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अनुशासन पर्व · अध्याय 3

मतङ्ग और गर्दभी

युधिष्ठिर पूछते हैं कि क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र ब्राह्मणत्व कैसे पा सकता है; भीष्म बताते हैं कि यह सबसे दुर्लभ स्थान है, जो अनेक जन्मों के बाद ही मिलता है। वे मतङ्ग का प्राचीन आख्यान सुनाते हैं, जिसे एक गधी से पता चलता है कि उसका वास्तविक पिता नाई था और इसलिए वह चाण्डाल है। मतङ्ग वन में जाकर तप करता है; इन्द्र उसे वर देने को कहते हैं, पर चेताते हैं कि चाण्डाल योनि में जन्मा व्यक्ति कभी ब्राह्मणत्व नहीं पा सकता।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.3.1)

प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च यथा भवान् । गुणैश्च विविधैः सर्वैर्वयसा च समन्वितः ॥

prajñāśrutābhyāṃ vṛttena śīlena ca yathā bhavān | guṇaiśca vividhaiḥ sarvairvayasā ca samanvitaḥ

आप बुद्धि और शास्त्र-ज्ञान से, आचरण और शील से, अनेक प्रकार के गुणों से तथा अवस्था से भी सम्पन्न हैं।

श्लोक 2 (13.3.2)

भवान्विशिष्टो बुद्ध्या च प्रज्ञया तपसा तथा । सर्वेषामेव जातानां सतामेतन्न संशयः ॥

bhavānviśiṣṭo buddhyā ca prajñayā tapasā tathā | sarveṣāmeva jātānāṃ satāmetanna saṃśayaḥ

आप बुद्धि, प्रज्ञा और तप में विशिष्ट हैं; जितने भी सज्जन उत्पन्न हुए हैं, उन सबमें आप श्रेष्ठ हैं — इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 3 (13.3.3)

तस्माद्भवन्तं पृच्छामि धर्मं धर्मभृतांवर । नान्यस्त्वदन्यो लोकेषु प्रष्टव्योस्ति नराधिप ॥

tasmādbhavantaṃ pṛcchāmi dharmaṃ dharmabhṛtāṃvara | nānyastvadanyo lokeṣu praṣṭavyosti narādhipa

इसीलिए, हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, मैं आपसे धर्म के विषय में पूछता हूँ। हे नरेश्वर, संसार में आपके सिवा और कोई ऐसा नहीं जिससे पूछा जाए।

श्लोक 4 (13.3.4)

क्षत्रियो यदि वा वैश्यः शूद्रो वा राजसत्तम । ब्राह्मण्यं प्राप्नुयाद्येन तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

kṣatriyo yadi vā vaiśyaḥ śūdro vā rājasattama | brāhmaṇyaṃ prāpnuyādyena tanme vyākhyātumarhasi

हे राजाओं में श्रेष्ठ, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र किस उपाय से ब्राह्मणत्व पा सकता है? यह मुझे समझाने की कृपा कीजिए।

श्लोक 5 (13.3.5)

ब्राह्मण्यं यदि दुष्प्रापं त्रिभिर्वर्णैर्नराधिप । तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा । ब्राह्मण्यमथ चेदिच्छेत्कथं शक्यं पितामह ॥

brāhmaṇyaṃ yadi duṣprāpaṃ tribhirvarṇairnarādhipa | tapasā vā sumahatā karmaṇā vā śrutena vā | brāhmaṇyamatha cedicchetkathaṃ śakyaṃ pitāmaha

हे नरेश्वर, ब्राह्मणत्व तीनों वर्णों के लिए दुर्लभ है। फिर भी यदि कोई महान तप से, कर्म से या शास्त्र-ज्ञान से ब्राह्मण बनना चाहे, तो हे पितामह, यह कैसे सम्भव है?

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (13.3.6)

ब्राह्मण्यमतिदुष्प्राप्यं वर्णैः क्षत्रादिभिस्त्रिभिः । परं हि सर्वभूतानां स्थानमेतद्युधिष्ठिर ॥

brāhmaṇyamatiduṣprāpyaṃ varṇaiḥ kṣatrādibhistribhiḥ | paraṃ hi sarvabhūtānāṃ sthānametadyudhiṣṭhira

क्षत्रिय आदि तीनों वर्णों के लिए ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है। हे युधिष्ठिर, यह समस्त प्राणियों का सर्वोच्च स्थान है।

श्लोक 7 (13.3.7)

बह्वीस्तु संसरन्योनीर्जायमानः पुनःपुनः । पर्याये तात कस्मिंश्चिद्ब्राह्मणो नाम जायते ॥

bahvīstu saṃsaranyonīrjāyamānaḥ punaḥpunaḥ | paryāye tāta kasmiṃścidbrāhmaṇo nāma jāyate

