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अनुशासन पर्व · अध्याय 8

वीतहव्य को ब्राह्मणत्व की प्राप्ति

युधिष्ठिर के अनुरोध पर भीष्म बताते हैं कि राजर्षि वीतहव्य को ब्राह्मणत्व कैसे मिला। वीतहव्य के सौ हैहय पुत्र काशी के राजाओं को हराकर मार डालते हैं; वाराणसी से निकाले गए दिवोदास भरद्वाज की शरण लेते हैं, जिनके यज्ञ से उन्हें पुत्र प्रतर्दन प्राप्त होता है। प्रतर्दन वीतहव्यों का संहार करता है और बचा हुआ वीतहव्य भृगु की शरण लेता है, जो कहते हैं कि उनके आश्रम में कोई क्षत्रिय नहीं, सब ब्राह्मण हैं। इस प्रकार भृगु के वचन से वीतहव्य ब्रह्मर्षि हो जाता है, और भीष्म उसके वंशजों की परम्परा शौनक तक बताते हैं।

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (13.8.1)

श्रुतं मे महदाख्यानमेतत्कुरुकुलोद्वह । सुदुष्प्रापं यद्ब्रवीषि ब्राह्मण्यं वदतांवर ॥

śrutaṃ me mahadākhyānametatkurukulodvaha | suduṣprāpaṃ yadbravīṣi brāhmaṇyaṃ vadatāṃvara

हे कुरुकुल के उद्धारक, मैंने यह महान् आख्यान सुना, कि ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है, जैसा आप कहते हैं, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ।

श्लोक 2 (13.8.2)

विश्वामित्रो महाराज राजा ब्राह्मणतां गतः । कथितं भवता सर्वं विस्तरेण पितामह ॥

viśvāmitro mahārāja rājā brāhmaṇatāṃ gataḥ | kathitaṃ bhavatā sarvaṃ vistareṇa pitāmaha

हे महाराज पितामह, आपने विस्तार से बताया कि राजा विश्वामित्र ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए।

श्लोक 3 (13.8.3)

तच्च राजन्मया सर्वं श्रुतं बुद्धिमतांवर । आगमो हि परोऽस्माकं त्वत्तः कौरवनन्दन ॥

tacca rājanmayā sarvaṃ śrutaṃ buddhimatāṃvara | āgamo hi paro'smākaṃ tvattaḥ kauravanandana

हे राजन्, हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, वह सब मैंने सुन लिया; क्योंकि हे कुरुनन्दन, हमारे लिए परम प्रमाण आपसे ही प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (13.8.4)

वीतहव्यश्च नृपतिः श्रुतो मे विप्रतां गतः । तदेव तावद्गाङ्गेय श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो ॥

vītahavyaśca nṛpatiḥ śruto me vipratāṃ gataḥ | tadeva tāvadgāṅgeya śrotumicchāmyahaṃ vibho

मैंने यह भी सुना है कि राजा वीतहव्य ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। हे गाङ्गेय, हे विभो, अब मैं वही सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 5 (13.8.5)

स केन कर्मणा प्राप्तो ब्राह्मण्यं राजसत्तमः । वरेण तपसा वाऽपि तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

sa kena karmaṇā prāpto brāhmaṇyaṃ rājasattamaḥ | vareṇa tapasā vā'pi tanme vyākhyātumarhasi

उस श्रेष्ठ राजा ने किस कर्म से ब्राह्मणत्व पाया, वर से या तप से? कृपया मुझे यह समझाइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 6 (13.8.6)

शृणु राजन्यथा राजा वीतहव्यो महायशाः । राजर्षिर्दुर्लभं प्राप्तो ब्राह्मण्यं लोकसत्कृतम् ॥

śṛṇu rājanyathā rājā vītahavyo mahāyaśāḥ | rājarṣirdurlabhaṃ prāpto brāhmaṇyaṃ lokasatkṛtam

हे राजन्, सुनो कि महायशस्वी राजर्षि राजा वीतहव्य को लोक में सम्मानित वह दुर्लभ ब्राह्मणत्व कैसे प्राप्त हुआ।

श्लोक 7 (13.8.7)

मनोर्महात्मनस्तात प्रजा धर्मेण शासतः । बभूव पुत्रो धर्मात्मा शर्यातिरिति विश्रुतः ॥

manormahātmanastāta prajā dharmeṇa śāsataḥ | babhūva putro dharmātmā śaryātiriti viśrutaḥ

तात, महात्मा मनु धर्म से प्रजा का शासन करते थे; उनके शर्याति नाम से प्रसिद्ध एक धर्मात्मा पुत्र हुआ।

श्लोक 8 (13.8.8)

तस्यान्ववाये द्वौ राजन्राजानौ सम्बभूवतुः । हैहयस्तालजङ्घश्च वत्सेषु जयतांवर ॥

tasyānvavāye dvau rājanrājānau sambabhūvatuḥ | haihayastālajaṅghaśca vatseṣu jayatāṃvara

