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अनुशासन पर्व · अध्याय 21

गरुड़ का जन्म और कद्रू-विनता की शर्त

पुत्र के शोक से व्याकुल और शाप से भयभीत विनता उस समय की प्रतीक्षा करती है जो उसके पुत्र ने बताया था। पाँच सौ वर्ष और बीतने पर सर्पभक्षी बलवान गरुड़ का जन्म होता है, और उसका बड़ा भाई अरुण प्रभात की लालिमा के रूप में आकाश में दिखाई देता है। गरुड़ तुरन्त माता को छोड़कर चला जाता है और बढ़ने लगता है। इसी बीच कद्रू और विनता समुद्र के पास उच्चैःश्रवा घोड़े को देखती हैं; कद्रू उसे एकवर्ण नहीं मानती, विनता उसे पूरा श्वेत बताती है, और दोनों शर्त लगाती हैं कि जो हारेगी वह दूसरी की दासी होगी।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.21.1)

विनता पुत्रशोकार्ता शापाद्भीता च भारत । प्रतीक्षते स्म तं कालं यः पुत्रोक्तस्तदाऽभवत् ॥

vinatā putraśokārtā śāpādbhītā ca bhārata | pratīkṣate sma taṃ kālaṃ yaḥ putroktastadā'bhavat

हे भारत, पुत्र के शोक से पीड़ित और शाप से भयभीत विनता उस समय की प्रतीक्षा करने लगी जिसे उसके पुत्र ने तब बताया था।

श्लोक 2 (13.21.2)

ततोऽप्यतीते पञ्चशते वर्षाणां कालसंयुगे । गरुडोऽथ महावीर्यो जज्ञे भुजगभुग्बली ॥

tato'pyatīte pañcaśate varṣāṇāṃ kālasaṃyuge | garuḍo'tha mahāvīryo jajñe bhujagabhugbalī

तब काल के संधिकाल में और पाँच सौ वर्ष बीत जाने पर महाबली, सर्पभक्षी और बलवान गरुड़ उत्पन्न हुए।

श्लोक 3 (13.21.3)

बन्धुरास्यः शिखी पत्रकोशः कूर्मनखो महान् । रक्ताक्षः संहतग्रीवो ह्रस्वपादो महाशिराः ॥

bandhurāsyaḥ śikhī patrakośaḥ kūrmanakho mahān | raktākṣaḥ saṃhatagrīvo hrasvapādo mahāśirāḥ

उनका मुख मुड़ा हुआ था, शिखा थी, पंखों का आवरण था, कछुए जैसे नाखून थे और विशाल शरीर था; आँखें लाल थीं, गर्दन भरी हुई, पैर छोटे और सिर बड़ा था।

श्लोक 4 (13.21.4)

यस्त्वण्डात्स विनिर्भिन्नो निष्क्रान्तो भरतर्षभ । विनतापूर्वजः पुत्रः सोऽरुणो दृश्यते दिवि ॥

yastvaṇḍātsa vinirbhinno niṣkrānto bharatarṣabha | vinatāpūrvajaḥ putraḥ so'ruṇo dṛśyate divi

हे भरतश्रेष्ठ, जो अण्डे को फोड़कर बाहर निकला था, विनता का वह बड़ा पुत्र अरुण आकाश में दिखाई देता है।

श्लोक 5 (13.21.5)

पूर्वां दिशामभिप्रेत्य सूर्यस्योदयनं प्रति । अरुणोऽरुणसंकाशो नाम्ना चैवारुणः स्मृतः ॥

pūrvāṃ diśāmabhipretya sūryasyodayanaṃ prati | aruṇo'ruṇasaṃkāśo nāmnā caivāruṇaḥ smṛtaḥ

प्रभात की लालिमा के समान लाल वह अरुण नाम से स्मरण किया जाता है; वह पूर्व दिशा की ओर, सूर्य के उदय की ओर मुख किए रहता है।

श्लोक 6 (13.21.6)

जातमात्रस्तु विहगो गरुडः पन्नगाशनः । विहाय मातरं क्षिप्रमगमत्सर्वतो दिशः ॥

jātamātrastu vihago garuḍaḥ pannagāśanaḥ | vihāya mātaraṃ kṣipramagamatsarvato diśaḥ

जन्म लेते ही पक्षी गरुड़, सर्पों के भक्षक, माता को छोड़कर शीघ्र ही चारों दिशाओं में चले गए।

श्लोक 7 (13.21.7)

स तदा ववृधेऽतीव सर्वकामैरथार्चितः । पितामहविसृष्टेन भोजनेन विशांपते ॥

sa tadā vavṛdhe'tīva sarvakāmairathārcitaḥ | pitāmahavisṛṣṭena bhojanena viśāṃpate

तब वे सब कामनाओं की पूर्ति से सम्मानित होकर, पितामह के दिए हुए भोजन से, बहुत बढ़े, हे प्रजापालक।

