अनुशासन पर्व · अध्याय 9
दैव और पुरुषार्थ
युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि दैव और पुरुषार्थ में कौन श्रेष्ठ है। भीष्म वह संवाद सुनाते हैं जो ब्रह्मा ने वसिष्ठ से कहा था: दैव बीज है और पुरुषार्थ खेत, और दोनों के बिना कुछ नहीं उगता। ययाति, पुरूरवा, बलि, नृग और पाण्डवों जैसे देवों और राजाओं के उदाहरणों से ब्रह्मा दिखाते हैं कि फल कर्म से ही मिलता है और दैव भी कर्म से ही पलता और क्षीण होता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (13.9.1)
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । दैवे पुरुषकारे च किंस्विच्छ्रेष्ठतरं भवेत् ॥
pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | daive puruṣakāre ca kiṃsvicchreṣṭhataraṃ bhavet
युधिष्ठिर ने कहा — पितामह, आप महाप्राज्ञ हैं और सब शास्त्रों में निपुण हैं; बताइए, दैव और पुरुषार्थ में कौन श्रेष्ठ है?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (13.9.2)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । वसिष्ठस्य च संवादं ब्रह्मणश्च युधिष्ठिर ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | vasiṣṭhasya ca saṃvādaṃ brahmaṇaśca yudhiṣṭhira
भीष्म ने कहा — युधिष्ठिर, इस विषय में एक पुराना इतिहास सुनाया जाता है: वसिष्ठ और ब्रह्मा का संवाद।
श्लोक 3 (13.9.3)
दैवमानुषयोः किंस्वित्कर्मणोः श्रेष्ठमित्युत । पुरा वसिष्ठो भगवान्पितामहमपृच्छत ॥
daivamānuṣayoḥ kiṃsvitkarmaṇoḥ śreṣṭhamityuta | purā vasiṣṭho bhagavānpitāmahamapṛcchata
पूर्वकाल में भगवान् वसिष्ठ ने पितामह ब्रह्मा से पूछा था कि दैव और मानवीय कर्म, इन दोनों में कौन-सा श्रेष्ठ है।
श्लोक 4 (13.9.4)
ततः पद्मोद्भवो राजन्देवदेवः पितामहः । उवाच मधुरं वाक्यमर्थवद्धेतुभूषितम् ॥
tataḥ padmodbhavo rājandevadevaḥ pitāmahaḥ | uvāca madhuraṃ vākyamarthavaddhetubhūṣitam
तब हे राजन्, कमल से उत्पन्न, देवों के देव पितामह ने मधुर, अर्थपूर्ण और युक्तियों से सजे हुए वचन कहे।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 5 (13.9.5)
बीजतो ह्यङ्कुरोत्पत्तिरङ्कुरात्पर्णसम्भवः । पर्णान्नालाः प्रसूयन्ते नालात्स्कन्धः प्रवर्तते ॥
bījato hyaṅkurotpattiraṅkurātparṇasambhavaḥ | parṇānnālāḥ prasūyante nālātskandhaḥ pravartate
ब्रह्मा ने कहा — बीज से अंकुर उत्पन्न होता है, अंकुर से पत्ता निकलता है; पत्तों से नाल निकलते हैं और नाल से तना आगे बढ़ता है।
श्लोक 6 (13.9.6)
स्कन्धात्प्रवर्तते पुष्पं पुष्पात्संवर्धते फलम् । फलान्निर्वर्तते बीजं बीजात्स्यात्सम्भवः पुनः ॥
skandhātpravartate puṣpaṃ puṣpātsaṃvardhate phalam | phalānnirvartate bījaṃ bījātsyātsambhavaḥ punaḥ
तने से फूल निकलता है, फूल से फल बढ़ता है; फल से बीज बनता है और बीज से फिर नया जन्म होता है।
श्लोक 7 (13.9.7)
नाबीजं जायते किञ्चिन्न बीजेन विना फलम् । बीजाद्बीजं प्रभवति नाबीजं विद्यते फलम् ॥
