अनुशासन पर्व · अध्याय 7
विश्वामित्र को ब्राह्मणत्व की प्राप्ति
युधिष्ठिर के प्रश्न पर भीष्म बताते हैं कि क्षत्रिय कुल में जन्मे विश्वामित्र ने ब्राह्मणत्व कैसे पाया। कुशिक वंश के गाधि अपनी पुत्री सत्यवती को ऋषि ऋचीक को चन्द्रमा जैसे उज्ज्वल एक हजार घोड़ों के शुल्क पर देते हैं, जिन्हें वरुण गंगा से प्रकट करते हैं। ऋचीक दो चरु तैयार करते हैं, एक ब्राह्मण पुत्र के लिए और एक क्षत्रिय के लिए; सत्यवती और उसकी माता उन्हें आपस में बदल लेती हैं, और सत्यवती की प्रार्थना पर ऋचीक क्षत्रिय स्वभाव को पौत्र में कर देते हैं। इस प्रकार सत्यवती से जमदग्नि और उसकी माता से विश्वामित्र जन्म लेते हैं, और भीष्म विश्वामित्र के ब्राह्मण पुत्रों की सूची देते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.7.1)
श्रूयतां पार्थ तत्त्वेन विश्वामित्रो यथा पुरा । ब्राह्मणत्वं गतस्तात ब्रह्मर्षित्वं तथैव च ॥
śrūyatāṃ pārtha tattvena viśvāmitro yathā purā | brāhmaṇatvaṃ gatastāta brahmarṣitvaṃ tathaiva ca
हे पार्थ, सुनो; मैं यथार्थ रूप से बताता हूँ कि प्राचीन काल में विश्वामित्र ने ब्राह्मणत्व कैसे पाया और उसी प्रकार ब्रह्मर्षि का पद भी कैसे प्राप्त किया, तात।
श्लोक 2 (13.7.2)
भरतस्यान्ववाये वै मिथिलो नाम पार्थिवः । बभूव भरतश्रेष्ठ यज्वा धर्मभृतांवरः ॥
bharatasyānvavāye vai mithilo nāma pārthivaḥ | babhūva bharataśreṣṭha yajvā dharmabhṛtāṃvaraḥ
हे भरतश्रेष्ठ, भरत के वंश में मिथिल नाम का एक राजा हुआ, जो यज्ञ करने वाला और धर्म को धारण करने वालों में श्रेष्ठ था।
श्लोक 3 (13.7.3)
तस्य पुत्रो महानासीञ्जह्नुर्नाम नरेश्वरः । दुहितृत्वमनुप्राप्ता गङ्गा यस्य महात्मनः ॥
tasya putro mahānāsīñjahnurnāma nareśvaraḥ | duhitṛtvamanuprāptā gaṅgā yasya mahātmanaḥ
उसका पुत्र जह्नु नामक महान् राजा हुआ; उन महात्मा की पुत्री होने का गौरव गंगा को प्राप्त हुआ।
श्लोक 4 (13.7.4)
तस्यात्मजस्तुल्यगुणः सिन्धुद्वीपो महायशाः । सिन्धुद्वीपाच्च राजर्षिर्बलाकाश्वो महाबलः ॥
tasyātmajastulyaguṇaḥ sindhudvīpo mahāyaśāḥ | sindhudvīpācca rājarṣirbalākāśvo mahābalaḥ
उसका पुत्र सिन्धुद्वीप था, जो गुणों में उसके समान और महान् यशस्वी था; सिन्धुद्वीप से महाबली राजर्षि बलाकाश्व हुआ।
श्लोक 5 (13.7.5)
वल्लभस्तस्य तनयः साक्षाद्धर्म इवापरः । कुशिकस्तस्य तनयः सहस्राक्षसमद्युतिः ॥
vallabhastasya tanayaḥ sākṣāddharma ivāparaḥ | kuśikastasya tanayaḥ sahasrākṣasamadyutiḥ
बलाकाश्व का पुत्र वल्लभ था, जो मानो साक्षात् दूसरा धर्म था; और वल्लभ का पुत्र कुशिक था, जो सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र के समान तेजस्वी था।
श्लोक 6 (13.7.6)
कुशिकस्यात्मजः श्रीमान्गाधिर्नाम जनेश्वरः । अपुत्रः प्रसवेनार्थी वनवासमुपावसत् ॥
kuśikasyātmajaḥ śrīmāngādhirnāma janeśvaraḥ | aputraḥ prasavenārthī vanavāsamupāvasat
