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अनुशासन पर्व · अध्याय 5

इन्द्र से मतङ्ग का वरदान

एक हज़ार वर्ष एक पैर पर खड़े रहने के बाद मतङ्ग इन्द्र से फिर सुनता है कि ब्राह्मणत्व उसके लिए बन्द है। शोक में वह गया जाकर सौ वर्ष अँगूठे के बल खड़ा रहता है और गिर पड़ता है, तब इन्द्र उसका हाथ थाम लेते हैं। मतङ्ग कहता है कि दैव को लाँघा नहीं जा सकता, और वर माँगने को कहे जाने पर इच्छानुसार विचरने, मनचाहा रूप धरने, ब्राह्मणों-क्षत्रियों के विरोध के बिना सम्मान पाने और अक्षय कीर्ति का वर माँगता है। इन्द्र वर देते हैं कि वह छन्दोदेव नाम से प्रसिद्ध होगा और स्त्रियों का पूज्य बनेगा। मतङ्ग प्राण त्यागकर परम स्थान पाता है, और भीष्म इन्द्र की इस बात को दोहराकर कथा समाप्त करते हैं कि ब्राह्मणत्व दुर्लभ है।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.5.1)

एवमुक्तो मतङ्गस्तु संशितात्मा यतव्रतः । सहस्रमेकपादेन ततो ध्याने व्यतिष्ठत ॥

evamukto mataṅgastu saṃśitātmā yatavrataḥ | sahasramekapādena tato dhyāne vyatiṣṭhata

ऐसा कहे जाने पर दृढ़ संकल्प और कठोर व्रत वाला मतङ्ग एक हज़ार वर्ष तक एक पैर पर खड़ा होकर ध्यान में स्थित रहा।

श्लोक 2 (13.5.2)

तं सहस्रावरे काले शक्रो द्रष्टुमुपागमत् । तदेव च पुनर्वाक्यमुवाच बलवृत्रहा ॥

taṃ sahasrāvare kāle śakro draṣṭumupāgamat | tadeva ca punarvākyamuvāca balavṛtrahā

एक हज़ार वर्ष पूरे होने पर शक्र उसे देखने आए, और बल तथा वृत्र के संहारक इन्द्र ने फिर वही बात कही।

मतङ्ग उवाच

श्लोक 3 (13.5.3)

इदं वर्षसहस्रं वै ब्रह्मचारी समाहितः । अतिष्ठमेकपादेन ब्राह्मण्यं नाप्नुयां कथम् ॥

idaṃ varṣasahasraṃ vai brahmacārī samāhitaḥ | atiṣṭhamekapādena brāhmaṇyaṃ nāpnuyāṃ katham

मैं एक हज़ार वर्ष से ब्रह्मचारी रहकर, मन को एकाग्र करके, एक पैर पर खड़ा हूँ। फिर मुझे ब्राह्मणत्व कैसे नहीं मिलेगा?

शक्र उवाच

श्लोक 4 (13.5.4)

चण्डालयोनौ जातेन नावाप्यं वै कथञ्चन । अन्यं कामं वृणीष्व त्वं मा वृथा तेऽस्त्वयं श्रमः ॥

caṇḍālayonau jātena nāvāpyaṃ vai kathañcana | anyaṃ kāmaṃ vṛṇīṣva tvaṃ mā vṛthā te'stvayaṃ śramaḥ

चाण्डाल योनि में जन्मे हुए को यह किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकता। कोई दूसरी कामना माँग लो; तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ न जाए।

भीष्म उवाच

श्लोक 5 (13.5.5)

एवमुक्तो मतङ्गस्तु भृशं शोकपरायणः । अध्यतिष्ठद्गयां गत्वा सोऽङ्गुष्टेन शतं समाः ॥

evamukto mataṅgastu bhṛśaṃ śokaparāyaṇaḥ | adhyatiṣṭhadgayāṃ gatvā so'ṅguṣṭena śataṃ samāḥ

ऐसा कहे जाने पर मतङ्ग अत्यन्त शोकमग्न होकर गया चला गया और वहाँ सौ वर्ष तक अँगूठे के बल खड़ा रहा।

श्लोक 6 (13.5.6)

सुदुर्वहं वहन्योगं कृशो धमनिसन्ततः । त्वगस्थिभूतो धर्मात्मा स ततापेति नः श्रुतम् ॥

sudurvahaṃ vahanyogaṃ kṛśo dhamanisantataḥ | tvagasthibhūto dharmātmā sa tatāpeti naḥ śrutam