हे राजन्, उसके वंश में दो राजा हुए: हैहय और तालजङ्घ, हे विजेताओं में श्रेष्ठ, वत्स देश में।

श्लोक 9 (13.8.9)

हैहयस्य तु राजेन्द्र दशसु स्त्रीषु भारत । शतं बभूव पुत्राणां शूराणामनिवर्तिनाम् । तुल्यरूपप्रभावानां बलिनां युद्धशालिनाम् ॥

haihayasya tu rājendra daśasu strīṣu bhārata | śataṃ babhūva putrāṇāṃ śūrāṇāmanivartinām | tulyarūpaprabhāvānāṃ balināṃ yuddhaśālinām

हे राजेन्द्र, हे भारत, हैहय के दस पत्नियों से सौ पुत्र हुए, जो शूर थे और युद्ध से कभी पीछे नहीं हटते थे, रूप और प्रभाव में एक समान, बलवान् और युद्ध में शोभा पाने वाले।

श्लोक 10 (13.8.10)

धनुर्वेदे च वेदे च सर्वत्रैव कृतश्रमाः ॥

dhanurvede ca vede ca sarvatraiva kṛtaśramāḥ

वे सभी धनुर्वेद में और वेद में, सर्वत्र ही परिश्रम कर चुके थे।

श्लोक 11 (13.8.11)

काशिष्वपि नृपो राजन्दिवोदासपितामहः । हर्यश्व इति विख्यातो बभूव जयतांवरः ॥

kāśiṣvapi nṛpo rājandivodāsapitāmahaḥ | haryaśva iti vikhyāto babhūva jayatāṃvaraḥ

हे राजन्, काशी में भी दिवोदास के पितामह एक राजा थे, जो हर्यश्व नाम से विख्यात और विजेताओं में श्रेष्ठ थे।

श्लोक 12 (13.8.12)

स वीतहव्यदायादैरागत्य पुरुषर्षभ । गङ्गायमुनयोर्मध्ये सङ्ग्रामे विनिपातितः ॥

sa vītahavyadāyādairāgatya puruṣarṣabha | gaṅgāyamunayormadhye saṅgrāme vinipātitaḥ

हे पुरुषश्रेष्ठ, वीतहव्य के पुत्रों ने आकर गंगा और यमुना के बीच युद्ध में उन्हें मार गिराया।

श्लोक 13 (13.8.13)

तं तु हत्वा नरपतिं हैहयास्ते महारथाः । प्रतिजग्मुः पुरीं रम्यां वत्सानामकुतोभयाः ॥

taṃ tu hatvā narapatiṃ haihayāste mahārathāḥ | pratijagmuḥ purīṃ ramyāṃ vatsānāmakutobhayāḥ

उस नरपति को मारकर वे हैहय महारथी निर्भय होकर वत्सों की अपनी रमणीय नगरी को लौट गए।

श्लोक 14 (13.8.14)

हर्यश्वस्य च दायादः काशिराजोऽभ्यषिच्यत । सुदेवो देवसंकाशः साक्षाद्धर्म इवापरः ॥

haryaśvasya ca dāyādaḥ kāśirājo'bhyaṣicyata | sudevo devasaṃkāśaḥ sākṣāddharma ivāparaḥ

हर्यश्व का उत्तराधिकारी काशिराज के रूप में अभिषिक्त हुआ: सुदेव, जो देवतुल्य था और मानो साक्षात् दूसरा धर्म था।

श्लोक 15 (13.8.15)

स पालयामास महीं धर्मात्मा काशिनन्दनः । तैर्वीतहव्यैरागत्य युधि सर्वैर्विनिर्जितः ॥

sa pālayāmāsa mahīṃ dharmātmā kāśinandanaḥ | tairvītahavyairāgatya yudhi sarvairvinirjitaḥ

वह धर्मात्मा काशिराज का पुत्र पृथ्वी का पालन करता रहा; परन्तु उन सब वीतहव्यों ने आकर युद्ध में उसे जीत लिया।

श्लोक 16 (13.8.16)

तमथाजौ विनिर्जित्य प्रतिजग्मुर्यथागतम् । सौदेविस्त्वथ काशीशोदिवोदासोऽभ्यषिच्यत ॥

tamathājau vinirjitya pratijagmuryathāgatam | saudevistvatha kāśīśodivodāso'bhyaṣicyata

उसे भी युद्ध में जीतकर वे जैसे आए थे वैसे लौट गए। तब सुदेव का पुत्र दिवोदास काशी का अधिपति बनकर अभिषिक्त हुआ।

श्लोक 17 (13.8.17)