कुशिक का पुत्र गाधि नाम का तेजस्वी राजा था। वह निःसन्तान था और सन्तान की इच्छा से वन में जाकर रहने लगा।
श्लोक 7 (13.7.7)
कन्या जज्ञे सुतात्तस्य वने निवसतः सतः । नाम्ना सत्यवती नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥
kanyā jajñe sutāttasya vane nivasataḥ sataḥ | nāmnā satyavatī nāma rūpeṇāpratimā bhuvi
वन में रहते हुए उस सज्जन राजा के यहाँ सोमयज्ञ के फलस्वरूप एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम सत्यवती था और जिसके रूप की पृथ्वी पर कोई तुलना नहीं थी।
श्लोक 8 (13.7.8)
तां वव्रे भार्गवः श्रीमांश्च्यवनस्यात्मसम्भवः । ऋचीक इति विख्यातो विपुले तपसि स्थितः ॥
tāṃ vavre bhārgavaḥ śrīmāṃścyavanasyātmasambhavaḥ | ṛcīka iti vikhyāto vipule tapasi sthitaḥ
च्यवन के आत्मज, तेजस्वी भार्गव ने, जो ऋचीक नाम से विख्यात थे और महान् तप में स्थित थे, उसे माँगा।
श्लोक 9 (13.7.9)
स तां न प्रददौ तस्मै ऋचीकाय महात्मने । दरिद्र इति मत्वा वै गाधिः शत्रुनिबर्हणः ॥
sa tāṃ na pradadau tasmai ṛcīkāya mahātmane | daridra iti matvā vai gādhiḥ śatrunibarhaṇaḥ
परन्तु शत्रुओं का संहार करने वाले गाधि ने उन्हें दरिद्र समझकर वह कन्या महात्मा ऋचीक को नहीं दी।
श्लोक 10 (13.7.10)
प्रत्याख्याय पुनर्यान्तमब्रवीद्राजसत्तमः । शुल्कं प्रदीयतां मह्यं ततो वत्स्यसि मे सुताम् ॥
pratyākhyāya punaryāntamabravīdrājasattamaḥ | śulkaṃ pradīyatāṃ mahyaṃ tato vatsyasi me sutām
इनकार कर देने के बाद लौटते हुए ऋचीक से उस श्रेष्ठ राजा ने कहा, "मुझे शुल्क दिया जाए; तभी तुम मेरी पुत्री को पाओगे।"
ऋचीक उवाच
श्लोक 11 (13.7.11)
किं प्रयच्छामि राजेन्द्र तुभ्यं शुल्कमहं नृप । दुहितुर्ब्रूह्यसंसक्तो माऽभूत्तत्र विचारणा ॥
kiṃ prayacchāmi rājendra tubhyaṃ śulkamahaṃ nṛpa | duhiturbrūhyasaṃsakto mā'bhūttatra vicāraṇā
"हे राजेन्द्र, मैं आपको क्या शुल्क दूँ? अपनी पुत्री के लिए बिना संकोच बताइए; इसमें कोई विचार या हिचक न रहे।"
गाधिरुवाच
श्लोक 12 (13.7.12)
चन्द्ररश्मिप्रकाशानां हयानां वातरहसाम् । एकतः श्यामकर्णानां सहस्रं देहि भार्गव ॥
candraraśmiprakāśānāṃ hayānāṃ vātarahasām | ekataḥ śyāmakarṇānāṃ sahasraṃ dehi bhārgava
"हे भार्गव, मुझे एक हजार घोड़े दीजिए, जो चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल हों, वायु के समान वेगवान् हों और जिनका एक-एक कान काला हो।"
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (13.7.13)
ततः स भृगुशार्दूलश्च्यवनस्यात्मजः प्रभुः । अब्रवीद्वरुणं देवमादित्यं पतिमम्भसाम् ॥
tataḥ sa bhṛguśārdūlaścyavanasyātmajaḥ prabhuḥ | abravīdvaruṇaṃ devamādityaṃ patimambhasām
तब च्यवन के पुत्र, समर्थ भृगुश्रेष्ठ ने जलों के स्वामी आदित्य देव वरुण से कहा:
ऋचीक उवाच
श्लोक 14 (13.7.14)
एकतः श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् । सहस्रं वातवेगानां भिक्षे त्वां देवसत्तम ॥