अत्यन्त कठिन योग का भार वहन करते हुए वह दुबला हो गया, उसकी नसें उभर आईं और वह केवल त्वचा-हड्डी रह गया; हमने सुना है कि वह धर्मात्मा तप करता रहा।

श्लोक 7 (13.5.7)

तं तपन्तमभिद्रुत्य पाणिं जग्राह वासवः । वराणामीश्वरो दाता सर्वभूतहिते रतः ॥

taṃ tapantamabhidrutya pāṇiṃ jagrāha vāsavaḥ | varāṇāmīśvaro dātā sarvabhūtahite rataḥ

तप करते हुए उसके पास दौड़कर वर देने वालों के स्वामी, वरदाता, सब प्राणियों के हित में लगे रहने वाले वासव (इन्द्र) ने उसका हाथ पकड़ लिया।

शक्र उवाच

श्लोक 8 (13.5.8)

मतङ्ग ब्राह्मणत्वं ते विरुद्धमिह दृश्यते । ब्राह्मण्यं दुर्लभतरं संवृतं परिपन्थिभिः ॥

mataṅga brāhmaṇatvaṃ te viruddhamiha dṛśyate | brāhmaṇyaṃ durlabhataraṃ saṃvṛtaṃ paripanthibhiḥ

मतङ्ग, तुम्हारा ब्राह्मणत्व यहाँ विरुद्ध ही दिखाई देता है; ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है, वह बाधा डालने वालों से घिरा हुआ है।

श्लोक 9 (13.5.9)

पूजयन्सुखमाप्नोति दुःखमाप्नोत्यपूजयन् । ब्राह्मणे सर्वभूतानां योगक्षेमः समाहितः ॥

pūjayansukhamāpnoti duḥkhamāpnotyapūjayan | brāhmaṇe sarvabhūtānāṃ yogakṣemaḥ samāhitaḥ

ब्राह्मण की पूजा करने वाला सुख पाता है और पूजा न करने वाला दुःख पाता है। सब प्राणियों का योग-क्षेम ब्राह्मण में ही सुस्थिर रहता है।

श्लोक 10 (13.5.10)

ब्राह्मणेभ्योऽनुतृप्यन्ते पितरो देवतास्तथा । ब्राह्मणः सर्वभूतानां मतङ्ग पर उच्यते ॥

brāhmaṇebhyo'nutṛpyante pitaro devatāstathā | brāhmaṇaḥ sarvabhūtānāṃ mataṅga para ucyate

ब्राह्मणों से ही पितर और देवता तृप्त होते हैं। मतङ्ग, ब्राह्मण सब प्राणियों में सर्वोच्च कहा जाता है।

श्लोक 11 (13.5.11)

ब्राह्मणः कुरुते तद्धि यथा यद्यच्च वाञ्छति ॥

brāhmaṇaḥ kurute taddhi yathā yadyacca vāñchati

क्योंकि ब्राह्मण जैसा और जो-जो चाहता है, वह कर दिखाता है।

श्लोक 12 (13.5.12)

बह्वीस्तु संसरन्योनीर्जायमानः पुनःपुनः । पर्याये तात कस्मिंश्चिद्ब्राह्मण्यमिह विन्दति ॥

bahvīstu saṃsaranyonīrjāyamānaḥ punaḥpunaḥ | paryāye tāta kasmiṃścidbrāhmaṇyamiha vindati

अनेक योनियों में बार-बार जन्म लेता हुआ जीव किसी एक आवर्तन में, हे तात, यहाँ ब्राह्मणत्व पाता है।

श्लोक 13 (13.5.13)

तदुत्सृज्येह दुष्प्रापं ब्राह्मण्यमकृतात्मभिः । अन्यं वरं वृणीष्व त्वं दुर्लभोऽयं हि ते वरः ॥

tadutsṛjyeha duṣprāpaṃ brāhmaṇyamakṛtātmabhiḥ | anyaṃ varaṃ vṛṇīṣva tvaṃ durlabho'yaṃ hi te varaḥ

इसलिए अशुद्ध आत्मा वालों के लिए दुर्लभ इस ब्राह्मणत्व को छोड़ दो और कोई दूसरा वर माँग लो; क्योंकि तुम्हारा यह वर दुर्लभ है।

मतङ्ग उवाच

श्लोक 14 (13.5.14)