दिवोदासस्तु विज्ञाय वीर्यं तेषां यतात्मनाम् । वाराणसीं महातेजा निर्ममे शक्रशासनात् ॥

divodāsastu vijñāya vīryaṃ teṣāṃ yatātmanām | vārāṇasīṃ mahātejā nirmame śakraśāsanāt

उन दृढ़ संकल्प वाले योद्धाओं का बल जानकर महातेजस्वी दिवोदास ने इन्द्र की आज्ञा से वाराणसी नगरी का निर्माण किया,

श्लोक 18 (13.8.18)

विप्रक्षत्रियसम्बाधां वैश्यशूद्रसमाकुलाम् । नैकद्रव्योच्चयवतीं समृद्धविपणापणाम् ॥

viprakṣatriyasambādhāṃ vaiśyaśūdrasamākulām | naikadravyoccayavatīṃ samṛddhavipaṇāpaṇām

जो ब्राह्मणों और क्षत्रियों से भरी थी, वैश्यों और शूद्रों से व्याप्त थी, अनेक प्रकार के धन के भण्डारों वाली थी और जहाँ हाट-बाजार समृद्ध थे,

श्लोक 19 (13.8.19)

गङ्गाया उत्तरे कूले वप्रान्ते राजसत्तम । गोमत्या दक्षिणे कूले शक्रस्येवामरावतीम् ॥

gaṅgāyā uttare kūle vaprānte rājasattama | gomatyā dakṣiṇe kūle śakrasyevāmarāvatīm

हे राजश्रेष्ठ, गंगा के उत्तरी तट पर बाँध के छोर तक और गोमती के दक्षिणी तट पर, इन्द्र की अमरावती के समान।

श्लोक 20 (13.8.20)

तत्र तं राजशार्दूलं निवसन्तं महीपतिम् । आगत्य हैहया भूयः पर्यधावन्त भारत ॥

tatra taṃ rājaśārdūlaṃ nivasantaṃ mahīpatim | āgatya haihayā bhūyaḥ paryadhāvanta bhārata

हे भारत, जब वह राजाओं में सिंह के समान राजा वहाँ रह रहा था, तब हैहयों ने फिर आकर उस पर धावा बोला।

श्लोक 21 (13.8.21)

स निष्क्रम्य ददौ युद्धं तेभ्यो राजा महाबलः । देवासुरसमं घोरं दिवोदासो महाद्युतिः ॥

sa niṣkramya dadau yuddhaṃ tebhyo rājā mahābalaḥ | devāsurasamaṃ ghoraṃ divodāso mahādyutiḥ

महाबली और महातेजस्वी राजा दिवोदास ने नगर से निकलकर उनसे युद्ध किया, जो देवताओं और असुरों के युद्ध के समान घोर था।

श्लोक 22 (13.8.22)

स तु युद्धे महाराज दिनानां दशतीर्दश । हतवाहनभूयिष्ठस्ततो दैन्यमुपागमत् ॥

sa tu yuddhe mahārāja dinānāṃ daśatīrdaśa | hatavāhanabhūyiṣṭhastato dainyamupāgamat

हे महाराज, उसने दस गुणा दस दिन तक युद्ध किया; फिर अधिकांश वाहन नष्ट हो जाने से वह दीन दशा को प्राप्त हुआ।

श्लोक 23 (13.8.23)

हतयोधस्ततो राजन्क्षीणकोशश्च भूमिपः । दिवोदासः पुरीं त्यक्त्वा पलायनपरोऽभवत् ॥

hatayodhastato rājankṣīṇakośaśca bhūmipaḥ | divodāsaḥ purīṃ tyaktvā palāyanaparo'bhavat

हे राजन्, योद्धा मारे गए और कोश क्षीण हो गया, तब दिवोदास नगरी छोड़कर भाग निकला।

श्लोक 24 (13.8.24)

गत्वाऽऽश्रमपदं रम्यं भरद्वाजस्य धीमतः । जगाम शरणं राजा कृताञ्जलिररिंदम ॥

gatvā''śramapadaṃ ramyaṃ bharadvājasya dhīmataḥ | jagāma śaraṇaṃ rājā kṛtāñjalirariṃdama

वह शत्रुदमन राजा बुद्धिमान् भरद्वाज के रमणीय आश्रम में पहुँचा और हाथ जोड़कर उनकी शरण में गया।

श्लोक 25 (13.8.25)

तमुवाच भरद्वाजो ज्येष्ठः पुत्रो बृहस्पतेः । पुरोधाः शीलसम्पन्नो दिवोदासं महीपतिम् ॥

tamuvāca bharadvājo jyeṣṭhaḥ putro bṛhaspateḥ | purodhāḥ śīlasampanno divodāsaṃ mahīpatim

बृहस्पति के ज्येष्ठ पुत्र भरद्वाज ने, जो शीलवान् पुरोहित थे, राजा दिवोदास से कहा:

भरद्वाज उवाच

श्लोक 26 (13.8.26)