ekataḥ śyāmakarṇānāṃ hayānāṃ candravarcasām | sahasraṃ vātavegānāṃ bhikṣe tvāṃ devasattama
"हे देवश्रेष्ठ, मैं आपसे एक हजार घोड़े माँगता हूँ, जो चन्द्रमा के समान कान्तिमान् और वायु के समान वेगवान् हों तथा जिनका एक-एक कान काला हो।"
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (13.7.15)
तथेति वरुणो देव आदित्यो भृगुसत्तमम् । उवाच यत्र ते च्छन्दस्तत्रोत्थास्यन्ति वाजिनः ॥
tatheti varuṇo deva ādityo bhṛgusattamam | uvāca yatra te cchandastatrotthāsyanti vājinaḥ
"ऐसा ही हो" कहकर आदित्य देव वरुण ने उन भृगुश्रेष्ठ से कहा, "तुम जहाँ चाहोगे, वहीं वे घोड़े उठ खड़े होंगे।"
श्लोक 16 (13.7.16)
ध्यातमात्रे ऋचीकेन हयानां चन्द्रवर्चसाम् । गङ्गाजलात्समुत्तस्थौ सहस्रं विपुलौजसाम् ॥
dhyātamātre ṛcīkena hayānāṃ candravarcasām | gaṅgājalātsamuttasthau sahasraṃ vipulaujasām
ऋचीक के चिन्तन करते ही चन्द्रमा के समान कान्तिमान् एक हजार महातेजस्वी घोड़े गंगा के जल से निकल आए।
श्लोक 17 (13.7.17)
अदूरे कान्यकुब्जस्य गङ्गायास्तीरमुत्तमम् । अश्वतीर्थं तदद्यापि मानवाः परिचक्षते ॥
adūre kānyakubjasya gaṅgāyāstīramuttamam | aśvatīrthaṃ tadadyāpi mānavāḥ paricakṣate
कान्यकुब्ज के समीप गंगा का वह उत्तम तट है, जिसे लोग आज भी अश्वतीर्थ कहते हैं।
श्लोक 18 (13.7.18)
ततो वै गाधये तात सहस्रं वाजिनां शुभम् । ऋचीकः प्रददौ प्रीतः शुल्कार्थं तपतां वरः ॥
tato vai gādhaye tāta sahasraṃ vājināṃ śubham | ṛcīkaḥ pradadau prītaḥ śulkārthaṃ tapatāṃ varaḥ
तब, तात, तपस्वियों में श्रेष्ठ ऋचीक ने प्रसन्न होकर शुल्क के रूप में वे एक हजार सुन्दर घोड़े गाधि को दे दिए।
श्लोक 19 (13.7.19)
ततः स विस्मितो राजा गाधिः शापभयेन च । ददौ तां समलङ्कृत्य कन्यां भृगुसुताय वै ॥
tataḥ sa vismito rājā gādhiḥ śāpabhayena ca | dadau tāṃ samalaṅkṛtya kanyāṃ bhṛgusutāya vai
तब राजा गाधि ने विस्मित होकर और शाप के भय से कन्या को अलंकृत करके भृगुपुत्र को दे दिया।
श्लोक 20 (13.7.20)
जग्राह विधिवत्पाणिं तस्या ब्रह्मर्षिसत्तमः । सा च तं पतिमासाद्य परं हर्षमवाप ह ॥
jagrāha vidhivatpāṇiṃ tasyā brahmarṣisattamaḥ | sā ca taṃ patimāsādya paraṃ harṣamavāpa ha
उन ब्रह्मर्षिश्रेष्ठ ने विधिपूर्वक उसका पाणिग्रहण किया, और वह उन्हें पति के रूप में पाकर परम आनन्दित हुई।
श्लोक 21 (13.7.21)
स तुतोष च ब्रह्मर्षिस्तस्या वृत्तेन भारत । छन्दयामास चैवैनां वरेण वरवर्णिनीम् ॥
sa tutoṣa ca brahmarṣistasyā vṛttena bhārata | chandayāmāsa caivaināṃ vareṇa varavarṇinīm
हे भारत, ब्रह्मर्षि उसके आचरण से सन्तुष्ट हुए और उन्होंने उस सुन्दरी को वर देकर प्रसन्न करना चाहा।
श्लोक 22 (13.7.22)
मात्रे तत्सर्वमाचख्यौ सा कन्या राजसत्तम । अथतामब्रवीन्माता सुतां किञ्चिदवाङ्मुखीम् ॥
mātre tatsarvamācakhyau sā kanyā rājasattama | athatāmabravīnmātā sutāṃ kiñcidavāṅmukhīm
