अनुशासन पर्व · अध्याय 20
कश्यप के वरदान कद्रू और विनता को
भीष्म गरुड़ की कथा आरम्भ करते हैं, जैसी उन्होंने कैलास पर परशुराम से सुनी थी। कश्यप अपनी पत्नियों कद्रू और विनता को वर देते हैं: कद्रू समान तेजवाले एक हजार पुत्र चुनती है और विनता ऐसे दो पुत्र जो उन सबसे अधिक बलवान हों। कद्रू एक हजार अण्डे देती है और विनता दो। पाँच सौ वर्ष बाद कद्रू के पुत्र निकलते हैं तो अधीर विनता एक अण्डा तोड़ देती है और उसमें से बिना निचले अंगों का पुत्र निकलता है। क्रुद्ध अरुण माता को अपनी सौत की दासी होने का शाप देता है और कहता है कि उसका छोटा भाई उसे मुक्त करेगा।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.20.1)
युधिष्ठिर महाबाहो शृणु राजन्यथातथम् । गरुडं पक्षिणां श्रेष्ठं वैनतेयं महाबलम् ॥
yudhiṣṭhira mahābāho śṛṇu rājanyathātatham | garuḍaṃ pakṣiṇāṃ śreṣṭhaṃ vainateyaṃ mahābalam
हे महाबाहु युधिष्ठिर, हे राजन्, पक्षियों में श्रेष्ठ, महाबली विनतापुत्र गरुड़ की कथा जैसी थी वैसी सुनो।
श्लोक 2 (13.20.2)
तथा च गरुडो राजन्सुपर्णश्च यथाऽभवत् । यथा च भुजगान्हन्ति तथा मे ब्रुवतः शृणु ॥
tathā ca garuḍo rājansuparṇaśca yathā'bhavat | yathā ca bhujagānhanti tathā me bruvataḥ śṛṇu
हे राजन्, गरुड़ और सुपर्ण कैसे हुए और वे सर्पों को कैसे मारते हैं, यह मैं बताता हूँ, सुनो।
श्लोक 3 (13.20.3)
पुराऽहं तात रामेण जामदग्न्येन धीमता । कैलासशिखरे रम्ये मृगान्निघ्नन्सहस्रशः ॥
purā'haṃ tāta rāmeṇa jāmadagnyena dhīmatā | kailāsaśikhare ramye mṛgānnighnansahasraśaḥ
हे तात, बहुत पहले मैं रम्य कैलास शिखर पर हजारों मृगों को मारते हुए बुद्धिमान जमदग्निपुत्र राम से मिला।
श्लोक 4 (13.20.4)
तमहं तात दृष्ट्वैव शस्त्राण्युत्सृज्य सर्वशः । अभिवाद्य पूर्वं रामाय विनयेनोपतस्थिवान् ॥
tamahaṃ tāta dṛṣṭvaiva śastrāṇyutsṛjya sarvaśaḥ | abhivādya pūrvaṃ rāmāya vinayenopatasthivān
हे तात, उन्हें देखते ही मैंने सब शस्त्र रख दिए, पहले राम को प्रणाम किया और विनय के साथ उनके पास खड़ा हुआ।
श्लोक 5 (13.20.5)
तमहं कथान्ते वरदं सुपर्णस्य बलौजसी । अपृच्छं स च मां प्रीतः प्रत्युवाच युधिष्ठिर ॥
tamahaṃ kathānte varadaṃ suparṇasya balaujasī | apṛcchaṃ sa ca māṃ prītaḥ pratyuvāca yudhiṣṭhira
बातचीत के अन्त में मैंने उन वरदाता से सुपर्ण के बल और ओज के विषय में पूछा, और उन्होंने प्रसन्न होकर मुझे उत्तर दिया, हे युधिष्ठिर।
श्लोक 6 (13.20.6)
कद्रूश्च विनता चास्तां प्रजापतिसुते उभे । ते तु धर्मेणोपयेमे मारीचः कश्यपः प्रभुः ॥
kadrūśca vinatā cāstāṃ prajāpatisute ubhe | te tu dharmeṇopayeme mārīcaḥ kaśyapaḥ prabhuḥ
कद्रू और विनता, दोनों प्रजापति की पुत्रियाँ थीं। मरीचि के पुत्र प्रभु कश्यप ने धर्मपूर्वक उन दोनों से विवाह किया।
