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अनुशासन पर्व · अध्याय 4

इन्द्र का मतङ्ग को ब्राह्मणत्व की लम्बी राह बताना

मतङ्ग सौ वर्ष तक एक पैर पर खड़ा रहता है। इन्द्र फिर आकर उसे अपना लक्ष्य छोड़ने को कहते हैं और समझाते हैं कि पशु-योनि में पड़ा प्राणी मनुष्य-योनि में आने पर पुल्कस या चाण्डाल होता है, और फिर शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय, ब्रह्मबन्धु, काण्डपृष्ठ, जपी और श्रोत्रिय — इन अवस्थाओं से क्रमशः अधिकाधिक लम्बे कालखण्डों में गुज़रता है। श्रोत्रिय को भी शोक, हर्ष, काम, द्वेष, अभिमान और अतिवाद घेर लेते हैं, और उनके जीत लेने पर वह गिर जाता है। इन्द्र मतङ्ग से कोई दूसरा वर माँगने को कहते हैं।

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.4.1)

एवमुक्तो मतङ्गस्तु संशितात्मा यतव्रतः । अतिष्ठदेकपादेन वर्षाणां शतमच्युतः ॥

evamukto mataṅgastu saṃśitātmā yatavrataḥ | atiṣṭhadekapādena varṣāṇāṃ śatamacyutaḥ

ऐसा कहे जाने पर दृढ़ संकल्प और कठोर व्रत वाला मतङ्ग, हे अच्युत, सौ वर्ष तक एक पैर पर खड़ा रहा।

श्लोक 2 (13.4.2)

तमुवाच ततः शक्रः पुनरेव महायशाः । ब्राह्मण्यं दुर्लभं तात प्रार्थयानो न लप्स्यसे ॥

tamuvāca tataḥ śakraḥ punareva mahāyaśāḥ | brāhmaṇyaṃ durlabhaṃ tāta prārthayāno na lapsyase

तब महायशस्वी शक्र ने उससे फिर कहा — "हे तात, ब्राह्मणत्व दुर्लभ है; उसे चाहते हुए भी तुम पा नहीं सकोगे।"

शक्र उवाच

श्लोक 3 (13.4.3)

मतङ्ग परमं स्थानं प्रार्थयन्विनशिष्यसि । मा कृथाः साहसं पुत्र नैष धर्मपथस्तव ॥

mataṅga paramaṃ sthānaṃ prārthayanvinaśiṣyasi | mā kṛthāḥ sāhasaṃ putra naiṣa dharmapathastava

मतङ्ग, परम पद को चाहते हुए तुम नष्ट हो जाओगे। पुत्र, ऐसा दुस्साहस मत करो; यह तुम्हारे धर्म का मार्ग नहीं है।

श्लोक 4 (13.4.4)

विमार्गतो मार्गमाणः सर्वथा नभविष्यसि । न हि शक्यं त्वया प्राप्तुं ब्राह्मण्यमिह दुर्मते । अप्राप्यं प्रार्थयानो हि नचिराद्विनशिष्यसि ॥

vimārgato mārgamāṇaḥ sarvathā nabhaviṣyasi | na hi śakyaṃ tvayā prāptuṃ brāhmaṇyamiha durmate | aprāpyaṃ prārthayāno hi nacirādvinaśiṣyasi

गलत मार्ग से खोज करते हुए तुम किसी प्रकार सफल नहीं होगे। हे दुर्बुद्धि, तुम यहाँ ब्राह्मणत्व नहीं पा सकते; जो पाया नहीं जा सकता, उसे चाहने वाले तुम शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे।

श्लोक 5 (13.4.5)

मतङ्ग परमं स्थानं वार्यमाणोऽसकृन्मया । चिकीर्षस्येव तपसा सर्वथा नभविष्यसि ॥

mataṅga paramaṃ sthānaṃ vāryamāṇo'sakṛnmayā | cikīrṣasyeva tapasā sarvathā nabhaviṣyasi

मतङ्ग, मेरे रोकने पर भी तुम तप से परम पद को पाने पर तुले हो; तुम किसी प्रकार सफल नहीं होगे।

श्लोक 6 (13.4.6)

तिर्यग्योनिगतः सर्वो मानुष्यं यदि गच्छति । स जायते पुल्कसो वा चण्डालो वाऽप्यसंशयः ॥

tiryagyonigataḥ sarvo mānuṣyaṃ yadi gacchati | sa jāyate pulkaso vā caṇḍālo vā'pyasaṃśayaḥ

पशु-योनि में पड़ा हुआ कोई भी प्राणी यदि मनुष्य-योनि में आता है, तो निश्चय ही वह पुल्कस या चाण्डाल होकर जन्म लेता है।

श्लोक 7 (13.4.7)

पुल्कसः पापयोनिर्वा यः कश्चिदिह लक्ष्यते । स तस्यामेव सुचिरं मतङ्ग परिवर्तते ॥

pulkasaḥ pāpayonirvā yaḥ kaścidiha lakṣyate | sa tasyāmeva suciraṃ mataṅga parivartate

मतङ्ग, यहाँ जो कोई पुल्कस या पाप-योनि का दिखाई देता है, वह बहुत समय तक उसी योनि में घूमता रहता है।