हे राजश्रेष्ठ, उस कन्या ने यह सब अपनी माता को बता दिया। तब माता ने कुछ झुके मुख वाली अपनी पुत्री से कहा:
गाधिभार्योवाच
श्लोक 23 (13.7.23)
ममापि पुत्रि भर्ता ते प्रसादं कर्तुमर्हति । अपत्यस्य प्रदानेन समर्थश्च महातपाः ॥
mamāpi putri bhartā te prasādaṃ kartumarhati | apatyasya pradānena samarthaśca mahātapāḥ
"पुत्री, तुम्हारे पति को मुझ पर भी कृपा करनी चाहिए; वे महातपस्वी सन्तान देने में समर्थ हैं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 24 (13.7.24)
ततः सा त्वरितं गत्वा तत्सर्वं प्रत्यवेदयत् । मातुश्चिकीर्षितं राजन्ऋचीकस्तामथाब्रवीत् ॥
tataḥ sā tvaritaṃ gatvā tatsarvaṃ pratyavedayat | mātuścikīrṣitaṃ rājanṛcīkastāmathābravīt
तब वह शीघ्र जाकर अपनी माता की इच्छा सहित सब कुछ उनसे निवेदन कर आई; हे राजन्, तब ऋचीक ने उससे कहा:
ऋचीक उवाच
श्लोक 25 (13.7.25)
गुणवन्तं च पुत्रं वै त्वं च साऽथ जनिष्यथ । जनन्यास्तव कल्याणि मा भूद्वै प्रणयोऽन्यथा ॥
guṇavantaṃ ca putraṃ vai tvaṃ ca sā'tha janiṣyatha | jananyāstava kalyāṇi mā bhūdvai praṇayo'nyathā
"तुम गुणवान् पुत्र को जन्म दोगी और वह भी जन्म देंगी; हे कल्याणी, तुम्हारी माता की कामना व्यर्थ न हो।"
श्लोक 26 (13.7.26)
तव चैव गुणश्लाघी पुत्र उत्पत्स्यते महान् । अस्मद्वंशकरः श्रीमांस्तव भ्राता च वंशकृत् ॥
tava caiva guṇaślāghī putra utpatsyate mahān | asmadvaṃśakaraḥ śrīmāṃstava bhrātā ca vaṃśakṛt
"तुम्हारे गुणों का आदर करने वाला महान् पुत्र उत्पन्न होगा, जो तेजस्वी होगा और हमारे वंश को चलाने वाला होगा; और तुम्हारा भाई भी वंश चलाने वाला होगा।"
श्लोक 27 (13.7.27)
ऋतुस्नाता च साऽश्वत्थं त्वं च वृक्षमुदुम्बरम् । परिष्वजेतं कल्याणि तत इष्टमवाप्स्यथः ॥
ṛtusnātā ca sā'śvatthaṃ tvaṃ ca vṛkṣamudumbaram | pariṣvajetaṃ kalyāṇi tata iṣṭamavāpsyathaḥ
"ऋतुस्नान के बाद वह पीपल के वृक्ष का और तुम गूलर के वृक्ष का आलिंगन करो, हे कल्याणी; तब तुम दोनों को इष्ट फल प्राप्त होगा।"
श्लोक 28 (13.7.28)
चरुद्वयमिदं चैव मन्त्रपूतं शुचिस्मिते । त्वं च सा चोपभुञ्जीतं ततः पुत्राववाप्स्यथः ॥
carudvayamidaṃ caiva mantrapūtaṃ śucismite | tvaṃ ca sā copabhuñjītaṃ tataḥ putrāvavāpsyathaḥ
"हे शुचिस्मिते, मन्त्रों से पवित्र किए हुए ये दो चरु भी हैं; तुम और वह दोनों इन्हें खाओ, तब तुम दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे।"
भीष्म उवाच
श्लोक 29 (13.7.29)
ततः सत्यवती हृष्टा मातरं प्रत्यभाषत । यदृचीकेन कथितं तच्चाचख्यौ चरुद्वयम् ॥
tataḥ satyavatī hṛṣṭā mātaraṃ pratyabhāṣata | yadṛcīkena kathitaṃ taccācakhyau carudvayam
तब सत्यवती ने प्रसन्न होकर माता को वह सब बताया जो ऋचीक ने कहा था और दोनों चरुओं का भी वर्णन किया।
श्लोक 30 (13.7.30)
तामुवाच ततो माता सुतां सत्यवतीं तदा । पुत्रि पूर्वोपपन्नायाः कुरुष्व वचनं मम ॥