हे तात, अनेक योनियों में बार-बार जन्म लेता हुआ जीव किसी एक आवर्तन में जाकर ब्राह्मण के रूप में जन्म पाता है।

श्लोक 8 (13.3.8)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मतङ्गस्य च संवादं गर्दभ्याश्च युधिष्ठिर ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | mataṅgasya ca saṃvādaṃ gardabhyāśca yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, इसी विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं — मतङ्ग और एक गधी का संवाद।

श्लोक 9 (13.3.9)

द्विजातेः कस्यचित्तात तुल्यवर्णः सुतस्त्वभूत् । मतङ्गो नाम नाम्नाऽऽसीत्सर्वैः समुदितो गुणैः ॥

dvijāteḥ kasyacittāta tulyavarṇaḥ sutastvabhūt | mataṅgo nāma nāmnā''sītsarvaiḥ samudito guṇaiḥ

हे तात, किसी द्विज का एक पुत्र था, जो उसी के वर्ण का माना जाता था। उसका नाम मतङ्ग था और वह सब गुणों से सम्पन्न था।

श्लोक 10 (13.3.10)

स यज्ञकारः कौन्तेय पित्रोत्सृष्टः परंतप । प्रायाद्गर्दभयुक्तेन रथेनाप्याशुगामिना ॥

sa yajñakāraḥ kaunteya pitrotsṛṣṭaḥ paraṃtapa | prāyādgardabhayuktena rathenāpyāśugāminā

हे कुन्तीपुत्र, हे शत्रुओं को तपाने वाले, पिता ने उसे यज्ञ के कार्य के लिए भेजा, और वह तेज़ चलने वाले गधों के रथ में बैठकर चल पड़ा।

श्लोक 11 (13.3.11)

स बालं गर्दभं राजन्वहन्तं मातुरन्तिके । निरविध्यत्प्रतोदेन नासिकायां पुनःपुनः ॥

sa bālaṃ gardabhaṃ rājanvahantaṃ māturantike | niravidhyatpratodena nāsikāyāṃ punaḥpunaḥ

हे राजन्, उसने रथ खींचते हुए एक छोटे गधे को, जो अपनी माता के पास ही था, चाबुक की नोक से उसकी नाक पर बार-बार मारा।

श्लोक 12 (13.3.12)

तं दृष्ट्वा नसि निर्भिन्नं गर्दभी पुत्रगृद्धिनी । उवाच मा शुचः पुत्र चण्डालस्त्वाभिविध्यति ॥

taṃ dṛṣṭvā nasi nirbhinnaṃ gardabhī putragṛddhinī | uvāca mā śucaḥ putra caṇḍālastvābhividhyati

उसकी नाक छिदी हुई देखकर पुत्र-स्नेह में डूबी गधी बोली — "पुत्र, शोक मत कर; तुझे एक चाण्डाल मार रहा है।"

गर्दभ्युवाच

श्लोक 13 (13.3.13)

ब्राह्मणो दारुणो नास्ति मैत्रो ब्राह्मण उच्यते । आचार्यः सर्वभूतानां शास्ता किं प्रहरिष्यति ॥

brāhmaṇo dāruṇo nāsti maitro brāhmaṇa ucyate | ācāryaḥ sarvabhūtānāṃ śāstā kiṃ prahariṣyati

ब्राह्मण में क्रूरता नहीं होती; ब्राह्मण तो मित्र-भाव वाला कहा जाता है। वह सब प्राणियों का आचार्य और शिक्षक है, वह प्रहार क्यों करेगा?

श्लोक 14 (13.3.14)

अयं तु पापप्रकृतिर्बाले न कुरुते दयाम् । स्वयोनिं मानयत्येष भावो भावं नियच्छति ॥

ayaṃ tu pāpaprakṛtirbāle na kurute dayām | svayoniṃ mānayatyeṣa bhāvo bhāvaṃ niyacchati

पर यह तो स्वभाव से ही पापी है; इसे नन्हे प्राणी पर दया नहीं आती। यह अपनी योनि का मान रखता है; जन्मजात स्वभाव ही बुद्धि को चलाता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 15 (13.3.15)

एतच्छ्रुत्वा मतङ्गस्तु दारुणं रासभीवचः । अवतीर्य रथात्तूर्णं रासभीं प्रत्यभाषत ॥

etacchrutvā mataṅgastu dāruṇaṃ rāsabhīvacaḥ | avatīrya rathāttūrṇaṃ rāsabhīṃ pratyabhāṣata