किमागमनकृत्यं ते सर्वं प्रबूहि मे नृप । यत्ते प्रियं तत्करिष्ये न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥

kimāgamanakṛtyaṃ te sarvaṃ prabūhi me nṛpa | yatte priyaṃ tatkariṣye na me'trāsti vicāraṇā

"आपके आने का क्या प्रयोजन है? हे राजन्, मुझे सब बताइए। जो आपको प्रिय है, वह मैं करूँगा; इसमें मुझे कोई सन्देह नहीं।"

राजोवाच

श्लोक 27 (13.8.27)

भगवन्वैतहव्यैर्मे युद्धे वंशः प्रणाशितः । अहमेकः परिद्यूनो भवन्तं शरणं गतः ॥

bhagavanvaitahavyairme yuddhe vaṃśaḥ praṇāśitaḥ | ahamekaḥ paridyūno bhavantaṃ śaraṇaṃ gataḥ

"भगवन्, वीतहव्यों ने युद्ध में मेरे वंश का नाश कर दिया। मैं अकेला बचा हूँ, सब ओर से पीड़ित होकर आपकी शरण में आया हूँ।"

श्लोक 28 (13.8.28)

शिष्यस्नेहेन भगवंस्त्वं मां रक्षितुमर्हसि । एकशेषः कृतो वंशो मम तैः पापकर्मभिः ॥

śiṣyasnehena bhagavaṃstvaṃ māṃ rakṣitumarhasi | ekaśeṣaḥ kṛto vaṃśo mama taiḥ pāpakarmabhiḥ

"भगवन्, शिष्य के प्रति स्नेह के कारण आप मेरी रक्षा करें। उन पापकर्मियों ने मेरे वंश में केवल एक को शेष छोड़ा है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 29 (13.8.29)

तमुवाच महाभागो भरद्वाजः प्रतापवान् । न भेतव्यं न भेतव्यं सौदेव व्येतु ते भयम् ॥

tamuvāca mahābhāgo bharadvājaḥ pratāpavān | na bhetavyaṃ na bhetavyaṃ saudeva vyetu te bhayam

महाभाग और प्रतापी भरद्वाज ने उससे कहा, "डरो मत, डरो मत, सुदेवपुत्र; तुम्हारा भय दूर हो।"

भरद्वाज उवाच

श्लोक 30 (13.8.30)

अहमिष्टिं करिष्यामि पुत्रार्थं ते विशाम्पते । वीतहव्यसहस्राणि येन त्वं प्रहरिष्यसि ॥

ahamiṣṭiṃ kariṣyāmi putrārthaṃ te viśāmpate | vītahavyasahasrāṇi yena tvaṃ prahariṣyasi

"हे प्रजापालक, मैं तुम्हारे लिए पुत्र-प्राप्ति का यज्ञ करूँगा, जिससे तुम हजारों वीतहव्यों का संहार करोगे।"

भीष्म उवाच

श्लोक 31 (13.8.31)

तत इष्टिं चकारर्षिस्तस्य वै पुत्रकामिकीम् । अथास्य तनयो जज्ञे दैवोदासः प्रतर्दनः ॥

tata iṣṭiṃ cakārarṣistasya vai putrakāmikīm | athāsya tanayo jajñe daivodāsaḥ pratardanaḥ

तब ऋषि ने उसके लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया, और उसके दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन उत्पन्न हुआ।

श्लोक 32 (13.8.32)

स जातमात्रो ववृधे समाः सद्यस्त्रयोदश । वेदं चापि जगौ कृत्स्नं धनुर्वेदं च भारत ॥

sa jātamātro vavṛdhe samāḥ sadyastrayodaśa | vedaṃ cāpi jagau kṛtsnaṃ dhanurvedaṃ ca bhārata

वह जन्म लेते ही तत्काल तेरह वर्ष का हो गया; हे भारत, उसने सम्पूर्ण वेद और धनुर्वेद का भी पाठ किया।

श्लोक 33 (13.8.33)

योगेन च समाविष्टो भरद्वाजेन धीमता । कृत्स्नं हि तेजो यल्लोके तदेतद्देहमाविशत् ॥

yogena ca samāviṣṭo bharadvājena dhīmatā | kṛtsnaṃ hi tejo yalloke tadetaddehamāviśat

बुद्धिमान् भरद्वाज ने उसे योग से आविष्ट किया, और संसार में जो भी सम्पूर्ण तेज है, वह इसी शरीर में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 34 (13.8.34)

ततः स कवची धन्वी स्तूयमानः सुरर्षिभिः । बन्दिभिर्वन्द्यमानश्च बभौ सूर्य इवोदितः ॥

tataḥ sa kavacī dhanvī stūyamānaḥ surarṣibhiḥ | bandibhirvandyamānaśca babhau sūrya ivoditaḥ