tāmuvāca tato mātā sutāṃ satyavatīṃ tadā | putri pūrvopapannāyāḥ kuruṣva vacanaṃ mama
तब माता ने अपनी पुत्री सत्यवती से कहा, "पुत्री, मेरी बात मानो, क्योंकि मैं तुमसे पहले की हूँ।"
गाधिभार्योवाच
श्लोक 31 (13.7.31)
भर्त्रा य एष दत्तस्ते चरुर्मन्त्रपुरस्कृतः । एनं प्रयच्छ मह्यं त्वं मदीयं त्वं गृहाण च ॥
bhartrā ya eṣa dattaste carurmantrapuraskṛtaḥ | enaṃ prayaccha mahyaṃ tvaṃ madīyaṃ tvaṃ gṛhāṇa ca
"तुम्हारे पति ने तुम्हें मन्त्रों से अभिमन्त्रित जो चरु दिया है, उसे तुम मुझे दे दो और मेरा चरु तुम ले लो।"
श्लोक 32 (13.7.32)
व्यत्यासं वृक्षयोश्चापि करवाव शुचिस्मिते । यदि प्रमाणं वचनं मम मातुरनिन्दिते ॥
vyatyāsaṃ vṛkṣayoścāpi karavāva śucismite | yadi pramāṇaṃ vacanaṃ mama māturanindite
"हे शुचिस्मिते, यदि तुम्हारे लिए मुझ माता की बात प्रमाण है, हे निर्दोषे, तो हम दोनों वृक्ष भी आपस में बदल लें।"
श्लोक 33 (13.7.33)
स्वमपत्यं विशिष्टं हि सर्व इच्छत्यनाविलम् । व्यक्तं भगवता चात्र कृतमेवं भविष्यति ॥
svamapatyaṃ viśiṣṭaṃ hi sarva icchatyanāvilam | vyaktaṃ bhagavatā cātra kṛtamevaṃ bhaviṣyati
"सब अपनी सन्तान को सबसे उत्तम और निर्दोष चाहते हैं। यह स्पष्ट है कि भगवान् ऋषि ने यहाँ जो किया है, वह इसी प्रकार फलित होगा।"
श्लोक 34 (13.7.34)
ततो मे त्वच्चरौ भावः पादपे च सुमध्यमे । कथं विशिष्टो भ्राता मे भवेदित्येव चिन्तय ॥
tato me tvaccarau bhāvaḥ pādape ca sumadhyame | kathaṃ viśiṣṭo bhrātā me bhavedityeva cintaya
"इसलिए, हे सुमध्यमे, मेरा मन तुम्हारे चरु और वृक्ष पर लगा है। बस यही सोचो कि मेरे लिए कोई श्रेष्ठ भाई कैसे उत्पन्न हो।"
भीष्म उवाच
श्लोक 35 (13.7.35)
तथाच कृतवत्यौ ते माता सत्यवती च सा । अथ गर्भावनुप्राप्ते उभे ते वै युधिष्ठिर ॥
tathāca kṛtavatyau te mātā satyavatī ca sā | atha garbhāvanuprāpte ubhe te vai yudhiṣṭhira
माता और सत्यवती दोनों ने वैसा ही किया; और हे युधिष्ठिर, उसके बाद दोनों गर्भवती हो गईं।
श्लोक 36 (13.7.36)
दृष्ट्वा गर्भमनुप्राप्तां भार्यां स च महानृषिः । उवाच तां सत्यवतीं दुर्मना भृगुसत्तमः ॥
dṛṣṭvā garbhamanuprāptāṃ bhāryāṃ sa ca mahānṛṣiḥ | uvāca tāṃ satyavatīṃ durmanā bhṛgusattamaḥ
अपनी पत्नी को गर्भवती देखकर उन महर्षि भृगुश्रेष्ठ ने खिन्न मन से सत्यवती से कहा:
ऋचीक उवाच
श्लोक 37 (13.7.37)
व्यत्यासेनोपयुक्तस्ते चरुर्व्यक्तं भविष्यति । व्यत्यासः पादपे चापि सुव्यक्तं ते कृतः शुभे ॥
vyatyāsenopayuktaste carurvyaktaṃ bhaviṣyati | vyatyāsaḥ pādape cāpi suvyaktaṃ te kṛtaḥ śubhe
"स्पष्ट है कि तुमने चरु बदलकर खाया है, और वृक्षों की भी अदला-बदली की है, हे शुभे; यह बिलकुल प्रकट है।"
श्लोक 38 (13.7.38)
मया हि विश्वं यद्ब्रह्म त्वच्चरौ सन्निवेशितम् । क्षत्रवीर्यं च सकलं चरौ तस्या निवेशितम् ॥
