अनुशासन पर्व · अध्याय 22
कद्रू का सर्पों को उच्चैःश्रवा की पूँछ काली करने का आदेश
भीष्म बताते हैं कि कद्रू ने अपने पुत्रों को विनता के साथ उच्चैःश्रवा घोड़े के रंग पर लगाई गई अपनी शर्त बताई और आदेश दिया कि वे उसकी पूँछ में काले बाल बनकर समा जाएँ, ताकि वह जीत सके। सर्पों ने छल से मिलने वाली जीत में भाग लेने से इनकार किया और माता को छोड़ देने की बात कही। कद्रू ने उनकी युक्तियाँ अस्वीकार कर दीं और उन्हें फिर वही आदेश दिया।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.22.1)
विनता तु तथेत्युक्त्वा कृतसंशयना पणे । कद्रूरपि तथेत्युक्त्वा पुत्रानिदमुवाच ह ॥
vinatā tu tathetyuktvā kṛtasaṃśayanā paṇe | kadrūrapi tathetyuktvā putrānidamuvāca ha
विनता ने मन में शंका रहते हुए भी "ठीक है" कहकर शर्त मान ली; और कद्रू ने भी "ठीक है" कहकर अपने पुत्रों से यह बात कही।
कद्रूरुवाच
श्लोक 2 (13.22.2)
मया कृतः पणः पुत्रा मिथो विनतया सह । उच्चैरश्रवसि गान्धर्वे तच्छृणुध्वं भुजङ्गमाः ॥
mayā kṛtaḥ paṇaḥ putrā mitho vinatayā saha | uccairaśravasi gāndharve tacchṛṇudhvaṃ bhujaṅgamāḥ
"पुत्रो, मैंने विनता के साथ गन्धर्वों के घोड़े उच्चैःश्रवा के विषय में एक शर्त लगाई है। हे सर्पो, उसे सुनो।
श्लोक 3 (13.22.3)
अब्रवं नैकवर्णं तं सैकवर्णमथाब्रवीत् । जिता दासी भवेत्पुत्राः सा वाऽहं वा न संशयः ॥
abravaṃ naikavarṇaṃ taṃ saikavarṇamathābravīt | jitā dāsī bhavetputrāḥ sā vā'haṃ vā na saṃśayaḥ
मैंने कहा कि वह एक रंग का नहीं है, पर उसने कहा कि वह एक रंग का है। जो हारेगी, वह दासी बनेगी, चाहे वह वह हो या मैं; इसमें कोई सन्देह नहीं, पुत्रो।
श्लोक 4 (13.22.4)
एकवर्णश्च वाजी स चन्द्रकोकनदप्रभः । साऽहं दासी भविष्यामि जिता पुत्रा न संशयः ॥
ekavarṇaśca vājī sa candrakokanadaprabhaḥ | sā'haṃ dāsī bhaviṣyāmi jitā putrā na saṃśayaḥ
वह घोड़ा एक ही रंग का है, चन्द्रमा और लाल कमल की-सी आभा वाला। इसलिए पुत्रो, यदि मैं हारी तो निस्सन्देह दासी बनूँगी।
श्लोक 5 (13.22.5)
ते यूयमश्वप्रवरमाविशध्वमतन्द्रिताः । सर्वश्वेतं वालधिषु वाला भूत्वाञ्जनप्रभाः ॥
te yūyamaśvapravaramāviśadhvamatandritāḥ | sarvaśvetaṃ vāladhiṣu vālā bhūtvāñjanaprabhāḥ
इसलिए तुम सब आलस्य छोड़कर उस श्रेष्ठ घोड़े में प्रवेश करो; उस सर्वथा श्वेत घोड़े की पूँछ में अंजन-जैसे काले बाल बन जाओ।"
सर्पा ऊचुः
श्लोक 6 (13.22.6)
निकृत्या न जयः श्रेयान्मातः सत्या गिरः शृणु । आयत्यां च तदात्वे च न च धर्मोऽत्र विद्यते ॥
nikṛtyā na jayaḥ śreyānmātaḥ satyā giraḥ śṛṇu | āyatyāṃ ca tadātve ca na ca dharmo'tra vidyate
