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अनुशासन पर्व · अध्याय 205

उमा द्वारा शिव के नेत्र ढकना

नारद उस हिमालय-वन का वर्णन करते हैं जहाँ उन्होंने गणों और ऋषियों के बीच बैठे शिव को देखा, और उमा को क्रीड़ा में उनके नेत्र अपने हाथों से ढकते देखा। संसार में अन्धकार छा जाता है और शिव अपने ललाट पर तीसरा नेत्र प्रकट करते हैं, जिसकी अग्नि पर्वत को जला देती है। उमा के दुःख पर वे दृष्टि से हिमालय को फिर पूर्ववत् कर देते हैं। उमा के पूछने पर शिव बताते हैं कि संसार को अन्धकार से बचाने के लिए उन्होंने यह नेत्र रचा।

अध्याय 204अध्याय-सूचीअध्याय 206

नारद उवाच

श्लोक 1 (13.205.1)

भगवंस्तीर्थयात्रार्थं तथैव चरता मया । दिव्यमद्भुतसङ्काशं दृष्टं हैमवतं वनम् ॥

bhagavaṃstīrthayātrārthaṃ tathaiva caratā mayā | divyamadbhutasaṅkāśaṃ dṛṣṭaṃ haimavataṃ vanam

भगवन्, तीर्थयात्रा के लिए विचरण करते हुए मैंने हिमालय का एक दिव्य और अद्भुत वन देखा,

श्लोक 2 (13.205.2)

नानावृक्षसमायुक्तं नानापक्षिगणैर्वृतम् । नानारत्नगणाकीर्णं नानाभावसमन्वितम् ॥

nānāvṛkṣasamāyuktaṃ nānāpakṣigaṇairvṛtam | nānāratnagaṇākīrṇaṃ nānābhāvasamanvitam

जो नाना वृक्षों से युक्त था, नाना पक्षियों के झुण्डों से घिरा था, नाना रत्नों से बिखरा हुआ था और नाना भावों से सम्पन्न था,

श्लोक 3 (13.205.3)

दिव्यचन्दनसंयुक्तं दिव्यधूपेन धूपितम् । दिव्यपुष्पसमाकीर्णं दिव्यगन्धेन वासितम् ॥

divyacandanasaṃyuktaṃ divyadhūpena dhūpitam | divyapuṣpasamākīrṇaṃ divyagandhena vāsitam

दिव्य चन्दन से युक्त, दिव्य धूप से सुगन्धित, दिव्य फूलों से बिछा हुआ और दिव्य गन्ध से सुवासित था,

श्लोक 4 (13.205.4)

सिद्धचारणसंघातैर्भूतसङ्घैर्निषेवितम् । वरिष्ठाप्सरसाकीर्णं नागगन्धर्वसङ्कुलम् ॥

siddhacāraṇasaṃghātairbhūtasaṅghairniṣevitam | variṣṭhāpsarasākīrṇaṃ nāgagandharvasaṅkulam

जहाँ सिद्धों और चारणों के समूह तथा भूतगण आते-जाते थे, जो श्रेष्ठ अप्सराओं से भरा था और नागों तथा गन्धर्वों से व्याप्त था।

श्लोक 5 (13.205.5)

मृदङ्गमुरजोद्धुष्टं शङ्खवीणाभिनादितम् । नृत्यद्भिर्भूतसङ्घैश्च सर्वतस्त्वभिशोभितम् ॥

mṛdaṅgamurajoddhuṣṭaṃ śaṅkhavīṇābhināditam | nṛtyadbhirbhūtasaṅghaiśca sarvatastvabhiśobhitam

वह मृदंग और मुरज की ध्वनि से गूँज रहा था, शंखों और वीणाओं से निनादित था, और नाचते हुए भूतगणों से चारों ओर सुशोभित था।

श्लोक 6 (13.205.6)

नानारूपैर्विरूपैश्च भीमरूपैर्भयानकैः । सिंहव्याघ्रोरगमृगैर्बिडालवदनैस्तथा ॥

nānārūpairvirūpaiśca bhīmarūpairbhayānakaiḥ | siṃhavyāghroragamṛgairbiḍālavadanaistathā