mayā hi viśvaṃ yadbrahma tvaccarau sanniveśitam | kṣatravīryaṃ ca sakalaṃ carau tasyā niveśitam
"मैंने तुम्हारे चरु में सम्पूर्ण ब्रह्मतेज रखा था और उसके चरु में सम्पूर्ण क्षत्रियों का पराक्रम रखा था।"
श्लोक 39 (13.7.39)
त्रैलोक्यविख्यातगुणं त्वं विप्रं जनयिष्यसि । सा च क्षत्रं विशिष्टं वै तत एतत्कृतं मया ॥
trailokyavikhyātaguṇaṃ tvaṃ vipraṃ janayiṣyasi | sā ca kṣatraṃ viśiṣṭaṃ vai tata etatkṛtaṃ mayā
"तुम तीनों लोकों में विख्यात गुणों वाले ब्राह्मण को जन्म देतीं और वह उत्तम क्षत्रिय को; इसीलिए मैंने यह किया था।"
श्लोक 40 (13.7.40)
व्यत्यासस्तु कृतो यस्मात्त्वया मात्रा च ते शुभे । तस्मात्सा ब्राह्मणं श्रेष्ठं माता ते जनयिष्यति ॥
vyatyāsastu kṛto yasmāttvayā mātrā ca te śubhe | tasmātsā brāhmaṇaṃ śreṣṭhaṃ mātā te janayiṣyati
"परन्तु हे शुभे, क्योंकि तुमने और तुम्हारी माता ने अदला-बदली कर दी, इसलिए तुम्हारी माता श्रेष्ठ ब्राह्मण को जन्म देगी।"
श्लोक 41 (13.7.41)
क्षत्रियं तूग्रकर्माणं त्वं भद्रे जनयिष्यसि । न हि ते तत्कृतं साधु मातृस्नेहेन भामिनि ॥
kṣatriyaṃ tūgrakarmāṇaṃ tvaṃ bhadre janayiṣyasi | na hi te tatkṛtaṃ sādhu mātṛsnehena bhāmini
"और हे भद्रे, तुम उग्र कर्म करने वाले क्षत्रिय को जन्म दोगी; क्योंकि हे भामिनी, माता के स्नेह के कारण तुमने जो किया, वह ठीक नहीं था।"
भीष्म उवाच
श्लोक 42 (13.7.42)
सा श्रुत्वा शोकसंतप्ता पपात वरवर्णिनी । भूमौ सत्यवती राजंश्छिन्नेव रुचिरा लता ॥
sā śrutvā śokasaṃtaptā papāta varavarṇinī | bhūmau satyavatī rājaṃśchinneva rucirā latā
यह सुनकर वह सुन्दरी सत्यवती शोक से सन्तप्त होकर, हे राजन्, कटी हुई सुन्दर लता के समान भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 43 (13.7.43)
प्रतिलभ्य च सा सञ्ज्ञां शिरसा प्रणिपत्य च । उवाच भार्या भर्तारं गाधेयी भार्गवर्षभम् ॥
pratilabhya ca sā sañjñāṃ śirasā praṇipatya ca | uvāca bhāryā bhartāraṃ gādheyī bhārgavarṣabham
होश में आकर उसने सिर झुकाकर प्रणाम किया और गाधि की पुत्री ने अपने पति, भार्गवश्रेष्ठ से कहा:
सत्यवत्युवाच
श्लोक 44 (13.7.44)
प्रसादयन्त्यां भार्यायां मयि ब्रह्मविदांवर । प्रसादं कुरु विप्रर्षे न मे स्यात्क्षत्रियः सुतः ॥
prasādayantyāṃ bhāryāyāṃ mayi brahmavidāṃvara | prasādaṃ kuru viprarṣe na me syātkṣatriyaḥ sutaḥ
"हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, मैं आपकी पत्नी आपको मना रही हूँ; हे विप्रर्षि, कृपा कीजिए कि मेरा पुत्र क्षत्रिय न हो।"
श्लोक 45 (13.7.45)
कामं ममोग्रकर्मा वै पौत्रो भवितुमर्हति । न तु मे स्यात्सुतो ब्रह्मन्नेष मे दीयतां वरः ॥
kāmaṃ mamograkarmā vai pautro bhavitumarhati | na tu me syātsuto brahmanneṣa me dīyatāṃ varaḥ
"चाहे मेरा पौत्र उग्र कर्म करने वाला हो जाए, पर मेरा पुत्र नहीं, हे ब्रह्मन्; मुझे यही वर दीजिए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 46 (13.7.46)