श्लोक 8 (13.21.8)

तस्मिंश्च विहगे तत्र यथाकामं विवर्धति । कद्रूश्च विनता चैवागच्छतां सागरं प्रति ॥

tasmiṃśca vihage tatra yathākāmaṃ vivardhati | kadrūśca vinatā caivāgacchatāṃ sāgaraṃ prati

जब वह पक्षी वहाँ इच्छानुसार बढ़ रहा था, तब कद्रू और विनता समुद्र के पास गईं।

श्लोक 9 (13.21.9)

ददृशाते तु ते यान्तमुच्चैश्श्रवसमन्तिकात् । स्नात्वोपवृत्तं त्वरितं पीतवन्तं च वाजिनम् ॥

dadṛśāte tu te yāntamuccaiśśravasamantikāt | snātvopavṛttaṃ tvaritaṃ pītavantaṃ ca vājinam

उन दोनों ने उच्चैःश्रवा घोड़े को पास से आते देखा, जो स्नान करके लौट रहा था और शीघ्रता से पानी पी चुका था।

श्लोक 10 (13.21.10)

ततः कद्रूर्हसन्त्येव विनतामिदमब्रवीत् । हयस्य वर्णः को न्वत्र ब्रूहि यस्ते मतः शुभे ॥

tataḥ kadrūrhasantyeva vinatāmidamabravīt | hayasya varṇaḥ ko nvatra brūhi yaste mataḥ śubhe

तब कद्रू ने हँसते हुए विनता से कहा: 'इस घोड़े का रंग तुम क्या मानती हो? हे शुभे, बताओ।'

विनतोवाच

श्लोक 11 (13.21.11)

एकवर्णो हयो राज्ञि सर्वश्वेतो मतो मम । वर्णं वा कीदृशं तस्य मन्यसे त्वं मनस्विनि ॥

ekavarṇo hayo rājñi sarvaśveto mato mama | varṇaṃ vā kīdṛśaṃ tasya manyase tvaṃ manasvini

'हे रानी, घोड़ा एक ही रंग का है, पूरा श्वेत, ऐसा मेरा मत है। और हे मनस्विनी, तुम उसका रंग कैसा मानती हो?'

कद्रूरुवाच

श्लोक 12 (13.21.12)

सर्वश्वेतो मतस्तुभ्यं य एष हयसत्तमः । ब्रूहि कल्याणि दीव्यावो वर्णान्यत्वेन भामिनि ॥

sarvaśveto matastubhyaṃ ya eṣa hayasattamaḥ | brūhi kalyāṇi dīvyāvo varṇānyatvena bhāmini

'तुम इस श्रेष्ठ घोड़े को पूरा श्वेत मानती हो। हे कल्याणी, कहो, हे भामिनी, इसके रंग के कुछ और होने पर हम दोनों शर्त लगाएँ।'

विनतोवाच

श्लोक 13 (13.21.13)

यद्यार्ये दीव्यसि त्वं मे कः पणो नो भविष्यति । सा तज्ज्ञात्वा पणेयं वै ज्ञात्वा तु विपणे त्वया ॥

yadyārye dīvyasi tvaṃ me kaḥ paṇo no bhaviṣyati | sā tajjñātvā paṇeyaṃ vai jñātvā tu vipaṇe tvayā

'हे आर्ये, यदि तुम मेरे साथ खेलती हो तो हमारी शर्त क्या होगी? उसे जानकर मैं दाँव लगाऊँगी, और जानकर तुम्हारे विरुद्ध शर्त बदूँगी।'

कद्रूरुवाच

श्लोक 14 (13.21.14)

जिता दासी भवेर्मे त्वमहं चाप्यसितेक्षणे । नैकवर्णैकवर्णत्वे विनते रोचते च ते ॥

jitā dāsī bhaverme tvamahaṃ cāpyasitekṣaṇe | naikavarṇaikavarṇatve vinate rocate ca te

'जो हारेगी वह दूसरी की दासी होगी: तुम मेरी, या मैं तुम्हारी, हे कजरारी आँखोंवाली। घोड़ा एकवर्ण हो या एकवर्ण न हो, हे विनता, क्या यह तुम्हें स्वीकार है?'

विनतोवाच

श्लोक 15 (13.21.15)

रोचते मे पणे राज्ञि दासीत्वेन न संशयः । सत्यमातिष्ठ भद्रं ते सत्ये स्थास्यामि चाप्यहम् ॥

rocate me paṇe rājñi dāsītvena na saṃśayaḥ | satyamātiṣṭha bhadraṃ te satye sthāsyāmi cāpyaham

'हे रानी, दासीपन की शर्त मुझे स्वीकार है, इसमें संदेह नहीं। सत्य पर टिकी रहो, तुम्हारा कल्याण हो; मैं भी सत्य पर टिकी रहूँगी।'

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