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अनुशासन पर्व · अध्याय 2

सुदर्शन द्वारा मृत्यु पर विजय

युधिष्ठिर पूछते हैं कि किस गृहस्थ ने मृत्यु को जीता था। भीष्म माहिष्मती के राजा दुर्योधन की कन्या और अग्नि के पुत्र सुदर्शन की कथा सुनाते हैं। गृहस्थ रहकर मृत्यु को जीतने की प्रतिज्ञा करके सुदर्शन अपनी पत्नी ओघवती को आदेश देता है कि वह अतिथि को कभी किसी बात के लिए मना न करे। जब एक ब्राह्मण अतिथि उसी को माँगता है और वह सहमत हो जाती है, तो सुदर्शन बिना क्रोध के यह स्वीकार कर लेता है। अतिथि धर्म के रूप में प्रकट होता है, मृत्यु हार जाता है, और सुदर्शन को इसी शरीर से शाश्वत लोकों का वर मिलता है, जबकि ओघवती नदी बनेगी।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.2.1)

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । श्रुतं मे महदाख्यानमिदं मतिमतांवर ॥

pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | śrutaṃ me mahadākhyānamidaṃ matimatāṃvara

पितामह! आप महाप्रज्ञ हैं और सब शास्त्रों में निपुण हैं। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! यह महान् आख्यान मैंने सुन लिया।

श्लोक 2 (13.2.2)

भूयस्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मार्थसहितं नृप । कथ्यमानं त्वया किञ्चित्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

bhūyastu śrotumicchāmi dharmārthasahitaṃ nṛpa | kathyamānaṃ tvayā kiñcittanme vyākhyātumarhasi

हे राजन्! मैं धर्म और अर्थ से भरी हुई कोई और बात आपके मुख से सुनना चाहता हूँ। कृपा करके मुझे समझाइए।

श्लोक 3 (13.2.3)

केन मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः । इत्येतद्धर्ममाचक्ष्व तत्त्वेनापि च पार्थिव ॥

kena mṛtyurgṛhasthena dharmamāśritya nirjitaḥ | ityetaddharmamācakṣva tattvenāpi ca pārthiva

किस गृहस्थ ने धर्म का आश्रय लेकर मृत्यु को जीता था? हे पृथ्वीपति! यह सब मुझे यथार्थ रूप से बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 4 (13.2.4)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । यथा मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | yathā mṛtyurgṛhasthena dharmamāśritya nirjitaḥ

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं कि किस प्रकार एक गृहस्थ ने धर्म का आश्रय लेकर मृत्यु को जीत लिया था।

श्लोक 5 (13.2.5)

मनोः प्रजापते राजन्निक्ष्वाकुरभवत्सुतः । तस्य पुत्रशतं जज्ञे नृपतेः सूर्यवर्चसः ॥

manoḥ prajāpate rājannikṣvākurabhavatsutaḥ | tasya putraśataṃ jajñe nṛpateḥ sūryavarcasaḥ

हे राजन्! प्रजापति मनु के पुत्र इक्ष्वाकु हुए। सूर्य के समान तेजस्वी उन राजा के सौ पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 6 (13.2.6)

दशमस्तस्य पुत्रस्तु दशाश्वो नाम भारत । माहिष्मत्यामभूद्राजा धर्मात्मा सत्यविक्रमः ॥

daśamastasya putrastu daśāśvo nāma bhārata | māhiṣmatyāmabhūdrājā dharmātmā satyavikramaḥ

हे भारत! उनका दसवाँ पुत्र दशाश्व नाम का था। वह धर्मात्मा और सत्यपराक्रमी राजा माहिष्मती में राज्य करता था।

श्लोक 7 (13.2.7)

दशाश्वस्य सुतस्त्वासीद्राजा परमधार्मिकः । सत्ये तपसि दाने च यस्य नित्यं रतं मनः ॥

daśāśvasya sutastvāsīdrājā paramadhārmikaḥ | satye tapasi dāne ca yasya nityaṃ rataṃ manaḥ

दशाश्व के एक पुत्र हुआ, जो परम धर्मात्मा राजा था और जिसका मन सदा सत्य, तप और दान में लगा रहता था।

श्लोक 8 (13.2.8)

मदिराश्व इति ख्यातः पृथिव्यां पृथिवीपतिः । धनुर्वेदे च वेदे च निरतो योऽभवत्सदा ॥

madirāśva iti khyātaḥ pṛthivyāṃ pṛthivīpatiḥ | dhanurvede ca vede ca nirato yo'bhavatsadā

वह पृथ्वीपति पृथ्वी पर मदिराश्व नाम से प्रसिद्ध था और सदा धनुर्वेद तथा वेद में तत्पर रहता था।

श्लोक 9 (13.2.9)

मदिराश्वस्य पुत्रस्तु द्युतिमान्नाम पार्थिवः । महाभागो महातेजा महासत्वो महाबलः ॥

madirāśvasya putrastu dyutimānnāma pārthivaḥ | mahābhāgo mahātejā mahāsatvo mahābalaḥ

मदिराश्व का पुत्र द्युतिमान् नाम का राजा हुआ, जो महान् भाग्यशाली, महातेजस्वी, महान् सत्त्वशाली और महाबली था।

श्लोक 10 (13.2.10)

पुत्रो द्युतिमतस्त्वासीद्राजा परमधार्मिकः । सर्वलोकेषु विख्यातः सुवीरो नाम नामतः । धर्मात्मा कोशवांश्चापि देवराज इवापरः ॥

putro dyutimatastvāsīdrājā paramadhārmikaḥ | sarvalokeṣu vikhyātaḥ suvīro nāma nāmataḥ | dharmātmā kośavāṃścāpi devarāja ivāparaḥ

द्युतिमान् का पुत्र परम धर्मात्मा राजा हुआ, जो सब लोकों में सुवीर नाम से प्रसिद्ध था। वह धर्मात्मा और कोशसम्पन्न था और दूसरे देवराज इन्द्र के समान था।

श्लोक 11 (13.2.11)

सुवीरस्य तु पुत्रोऽभूत्सर्वसङ्ग्रामदुर्जयः । दुर्जयो नाम विख्यातः सर्वशस्त्रभृतांवर ॥

suvīrasya tu putro'bhūtsarvasaṅgrāmadurjayaḥ | durjayo nāma vikhyātaḥ sarvaśastrabhṛtāṃvara

सुवीर का एक पुत्र हुआ, जो सब संग्रामों में अजेय था। वह दुर्जय नाम से विख्यात था और सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ था।

श्लोक 12 (13.2.12)

दुर्जयस्येन्द्रवपुषः पुत्रोऽग्निसदृशद्युतिः । दुर्योधनो नाम महान्राजा राजर्षिसत्तमः ॥

durjayasyendravapuṣaḥ putro'gnisadṛśadyutiḥ | duryodhano nāma mahānrājā rājarṣisattamaḥ

इन्द्र के समान शरीर वाले दुर्जय के अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र हुआ, दुर्योधन नाम का महान् राजा, जो राजर्षियों में श्रेष्ठ था।

श्लोक 13 (13.2.13)

तस्येन्द्रसमवीर्यस्य सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिनः । विषये वासवस्तस्य सम्यगेव प्रवर्षति ॥

tasyendrasamavīryasya saṅgrāmeṣvanivartinaḥ | viṣaye vāsavastasya samyageva pravarṣati

इन्द्र के समान वीर्य वाले और युद्धों में कभी पीछे न हटने वाले उस राजा के देश में इन्द्र ठीक समय पर वर्षा करते थे।

श्लोक 14 (13.2.14)

रत्नैर्धनैश्च पशुभिः सस्यैश्चापि पृथग्विधैः । नगरं विषयश्चास्य प्रतिपूर्णस्तदाऽभवत् ॥

ratnairdhanaiśca paśubhiḥ sasyaiścāpi pṛthagvidhaiḥ | nagaraṃ viṣayaścāsya pratipūrṇastadā'bhavat