श्लोक 7 (13.20.7)
प्रादात्ताभ्यां वरं प्रीतो भार्याभ्यां सुमहातपाः ॥
prādāttābhyāṃ varaṃ prīto bhāryābhyāṃ sumahātapāḥ
उन महातपस्वी ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों को वर दिया।
श्लोक 8 (13.20.8)
तत्र कद्रूर्वरं वव्रे पुत्राणां दशतः शतम् । तुल्यतेजःप्रभावानां सर्वेषां तुल्यजन्मनाम् ॥
tatra kadrūrvaraṃ vavre putrāṇāṃ daśataḥ śatam | tulyatejaḥprabhāvānāṃ sarveṣāṃ tulyajanmanām
उनमें कद्रू ने वर में एक हजार पुत्र माँगे, दस गुने सौ, जो तेज और प्रभाव में सब समान और जन्म में भी समान हों।
श्लोक 9 (13.20.9)
विनता तु वव्रे द्वौ पुत्रौ वीरौ भरतसत्तम । कद्रूपुत्रसहस्रेण तुल्यवेगपराक्रमौ ॥
vinatā tu vavre dvau putrau vīrau bharatasattama | kadrūputrasahasreṇa tulyavegaparākramau
हे भरतश्रेष्ठ, विनता ने दो वीर पुत्र माँगे, जो वेग और पराक्रम में कद्रू के हजार पुत्रों के बराबर हों।
श्लोक 10 (13.20.10)
स तु ताभ्यां वरं प्रादात्तथेत्युक्त्वा महातपाः । जनयामास तान्पुत्रांस्ताभ्यामासीद्यथा पुरा ॥
sa tu tābhyāṃ varaṃ prādāttathetyuktvā mahātapāḥ | janayāmāsa tānputrāṃstābhyāmāsīdyathā purā
उन महातपस्वी ने 'ऐसा ही हो' कहकर उन दोनों को वर दिया, और जैसा पहले कहा गया था वैसे ही उन दोनों से वे पुत्र उत्पन्न किए।
श्लोक 11 (13.20.11)
कद्रूः प्रजज्ञे ह्यण्डानां तथैव दशतःशतम् । अण्डे द्वे विनता चैव दर्शनीयतरे शुभे ॥
kadrūḥ prajajñe hyaṇḍānāṃ tathaiva daśataḥśatam | aṇḍe dve vinatā caiva darśanīyatare śubhe
कद्रू ने एक हजार, दस गुने सौ, अण्डे दिए और विनता ने दो अण्डे, जो अधिक सुन्दर और शुभ थे।
श्लोक 12 (13.20.12)
तानि त्वण्डानि तु तयोः कद्रूविनतयोर्द्वयोः । सोपस्वेदेषु पात्रेषु निदधुः परिचारिणः ॥
tāni tvaṇḍāni tu tayoḥ kadrūvinatayordvayoḥ | sopasvedeṣu pātreṣu nidadhuḥ paricāriṇaḥ
कद्रू और विनता, दोनों के उन अण्डों को सेवकों ने भाप से गरम पात्रों में रख दिया।
श्लोक 13 (13.20.13)
निस्सरन्ति तदाऽण्डेभ्यः कद्रूपुत्रा भुजङ्गमाः । पञ्चवर्षशते काले दृष्ट्वाऽमोघबलौजसः ॥
nissaranti tadā'ṇḍebhyaḥ kadrūputrā bhujaṅgamāḥ | pañcavarṣaśate kāle dṛṣṭvā'moghabalaujasaḥ
तब पाँच सौ वर्ष पूरे होने पर कद्रू के पुत्र सर्प अण्डों से निकले, जिन्हें अमोघ बल और ओजवाला देखा गया।
श्लोक 14 (13.20.14)
विनता तेषु जातेषु पन्नगेषु महात्मसु । विपुत्रा पुत्रसंतापादण्डमेकं बिभेद ह ॥
vinatā teṣu jāteṣu pannageṣu mahātmasu | viputrā putrasaṃtāpādaṇḍamekaṃ bibheda ha
उन महात्मा सर्पों के उत्पन्न हो जाने पर पुत्रहीन विनता ने पुत्रों के शोक की पीड़ा से एक अण्डा तोड़ दिया।
श्लोक 15 (13.20.15)