गधी की यह कठोर बात सुनकर मतङ्ग तुरन्त रथ से उतरा और उससे बोला।

मतङ्ग उवाच

श्लोक 16 (13.3.16)

ब्रूहि रासभि कल्याणि माता मे येन दूषिता । केन मां वेत्सि चण्डालं ब्राह्मण्यं केन मेऽनशत् । तत्त्वेनैतन्महाप्राज्ञे ब्रूहि सर्वमशेषतः ॥

brūhi rāsabhi kalyāṇi mātā me yena dūṣitā | kena māṃ vetsi caṇḍālaṃ brāhmaṇyaṃ kena me'naśat | tattvenaitanmahāprājñe brūhi sarvamaśeṣataḥ

हे कल्याणी गधी, बता — मेरी माता किस कारण दूषित हुई? तू मुझे चाण्डाल कैसे जानती है, और मेरा ब्राह्मणत्व किस कारण नष्ट हुआ? हे महाप्राज्ञे, यह सब ठीक-ठीक और पूरा-पूरा बता।

गर्दभ्युवाच

श्लोक 17 (13.3.17)

ब्राह्मण्यां वृषलेन त्वं मत्तायां नापितेन ह । जातस्त्वमसि चण्डालो ब्राह्मण्यं तेन तेऽनशत् ॥

brāhmaṇyāṃ vṛṣalena tvaṃ mattāyāṃ nāpitena ha | jātastvamasi caṇḍālo brāhmaṇyaṃ tena te'naśat

तू एक ब्राह्मणी से, जो मद में थी, एक नाई के द्वारा, जो शूद्र था, उत्पन्न हुआ है। इसीलिए तू चाण्डाल है और इसीलिए तेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हुआ।

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (13.3.18)

एवमुक्तो मतङ्गस्तु प्रतिप्रायाद्गृहं पुनः । तमागतमभिप्रेक्ष्य पिता वाक्यमथाब्रवीत् ॥

evamukto mataṅgastu pratiprāyādgṛhaṃ punaḥ | tamāgatamabhiprekṣya pitā vākyamathābravīt

ऐसा कहे जाने पर मतङ्ग फिर घर लौट आया। उसे आया देखकर पिता ने कहा।

पितोवाच

श्लोक 19 (13.3.19)

यस्त्वं यज्ञार्थसंसिद्धौ नियुक्तो गुरुकर्मणि । कस्मात्प्रतिनिवृत्तोसि कच्चिन्न कुशलं तव ॥

yastvaṃ yajñārthasaṃsiddhau niyukto gurukarmaṇi | kasmātpratinivṛttosi kaccinna kuśalaṃ tava

तुम्हें तो मैंने यज्ञ की सिद्धि के लिए, गुरु के कार्य में लगाया था। फिर लौट क्यों आए? कहीं तुम्हारा कुशल तो है न?

मतङ्ग उवाच

श्लोक 20 (13.3.20)

अन्त्ययोनिरयोनिर्वा कथं स कुशली भवेत् । कुशलं तु कुतस्तस्य यस्येयं जननी पितः ॥

antyayonirayonirvā kathaṃ sa kuśalī bhavet | kuśalaṃ tu kutastasya yasyeyaṃ jananī pitaḥ

जो अन्त्यज योनि का हो या हीन योनि का, वह कुशल कैसे हो सकता है? पिताजी, जिसकी ऐसी माता हो, उसके लिए कुशल कहाँ?

श्लोक 21 (13.3.21)

ब्राह्मण्यां वृषलाञ्जातं पितर्वेदयते हि माम् । अमानुषी गर्दभीयं तस्मात्तप्स्ये तपो महत् ॥

brāhmaṇyāṃ vṛṣalāñjātaṃ pitarvedayate hi mām | amānuṣī gardabhīyaṃ tasmāttapsye tapo mahat

पिताजी, इस गधी ने, जो मनुष्य नहीं है, मुझे बताया है कि मैं ब्राह्मणी से शूद्र द्वारा उत्पन्न हुआ हूँ। इसलिए अब मैं महान तप करूँगा।

भीष्म उवाच

श्लोक 22 (13.3.22)

एवमुक्त्वा स पितरं प्रतस्थे कृतनिश्चयः । ततो गत्वा महारण्यमतपत्सुमहत्तपः ॥

evamuktvā sa pitaraṃ pratasthe kṛtaniścayaḥ | tato gatvā mahāraṇyamatapatsumahattapaḥ

पिता से यह कहकर वह दृढ़ निश्चय के साथ चल पड़ा; फिर एक विशाल वन में जाकर उसने अत्यन्त कठोर तप किया।

श्लोक 23 (13.3.23)