उस समय उसका नगर और सारा राज्य रत्नों, धन, पशुओं और नाना प्रकार के अन्नों से भरपूर था।

श्लोक 15 (13.2.15)

न तस्य विषये चाभूत्कृपणो नापि दुर्गतः । व्याधितो वा कृशो वाऽपि तस्मिन्नाभून्नरः क्वचित् ॥

na tasya viṣaye cābhūtkṛpaṇo nāpi durgataḥ | vyādhito vā kṛśo vā'pi tasminnābhūnnaraḥ kvacit

उसके राज्य में न कोई कंजूस था, न कोई दुर्दशा में पड़ा हुआ; उसमें कहीं कोई मनुष्य रोगी या दुर्बल भी नहीं था।

श्लोक 16 (13.2.16)

सुदक्षिणो मधुरवागनसूयुर्जितेन्द्रियः । धर्मात्मा चानृशंसश्च विक्रान्तोऽथाविकत्थनः ॥

sudakṣiṇo madhuravāganasūyurjitendriyaḥ | dharmātmā cānṛśaṃsaśca vikrānto'thāvikatthanaḥ

वह उदार, मधुरभाषी, ईर्ष्यारहित, जितेन्द्रिय, धर्मात्मा, दयालु, पराक्रमी और अपनी बड़ाई न करने वाला था।

श्लोक 17 (13.2.17)

यज्वा च दान्तो मेधावी ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः । न चावमन्ता दाता च वेदवेदाङ्गपारगः ॥

yajvā ca dānto medhāvī brahmaṇyaḥ satyasaṅgaraḥ | na cāvamantā dātā ca vedavedāṅgapāragaḥ

वह यज्ञकर्ता, संयमी, बुद्धिमान्, ब्राह्मणों का भक्त, सत्य की प्रतिज्ञा निभाने वाला, किसी का अपमान न करने वाला, दानी तथा वेद-वेदांगों का पारगामी था।

श्लोक 18 (13.2.18)

तं नर्मदा देवनदी पुण्या शीतजला शिवा । चकमे पुरुषव्याघ्रं स्वेन भावेन भारत ॥

taṃ narmadā devanadī puṇyā śītajalā śivā | cakame puruṣavyāghraṃ svena bhāvena bhārata

हे भारत! पवित्र, शीतल जल वाली और मंगलमयी देवनदी नर्मदा ने उस पुरुषसिंह को अपने हृदय से चाहा।

श्लोक 19 (13.2.19)

तस्यां जज्ञे तदा नद्यां कन्या राजीवलोचना । नाम्ना सुदर्शना राजन्रूपेण च सुदर्शना ॥

tasyāṃ jajñe tadā nadyāṃ kanyā rājīvalocanā | nāmnā sudarśanā rājanrūpeṇa ca sudarśanā

हे राजन्! तब उस नदी में कमल-नयनी एक कन्या उत्पन्न हुई, जो नाम से भी सुदर्शना थी और रूप से भी सुदर्शना।

श्लोक 20 (13.2.20)

तादृग्रूपा न नारीषु भूतपूर्वा युधिष्ठिर । दुर्योधनसुता यादृगभवद्वरवर्णिनी ॥

tādṛgrūpā na nārīṣu bhūtapūrvā yudhiṣṭhira | duryodhanasutā yādṛgabhavadvaravarṇinī

हे युधिष्ठिर! दुर्योधन की उस सुन्दरी कन्या के समान रूप वाली स्त्री पहले कभी स्त्रियों में नहीं हुई थी।

श्लोक 21 (13.2.21)

तामग्निश्चकमे साक्षाद्राजकन्यां सुदर्शनाम् । स्वरूपं दीप्तिमत्कृत्वा शरदर्कसमद्युति ॥

tāmagniścakame sākṣādrājakanyāṃ sudarśanām | svarūpaṃ dīptimatkṛtvā śaradarkasamadyuti

अग्नि ने स्वयं उस राजकन्या सुदर्शना को चाहा, और अपने रूप को शरद् ऋतु के सूर्य के समान देदीप्यमान बना लिया।

श्लोक 22 (13.2.22)

सा चाग्निशरणे राज्ञः शुश्रूषाकृतनिश्चया । नियुक्ता पितृसन्देशादारिराधयिषुः शिखिम् ॥

sā cāgniśaraṇe rājñaḥ śuśrūṣākṛtaniścayā | niyuktā pitṛsandeśādārirādhayiṣuḥ śikhim

वह कन्या राजा के अग्निगृह में सेवा करने का निश्चय कर चुकी थी और पिता की आज्ञा से वहाँ नियुक्त थी; वह अग्नि की आराधना करना चाहती थी।

श्लोक 23 (13.2.23)

तस्या मनोहरं रूपं दृष्ट्वा देवो हुताशनः । मन्मथेन समादिष्टः पत्नीत्वे यतते मिथः ॥

tasyā manoharaṃ rūpaṃ dṛṣṭvā devo hutāśanaḥ | manmathena samādiṣṭaḥ patnītve yatate mithaḥ

उसका मनोहर रूप देखकर देवता अग्नि कामदेव की प्रेरणा से एकान्त में उसे पत्नी बनाने का यत्न करने लगे।

अग्निरुवाच

श्लोक 24 (13.2.24)

भज मामनवद्याङ्गि कामात्कमललोचने । रम्भोरु मृगशावाक्षि पूर्णचन्द्रनिभानने ॥

bhaja māmanavadyāṅgi kāmātkamalalocane | rambhoru mṛgaśāvākṣi pūrṇacandranibhānane

हे निर्दोष अंगों वाली! हे कमल-नयनी! हे केले के स्तम्भ जैसी जाँघों वाली! हे मृगनयनी! हे पूर्णचन्द्र जैसे मुख वाली! मैं कामवश तुमसे प्रार्थना करता हूँ, मुझे अपनाओ।

श्लोक 25 (13.2.25)

तवेदं पद्मपत्राक्षं मुखं दृष्ट्वा मनोहरम् । भ्रूलताललितं कान्तमनङ्गो बाधते हि माम् ॥

tavedaṃ padmapatrākṣaṃ mukhaṃ dṛṣṭvā manoharam | bhrūlatālalitaṃ kāntamanaṅgo bādhate hi mām

कमल-पत्र जैसी आँखों वाले और लता के समान सुन्दर भौंहों से शोभित तुम्हारे इस मनोहर मुख को देखकर अनंग कामदेव मुझे सता रहा है।

श्लोक 26 (13.2.26)

ललाटं चन्द्ररेखाभं शिरोरुहविभूषितम् । दृष्ट्वा ते पत्रलेखान्तमनङ्गो बाधते भृशम् ॥

lalāṭaṃ candrarekhābhaṃ śiroruhavibhūṣitam | dṛṣṭvā te patralekhāntamanaṅgo bādhate bhṛśam

चन्द्ररेखा के समान आभा वाले और केशों से सजे तुम्हारे ललाट को, तथा कपोलों की चित्र-रचना तक की शोभा को देखकर कामदेव मुझे बहुत पीड़ा दे रहा है।

श्लोक 27 (13.2.27)

बालातपेन तुलितं सस्वेदपुलकोद्गमम् । बिम्बाधरोष्ठवदनं विबुद्धमिव पङ्कजम् । अतीव चारुविभ्रान्तं मदमावहते मम ॥

bālātapena tulitaṃ sasvedapulakodgamam | bimbādharoṣṭhavadanaṃ vibuddhamiva paṅkajam | atīva cāruvibhrāntaṃ madamāvahate mama

प्रभात की धूप से होड़ करने वाला, पसीने और रोमांच से भरा, बिम्बफल जैसे लाल अधरों वाला, खिले हुए कमल के समान तुम्हारा मुख, जो अत्यन्त मनोहर चंचलता से भरा है, मुझे मतवाला कर रहा है।

श्लोक 28 (13.2.28)