किमनेन करिष्येऽहमिति वाक्यमभाषत । नहि पञ्चशते काले पुरा पुत्रौ ददर्श सा ॥
kimanena kariṣye'hamiti vākyamabhāṣata | nahi pañcaśate kāle purā putrau dadarśa sā
'इसका मैं क्या करूँगी?' उसने ऐसा कहा। क्योंकि पाँच सौ वर्ष की अवधि आ जाने पर भी उसने अब तक अपने दोनों पुत्रों को नहीं देखा था।
श्लोक 16 (13.20.16)
सापश्यदण्डान्निष्क्रान्तं विनापत्रं मनस्विनम् । पूर्वकायोपसम्पन्नं वियुक्तमितरेण ह ॥
sāpaśyadaṇḍānniṣkrāntaṃ vināpatraṃ manasvinam | pūrvakāyopasampannaṃ viyuktamitareṇa ha
उसने अण्डे से निकलता हुआ एक तेजस्वी प्राणी देखा, जिसके पंख नहीं थे; उसका आगे का शरीर पूरा था और दूसरा भाग उससे अलग-सा था।
श्लोक 17 (13.20.17)
दृष्ट्वा तु तं तथारूपमसमग्रशरीरिणम् । पुत्रदुःखान्विताऽशोचत्स च पक्षी तथा गतः ॥
dṛṣṭvā tu taṃ tathārūpamasamagraśarīriṇam | putraduḥkhānvitā'śocatsa ca pakṣī tathā gataḥ
उसे ऐसे रूप में, अधूरे शरीरवाला देखकर वह पुत्र के दुःख से भर गई और शोक करने लगी; वह पक्षी भी वैसी ही दशा में था।
श्लोक 18 (13.20.18)
अब्रवीच्च मुदा युक्तः पर्यश्रुनयनस्तदा । मातरं चपलासीति हतोऽहमिति चासकृत् ॥
abravīcca mudā yuktaḥ paryaśrunayanastadā | mātaraṃ capalāsīti hato'hamiti cāsakṛt
तब आनन्द से भरा, फिर भी आँखों में आँसू लिए, उसने माता से बार-बार कहा, 'तुम चंचल हो! मैं नष्ट हो गया!'
अरुण उवाच
श्लोक 19 (13.20.19)
न त्वया काङ्क्षितः कालो यावानेवात्यगात्पुरा । आवां भवाव पुत्रौ ते श्वसनाद्बलवत्तरौ ॥
na tvayā kāṅkṣitaḥ kālo yāvānevātyagātpurā | āvāṃ bhavāva putrau te śvasanādbalavattarau
तुमने उस समय की प्रतीक्षा नहीं की, जबकि इतना समय पहले ही बीत चुका था; हम दोनों तुम्हारे पुत्र होते, वायु से भी अधिक बलवान।
श्लोक 20 (13.20.20)
ईर्ष्याक्रोधाभिभूतत्वाद्योऽहमेवं कृतस्त्वया । तस्मात्त्वमपि मे मातर्दासीभावं गमिष्यसि ॥
īrṣyākrodhābhibhūtatvādyo'hamevaṃ kṛtastvayā | tasmāttvamapi me mātardāsībhāvaṃ gamiṣyasi
ईर्ष्या और क्रोध से अभिभूत होने के कारण तुमने मुझे ऐसा बना दिया; इसलिए माता, तुम भी दासी बनोगी।
भीष्म उवाच
श्लोक 21 (13.20.21)
पञ्चवर्षशतानि त्वं स्पर्धसे वै यया सह । दासी तस्या भवित्रीति साश्रुपातमुवाच ह ॥
pañcavarṣaśatāni tvaṃ spardhase vai yayā saha | dāsī tasyā bhavitrīti sāśrupātamuvāca ha
'पाँच सौ वर्षों से तुम जिसके साथ होड़ करती रही हो, उसी की तुम दासी बनोगी,' उसने आँसू बहाते हुए कहा।
अरुण उवाच
श्लोक 22 (13.20.22)
एष चैव महाभागे बली बलवतांवरः । मोक्षयिष्यति ते मातर्दासीभावान्ममानुजः ॥
eṣa caiva mahābhāge balī balavatāṃvaraḥ | mokṣayiṣyati te mātardāsībhāvānmamānujaḥ
और हे महाभागे, मेरा यह छोटा भाई, जो बलवानों में श्रेष्ठ और बली है, माता, तुम्हें दासीपन से मुक्त करेगा।