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अनुशासन पर्व · अध्याय 189

विष्णु, देवताओं और ब्रह्मा को प्रसन्न करने के उपाय

इन्द्र के पूछने पर विष्णु बताते हैं कि ब्राह्मणों का सम्मान, गौ, पीपल और गोरोचना की पूजा तथा सन्ध्योपासना से वे प्रसन्न होते हैं। बलदेव, देवता, धर्म, अग्नि और विश्वामित्र एक-एक रहस्य बताते हैं: प्रातःकाल गौ और घी का स्पर्श, ताँबे के पात्र का प्रयोग, किन्हें दान नहीं देना चाहिए, पैर से गौ, ब्राह्मण या अग्नि को छूने के दोष, और गौओं के मन्त्र के साथ खीर का श्राद्ध। अन्त में सप्तर्षि ब्रह्मा से पूछते हैं कि निर्धन यज्ञ का फल कैसे पा सकते हैं, और वे पौष मास की रोहिणी-रात्रि में खुले आकाश के नीचे शयन का उपाय बताते हैं।

अध्याय 188अध्याय-सूचीअध्याय 190

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.189.1)

केन ते च भवेत्प्रीतिः कथं तुष्टिं तु गच्छसि । इति पृष्टः सुरेन्द्रेण प्रोवाच हरिरीश्वरः ॥

kena te ca bhavetprītiḥ kathaṃ tuṣṭiṃ tu gacchasi | iti pṛṣṭaḥ surendreṇa provāca harirīśvaraḥ

"आप किससे प्रसन्न होते हैं और कैसे सन्तुष्ट होते हैं?" देवेन्द्र के इस प्रकार पूछने पर ईश्वर हरि ने उत्तर दिया।

विष्णुरुवाच

श्लोक 2 (13.189.2)

ब्राह्मणानां परीवादो मम विद्वेषणं महत् । ब्राह्मणैः पूजितैर्नित्यं पूजितोऽहं न संशयः ॥

brāhmaṇānāṃ parīvādo mama vidveṣaṇaṃ mahat | brāhmaṇaiḥ pūjitairnityaṃ pūjito'haṃ na saṃśayaḥ

ब्राह्मणों की निन्दा मेरे प्रति महान् द्वेष है। ब्राह्मणों की सदा पूजा होने पर मेरी ही पूजा होती है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 3 (13.189.3)

नित्याभिवाद्या विप्रेन्द्रा भुक्त्वा पादौ तथाऽऽत्मनः । तेषां तुष्यामि मर्त्यानां यश्चक्रे च बलिं हरेत् ॥

nityābhivādyā viprendrā bhuktvā pādau tathā''tmanaḥ | teṣāṃ tuṣyāmi martyānāṃ yaścakre ca baliṃ haret

श्रेष्ठ ब्राह्मणों को प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिए; और इसी प्रकार भोजन करके अपने पैरों और अपने शरीर का भी। जो मनुष्य चक्र के निमित्त बलि अर्पित करते हैं, उनसे मैं प्रसन्न होता हूँ।

श्लोक 4 (13.189.4)

वामनं ब्राह्मणं दृष्ट्वा वराहं च जलोत्थितम् । उद्धृतां धरणीं चैव मूर्ध्ना धारयते तु यः । न तेषामशुभं किञ्चित्कल्मषं चोपपद्यते ॥

vāmanaṃ brāhmaṇaṃ dṛṣṭvā varāhaṃ ca jalotthitam | uddhṛtāṃ dharaṇīṃ caiva mūrdhnā dhārayate tu yaḥ | na teṣāmaśubhaṃ kiñcitkalmaṣaṃ copapadyate

जो मनुष्य ब्राह्मण-रूप वामन को और जल से निकले वराह को देखकर, उद्धार की गई पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करता है, उन्हें कोई अशुभ या पाप नहीं लगता।

श्लोक 5 (13.189.5)

अश्वत्थं रोचनां गां च पूजयेद्यो नरः सदा । पूजितं च जगत्तेन सदेवासुरमानुषम् ॥

aśvatthaṃ rocanāṃ gāṃ ca pūjayedyo naraḥ sadā | pūjitaṃ ca jagattena sadevāsuramānuṣam

