अनुशासन पर्व · अध्याय 190
विभावसु, श्री और ऋषियों के बताए धर्म-रहस्य
इस कोष्ठकबद्ध प्रसंग में विभावसु, श्री, अङ्गिरा, गार्ग्य, धौम्य और जमदग्नि बारी-बारी से छोटे-छोटे नियम बताते हैं: उगते चन्द्रमा को पूर्णिमा की बलि, अमावस्या के दोष, मलिन घर का विनाश, दीपदान, अयोग्य व्यक्तियों की दृष्टि से हवि का नष्ट होना, घर के अशुभ पदार्थ, और यह कि शुद्ध हृदय महँगे यज्ञों से बढ़कर है।
विभावसुरुवाच
श्लोक 1 (13.190.1)
सलिलस्याञ्जलिं पूर्णमक्षताश्च घृतोत्तराः । सोमस्योत्तिष्ठमानस्य तज्जलं चाक्षतांश्च तान् ॥
salilasyāñjaliṃ pūrṇamakṣatāśca ghṛtottarāḥ | somasyottiṣṭhamānasya tajjalaṃ cākṣatāṃśca tān
जल से भरी अंजलि और घी चुपड़े हुए अक्षत (साबुत चावल) लेकर, उगते हुए चन्द्रमा को वही जल और वे अक्षत अर्पित करे।
श्लोक 2 (13.190.2)
स्थितो ह्यभिमुखो मर्त्यः पौर्णमास्यां बलिं हरेत् । अग्निकार्यं कृतं तेन हुताश्चास्याग्नयस्त्रयः ॥
sthito hyabhimukho martyaḥ paurṇamāsyāṃ baliṃ haret | agnikāryaṃ kṛtaṃ tena hutāścāsyāgnayastrayaḥ
जो मनुष्य पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा के सामने खड़ा होकर इस प्रकार बलि अर्पित करता है, उसने मानो अग्निकार्य कर लिया और उसकी तीनों अग्नियाँ तृप्त हो गईं।
श्लोक 3 (13.190.3)
वनस्पतिं च यो हन्यादमावास्यामबुद्धिमान् । अपि ह्येकेन पत्रेण लिप्यते ब्रह्महत्यया ॥
vanaspatiṃ ca yo hanyādamāvāsyāmabuddhimān | api hyekena patreṇa lipyate brahmahatyayā
जो अज्ञानी अमावस्या के दिन वृक्ष को काटता है, वह एक पत्ते के लिए भी ब्रह्महत्या के पाप से लिप्त हो जाता है।
श्लोक 4 (13.190.4)
दन्तकाष्ठं तु यः खादेदमावास्यामबुद्धिमान् । हिंसितश्चन्द्रमास्तेन पितरश्चोद्विजन्ति च ॥
dantakāṣṭhaṃ tu yaḥ khādedamāvāsyāmabuddhimān | hiṃsitaścandramāstena pitaraścodvijanti ca
जो अज्ञानी अमावस्या के दिन दातुन चबाता है, उससे चन्द्रमा की हिंसा होती है और पितर भी उद्विग्न हो उठते हैं।
श्लोक 5 (13.190.5)
हव्यं न तस्य देवाश्च प्रतिगृह्णन्ति पर्वसु । कुप्यन्ते पितरश्चास्य कुले वंशोऽस्य हीयते ॥
havyaṃ na tasya devāśca pratigṛhṇanti parvasu | kupyante pitaraścāsya kule vaṃśo'sya hīyate
पर्व के दिनों में देवता उसकी हवि ग्रहण नहीं करते, उसके पितर कुपित होते हैं और उसके कुल का वंश घटने लगता है।
श्रीरुवाच
श्लोक 6 (13.190.6)
प्रकीर्णं भाजनं यत्र भिन्नभाण्डमथासनम् । योषितश्चैव हन्यन्ते कश्मलोपहते गृहे ॥
prakīrṇaṃ bhājanaṃ yatra bhinnabhāṇḍamathāsanam | yoṣitaścaiva hanyante kaśmalopahate gṛhe
जिस घर में मलिनता छाई हो, बर्तन बिखरे पड़े हों, मटके और आसन टूटे हों और स्त्रियों को मारा-पीटा जाता हो,
