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अनुशासन पर्व · अध्याय 203

कृष्ण का व्रत और पर्वत का दहन

भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि पुत्र के लिए बारह वर्ष का व्रत करते हुए कृष्ण से मिलने नारद, पर्वत, व्यास आदि ऋषि आए, और आगे आने वाले शिव-उमा संवाद की प्रस्तावना करते हैं। तब कृष्ण के मुख से अग्नि निकलकर पर्वत को जला देती है, जिसे वे एक दृष्टि से फिर पूर्ववत् कर देते हैं। विस्मित ऋषियों के पूछने पर कृष्ण बताते हैं कि वह अग्नि उनका अपना ही आत्मा था, जो ब्रह्मा के पास जाकर कामदेव को उनके पुत्र रूप में ले आया।

अध्याय 202अध्याय-सूचीअध्याय 204

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (13.203.1)

अयं नारायणः श्रीमान्पुत्रार्थे व्रतकाङ्क्षया । दीक्षितोऽभून्महाबाहुः पुरा द्वादशवार्षिकम् ॥

ayaṃ nārāyaṇaḥ śrīmānputrārthe vratakāṅkṣayā | dīkṣito'bhūnmahābāhuḥ purā dvādaśavārṣikam

ये श्रीमान् नारायण, महाबाहु, पुत्र की प्राप्ति के लिए व्रत करने की इच्छा से पूर्वकाल में बारह वर्ष की दीक्षा में स्थित हुए थे।

श्लोक 2 (13.203.2)

दीक्षितं केशवं द्रष्टुमभिजग्मुर्महर्षयः । सेवित्वा च महात्मानः प्रीयमाणं जनार्दनम् ॥

dīkṣitaṃ keśavaṃ draṣṭumabhijagmurmaharṣayaḥ | sevitvā ca mahātmānaḥ prīyamāṇaṃ janārdanam

दीक्षा में स्थित केशव को देखने के लिए महर्षि वहाँ आए, और उन महात्माओं ने प्रसन्न जनार्दन की सेवा की।

श्लोक 3 (13.203.3)

नारदः पर्वतश्चैव कृष्णद्वैपायनस्तथा । देवलः काश्यपश्चैव हस्तिकाश्यप एव च । जमदग्निश्च राजेन्द्र धौम्यो वाल्मीकिरेव च ॥

nāradaḥ parvataścaiva kṛṣṇadvaipāyanastathā | devalaḥ kāśyapaścaiva hastikāśyapa eva ca | jamadagniśca rājendra dhaumyo vālmīkireva ca

नारद, पर्वत, कृष्णद्वैपायन, देवल, काश्यप, हस्तिकाश्यप, जमदग्नि, हे राजेन्द्र, धौम्य और वाल्मीकि।

श्लोक 4 (13.203.4)

अपरेऽपि तपःसिद्धाः सत्यव्रतपरायणाः । शिष्यैरनुगताः सर्वे ब्रह्मविद्भिरकल्मषैः ॥

apare'pi tapaḥsiddhāḥ satyavrataparāyaṇāḥ | śiṣyairanugatāḥ sarve brahmavidbhirakalmaṣaiḥ

तपस्या से सिद्ध और सत्यव्रत में तत्पर अन्य तपस्वी भी आए; ब्रह्मवेत्ता और निष्कलंक शिष्य उन सबके साथ थे।

श्लोक 5 (13.203.5)

केशवस्तानभिगतान्प्रीत्या सम्परिगृह्य च । तेषामतिथिसत्कारं पूजनार्थं कुलोचितम् । देवकीतनयो हृष्टो देवतुल्यमकल्पयत् ॥

keśavastānabhigatānprītyā samparigṛhya ca | teṣāmatithisatkāraṃ pūjanārthaṃ kulocitam | devakītanayo hṛṣṭo devatulyamakalpayat

आए हुए उन ऋषियों को केशव ने प्रेम से अपनाया, और देवकीपुत्र ने हर्षित होकर उनके पूजन के लिए उनके कुल के योग्य, देवताओं के समान अतिथि-सत्कार की व्यवस्था की।