जो मनुष्य सदा पीपल, गोरोचना और गौ की पूजा करता है, उसके द्वारा देवता, असुर और मनुष्यों-सहित सारा जगत् पूजित हो जाता है।

श्लोक 6 (13.189.6)

तेन रूपेण तेषां च पूजां गृह्णामि तत्त्वतः । पूजा ममैषा नास्त्यन्या यावल्लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥

tena rūpeṇa teṣāṃ ca pūjāṃ gṛhṇāmi tattvataḥ | pūjā mamaiṣā nāstyanyā yāvallokāḥ pratiṣṭhitāḥ

उसी रूप में मैं उनकी पूजा वास्तव में ग्रहण करता हूँ। जब तक लोक स्थित हैं, तब तक मेरी यही पूजा है, दूसरी नहीं।

श्लोक 7 (13.189.7)

अन्यथा हि वृथा मर्त्याः पूजयन्त्यल्पबुद्धयः । नाहं तत्प्रतिगृह्णामि न सा तुष्टिकरी मम ॥

anyathā hi vṛthā martyāḥ pūjayantyalpabuddhayaḥ | nāhaṃ tatpratigṛhṇāmi na sā tuṣṭikarī mama

अन्यथा अल्पबुद्धि मनुष्य व्यर्थ ही पूजा करते हैं। उसे मैं ग्रहण नहीं करता और वह मुझे सन्तुष्ट नहीं करती।

इन्द्र उवाच

श्लोक 8 (13.189.8)

चक्रं पादौ वराहं च ब्राह्मणं चापि वामनम् । उद्धृतां धरणीं चैव किमर्थं त्वं प्रशंससि ॥

cakraṃ pādau varāhaṃ ca brāhmaṇaṃ cāpi vāmanam | uddhṛtāṃ dharaṇīṃ caiva kimarthaṃ tvaṃ praśaṃsasi

आप चक्र, चरण, वराह, ब्राह्मण, वामन और उठाई गई पृथ्वी की प्रशंसा किसलिए करते हैं?

श्लोक 9 (13.189.9)

भवान्सृजति भूतानि भवान्संहरति प्रजाः । प्रकृतिः सर्वभूतानां समर्त्यानां सनातनी ॥

bhavānsṛjati bhūtāni bhavānsaṃharati prajāḥ | prakṛtiḥ sarvabhūtānāṃ samartyānāṃ sanātanī

आप प्राणियों की सृष्टि करते हैं और प्रजा का संहार करते हैं; मनुष्यों-सहित समस्त प्राणियों की आप सनातन प्रकृति हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 10 (13.189.10)

सम्प्रहस्य ततो विष्णुरिदं वचनमब्रवीत् । चक्रेण निहता दैत्याः पद्भ्यां क्रान्ता वसुन्धरा ॥

samprahasya tato viṣṇuridaṃ vacanamabravīt | cakreṇa nihatā daityāḥ padbhyāṃ krāntā vasundharā

तब विष्णु ने हँसकर ये वचन कहे: "चक्र से दैत्य मारे गए और पैरों से पृथ्वी नापी गई।"

विष्णुरुवाच

श्लोक 11 (13.189.11)

वाराहं रूपमास्थाय हिरण्याक्षो निपातितः । वामनं रूपमास्थाय जितो राजा मया बलिः ॥

vārāhaṃ rūpamāsthāya hiraṇyākṣo nipātitaḥ | vāmanaṃ rūpamāsthāya jito rājā mayā baliḥ

"वराह का रूप धारण करके मैंने हिरण्याक्ष को मार गिराया; वामन का रूप धारण करके राजा बलि को जीत लिया।"

श्लोक 12 (13.189.12)

परितुष्टो भवाम्येवं मानुषाणां महात्मनाम् । तन्मां ये पूजयिष्यन्ति नास्ति तेषां पराभवः ॥

parituṣṭo bhavāmyevaṃ mānuṣāṇāṃ mahātmanām | tanmāṃ ye pūjayiṣyanti nāsti teṣāṃ parābhavaḥ

"इस प्रकार मैं महात्मा मनुष्यों पर प्रसन्न होता हूँ। इसलिए जो मेरी पूजा करेंगे, उनकी कभी पराजय नहीं होती।"

श्लोक 13 (13.189.13)