दन्तप्रकाशनियता वाणी तव सुरक्षिता । ताम्रपल्लवसंकाशा जिह्वेयं मे मनोहरा ॥

dantaprakāśaniyatā vāṇī tava surakṣitā | tāmrapallavasaṃkāśā jihveyaṃ me manoharā

दाँतों की चमक से ही प्रकट होने वाली तुम्हारी वाणी भली-भाँति संयमित है, और ताँबे के नये पत्ते जैसी लाल तुम्हारी यह जीभ मेरे मन को हर लेती है।

श्लोक 29 (13.2.29)

समाः स्निग्धाः सुजाताश्च सहिताश्च द्विजास्तव । द्विजप्रिये प्रसीदस्व भज मां सुभगा ह्यसि ॥

samāḥ snigdhāḥ sujātāśca sahitāśca dvijāstava | dvijapriye prasīdasva bhaja māṃ subhagā hyasi

तुम्हारे दाँत सम, चिकने, सुडौल और सटे हुए हैं। हे द्विजप्रिये! प्रसन्न हो जाओ, मुझे अपनाओ; तुम बड़ी सौभाग्यवती हो।

श्लोक 30 (13.2.30)

मनोज्ञं सुकृतापाङ्गं मुखं तव मनोहरम् । स्तनौ ते संहतौ भीरु हाराभरणभूषितौ ॥

manojñaṃ sukṛtāpāṅgaṃ mukhaṃ tava manoharam | stanau te saṃhatau bhīru hārābharaṇabhūṣitau

तुम्हारा मुख मनोहर है और आँखों के कोये सुन्दर बने हैं। हे भीरु! तुम्हारे स्तन परस्पर सटे हुए हैं और हार तथा आभूषणों से सजे हैं।

श्लोक 31 (13.2.31)

पक्वबिल्वप्रतीकाशौ कर्कशौ सङ्गमक्षमौ । गम्भीरनाभिसुभगे भज मां वरवर्णिनि ॥

pakvabilvapratīkāśau karkaśau saṅgamakṣamau | gambhīranābhisubhage bhaja māṃ varavarṇini

वे पके बेल के फल जैसे कठोर और आलिंगन के योग्य हैं। हे गहरी और सुन्दर नाभि वाली! हे सुन्दरी! मुझे अपनाओ।

भीष्म उवाच

श्लोक 32 (13.2.32)

सैवमुक्ता विरहिते पावकेन महात्मना । ईषदाकम्पहृदया व्रीडिता वाक्यमब्रवीत् ॥

saivamuktā virahite pāvakena mahātmanā | īṣadākampahṛdayā vrīḍitā vākyamabravīt

महात्मा अग्नि के एकान्त में इस प्रकार कहने पर उसका हृदय कुछ काँप उठा और लज्जित होकर उसने यह वचन कहा।

सुदर्शनोवाच

श्लोक 33 (13.2.33)

ननु नाम कुलीनानां कन्यकानां विशेषतः । माता पिता प्रभवतः प्रदाने बान्धवाश्च ये ॥

nanu nāma kulīnānāṃ kanyakānāṃ viśeṣataḥ | mātā pitā prabhavataḥ pradāne bāndhavāśca ye

निश्चय ही कुलीन कन्याओं के विषय में, विशेष रूप से, उन्हें दान में देने का अधिकार माता, पिता और जो बन्धु-जन हैं, उन्हीं को होता है।

श्लोक 34 (13.2.34)

पाणिग्रहणमन्त्रैश्च हुते चैव विभावसौ । सतां मध्ये निविष्टायाः कन्यायाः शरणं पतिः ॥

pāṇigrahaṇamantraiśca hute caiva vibhāvasau | satāṃ madhye niviṣṭāyāḥ kanyāyāḥ śaraṇaṃ patiḥ

पाणिग्रहण के मन्त्रों से और अग्नि में आहुति दिए जाने पर, सज्जनों के बीच स्थित कन्या का आश्रय उसका पति होता है।

श्लोक 35 (13.2.35)

साऽहं नात्मवशा देव पितरं वरयस्व मे ॥

sā'haṃ nātmavaśā deva pitaraṃ varayasva me

हे देव! मैं अपने वश में नहीं हूँ; आप मेरे पिता से मुझे माँग लीजिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 36 (13.2.36)

अथ नातिचिराद्राजा कालाद्दुर्योधनस्तदा । यज्ञसम्भारनिपुणान्मन्त्रीनाहूय चोक्तवान् । यज्ञं यक्ष्येऽहमिति वै सम्भारान्सम्भ्रियन्तु मे ॥

atha nāticirādrājā kālādduryodhanastadā | yajñasambhāranipuṇānmantrīnāhūya coktavān | yajñaṃ yakṣye'hamiti vai sambhārānsambhriyantu me

इसके कुछ ही समय बाद राजा दुर्योधन ने यज्ञ की सामग्री जुटाने में कुशल मन्त्रियों को बुलाकर कहा, "मैं यज्ञ करूँगा; मेरे लिए सब सामग्री एकत्र की जाए।"

श्लोक 37 (13.2.37)

ततः समाहिते तस्य यज्ञे ब्राह्मणसत्तमैः । विप्ररूपी हुतवहो नृपं कन्यामयाचत ॥

tataḥ samāhite tasya yajñe brāhmaṇasattamaiḥ | viprarūpī hutavaho nṛpaṃ kanyāmayācata

तब श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ उसका यज्ञ आरम्भ हो जाने पर अग्नि ने ब्राह्मण का रूप धारण करके राजा से कन्या माँगी।

श्लोक 38 (13.2.38)

न तु राजा प्रदानाय तस्मै भावमकल्पयत् । दरिद्रश्चासवर्णश्च ममायमिति पार्थिवः । इति तस्मै न वै कन्यां दित्सां चक्रे नराधिपः ॥

na tu rājā pradānāya tasmai bhāvamakalpayat | daridraścāsavarṇaśca mamāyamiti pārthivaḥ | iti tasmai na vai kanyāṃ ditsāṃ cakre narādhipaḥ

परन्तु राजा ने उसे कन्या देने का मन नहीं बनाया; "यह दरिद्र है और मेरे वर्ण का नहीं है" — ऐसा सोचकर उस नरेश ने उसे कन्या देने की इच्छा नहीं की।

श्लोक 39 (13.2.39)

अथ दीक्षामुपेतस्य यज्ञे तस्य महात्मनः । आहितो हवनार्थाय वेद्यामग्निः प्रणश्यत ॥

atha dīkṣāmupetasya yajñe tasya mahātmanaḥ | āhito havanārthāya vedyāmagniḥ praṇaśyata

फिर जब वह महात्मा राजा यज्ञ की दीक्षा ले चुका था, तब होम के लिए वेदी पर स्थापित अग्नि लुप्त हो गई।

श्लोक 40 (13.2.40)

ततः स भीतो नृपतिर्भृशं प्रव्यथितेन्द्रियः । मन्त्रिणो ब्राह्मणांश्चैव पप्रच्छ किमिदं भवेत् । यज्ञे समिद्धो भगवान्नष्टो मे हव्यवाहनः ॥

tataḥ sa bhīto nṛpatirbhṛśaṃ pravyathitendriyaḥ | mantriṇo brāhmaṇāṃścaiva papraccha kimidaṃ bhavet | yajñe samiddho bhagavānnaṣṭo me havyavāhanaḥ

तब राजा बहुत भयभीत हो गया और उसकी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो उठीं। उसने मन्त्रियों और ब्राह्मणों से पूछा, "यह क्या हो गया? मेरे यज्ञ में प्रज्वलित पूज्य हव्यवाहन अग्निदेव अदृश्य हो गए हैं!"