nābījaṃ jāyate kiñcinna bījena vinā phalam | bījādbījaṃ prabhavati nābījaṃ vidyate phalam
बिना बीज के कुछ भी नहीं जन्मता, और बीज के बिना फल नहीं होता। बीज से ही बीज उत्पन्न होता है; बीज के बिना फल कहीं नहीं मिलता।
श्लोक 8 (13.9.8)
यादृशं वपते बीजं क्षेत्रमासाद्य वापकः । सुकृते दुष्कृते वाऽपि तादृशं लभते फलम् ॥
yādṛśaṃ vapate bījaṃ kṣetramāsādya vāpakaḥ | sukṛte duṣkṛte vā'pi tādṛśaṃ labhate phalam
बोने वाला खेत में पहुँचकर जैसा बीज बोता है, चाहे खेत अच्छी तरह जोता गया हो या बुरी तरह, उसे वैसा ही फल मिलता है।
श्लोक 9 (13.9.9)
यथा बीजं विना क्षेत्रमुप्तं भवति निष्फलम् । तथा पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥
yathā bījaṃ vinā kṣetramuptaṃ bhavati niṣphalam | tathā puruṣakāreṇa vinā daivaṃ na sidhyati
जैसे बिना खेत के बोया हुआ बीज निष्फल होता है, वैसे ही बिना पुरुषार्थ के दैव सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 10 (13.9.10)
क्षेत्रं पुरुषकारस्तु दैवं बीजमुदाहृतम् । क्षेत्रबीजसमायोगात्ततः सस्यं समृद्ध्यते ॥
kṣetraṃ puruṣakārastu daivaṃ bījamudāhṛtam | kṣetrabījasamāyogāttataḥ sasyaṃ samṛddhyate
पुरुषार्थ को खेत और दैव को बीज कहा गया है; खेत और बीज के मेल से ही फसल फलती-फूलती है।
श्लोक 11 (13.9.11)
कर्मणः फलनिर्वृत्तिं स्वयमश्नाति कारकः । प्रत्यक्षं दृश्यते लोके कृतस्याप्यकृतस्य च ॥
karmaṇaḥ phalanirvṛttiṃ svayamaśnāti kārakaḥ | pratyakṣaṃ dṛśyate loke kṛtasyāpyakṛtasya ca
कर्म का फल कर्ता स्वयं भोगता है। संसार में यह प्रत्यक्ष दिखाई देता है, चाहे किसी ने कर्म किया हो या न किया हो।
श्लोक 12 (13.9.12)
शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा । कृतं सर्वत्र लभते नाकृतं भुज्यते क्वचित् ॥
śubhena karmaṇā saukhyaṃ duḥkhaṃ pāpena karmaṇā | kṛtaṃ sarvatra labhate nākṛtaṃ bhujyate kvacit
शुभ कर्म से सुख मिलता है और पाप कर्म से दुःख; जो किया गया है वही सर्वत्र मिलता है, जो नहीं किया गया उसका भोग कहीं नहीं होता।
श्लोक 13 (13.9.13)
कृती सर्वत्र लभते प्रतिष्ठां भाग्यवीक्षितः । अकृती लभते भ्रष्टः क्षते क्षारावसेचनम् ॥
kṛtī sarvatra labhate pratiṣṭhāṃ bhāgyavīkṣitaḥ | akṛtī labhate bhraṣṭaḥ kṣate kṣārāvasecanam
कर्म करने वाला, भाग्य की कृपा से, सर्वत्र प्रतिष्ठा पाता है; जो कुछ नहीं करता वह भ्रष्ट होकर घाव पर नमक छिड़कने जैसा कष्ट पाता है।
श्लोक 14 (13.9.14)
तपसा रूपसौभाग्यं रत्नानि विविधानि च । प्राप्यते कर्मणा सर्वं न दैवादकृतात्मना ॥
tapasā rūpasaubhāgyaṃ ratnāni vividhāni ca | prāpyate karmaṇā sarvaṃ na daivādakṛtātmanā
रूप, सौभाग्य और अनेक प्रकार के रत्न तप और कर्म से ही मिलते हैं; जिसने अपने को साधा नहीं, उसे केवल दैव से कुछ नहीं मिलता।
श्लोक 15 (13.9.15)
तथा स्वर्गश्च भोगश्च निष्ठा या च मनीषिता । सर्वं पुरुषकारेण कृतेनेहोपलभ्यते ॥
tathā svargaśca bhogaśca niṣṭhā yā ca manīṣitā | sarvaṃ puruṣakāreṇa kṛtenehopalabhyate