अपि वा ब्राह्मणं दृष्ट्वा ब्रह्मचारिणमागतम् । ब्राह्मणाग्र्याहुतिं दत्त्वा अमृतं तस्य भोजनम् ॥

api vā brāhmaṇaṃ dṛṣṭvā brahmacāriṇamāgatam | brāhmaṇāgryāhutiṃ dattvā amṛtaṃ tasya bhojanam

अथवा आए हुए ब्रह्मचारी ब्राह्मण को देखकर जो ब्राह्मण को पहली आहुति (भोजन) देता है, उसका भोजन अमृत हो जाता है।

श्लोक 14 (13.189.14)

ऐन्द्रीं संध्यामुपासित्वा आदित्याभिमुखः स्थितः । सर्वतीर्थेषु स स्नातो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥

aindrīṃ saṃdhyāmupāsitvā ādityābhimukhaḥ sthitaḥ | sarvatīrtheṣu sa snāto mucyate sarvakilbiṣaiḥ

सूर्य की ओर मुख करके खड़े होकर ऐन्द्री सन्ध्या की उपासना करने पर वह मानो सब तीर्थों में स्नान कर चुका होता है और सब पापों से छूट जाता है।

श्लोक 15 (13.189.15)

एतद्वः कथितं गुह्यमखिलेन तपोधनाः । संशयं पृच्छमानानां किं भूयः कथयाम्यहम् ॥

etadvaḥ kathitaṃ guhyamakhilena tapodhanāḥ | saṃśayaṃ pṛcchamānānāṃ kiṃ bhūyaḥ kathayāmyaham

हे तपोधनो, यह रहस्य मैंने आपको पूरा-पूरा कह दिया। संशय पूछनेवाले आप लोगों से अब मैं और क्या कहूँ?

बलदेव उवाच

श्लोक 16 (13.189.16)

श्रूयतां परमं गुह्यं मानुषाणां सुखावहम् । अजानन्तो यदबुधाः क्लिश्यन्ते भूतपीडिताः ॥

śrūyatāṃ paramaṃ guhyaṃ mānuṣāṇāṃ sukhāvaham | ajānanto yadabudhāḥ kliśyante bhūtapīḍitāḥ

मनुष्यों को सुख देनेवाला परम रहस्य सुनो, जिसे न जानने से अज्ञानी लोग भूतों से पीड़ित होकर कष्ट पाते हैं।

श्लोक 17 (13.189.17)

कल्य उत्थाय यो मर्त्यः स्पृशेद्गां वै घृतं दधि । सर्षपं च प्रियङ्गुं च कल्मषात्प्रतिमुच्यते ॥

kalya utthāya yo martyaḥ spṛśedgāṃ vai ghṛtaṃ dadhi | sarṣapaṃ ca priyaṅguṃ ca kalmaṣātpratimucyate

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर गौ, घी, दही, सरसों और प्रियङ्गु का स्पर्श करता है, वह पाप से छूट जाता है।

श्लोक 18 (13.189.18)

भूतानि चैव सर्वाणि अग्रतः पृष्ठतोपि वा । उच्छिष्टं वाऽपि च्छिद्रेषु वर्जयन्ति तपोधनाः ॥

bhūtāni caiva sarvāṇi agrataḥ pṛṣṭhatopi vā | ucchiṣṭaṃ vā'pi cchidreṣu varjayanti tapodhanāḥ

तपस्वी लोग सब प्राणियों से, चाहे वे आगे हों या पीछे, और छिद्रों में भी उच्छिष्ट से बचते हैं।

देवा ऊचुः

श्लोक 19 (13.189.19)

प्रगृह्यौदुम्बरं पात्रं तोयपूर्णमुदङ्मुखः । उपवासं तु गृह्णीयाद्यद्वा सङ्कल्पयेद्व्रतम् ॥

pragṛhyaudumbaraṃ pātraṃ toyapūrṇamudaṅmukhaḥ | upavāsaṃ tu gṛhṇīyādyadvā saṅkalpayedvratam

गूलर की लकड़ी का जल से भरा पात्र लेकर, उत्तर की ओर मुख करके, वह उपवास ग्रहण करे अथवा किसी व्रत का सङ्कल्प करे।

श्लोक 20 (13.189.20)

