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अनुशासन पर्व · अध्याय 206

शिव के चार मुख, नीलकण्ठ, पिनाक धनुष और वृषभ

नारद उमा के प्रश्न और शिव के उत्तर सुनाते हैं। शिव बताते हैं कि सुन्द और उपसुन्द असुरों के नाश के लिए रची गई अप्सरा तिलोत्तमा को देखने के लिए उन्होंने चार मुख धारण किए; समुद्र-मन्थन में उठा विष पीने से उनका कण्ठ नीला हुआ; कण्व मुनि के सिर पर उगे बाँस से पिनाक धनुष बना; और घमण्डी गौओं पर उनके क्रोध को शान्त करने के कारण श्वेत बैल उनका वाहन बना।

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नारद उवाच

श्लोक 1 (13.206.1)

क्षणज्ञा देवदेवस्य श्रोतुकामा प्रियं हितम् । उमादेवी महादेवमपृच्छत्पुनरेव तु ॥

kṣaṇajñā devadevasya śrotukāmā priyaṃ hitam | umādevī mahādevamapṛcchatpunareva tu

उचित अवसर को जाननेवाली उमादेवी ने देवाधिदेव के मुख से प्रिय और हितकर बात सुनने की इच्छा से महादेव से फिर पूछा।

उमोवाच

श्लोक 2 (13.206.2)

भगवन्देवदेवेश सर्वदेवनमस्कृत । चतुर्मुखो वै भगवानभवत्केन हेतुना ॥

bhagavandevadeveśa sarvadevanamaskṛta | caturmukho vai bhagavānabhavatkena hetunā

"भगवन्, देवदेवेश्वर, सब देवताओं के वन्दनीय! आप भगवान् किस कारण से चार मुखवाले हुए?"

श्लोक 3 (13.206.3)

भगवन्केन ते वक्त्रमैन्द्रमद्भुतदर्शनम् । उत्तरं चापि भगवन्पश्चिमं शुभदर्शनम् । दक्षिणं च मुखं रौद्रं केनोर्ध्वं जटिलावृतम् ॥

bhagavankena te vaktramaindramadbhutadarśanam | uttaraṃ cāpi bhagavanpaścimaṃ śubhadarśanam | dakṣiṇaṃ ca mukhaṃ raudraṃ kenordhvaṃ jaṭilāvṛtam

"भगवन्! आपका यह इन्द्र-सम्बन्धी पूर्वमुख इतना अद्भुत क्यों है? उत्तर का मुख और पश्चिम का सुन्दर मुख ऐसे क्यों हैं? दक्षिण का मुख भयंकर क्यों है, और ऊपर का मुख जटाओं से घिरा हुआ क्यों है?"

श्लोक 4 (13.206.4)

यथादृशं महाभाग श्रोतुमिच्छामि कारणम् । एष मे संशयो देव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

yathādṛśaṃ mahābhāga śrotumicchāmi kāraṇam | eṣa me saṃśayo deva tanme śaṃsitumarhasi

"हे महाभाग! मैं इसका कारण जैसा है वैसा सुनना चाहती हूँ। हे देव! यही मेरा संशय है; आप इसे मुझे बताइए।"

महादेव उवाच

श्लोक 5 (13.206.5)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि यत्त्वमिच्छसि भामिनि । पुराऽसुरौ महाघोरौ लोकोद्वेगकरौ भृशम् ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi yattvamicchasi bhāmini | purā'surau mahāghorau lokodvegakarau bhṛśam

"हे भामिनी! तुम जो जानना चाहती हो, वह मैं तुम्हें बताऊँगा। प्राचीन काल में दो अत्यन्त भयंकर असुर थे, जो संसार को बहुत उद्विग्न किए रहते थे,"

श्लोक 6 (13.206.6)

सुन्दोपसुन्दनामानावासतुर्बलगर्वितौ । अशस्त्रवध्यौ बलिनौ परस्परहितैषिणौ ॥

sundopasundanāmānāvāsaturbalagarvitau | aśastravadhyau balinau parasparahitaiṣiṇau

"उनके नाम सुन्द और उपसुन्द थे, और वे अपने बल के घमण्ड में थे। वे शस्त्रों से अवध्य और बलवान् थे, तथा एक-दूसरे का हित चाहनेवाले थे।"

श्लोक 7 (13.206.7)

तयोरेव विनाशाय निर्मिता विश्वकर्मणा । सर्वतः सारमुद्धृत्य तिलशो लोकपूजिता । तिलोत्तमेति विख्याता अप्सराः सा बभूव ह ॥

tayoreva vināśāya nirmitā viśvakarmaṇā | sarvataḥ sāramuddhṛtya tilaśo lokapūjitā | tilottameti vikhyātā apsarāḥ sā babhūva ha

"उन्हीं दोनों के विनाश के लिए विश्वकर्मा ने सब वस्तुओं का सार तिल-तिल करके निकालकर एक अप्सरा रची। लोकों में पूजित वह अप्सरा तिलोत्तमा नाम से प्रसिद्ध हुई।"

श्लोक 8 (13.206.8)

देवकार्यं करिष्यन्ती हासभावसमन्विता । सा तपस्यन्तमागम्य रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥

devakāryaṃ kariṣyantī hāsabhāvasamanvitā | sā tapasyantamāgamya rūpeṇāpratimā bhuvi