तब कवच पहने और धनुष धारण किए हुए, देवर्षियों से स्तुति पाते और बन्दियों से वन्दित होते हुए वह उगे हुए सूर्य के समान शोभित हुआ।

श्लोक 35 (13.8.35)

स रथी बद्धनिस्त्रिंशो बभौ दीप्त इवानलः । प्रययौ स धनुर्धुन्वन्विवर्षिषुरिवाम्बुदः ॥

sa rathī baddhanistriṃśo babhau dīpta ivānalaḥ | prayayau sa dhanurdhunvanvivarṣiṣurivāmbudaḥ

रथ पर आरूढ़, तलवार बाँधे हुए वह प्रज्वलित अग्नि के समान चमका; धनुष की टंकार करता हुआ वह बरसने को उद्यत मेघ की भाँति चल पड़ा।

श्लोक 36 (13.8.36)

तं दृष्ट्वा परमं हर्षं सुदेवतनयो ययौ । मेने च मनसा दग्धान्वैतहव्यान्स पार्थिवः ॥

taṃ dṛṣṭvā paramaṃ harṣaṃ sudevatanayo yayau | mene ca manasā dagdhānvaitahavyānsa pārthivaḥ

उसे देखकर सुदेव का पुत्र परम हर्ष को प्राप्त हुआ और उस राजा ने मन में वीतहव्यों को भस्म हुआ ही मान लिया।

श्लोक 37 (13.8.37)

ततोसौ यौवराज्ये च स्थापयित्वा प्रतर्दनम् । कृतकृत्यं तदाऽऽत्मानं स राजा प्रत्यपद्यत ॥

tatosau yauvarājye ca sthāpayitvā pratardanam | kṛtakṛtyaṃ tadā''tmānaṃ sa rājā pratyapadyata

तब प्रतर्दन को युवराज पद पर स्थापित करके उस राजा ने अपने को कृतकृत्य माना।

श्लोक 38 (13.8.38)

ततस्तु वैतहव्यानां वधाय स महीपतिः । पुत्रं प्रस्थापयामास प्रतर्दनमरिंदमम् ॥

tatastu vaitahavyānāṃ vadhāya sa mahīpatiḥ | putraṃ prasthāpayāmāsa pratardanamariṃdamam

तब उस राजा ने वैतहव्यों के वध के लिए अपने शत्रुदमन पुत्र प्रतर्दन को भेजा।

श्लोक 39 (13.8.39)

सरथः स तु संतीर्य गङ्गामाशु पराक्रमी । प्रययौ वीतहव्यानां पुरीं परपुरंजयः ॥

sarathaḥ sa tu saṃtīrya gaṅgāmāśu parākramī | prayayau vītahavyānāṃ purīṃ parapuraṃjayaḥ

रथ सहित गंगा को शीघ्र पार करके वह पराक्रमी, शत्रुओं के नगरों को जीतने वाला वीतहव्यों की नगरी की ओर चला।

श्लोक 40 (13.8.40)

वैतहव्यास्तु संश्रुत्य रथघोषं समुद्धतम् । निर्ययुर्नगराकारै रथैः पररथारुजैः ॥

vaitahavyāstu saṃśrutya rathaghoṣaṃ samuddhatam | niryayurnagarākārai rathaiḥ pararathārujaiḥ

उसके रथ की भीषण घरघराहट सुनकर वैतहव्य नगर जैसे विशाल, शत्रुओं के रथ कुचल देने वाले रथों पर सवार होकर निकल पड़े।

श्लोक 41 (13.8.41)

निष्क्रम्य ते नरव्याघ्रा दंशिताश्चित्रयोधिनः । प्रतर्दनं समाजग्मुः शरवर्षैरुदायुधाः ॥

niṣkramya te naravyāghrā daṃśitāścitrayodhinaḥ | pratardanaṃ samājagmuḥ śaravarṣairudāyudhāḥ

बाहर निकलकर वे नरश्रेष्ठ, कवचधारी और विचित्र ढंग से लड़ने वाले योद्धा, शस्त्र उठाए हुए बाणों की वर्षा करते हुए प्रतर्दन पर टूट पड़े।

श्लोक 42 (13.8.42)

शस्त्रैश्च विविधाकारै रथौघैश्च युधिष्ठिर । अभ्यवर्षन्त राजानं हिमवन्तमिवाम्बुदाः ॥

śastraiśca vividhākārai rathaughaiśca yudhiṣṭhira | abhyavarṣanta rājānaṃ himavantamivāmbudāḥ

हे युधिष्ठिर, अनेक प्रकार के शस्त्रों और रथों के समूहों से उन्होंने राजा पर वैसे ही वर्षा की जैसे मेघ हिमालय पर करते हैं।

श्लोक 43 (13.8.43)