वहाँ नाना रूपों वाले, विकृत, भयंकर आकार वाले और डरावने प्राणी थे, जिनके मुख सिंह, बाघ, सर्प और मृग जैसे थे और बिल्लियों जैसे भी थे,

श्लोक 7 (13.205.7)

खरोष्ट्रद्वीपिवदनैर्गजवक्त्रैस्तथैव च । उलूकश्येनवदनैः काकगृध्रमुखैस्तथा ॥

kharoṣṭradvīpivadanairgajavaktraistathaiva ca | ulūkaśyenavadanaiḥ kākagṛdhramukhaistathā

गधों, ऊँटों और तेंदुओं जैसे मुखों वाले, हाथी जैसे मुखों वाले, और उसी प्रकार उल्लू, बाज, कौए और गिद्धों जैसे मुखों वाले भी थे।

श्लोक 8 (13.205.8)

एवं बहुविधाकारैर्भूतसङ्घैर्भृशाकुलम् । नानद्यमानं बहुधा हरपारिषदैर्भृशम् ॥

evaṃ bahuvidhākārairbhūtasaṅghairbhṛśākulam | nānadyamānaṃ bahudhā harapāriṣadairbhṛśam

इस प्रकार नाना आकार वाले भूतगणों से वह वन अत्यन्त भरा हुआ था और हर के अनुचरों के भारी कोलाहल से अनेक प्रकार से गूँज रहा था।

श्लोक 9 (13.205.9)

घोररूपं सुदुर्दर्शं रक्षोगणशतैर्वृतम् । समाजं तद्वने दृष्टं मया भूतपतेः पुरा ॥

ghorarūpaṃ sudurdarśaṃ rakṣogaṇaśatairvṛtam | samājaṃ tadvane dṛṣṭaṃ mayā bhūtapateḥ purā

घोर रूप वाली, देखने में अत्यन्त कठिन, सैकड़ों राक्षसगणों से घिरी वह भूतपति की सभा थी, जिसे मैंने पूर्वकाल में उस वन में देखा था।

श्लोक 10 (13.205.10)

प्रनृत्ताप्सरसं दिव्यं देवगन्धर्वनादितम् । प्रथमे वर्षरात्रे तु मेघसङ्घनिनादितम् ॥

pranṛttāpsarasaṃ divyaṃ devagandharvanāditam | prathame varṣarātre tu meghasaṅghanināditam

वहाँ दिव्य अप्सराएँ नाच रही थीं, देवता और गन्धर्व उसे गुंजा रहे थे, और वर्षा की पहली रात्रि में वह मेघ-समूहों की गर्जना से गूँज रहा था।

श्लोक 11 (13.205.11)

नानाबर्हिणसंघुष्टं गजयूथसमाकुलम् । षट्पदैरुपगीतं च प्रथमे मासि माधवे ॥

nānābarhiṇasaṃghuṣṭaṃ gajayūthasamākulam | ṣaṭpadairupagītaṃ ca prathame māsi mādhave

वह अनेक मोरों की बोली से गूँज रहा था, हाथियों के झुण्डों से भरा था, और वसन्त के पहले मास माधव में भौंरों से गाया जा रहा था।

श्लोक 12 (13.205.12)

उत्क्रोशत्क्रौञ्चकुररैः सारसैर्जीवजीवकैः । मत्ताभिः परपुष्टाभिः कूजन्तीभिः समाकुलम् ॥

utkrośatkrauñcakuraraiḥ sārasairjīvajīvakaiḥ | mattābhiḥ parapuṣṭābhiḥ kūjantībhiḥ samākulam

वह चिल्लाते हुए क्रौंच और कुरर पक्षियों, सारसों और जीवजीवकों से कोलाहलमय था, और कूजती हुई मतवाली कोयलों से भरा था।

श्लोक 13 (13.205.13)

उत्तमावाससङ्काशं भीमरूपतरं ततः । द्रष्टुं भवति धर्मस्य धर्मभागिजनस्य च ॥

uttamāvāsasaṅkāśaṃ bhīmarūpataraṃ tataḥ | draṣṭuṃ bhavati dharmasya dharmabhāgijanasya ca

