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अनुशासन पर्व · अध्याय 6

विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे बने?

मतङ्ग की कथा सुनकर युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि क्षत्रिय विश्वामित्र ने ब्राह्मणत्व कैसे पाया। वे विश्वामित्र के कर्मों को गिनाते हैं — वसिष्ठ के सौ पुत्रों का वध, उनके रचे राक्षस, कुशिक-वंश, पुत्र रूप में अपनाए गए शुनःशेप, पुत्रों को शाप, त्रिशंकु का स्वर्गारोहण, कौशिकी नदी, शिला बनी रम्भा और विपाशा नदी की उत्पत्ति। फिर पूछते हैं कि दूसरा शरीर पाए बिना विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे हो गए, और मतङ्ग क्यों नहीं हो सके।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.6.1)

ब्राह्मण्यं यदि दुष्प्राप्यं त्रिभिर्वर्णैर्नराधिप । कथं प्राप्तं महाराज क्षत्रियेण महात्मना ॥

brāhmaṇyaṃ yadi duṣprāpyaṃ tribhirvarṇairnarādhipa | kathaṃ prāptaṃ mahārāja kṣatriyeṇa mahātmanā

हे नरेश्वर, यदि ब्राह्मणत्व तीनों वर्णों के लिए दुर्लभ है, तो हे महाराज, एक क्षत्रिय महात्मा ने उसे कैसे पा लिया?

श्लोक 2 (13.6.2)

विश्वामित्रेण धर्मात्मन्ब्राह्मणत्वं नरर्षभ । श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

viśvāmitreṇa dharmātmanbrāhmaṇatvaṃ nararṣabha | śrotumicchāmi tattvena tanme brūhi pitāmaha

हे धर्मात्मा नरश्रेष्ठ, मैं यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ कि विश्वामित्र ने ब्राह्मणत्व कैसे पाया। हे पितामह, मुझे बताइए।

श्लोक 3 (13.6.3)

तेन ह्यमितवीर्येण वसिष्ठस्य महात्मनः । हतं पुत्रशतं सद्यस्तपसाऽपि पितामह ॥

tena hyamitavīryeṇa vasiṣṭhasya mahātmanaḥ | hataṃ putraśataṃ sadyastapasā'pi pitāmaha

हे पितामह, उन्हीं अपार पराक्रमी ने महात्मा वसिष्ठ के सौ पुत्रों को तप के बल से भी क्षण भर में मार डाला था।

श्लोक 4 (13.6.4)

यातुधानाश्च बहवो राक्षसास्तिग्मतेजसः । मन्युनाऽऽविष्टदेहेन सृष्टाः कालान्तकोपमाः ॥

yātudhānāśca bahavo rākṣasāstigmatejasaḥ | manyunā''viṣṭadehena sṛṣṭāḥ kālāntakopamāḥ

क्रोध से भरे शरीर वाले उन्होंने बहुत-से यातुधान, तीखे तेज वाले राक्षस रचे थे, जो काल और अन्तक के समान थे।

श्लोक 5 (13.6.5)

महान्कुशिकवंशश्च ब्रह्मर्षिशतसंकुलः । स्थापितो नरलोकेऽस्मिन्विद्वद्ब्राह्मणसंकुलः ॥

mahānkuśikavaṃśaśca brahmarṣiśatasaṃkulaḥ | sthāpito naraloke'sminvidvadbrāhmaṇasaṃkulaḥ

उन्होंने इस मनुष्य-लोक में सैकड़ों ब्रह्मर्षियों से भरे हुए, विद्वान ब्राह्मणों से परिपूर्ण महान कुशिक-वंश को स्थापित किया।

श्लोक 6 (13.6.6)