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां राजा प्रतर्दनः । जघान तान्महातेजा वज्रानलसमैः शरैः ॥

astrairastrāṇi saṃvārya teṣāṃ rājā pratardanaḥ | jaghāna tānmahātejā vajrānalasamaiḥ śaraiḥ

महातेजस्वी राजा प्रतर्दन ने अपने अस्त्रों से उनके अस्त्रों को रोककर वज्र और अग्नि के समान बाणों से उन्हें मार गिराया।

श्लोक 44 (13.8.44)

कृत्तोत्तमाङ्गास्ते राजन्भल्लैः शतसहस्रशः । अपतन्रुधिरार्द्राङ्गा निकृत्ता इव किंशुकाः ॥

kṛttottamāṅgāste rājanbhallaiḥ śatasahasraśaḥ | apatanrudhirārdrāṅgā nikṛttā iva kiṃśukāḥ

हे राजन्, भल्ल बाणों से सैकड़ों-हजारों के सिर कट गए; वे रक्त से भीगे अंगों वाले कटे हुए किंशुक वृक्षों के समान गिर पड़े।

श्लोक 45 (13.8.45)

हतेषु तेषु सर्वेषु वीतहव्यः सुतेष्वथ । प्राद्रवन्नगरं हित्वा भृगोराश्रममप्युत ॥

hateṣu teṣu sarveṣu vītahavyaḥ suteṣvatha | prādravannagaraṃ hitvā bhṛgorāśramamapyuta

उन सब पुत्रों के मारे जाने पर वीतहव्य नगर छोड़कर भागा और भृगु के आश्रम में पहुँचा।

श्लोक 46 (13.8.46)

ययौ भृगुं च शरणं वीतहव्यो नराधिपः । अभयं च ददौ तस्मै वीतहव्याय भार्गवः । आसनं शिष्यमध्ये च भृगुरन्यत्समादिशत् ॥

yayau bhṛguṃ ca śaraṇaṃ vītahavyo narādhipaḥ | abhayaṃ ca dadau tasmai vītahavyāya bhārgavaḥ | āsanaṃ śiṣyamadhye ca bhṛguranyatsamādiśat

राजा वीतहव्य भृगु की शरण में गया। भार्गव भृगु ने वीतहव्य को अभय दिया और शिष्यों के बीच उसे दूसरा आसन दिया।

श्लोक 47 (13.8.47)

अथानुपदमेवाशु तत्रागच्छत्प्रतर्दनः । स प्राप्य चाश्रमपदं दिवोदासात्मजोऽब्रवीत् ॥

athānupadamevāśu tatrāgacchatpratardanaḥ | sa prāpya cāśramapadaṃ divodāsātmajo'bravīt

उसके ठीक पीछे प्रतर्दन भी शीघ्र वहाँ आ पहुँचा। आश्रम में पहुँचकर दिवोदास के पुत्र ने कहा:

प्रतर्दन उवाच

श्लोक 48 (13.8.48)

भोभो केऽत्राश्रमे सन्ति भृगोः शिष्या महात्मनः । द्रष्टुमिच्छे मुनिमहं तस्याचक्षत मामिति ॥

bhobho ke'trāśrame santi bhṛgoḥ śiṣyā mahātmanaḥ | draṣṭumicche munimahaṃ tasyācakṣata māmiti

"अरे! महात्मा भृगु के शिष्यों में से इस आश्रम में कौन-कौन हैं? मैं मुनि के दर्शन करना चाहता हूँ; उन्हें मेरे आने की सूचना दो।"

भीष्म उवाच

श्लोक 49 (13.8.49)

स तं विदित्वा तु भृगुर्निश्चक्रामाश्रमात्तदा । पूजयामास च ततो विधिना नृपसत्तमम् ॥

sa taṃ viditvā tu bhṛgurniścakrāmāśramāttadā | pūjayāmāsa ca tato vidhinā nṛpasattamam

उसे जानकर भृगु तब आश्रम से बाहर आए और उन्होंने उस श्रेष्ठ राजा का विधिपूर्वक सत्कार किया।

श्लोक 50 (13.8.50)

उवाच चैनं राजेन्द्र किं कार्यं ब्रूहि पार्थिव । स चोवाच नृपस्तस्मै यदागमनकारणम् ॥

uvāca cainaṃ rājendra kiṃ kāryaṃ brūhi pārthiva | sa covāca nṛpastasmai yadāgamanakāraṇam

उन्होंने उससे कहा, "हे राजेन्द्र, क्या कार्य है? हे राजन्, बताओ।" तब राजा ने अपने आने का कारण उन्हें कह सुनाया।

राजोवाच

श्लोक 51 (13.8.51)

अयं ब्रह्मन्नितो राजा वीतहव्यो विसर्ज्यताम् । अस्य पुत्रैर्हि मे कृत्स्नो ब्रह्मन्वंशः प्रणाशितः ॥

ayaṃ brahmannito rājā vītahavyo visarjyatām | asya putrairhi me kṛtsno brahmanvaṃśaḥ praṇāśitaḥ