वह उत्तम निवास के समान दिखता था, फिर भी उसका रूप और भी भयंकर था; वह धर्म के और धर्म के भागी जनों के देखने योग्य था।

श्लोक 14 (13.205.14)

ये चोर्ध्वरेतसः सिद्धास्तत्रतत्र समागताः । मार्ताण्डरश्मिसञ्चारा विश्वेदेवगणास्तथा ॥

ye cordhvaretasaḥ siddhāstatratatra samāgatāḥ | mārtāṇḍaraśmisañcārā viśvedevagaṇāstathā

जो ऊर्ध्वरेता सिद्ध थे वे वहाँ-वहाँ से एकत्र हुए थे, तथा सूर्य की किरणों पर विचरने वाले और विश्वेदेवों के गण भी आए थे।

श्लोक 15 (13.205.15)

तथा नागास्तथा दिव्या लोकपाला हुताशनाः । वाताश्च सर्वे चायान्ति दिव्यपुष्पसमाकुलाः ॥

tathā nāgāstathā divyā lokapālā hutāśanāḥ | vātāśca sarve cāyānti divyapuṣpasamākulāḥ

इसी प्रकार नाग, दिव्य जन, लोकपाल, अग्नियाँ और दिव्य पुष्पों से भरी सब वायुएँ भी वहाँ आती थीं।

श्लोक 16 (13.205.16)

किरन्तः सर्वपुष्पाणि किरन्तोऽद्भुतदर्शनाः । ओषध्यः प्रज्वलन्त्यश्च द्योतयन्त्यो दिशो दश ॥

kirantaḥ sarvapuṣpāṇi kiranto'dbhutadarśanāḥ | oṣadhyaḥ prajvalantyaśca dyotayantyo diśo daśa

वे सब प्रकार के फूल बिखेरते थे, अद्भुत दिखते थे, और ओषधियाँ जल रही थीं, दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई।

श्लोक 17 (13.205.17)

विहगाश्च मुदा युक्ता नृत्यन्ति च नदन्ति च । ततः समन्ततस्तत्र दिव्या दिव्यजनप्रियाः ॥

vihagāśca mudā yuktā nṛtyanti ca nadanti ca | tataḥ samantatastatra divyā divyajanapriyāḥ

पक्षी आनन्द से भरे नाचते और कूजते थे, और तब चारों ओर वहाँ दिव्य जनों के प्रिय दिव्य प्राणी थे।

श्लोक 18 (13.205.18)

तत्र देवो गिरितटे हेमधातुविभूषिते । पर्यङ्क इव बभ्राज उपविष्टो महाद्युतिः ॥

tatra devo giritaṭe hemadhātuvibhūṣite | paryaṅka iva babhrāja upaviṣṭo mahādyutiḥ

वहाँ स्वर्ण-धातुओं से विभूषित पर्वत-तट पर महान् तेज वाले देव पलंग पर बैठे हुए-से शोभित हो रहे थे।

श्लोक 19 (13.205.19)

व्याघ्रचर्मपरीधानो गजचर्मोत्तरच्छदः । व्यालयज्ञोपवीतश्च लोहितान्त्रविभूषितः ॥

vyāghracarmaparīdhāno gajacarmottaracchadaḥ | vyālayajñopavītaśca lohitāntravibhūṣitaḥ

वे बाघ की खाल पहने थे, हाथी की खाल उनका उत्तरीय थी, सर्प उनका यज्ञोपवीत था, और वे लाल आँतों से सजे थे।

श्लोक 20 (13.205.20)

हरिश्मश्रुजटो भीमो भयकर्ताऽमरद्विषाम् । भयहेतुरभक्तानां भक्तानामभयङ्करः ॥

hariśmaśrujaṭo bhīmo bhayakartā'maradviṣām | bhayaheturabhaktānāṃ bhaktānāmabhayaṅkaraḥ

उनकी दाढ़ी और जटाएँ पीली-भूरी थीं, वे भयंकर थे, देवताओं के शत्रुओं को भय देने वाले और अभक्तों के लिए भय के कारण थे, पर भक्तों को अभय देने वाले थे।

श्लोक 21 (13.205.21)