इसी प्रकार स्वर्ग, भोग और जो भी अभीष्ट लक्ष्य हो, वह सब यहाँ किए हुए पुरुषार्थ से ही प्राप्त होता है।
श्लोक 16 (13.9.16)
ज्योतींषि त्रिदशा नागा यक्षाश्चन्द्रार्कमारुताः । सर्वे पुरुषकारेण मानुष्याद्देवतां गताः ॥
jyotīṃṣi tridaśā nāgā yakṣāścandrārkamārutāḥ | sarve puruṣakāreṇa mānuṣyāddevatāṃ gatāḥ
ज्योतिर्गण, देवता, नाग, यक्ष, चन्द्रमा, सूर्य और वायु: ये सब पुरुषार्थ से ही मनुष्य-योनि से देवत्व को पहुँचे हैं।
श्लोक 17 (13.9.17)
अर्थो वा मित्रवर्गो वा ऐश्वर्यं वा कुलान्वितम् । श्रीश्चापि दुर्लभा भोक्तुं तथैवाकृतकर्मभिः ॥
artho vā mitravargo vā aiśvaryaṃ vā kulānvitam | śrīścāpi durlabhā bhoktuṃ tathaivākṛtakarmabhiḥ
धन, मित्रमण्डली, ऐश्वर्य, उत्तम कुल और लक्ष्मी भी, जिन्होंने कर्म नहीं किए, उनके लिए भोगना कठिन होता है।
श्लोक 18 (13.9.18)
शौचेन लभते विप्रः क्षत्रियो विक्रमेण तु । वैश्यः पुरुषकारेण शूद्रः शुश्रूषया श्रियम् ॥
śaucena labhate vipraḥ kṣatriyo vikrameṇa tu | vaiśyaḥ puruṣakāreṇa śūdraḥ śuśrūṣayā śriyam
ब्राह्मण शुद्धि से, क्षत्रिय पराक्रम से, वैश्य उद्यम से और शूद्र सेवा से लक्ष्मी प्राप्त करता है।
श्लोक 19 (13.9.19)
नादातारं भजन्त्यर्था न क्लीबं नापि निष्क्रियम् । नाकर्मशीलं नाशूरं तथा नैवातपस्विनम् ॥
nādātāraṃ bhajantyarthā na klībaṃ nāpi niṣkriyam | nākarmaśīlaṃ nāśūraṃ tathā naivātapasvinam
धन उसके पास नहीं आता जो दान नहीं देता, न नपुंसक के पास, न निष्क्रिय के, न कर्म से जी चुराने वाले के, न कायर के और न तपस्या न करने वाले के पास।
श्लोक 20 (13.9.20)
येन लोकास्त्रयः सृष्टा दैत्याः सर्वाश्च देवताः । स एष भगवान्विष्णुः समुद्रे तप्यते तपः ॥
yena lokāstrayaḥ sṛṣṭā daityāḥ sarvāśca devatāḥ | sa eṣa bhagavānviṣṇuḥ samudre tapyate tapaḥ
जिसने तीनों लोकों, दैत्यों और सब देवताओं को रचा, वही भगवान् विष्णु समुद्र में तप करते हैं।
श्लोक 21 (13.9.21)
स्वं चेत्कर्मफलं न स्यात्सर्वमेवाफलं भवेत् । लोको दैवं समालक्ष्य उदासीनो भवेद्यदि ॥
svaṃ cetkarmaphalaṃ na syātsarvamevāphalaṃ bhavet | loko daivaṃ samālakṣya udāsīno bhavedyadi
यदि अपने कर्म का फल न होता तो सब कुछ निष्फल हो जाता, यदि संसार केवल दैव की ओर देखकर उदासीन बैठ जाता।
श्लोक 22 (13.9.22)
अकृत्वा मानुषं कर्म यो दैवमनुवर्तते । वृथा श्राम्यति सम्प्राप्य पतिं क्लीबमिवाङ्गना ॥
akṛtvā mānuṣaṃ karma yo daivamanuvartate | vṛthā śrāmyati samprāpya patiṃ klībamivāṅganā
जो मनुष्य-कर्म छोड़कर केवल दैव के पीछे चलता है, वह व्यर्थ ही थकता है, जैसे नपुंसक पति को पाकर कोई स्त्री।
श्लोक 23 (13.9.23)
न तथा मानुषे लोके फलमस्ति शुभाशुभे । यथा त्रिदशलोके हि फलमल्पेन जायते ॥
na tathā mānuṣe loke phalamasti śubhāśubhe | yathā tridaśaloke hi phalamalpena jāyate
मनुष्यलोक में शुभ और अशुभ कर्मों का फल वैसा नहीं होता जैसा देवलोक में, जहाँ थोड़े से भी फल उत्पन्न हो जाता है।
श्लोक 24 (13.9.24)