श्लोक 6 (13.203.6)

उपविष्टेषु सर्वेषु विष्टरेषु तदाऽनघ । विश्वस्तेष्वभितुष्टेषु केशवार्चनया पुनः ॥

upaviṣṭeṣu sarveṣu viṣṭareṣu tadā'nagha | viśvasteṣvabhituṣṭeṣu keśavārcanayā punaḥ

हे निष्पाप, जब सब आसनों पर बैठ गए और केशव के सत्कार से विश्वस्त तथा पूर्ण सन्तुष्ट हो गए,

श्लोक 7 (13.203.7)

परस्परं कथा दिव्याः प्रावर्तन्त मनोरमाः । विष्णोर्नारायणस्यैव प्रसादात्कथयामि ताः ॥

parasparaṃ kathā divyāḥ prāvartanta manoramāḥ | viṣṇornārāyaṇasyaiva prasādātkathayāmi tāḥ

तब उनके बीच दिव्य और मनोहर कथाएँ चलने लगीं। विष्णु नारायण की ही कृपा से मैं उन्हें कहता हूँ।

श्लोक 8 (13.203.8)

तस्यैव व्रतचर्यायां मुनिभिर्विस्मितं पुरा । यत्र गोवृषभाङ्कस्य प्रभावोऽभून्महात्मनः ॥

tasyaiva vratacaryāyāṃ munibhirvismitaṃ purā | yatra govṛṣabhāṅkasya prabhāvo'bhūnmahātmanaḥ

उन्हीं के उस व्रत-काल में पूर्वकाल में मुनि विस्मित हुए थे, जब वृषभ-चिह्न वाले महात्मा शिव का प्रभाव प्रकट हुआ।

श्लोक 9 (13.203.9)

यत्र देवी महादेवमपृच्छत्संशयान्पुरा । कथयामास सर्वांस्तान्देव्याः प्रियचिकीर्षया ॥

yatra devī mahādevamapṛcchatsaṃśayānpurā | kathayāmāsa sarvāṃstāndevyāḥ priyacikīrṣayā

वहाँ पूर्वकाल में देवी ने महादेव से अपने संशय पूछे थे, और देवी का प्रिय करने की इच्छा से उन्होंने वे सब समझा दिए।

श्लोक 10 (13.203.10)

उमापत्योश्च संवादं शृणु तात मनोरमम् । वर्णाश्रमाणां धर्मश्च तत्र तात समाहितः ॥

umāpatyośca saṃvādaṃ śṛṇu tāta manoramam | varṇāśramāṇāṃ dharmaśca tatra tāta samāhitaḥ

हे तात, उमा और उनके पति का वह मनोहर संवाद सुनो; उसमें, हे तात, वर्णों और आश्रमों के धर्म संगृहीत हैं।

श्लोक 11 (13.203.11)

ऋषिधर्मश्च निखिलो राजधर्मश्च पुष्कलः । गृहस्थधर्मश्च शुभः कर्मपाकफलानि च ॥

ṛṣidharmaśca nikhilo rājadharmaśca puṣkalaḥ | gṛhasthadharmaśca śubhaḥ karmapākaphalāni ca

ऋषियों का सम्पूर्ण धर्म, राजाओं के विपुल धर्म, गृहस्थ के शुभ धर्म और कर्मों के परिपाक के फल भी उसमें हैं,

श्लोक 12 (13.203.12)

देवगुह्यं च विविधं दानधर्मविधिस्तथा । विधानमत्र प्रोक्तं यद्यमस्य नियमस्य च ॥

devaguhyaṃ ca vividhaṃ dānadharmavidhistathā | vidhānamatra proktaṃ yadyamasya niyamasya ca

देवताओं के नाना गुप्त रहस्य, दानधर्म की विधि, तथा यम और नियम का जो विधान वहाँ कहा गया है, वह भी उसमें है,

श्लोक 13 (13.203.13)

यमलोकविधानं च स्वर्गलोकगतिस्तथा । प्राणमोक्षविधिश्चैव तीर्थचर्या च पुष्कला ॥

yamalokavidhānaṃ ca svargalokagatistathā | prāṇamokṣavidhiścaiva tīrthacaryā ca puṣkalā