एवमस्त्विति होवाच स्वां भार्यां सुमहातपाः । ततः सा जनयामास जमदग्निं सुतं शुभम् ॥
evamastviti hovāca svāṃ bhāryāṃ sumahātapāḥ | tataḥ sā janayāmāsa jamadagniṃ sutaṃ śubham
"ऐसा ही हो" ऐसा उन महातपस्वी ने अपनी पत्नी से कहा। तब उसने जमदग्नि नाम के सुन्दर पुत्र को जन्म दिया।
श्लोक 47 (13.7.47)
विश्वामित्रं चाजनयद्गाधिभार्या यशस्विनी । ऋषेः प्रसादाद्राजेन्द्र ब्रह्मर्षिं ब्रह्मवादिनम् ॥
viśvāmitraṃ cājanayadgādhibhāryā yaśasvinī | ṛṣeḥ prasādādrājendra brahmarṣiṃ brahmavādinam
और गाधि की यशस्विनी पत्नी ने, हे राजेन्द्र, ऋषि की कृपा से ब्रह्मर्षि और ब्रह्मवादी विश्वामित्र को जन्म दिया।
श्लोक 48 (13.7.48)
ततो ब्राह्मणतां यातो विश्वामित्रो महातपाः । क्षत्रियः सोऽप्यथ तथा ब्रह्मवंशस्य कारकः ॥
tato brāhmaṇatāṃ yāto viśvāmitro mahātapāḥ | kṣatriyaḥ so'pyatha tathā brahmavaṃśasya kārakaḥ
इस प्रकार महातपस्वी विश्वामित्र क्षत्रिय होते हुए भी ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए और ब्राह्मण वंश के प्रवर्तक बने।
श्लोक 49 (13.7.49)
तस्य पुत्रा महात्मानो ब्रह्मवंशविवर्धनाः । तपस्विनो ब्रह्मविदो गोत्रकर्तार एव च ॥
tasya putrā mahātmāno brahmavaṃśavivardhanāḥ | tapasvino brahmavido gotrakartāra eva ca
उनके महात्मा पुत्र ब्राह्मण वंश को बढ़ाने वाले, तपस्वी, ब्रह्मवेत्ता और गोत्रों के प्रवर्तक हुए।
श्लोक 50 (13.7.50)
मधुच्छन्दश्च भगवान्देवरातश्च वीर्यवान् । अक्षीणश्च शकुन्तश्च बभ्रुः कालपथस्तथा ॥
madhucchandaśca bhagavāndevarātaśca vīryavān | akṣīṇaśca śakuntaśca babhruḥ kālapathastathā
वे थे: भगवान् मधुच्छन्दा, पराक्रमी देवरात, अक्षीण, शकुन्त, बभ्रु और कालपथ;
श्लोक 51 (13.7.51)
याज्ञवल्क्यश्च विख्यातस्तथा स्थूणो महाव्रतः । उलूको यमदूतश्च तथर्षिः सैन्धवायनः ॥
yājñavalkyaśca vikhyātastathā sthūṇo mahāvrataḥ | ulūko yamadūtaśca tatharṣiḥ saindhavāyanaḥ
विख्यात याज्ञवल्क्य, महाव्रती स्थूण, उलूक, यमदूत और ऋषि सैन्धवायन;
श्लोक 52 (13.7.52)
पर्णजङ्घश्च भगवान्गावलश्च महानृषिः । ऋषिर्वज्रस्तथा ख्यातः सालङ्कायन एव च ॥
parṇajaṅghaśca bhagavāngāvalaśca mahānṛṣiḥ | ṛṣirvajrastathā khyātaḥ sālaṅkāyana eva ca
भगवान् पर्णजङ्घ, महर्षि गावल, प्रसिद्ध ऋषि वज्र और सालङ्कायन;
श्लोक 53 (13.7.53)
लीलाढ्यो नारदश्चैव तथा कूर्चामुखः स्मृतः । वादुलिर्मुसलश्चैव वक्षोग्रीवस्तथैव च ॥
līlāḍhyo nāradaścaiva tathā kūrcāmukhaḥ smṛtaḥ | vādulirmusalaścaiva vakṣogrīvastathaiva ca
लीलाढ्य, नारद, प्रसिद्ध कूर्चामुख, वादुलि, मुसल और वक्षोग्रीव;
श्लोक 54 (13.7.54)
आङ्घ्रिको नैकदृक्चैव शिलायूपः सितः शुचिः । चक्रको मारुतन्तव्यो वातघ्नोऽथाश्वलायनः ॥
āṅghriko naikadṛkcaiva śilāyūpaḥ sitaḥ śuciḥ | cakrako mārutantavyo vātaghno'thāśvalāyanaḥ