कृतः पुरुषकारस्तु दैवमेवानुवर्तते । न दैवमकृते किञ्चित्कस्यचिद्दातुमर्हति ॥
kṛtaḥ puruṣakārastu daivamevānuvartate | na daivamakṛte kiñcitkasyaciddātumarhati
पुरुषार्थ एक बार किया जाए तो वह दैव में ही आगे बढ़ता है; जहाँ कुछ किया ही नहीं गया, वहाँ दैव किसी को कुछ नहीं दे सकता।
श्लोक 25 (13.9.25)
यथा स्थानान्यनित्यानि दृश्यन्ते दैवतेष्वपि । कथं कर्म विना दैवं स्थास्यति स्थापयिष्यतः ॥
yathā sthānānyanityāni dṛśyante daivateṣvapi | kathaṃ karma vinā daivaṃ sthāsyati sthāpayiṣyataḥ
देवताओं के भी स्थान जब अनित्य दिखाई देते हैं, तब कर्म के बिना दैव कैसे टिकेगा, या जिसे वह सँभालना चाहे उसे कैसे सँभालेगा?
श्लोक 26 (13.9.26)
न दैवतानि लोकेऽस्मिन्व्यापारं यान्ति कस्यचित् । व्यासङ्गं जनयन्त्युग्रमात्माभिभवशङ्कया ॥
na daivatāni loke'sminvyāpāraṃ yānti kasyacit | vyāsaṅgaṃ janayantyugramātmābhibhavaśaṅkayā
इस लोक में देवता किसी के उद्यम का अनुमोदन नहीं करते; अपने पराभव की आशंका से वे उग्र विघ्न खड़े करते हैं।
श्लोक 27 (13.9.27)
ऋषीणां देवतानां च सदा भवति विग्रहः । कस्य वाचा ह्यदैवं स्याद्यतो दैवं प्रवर्तते ॥
ṛṣīṇāṃ devatānāṃ ca sadā bhavati vigrahaḥ | kasya vācā hyadaivaṃ syādyato daivaṃ pravartate
ऋषियों और देवताओं में सदा विग्रह रहता है। किसके कहने से यह कहा जा सकता है कि दैव नहीं है, जबकि दैव इसी से प्रवृत्त होता है?
श्लोक 28 (13.9.28)
कथं तस्य समुत्पत्तिर्यतो दैवं प्रवर्तते । एवं त्रिदशलोकेऽपि प्राप्यते परमं सुखम् ॥
kathaṃ tasya samutpattiryato daivaṃ pravartate | evaṃ tridaśaloke'pi prāpyate paramaṃ sukham
जिस कर्म से दैव प्रवृत्त होता है, उसकी उत्पत्ति ही कैसे हो सकती है? इसी प्रकार देवलोक में भी परम सुख प्राप्त होता है।
श्लोक 29 (13.9.29)
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः । आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी कृतस्याप्यकृतस्य च ॥
ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ | ātmaiva hyātmanaḥ sākṣī kṛtasyāpyakṛtasya ca
आत्मा ही अपना बन्धु है और आत्मा ही अपना शत्रु; किए और न किए का साक्षी भी आत्मा ही है।
श्लोक 30 (13.9.30)
कृतं च विकृतं किञ्चित्सिद्ध्यते गुरुकर्मणा । सुकृतं दुष्कृतं कर्म अकृतार्थं प्रपद्यते ॥
kṛtaṃ ca vikṛtaṃ kiñcitsiddhyate gurukarmaṇā | sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ karma akṛtārthaṃ prapadyate
जो कुछ किया गया है, अच्छा या बुरा, वह भारी प्रयत्न से ही सिद्ध होता है; अन्यथा शुभ या अशुभ कर्म अपना प्रयोजन पूरा किए बिना ही रह जाता है।
श्लोक 31 (13.9.31)
देवानां शरणं पुण्यं सर्वं पुण्यैरवाप्यते । पुण्यहीनं नरं प्राप्य किं दैवं प्रकरिष्यति ॥
devānāṃ śaraṇaṃ puṇyaṃ sarvaṃ puṇyairavāpyate | puṇyahīnaṃ naraṃ prāpya kiṃ daivaṃ prakariṣyati
पुण्य ही देवताओं का आश्रय है; सब कुछ पुण्यों से ही मिलता है। पुण्यहीन मनुष्य को पाकर दैव क्या कर लेगा?