श्लोक 7 (13.190.7)
देवताः पितरश्चैव उत्सवे पर्वणीषु वा । निराशाः प्रतिगच्छन्ति कश्मलोपहताद्गृहात् ॥
devatāḥ pitaraścaiva utsave parvaṇīṣu vā | nirāśāḥ pratigacchanti kaśmalopahatādgṛhāt
ऐसे मलिन घर से देवता और पितर, उत्सव अथवा पर्व के दिन भी, निराश होकर लौट जाते हैं।
अङ्गिरा उवाच
श्लोक 8 (13.190.8)
यस्तु संवत्सरं पूर्णं दद्याद्दीपं करञ्जके । सुवर्चलामूलहस्तः प्रजा तस्य विवर्धते ॥
yastu saṃvatsaraṃ pūrṇaṃ dadyāddīpaṃ karañjake | suvarcalāmūlahastaḥ prajā tasya vivardhate
जो पूरे एक वर्ष तक हाथ में सुवर्चला की जड़ लेकर करञ्ज वृक्ष के पास दीप जलाकर रखता है, उसकी सन्तान बढ़ती है।
गार्ग्य उवाच
श्लोक 9 (13.190.9)
आतिथ्यं सततं कुर्याद्दीपं दद्यात्प्रतिश्रये । वर्जयानो दिवास्वापं न च मांसानि भक्षयेत् ॥
ātithyaṃ satataṃ kuryāddīpaṃ dadyātpratiśraye | varjayāno divāsvāpaṃ na ca māṃsāni bhakṣayet
वह सदा अतिथि-सत्कार करे, आश्रय-स्थान में दीप दे, दिन में सोना छोड़ दे और मांस न खाए।
श्लोक 10 (13.190.10)
गोब्राह्मणं न हिंस्याच्च पुष्कराणि च कीर्तयेत् । एष श्रेष्ठतमो धर्मः सरहस्यो महाफलः ॥
gobrāhmaṇaṃ na hiṃsyācca puṣkarāṇi ca kīrtayet | eṣa śreṣṭhatamo dharmaḥ sarahasyo mahāphalaḥ
वह गौओं और ब्राह्मणों की हिंसा न करे और पुष्कर तीर्थों का कीर्तन करे। यह सबसे श्रेष्ठ धर्म है, रहस्य सहित और महान फल देने वाला।
श्लोक 11 (13.190.11)
अपि क्रतुशतैरिष्ट्वा क्षयं गच्छति तद्धविः । न तु क्षीयन्ति ते धर्माः श्रद्दधानैः प्रयोजिताः ॥
api kratuśatairiṣṭvā kṣayaṃ gacchati taddhaviḥ | na tu kṣīyanti te dharmāḥ śraddadhānaiḥ prayojitāḥ
सैकड़ों यज्ञ करके भी मनुष्य की वह हवि क्षीण हो जाती है; किन्तु श्रद्धा से किए गए ये धर्म कभी क्षीण नहीं होते।
श्लोक 12 (13.190.12)
इदं च परमं गुह्यं सरहस्यं निबोधत । श्राद्धकल्पे च दैवे च तैर्थिके पर्वणीषु च ॥
idaṃ ca paramaṃ guhyaṃ sarahasyaṃ nibodhata | śrāddhakalpe ca daive ca tairthike parvaṇīṣu ca
अब यह परम गोपनीय बात रहस्य सहित सुनो: श्राद्ध-कर्म में, देवकर्म में, तीर्थ में और पर्वों के अवसर पर —
श्लोक 13 (13.190.13)
रजस्वला च या नारी श्वित्रिकाऽपुत्रिका च या । एताभिश्चक्षुषा दृष्टं हविर्नाश्नन्ति देवताः । पितरश्च न तुष्यन्ति वर्षाण्यपि त्रयोदश ॥
rajasvalā ca yā nārī śvitrikā'putrikā ca yā | etābhiścakṣuṣā dṛṣṭaṃ havirnāśnanti devatāḥ | pitaraśca na tuṣyanti varṣāṇyapi trayodaśa
जो स्त्री रजस्वला हो, या श्वित्र (श्वेत कुष्ठ) से ग्रस्त हो, या सन्तानहीन हो, उसकी दृष्टि पड़ी हुई हवि को देवता ग्रहण नहीं करते और पितर तेरह वर्षों तक तृप्त नहीं होते।