"ब्रह्मन्, यहाँ उपस्थित इस राजा वीतहव्य को छोड़ दीजिए। हे ब्रह्मन्, इसके पुत्रों ने मेरे समस्त वंश का नाश कर दिया।"

श्लोक 52 (13.8.52)

उत्सादितश्च विषयः काशीनां रत्नसञ्चयः । एतस्य वीर्यदृप्तस्य हतं पुत्रशतं मया । अस्येदानीं वधादद्य भविष्याम्यनृणः पितुः ॥

utsāditaśca viṣayaḥ kāśīnāṃ ratnasañcayaḥ | etasya vīryadṛptasya hataṃ putraśataṃ mayā | asyedānīṃ vadhādadya bhaviṣyāmyanṛṇaḥ pituḥ

"रत्नों के भण्डार काशी देश को उजाड़ दिया गया। इस बल के गर्व वाले के सौ पुत्र मैंने मार डाले। अब इसका वध करके मैं अपने पिता के ऋण से मुक्त हो जाऊँगा।"

भीष्म उवाच

श्लोक 53 (13.8.53)

तमुवाच कृपाविष्टो भृगुर्धर्मभृतांवरः । नेहास्ति क्षत्रियः कश्चित्सर्वे हीमे द्विजातयः ॥

tamuvāca kṛpāviṣṭo bhṛgurdharmabhṛtāṃvaraḥ | nehāsti kṣatriyaḥ kaścitsarve hīme dvijātayaḥ

धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ भृगु ने दया से भरकर उससे कहा, "यहाँ कोई क्षत्रिय नहीं है; ये सब द्विज हैं।"

श्लोक 54 (13.8.54)

एतत्तु वचनं श्रुत्वा भृगोस्तथ्यं प्रतर्दनः । पादावुपस्पृश्य शनैः प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥

etattu vacanaṃ śrutvā bhṛgostathyaṃ pratardanaḥ | pādāvupaspṛśya śanaiḥ prahṛṣṭo vākyamabravīt

भृगु का यह सत्य वचन सुनकर प्रतर्दन ने धीरे से उनके चरण छुए और हर्षित होकर यह बात कही:

प्रतर्दन उवाच

श्लोक 55 (13.8.55)

एवमप्यस्मि भगवन्कृतकृत्यो न संशयः । य एष राजा वीर्येण स्वजातिं त्याजितो मया ॥

evamapyasmi bhagavankṛtakṛtyo na saṃśayaḥ | ya eṣa rājā vīryeṇa svajātiṃ tyājito mayā

"भगवन्, इस प्रकार भी मैं निस्सन्देह कृतकृत्य हूँ, क्योंकि इस राजा को मैंने अपने पराक्रम से अपनी जाति से च्युत करा दिया।"

श्लोक 56 (13.8.56)

अनुजानीहि मां ब्रह्मन्ध्यायस्व च शिवेन माम् । त्याजितो हि मया जातिमेव राजा भृगूद्वह ॥

anujānīhi māṃ brahmandhyāyasva ca śivena mām | tyājito hi mayā jātimeva rājā bhṛgūdvaha

"हे ब्रह्मन्, मुझे अनुमति दीजिए और मेरा कल्याण-चिन्तन कीजिए; हे भृगुवंशी, मैंने इस राजा को उसकी जाति से च्युत करा दिया है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 57 (13.8.57)

ततस्तेनाभ्यनुज्ञातो ययौ राजा प्रतर्दनः । यथागतं महाराज मुक्त्वा विषमिवोरगः ॥

tatastenābhyanujñāto yayau rājā pratardanaḥ | yathāgataṃ mahārāja muktvā viṣamivoragaḥ

तब उनकी अनुमति पाकर राजा प्रतर्दन, हे महाराज, विष त्याग चुके सर्प की भाँति जैसे आया था वैसे ही लौट गया।

श्लोक 58 (13.8.58)

भृगोर्वचनमात्रेण स च ब्रह्मर्षितां गतः । वीतहव्यो महाराज ब्रह्मवादित्वमेव च ॥

bhṛgorvacanamātreṇa sa ca brahmarṣitāṃ gataḥ | vītahavyo mahārāja brahmavāditvameva ca

हे महाराज, भृगु के वचन मात्र से वीतहव्य ब्रह्मर्षि हो गया और ब्रह्मवादी भी।

श्लोक 59 (13.8.59)

तस्य गृत्समदः पुत्रो रूपेणेन्द्र इवापरः । शक्रस्त्वमिति यो दैत्यैर्निगृहीतः किलाभवत् ॥

tasya gṛtsamadaḥ putro rūpeṇendra ivāparaḥ | śakrastvamiti yo daityairnigṛhītaḥ kilābhavat