श्लोक 41 (13.2.41)

सम्मन्त्रकुशलैस्तैस्तैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । ऋत्विग्भिर्मन्त्रकुशलैर्यज्यतां वा हुताशनः ॥

sammantrakuśalaistaistairbrāhmaṇairvedapāragaiḥ | ṛtvigbhirmantrakuśalairyajyatāṃ vā hutāśanaḥ

मन्त्रों में कुशल, वेदपारंगत उन-उन ब्राह्मणों और मन्त्रकुशल ऋत्विजों द्वारा अग्नि का यजन किया जाए।

श्लोक 42 (13.2.42)

अथ ऋक्सामयजुषां ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । वेदतत्वार्थकुशलैस्ततः सोमपुरस्करैः ॥

atha ṛksāmayajuṣāṃ brāhmaṇairvedapāragaiḥ | vedatatvārthakuśalaistataḥ somapuraskaraiḥ

तब ऋग्, साम और यजुर्वेद के जानने वाले, वेदपारंगत, वेद के तत्त्व और अर्थ में कुशल तथा सोमयाग करने वाले ब्राह्मणों द्वारा,

श्लोक 43 (13.2.43)

गुह्यैश्च नामभिः सर्वैराहूतो हव्यवाहनः । स्वरूपं दीप्तिमत्कृत्वा शरदर्कसमद्युतिः ॥

guhyaiśca nāmabhiḥ sarvairāhūto havyavāhanaḥ | svarūpaṃ dīptimatkṛtvā śaradarkasamadyutiḥ

सब गुप्त नामों से पुकारे जाने पर हव्यवाहन अग्नि शरद् ऋतु के सूर्य के समान तेजस्वी अपना रूप प्रकाशित करके प्रकट हुए।

श्लोक 44 (13.2.44)

ततो महात्मा तानाह दहनो ब्राह्मणर्षभान् । वरयाम्यात्मनोऽर्थाय दुर्योधनसुतामिति ॥

tato mahātmā tānāha dahano brāhmaṇarṣabhān | varayāmyātmano'rthāya duryodhanasutāmiti

तब महात्मा अग्नि ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से कहा, "मैं दुर्योधन की कन्या को अपने लिए वरण करता हूँ।"

श्लोक 45 (13.2.45)

ततस्ते कल्यमुत्थाय तस्मै राज्ञे न्यवेदयन् । ब्राह्मणा विस्मिताः सर्वे यदुक्तं चित्रभानुना ॥

tataste kalyamutthāya tasmai rājñe nyavedayan | brāhmaṇā vismitāḥ sarve yaduktaṃ citrabhānunā

तब वे सब ब्राह्मण विस्मित होकर प्रातःकाल उठे और चित्रभानु ने जो कहा था, वह राजा को बता दिया।

श्लोक 46 (13.2.46)

ततः स राजा तच्छ्रुत्वा वचनं ब्रह्मवादिनाम् । अवाप्य परमं हर्षं तथेति प्राह बुद्धिमान् ॥

tataḥ sa rājā tacchrutvā vacanaṃ brahmavādinām | avāpya paramaṃ harṣaṃ tatheti prāha buddhimān

ब्रह्मवादियों का वचन सुनकर वह बुद्धिमान् राजा परम हर्ष से भर गया और बोला, "ऐसा ही हो।"

श्लोक 47 (13.2.47)

अयाचत च तं शुल्कं भगवन्तं विभावसुम् । नित्यं सान्निध्यमिह ते चित्रभानो भवेदिति ॥

ayācata ca taṃ śulkaṃ bhagavantaṃ vibhāvasum | nityaṃ sānnidhyamiha te citrabhāno bhavediti

और उसने भगवान् विभावसु से शुल्क के रूप में यह माँगा, "हे चित्रभानु! यहाँ आपका सान्निध्य सदा बना रहे।"

श्लोक 48 (13.2.48)

तमाह भगवानग्निरेवमस्त्विति पार्थिवम् । ततः सान्निध्यमद्यापि माहिष्मत्यां विभावसोः । दृष्टं हि सहदेवेन दिशं विजयता च तत् ॥

tamāha bhagavānagnirevamastviti pārthivam | tataḥ sānnidhyamadyāpi māhiṣmatyāṃ vibhāvasoḥ | dṛṣṭaṃ hi sahadevena diśaṃ vijayatā ca tat

भगवान् अग्नि ने राजा से कहा, "ऐसा ही हो।" इसी से आज भी माहिष्मती में अग्नि का सान्निध्य है; उस दिशा को जीतते हुए सहदेव ने भी उसे देखा था।

श्लोक 49 (13.2.49)

ततस्तां समलङ्कृत्य कन्यामहतवाससम् । ददौ दुर्योधनो राजा पावकाय महात्मने ॥

tatastāṃ samalaṅkṛtya kanyāmahatavāsasam | dadau duryodhano rājā pāvakāya mahātmane

तब राजा दुर्योधन ने कन्या को नये वस्त्र पहनाकर और अलंकृत करके महात्मा अग्नि को दे दिया।

श्लोक 50 (13.2.50)

प्रतिजग्राह चाग्निस्तु राजकन्यां सुदर्शनाम् । विधिना वेददृष्टेन वसोर्धारामिवाध्वरे ॥

pratijagrāha cāgnistu rājakanyāṃ sudarśanām | vidhinā vedadṛṣṭena vasordhārāmivādhvare

अग्नि ने राजकन्या सुदर्शना को वेद में देखी गई विधि से ग्रहण किया, जैसे यज्ञ में घी की अविच्छिन्न धारा ग्रहण की जाती है।

श्लोक 51 (13.2.51)

तस्या रूपेण शीलेन कुलेन वपुषा श्रिया । अभवत्प्रीतिमानग्निर्गर्भं चास्यां समादधे ॥

tasyā rūpeṇa śīlena kulena vapuṣā śriyā | abhavatprītimānagnirgarbhaṃ cāsyāṃ samādadhe

उसके रूप, शील, कुल, शरीर और शोभा से अग्नि बहुत प्रसन्न हुए और उसके गर्भ में सन्तान स्थापित की।

श्लोक 52 (13.2.52)

तस्याः समभवत्पुत्रो नाम्नाऽग्नेयः सुदर्शनः ॥

tasyāḥ samabhavatputro nāmnā'gneyaḥ sudarśanaḥ

उससे अग्नि का पुत्र सुदर्शन नाम का बालक उत्पन्न हुआ।

श्लोक 53 (13.2.53)

सुदर्शनस्तु रूपेण पूर्णेन्दुसदृशोपमः । शिशुरेवाध्यगात्सर्वं परं ब्रह्म सनातनम् ॥

sudarśanastu rūpeṇa pūrṇendusadṛśopamaḥ | śiśurevādhyagātsarvaṃ paraṃ brahma sanātanam

सुदर्शन रूप में पूर्णचन्द्र के समान था; बालक रहते ही उसने सब कुछ जान लिया, और सनातन परब्रह्म को भी।

श्लोक 54 (13.2.54)

अथौघवान्नाम नृपो नृगस्यासीत्पितामहः । तस्याप्योघवती कन्या पुत्रश्चौघरथोऽभवत् ॥

athaughavānnāma nṛpo nṛgasyāsītpitāmahaḥ | tasyāpyoghavatī kanyā putraścaugharatho'bhavat

नृग के पितामह ओघवान् नाम के एक राजा थे। उनके ओघवती नाम की कन्या और ओघरथ नाम का पुत्र था।

श्लोक 55 (13.2.55)

तामोघवान्ददौ तस्मै स्वयमोघवतीं सुताम् । सुदर्शनाय विदुषे भार्यार्थे देवरूपिणीम् ॥

tāmoghavāndadau tasmai svayamoghavatīṃ sutām | sudarśanāya viduṣe bhāryārthe devarūpiṇīm

ओघवान् ने देवी के समान रूप वाली अपनी कन्या ओघवती को पत्नी बनाने के लिए विद्वान् सुदर्शन को स्वयं दे दिया।

श्लोक 56 (13.2.56)