यमलोक का विधान, स्वर्गलोक की गति, प्राण-त्याग की विधि और तीर्थयात्रा का विस्तृत वर्णन भी उसमें है,

श्लोक 14 (13.203.14)

मोक्षधर्मविधानं च साङ्ख्ययोगसमन्वितम् । स्त्रीधर्मश्च स्वयं देव्या देवदेवाय भाषितः ॥

mokṣadharmavidhānaṃ ca sāṅkhyayogasamanvitam | strīdharmaśca svayaṃ devyā devadevāya bhāṣitaḥ

सांख्य और योग से युक्त मोक्षधर्म का विधान, तथा स्त्रियों का धर्म, जो स्वयं देवी ने देवों के देव से कहा था।

श्लोक 15 (13.203.15)

एवमादि शुभं सर्वं तत्र तात समाहितम् । रुद्राण्याः संशयप्रश्नो यत्र तात प्रवर्तते ॥

evamādi śubhaṃ sarvaṃ tatra tāta samāhitam | rudrāṇyāḥ saṃśayapraśno yatra tāta pravartate

यह सब, और इसी प्रकार का सारा शुभ विषय, हे तात, वहाँ संगृहीत है, जहाँ रुद्राणी के संशय और प्रश्न उठाए जाते हैं।

श्लोक 16 (13.203.16)

धन्यं यशस्यमायुष्यं धर्म्यं च परमं हितम् । पुष्टियोगमिमं दिव्यं कथ्यमानं मया शृणु ॥

dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ dharmyaṃ ca paramaṃ hitam | puṣṭiyogamimaṃ divyaṃ kathyamānaṃ mayā śṛṇu

जो मैं कह रहा हूँ, उस दिव्य पुष्टि-योग को सुनो; वह धन्य, यशदायक, आयुवर्धक, धर्मसम्मत और परम हितकारी है।

श्लोक 17 (13.203.17)

इतिहासमिमं दिव्यं पवित्रं परमं शुभम् । सायं प्रातः सदा सम्यक् श्रोतव्यं च बुभूषता ॥

itihāsamimaṃ divyaṃ pavitraṃ paramaṃ śubham | sāyaṃ prātaḥ sadā samyak śrotavyaṃ ca bubhūṣatā

यह दिव्य, पवित्र, परम और शुभ इतिहास कल्याण चाहने वाले को सदा सायं और प्रातः भली-भाँति सुनना चाहिए।

श्लोक 18 (13.203.18)

ततो नारायणो देवः संक्लिष्टो व्रतचर्यया । वह्निर्विनिःसृतो वक्त्रात्कृष्णस्याद्भुतदर्शनः ॥

tato nārāyaṇo devaḥ saṃkliṣṭo vratacaryayā | vahnirviniḥsṛto vaktrātkṛṣṇasyādbhutadarśanaḥ

तब व्रत के आचरण से देव नारायण के क्लान्त होने पर, कृष्ण के मुख से अद्भुत रूप वाली अग्नि निकल पड़ी।

श्लोक 19 (13.203.19)

अग्निना तेन महता निःसृतेन मुखाद्विभोः । पश्यतामेव सर्वेषां दग्ध एव नगोत्तमः ॥

agninā tena mahatā niḥsṛtena mukhādvibhoḥ | paśyatāmeva sarveṣāṃ dagdha eva nagottamaḥ

विभु के मुख से निकली उस महान् अग्नि से, सबके देखते-देखते, वह श्रेष्ठ पर्वत जल गया।

श्लोक 20 (13.203.20)

मृगपक्षिगणाकीर्णः श्वापदैरपि सङ्कुलः । वृक्षगुल्मलताकीर्णो मथितो दीनदर्शनः ॥

mṛgapakṣigaṇākīrṇaḥ śvāpadairapi saṅkulaḥ | vṛkṣagulmalatākīrṇo mathito dīnadarśanaḥ