देवतास्तस्य तुष्यन्ति कामिकं चापि सिध्यति । अन्यथा हि वृथा मर्त्याः कुर्वते स्वल्पबुद्धयः ॥

devatāstasya tuṣyanti kāmikaṃ cāpi sidhyati | anyathā hi vṛthā martyāḥ kurvate svalpabuddhayaḥ

उससे देवता प्रसन्न होते हैं और उसकी कामना सिद्ध होती है। अन्यथा अल्पबुद्धि मनुष्य व्यर्थ ही करते हैं।

श्लोक 21 (13.189.21)

उपवासे बलौ चापि ताम्रपात्रं विशिष्यते । बलिर्भिक्षा तथाऽर्घ्यं च पितॄणां च तिलोदकम् ॥

upavāse balau cāpi tāmrapātraṃ viśiṣyate | balirbhikṣā tathā'rghyaṃ ca pitṝṇāṃ ca tilodakam

उपवास में और बलि में ताँबे का पात्र श्रेष्ठ माना जाता है; बलि, भिक्षा, अर्घ्य और पितरों के लिए तिलोदक

श्लोक 22 (13.189.22)

ताम्रपात्रेण दातव्यमन्यथाऽल्पफलं भवेत् । गुह्यमेतत्समुद्दिष्टं यथा तुष्यन्ति देवताः ॥

tāmrapātreṇa dātavyamanyathā'lpaphalaṃ bhavet | guhyametatsamuddiṣṭaṃ yathā tuṣyanti devatāḥ

ताँबे के पात्र से देना चाहिए; अन्यथा फल थोड़ा होता है। देवता जिस प्रकार प्रसन्न होते हैं, यह रहस्य बता दिया गया।

धर्म उवाच

श्लोक 23 (13.189.23)

राजपौरुषिके विप्रे घाण्टिके परिचारिके । गोरक्षके वाणिजके तथा कारुकुशीलवे ॥

rājapauruṣike vipre ghāṇṭike paricārike | gorakṣake vāṇijake tathā kārukuśīlave

राजा के सेवक ब्राह्मण को, घण्टा बजानेवाले को, परिचारक को, गोरक्षक को, वणिक् को तथा कारीगर और नट को,

श्लोक 24 (13.189.24)

मित्रद्रुह्यनधीयाने यश्च स्याद्वृषलीपतिः । एतेषु दैवं पित्र्यं वा न देयं स्यात्कथञ्चन । पिण्डदास्तस्य हीयन्ते न च प्रीणाति वै पितॄन् ॥

mitradruhyanadhīyāne yaśca syādvṛṣalīpatiḥ | eteṣu daivaṃ pitryaṃ vā na deyaṃ syātkathañcana | piṇḍadāstasya hīyante na ca prīṇāti vai pitṝn

मित्र से द्रोह करनेवाले को, वेद न पढ़नेवाले को और जो वृषली का पति है, इन्हें देवकर्म या पितृकर्म का दान किसी प्रकार नहीं देना चाहिए। उसके पिण्ड देनेवाले क्षीण होते जाते हैं और वह पितरों को तृप्त नहीं करता।

श्लोक 25 (13.189.25)

अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । पितरस्तस्य देवाश्च अग्नयश्च तथैव हि । निराशाः प्रतिगच्छन्ति अतिथेरप्रतिग्रहात् ॥

atithiryasya bhagnāśo gṛhātpratinivartate | pitarastasya devāśca agnayaśca tathaiva hi | nirāśāḥ pratigacchanti atitherapratigrahāt

जिसके घर से अतिथि निराश होकर लौट जाता है, उसके पितर, देवता और अग्नियाँ भी अतिथि का सत्कार न होने के कारण निराश होकर चले जाते हैं।

श्लोक 26 (13.189.26)

स्त्रीघ्नैर्गोघ्नैः कृतघ्नैश्च ब्रह्मघ्नैर्गुरुतल्पगैः । तुल्यदोषो भवत्येभिर्यस्यातिथिरनर्चितः ॥

strīghnairgoghnaiḥ kṛtaghnaiśca brahmaghnairgurutalpagaiḥ | tulyadoṣo bhavatyebhiryasyātithiranarcitaḥ

जिसके यहाँ अतिथि का सत्कार नहीं होता, वह स्त्री-हत्यारों, गोहत्यारों, कृतघ्नों, ब्रह्महत्यारों और गुरुपत्नीगामियों के समान दोषी होता है।