स गृहस्थाश्रमरतस्तया सह सुदर्शनः । कुरुक्षेत्रेऽवसद्राजन्नोघवत्या समन्वितः ॥

sa gṛhasthāśramaratastayā saha sudarśanaḥ | kurukṣetre'vasadrājannoghavatyā samanvitaḥ

हे राजन्! गृहस्थाश्रम में रत सुदर्शन ओघवती के साथ कुरुक्षेत्र में रहने लगा।

श्लोक 57 (13.2.57)

गृहस्थश्चावजेष्यामि मृत्युमित्येव स प्रभो । प्रतिज्ञामकरोद्धीमान्दीप्ततेजा विशाम्पते ॥

gṛhasthaścāvajeṣyāmi mṛtyumityeva sa prabho | pratijñāmakaroddhīmāndīptatejā viśāmpate

"मैं गृहस्थ रहकर ही मृत्यु को जीतूँगा" — हे प्रभो! हे विशाम्पते! उस बुद्धिमान् और प्रदीप्त तेज वाले ने यह प्रतिज्ञा की।

श्लोक 58 (13.2.58)

तामेवौघवतीं राजन्स पावकसुतोऽब्रवीत् । अतिथेः प्रतिकूलं ते न कर्तव्यं कथञ्चन ॥

tāmevaughavatīṃ rājansa pāvakasuto'bravīt | atitheḥ pratikūlaṃ te na kartavyaṃ kathañcana

हे राजन्! उस अग्नि-पुत्र ने उसी ओघवती से कहा, "तुम्हें किसी भी प्रकार अतिथि के प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिए।"

सुदर्शन उवाच

श्लोक 59 (13.2.59)

येनयेन च तुष्येत नित्यमेव त्वयाऽतिथिः । अप्यात्मनः प्रदानेन न ते कार्या विचारणा ॥

yenayena ca tuṣyeta nityameva tvayā'tithiḥ | apyātmanaḥ pradānena na te kāryā vicāraṇā

जिस-जिस वस्तु से अतिथि सदा सन्तुष्ट हो, वही तुम्हें करना चाहिए; चाहे अपने को ही देना पड़े, इसमें तुम्हें कोई विचार नहीं करना चाहिए।

श्लोक 60 (13.2.60)

एतद्व्रतं मम सदा हृदि सम्परिवर्तते । गृहस्थानां च सुश्रोणि नातिथेर्विद्यते परम् ॥

etadvrataṃ mama sadā hṛdi samparivartate | gṛhasthānāṃ ca suśroṇi nātithervidyate param

यह व्रत मेरे हृदय में सदा घूमता रहता है। हे सुन्दर कटि वाली! गृहस्थों के लिए अतिथि से बढ़कर और कुछ नहीं है।

श्लोक 61 (13.2.61)

प्रमाणं यदि वामोरु वचस्ते मम शोभने । इदं वचनमव्यग्रा हृदि त्वं धारयेः सदा ॥

pramāṇaṃ yadi vāmoru vacaste mama śobhane | idaṃ vacanamavyagrā hṛdi tvaṃ dhārayeḥ sadā

हे वामोरु! हे शोभने! यदि मेरा वचन तुम्हारे लिए प्रमाण है, तो इस बात को सदा निश्चिन्त होकर अपने हृदय में रखना।

श्लोक 62 (13.2.62)

निष्क्रान्ते मयि कल्याणि तथा सन्निहितेऽनघे । नातिथिस्तेऽवमन्तव्यः प्रमाणं यद्यहं तव ॥

niṣkrānte mayi kalyāṇi tathā sannihite'naghe | nātithiste'vamantavyaḥ pramāṇaṃ yadyahaṃ tava

हे कल्याणी! हे निर्दोषे! मेरे बाहर चले जाने पर जब अतिथि उपस्थित हो, तब उसका अनादर न करना, यदि मैं तुम्हारे लिए प्रमाण हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 63 (13.2.63)

तमब्रवीदोघवती तथा मूर्ध्नि कृताञ्जलिः । न मे त्वद्वचनात्किञ्चिन्न कर्तव्यं कथञ्चन ॥

tamabravīdoghavatī tathā mūrdhni kṛtāñjaliḥ | na me tvadvacanātkiñcinna kartavyaṃ kathañcana

तब ओघवती ने मस्तक पर हाथ जोड़कर उससे कहा, "आपके वचन का कोई भी अंश मैं किसी प्रकार अधूरा नहीं छोड़ूँगी।"

श्लोक 64 (13.2.64)

जिगीषमाणस्तु गृहे तदा मृत्युः सुदर्शनम् । पृष्ठतोऽन्वगमद्राजन्रन्ध्रान्वेषी तदा सदा ॥

jigīṣamāṇastu gṛhe tadā mṛtyuḥ sudarśanam | pṛṣṭhato'nvagamadrājanrandhrānveṣī tadā sadā

हे राजन्! उसे जीतने की इच्छा से मृत्यु उस समय घर में सदा उसका छिद्र खोजता हुआ सुदर्शन के पीछे-पीछे चलता रहता था।

श्लोक 65 (13.2.65)

इध्मार्थं तु गते तस्मिन्नग्निपुत्रे सुदर्शने । अतिथिर्ब्राह्मणः श्रीमांस्तामाहौघवतीं तदा ॥

idhmārthaṃ tu gate tasminnagniputre sudarśane | atithirbrāhmaṇaḥ śrīmāṃstāmāhaughavatīṃ tadā

जब अग्नि-पुत्र सुदर्शन समिधा लाने गया हुआ था, तब एक तेजस्वी ब्राह्मण अतिथि आया और उसने ओघवती से कहा—

अतिथिरुवाच

श्लोक 66 (13.2.66)

आतिथ्यं कृतमिच्छामि त्वयाऽद्य वरवर्णिनि । प्रमाणं यदि धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसम्मतः ॥

ātithyaṃ kṛtamicchāmi tvayā'dya varavarṇini | pramāṇaṃ yadi dharmaste gṛhasthāśramasammataḥ

हे सुन्दरी! यदि गृहस्थाश्रम में मान्य धर्म तुम्हारे लिए प्रमाण है, तो मैं आज तुमसे आतिथ्य चाहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 67 (13.2.67)

इत्युक्ता तेन विप्रेण राजपुत्री यशस्विनी । विधिना प्रतिजग्राह वेदोक्तेन विशांपते ॥

ityuktā tena vipreṇa rājaputrī yaśasvinī | vidhinā pratijagrāha vedoktena viśāṃpate

उस ब्राह्मण के ऐसा कहने पर यशस्विनी राजकुमारी ने, हे विशाम्पते, वेद में बताई विधि से उसका स्वागत किया।

श्लोक 68 (13.2.68)

आसनं चैव पाद्यं च तस्मै दत्त्वा द्विजातये । प्रोवाचौघवती विप्रं केनार्थः किं ददामि ते ॥

āsanaṃ caiva pādyaṃ ca tasmai dattvā dvijātaye | provācaughavatī vipraṃ kenārthaḥ kiṃ dadāmi te

उस ब्राह्मण को आसन और पैर धोने का जल देकर ओघवती ने उससे कहा, "आपको किस वस्तु की आवश्यकता है? मैं आपको क्या दूँ?"

