अनुशासन पर्व · अध्याय 202
युधिष्ठिर की भीष्म से पुनः उपदेश की प्रार्थना
जनमेजय वैशम्पायन से पूछते हैं कि शरशय्या पर पड़े भीष्म से युधिष्ठिर ने आगे क्या पूछा। वैशम्पायन बताते हैं कि युधिष्ठिर ने भीष्म को कुल का अन्तिम गुरु कहकर उनकी प्रशंसा की और नारायण तथा राजाओं के सामने उनसे ऐसा प्राचीन वृत्तान्त सुनाने की प्रार्थना की जो सबका हित करे। भीष्म भावविह्वल होकर हरि को प्रणाम करते हैं और कहना आरम्भ करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (13.202.1)
अनुशास्य शुभैर्वाक्यैर्भीष्ममाह महामतिः । प्रीत्या पुनः स शुश्रूषुर्वचनं यद्युधिष्ठिरः ॥
anuśāsya śubhairvākyairbhīṣmamāha mahāmatiḥ | prītyā punaḥ sa śuśrūṣurvacanaṃ yadyudhiṣṭhiraḥ
शुभ वचनों से भीष्म को सम्बोधित करके बुद्धिमान् युधिष्ठिर ने प्रेमवश फिर से सुनने की इच्छा से उनसे कहा।
जनमेजय उवाच
श्लोक 2 (13.202.2)
पितामहो मे विप्रर्षे भीष्मं कालवशं गतम् । किमपृच्छत्तदा राजा सर्वसामाजिकं हितम् ॥
pitāmaho me viprarṣe bhīṣmaṃ kālavaśaṃ gatam | kimapṛcchattadā rājā sarvasāmājikaṃ hitam
हे विप्रर्षि, मेरे पितामह राजा ने काल के वश में पड़े भीष्म से उस समय सब सभासदों के हित की क्या बात पूछी थी?
श्लोक 3 (13.202.3)
उभयोर्लोकयोर्युक्तं पुरुषार्थमनुत्तमम् । तन्मे वद महाप्राज्ञ श्रोतुं कौतूहलं हि मे ॥
ubhayorlokayoryuktaṃ puruṣārthamanuttamam | tanme vada mahāprājña śrotuṃ kautūhalaṃ hi me
हे महाप्राज्ञ, दोनों लोकों के लिए उपयुक्त जो सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ है, वह मुझे बताइए; मुझे सुनने की बड़ी उत्सुकता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (13.202.4)
भूय एव महाराज शृणु धर्मसमुच्चयम् । यदपृच्छत्तदा राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
bhūya eva mahārāja śṛṇu dharmasamuccayam | yadapṛcchattadā rājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ
हे महाराज, धर्म का वह सार-संग्रह फिर सुनो, जो कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने उस समय पूछा था।
श्लोक 5 (13.202.5)
शरतल्पगतं भीष्मं सर्वपार्थिवसन्निधौ । अजातशत्रुः प्रीतात्मा पुनरेवाभ्यभाषत ॥
śaratalpagataṃ bhīṣmaṃ sarvapārthivasannidhau | ajātaśatruḥ prītātmā punarevābhyabhāṣata
सब राजाओं के सामने शरशय्या पर पड़े भीष्म से प्रसन्नचित्त अजातशत्रु ने फिर कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 6 (13.202.6)
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । श्रूयतां मे हि वचनमर्थित्वात्प्रब्रवीम्यहम् ॥
pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | śrūyatāṃ me hi vacanamarthitvātprabravīmyaham
हे पितामह, महाप्राज्ञ, सब शास्त्रों में निपुण, मेरी बात सुनिए; मैं याचक होकर कह रहा हूँ।
श्लोक 7 (13.202.7)
परावरज्ञो भूतानां दयावान्सर्वजन्तुषु । आगमैर्बहुभिः प्रीतो भवान्नः परमं कुले ॥
parāvarajño bhūtānāṃ dayāvānsarvajantuṣu | āgamairbahubhiḥ prīto bhavānnaḥ paramaṃ kule
आप ऊँच-नीच सब जानने वाले हैं, सब प्राणियों पर दयालु हैं, अनेक शास्त्रों से तृप्त हैं और हमारे कुल में सर्वश्रेष्ठ हैं।