"माता, छल से जीतना श्रेयस्कर नहीं है; सच्ची बात सुनो। न भविष्य के लिए और न वर्तमान के लिए इसमें कोई धर्म है।
श्लोक 7 (13.22.7)
सा त्वं धर्मादपेतं वै कुलस्यैवाहितं तव । निकृत्या विजयं मातर्मा स्म कार्षीः कथञ्चन ॥
sā tvaṃ dharmādapetaṃ vai kulasyaivāhitaṃ tava | nikṛtyā vijayaṃ mātarmā sma kārṣīḥ kathañcana
यह मार्ग धर्म से हटा हुआ है और आपके ही कुल के लिए अहितकर है। माता, छल से विजय पाने का प्रयत्न किसी प्रकार न करें।
श्लोक 8 (13.22.8)
यद्यधर्मेण विजयं वयं काङ्क्षामहे क्वचित् । त्वया नाम निवार्याः स्म मा कुरुध्वमिति ध्रुवम् ॥
yadyadharmeṇa vijayaṃ vayaṃ kāṅkṣāmahe kvacit | tvayā nāma nivāryāḥ sma mā kurudhvamiti dhruvam
यदि हम कभी अधर्म से विजय की इच्छा करते, तो आपको ही हमें रोकना चाहिए था कि "ऐसा मत करो" — यह निश्चित है।
श्लोक 9 (13.22.9)
सा त्वमस्मानपि सतो विपापानृजुबुद्धिनः । कल्मषेणाभिसंयोक्तुं काङ्क्षसे लोभमोहिता ॥
sā tvamasmānapi sato vipāpānṛjubuddhinaḥ | kalmaṣeṇābhisaṃyoktuṃ kāṅkṣase lobhamohitā
फिर भी आप लोभ से मोहित होकर हमें, जो सज्जन, निष्पाप और सरल बुद्धि वाले हैं, पाप में जोड़ना चाहती हैं।
श्लोक 10 (13.22.10)
ते वयं त्वां परित्यज्य द्रविष्याम दिशो दश । यत्र वाक्यं न ते मातः पुनः श्रोष्याम ईदृशम् ॥
te vayaṃ tvāṃ parityajya draviṣyāma diśo daśa | yatra vākyaṃ na te mātaḥ punaḥ śroṣyāma īdṛśam
इसलिए हम आपको छोड़कर दसों दिशाओं में भाग जाएँगे, जहाँ, माता, हमें आपसे फिर ऐसी बात सुननी न पड़े।
श्लोक 11 (13.22.11)
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथं प्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥
gurorapyavaliptasya kāryākāryamajānataḥ | utpathaṃ pratipannasya parityāgo vidhīyate
जो बड़ा भी अहंकारी हो, कर्तव्य-अकर्तव्य न जानता हो और कुमार्ग पर चल पड़ा हो, उसका त्याग कर देने का विधान है।"
कद्रूरुवाच
श्लोक 12 (13.22.12)
शृणोमि विविधा वाचो हेतुमत्यः समीरिताः । वक्रमार्गनिवृत्त्यर्थं तदहं वो न रोचये ॥
śṛṇomi vividhā vāco hetumatyaḥ samīritāḥ | vakramārganivṛttyarthaṃ tadahaṃ vo na rocaye
"मैं तुम्हारी अनेक युक्तियुक्त बातें सुन रही हूँ, जो मुझे टेढ़े मार्ग से हटाने के लिए कही गई हैं; पर वे मुझे पसन्द नहीं हैं।
श्लोक 13 (13.22.13)
न च तत्पणितं मन्दाः शक्यं जेतुमतोऽन्यथा । जिते निकृत्या श्रुत्वैतत्क्षेमं कुरुत पुत्रकाः ॥
na ca tatpaṇitaṃ mandāḥ śakyaṃ jetumato'nyathā | jite nikṛtyā śrutvaitatkṣemaṃ kuruta putrakāḥ