श्लोक 69 (13.2.69)

तामब्रवीत्ततो विप्रो राजपुत्रीं सुदर्शनाम् । त्वया ममार्थः कल्याणि निर्विशङ्कैतदाचर ॥

tāmabravīttato vipro rājaputrīṃ sudarśanām | tvayā mamārthaḥ kalyāṇi nirviśaṅkaitadācara

तब उस ब्राह्मण ने उस सुन्दर राजकन्या से कहा, "हे कल्याणी! मुझे तुमसे ही काम है; निःशंक होकर वही करो।"

अतिथिरुवाच

श्लोक 70 (13.2.70)

यदि प्रमाणं धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसम्मतः । प्रदानेनात्मनो राज्ञि कर्तुमर्हसि मे प्रियम् ॥

yadi pramāṇaṃ dharmaste gṛhasthāśramasammataḥ | pradānenātmano rājñi kartumarhasi me priyam

हे रानी! यदि गृहस्थाश्रम में मान्य धर्म तुम्हारे लिए प्रमाण है, तो अपने आपको देकर मेरा प्रिय करना तुम्हें उचित है।

भीष्म उवाच

श्लोक 71 (13.2.71)

स तया छन्द्यमानोऽन्यैरीप्सितैर्नृपकन्यया । नान्यमात्मप्रदानात्स तस्या वव्रे परं द्विजः ॥

sa tayā chandyamāno'nyairīpsitairnṛpakanyayā | nānyamātmapradānātsa tasyā vavre paraṃ dvijaḥ

राजकन्या ने उसे और भी अनेक इच्छित वस्तुओं का प्रलोभन दिया, परन्तु उस ब्राह्मण ने उसके आत्मदान के सिवा और कुछ वरण नहीं किया।

श्लोक 72 (13.2.72)

सा तु राजसुता स्मृत्वा भर्तुर्वचनमादितः । तथेति लज्जमाना सा तमुवाच द्विजर्षभम् ॥

sā tu rājasutā smṛtvā bharturvacanamāditaḥ | tatheti lajjamānā sā tamuvāca dvijarṣabham

तब उस राजपुत्री ने आरम्भ में कहा हुआ पति का वचन स्मरण किया और लज्जित होते हुए उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से कहा, "ऐसा ही हो।"

श्लोक 73 (13.2.73)

ततो विहस्य विप्रर्षिः सा चैवोपविवेश ह । संस्मृत्य भर्तुर्वचनं गृहस्थाश्रमकाङ्क्षिणः ॥

tato vihasya viprarṣiḥ sā caivopaviveśa ha | saṃsmṛtya bharturvacanaṃ gṛhasthāśramakāṅkṣiṇaḥ

तब वह ब्राह्मण-ऋषि हँसा, और वह भी गृहस्थाश्रम के अभिलाषी अपने पति का वचन स्मरण करके उसके साथ भीतर चली गई।

श्लोक 74 (13.2.74)

अथेध्मान्समुपादाय स पावकिरुपागमत् । मृत्युना रौद्रभावेन नित्यं बन्धुरिवान्वितः ॥

athedhmānsamupādāya sa pāvakirupāgamat | mṛtyunā raudrabhāvena nityaṃ bandhurivānvitaḥ

इतने में वह अग्नि-पुत्र समिधाएँ लेकर लौटा; भयंकर रूप वाला मृत्यु बन्धु की तरह सदा उसके साथ लगा हुआ था।

श्लोक 75 (13.2.75)

ततस्त्वाश्रममागम्य स पावकसुतस्तदा । तां व्याजहारौघवतीं क्वासि यातेति चासकृत् ॥

tatastvāśramamāgamya sa pāvakasutastadā | tāṃ vyājahāraughavatīṃ kvāsi yāteti cāsakṛt

तब आश्रम में आकर उस अग्नि-पुत्र ने ओघवती को बार-बार पुकारा, "तुम कहाँ चली गईं?"

श्लोक 76 (13.2.76)

तस्मै प्रतिवचः सा तु भर्त्रे न प्रददौ तदा । कराभ्यां तेन विप्रेण स्पृष्टा भर्तृव्रता सती ॥

tasmai prativacaḥ sā tu bhartre na pradadau tadā | karābhyāṃ tena vipreṇa spṛṣṭā bhartṛvratā satī

पतिव्रता सती ने तब अपने पति को कोई उत्तर नहीं दिया, क्योंकि उस ब्राह्मण ने उसे अपने हाथों से छू लिया था।

श्लोक 77 (13.2.77)

उच्छिष्टाऽस्मीति मन्वाना लज्जिता भर्तुरेव च । तूष्णींभूताऽभवत्साध्वी विप्रकोपाच्च शङ्किता ॥

ucchiṣṭā'smīti manvānā lajjitā bhartureva ca | tūṣṇīṃbhūtā'bhavatsādhvī viprakopācca śaṅkitā

"मैं अपवित्र हो गई" — यह सोचकर पति के सामने लज्जित हुई वह साध्वी ब्राह्मण के क्रोध से भी आशंकित होकर चुप रह गई।

श्लोक 78 (13.2.78)

अथ तां किन्विति पुनः प्रोवाच स सुदर्शनः । क्व सा साध्वी क्व सायाता गरीयः किमतो मम ॥

atha tāṃ kinviti punaḥ provāca sa sudarśanaḥ | kva sā sādhvī kva sāyātā garīyaḥ kimato mama

तब सुदर्शन ने फिर पुकारा, "वह साध्वी कहाँ है? वह कहाँ चली गई? मेरे लिए इससे बढ़कर और क्या है?"

सुदर्शन उवाच

श्लोक 79 (13.2.79)

पतिव्रता सत्यशीला नित्यं चैवार्जवे रता । कथं न प्रत्युदेत्यद्य स्मयमाना यथापुरम् ॥

pativratā satyaśīlā nityaṃ caivārjave ratā | kathaṃ na pratyudetyadya smayamānā yathāpuram

"पतिव्रता, सत्यशीला और सदा सरलता में रत वह आज पहले की तरह मुस्कराती हुई मेरे सामने क्यों नहीं आती?"

भीष्म उवाच

श्लोक 80 (13.2.80)

उटजस्थस्तु तं विप्रः प्रत्युवाच सुदर्शनम् । अतिथिं विद्धि सम्प्राप्तं ब्राह्मणं पावके च माम् ॥

uṭajasthastu taṃ vipraḥ pratyuvāca sudarśanam | atithiṃ viddhi samprāptaṃ brāhmaṇaṃ pāvake ca mām

तब कुटिया के भीतर से उस ब्राह्मण ने सुदर्शन को उत्तर दिया, "हे अग्नि-पुत्र! जान लो कि मैं आया हुआ ब्राह्मण अतिथि हूँ।"

अतिथिरुवाच

श्लोक 81 (13.2.81)

अनया छन्द्यमानोऽहं भार्यया तव सत्तम । तैस्तैरतिथिसत्कारैर्ब्रह्मन्नेषा वृता मया ॥

anayā chandyamāno'haṃ bhāryayā tava sattama | taistairatithisatkārairbrahmanneṣā vṛtā mayā

हे श्रेष्ठ पुरुष! तुम्हारी इस पत्नी ने उन-उन अतिथि-सत्कारों से मुझे मनाया, हे ब्राह्मण! तब मैंने इसी को चुना।

श्लोक 82 (13.2.82)

आत्मप्रदानविधिना मामर्चति शुभानना । अनुरूपं यदत्रान्यत्तद्भवान्कर्तुमर्हति ॥

ātmapradānavidhinā māmarcati śubhānanā | anurūpaṃ yadatrānyattadbhavānkartumarhati

यह सुन्दर मुख वाली आत्मदान की विधि से मेरी पूजा कर रही है। इस विषय में जो और उचित हो, वह तुम्हें करना चाहिए।

भीष्म उवाच

श्लोक 83 (13.2.83)

कूटमुद्गरहस्तस्तु मृत्युस्तं वै समन्वगात् । हीनप्रतिज्ञमत्रैवं वधिष्यामीति चिन्तयन् ॥

kūṭamudgarahastastu mṛtyustaṃ vai samanvagāt | hīnapratijñamatraivaṃ vadhiṣyāmīti cintayan

हाथ में लोहे का मुद्गर लिए मृत्यु उसके पीछे लगा रहा; वह सोच रहा था, "प्रतिज्ञा से गिरे हुए इसको मैं यहीं मार डालूँगा।"

श्लोक 84 (13.2.84)

सुदर्शनस्तु मनसा कर्मणा चक्षुषा गिरा । त्यक्तेर्ष्यस्त्यक्तमन्युश्च स्मयमानोऽब्रवीदिदम् ॥

sudarśanastu manasā karmaṇā cakṣuṣā girā | tyakterṣyastyaktamanyuśca smayamāno'bravīdidam