श्लोक 8 (13.202.8)
त्वादृशो दुर्लभो लोके साम्प्रतं ज्ञानसंयुतः । भवता गुरुणा चैव धन्याश्चैव वयं प्रभो ॥
tvādṛśo durlabho loke sāmprataṃ jñānasaṃyutaḥ | bhavatā guruṇā caiva dhanyāścaiva vayaṃ prabho
आज संसार में आप जैसा ज्ञानी दुर्लभ है। हे प्रभु, आप जैसे गुरु के कारण हम धन्य हैं।
श्लोक 9 (13.202.9)
अयं स कालः सम्प्राप्तो दुर्लभैर्ज्ञातिबान्धवैः । शास्ता तु नास्ति नः कश्चित्त्वदृते पुरुषर्षभ ॥
ayaṃ sa kālaḥ samprāpto durlabhairjñātibāndhavaiḥ | śāstā tu nāsti naḥ kaścittvadṛte puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, यह ऐसा समय आ गया है जब जाति-बन्धु दुर्लभ हो गए हैं; आपके सिवा हमारा कोई उपदेष्टा नहीं है।
श्लोक 10 (13.202.10)
तस्माद्धर्मार्थसहितमायत्यां च हितोदयम् । आश्चर्यं परमं वाक्यं श्रोतुमिच्छामि भारत ॥
tasmāddharmārthasahitamāyatyāṃ ca hitodayam | āścaryaṃ paramaṃ vākyaṃ śrotumicchāmi bhārata
इसलिए, हे भारत, मैं धर्म और अर्थ से युक्त, भविष्य में कल्याणकारी, परम आश्चर्यजनक वचन सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 11 (13.202.11)
अयं नारायणः श्रीमन्सर्वपार्थिवसन्निधौ । भवन्तं बहुमानाच्च प्रणयाच्चैव सेवते ॥
ayaṃ nārāyaṇaḥ śrīmansarvapārthivasannidhau | bhavantaṃ bahumānācca praṇayāccaiva sevate
ये श्रीमान् नारायण सब राजाओं के सामने बड़े आदर और प्रेम से आपकी सेवा करते हैं।
श्लोक 12 (13.202.12)
अस्यैव तु समक्षं नः पार्थिवानां तथैव च । इतिवृत्तं पुराणं च श्रोतॄणां परमं हितम् ॥
asyaiva tu samakṣaṃ naḥ pārthivānāṃ tathaiva ca | itivṛttaṃ purāṇaṃ ca śrotṝṇāṃ paramaṃ hitam
यहीं इनके सामने और राजाओं के सामने हमें वह प्राचीन वृत्तान्त सुनाइए, जो सुनने वालों के लिए परम हितकर है।
श्लोक 13 (13.202.13)
यदि तेऽहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ । मत्प्रियार्थं हि कौरव्य स्नेहाद्भाषितुमर्हसि ॥
yadi te'hamanugrāhyo bhrātṛbhiḥ sahito'nagha | matpriyārthaṃ hi kauravya snehādbhāṣitumarhasi
हे निष्पाप, यदि मैं भाइयों सहित आपकी कृपा के योग्य हूँ, तो हे कौरव्य, मेरे प्रिय के लिए स्नेहवश आप कहने योग्य हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (13.202.14)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स्नेहादागतविक्लवः । प्रपिबन्निव तं दृष्ट्वा भीष्मो वचनमब्रवीत् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā snehādāgataviklavaḥ | prapibanniva taṃ dṛṣṭvā bhīṣmo vacanamabravīt
उसकी वह बात सुनकर भीष्म स्नेह से भावविह्वल हो गए और मानो उसे पी जाते हुए देखकर बोले।
श्लोक 15 (13.202.15)
शृणु राजन्पुरावृत्तमितिहासं पुरातनम् । एतावदुक्त्वा गाङ्गेयः प्रणम्य शिरसा हरिम् । धर्मराजं समीक्ष्येदं पुनर्वक्तुं समारभत् ॥
śṛṇu rājanpurāvṛttamitihāsaṃ purātanam | etāvaduktvā gāṅgeyaḥ praṇamya śirasā harim | dharmarājaṃ samīkṣyedaṃ punarvaktuṃ samārabhat
"हे राजन्, एक पुराना वृत्तान्त, प्राचीन इतिहास सुनो।" इतना ही कहकर गङ्गापुत्र ने हरि को सिर झुकाकर प्रणाम किया, धर्मराज की ओर देखा और फिर कहना आरम्भ किया।