श्लोक 32 (13.9.32)
पुरा ययातिर्विभ्रष्टश्च्यावितः पतितः क्षितौ । पुनरारोपितः स्वर्गं दौहित्रैः पुण्यकर्मभिः ॥
purā yayātirvibhraṣṭaścyāvitaḥ patitaḥ kṣitau | punarāropitaḥ svargaṃ dauhitraiḥ puṇyakarmabhiḥ
पूर्वकाल में ययाति स्वर्ग से भ्रष्ट होकर गिरा दिए गए और पृथ्वी पर आ पड़े; पुण्यकर्म करने वाले दौहित्रों ने उन्हें फिर स्वर्ग पहुँचाया।
श्लोक 33 (13.9.33)
पुरूरवाश्च राजर्षिर्द्विजैरभिहितः पुरा । ऐल इत्यभिविख्यातः स्वर्गं प्राप्तो महीपतिः ॥
purūravāśca rājarṣirdvijairabhihitaḥ purā | aila ityabhivikhyātaḥ svargaṃ prāpto mahīpatiḥ
राजर्षि पुरूरवा, जिन्हें प्राचीन काल में ब्राह्मणों ने 'ऐल' नाम से प्रसिद्ध बताया, पृथ्वीपति होकर स्वर्ग को प्राप्त हुए।
श्लोक 34 (13.9.34)
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैः सत्कृतः कोसलाधिपः । महर्षिशापात्सौदासः पुरुषादत्वमागतः ॥
aśvamedhādibhiryajñaiḥ satkṛtaḥ kosalādhipaḥ | maharṣiśāpātsaudāsaḥ puruṣādatvamāgataḥ
अश्वमेध आदि यज्ञों से सम्मानित कोसलनरेश सौदास महर्षि के शाप से नरभक्षी हो गए।
श्लोक 35 (13.9.35)
अश्वत्थामा च रामश्च मुनिपुत्रौ धनुर्धरौ । न गच्छतः स्वर्गलोकं वेददृष्टेन कर्मणा ॥
aśvatthāmā ca rāmaśca muniputrau dhanurdharau | na gacchataḥ svargalokaṃ vedadṛṣṭena karmaṇā
मुनिपुत्र और धनुर्धर अश्वत्थामा और राम, वेदविहित कर्म से स्वर्गलोक को नहीं जाते।
श्लोक 36 (13.9.36)
वसुर्यज्ञशतैरिष्ट्वा द्वितीय इव वासवः । मिथ्याभिधानेनैकेन रसातलतलं गतः ॥
vasuryajñaśatairiṣṭvā dvitīya iva vāsavaḥ | mithyābhidhānenaikena rasātalatalaṃ gataḥ
सौ यज्ञ करके दूसरे इन्द्र के समान हुए वसु, एक ही मिथ्या वचन के कारण रसातल की गहराई में जा पड़े।
श्लोक 37 (13.9.37)
बलिर्वैरोचनिर्बद्धो धर्मपाशेन दैवतैः । विष्णोः पुरुषकारेण पातालसदनः कृतः ॥
balirvairocanirbaddho dharmapāśena daivataiḥ | viṣṇoḥ puruṣakāreṇa pātālasadanaḥ kṛtaḥ
विरोचन के पुत्र बलि को देवताओं ने धर्म के पाश में बाँध दिया, और विष्णु के पुरुषार्थ से वे पाताल के निवासी बना दिए गए।
श्लोक 38 (13.9.38)
शक्रस्याथ रथोपस्थे विष्ठितो जनमेजयः । द्विजस्त्रीणां वधं कृत्वा किं दैवेन न वारितः ॥
śakrasyātha rathopasthe viṣṭhito janamejayaḥ | dvijastrīṇāṃ vadhaṃ kṛtvā kiṃ daivena na vāritaḥ
इन्द्र के रथ के आसन पर खड़े जनमेजय ने ब्राह्मण-स्त्रियों का वध कर दिया; दैव ने उन्हें क्यों नहीं रोका?