आङ्घ्रिक, नैकदृक्, शिलायूप, सित, शुचि, चक्रक, मारुतन्तव्य, वातघ्न और अश्वलायन;
श्लोक 55 (13.7.55)
श्यामायनोऽथ गार्ग्यश्च जाबालिः सुश्रुतस्तथा । कारीषिरथ संश्रुत्यः परपौरवतन्तवः ॥
śyāmāyano'tha gārgyaśca jābāliḥ suśrutastathā | kārīṣiratha saṃśrutyaḥ parapauravatantavaḥ
श्यामायन, गार्ग्य, जाबालि, सुश्रुत, कारीषि, संश्रुत्य और परपौरवतन्तव;
श्लोक 56 (13.7.56)
महानृषिश्च कपिलस्तथर्षिस्ताडकायनः । तथैव चोपगहनस्तथर्षिश्चासुरायणः ॥
mahānṛṣiśca kapilastatharṣistāḍakāyanaḥ | tathaiva copagahanastatharṣiścāsurāyaṇaḥ
महर्षि कपिल, ऋषि ताडकायन, उपगहन और ऋषि आसुरायण;
श्लोक 57 (13.7.57)
मार्दमर्षिर्हिरण्याक्षो जङ्गारिर्बाभ्रवायणिः । भूतिर्विभूतिः सूतश्च सुरकृत्तु तथैव च ॥
mārdamarṣirhiraṇyākṣo jaṅgārirbābhravāyaṇiḥ | bhūtirvibhūtiḥ sūtaśca surakṛttu tathaiva ca
मार्दमर्षि, हिरण्याक्ष, जङ्गारि, बाभ्रवायणि, भूति, विभूति, सूत और सुरकृत्;
श्लोक 58 (13.7.58)
अरालिर्नाचिकश्चैव चाम्पेयोज्जयनौ तथा । नवतन्तुर्बकनखः सेयनो यतिरेव च ॥
arālirnācikaścaiva cāmpeyojjayanau tathā | navatanturbakanakhaḥ seyano yatireva ca
अरालि, नाचिक, चाम्पेय और उज्जयन, नवतन्तु, बकनख, सेयन और यति;
श्लोक 59 (13.7.59)
अम्भोरुदश्चारुमत्स्यः शिरीषी चाथ गार्दभिः । ऊर्जयोनिरुदापेक्षी नारदी च महानृषिः । विश्वामित्रात्मजाः सर्वे मुनयो ब्रह्मवादिनः ॥
ambhorudaścārumatsyaḥ śirīṣī cātha gārdabhiḥ | ūrjayonirudāpekṣī nāradī ca mahānṛṣiḥ | viśvāmitrātmajāḥ sarve munayo brahmavādinaḥ
अम्भोरुद, चारुमत्स्य, शिरीषी, गार्दभि, ऊर्जयोनि, उदापेक्षी और महर्षि नारदी: ये सब विश्वामित्र के पुत्र थे, ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाले मुनि।
श्लोक 60 (13.7.60)
तथैव क्षत्रियो राजन्विश्वामित्रो महातपाः । ऋचीकेनाहितं ब्रह्म परमेतद्युधिष्ठिर ॥
tathaiva kṣatriyo rājanviśvāmitro mahātapāḥ | ṛcīkenāhitaṃ brahma parametadyudhiṣṭhira
हे राजन्, उसी प्रकार महातपस्वी क्षत्रिय विश्वामित्र ब्राह्मण हुए; हे युधिष्ठिर, यह परम ब्राह्मणत्व उनमें ऋचीक द्वारा स्थापित किया गया था।
श्लोक 61 (13.7.61)
एतत्ते सर्वमाख्यातं तत्वेन भरतर्षभ । विश्वामित्रस्य वै जन्म सोमसूर्याग्नितेजसः ॥
etatte sarvamākhyātaṃ tatvena bharatarṣabha | viśvāmitrasya vai janma somasūryāgnitejasaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, मैंने तुम्हें यह सब यथार्थ रूप से बता दिया: चन्द्र, सूर्य और अग्नि के तेज वाले विश्वामित्र का जन्म।
श्लोक 62 (13.7.62)
यत्रयत्र च सन्देहो भूयस्ते राजसत्तम । तत्रतत्र च मां ब्रूहि च्छेत्ताऽस्मि तव संशयान् ॥
yatrayatra ca sandeho bhūyaste rājasattama | tatratatra ca māṃ brūhi cchettā'smi tava saṃśayān
हे राजश्रेष्ठ, जहाँ-जहाँ तुम्हें और सन्देह हो, वहाँ-वहाँ मुझसे पूछो; मैं तुम्हारे संशय दूर कर दूँगा।