अनुशासन पर्व · अध्याय 23
कद्रू का सर्पों को शाप; विनता की हार
कद्रू की आज्ञा सुनकर कुछ सर्पों ने कठिनाई से सहमति दी और कुछ भाग गए। कद्रू ने भागने वालों को शाप दिया कि अर्जुन की चौथी पीढ़ी में जन्मा राजा जनमेजय अपने सर्पयज्ञ में उन्हें अग्नि से जला देगा। आज्ञाकारी सर्प घोड़े की पूँछ के काले बाल बन गए। दोनों बहनें घोड़े को देखने गईं तो विनता ने उसकी काली पूँछ देखकर अपनी हार मान ली और कद्रू की दासी बनकर सेवा करने को कहा।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (13.23.1)
श्रुत्वा तु वचनं मातुः क्रुद्धायास्ते भुजङ्गमाः । कृच्छ्रेणैवान्वमोदन्त केचिद्धित्वा दिशो गताः ॥
śrutvā tu vacanaṃ mātuḥ kruddhāyāste bhujaṅgamāḥ | kṛcchreṇaivānvamodanta keciddhitvā diśo gatāḥ
क्रोध में भरी माता की बात सुनकर उन सर्पों में से कुछ ने कठिनाई से सहमति दी, और कुछ उसे छोड़कर दिशाओं में चले गए।
श्लोक 2 (13.23.2)
ये प्रतस्थुर्दिशस्तत्र क्रुद्धा तानशपद्भृशम् । भुजङ्गमानां माताऽसौ कद्रूर्वैरकरी तदा ॥
ye pratasthurdiśastatra kruddhā tānaśapadbhṛśam | bhujaṅgamānāṃ mātā'sau kadrūrvairakarī tadā
जो दिशाओं की ओर चल पड़े थे, उन्हें सर्पों की माता, वैर भाव से भरी हुई क्रुद्ध कद्रू ने तब कठोर शाप दिया।
कद्रूरुवाच
श्लोक 3 (13.23.3)
उत्पत्स्यति हि राजन्यः पाण्डवो जनमेजयः । चतुर्थो धन्विनां श्रेष्ठात्कुन्तीपुत्राद्धनञ्जयात् ॥
utpatsyati hi rājanyaḥ pāṇḍavo janamejayaḥ | caturtho dhanvināṃ śreṣṭhātkuntīputrāddhanañjayāt
"पाण्डव कुल में जनमेजय नामक एक राजा उत्पन्न होगा, जो धनुर्धरों में श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र धनंजय से चौथी पीढ़ी में होगा।
श्लोक 4 (13.23.4)
स सर्पसत्रमाहर्ता क्रुद्धः कुरुकुलोद्वहः । तस्मिन्सत्रेऽग्निना युष्मान्पञ्चत्वमुपनेष्यति ॥
sa sarpasatramāhartā kruddhaḥ kurukulodvahaḥ | tasminsatre'gninā yuṣmānpañcatvamupaneṣyati
कुरुकुल का वह वंशज क्रोध में सर्पयज्ञ करेगा, और उस यज्ञ में अग्नि से तुम्हें मृत्यु तक पहुँचाएगा।"
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (13.23.5)
एवं क्रुद्धाऽशपन्माता पन्नगान्धर्मचारिणः । गुरोः परित्यागकृतं नैतदन्यद्भविष्यति ॥
evaṃ kruddhā'śapanmātā pannagāndharmacāriṇaḥ | guroḥ parityāgakṛtaṃ naitadanyadbhaviṣyati
इस प्रकार क्रोधित माता ने धर्म पर चलने वाले सर्पों को शाप दे दिया। बड़े को त्याग देने से जो फल होता है, वह दूसरा नहीं हो सकता।
श्लोक 6 (13.23.6)
एवं शप्ता दिशः प्राप्ताः पन्नगा धर्मचारिणः । विहाय मातरं क्रुद्धा गता वैरकरीं तदा ॥
evaṃ śaptā diśaḥ prāptāḥ pannagā dharmacāriṇaḥ | vihāya mātaraṃ kruddhā gatā vairakarīṃ tadā
इस प्रकार शापित होकर धर्मचारी सर्प अपनी क्रोधित और वैरभाव से भरी माता को छोड़कर दिशाओं में चले गए।
श्लोक 7 (13.23.7)
तत्र ये वृजिनं तस्या अनापन्ना भुजङ्गमाः । ते तस्य वाजिनो वाला बभूवुरसितप्रभाः ॥
tatra ye vṛjinaṃ tasyā anāpannā bhujaṅgamāḥ | te tasya vājino vālā babhūvurasitaprabhāḥ