किन्नरैर्देवगन्धर्वैः स्तूयमानस्ततस्ततः । ऋषिभिश्चाप्सरोभिश्च सर्वतश्चैव शोभितः ॥

kinnarairdevagandharvaiḥ stūyamānastatastataḥ | ṛṣibhiścāpsarobhiśca sarvataścaiva śobhitaḥ

किन्नर, देवता और गन्धर्व, तथा ऋषि और अप्सराएँ चारों ओर से उनकी स्तुति करते थे, और वे सब ओर से शोभित थे।

श्लोक 22 (13.205.22)

तत्र भूतपतेः स्थानं देवदानवसङ्कुलम् । सर्वतेजोमयं भूम्ना लोकपालनिषेवितम् ॥

tatra bhūtapateḥ sthānaṃ devadānavasaṅkulam | sarvatejomayaṃ bhūmnā lokapālaniṣevitam

वहाँ भूतपति का निवास था, जो देवों और दानवों से भरा था, पूरी तरह तेजोमय था और लोकपालों से सेवित था,

श्लोक 23 (13.205.23)

महोरगसमाकीर्णं सर्वेषां रोमहर्षणम् । भीमरूपमनिर्देश्यमप्रधृष्यतमं विभोः ॥

mahoragasamākīrṇaṃ sarveṣāṃ romaharṣaṇam | bhīmarūpamanirdeśyamapradhṛṣyatamaṃ vibhoḥ

महानागों से व्याप्त, सबको रोमांचित कर देने वाला, भयंकर रूप वाला, अवर्णनीय और विभु का अत्यन्त अजेय स्थान था।

श्लोक 24 (13.205.24)

तत्र भूतपतिं देवमासीनं शिखरोत्तमे । ऋषयो भूतसङ्घाश्च प्रणम्य शिरसा हरम् । गीर्भिः परमशुद्धाभिस्तुष्टुवुश्च मनोहरम् ॥

tatra bhūtapatiṃ devamāsīnaṃ śikharottame | ṛṣayo bhūtasaṅghāśca praṇamya śirasā haram | gīrbhiḥ paramaśuddhābhistuṣṭuvuśca manoharam

वहाँ श्रेष्ठ शिखर पर बैठे भूतपति देव को ऋषियों और भूतगणों ने शीश झुकाकर प्रणाम किया और परम शुद्ध वाणियों से उन मनोहर की स्तुति की।

श्लोक 25 (13.205.25)

विमुक्ताश्चैव पापेभ्यो बभूवुर्विगतज्वराः । ऋषयो बालखिल्याश्च तथा विप्रर्षयश्च ये ॥

vimuktāścaiva pāpebhyo babhūvurvigatajvarāḥ | ṛṣayo bālakhilyāśca tathā viprarṣayaśca ye

वे पापों से मुक्त और सन्ताप से रहित हो गए, वे बालखिल्य ऋषि और जो ब्राह्मण ऋषि वहाँ थे,

श्लोक 26 (13.205.26)

अयोनिजा योनिजाश्च तपःसिद्धा महर्षयः । ततस्तं देवदेवेशं भगवन्तमुपासते ॥

ayonijā yonijāśca tapaḥsiddhā maharṣayaḥ | tatastaṃ devadeveśaṃ bhagavantamupāsate

अयोनिज और योनिज दोनों, तप से सिद्ध महर्षि; और उन्होंने उन भगवान् देवाधिदेव की उपासना की।

श्लोक 27 (13.205.27)

ततस्तस्मिन्क्षणे देवी भूतस्त्रीगणसंवृता । हरतुल्याम्बरधरा समानव्रतचारिणी ॥

tatastasminkṣaṇe devī bhūtastrīgaṇasaṃvṛtā | haratulyāmbaradharā samānavratacāriṇī

उसी क्षण भूत-स्त्रियों के समूह से घिरी देवी, जो हर के समान वस्त्र पहने थीं और उन्हीं के समान व्रत का पालन करती थीं,

श्लोक 28 (13.205.28)