ऋचीकस्यात्मजश्चैव शुनःशेपो महातपाः । विमोक्षितो महासत्रात्पशुतामप्युपागतः ॥

ṛcīkasyātmajaścaiva śunaḥśepo mahātapāḥ | vimokṣito mahāsatrātpaśutāmapyupāgataḥ

ऋचीक के पुत्र महातपस्वी शुनःशेप, जो यज्ञ-पशु की दशा को पहुँच गए थे, उस महान यज्ञ से मुक्त किए गए।

श्लोक 7 (13.6.7)

हरिश्चन्द्रक्रतौ देवांस्तोषयित्वाऽऽत्मतेजसा । पुत्रतामनुसंप्राप्तो विश्वामित्रस्य धीमतः ॥

hariścandrakratau devāṃstoṣayitvā''tmatejasā | putratāmanusaṃprāpto viśvāmitrasya dhīmataḥ

हरिश्चन्द्र के यज्ञ में अपने तेज से देवताओं को प्रसन्न करके वे बुद्धिमान विश्वामित्र के पुत्र-भाव को प्राप्त हुए।

श्लोक 8 (13.6.8)

नाभिवादयते ज्येष्ठं देवरातं नराधिप । पुत्राः पञ्चशतं चापि शप्ताः श्वपचतां गताः ॥

nābhivādayate jyeṣṭhaṃ devarātaṃ narādhipa | putrāḥ pañcaśataṃ cāpi śaptāḥ śvapacatāṃ gatāḥ

ज्येष्ठ देवरात को प्रणाम न करने के कारण, हे नराधिप, उनके पाँच सौ पुत्र शाप पाकर श्वपच (चाण्डाल) हो गए।

श्लोक 9 (13.6.9)

त्रिशङ्कुर्बन्धुभिर्मुक्त ऐक्ष्वाकः प्रीतिपूर्वकम् । अवाक्शिरादिवं नीतो दक्षिणामाश्रितोदिशम् ॥

triśaṅkurbandhubhirmukta aikṣvākaḥ prītipūrvakam | avākśirādivaṃ nīto dakṣiṇāmāśritodiśam

बन्धुओं द्वारा त्यागे गए इक्ष्वाकुवंशी त्रिशंकु को उन्होंने प्रेम से सिर नीचे किए स्वर्ग पहुँचाया; वह दक्षिण दिशा का आश्रय लेकर स्थित हुए।

श्लोक 10 (13.6.10)

विश्वामित्रस्य भगिनी नदी देवर्षिसेविता । कौशिकीति कृता पुण्या ब्रह्मर्षिसुरसेविता ॥

viśvāmitrasya bhaginī nadī devarṣisevitā | kauśikīti kṛtā puṇyā brahmarṣisurasevitā

विश्वामित्र की बहन, देवर्षियों से सेवित नदी, कौशिकी नाम से पुण्यमय बना दी गई और ब्रह्मर्षियों तथा देवताओं से सेवित हुई।

श्लोक 11 (13.6.11)

तपोविघ्नकरी चैव पञ्चचूडा सुसंमता । रम्भा नामाप्सराः शापाद्यस्य शैलत्वमागता ॥

tapovighnakarī caiva pañcacūḍā susaṃmatā | rambhā nāmāpsarāḥ śāpādyasya śailatvamāgatā

तप में विघ्न डालने वाली, सम्मानित पञ्चचूडा, रम्भा नाम की अप्सरा उनके शाप से शिला हो गई।

श्लोक 12 (13.6.12)

तथैवास्य भयाद्बद्ध्वा वसिष्ठः सलिले पुरा । आत्मानं मञ्जयञ्श्रीमान्विपाशः पुनरुत्थितः ॥

tathaivāsya bhayādbaddhvā vasiṣṭhaḥ salile purā | ātmānaṃ mañjayañśrīmānvipāśaḥ punarutthitaḥ

उसी प्रकार पूर्वकाल में उनके भय से अपने को बाँधकर वसिष्ठ ने अपने को जल में डुबो दिया और बन्धन से मुक्त होकर फिर ऊपर आए।

श्लोक 13 (13.6.13)