परन्तु सुदर्शन ने मन, कर्म, दृष्टि और वाणी से ईर्ष्या और क्रोध त्यागकर मुस्कराते हुए यह कहा—

सुदर्शन उवाच

श्लोक 85 (13.2.85)

सुरतं तेऽस्तु विप्राग्र्य प्रीतिर्हि परमा मम । गृहस्थस्य हि धर्मोऽग्र्यः सम्प्राप्तातिथिपूजनम् ॥

surataṃ te'stu viprāgrya prītirhi paramā mama | gṛhasthasya hi dharmo'gryaḥ samprāptātithipūjanam

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आपको पूर्ण सुख मिले; मुझे परम प्रसन्नता है। आए हुए अतिथि का पूजन गृहस्थ का सर्वश्रेष्ठ धर्म है।

श्लोक 86 (13.2.86)

अतिथिः पूजितो यस्य गृहस्थस्य तु गच्छति । नान्यस्तस्मात्परो धर्म इति प्राहुर्मनीषिणः ॥

atithiḥ pūjito yasya gṛhasthasya tu gacchati | nānyastasmātparo dharma iti prāhurmanīṣiṇaḥ

जिस गृहस्थ के यहाँ से पूजित अतिथि जाता है, उसके लिए इससे बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है — ऐसा विचारशील लोग कहते हैं।

श्लोक 87 (13.2.87)

प्राणाश्च मम दाराश्च यच्चान्यद्विद्यते वसु । अतिथिभ्यो मया देयमिति मे व्रतमाहितम् ॥

prāṇāśca mama dārāśca yaccānyadvidyate vasu | atithibhyo mayā deyamiti me vratamāhitam

मेरे प्राण, मेरी पत्नी और जो अन्य धन है, वह सब अतिथियों को देने योग्य है — यही व्रत मैंने धारण किया है।

श्लोक 88 (13.2.88)

निःसन्दिग्धं यथा वाक्यमेतन्मे समुदाहृतम् । तेनाहं विप्र सत्येन स्वयमात्मानमालभे ॥

niḥsandigdhaṃ yathā vākyametanme samudāhṛtam | tenāhaṃ vipra satyena svayamātmānamālabhe

मेरा यह वचन निःसंदेह है; इसी सत्य की शपथ लेकर, हे ब्राह्मण, मैं स्वयं अपना स्पर्श करता हूँ।

श्लोक 89 (13.2.89)

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । बुद्धिरात्मा मनः कालो दिशश्चैव गुणा दश ॥

pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam | buddhirātmā manaḥ kālo diśaścaiva guṇā daśa

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवीं ज्योति; बुद्धि, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ — ये दस गुण हैं।

श्लोक 90 (13.2.90)

नित्यमेव हि पश्यन्ति देहिनां देहसंश्रिताः । सुकृतं दुष्कृतं चापि कर्म कर्मवतांवर ॥

nityameva hi paśyanti dehināṃ dehasaṃśritāḥ | sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ cāpi karma karmavatāṃvara

हे कर्म करने वालों में श्रेष्ठ! देहधारियों की देह में रहने वाले ये सदा उनके शुभ और अशुभ कर्मों को देखते रहते हैं।

श्लोक 91 (13.2.91)

यथैषा नानृता वाणी मयाऽद्य समुदीरिता । तेन सत्येन मां देवाः पालयन्तु दहन्तु वा ॥

yathaiṣā nānṛtā vāṇī mayā'dya samudīritā | tena satyena māṃ devāḥ pālayantu dahantu vā

यदि आज मेरे द्वारा कही गई यह वाणी असत्य नहीं है, तो उसी सत्य के प्रभाव से देवता मेरी रक्षा करें या मुझे भस्म कर दें।

भीष्म उवाच

श्लोक 92 (13.2.92)

ततो नादः समभवद्दिक्षु सर्वासु भारत । असकृत्सत्यमित्येवं नैतन्मिथ्येति सर्वतः ॥

tato nādaḥ samabhavaddikṣu sarvāsu bhārata | asakṛtsatyamityevaṃ naitanmithyeti sarvataḥ

तब, हे भारत! सब दिशाओं में चारों ओर बार-बार यह नाद गूँज उठा, "यह सत्य है, यह मिथ्या नहीं है।"

श्लोक 93 (13.2.93)

उटजात्तु ततस्तस्मान्निश्चक्राम स वै द्विजः । वपुषा द्यां च भूमिं च व्याप्य वायुरिवोद्यतः ॥

uṭajāttu tatastasmānniścakrāma sa vai dvijaḥ | vapuṣā dyāṃ ca bhūmiṃ ca vyāpya vāyurivodyataḥ

तब वह ब्राह्मण उस कुटिया से बाहर निकला; उसने अपने शरीर से आकाश और पृथ्वी को व्याप्त कर लिया, मानो वायु उठ खड़ी हुई हो।

श्लोक 94 (13.2.94)

स्वरेण विप्रः शैक्षेण त्रींल्लोकाननुनादयन् । उवाच चैनं धर्मज्ञं पूर्वमामन्त्र्य नामतः ॥

svareṇa vipraḥ śaikṣeṇa trīṃllokānanunādayan | uvāca cainaṃ dharmajñaṃ pūrvamāmantrya nāmataḥ

शिक्षा के अनुसार स्वर से तीनों लोकों को गुँजाते हुए उस ब्राह्मण ने पहले उस धर्मज्ञ को नाम लेकर पुकारा और फिर उससे कहा—

धर्म उवाच

श्लोक 95 (13.2.95)

धर्मोऽहमस्मि भद्रं ते जिज्ञासार्थं तवानघ । प्राप्तः सत्यं च ते ज्ञात्वा प्रीतिर्मे परमा त्वयि ॥

dharmo'hamasmi bhadraṃ te jijñāsārthaṃ tavānagha | prāptaḥ satyaṃ ca te jñātvā prītirme paramā tvayi

मैं धर्म हूँ। हे निष्पाप! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारी परीक्षा लेने आया था; तुम्हारी सत्यनिष्ठा जानकर तुम पर मेरी परम प्रीति है।

श्लोक 96 (13.2.96)

विजितश्च त्वया मृत्युर्योऽयं त्वामनुगच्छति । रन्ध्रान्वेषी तव सदा त्वया धृत्या वशीकृतः ॥

vijitaśca tvayā mṛtyuryo'yaṃ tvāmanugacchati | randhrānveṣī tava sadā tvayā dhṛtyā vaśīkṛtaḥ

तुमने उस मृत्यु को जीत लिया है जो सदा तुम्हारा छिद्र खोजता हुआ तुम्हारे पीछे लगा रहा; तुम्हारे धैर्य से वह वश में हो गया है।

श्लोक 97 (13.2.97)

न चास्ति शक्तिस्त्रैलोक्ये कस्य चित्पुरुषोत्तम । पतिव्रतामिमां साध्वीं तवोद्वीक्षितुमप्युत ॥

na cāsti śaktistrailokye kasya citpuruṣottama | pativratāmimāṃ sādhvīṃ tavodvīkṣitumapyuta

हे पुरुषोत्तम! तीनों लोकों में किसी में भी तुम्हारी इस पतिव्रता साध्वी की ओर आँख उठाकर देखने तक की शक्ति नहीं है।

श्लोक 98 (13.2.98)

रक्षिता त्वद्गुणैरेषा पातिव्रत्यगुणैस्तथा । अधृष्या यदियं ब्रूयात्तथा तन्नान्यथा भवेत् ॥

rakṣitā tvadguṇaireṣā pātivratyaguṇaistathā | adhṛṣyā yadiyaṃ brūyāttathā tannānyathā bhavet

यह तुम्हारे गुणों से और अपने पातिव्रत्य के गुणों से रक्षित है; यह अजेय है, यह जो कहेगी वही होगा, अन्यथा नहीं होगा।