काञ्चनं कलशं गृह्य सर्वतीर्थाम्बुपूरितम् । पुष्पवृष्ट्याऽभिवर्षन्ती दिव्यगन्धसमावृता ॥

kāñcanaṃ kalaśaṃ gṛhya sarvatīrthāmbupūritam | puṣpavṛṣṭyā'bhivarṣantī divyagandhasamāvṛtā

सब तीर्थों के जल से भरा सोने का कलश लेकर, फूलों की वर्षा करती हुई, दिव्य सुगन्ध से घिरी हुई,

श्लोक 29 (13.205.29)

सरिद्वराभिः सर्वाभिः पृष्ठतोऽनुगता वरा । सेवितुं भगवत्पार्श्वमाजगाम शुचिस्मिता ॥

saridvarābhiḥ sarvābhiḥ pṛṣṭhato'nugatā varā | sevituṃ bhagavatpārśvamājagāma śucismitā

सब श्रेष्ठ नदियों के पीछे-पीछे आने पर, वह उत्तम, पवित्र मुस्कान वाली देवी भगवान् के पार्श्व की सेवा करने आईं।

श्लोक 30 (13.205.30)

आगम्य तु गिरेः पुत्री देवदेवस्य चान्तिकम् । मनःप्रियं चिकीर्षन्ती क्रीडार्थं शङ्करान्तिके ॥

āgamya tu gireḥ putrī devadevasya cāntikam | manaḥpriyaṃ cikīrṣantī krīḍārthaṃ śaṅkarāntike

पर्वत की पुत्री, देवों के देव के पास आकर, उनके मन को प्रिय करने की इच्छा से, शंकर के समीप खेल में,

श्लोक 31 (13.205.31)

मनोहराभ्यां पाणिभ्यां हरनेत्रे पिधाय तु । अवेक्ष्य हृष्टा स्वगणान्स्मयन्ती पृष्ठतः स्थिता ॥

manoharābhyāṃ pāṇibhyāṃ haranetre pidhāya tu | avekṣya hṛṣṭā svagaṇānsmayantī pṛṣṭhataḥ sthitā

अपने मनोहर हाथों से हर के नेत्र ढककर, प्रसन्न होकर अपने गणों को देखती हुई, मुस्कराती हुई उनके पीछे खड़ी रहीं।

श्लोक 32 (13.205.32)

देव्या चान्धीकृते देवे कश्मलं समपद्यत । निमीलिते भूतपतौ नष्टचन्द्रार्कतारकम् ॥

devyā cāndhīkṛte deve kaśmalaṃ samapadyata | nimīlite bhūtapatau naṣṭacandrārkatārakam

देवी द्वारा देव को अन्धा कर दिए जाने पर मूर्च्छा-सी छा गई। भूतपति के नेत्र बन्द होने पर चन्द्र, सूर्य और तारे लुप्त हो गए।

श्लोक 33 (13.205.33)

निःस्वाध्यायवषट्कारं तमसा चाभिसंवृतम् । विषण्णं भयवित्रस्तं जगदासीद्भयाकुलम् ॥

niḥsvādhyāyavaṣaṭkāraṃ tamasā cābhisaṃvṛtam | viṣaṇṇaṃ bhayavitrastaṃ jagadāsīdbhayākulam

स्वाध्याय और वषट्कार रुक गए, अन्धकार से घिरा संसार खिन्न, भय से त्रस्त और भयाकुल हो गया।

श्लोक 34 (13.205.34)

हाहाकारमृषीणां च लोकानामभवत्तदा । तमोभिभूते सम्भ्रान्ते लोके जीवनसंक्षये ॥

hāhākāramṛṣīṇāṃ ca lokānāmabhavattadā | tamobhibhūte sambhrānte loke jīvanasaṃkṣaye

तब ऋषियों और लोकों में हाहाकार मच गया, जब संसार अन्धकार से घिर गया, घबरा गया और उसके जीवन का नाश होने लगा।

श्लोक 35 (13.205.35)

तृतीयं चास्य सम्भूतं ललाटे नेत्रमायतम् । द्वादशादित्यसङ्काशं लोकान्भासाऽवभासयत् ॥

tṛtīyaṃ cāsya sambhūtaṃ lalāṭe netramāyatam | dvādaśādityasaṅkāśaṃ lokānbhāsā'vabhāsayat