उसका पुत्र गृत्समद था, जो रूप में दूसरे इन्द्र के समान था; कहते हैं कि "तुम इन्द्र हो" ऐसा समझकर दैत्यों ने उसे पकड़ लिया था।

श्लोक 60 (13.8.60)

ऋग्वेदे वर्तते चाग्र्या श्रुतिर्यस्य महात्मनः । यत्र गृत्समदो राजन्ब्राह्मणैः स महीयते ॥

ṛgvede vartate cāgryā śrutiryasya mahātmanaḥ | yatra gṛtsamado rājanbrāhmaṇaiḥ sa mahīyate

ऋग्वेद में उस महात्मा की एक श्रेष्ठ श्रुति विद्यमान है, जिसमें, हे राजन्, ब्राह्मणों द्वारा गृत्समद की महिमा गाई जाती है।

श्लोक 61 (13.8.61)

स ब्रह्मचारी विप्रर्षिः श्रीमान्गृत्समदोऽभवत् । पुत्रो गृत्समदस्यापि विप्रः सावैनसोऽभवत् ॥

sa brahmacārī viprarṣiḥ śrīmāngṛtsamado'bhavat | putro gṛtsamadasyāpi vipraḥ sāvainaso'bhavat

वह तेजस्वी गृत्समद ब्रह्मचारी विप्रर्षि हुआ, और गृत्समद का पुत्र भी सावैनस नाम का ब्राह्मण हुआ।

श्लोक 62 (13.8.62)

सावैनसस्य पुत्रो वै वितस्त्यस्तस्य चात्मजः । वितस्त्यस्य सुतस्तस्य शिवस्तश्चात्मजोऽभवत् ॥

sāvainasasya putro vai vitastyastasya cātmajaḥ | vitastyasya sutastasya śivastaścātmajo'bhavat

सावैनस का पुत्र वितस्त्य था; वितस्त्य के एक पुत्र हुआ और उसका पुत्र शिवस्त हुआ।

श्लोक 63 (13.8.63)

श्रवास्तस्य सुतश्चर्षिः श्रवसश्चाभवत्तमः । तमसश्च प्रकाशोऽभूत्तनयो द्विजसत्तमः ॥

śravāstasya sutaścarṣiḥ śravasaścābhavattamaḥ | tamasaśca prakāśo'bhūttanayo dvijasattamaḥ

उसका पुत्र श्रवा नाम का ऋषि था, श्रवस से तम हुआ, और तम से प्रकाश नाम का द्विजश्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 64 (13.8.64)

प्रकाशस्य च वागिन्द्रो बभूव जयतांवरः । तस्यात्मजश्च प्रमितिर्वेदवेदाङ्गपारगः ॥

prakāśasya ca vāgindro babhūva jayatāṃvaraḥ | tasyātmajaśca pramitirvedavedāṅgapāragaḥ

प्रकाश का पुत्र वागिन्द्र था, जो विजेताओं में श्रेष्ठ था, और उसका पुत्र प्रमिति वेद-वेदाङ्गों का पारगामी हुआ।

श्लोक 65 (13.8.65)

घृताच्यां तस्य पुत्रस्तु रुरुर्नामोदपद्यत । प्रमद्वरायां तु रुरोः पुत्रः समुदपद्यत । शुनको नाम विप्रर्षिर्यस्य पुत्रोऽथ शौनकः ॥

ghṛtācyāṃ tasya putrastu rururnāmodapadyata | pramadvarāyāṃ tu ruroḥ putraḥ samudapadyata | śunako nāma viprarṣiryasya putro'tha śaunakaḥ

उसके घृताची से रुरु नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ; और रुरु के प्रमद्वरा से शुनक नाम का विप्रर्षि पुत्र हुआ, जिसका पुत्र शौनक हुआ।

श्लोक 66 (13.8.66)

एवं विप्रत्वमगमद्वीतहव्यो नराधिपः । भृगोः प्रसादाद्राजेन्द्र क्षत्रियः क्षत्रियर्षभ ॥

evaṃ vipratvamagamadvītahavyo narādhipaḥ | bhṛgoḥ prasādādrājendra kṣatriyaḥ kṣatriyarṣabha

इस प्रकार क्षत्रिय राजा वीतहव्य भृगु की कृपा से ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुआ, हे राजेन्द्र, हे क्षत्रियश्रेष्ठ।

श्लोक 67 (13.8.67)

एष ते कथितो वंशो राजन्गार्त्समदो मया । विस्तरेण महाराज किमन्यदनुपृच्छसि ॥

eṣa te kathito vaṃśo rājangārtsamado mayā | vistareṇa mahārāja kimanyadanupṛcchasi

हे राजन्, मैंने तुम्हें गृत्समद का यह वंश विस्तार से बता दिया, हे महाराज; अब और क्या पूछते हो?

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