श्लोक 39 (13.9.39)
अज्ञानाद्ब्राह्मणं हत्वा स्पृष्टो बालवधेन च । वैशंपायनविप्रर्षिः किं दैवेन न वारितः ॥
ajñānādbrāhmaṇaṃ hatvā spṛṣṭo bālavadhena ca | vaiśaṃpāyanaviprarṣiḥ kiṃ daivena na vāritaḥ
विप्रर्षि वैशम्पायन ने अनजाने में एक ब्राह्मण को मार डाला और बालहत्या के दोष से भी स्पृष्ट हुए; दैव ने उन्हें क्यों नहीं रोका?
श्लोक 40 (13.9.40)
गोप्रदानेन मिथ्या च ब्राह्मणेभ्यो महामखे । पुरा नृगश्च राजर्षिः कृकलासत्वमागतः ॥
gopradānena mithyā ca brāhmaṇebhyo mahāmakhe | purā nṛgaśca rājarṣiḥ kṛkalāsatvamāgataḥ
पूर्वकाल में राजर्षि नृग, एक महायज्ञ में ब्राह्मणों को गायों का झूठा दान देने के कारण, गिरगिट बन गए।
श्लोक 41 (13.9.41)
धुन्धुमारश्च राजर्षिः सत्रेष्वेव जरां गतः । प्रीतिदायं परित्यज्य सुष्वाप स गिरिव्रजे ॥
dhundhumāraśca rājarṣiḥ satreṣveva jarāṃ gataḥ | prītidāyaṃ parityajya suṣvāpa sa girivraje
राजर्षि धुन्धुमार यज्ञों में ही बूढ़े हो गए; प्रीति देने वाला दान छोड़कर वे गिरिव्रज में सो गए।
श्लोक 42 (13.9.42)
पाण्डवानां हृतं राज्यं धार्तराष्ट्रैर्महाबलैः । पुनः प्रत्याहृतं चैव न दैवाद्भुजसंश्रयात् ॥
pāṇḍavānāṃ hṛtaṃ rājyaṃ dhārtarāṣṭrairmahābalaiḥ | punaḥ pratyāhṛtaṃ caiva na daivādbhujasaṃśrayāt
पाण्डवों का राज्य महाबली धृतराष्ट्र-पुत्रों ने छीन लिया था, और वह भुजाओं के बल से ही वापस लिया गया, दैव से नहीं।
श्लोक 43 (13.9.43)
तपोनियमसंयुक्ता मुनयः संशितव्रताः । किं ते दैवबलाच्छापमुत्सृजन्ते न कर्मणा ॥
taponiyamasaṃyuktā munayaḥ saṃśitavratāḥ | kiṃ te daivabalācchāpamutsṛjante na karmaṇā
तप और नियम से युक्त, कठोर व्रत वाले मुनि क्या दैव के बल से शाप देते हैं, कर्म से नहीं?
श्लोक 44 (13.9.44)
पापमुत्सृजते लोके सर्वं प्राप्य सुदुर्लभम् । लोभमोहसमापन्नं न दैवं त्रायते नरम् ॥
pāpamutsṛjate loke sarvaṃ prāpya sudurlabham | lobhamohasamāpannaṃ na daivaṃ trāyate naram
जिसने संसार में अत्यन्त दुर्लभ सब कुछ पा लिया हो, फिर भी जो पाप करता है और लोभ तथा मोह में पड़ा है, उस मनुष्य को दैव नहीं बचाता।
श्लोक 45 (13.9.45)
यथाऽऽग्निः पवनोद्भूतः सुसूक्ष्मोऽपि महान्भवेत् । तथा कर्मसमायुक्तं दैवं साधु विवर्धते ॥
yathā''gniḥ pavanodbhūtaḥ susūkṣmo'pi mahānbhavet | tathā karmasamāyuktaṃ daivaṃ sādhu vivardhate
जैसे वायु से भड़की आग अत्यन्त छोटी होकर भी बड़ी हो जाती है, वैसे ही कर्म से जुड़ा हुआ दैव भली-भाँति बढ़ता है।
श्लोक 46 (13.9.46)
यथा तैलक्षयाद्दीपः प्रम्लानिमुपगच्छति । तथा कर्मक्षयाद्दैवं प्रम्लानिमुपगच्छति ॥
yathā tailakṣayāddīpaḥ pramlānimupagacchati | tathā karmakṣayāddaivaṃ pramlānimupagacchati