और उनके ललाट पर बारह आदित्यों के समान तेजस्वी एक विशाल तीसरा नेत्र प्रकट हुआ, जिसने अपनी आभा से लोकों को प्रकाशित कर दिया।

श्लोक 36 (13.205.36)

तत्र तेनाग्निना तेन युगान्ताग्निनिभेन वै । अदह्यत गिरिः सर्वो हिमवानग्रतः स्थितः ॥

tatra tenāgninā tena yugāntāgninibhena vai | adahyata giriḥ sarvo himavānagrataḥ sthitaḥ

उस अग्नि से, जो युग के अन्त की अग्नि के समान थी, सामने खड़ा सारा हिमालय पर्वत जल उठा।

श्लोक 37 (13.205.37)

दह्यमाने गिरौ तस्मिन्मृगपक्षिसमाकुले । सविद्याधरगन्धर्वे दिव्यौषधसमाकुले ॥

dahyamāne girau tasminmṛgapakṣisamākule | savidyādharagandharve divyauṣadhasamākule

जब वह पर्वत जल रहा था, जो मृगों और पक्षियों से भरा था, विद्याधरों और गन्धर्वों से युक्त था और दिव्य ओषधियों से सम्पन्न था,

श्लोक 38 (13.205.38)

ततो गिरिसुता चापि विस्मयोत्फुल्ललोचना । बभूव च जगत्सर्वं तथा विस्मयसंयुतम् ॥

tato girisutā cāpi vismayotphullalocanā | babhūva ca jagatsarvaṃ tathā vismayasaṃyutam

तब पर्वत की पुत्री भी, विस्मय से फैली आँखों वाली, और उसके साथ सारा संसार विस्मय से भर गया।

श्लोक 39 (13.205.39)

पश्यतामेव सर्वेषां देवदानवरक्षसाम् । नेत्रजेनाग्निना तेन दग्ध एव नगोत्तमः ॥

paśyatāmeva sarveṣāṃ devadānavarakṣasām | netrajenāgninā tena dagdha eva nagottamaḥ

सब देवों, दानवों और राक्षसों के देखते-देखते, उस नेत्र से उत्पन्न अग्नि से वह श्रेष्ठ पर्वत जल गया।

श्लोक 40 (13.205.40)

तं दृष्ट्वा मथितं शैलं शैलपुत्री सविक्लवा । पितुः सम्मानमिच्छन्ती पपात भुवि पादयोः ॥

taṃ dṛṣṭvā mathitaṃ śailaṃ śailaputrī saviklavā | pituḥ sammānamicchantī papāta bhuvi pādayoḥ

उस पर्वत को मथा हुआ देखकर पर्वतपुत्री व्याकुल हो गईं और अपने पिता का मान चाहती हुई भगवान् के चरणों में भूमि पर गिर पड़ीं।

श्लोक 41 (13.205.41)

तं दृष्ट्वा देवदेवेशो देव्या दुःखमनुत्तमम् । हैमवत्याः प्रियार्थं च गिरिं पुनरवैक्षत ॥

taṃ dṛṣṭvā devadeveśo devyā duḥkhamanuttamam | haimavatyāḥ priyārthaṃ ca giriṃ punaravaikṣata

देवी का वह महान् दुःख देखकर देवों के देव ने हैमवती का प्रिय करने के लिए पर्वत को फिर देखा।

श्लोक 42 (13.205.42)

दृष्टमात्रे भगवता सौम्ययुक्तेन चेतसा । क्षणेन हिमवाञ्शैलः प्रकृतिस्थोऽभवत्पुनः ॥

dṛṣṭamātre bhagavatā saumyayuktena cetasā | kṣaṇena himavāñśailaḥ prakṛtistho'bhavatpunaḥ

सौम्य चित्त वाले भगवान् की दृष्टि पड़ते ही हिमालय पर्वत क्षण भर में फिर अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गया।

श्लोक 43 (13.205.43)

हृष्टपुष्टविहङ्गैश्च प्रफुल्लद्रुमकाननः । सिद्धचारणसङ्घैश्च प्रीतियुक्तैः समाकुलः ॥

hṛṣṭapuṣṭavihaṅgaiśca praphulladrumakānanaḥ | siddhacāraṇasaṅghaiśca prītiyuktaiḥ samākulaḥ