मृगों और पक्षियों के झुण्डों से भरा, हिंस्र पशुओं से व्याप्त, वृक्षों, झाड़ियों और लताओं से घिरा वह पर्वत मथ दिया गया और देखने में दयनीय हो गया।

श्लोक 21 (13.203.21)

पुनः स दृष्टमात्रेण हरिणा सौम्यचेतसा । स बभूव गिरिः क्षिप्रं प्रफुल्लद्रुमकाननः ॥

punaḥ sa dṛṣṭamātreṇa hariṇā saumyacetasā | sa babhūva giriḥ kṣipraṃ praphulladrumakānanaḥ

पर सौम्य चित्त वाले हरि की दृष्टि पड़ते ही वह पर्वत तुरन्त फिर खिले हुए वृक्षों के वनों वाला हो गया।

श्लोक 22 (13.203.22)

सिद्धचारणसङ्घैश्च प्रसन्नैरुपशोभितः । मत्तवारणसंयुक्तो नानापक्षिगणैर्युतः । तदद्भुतमचिन्त्यं च सर्वेषामभवद्भृशम् ॥

siddhacāraṇasaṅghaiśca prasannairupaśobhitaḥ | mattavāraṇasaṃyukto nānāpakṣigaṇairyutaḥ | tadadbhutamacintyaṃ ca sarveṣāmabhavadbhṛśam

प्रसन्न सिद्धों और चारणों के समूहों से शोभित, मतवाले हाथियों और नाना पक्षियों के झुण्डों से युक्त वह दृश्य सबके लिए अत्यन्त अद्भुत और अचिन्त्य था।

श्लोक 23 (13.203.23)

तं दृष्ट्वा हृष्टरोमाणः सर्वे मुनिगणास्तदा । विस्मिताः परमायत्ताः साध्वसाकुललोचनाः । न किञ्चिदब्रुवंस्तत्र शुभं वा यदि वेतरत् ॥

taṃ dṛṣṭvā hṛṣṭaromāṇaḥ sarve munigaṇāstadā | vismitāḥ paramāyattāḥ sādhvasākulalocanāḥ | na kiñcidabruvaṃstatra śubhaṃ vā yadi vetarat

उसे देखकर सब मुनिगण रोमांचित, विस्मित और अत्यन्त अभिभूत हो गए; उनकी आँखें भय और विस्मय से भरी थीं, और वहाँ उन्होंने भला या बुरा कुछ भी नहीं कहा।

श्लोक 24 (13.203.24)

ततो नारायणो देवो मुनिसङ्घे तु विस्मिते । तान्समीक्ष्यैव मधुरं बभाषे पुष्करेक्षणः ॥

tato nārāyaṇo devo munisaṅghe tu vismite | tānsamīkṣyaiva madhuraṃ babhāṣe puṣkarekṣaṇaḥ

तब मुनियों की मण्डली के विस्मित रहने पर कमलनयन देव नारायण ने उन्हें देखकर मधुर वाणी में कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 25 (13.203.25)

किमर्थं मुनिसङ्घेऽस्मिन्विस्मयोऽयमनुत्तमः । एतन्मे संशयं सर्वे याथातथ्येन नन्दिताः । ऋषयो वक्तुमर्हन्ति निश्चयेनार्थकोविदाः ॥

kimarthaṃ munisaṅghe'sminvismayo'yamanuttamaḥ | etanme saṃśayaṃ sarve yāthātathyena nanditāḥ | ṛṣayo vaktumarhanti niścayenārthakovidāḥ

“इस मुनि-मण्डली में यह परम विस्मय किस कारण हुआ? आप सब सन्तुष्ट और अर्थ के ज्ञाता ऋषि मेरे इस संशय को यथार्थ रूप से और निश्चय के साथ बताएँ।”

ऋषय ऊचुः

श्लोक 26 (13.203.26)