जैसे तेल घट जाने पर दीपक मन्द पड़ जाता है, वैसे ही कर्म घट जाने पर दैव मन्द पड़ जाता है।
श्लोक 47 (13.9.47)
विपुलमपि धनौघं प्राप्य भोगान्स्त्रियो वा । पुरुष इह न शक्तः कर्महीनो हि भोक्तुम् । सुविहितमपि चार्थं दैवतै रक्ष्यमाणं । पुरुष इह महात्मा प्राप्नुते नित्ययुक्तः ॥
vipulamapi dhanaughaṃ prāpya bhogānstriyo vā | puruṣa iha na śaktaḥ karmahīno hi bhoktum | suvihitamapi cārthaṃ daivatai rakṣyamāṇaṃ | puruṣa iha mahātmā prāpnute nityayuktaḥ
धन की विपुल धारा, भोग या स्त्रियाँ पा लेने पर भी कर्महीन मनुष्य यहाँ उनका भोग करने में समर्थ नहीं होता; पर सदा उद्यम में लगा महात्मा पुरुष देवताओं से रक्षित, भली-भाँति सँजोए हुए धन को भी पा लेता है।
श्लोक 48 (13.9.48)
व्ययगुणमपि साधुं कर्मणा संश्रयन्ते । भवति मनुजलोकाद्दैवलोको विशिष्टः । बहुतरसुसमृद्ध्या मानुषाणां गृहाणि । पितृवनभवनाभं दृश्यते चामराणाम् ॥
vyayaguṇamapi sādhuṃ karmaṇā saṃśrayante | bhavati manujalokāddaivaloko viśiṣṭaḥ | bahutarasusamṛddhyā mānuṣāṇāṃ gṛhāṇi | pitṛvanabhavanābhaṃ dṛśyate cāmarāṇām
जिसका पुण्य खर्च हो रहा हो, ऐसा सज्जन भी कर्म का ही आश्रय लेता है। मनुष्यलोक से देवलोक श्रेष्ठ है: मनुष्यों के घर बहुत समृद्ध होने पर भी अमर देवताओं के भवनों के सामने श्मशान जैसे दिखाई देते हैं।
श्लोक 49 (13.9.49)
न च फलति विकर्मा जीवलोके न दैवं । व्यपनयति विमार्गं नास्ति दैवे प्रभुत्वम् । गुरुमिव कृतमग्र्यं कर्म संयाति दैवं । नयति पुरुषकारः सञ्चितस्तत्रतत्र ॥
na ca phalati vikarmā jīvaloke na daivaṃ | vyapanayati vimārgaṃ nāsti daive prabhutvam | gurumiva kṛtamagryaṃ karma saṃyāti daivaṃ | nayati puruṣakāraḥ sañcitastatratatra
जीवलोक में कर्महीन पुरुष फलता नहीं, और दैव भी नहीं फलता; कुमार्ग से हटाने की सामर्थ्य दैव में नहीं है। किया हुआ उत्तम कर्म गुरु की तरह दैव के पास जाता है, और संचित पुरुषार्थ मनुष्य को यहाँ-वहाँ ले जाता है।
श्लोक 50 (13.9.50)
एतत्ते सर्वमाख्यातं मया वै मुनिसत्तम । फलं पुरुषकारस्य सदा संदृश्य तत्त्वतः ॥
etatte sarvamākhyātaṃ mayā vai munisattama | phalaṃ puruṣakārasya sadā saṃdṛśya tattvataḥ
हे मुनिश्रेष्ठ, पुरुषार्थ का फल सदा यथार्थ रूप में देखकर मैंने यह सब आपसे कह दिया।
श्लोक 51 (13.9.51)
अभ्युत्थानेन दैवस्य समारब्धेन केनचित् । विधिना कर्मणा चैव स्वर्गमार्गमवाप्नुयात् ॥
abhyutthānena daivasya samārabdhena kenacit | vidhinā karmaṇā caiva svargamārgamavāpnuyāt
दैव की सहायता के लिए किसी के भी द्वारा आरम्भ किए गए उद्यम से, विधि और कर्म के साथ, मनुष्य स्वर्ग का मार्ग पा सकता है।