उसके पक्षी हर्षित और पुष्ट थे, उसके वन खिले हुए वृक्षों से भरे थे, और वह प्रसन्न सिद्धों और चारणों के समूहों से भरा था।

श्लोक 44 (13.205.44)

पितरं प्रकृतिस्थं च दृष्ट्वा हैमवती भृशम् । अभवत्प्रीतिसंयुक्ता मुदितात्र पिनाकिनम् ॥

pitaraṃ prakṛtisthaṃ ca dṛṣṭvā haimavatī bhṛśam | abhavatprītisaṃyuktā muditātra pinākinam

अपने पिता को अपनी स्वाभाविक स्थिति में देखकर हैमवती को बहुत आनन्द हुआ, और वे वहाँ पिनाकी के पास मुदित हुईं।

श्लोक 45 (13.205.45)

देवी विस्मयसंयुक्ता प्रष्टुकामा महेश्वरम् । हितार्थं सर्वलोकानां प्रजानां हितकाम्यया । देवदेवं महादेवी बभाषेदं वचोऽर्थवत् ॥

devī vismayasaṃyuktā praṣṭukāmā maheśvaram | hitārthaṃ sarvalokānāṃ prajānāṃ hitakāmyayā | devadevaṃ mahādevī babhāṣedaṃ vaco'rthavat

विस्मय से भरी देवी ने महेश्वर से पूछने की इच्छा से, सब लोकों के हित के लिए और प्रजाओं के कल्याण की कामना से, देवाधिदेव से ये अर्थपूर्ण वचन कहे।

उमोवाच

श्लोक 46 (13.205.46)

भगवन्देवदेवेश शूलपाणे महाद्युते । विस्मयो मे महाञ्जातस्तस्मिन्नेत्राग्निसम्भवे ॥

bhagavandevadeveśa śūlapāṇe mahādyute | vismayo me mahāñjātastasminnetrāgnisambhave

“भगवन्, देवों के देव, शूलपाणि, महातेजस्वी, आपके नेत्र से उत्पन्न उस अग्नि को देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ है।

श्लोक 47 (13.205.47)

किमर्थं देवदेवेश ललाटेऽस्मिन्प्रकाशते । अतिसूर्याग्निसङ्काशं तृतीयं नेत्रमायतम् ॥

kimarthaṃ devadeveśa lalāṭe'sminprakāśate | atisūryāgnisaṅkāśaṃ tṛtīyaṃ netramāyatam

हे देवों के देव, आपके ललाट पर यह सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, विशाल तीसरा नेत्र क्यों चमक रहा है?

श्लोक 48 (13.205.48)

नेत्राग्निना तु महता निर्दग्धो हिमवानसौ । पुनः संदृष्टमात्रस्तु प्रकृतिस्थः पिता मम ॥

netrāgninā tu mahatā nirdagdho himavānasau | punaḥ saṃdṛṣṭamātrastu prakṛtisthaḥ pitā mama

उस नेत्र की महान् अग्नि से हिमालय जल गया, और फिर देखे जाते ही मेरे पिता अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गए।

श्लोक 49 (13.205.49)

एष मे संशयो देव हृदि मे सम्प्रवर्तते । देवदेव नमस्तुभ्यं तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

eṣa me saṃśayo deva hṛdi me sampravartate | devadeva namastubhyaṃ tanme śaṃsitumarhasi

हे देव, यही संशय मेरे हृदय में उठ रहा है। हे देवों के देव, आपको नमस्कार; आप इसे मुझे समझाएँ।”

महादेव उवाच

श्लोक 50 (13.205.50)

एवमुक्तस्तया देव्या प्रीयमाणोऽब्रवीद्भवः । स्थाने संशयितुं देवि धर्मज्ञे प्रियभाषिणि ॥

evamuktastayā devyā prīyamāṇo'bravīdbhavaḥ | sthāne saṃśayituṃ devi dharmajñe priyabhāṣiṇi