श्लोक 8 (13.4.8)

ततो दशशते काले लभते शूद्रतामपि । शूद्रयोनावपि ततो बहुशः परिवर्तते ॥

tato daśaśate kāle labhate śūdratāmapi | śūdrayonāvapi tato bahuśaḥ parivartate

फिर दस सौ कालखण्ड बीतने पर वह शूद्र-भाव पाता है, और शूद्र-योनि में भी बहुत बार चक्कर काटता रहता है।

श्लोक 9 (13.4.9)

ततस्त्रिंशद्गुणे काले लभते वैश्यतामपि । वैश्यतायां चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते । ततः षष्टिगुणे काले राजन्यो नाम जायते ॥

tatastriṃśadguṇe kāle labhate vaiśyatāmapi | vaiśyatāyāṃ ciraṃ kālaṃ tatraiva parivartate | tataḥ ṣaṣṭiguṇe kāle rājanyo nāma jāyate

फिर तीस गुना समय बीतने पर वह वैश्य-भाव पाता है और वैश्य-योनि में बहुत काल तक वहीं घूमता रहता है। फिर साठ गुना समय बीतने पर वह राजन्य (क्षत्रिय) होकर जन्म लेता है।

श्लोक 10 (13.4.10)

ततः षष्टिगुणे काले लभते ब्रह्मबन्धुताम् । ब्रह्मबन्धुश्चिरं कालं ततस्तु परिवर्तते ॥

tataḥ ṣaṣṭiguṇe kāle labhate brahmabandhutām | brahmabandhuściraṃ kālaṃ tatastu parivartate

फिर साठ गुना समय बीतने पर उसे ब्रह्मबन्धु (नाममात्र के ब्राह्मण) का भाव मिलता है, और वह बहुत समय तक वहीं घूमता रहता है।

श्लोक 11 (13.4.11)

ततस्तु द्विशते काले लभते काण्डपृष्ठताम् । काण्डपृष्ठश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ॥

tatastu dviśate kāle labhate kāṇḍapṛṣṭhatām | kāṇḍapṛṣṭhaściraṃ kālaṃ tatraiva parivartate

फिर दो सौ कालखण्ड बीतने पर वह काण्डपृष्ठ (शस्त्र से जीविका चलाने वाला) बनता है, और काण्डपृष्ठ होकर बहुत काल तक वहीं घूमता रहता है।

श्लोक 12 (13.4.12)

ततस्तु त्रिशते काले लभते जपतामपि । तं च प्राप्य चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ॥

tatastu triśate kāle labhate japatāmapi | taṃ ca prāpya ciraṃ kālaṃ tatraiva parivartate

फिर तीन सौ कालखण्ड बीतने पर वह जप करने वालों (केवल गायत्री-जप करने वालों) का स्थान भी पा लेता है; उसे पाकर भी बहुत काल तक वहीं घूमता रहता है।

श्लोक 13 (13.4.13)

ततश्चतुःशते काले श्रोत्रियो नाम जायते । श्रोत्रियत्वे चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ॥

tataścatuḥśate kāle śrotriyo nāma jāyate | śrotriyatve ciraṃ kālaṃ tatraiva parivartate

फिर चार सौ कालखण्ड बीतने पर वह श्रोत्रिय (वेदज्ञ) के रूप में जन्म लेता है, और श्रोत्रिय रहकर बहुत काल तक वहीं घूमता रहता है।

श्लोक 14 (13.4.14)

तदेवं शोकहर्षौ तु कामद्वेषौ च पुत्रक । अतिमानातिवादौ च प्रविशेते द्विजाधमम् ॥

tadevaṃ śokaharṣau tu kāmadveṣau ca putraka | atimānātivādau ca praviśete dvijādhamam

तब, हे पुत्र, शोक और हर्ष, काम और द्वेष, अत्यधिक अभिमान और अतिवाद — ये उस अधम द्विज में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 15 (13.4.15)

तांश्चेज्जयति शत्रून्स तदा प्राप्नोति सद्गतिम् । अथ ते वै जयन्त्येनं तालं पक्वमिवापतेत् ॥

tāṃścejjayati śatrūnsa tadā prāpnoti sadgatim | atha te vai jayantyenaṃ tālaṃ pakvamivāpatet

यदि वह उन शत्रुओं को जीत लेता है तो उत्तम गति पाता है; और यदि वे उसे जीत लेते हैं तो वह पके हुए ताड़-फल की तरह गिर पड़ता है।

श्लोक 16 (13.4.16)

मतङ्ग सम्प्रधार्यैवं यदहं त्वामचूचुदम् । वृणीष्व काममन्यं त्वं ब्राह्मण्यं हि सुदुर्लभम् ॥

mataṅga sampradhāryaivaṃ yadahaṃ tvāmacūcudam | vṛṇīṣva kāmamanyaṃ tvaṃ brāhmaṇyaṃ hi sudurlabham

मतङ्ग, मैंने जो तुम्हें यह समझाया है, उस पर भली-भाँति विचार करके कोई दूसरा वर माँग लो; क्योंकि ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है।

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