मूर्खो, उस शर्त को किसी और प्रकार से जीता नहीं जा सकता। पुत्रो, यह सुनकर, जब जीत छल से ही होनी है, वही करो जिसमें भलाई हो।
श्लोक 14 (13.22.14)
श्वोऽहं प्रभातसमये जिता धर्मेण पुत्रकाः । शैलूषिणी भविष्यामि विनताया न संशयः ॥
śvo'haṃ prabhātasamaye jitā dharmeṇa putrakāḥ | śailūṣiṇī bhaviṣyāmi vinatāyā na saṃśayaḥ
पुत्रो, कल प्रातःकाल यदि मैं धर्मपूर्वक हार गई, तो निस्सन्देह विनता की नर्तकी, उसकी दासी बन जाऊँगी।
श्लोक 15 (13.22.15)
इह चामुत्र चार्थाय पुत्रानिच्छन्ति मातरः । सेयमीहा विपन्ना मे युष्मानासाद्य सङ्गताम् ॥
iha cāmutra cārthāya putrānicchanti mātaraḥ | seyamīhā vipannā me yuṣmānāsādya saṅgatām
माताएँ इस लोक और परलोक में अपने कल्याण के लिए पुत्र चाहती हैं; पर तुम्हारे पास आकर मेरी यह आशा टूट गई है।
श्लोक 16 (13.22.16)
इह वा तारयेत्पुत्रः प्रेत्य वा तारयेत्पितॄन् । नात्र चित्रं भवेत्किञ्चित्पुनातीति च पुत्रकः ॥
iha vā tārayetputraḥ pretya vā tārayetpitṝn | nātra citraṃ bhavetkiñcitpunātīti ca putrakaḥ
पुत्र इस लोक में अथवा मरने के बाद अपने पितरों का उद्धार करता है; इसमें कुछ भी विचित्र नहीं, क्योंकि वह पवित्र करता है, इसीलिए पुत्र कहलाता है।
श्लोक 17 (13.22.17)
ते यूयं तारणार्थाय मम पुत्रा मनोजवाः । आविशध्वं हयश्रेष्ठं वाला भूत्वाऽञ्जनप्रभाः ॥
te yūyaṃ tāraṇārthāya mama putrā manojavāḥ | āviśadhvaṃ hayaśreṣṭhaṃ vālā bhūtvā'ñjanaprabhāḥ
इसलिए मेरे मनोवेग वाले पुत्रो, मेरी रक्षा के लिए तुम उस श्रेष्ठ घोड़े में अंजन-जैसे काले बाल बनकर प्रवेश करो।
श्लोक 18 (13.22.18)
जानाम्यधर्मं सकलं विजिता विनता भवेत् । निकृत्या दासभावस्तु युष्मानप्यवपीडयेत् ॥
jānāmyadharmaṃ sakalaṃ vijitā vinatā bhavet | nikṛtyā dāsabhāvastu yuṣmānapyavapīḍayet
मैं जानती हूँ कि यह सब अधर्म है, क्योंकि इससे विनता हार जाएगी। फिर भी छल से आई दासता तुम्हें भी पीड़ित करेगी।
श्लोक 19 (13.22.19)
निकृत्या विजयो वेति दासत्वं वा पराभवे । उभयं निश्चयं कृत्वा जयो वै धार्मिको वरः ॥
nikṛtyā vijayo veti dāsatvaṃ vā parābhave | ubhayaṃ niścayaṃ kṛtvā jayo vai dhārmiko varaḥ
छल से विजय हो या हार पर दासता — दोनों को तौलकर देखने पर धर्मसम्मत विजय ही श्रेष्ठ है।
श्लोक 20 (13.22.20)
यद्यप्यधर्मो विजयो युष्मानेव स्पृशेत्पुनः । गुरोर्वचनमास्थाय धर्मो वा सम्भविष्यति ॥
yadyapyadharmo vijayo yuṣmāneva spṛśetpunaḥ | gurorvacanamāsthāya dharmo vā sambhaviṣyati
यदि वह विजय अधर्म भी हो, तो उसका दोष तुम्हीं को छुएगा; अथवा माता की आज्ञा मानने से वह धर्म ही हो जाएगा।"