किं मां तुदसि दुःखार्तं मृतं मारयसे च माम् । त्वां तु शोचामि यो लब्ध्वा ब्राह्मण्यं न बुभूषसे ॥

kiṃ māṃ tudasi duḥkhārtaṃ mṛtaṃ mārayase ca mām | tvāṃ tu śocāmi yo labdhvā brāhmaṇyaṃ na bubhūṣase

मैं तो पहले से ही दुःख से पीड़ित हूँ; मुझे क्यों सताते हो? मरे हुए को और क्यों मारते हो? मुझे तो तुम्हारे लिए शोक है, जो ब्राह्मणत्व पाकर भी ब्राह्मण नहीं होना चाहते।

श्लोक 15 (13.5.15)

ब्राह्मण्यं यदि दुष्प्रापं त्रिभिर्वर्णैर्दुरासदम् । सुदुर्लभं तदावाप्य नानुतिष्ठन्ति मानवाः ॥

brāhmaṇyaṃ yadi duṣprāpaṃ tribhirvarṇairdurāsadam | sudurlabhaṃ tadāvāpya nānutiṣṭhanti mānavāḥ

यदि ब्राह्मणत्व तीनों वर्णों के लिए दुष्प्राप्य और दुर्गम है, तब भी इस अत्यन्त दुर्लभ को पाकर मनुष्य उसका पालन नहीं करते।

श्लोक 16 (13.5.16)

ये पापेभ्यः पापतमास्तेषामधम एव सः । ब्राह्मण्यं योऽवजानीते धनं लब्ध्वेव दुर्लभम् ॥

ye pāpebhyaḥ pāpatamāsteṣāmadhama eva saḥ | brāhmaṇyaṃ yo'vajānīte dhanaṃ labdhveva durlabham

पापियों से भी बढ़कर पापी लोगों में वही सबसे अधम है जो ब्राह्मणत्व की अवज्ञा करता है, जैसे कोई दुर्लभ धन पाकर उसका अनादर करे।

श्लोक 17 (13.5.17)

दुष्प्रापं खलु विप्रत्वं प्राप्तं दुरनुपालनम् । दुरवापमवाप्यैतन्नानुतिष्ठन्ति मानवाः ॥

duṣprāpaṃ khalu vipratvaṃ prāptaṃ duranupālanam | duravāpamavāpyaitannānutiṣṭhanti mānavāḥ

विप्रत्व सचमुच दुष्प्राप्य है, और मिल जाने पर उसका पालन करना भी कठिन है; इस दुर्लभ को पाकर भी मनुष्य उसका आचरण नहीं करते।

श्लोक 18 (13.5.18)

एकारामो ह्यहं शक्र निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । अहिंसादममास्थाय कथं नार्हामि विप्रताम् ॥

ekārāmo hyahaṃ śakra nirdvandvo niṣparigrahaḥ | ahiṃsādamamāsthāya kathaṃ nārhāmi vipratām

हे शक्र, मैं अकेले रमने वाला, द्वन्द्वों से रहित और संग्रह-रहित हूँ; अहिंसा और इन्द्रिय-दमन को अपनाकर भी मैं विप्रत्व के योग्य कैसे नहीं हूँ?

श्लोक 19 (13.5.19)

दैवं तु कथमेतद्वै यदहं मातृदोषतः । एतामवस्थां सम्प्राप्तो धर्मज्ञः सन्पुरन्दर ॥

daivaṃ tu kathametadvai yadahaṃ mātṛdoṣataḥ | etāmavasthāṃ samprāpto dharmajñaḥ sanpurandara

हे पुरन्दर, फिर यह दैव के सिवा और क्या है कि धर्म को जानने वाला होकर भी मैं माता के दोष से इस दशा को पहुँचा हूँ?

श्लोक 20 (13.5.20)

नूनं दैवं न शक्यं हि पौरुषेणातिवर्तितुम् । यदर्थं यत्नवानेव न लभे विप्रतां विभो ॥

nūnaṃ daivaṃ na śakyaṃ hi pauruṣeṇātivartitum | yadarthaṃ yatnavāneva na labhe vipratāṃ vibho

निश्चय ही दैव को पुरुषार्थ से नहीं लाँघा जा सकता, क्योंकि जिस (ब्राह्मणत्व) के लिए मैं प्रयत्न करता हूँ, उसे नहीं पा रहा, हे विभो।

श्लोक 21 (13.5.21)

एवंगते तु धर्मज्ञ दातुमर्हसि मे वरम् । यदि तेऽहमनुग्राह्यः किञ्चिद्वा सुकृतं मम ॥

evaṃgate tu dharmajña dātumarhasi me varam | yadi te'hamanugrāhyaḥ kiñcidvā sukṛtaṃ mama