केशवस्य वचः श्रुत्वा तुष्टुवुर्मुनिपुङ्गवाः । भवान्सृजति वै लोकान्भवान्संहरति प्रजाः । भवाञ्शीतं भवानुष्णं भवान्सत्यं भवान्क्रतुः ॥

keśavasya vacaḥ śrutvā tuṣṭuvurmunipuṅgavāḥ | bhavānsṛjati vai lokānbhavānsaṃharati prajāḥ | bhavāñśītaṃ bhavānuṣṇaṃ bhavānsatyaṃ bhavānkratuḥ

केशव के वचन सुनकर श्रेष्ठ मुनियों ने उनकी स्तुति की: “आप लोकों की सृष्टि करते हैं और प्रजा का संहार करते हैं; आप शीत हैं, आप उष्ण हैं, आप सत्य हैं, आप यज्ञ हैं।

श्लोक 27 (13.203.27)

भवानादिर्भवानन्तो भवतोऽन्यन्न विद्यते । स्थावरं जङ्गमं सर्वं त्वमेव पुरुषोत्तम ॥

bhavānādirbhavānanto bhavato'nyanna vidyate | sthāvaraṃ jaṅgamaṃ sarvaṃ tvameva puruṣottama

आप आदि हैं, आप अन्त हैं; आपसे अलग कुछ नहीं है। स्थावर और जंगम, यह सब आप ही हैं, हे पुरुषोत्तम।

श्लोक 28 (13.203.28)

त्वत्तः सर्वमिदं तात लोकचक्रं प्रवर्तते । त्वमेवार्हसि तद्वक्तुं मुखादग्निविनिर्गमम् ॥

tvattaḥ sarvamidaṃ tāta lokacakraṃ pravartate | tvamevārhasi tadvaktuṃ mukhādagnivinirgamam

हे तात, आपसे ही यह लोक-चक्र चलता है। आपके मुख से अग्नि के निकलने का कारण बताने के योग्य आप ही हैं।

श्लोक 29 (13.203.29)

एतन्नो विस्मयकरं बभूव मधुसूदन । ततो विगतसंत्रासा भवाम पुरुषोत्तम । यदिच्छेत्तत्र वक्तव्यं कुतोऽस्माकं नियोगतः ॥

etanno vismayakaraṃ babhūva madhusūdana | tato vigatasaṃtrāsā bhavāma puruṣottama | yadicchettatra vaktavyaṃ kuto'smākaṃ niyogataḥ

हे मधुसूदन, इसने हमें विस्मय में डाल दिया है। इसके बाद, हे पुरुषोत्तम, हम भयमुक्त हो जाएँगे। आप जो चाहें वहाँ कहें; हमारे आदेश से कैसे हो सकता है?”

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 30 (13.203.30)

नित्यं हितार्थं लोकानां भवद्भिः क्रियते तपः । तस्माल्लोकहितं गुह्यं श्रूयतां कथयामि वः ॥

nityaṃ hitārthaṃ lokānāṃ bhavadbhiḥ kriyate tapaḥ | tasmāllokahitaṃ guhyaṃ śrūyatāṃ kathayāmi vaḥ

श्रीभगवान् ने कहा: “आप लोगों के हित के लिए निरन्तर तप करते हैं; इसलिए मैं आपको लोकहित का एक गुप्त रहस्य बताता हूँ, सुनिए।

श्लोक 31 (13.203.31)

असुरः साम्प्रतं कश्चिदहितो लोकनाशनः । मायास्त्रकुशलश्चैव बलदर्पसमन्वितः ॥

asuraḥ sāmprataṃ kaścidahito lokanāśanaḥ | māyāstrakuśalaścaiva baladarpasamanvitaḥ

इस समय एक असुर है, जो शत्रु और लोकों का नाश करने वाला है, माया और अस्त्रों में कुशल तथा बल के अभिमान से भरा है।

श्लोक 32 (13.203.32)

बभूव स मया बद्धो लोकानां हितकाम्यया । पुत्रेण मे वधो दृष्टस्तस्य वै मुनिपुङ्गवाः ॥

babhūva sa mayā baddho lokānāṃ hitakāmyayā | putreṇa me vadho dṛṣṭastasya vai munipuṅgavāḥ

लोकों के हित की इच्छा से मैंने उसे बाँध रखा है। हे मुनिश्रेष्ठो, उसका वध मेरे पुत्र के द्वारा होना देखा गया है।