पर जो सर्प उसके कोप के भागी नहीं हुए थे, वे उस घोड़े की पूँछ के काले रंग वाले बाल बन गए।
श्लोक 8 (13.23.8)
तान्दृष्ट्वा वालधिस्थांश्च पुत्रान्कद्रूरथाब्रवीत् । विनतामथ संहृष्टा हयोऽसौ दृश्यतामिति ॥
tāndṛṣṭvā vāladhisthāṃśca putrānkadrūrathābravīt | vinatāmatha saṃhṛṣṭā hayo'sau dṛśyatāmiti
अपने पुत्रों को घोड़े की पूँछ में स्थित देखकर कद्रू ने तब प्रसन्न होकर विनता से कहा, "उस घोड़े को देखा जाए।
कद्रूरुवाच
श्लोक 9 (13.23.9)
एकवर्णो न वा भद्रे पणो नौ सुव्यवस्थितः । उदकादुत्तरन्तं तं हयं चैव च भामिनि ॥
ekavarṇo na vā bhadre paṇo nau suvyavasthitaḥ | udakāduttarantaṃ taṃ hayaṃ caiva ca bhāmini
वह एक रंग का है या नहीं, हमारी शर्त पक्की तय है, भली स्त्री। जल से बाहर निकलते हुए उस घोड़े को देखें, हे सुन्दरी।"
भीष्म उवाच
श्लोक 10 (13.23.10)
सा त्ववक्रमतिर्देवी विनता जिह्मगामिनीम् । अब्रवीद्भगिनीं किञ्चिद्विहसन्तीव भारत ॥
sā tvavakramatirdevī vinatā jihmagāminīm | abravīdbhaginīṃ kiñcidvihasantīva bhārata
तब सरल बुद्धि वाली देवी विनता ने, हे भारत, कुटिल चाल वाली अपनी बहन से कुछ मुस्कुराते हुए कहा,
विनतोवाच
श्लोक 11 (13.23.11)
हन्त पश्याव गच्छावः सुकृतो नौ पणः शुभे । दासी वा ते भविष्यामि त्वं वा दासी भविष्यसि ॥
hanta paśyāva gacchāvaḥ sukṛto nau paṇaḥ śubhe | dāsī vā te bhaviṣyāmi tvaṃ vā dāsī bhaviṣyasi
"चलो, चलकर देखें; हमारी शर्त ठीक से तय हुई है, शुभे। या तो मैं तुम्हारी दासी बनूँगी, या तुम मेरी दासी बनोगी।"
भीष्म उवाच
श्लोक 12 (13.23.12)
एवं स्थिरं पणं कृत्वा हयं ते तं ददर्शतुः । कृत्वा साक्षिणमात्मानं भगिन्यौ कुरुसत्तम ॥
evaṃ sthiraṃ paṇaṃ kṛtvā hayaṃ te taṃ dadarśatuḥ | kṛtvā sākṣiṇamātmānaṃ bhaginyau kurusattama
इस प्रकार शर्त को दृढ़ करके, हे कुरुश्रेष्ठ, उन दोनों बहनों ने स्वयं को ही साक्षी बनाकर उस घोड़े को देखा।
श्लोक 13 (13.23.13)
सा दृष्ट्वैव हयं मन्दं विनता शोककर्शिता । श्वेतं चन्द्रांशुवालं तं कालवालं मनोजवम् ॥
sā dṛṣṭvaiva hayaṃ mandaṃ vinatā śokakarśitā | śvetaṃ candrāṃśuvālaṃ taṃ kālavālaṃ manojavam
घोड़े को देखते ही विनता उदास होकर शोक से क्षीण हो गई: वह श्वेत था, चन्द्रकिरणों-सा उजला और मन के समान वेगवान, पर उसकी पूँछ काली थी।
श्लोक 14 (13.23.14)
तत्र सा व्रीलिता वाक्यं विनता साश्रुबिन्दुका । उवाच कालवालोऽयं तुरगो विजितं त्वया ॥
tatra sā vrīlitā vākyaṃ vinatā sāśrubindukā | uvāca kālavālo'yaṃ turago vijitaṃ tvayā
वहाँ लज्जित होकर, आँसुओं की बूँदें लिए विनता ने कहा, "इस घोड़े की पूँछ काली है; तुमने मुझे जीत लिया।"
विनतोवाच
श्लोक 15 (13.23.15)
दासी मां प्रेषय स्वार्थे यथा कामवशां शुभे । दास्यश्च कामकारा हि भर्तॄणां नात्र संशयः ॥
dāsī māṃ preṣaya svārthe yathā kāmavaśāṃ śubhe | dāsyaśca kāmakārā hi bhartṝṇāṃ nātra saṃśayaḥ
"शुभे, मुझे दासी मानकर अपने कामों पर भेजो, जैसी तुम्हारी इच्छा हो; क्योंकि दासियाँ अपने स्वामियों की इच्छा के अनुसार ही काम करती हैं, इसमें सन्देह नहीं।"