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अनुशासन पर्व · अध्याय 24

नारद का गरुड़ को उसकी माता की दासता बताना

कद्रू विनता से दासी की तरह सेवा कराती है। अभिमान में घूमते गरुड़ को नारद उसकी माता की दासता और शर्त में उसकी हार की कथा सुनाते हैं। गरुड़ क्रोध और दुःख से भरकर माता के पास जाता है और कद्रू से उसे छोड़ देने को कहता है। कद्रू अनुग्रह करने से मना करती है, पर कहती है कि यदि वह अमृत ला दे तो विनता मुक्त हो जाएगी।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.24.1)

ततः कद्रूर्हसन्ती च विनतां धर्मचारिणीम् । दासीवत्प्रेषयामास सा च सर्वं चकार तत् ॥

tataḥ kadrūrhasantī ca vinatāṃ dharmacāriṇīm | dāsīvatpreṣayāmāsa sā ca sarvaṃ cakāra tat

तब कद्रू ने हँसते हुए धर्मपरायण विनता को दासी की तरह इधर-उधर भेजा, और विनता ने वह सब किया।

श्लोक 2 (13.24.2)

न विवर्णा न संक्षुब्धा न च क्रुद्धा न दुःखिता । प्रेष्यकर्म चकारास्या विनता कमलेक्षणा ॥

na vivarṇā na saṃkṣubdhā na ca kruddhā na duḥkhitā | preṣyakarma cakārāsyā vinatā kamalekṣaṇā

न उदास, न विचलित, न क्रुद्ध और न दुःखी — कमल-नयनी विनता कद्रू की सेवा करती रही।

श्लोक 3 (13.24.3)

इमा दिशश्चतस्रोऽस्याः प्रेष्यभावेन वर्तिताः । अथ स्म वैनतेयं वै बलदर्पौ समीयतुः ॥

imā diśaścatasro'syāḥ preṣyabhāvena vartitāḥ | atha sma vainateyaṃ vai baladarpau samīyatuḥ

दासी के रूप में उसे इन चारों दिशाओं में चलाया गया। इसी बीच विनता-पुत्र गरुड़ में बल और अभिमान आ गए।

श्लोक 4 (13.24.4)

तं दर्पवशमापन्नं परिधावन्तमन्तिकात् । ददर्श नारदो राजन्देवर्षिर्दर्पसंयुतम् ॥

taṃ darpavaśamāpannaṃ paridhāvantamantikāt | dadarśa nārado rājandevarṣirdarpasaṃyutam

हे राजन्, देवर्षि नारद ने उसे अभिमान के वश में आकर पास ही इधर-उधर दौड़ते हुए देखा।

श्लोक 5 (13.24.5)

तमब्रवीच्च देवर्षिर्नारदः प्रहसन्निव । किं दर्पवशमापन्नो न वै पश्यसि मातरम् ॥

tamabravīcca devarṣirnāradaḥ prahasanniva | kiṃ darpavaśamāpanno na vai paśyasi mātaram

तब देवर्षि नारद ने मानो हँसते हुए उससे कहा, "अभिमान के वश में होकर तुम अपनी माता को क्यों नहीं देखते?

नारद उवाच

श्लोक 6 (13.24.6)

बलेन दृप्तः सततमहंमानकृतः सदा । दासीं पन्नगराजस्य मातुरन्तर्गृहे सतीम् ॥

balena dṛptaḥ satatamahaṃmānakṛtaḥ sadā | dāsīṃ pannagarājasya māturantargṛhe satīm

तुम सदा अपने बल पर इतराते और अहंकार से भरे रहते हो, जबकि सती-साध्वी तुम्हारी माता नागराज की माता के अन्तःपुर में दासी बनी हुई है।"

भीष्म उवाच

श्लोक 7 (13.24.7)

तमब्रवीद्वैनतेयः कर्म किं तन्महामते । जनयित्री मयि सुते जाता दासी तपस्विनी ॥

tamabravīdvainateyaḥ karma kiṃ tanmahāmate | janayitrī mayi sute jātā dāsī tapasvinī

वैनतेय ने उससे कहा, "हे महामति, वह कर्म क्या है? मैं पुत्र हूँ, फिर मेरी बेचारी माता दासी कैसे बन गई?"