श्लोक 33 (13.203.33)

तदर्थं पुत्रमेवाहं सिसृक्षुर्वनमागतः । आत्मनः सदृशं पुत्रमहं जनयितुं व्रतैः ॥

tadarthaṃ putramevāhaṃ sisṛkṣurvanamāgataḥ | ātmanaḥ sadṛśaṃ putramahaṃ janayituṃ vrataiḥ

उसी के लिए मैं पुत्र को उत्पन्न करने की इच्छा से वन में आया, अपने समान पुत्र को व्रतों द्वारा जन्म देने के लिए।

श्लोक 34 (13.203.34)

एवं व्रतपरीतस्य तपस्तीव्रतया मम । अथात्मा मम देहस्थः सोऽग्निर्भूत्वा विनिःसृतः ॥

evaṃ vrataparītasya tapastīvratayā mama | athātmā mama dehasthaḥ so'gnirbhūtvā viniḥsṛtaḥ

इस प्रकार व्रत में लगे हुए मेरे तप की तीव्रता से देह में स्थित मेरा आत्मा अग्नि होकर बाहर निकल गया।

श्लोक 35 (13.203.35)

विनिःसृत्य गतो द्रष्टुं क्षणेन च पितामहम् । ब्रह्मणा मन्मथोऽनङ्गः पुत्रत्वेन प्रकल्पितः । अनुज्ञातश्च तेनैव पुनरायान्ममान्तिकम् ॥

viniḥsṛtya gato draṣṭuṃ kṣaṇena ca pitāmaham | brahmaṇā manmatho'naṅgaḥ putratvena prakalpitaḥ | anujñātaśca tenaiva punarāyānmamāntikam

बाहर निकलकर वह क्षण भर में पितामह को देखने गया। ब्रह्मा ने अनंग मन्मथ को मेरे पुत्र के रूप में नियत किया, और उन्हीं की अनुमति पाकर वह फिर मेरे पास लौट आया।

श्लोक 36 (13.203.36)

एवं मे वैष्णवं तेजो मम वक्त्राद्विनिःसृतम् । तत्तेजसा निर्मथितः पुरतोऽयं गिरिः स्थितः ॥

evaṃ me vaiṣṇavaṃ tejo mama vaktrādviniḥsṛtam | tattejasā nirmathitaḥ purato'yaṃ giriḥ sthitaḥ

इस प्रकार मेरा यह वैष्णव तेज मेरे मुख से निकला, और उसी तेज से आपके सामने खड़ा यह पर्वत मथ दिया गया।

श्लोक 37 (13.203.37)

दृष्ट्वा दाहं गिरेस्तस्य सौम्यभावतया मम । पुनः स दृष्टमात्रेण गिरिरासीद्यथा पुरा ॥

dṛṣṭvā dāhaṃ girestasya saumyabhāvatayā mama | punaḥ sa dṛṣṭamātreṇa girirāsīdyathā purā

उस पर्वत का जलना देखकर, अपने सौम्य भाव से मैंने उसे फिर देखा, और दृष्टि पड़ते ही पर्वत पहले जैसा हो गया।

श्लोक 38 (13.203.38)

एतद्गुह्यं यथातथ्यं कथितं वः समासतः । भवन्तो व्यथिता येन विस्मिताश्च तपोधनाः ॥

etadguhyaṃ yathātathyaṃ kathitaṃ vaḥ samāsataḥ | bhavanto vyathitā yena vismitāśca tapodhanāḥ

हे तपोधनो, यह रहस्य मैंने आपको यथार्थ रूप से और संक्षेप में बता दिया, जिससे आप व्यथित और विस्मित हुए थे।”

भीष्म उवाच

श्लोक 39 (13.203.39)

ऋषीणामेवमुक्त्वा तु तान्पुनः प्रत्यभाषत ॥

ṛṣīṇāmevamuktvā tu tānpunaḥ pratyabhāṣata

ऋषियों से इस प्रकार कहकर वे उनसे फिर बोले।

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