तदाप्रभृति पुण्या हि विपाशाऽभून्महानदी । विख्याता कर्मणा तेन वसिष्ठस्य महात्मनः ॥

tadāprabhṛti puṇyā hi vipāśā'bhūnmahānadī | vikhyātā karmaṇā tena vasiṣṭhasya mahātmanaḥ

तभी से वह महानदी पवित्र विपाशा कहलाई और महात्मा वसिष्ठ के उस कर्म से प्रसिद्ध हुई।

श्लोक 14 (13.6.14)

वश्यश्च भगवान्येन देवसेनाग्रगः प्रभुः । स्तुतः प्रीतमनाश्चासीच्छापाच्चैनममुञ्चत ॥

vaśyaśca bhagavānyena devasenāgragaḥ prabhuḥ | stutaḥ prītamanāścāsīcchāpāccainamamuñcata

जिनके द्वारा देवसेना के अग्रणी भगवान वश में किए गए, और स्तुति किए जाने पर प्रसन्न-चित्त होकर उन्होंने इन्हें शाप से मुक्त कर दिया।

श्लोक 15 (13.6.15)

ध्रुवस्यौत्तानपादस्य ब्रह्मर्षीणां तथैव च । मध्ये ज्वलति यो नित्यमुदीचीमाश्रितो दिशम् ॥

dhruvasyauttānapādasya brahmarṣīṇāṃ tathaiva ca | madhye jvalati yo nityamudīcīmāśrito diśam

जो उत्तानपाद-पुत्र ध्रुव और ब्रह्मर्षियों के बीच, उत्तर दिशा का आश्रय लेकर, नित्य प्रकाशित होते हैं।

श्लोक 16 (13.6.16)

तस्यैतानि च कर्माणि तथाऽन्यानि च कौरव । क्षत्रियस्येत्यतो जातमिदं कौतूहलं मम ॥

tasyaitāni ca karmāṇi tathā'nyāni ca kaurava | kṣatriyasyetyato jātamidaṃ kautūhalaṃ mama

हे कौरव, उनके ये कर्म और दूसरे भी कर्म, एक क्षत्रिय के होने के कारण, मेरे मन में यह कौतूहल उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 17 (13.6.17)

किमेतदिति तत्त्वेन प्रब्रूहि भरतर्षभ । देहान्तरमनासाद्य कथं स ब्राह्मणोऽभवत् ॥

kimetaditi tattvena prabrūhi bharatarṣabha | dehāntaramanāsādya kathaṃ sa brāhmaṇo'bhavat

हे भरतश्रेष्ठ, यह क्या है — यथार्थ बताइए: दूसरा शरीर पाए बिना वे ब्राह्मण कैसे हो गए?

श्लोक 18 (13.6.18)

एतत्तत्वेन मे तात सर्वमाख्यातुमर्हसि । मतङ्गस्य यथातत्त्वं तथैवैतद्वदस्व मे ॥

etattatvena me tāta sarvamākhyātumarhasi | mataṅgasya yathātattvaṃ tathaivaitadvadasva me

हे तात, यह सब आप मुझे यथार्थ रूप से बताने की कृपा करें; और मतङ्ग के विषय में भी जैसा था वैसा ही कहिए।

श्लोक 19 (13.6.19)

स्थाने मतङ्गो ब्राह्मण्यं नालभद्भरतर्षभ । चण्डालयोनौजातो हि कथं ब्राह्मण्यमाप्तवान् ॥

sthāne mataṅgo brāhmaṇyaṃ nālabhadbharatarṣabha | caṇḍālayonaujāto hi kathaṃ brāhmaṇyamāptavān

हे भरतश्रेष्ठ, मतङ्ग ने ब्राह्मणत्व नहीं पाया, यह ठीक ही था; क्योंकि चाण्डाल योनि में जन्मा हुआ ब्राह्मणत्व कैसे पा सकता था?

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