श्लोक 99 (13.2.99)

एषा हि तपसा स्वेन संयुक्ता ब्रह्मवादिनी । पावनार्थं च लोकस्य सरिच्छ्रेष्ठा भविष्यति ॥

eṣā hi tapasā svena saṃyuktā brahmavādinī | pāvanārthaṃ ca lokasya saricchreṣṭhā bhaviṣyati

यह अपने तप से युक्त ब्रह्मवादिनी है और लोक को पवित्र करने के लिए सरिताओं में श्रेष्ठ नदी बनेगी।

श्लोक 100 (13.2.100)

अर्धेनौघवती नाम त्वामर्धेनानुयास्यति । शरीरेण महाभागा योगो ह्यस्या वशे स्थितः । अनया सह लोकांश्च गन्ताऽसि तपसार्जितान् ॥

ardhenaughavatī nāma tvāmardhenānuyāsyati | śarīreṇa mahābhāgā yogo hyasyā vaśe sthitaḥ | anayā saha lokāṃśca gantā'si tapasārjitān

यह महाभागा आधे शरीर से ओघवती नाम की नदी होगी और आधे से तुम्हारा अनुसरण करेगी; योग इसके वश में है। इसके साथ तुम तप से अर्जित लोकों में जाओगे,

श्लोक 101 (13.2.101)

यत्र नावृत्तिमभ्येति शाश्वतांस्ताननुत्तमान् । अनेन चैव देहेन लोकांस्त्वमभिपत्स्यसे ॥

yatra nāvṛttimabhyeti śāśvatāṃstānanuttamān | anena caiva dehena lokāṃstvamabhipatsyase

जहाँ से कोई नहीं लौटता, उन शाश्वत और सर्वोत्तम लोकों में। और इसी शरीर से तुम उन लोकों को प्राप्त करोगे।

श्लोक 102 (13.2.102)

निर्जितश्च त्वया मृत्युरैश्वर्यं च तवोत्तमम् । पञ्चभूतान्यतिक्रान्तः स्ववीर्याच्च मनोजवः ॥

nirjitaśca tvayā mṛtyuraiśvaryaṃ ca tavottamam | pañcabhūtānyatikrāntaḥ svavīryācca manojavaḥ

तुमने मृत्यु को जीत लिया है, और तुम्हारा ऐश्वर्य सर्वोत्तम है। तुम पाँच महाभूतों को पार कर चुके हो और अपने पराक्रम से मन के समान वेग वाले हो गए हो।

श्लोक 103 (13.2.103)

गृहस्थधर्मेणानेन कामक्रोधौ च ते जितौ । स्नेहो रागश्च तन्द्री च मोहो द्रोहश्च केवलः । तव शुश्रूषया राजन्राजपुत्र्या च निर्जिताः ॥

gṛhasthadharmeṇānena kāmakrodhau ca te jitau | sneho rāgaśca tandrī ca moho drohaśca kevalaḥ | tava śuśrūṣayā rājanrājaputryā ca nirjitāḥ

इस गृहस्थ-धर्म से तुमने काम और क्रोध को जीत लिया है। स्नेह, राग, तन्द्रा, मोह और सम्पूर्ण द्रोह — ये सब, हे राजन्, तुम्हारी सेवा-भावना और राजकन्या के द्वारा जीत लिए गए हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 104 (13.2.104)

शुक्लानां तु सहस्रेण वाजिनां रथमुत्तमम् । युक्तं प्रगृह्य भगवान्वासवोप्याजगाम तम् ॥

śuklānāṃ tu sahasreṇa vājināṃ rathamuttamam | yuktaṃ pragṛhya bhagavānvāsavopyājagāma tam

तब भगवान् इन्द्र भी एक हजार श्वेत अश्वों से जुता हुआ उत्तम रथ लेकर उसके पास आए।

श्लोक 105 (13.2.105)

मृत्युरात्मा च लोकाश्च जिता भूतानि पञ्च च । बुद्धिः कालो मदो मोहः कामक्रोधौ तथैव च ॥

mṛtyurātmā ca lokāśca jitā bhūtāni pañca ca | buddhiḥ kālo mado mohaḥ kāmakrodhau tathaiva ca

मृत्यु, आत्मा, लोक, पाँचों भूत, बुद्धि, काल, मद, मोह, काम और क्रोध — इन सबको उसने जीत लिया।

श्लोक 106 (13.2.106)

तस्माद्गृहाश्रमस्थस्य नान्यद्दैवतमस्ति वै । ऋतेऽतिथिं नरव्याघ्र मनसैतद्विचारय ॥

tasmādgṛhāśramasthasya nānyaddaivatamasti vai | ṛte'tithiṃ naravyāghra manasaitadvicāraya

इसलिए, हे नरव्याघ्र! गृहस्थाश्रम में रहने वाले के लिए अतिथि के सिवा और कोई देवता नहीं है; इस पर मन में विचार करो।

श्लोक 107 (13.2.107)

अतिथिः पूजितो यद्धि ध्यायते मनसा शुभम् । न तत्क्रतुशतेनापि तुल्यमाहुर्मनीषिणः ॥

atithiḥ pūjito yaddhi dhyāyate manasā śubham | na tatkratuśatenāpi tulyamāhurmanīṣiṇaḥ

सम्मानित अतिथि मन से जो शुभ चिन्तन करता है, उसके बराबर सौ यज्ञ भी नहीं हैं — ऐसा विद्वान् कहते हैं।

श्लोक 108 (13.2.108)

सुदत्तं सुकृतं वाऽपि कम्पयेदप्यनर्चितः ॥

sudattaṃ sukṛtaṃ vā'pi kampayedapyanarcitaḥ

अच्छी तरह दिया हुआ अथवा अच्छी तरह किया हुआ पुण्य भी, यदि अतिथि का सत्कार न हुआ हो, तो डगमगा जाता है।

श्लोक 109 (13.2.109)

पात्रं त्वतिथिमासाद्य शीलाढ्यं यो न पूजयेत् । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥

pātraṃ tvatithimāsādya śīlāḍhyaṃ yo na pūjayet | sa dattvā duṣkṛtaṃ tasmai puṇyamādāya gacchati

शील से सम्पन्न योग्य अतिथि के आने पर जो उसका पूजन नहीं करता, उस मनुष्य को वह अतिथि अपना पाप देकर और उसका पुण्य लेकर चला जाता है।

श्लोक 110 (13.2.110)

एतत्ते कथितं पुत्र मयाऽऽख्यानमनुत्तमम् । यथा हि विजितो मृत्युर्गृहस्थेन पुराऽभवत् ॥

etatte kathitaṃ putra mayā''khyānamanuttamam | yathā hi vijito mṛtyurgṛhasthena purā'bhavat

हे पुत्र! यह उत्तम आख्यान मैंने तुम्हें सुनाया कि प्राचीन काल में एक गृहस्थ ने किस प्रकार मृत्यु को जीता था।

श्लोक 111 (13.2.111)

धन्यं यशस्यमायुष्यमिदमाख्यानमुत्तमम् । बुभूषताऽभिमन्तव्यं सर्वदुश्चरितापहम् ॥

dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyamidamākhyānamuttamam | bubhūṣatā'bhimantavyaṃ sarvaduścaritāpaham

यह उत्तम आख्यान धन, यश और आयु देने वाला है और सब दुष्कर्मों को दूर करता है; समृद्धि चाहने वाले को इसे मन में रखना चाहिए।

श्लोक 112 (13.2.112)

इदं यः कथयेद्विद्वानहन्यहनि भारत । सुदर्शनस्य चरितं पुण्याँल्लोकानवाप्नुयात् ॥

idaṃ yaḥ kathayedvidvānahanyahani bhārata | sudarśanasya caritaṃ puṇyām̐llokānavāpnuyāt

हे भारत! जो विद्वान् प्रतिदिन सुदर्शन के इस चरित्र को सुनाता है, वह पुण्य लोकों को प्राप्त करता है।

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