अग्निरुवाच

श्लोक 27 (13.189.27)

पादमुद्यम्य यो मर्त्यः स्पृशेद्गाश्च सुदुर्मतिः । ब्राह्मणं वा महाभागं दीप्यमानं तथाऽनलम् । तस्य दोषान्प्रवक्ष्यामि तच्छृणुध्वं समाहिताः ॥

pādamudyamya yo martyaḥ spṛśedgāśca sudurmatiḥ | brāhmaṇaṃ vā mahābhāgaṃ dīpyamānaṃ tathā'nalam | tasya doṣānpravakṣyāmi tacchṛṇudhvaṃ samāhitāḥ

जो दुर्बुद्धि मनुष्य पैर उठाकर गौओं को, अथवा महाभाग ब्राह्मण को, अथवा प्रज्वलित अग्नि को छूता है, उसके दोष मैं बताऊँगा; सावधान होकर सुनो।

श्लोक 28 (13.189.28)

दिवं स्पृशत्यशब्दोऽस्य त्रस्यन्ति पितरश्च वै । वैमनस्यं च देवानां कृतं भवति पुष्कलम् । पावकश्च महातेजा हव्यं न प्रतिगृह्णति ॥

divaṃ spṛśatyaśabdo'sya trasyanti pitaraśca vai | vaimanasyaṃ ca devānāṃ kṛtaṃ bhavati puṣkalam | pāvakaśca mahātejā havyaṃ na pratigṛhṇati

उसकी निन्दा स्वर्ग तक पहुँचती है, पितर काँप उठते हैं, देवताओं में भरपूर अप्रसन्नता उत्पन्न होती है, और महातेजस्वी अग्नि उसका हव्य ग्रहण नहीं करता।

श्लोक 29 (13.189.29)

आजन्मनां शतं चैव नरके पच्यते तु सः । निष्कृतिं च न तस्यापि अनुमन्यन्ति कर्हिचित् ॥

ājanmanāṃ śataṃ caiva narake pacyate tu saḥ | niṣkṛtiṃ ca na tasyāpi anumanyanti karhicit

वह सौ जन्मों तक नरक में पकाया जाता है, और उसके लिए वे कभी प्रायश्चित्त की अनुमति नहीं देते।

श्लोक 30 (13.189.30)

तस्माद्गावो न पादेन स्प्रष्टव्या वै कदाचन । ब्राह्मणश्च महातेजा दीप्यमानस्तथाऽनलः । श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता ॥

tasmādgāvo na pādena spraṣṭavyā vai kadācana | brāhmaṇaśca mahātejā dīpyamānastathā'nalaḥ | śraddadhānena martyena ātmano hitamicchatā

इसलिए अपना हित चाहनेवाले श्रद्धावान् मनुष्य को गौओं को कभी पैर से नहीं छूना चाहिए, न तेजस्वी ब्राह्मण को, न प्रज्वलित अग्नि को।

श्लोक 31 (13.189.31)

एते दोषा मया प्रोक्तास्त्रिषु यः पादमुत्सृजेत् ॥

ete doṣā mayā proktāstriṣu yaḥ pādamutsṛjet

जो इन तीनों की ओर पैर बढ़ाता है, उसके ये दोष मैंने बता दिए।

विश्वामित्र उवाच

श्लोक 32 (13.189.32)

श्रूयतां परमं गुह्यं रहस्यं धर्मसंहितम् । परमान्नेन यो दद्यात्पितॄणामौपहारिकम् ॥

śrūyatāṃ paramaṃ guhyaṃ rahasyaṃ dharmasaṃhitam | paramānnena yo dadyātpitṝṇāmaupahārikam

धर्म से युक्त परम गुह्य रहस्य सुनो: जो पितरों को परमान्न (खीर) का उपहार देता है,

श्लोक 33 (13.189.33)

गजच्छायायां पूर्वस्यां कुतपे दक्षिणामुखः । यदा भाद्रपदे मासि भवते बहुले मघा ॥

gajacchāyāyāṃ pūrvasyāṃ kutape dakṣiṇāmukhaḥ | yadā bhādrapade māsi bhavate bahule maghā

जब पूर्व दिशा में हाथी की छाया पड़े, कुतप काल में, दक्षिण की ओर मुख करके, भाद्रपद मास में जब कृष्ण पक्ष में मघा नक्षत्र हो,