श्लोक 8 (13.24.8)

अथाब्रवीदृषिर्वाक्यं दीव्यती विजिता खग । निकृत्या पन्नगेन्द्रस्य मात्रा पुत्रैः पुरा सह ॥

athābravīdṛṣirvākyaṃ dīvyatī vijitā khaga | nikṛtyā pannagendrasya mātrā putraiḥ purā saha

तब ऋषि ने कहा, "हे पक्षी, बहुत पहले दाँव लगाते हुए वह नागराज की माता और उसके पुत्रों से छल द्वारा हार गई थी।"

गरुड उवाच

श्लोक 9 (13.24.9)

कथं जिता निकृत्या सा भगवञ्जननी मम । ब्रूहि तन्मे यथावृत्तं श्रुत्वा वेत्स्ये ततः परम् ॥

kathaṃ jitā nikṛtyā sā bhagavañjananī mama | brūhi tanme yathāvṛttaṃ śrutvā vetsye tataḥ param

"भगवन्, मेरी माता छल से कैसे हारी? जैसा हुआ वैसा मुझे बताइए; सुनकर मैं आगे क्या करना है, यह जान लूँगा।"

भीष्म उवाच

श्लोक 10 (13.24.10)

ततस्तस्य यथावृत्तं सर्वं तन्नारदस्तदा । आचख्यौ भरतश्रेष्ठ यथावृत्तं पतत्रिणः ॥

tatastasya yathāvṛttaṃ sarvaṃ tannāradastadā | ācakhyau bharataśreṣṭha yathāvṛttaṃ patatriṇaḥ

तब नारद ने उस पक्षी को सब कुछ, जैसा घटा था वैसा ही, बताया, हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक 11 (13.24.11)

तच्छ्रुत्वा वैनतेयस्य कोपो हृदि समाविशत् । जगर्हे पन्नगान्सर्वान्मात्रा सह परंतपः ॥

tacchrutvā vainateyasya kopo hṛdi samāviśat | jagarhe pannagānsarvānmātrā saha paraṃtapaḥ

यह सुनकर वैनतेय के हृदय में क्रोध भर गया, और उस परंतप ने माता सहित सब सर्पों की निन्दा की।

श्लोक 12 (13.24.12)

ततस्तु रोषाद्दुःखाच्च तूर्णमुत्पत्य पक्षिराट् । जगाम यत्र माताऽस्य कृच्छ्रे महति वर्तते ॥

tatastu roṣādduḥkhācca tūrṇamutpatya pakṣirāṭ | jagāma yatra mātā'sya kṛcchre mahati vartate

तब क्रोध और दुःख से पक्षिराज शीघ्र उड़कर वहाँ गया जहाँ उसकी माता बड़े कष्ट में रह रही थी।

श्लोक 13 (13.24.13)

तत्रापश्यत्ततो दीनां जटिलां मलिनां कृशाम् । तोयदेन प्रतिच्छन्नां सूर्याभामिव मातरम् ॥

tatrāpaśyattato dīnāṃ jaṭilāṃ malināṃ kṛśām | toyadena praticchannāṃ sūryābhāmiva mātaram

वहाँ उसने अपनी माता को दीन, जटाधारिणी, मैली और दुबली देखा, जैसे बादल से ढकी हुई सूर्य की आभा हो।

श्लोक 14 (13.24.14)

तस्य दुःखाच्च रोषाच्च नेत्राभ्यामश्रु चास्रवत् । प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च पौरुषे प्रतितस्थुषः ॥

tasya duḥkhācca roṣācca netrābhyāmaśru cāsravat | pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca pauruṣe pratitasthuṣaḥ

पुरुषार्थ में, प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों में दृढ़ रहने वाले उस गरुड़ की आँखों से दुःख और क्रोध के कारण आँसू बह निकले।

श्लोक 15 (13.24.15)

अनुक्त्वा मातरं किञ्चित्पतत्रिवरपुङ्गवः । कद्रूमेव स धर्मात्मा वचनं प्रत्यभाषत ॥

anuktvā mātaraṃ kiñcitpatatrivarapuṅgavaḥ | kadrūmeva sa dharmātmā vacanaṃ pratyabhāṣata

अपनी माता से कुछ न कहकर पक्षियों में श्रेष्ठ उस धर्मात्मा ने कद्रू से ही बात की।

गरुड उवाच

श्लोक 16 (13.24.16)

यदि धर्मेण मे माता जिता यद्यप्यधर्मतः । ज्येष्ठा त्वमसि मे माता धर्मः सर्वः स मे मतः ॥

yadi dharmeṇa me mātā jitā yadyapyadharmataḥ | jyeṣṭhā tvamasi me mātā dharmaḥ sarvaḥ sa me mataḥ