श्लोक 14 (13.190.14)
शुक्लवासाः शुचिर्भूत्वा ब्राह्मणान्स्वस्ति वाचयेत् । कीर्तयेद्भारतं चैव तथा स्यादक्षयं हविः ॥
śuklavāsāḥ śucirbhūtvā brāhmaṇānsvasti vācayet | kīrtayedbhārataṃ caiva tathā syādakṣayaṃ haviḥ
श्वेत वस्त्र पहनकर और पवित्र होकर वह ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराए और भारत का पाठ करे; ऐसा करने से हवि अक्षय हो जाती है।
धौम्य उवाच
श्लोक 15 (13.190.15)
भिन्नभाण्डं च खट्वां च कुक्कुटं शुनकं तथा । अप्रशस्तानि सर्वाणि यश्च वृक्षो गृहेरुहः ॥
bhinnabhāṇḍaṃ ca khaṭvāṃ ca kukkuṭaṃ śunakaṃ tathā | apraśastāni sarvāṇi yaśca vṛkṣo gṛheruhaḥ
टूटा बर्तन, खाट, मुर्गा, कुत्ता और घर में उगा हुआ वृक्ष — ये सब अशुभ माने गए हैं।
श्लोक 16 (13.190.16)
भिन्नभाण्डे कलिं प्राहुः खट्वायां तु धनक्षयः । कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्नन्ति देवताः । वृक्षमूले ध्रुवं सत्वं तस्माद्वृक्षं न रोपयेत् ॥
bhinnabhāṇḍe kaliṃ prāhuḥ khaṭvāyāṃ tu dhanakṣayaḥ | kukkuṭe śunake caiva havirnāśnanti devatāḥ | vṛkṣamūle dhruvaṃ satvaṃ tasmādvṛkṣaṃ na ropayet
कहते हैं कि टूटे बर्तन में कलह का वास होता है और खाट से धन का क्षय होता है; मुर्गे और कुत्ते के रहते देवता हवि ग्रहण नहीं करते। वृक्ष की जड़ में निश्चय ही जीव-जन्तु (साँप-बिच्छू आदि) रहते हैं, इसलिए घर के पास वृक्ष न लगाए।
जमदग्निरुवाच
श्लोक 17 (13.190.17)
यो यजेदश्वमेधेन वाजपेयशतेन ह । अवाक्शिरा वा लम्बेत सत्रं वा स्फीतमाहरेत् ॥
yo yajedaśvamedhena vājapeyaśatena ha | avākśirā vā lambeta satraṃ vā sphītamāharet
जो अश्वमेध यज्ञ करे, या सौ वाजपेय यज्ञ करे, या सिर नीचे करके लटके, या समृद्ध सत्र का अनुष्ठान करे —
श्लोक 18 (13.190.18)
न यस्य हृदयं शुद्धं नरकं स ध्रुवं व्रजेत् । तुल्यं यज्ञश्च सत्यं च हृदयस्य च शुद्धता ॥
na yasya hṛdayaṃ śuddhaṃ narakaṃ sa dhruvaṃ vrajet | tulyaṃ yajñaśca satyaṃ ca hṛdayasya ca śuddhatā
यदि उसका हृदय शुद्ध नहीं है तो वह निश्चय ही नरक में जाता है। यज्ञ, सत्य और हृदय की शुद्धता — ये तीनों समान हैं।
श्लोक 19 (13.190.19)
शुद्धेन मनसा दत्त्वा सक्तुप्रस्थं द्विजातये । ब्रह्मलोकमनुप्राप्तः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥
śuddhena manasā dattvā saktuprasthaṃ dvijātaye | brahmalokamanuprāptaḥ paryāptaṃ tannidarśanam
जो शुद्ध मन से किसी द्विज को एक प्रस्थ सत्तू दान करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है; इसके लिए यही प्रमाण पर्याप्त है।