श्लोक 34 (13.189.34)

श्रूयतां तस्य दानस्य यादृशो गुणविस्तरः । कृतं तेन महच्छ्राद्धं वर्षाणीह त्रयोदश ॥

śrūyatāṃ tasya dānasya yādṛśo guṇavistaraḥ | kṛtaṃ tena mahacchrāddhaṃ varṣāṇīha trayodaśa

उस दान के गुणों का कितना विस्तार है, यह सुनो: उसने यहाँ तेरह वर्षों तक चलनेवाला महान् श्राद्ध कर लिया।

श्लोक 35 (13.189.35)

बहुले समङ्गे ह्यकुतोभये च । क्षेमे च संख्येव हि भूयसी च । यथा पुरा ब्रह्मपुरे सवत्सा । शतक्रतोर्वज्रधरस्य यज्ञे ॥

bahule samaṅge hyakutobhaye ca | kṣeme ca saṃkhyeva hi bhūyasī ca | yathā purā brahmapure savatsā | śatakratorvajradharasya yajñe

बहुला और समङ्गा में, जहाँ किसी ओर से भय नहीं, और क्षेमा में, और उसमें जो गणना की तरह बढ़ती जाती है; जैसे पूर्वकाल में ब्रह्मपुर में वज्रधारी शतक्रतु के यज्ञ में बछड़ेवाली गौ थी।

श्लोक 36 (13.189.36)

भूयश्च या विष्णुपदे स्थिता या । विभावसोश्चापि पथे स्थिता या । देवाश्च सर्वे सह नारदेन । प्रकुर्वते सर्वसहेति नाम ॥

bhūyaśca yā viṣṇupade sthitā yā | vibhāvasoścāpi pathe sthitā yā | devāśca sarve saha nāradena | prakurvate sarvasaheti nāma

और जो विष्णुपद में स्थित है, और जो सूर्य के मार्ग में स्थित है, जिसे नारद-सहित सब देवता 'सर्वसहा' नाम से पुकारते हैं।

श्लोक 37 (13.189.37)

मन्त्रेणैतेनाभिवन्देत यो वै । विमुच्यते पापकृतेन कर्मणा । लोकानवाप्नोति पुरंदरस्य । गवां फलं चन्द्रमसो द्युतिं च ॥

mantreṇaitenābhivandeta yo vai | vimucyate pāpakṛtena karmaṇā | lokānavāpnoti puraṃdarasya | gavāṃ phalaṃ candramaso dyutiṃ ca

जो इस मन्त्र से प्रणाम करता है, वह अपने पापकर्म से छूट जाता है; वह पुरन्दर के लोकों को, गौओं के फल को और चन्द्रमा की कान्ति को प्राप्त करता है।

श्लोक 38 (13.189.38)

एवं हि मन्त्रं त्रिदशाभिजुष्टं । पठेत यः पर्वसु गोष्ठमध्ये । न तस्य पापं न भयं न शोकः । सहस्रनेत्रस्य च याति लोकम् ॥

evaṃ hi mantraṃ tridaśābhijuṣṭaṃ | paṭheta yaḥ parvasu goṣṭhamadhye | na tasya pāpaṃ na bhayaṃ na śokaḥ | sahasranetrasya ca yāti lokam

जो पर्व के दिनों में गोशाला के बीच देवताओं को प्रिय इस मन्त्र का पाठ करता है, उसे न पाप लगता है, न भय, न शोक; और वह सहस्रनेत्र इन्द्र के लोक को जाता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 39 (13.189.39)

अथ सप्त महाभाग ऋषयो लोकविश्रुताः । वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे ब्रह्माणं पद्मसम्भवम् ॥

atha sapta mahābhāga ṛṣayo lokaviśrutāḥ | vasiṣṭhapramukhāḥ sarve brahmāṇaṃ padmasambhavam

फिर लोक में प्रसिद्ध वसिष्ठ आदि सातों महर्षि कमल से उत्पन्न ब्रह्मा के पास गए,

श्लोक 40 (13.189.40)

प्रदक्षिणमभिक्रम्य सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः । उवाच वचनं तेषां वसिष्ठो ब्रह्मवित्तमः ॥

pradakṣiṇamabhikramya sarve prāñjalayaḥ sthitāḥ | uvāca vacanaṃ teṣāṃ vasiṣṭho brahmavittamaḥ