"चाहे मेरी माता धर्म से हारी हो या अधर्म से भी, आप मेरी बड़ी माता हैं; मेरे लिए वह सब धर्म ही है।

श्लोक 17 (13.24.17)

इयं तु मे स्यात्कृपणा मयि पुत्रेऽम्ब दुःखिता । अनुजानीहि तां साधु मत्कृते धर्मदर्शिनि ॥

iyaṃ tu me syātkṛpaṇā mayi putre'mba duḥkhitā | anujānīhi tāṃ sādhu matkṛte dharmadarśini

पर माता, मुझ-जैसा पुत्र होते हुए भी वह दीन और दुःखी है। हे धर्म को देखने वाली, मेरे लिए कृपा करके उसे मुक्त होने की अनुमति दीजिए।"

भीष्म उवाच

श्लोक 18 (13.24.18)

कद्रूः श्रुत्वास्य तद्वाक्यं वैनतेयस्य धीमतः । उवाच वाक्यं दुष्प्रज्ञा परीता दुःखमूर्च्छिता ॥

kadrūḥ śrutvāsya tadvākyaṃ vainateyasya dhīmataḥ | uvāca vākyaṃ duṣprajñā parītā duḥkhamūrcchitā

बुद्धिमान वैनतेय की यह बात सुनकर दुष्ट-बुद्धि कद्रू, दुःख से घिरी और स्तब्ध-सी होकर बोली।

कद्रूरुवाच

श्लोक 19 (13.24.19)

नाहं तव न ते मातुर्वैनतेय कथञ्चन । कुर्यां प्रियमनिष्टात्मा मां ब्रवीषि खग द्विज ॥

nāhaṃ tava na te māturvainateya kathañcana | kuryāṃ priyamaniṣṭātmā māṃ bravīṣi khaga dvija

"वैनतेय, मैं तुम्हारे प्रति अनिष्ट भाव वाली हूँ; तुम्हारा या तुम्हारी माता का प्रिय मैं किसी प्रकार नहीं करूँगी। फिर भी, हे पक्षी, हे द्विज, तुम मुझसे ऐसा कहते हो?"

भीष्म उवाच

श्लोक 20 (13.24.20)

तां तदा ब्रुवतीं वाक्यमनिष्टं क्रूरभाषिणीम् । दारुणां सूनृताभिस्तामनुनेतुं प्रचक्रमे ॥

tāṃ tadā bruvatīṃ vākyamaniṣṭaṃ krūrabhāṣiṇīm | dāruṇāṃ sūnṛtābhistāmanunetuṃ pracakrame

जब वह ऐसी अप्रिय, कठोर और क्रूर बात कह रही थी, तब वह उसे मधुर और सत्य वचनों से मनाने लगा।

गरुड उवाच

श्लोक 21 (13.24.21)

ज्येष्ठा त्वमसि कल्याणि मातुर्मे भामिनि प्रिया । सोदर्या मम चासि त्वं ज्येष्ठा माता न संशयः ॥

jyeṣṭhā tvamasi kalyāṇi māturme bhāmini priyā | sodaryā mama cāsi tvaṃ jyeṣṭhā mātā na saṃśayaḥ

"कल्याणी, आप मेरी माता की बड़ी बहन हैं और उन्हें प्रिय हैं। आप मेरी माता की सहोदरा हैं और निस्सन्देह मेरी बड़ी माता हैं।

कद्रूरुवाच

श्लोक 22 (13.24.22)

विहङ्गम यथाकामं गच्छ कामगम द्विज । सूनृताभिस्त्वया माता नादासी शक्यमण्डज ॥

vihaṅgama yathākāmaṃ gaccha kāmagama dvija | sūnṛtābhistvayā mātā nādāsī śakyamaṇḍaja

हे पक्षी, हे द्विज, तुम जहाँ चाहो जा सकते हो। पर हे अण्डज, केवल मीठी बातों से तुम्हारी माता दासता से मुक्त नहीं हो सकती।

श्लोक 23 (13.24.23)

अमृतं यद्याहरेस्त्वं विहङ्ग जननीं तव । अदासीं मम पश्येमां वैनतेय न संशयः ॥

amṛtaṃ yadyāharestvaṃ vihaṅga jananīṃ tava | adāsīṃ mama paśyemāṃ vainateya na saṃśayaḥ

हे पक्षी, यदि तुम अमृत ले आओ, तो वैनतेय, तुम अपनी माता को मेरी दासता से मुक्त देखोगे, इसमें सन्देह नहीं।"

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