ततः स तापयामास विबुधांस्तपसाऽन्वितः । मतङ्गः सुसुखं प्रेप्सुः स्थानं सुचरितादपि ॥

tataḥ sa tāpayāmāsa vibudhāṃstapasā'nvitaḥ | mataṅgaḥ susukhaṃ prepsuḥ sthānaṃ sucaritādapi

तब तप से सम्पन्न मतङ्ग ने अपने सुचरित और तप के बल से वह स्थान सहज ही पाना चाहते हुए अपने तप के ताप से देवताओं को सन्तप्त कर दिया।

श्लोक 24 (13.3.24)

तं तथा तपसा युक्तमुवाच हरिवाहनः । मतङ्ग तप्स्यसे किं त्वं भोगानुत्सृज्य मानुषान् ॥

taṃ tathā tapasā yuktamuvāca harivāhanaḥ | mataṅga tapsyase kiṃ tvaṃ bhogānutsṛjya mānuṣān

उसे इस प्रकार तप में लगा देखकर हरिवाहन इन्द्र ने कहा — "मतङ्ग, तुम मनुष्यों के भोग छोड़कर तप क्यों कर रहे हो?"

शक्र उवाच

श्लोक 25 (13.3.25)

वरं ददामि ते हन्त वृणीष्व त्वं यदिच्छसि । यच्चाप्यवाप्यं हृदि ते सर्वं तद्ब्रूहि मा चिरम् ॥

varaṃ dadāmi te hanta vṛṇīṣva tvaṃ yadicchasi | yaccāpyavāpyaṃ hṛdi te sarvaṃ tadbrūhi mā ciram

मैं तुम्हें वर देता हूँ; जो चाहो माँग लो। और भी जो कुछ तुम्हारे हृदय में पाने योग्य हो, वह सब बिना देर किए कहो।

मतङ्ग उवाच

श्लोक 26 (13.3.26)

ब्राह्मण्यं कामयानोऽहमिदमारब्धवांस्तपः । गच्छेयं तदवाप्येह वर एष वृतो मया ॥

brāhmaṇyaṃ kāmayāno'hamidamārabdhavāṃstapaḥ | gaccheyaṃ tadavāpyeha vara eṣa vṛto mayā

मैं ब्राह्मणत्व चाहता हूँ; इसी के लिए मैंने यह तप आरम्भ किया है। उसे यहीं पाकर मैं जाऊँ — मैंने यही वर माँगा है।

भीष्म उवाच

श्लोक 27 (13.3.27)

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं तमुवाच पुरन्दरः । मतङ्ग दुर्लभमिदं विप्रत्वं प्रार्थ्यते त्वया ॥

etacchrutvā tu vacanaṃ tamuvāca purandaraḥ | mataṅga durlabhamidaṃ vipratvaṃ prārthyate tvayā

यह वचन सुनकर पुरन्दर ने उससे कहा — "मतङ्ग, तुम जो यह विप्रत्व माँग रहे हो, वह अत्यन्त दुर्लभ है।"

शक्र उवाच

श्लोक 28 (13.3.28)

ब्राह्मण्यं प्रार्थयानस्त्वमप्राप्यमकृतात्मभिः । विनशिष्यसि दुर्बुद्धे तदुपारम मा चिरम् ॥

brāhmaṇyaṃ prārthayānastvamaprāpyamakṛtātmabhiḥ | vinaśiṣyasi durbuddhe tadupārama mā ciram

हे दुर्बुद्धि, जो ब्राह्मणत्व अशुद्ध आत्माओं को नहीं मिल सकता, उसे चाहते हुए तुम नष्ट हो जाओगे। इसलिए बिना देर किए इससे विरत हो जाओ।

श्लोक 29 (13.3.29)

श्रेष्ठं यत्सर्वभूतेषु तपो यदतिवर्तते । तदग्र्यं प्रार्थयानस्त्वमचिराद्विनशिष्यसि ॥

śreṣṭhaṃ yatsarvabhūteṣu tapo yadativartate | tadagryaṃ prārthayānastvamacirādvinaśiṣyasi

जो सब प्राणियों में श्रेष्ठ है और जो तप से भी बढ़कर है, उस सर्वोच्च पद को चाहने वाले तुम शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे।

श्लोक 30 (13.3.30)

देवतासुरमर्त्येषु यत्पवित्रं परं स्मृतम् । चण्डालयोनौ जातेन न तत्प्राप्यं कथञ्चन ॥

devatāsuramartyeṣu yatpavitraṃ paraṃ smṛtam | caṇḍālayonau jātena na tatprāpyaṃ kathañcana

देवताओं, असुरों और मनुष्यों में जो परम पवित्र माना गया है, वह चाण्डाल योनि में जन्मे हुए को किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकता।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4