सब ने प्रदक्षिणा करके हाथ जोड़े खड़े होकर उन्हें प्रणाम किया; और ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ ने उनकी ओर से वचन कहा।

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 41 (13.189.41)

सर्वप्राणिहितं प्रश्नं ब्रह्मक्षेत्रे विशेषतः । द्रव्यहीनाः कथं मर्त्या दरिद्राः साधुवर्तिनः ॥

sarvaprāṇihitaṃ praśnaṃ brahmakṣetre viśeṣataḥ | dravyahīnāḥ kathaṃ martyā daridrāḥ sādhuvartinaḥ

"सब प्राणियों के हित का प्रश्न, विशेषकर ब्रह्मक्षेत्र में: धन से रहित, निर्धन किन्तु सदाचारी मनुष्य कैसे

भीष्म उवाच

श्लोक 42 (13.189.42)

प्राप्नुवन्तीह यज्ञस्य फलं केन च कर्मणा । एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥

prāpnuvantīha yajñasya phalaṃ kena ca karmaṇā | etacchrutvā vacasteṣāṃ brahmā vacanamabravīt

यज्ञ का फल पाते हैं, और किस कर्म से?" उनकी यह बात सुनकर ब्रह्मा ने कहा।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 43 (13.189.43)

अहो प्रश्नो महाभाग गूढार्थः परमः शुभः । सूक्ष्मः श्रेयांश्च मर्त्यानां भवद्भिः समुदाहृतः ॥

aho praśno mahābhāga gūḍhārthaḥ paramaḥ śubhaḥ | sūkṣmaḥ śreyāṃśca martyānāṃ bhavadbhiḥ samudāhṛtaḥ

"अहो महाभाग, कैसा प्रश्न है! आपने गूढ़ अर्थवाला, परम, शुभ, सूक्ष्म और मनुष्यों के लिए अत्यन्त कल्याणकारी प्रश्न उठाया है।

श्लोक 44 (13.189.44)

श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये निखिलेन तपोधनाः । यथा यज्ञफलं मर्त्यो लभते नात्र संशयः ॥

śrūyatāṃ sarvamākhyāsye nikhilena tapodhanāḥ | yathā yajñaphalaṃ martyo labhate nātra saṃśayaḥ

हे तपोधनो, सुनिए; मैं सब पूरा-पूरा कहूँगा कि मनुष्य यज्ञ का फल कैसे पाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 45 (13.189.45)

पौषमासस्य शुक्ले वै यदा युज्येत रोहिणी । तेन नक्षत्रयोगेन आकाशशयनो भवेत् ॥

pauṣamāsasya śukle vai yadā yujyeta rohiṇī | tena nakṣatrayogena ākāśaśayano bhavet

पौष मास के शुक्ल पक्ष में जब रोहिणी का योग हो, उस नक्षत्र-योग में वह खुले आकाश के नीचे शयन करे,

श्लोक 46 (13.189.46)

एकवस्त्रः शुचिः स्नातः श्रद्दधानः समाहितः । सोमस्य रश्मयः पीत्वा महायज्ञफलं लभेत् ॥

ekavastraḥ śuciḥ snātaḥ śraddadhānaḥ samāhitaḥ | somasya raśmayaḥ pītvā mahāyajñaphalaṃ labhet

एक वस्त्र पहने, पवित्र, स्नान किया हुआ, श्रद्धावान् और एकाग्र होकर; चन्द्रमा की किरणों का पान करके वह महायज्ञ का फल पाता है।

श्लोक 47 (13.189.47)

एतद्वः परमं गुह्यं कथितं द्विजसत्तमाः । यन्मां भवन्तः पृच्छन्ति सूक्ष्मतत्त्वार्थदर्शिनः ॥

etadvaḥ paramaṃ guhyaṃ kathitaṃ dvijasattamāḥ | yanmāṃ bhavantaḥ pṛcchanti sūkṣmatattvārthadarśinaḥ

हे द्विजश्रेष्ठो, सूक्ष्म तत्त्व को देखनेवाले आप लोग जो मुझसे पूछ रहे हैं, वह परम गुह्य रहस्य आपको बता दिया।"

अध्याय 188अध्याय-सूचीअध्याय 190