देवी के इस प्रकार कहने पर प्रसन्न भव ने कहा: “हे धर्म को जानने वाली, प्रियभाषिणी देवी, संशय पूछना उचित है।

श्लोक 51 (13.205.51)

त्वदृते मां हि वै प्रष्टुं न शक्यं केन चेत्प्रिये । प्रकाशं यदि वा गुह्यं प्रियार्थं प्रब्रवीम्यहम् ॥

tvadṛte māṃ hi vai praṣṭuṃ na śakyaṃ kena cetpriye | prakāśaṃ yadi vā guhyaṃ priyārthaṃ prabravīmyaham

हे प्रिये, तुम्हारे सिवा मुझसे कोई नहीं पूछ सकता। चाहे प्रकट हो या गुप्त, मैं तुम्हारे प्रिय के लिए कहता हूँ।

श्लोक 52 (13.205.52)

शृणु तत्सर्वमखिलमस्यां संसदि भामिनि । सर्वेषामेव लोकानां कूटस्थं विद्धि मां प्रिये ॥

śṛṇu tatsarvamakhilamasyāṃ saṃsadi bhāmini | sarveṣāmeva lokānāṃ kūṭasthaṃ viddhi māṃ priye

हे भामिनि, इस सभा में वह सब पूरा सुनो। हे प्रिये, मुझे सब लोकों का कूटस्थ जानो।

श्लोक 53 (13.205.53)

मदधीनास्त्रयो लोका यथा विष्णौ तथा मयि । स्रष्टा विष्णुरहं गोप्ता इत्येतद्विद्धि भामिनि ॥

madadhīnāstrayo lokā yathā viṣṇau tathā mayi | sraṣṭā viṣṇurahaṃ goptā ityetadviddhi bhāmini

तीनों लोक मेरे अधीन हैं, जैसे विष्णु के अधीन हैं। विष्णु सृष्टा हैं और मैं रक्षक हूँ; हे भामिनि, यह जान लो।

श्लोक 54 (13.205.54)

तस्माद्यदा मां स्पृशति शुभं वा यदि वेतरत् । तथैवेदं जगत्सर्वं तत्तद्भवति शोभने ॥

tasmādyadā māṃ spṛśati śubhaṃ vā yadi vetarat | tathaivedaṃ jagatsarvaṃ tattadbhavati śobhane

इसलिए, हे शोभने, जब शुभ या उससे भिन्न कुछ भी मुझे स्पर्श करता है, तब यह सारा संसार वैसा ही हो जाता है।

श्लोक 55 (13.205.55)

एतद्गुह्यमजानन्त्या त्वया बाल्यादनिन्दिते । मन्नेत्रे पिहिते देवि क्रीडनार्थं दृढव्रते ॥

etadguhyamajānantyā tvayā bālyādanindite | mannetre pihite devi krīḍanārthaṃ dṛḍhavrate

हे निर्दोष, हे दृढ़व्रते, इस रहस्य को न जानती हुई तुमने बचपन के भाव से खेल में मेरी आँखें ढक दीं।

श्लोक 56 (13.205.56)

तत्कृते नष्टचन्द्रार्कं जगदासीद्भयाकुलम् । नष्टादित्ये तमोभूते लोके गिरिसुते प्रिये ॥

tatkṛte naṣṭacandrārkaṃ jagadāsīdbhayākulam | naṣṭāditye tamobhūte loke girisute priye

उसी कारण चन्द्र और सूर्य के लुप्त होने से संसार भय से भर गया; हे प्रिये गिरिपुत्री, सूर्य के नष्ट होने पर और लोक के अन्धकारमय होने पर,

श्लोक 57 (13.205.57)

तृतीयं लोचनं सृष्टं लोकं संरक्षितुं मया । कथितं संशयस्थानं निर्विशङ्का भव प्रिये ॥

tṛtīyaṃ locanaṃ sṛṣṭaṃ lokaṃ saṃrakṣituṃ mayā | kathitaṃ saṃśayasthānaṃ nirviśaṅkā bhava priye

मैंने लोक की रक्षा के लिए तीसरा नेत्र रचा। तुम्हारे संशय का कारण मैंने बता दिया; हे प्रिये, निर्भय हो जाओ।”

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