ऐसी स्थिति में, हे धर्मज्ञ, यदि मैं आपके अनुग्रह के योग्य हूँ, या मेरा कोई भी पुण्य है, तो आप मुझे वर दीजिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (13.5.22)

वृणीष्वेति तदा प्राह ततस्तं बलवृत्रहा । चोदितस्तु महेन्द्रेण मतङ्गः प्राब्रवीदिदम् ॥

vṛṇīṣveti tadā prāha tatastaṃ balavṛtrahā | coditastu mahendreṇa mataṅgaḥ prābravīdidam

तब बल और वृत्र का संहार करने वाले इन्द्र ने कहा, "वर माँगो।" महेन्द्र के इस प्रकार प्रेरित करने पर मतङ्ग ने यह कहा।

मतङ्ग उवाच

श्लोक 23 (13.5.23)

यथा कामविहारी स्यां कामरूपी विहङ्गमः । ब्रह्मक्षत्राविरोधेन पूजां च प्राप्नुयामहम् ॥

yathā kāmavihārī syāṃ kāmarūpī vihaṅgamaḥ | brahmakṣatrāvirodhena pūjāṃ ca prāpnuyāmaham

मैं इच्छानुसार विचरने वाला, इच्छानुसार रूप धारण करने वाला और पक्षी की तरह आकाश में चलने वाला हो जाऊँ; और ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के विरोध के बिना मुझे सम्मान प्राप्त हो।

श्लोक 24 (13.5.24)

यथा ममाक्षया कीर्तिर्भवेच्चापि पुरन्दर । कर्तुमर्हसि तद्देव शिरसा त्वां प्रसादये ॥

yathā mamākṣayā kīrtirbhaveccāpi purandara | kartumarhasi taddeva śirasā tvāṃ prasādaye

हे पुरन्दर, मेरी कीर्ति भी अक्षय हो। हे देव, आप यह करने की कृपा करें; मैं सिर झुकाकर आपको प्रसन्न करता हूँ।

शक्र उवाच

श्लोक 25 (13.5.25)

मतङ्ग गम्यतां शीघ्रमेवमेतद्भविष्यति । स्त्रियः सर्वास्त्वया लोके यक्ष्यन्ते भूतिकर्मणि ॥

mataṅga gamyatāṃ śīghramevametadbhaviṣyati | striyaḥ sarvāstvayā loke yakṣyante bhūtikarmaṇi

मतङ्ग, शीघ्र जाओ; ऐसा ही होगा। संसार में सब स्त्रियाँ मंगल-कर्मों में तुम्हारी पूजा करेंगी।

श्लोक 26 (13.5.26)

छन्दोदेव इति ख्यातः स्त्रीणां पूज्यो भविष्यसि । कीर्तिश्च तेऽतुला वत्स त्रिषु लोकेषु यास्यति ॥

chandodeva iti khyātaḥ strīṇāṃ pūjyo bhaviṣyasi | kīrtiśca te'tulā vatsa triṣu lokeṣu yāsyati

तुम "छन्दोदेव" नाम से प्रसिद्ध होगे और स्त्रियों के पूज्य होगे। हे वत्स, तुम्हारी अतुलनीय कीर्ति तीनों लोकों में फैलेगी।

भीष्म उवाच

श्लोक 27 (13.5.27)

एवं तस्मै वरं दत्त्वा वासवोऽन्तरधीयत । प्राणांस्त्यक्त्वा मतङ्गोपि प्राप तत्स्थानमुत्तमम् ॥

evaṃ tasmai varaṃ dattvā vāsavo'ntaradhīyata | prāṇāṃstyaktvā mataṅgopi prāpa tatsthānamuttamam

इस प्रकार उसे वर देकर वासव अन्तर्धान हो गए, और मतङ्ग भी प्राण त्यागकर उस परम स्थान को प्राप्त हुआ।

श्लोक 28 (13.5.28)

एवमेव परं स्थानं मर्त्यानां भरतर्षभ । ब्राह्मण्यं नाम दुष्प्रापमिन्द्रेणोक्तं महात्मना ॥

evameva paraṃ sthānaṃ martyānāṃ bharatarṣabha | brāhmaṇyaṃ nāma duṣprāpamindreṇoktaṃ mahātmanā

हे भरतश्रेष्ठ, मनुष्यों का परम स्थान ब्राह्मणत्व ऐसा ही दुर्लभ है — महात्मा इन्द्र ने यही कहा था।

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