"देवताओं का कार्य करने के उद्देश्य से, हास्य और भाव-भंगिमा से युक्त वह, पृथ्वी पर अनुपम रूपवाली, तप करते हुए मेरे पास आई।"

श्लोक 9 (13.206.9)

मया बहुमता चेयं देवकार्यं करिष्यति । इति मत्वा तदा चाहं कुर्वन्तीं मां प्रदक्षिणम् । तथैव तां दिदृक्षुश्च चतुर्वक्त्रोऽभवं प्रिये ॥

mayā bahumatā ceyaṃ devakāryaṃ kariṣyati | iti matvā tadā cāhaṃ kurvantīṃ māṃ pradakṣiṇam | tathaiva tāṃ didṛkṣuśca caturvaktro'bhavaṃ priye

"'यह मुझे मान्य है और देवताओं का कार्य सिद्ध करेगी'—ऐसा सोचकर, तथा मेरी प्रदक्षिणा करती हुई उसे उसी प्रकार देखने की इच्छा से, हे प्रिये, मैं चार मुखवाला हो गया।"

श्लोक 10 (13.206.10)

ऐन्द्रं मुखमिदं पूर्वं तपश्चर्यापरं सदा । दक्षिणं मे मुखं दिव्यं रौद्रं संहरति प्रजाः ॥

aindraṃ mukhamidaṃ pūrvaṃ tapaścaryāparaṃ sadā | dakṣiṇaṃ me mukhaṃ divyaṃ raudraṃ saṃharati prajāḥ

"मेरा यह पूर्वमुख, इन्द्र-सम्बन्धी, सदा तपस्या में लगा रहता है; और दक्षिण का दिव्य, भयंकर मुख प्राणियों का संहार करता है।"

श्लोक 11 (13.206.11)

लोककार्यपरं नित्यं पश्चिमं मे मुखं प्रिये । वेदानधीते सततमद्भुतं चोत्तरं मुखम् । एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

lokakāryaparaṃ nityaṃ paścimaṃ me mukhaṃ priye | vedānadhīte satatamadbhutaṃ cottaraṃ mukham | etatte sarvamākhyātaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

"हे प्रिये! मेरा पश्चिम का मुख सदा लोक-कार्य में लगा रहता है, और उत्तर का अद्भुत मुख निरन्तर वेदों का पाठ करता है। यह सब तुम्हें बता दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?"

उमोवाच

श्लोक 12 (13.206.12)

भगवञ्श्रोतुमिच्छामि शूलपाणे वरप्रद । किमर्थं नीलता कण्ठे भाति बर्हिनिभा तव ॥

bhagavañśrotumicchāmi śūlapāṇe varaprada | kimarthaṃ nīlatā kaṇṭhe bhāti barhinibhā tava

"हे शूलपाणि, वर देनेवाले भगवन्! मैं सुनना चाहती हूँ कि आपके कण्ठ में मोर के पंख के समान चमकता हुआ यह नीलापन किसलिए है?"

महेश्वर उवाच

श्लोक 13 (13.206.13)

एतत्ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता ॥

etatte kathayiṣyāmi śṛṇu devi samāhitā

"यह मैं तुम्हें बताऊँगा; हे देवी, ध्यान से सुनो।"

श्लोक 14 (13.206.14)

पुरा युगान्तरे यत्नादमृतार्थं सुरासुरैः । बलवद्भिर्विमथितश्चिरकालं महोदधिः ॥

purā yugāntare yatnādamṛtārthaṃ surāsuraiḥ | balavadbhirvimathitaścirakālaṃ mahodadhiḥ

"प्राचीन काल में एक युग के बदलने पर बलवान् देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए बड़े यत्न से बहुत समय तक महासागर का मन्थन किया।"

श्लोक 15 (13.206.15)

रज्जुना नागराजेन मथ्यमाने महोदधौ । विषं तत्र समुद्भूतं सर्वलोकविनाशनम् ॥

rajjunā nāgarājena mathyamāne mahodadhau | viṣaṃ tatra samudbhūtaṃ sarvalokavināśanam

"नागराज को रस्सी बनाकर जब महासागर का मन्थन हो रहा था, तब उसमें से सब लोकों का नाश करनेवाला विष उत्पन्न हुआ।"

श्लोक 16 (13.206.16)

तद्दृष्ट्वा विबुधाः सर्वे तदा विमनसोऽभवन् । ग्रस्तं हि तन्मया देवि लोकानां हितकारणात् ॥

taddṛṣṭvā vibudhāḥ sarve tadā vimanaso'bhavan | grastaṃ hi tanmayā devi lokānāṃ hitakāraṇāt

"उसे देखकर सब देवता उदास हो गए। तब हे देवी, लोकों के हित के लिए मैंने उसे पी लिया।"

श्लोक 17 (13.206.17)

तत्कृता नीलता चासीत्कण्ठे बर्हिनिभा शुभे । तदाप्रभृति चैवाहं नीलकण्ठ इति स्मृतः । एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

tatkṛtā nīlatā cāsītkaṇṭhe barhinibhā śubhe | tadāprabhṛti caivāhaṃ nīlakaṇṭha iti smṛtaḥ | etatte sarvamākhyātaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

"उसी से मेरे कण्ठ में मोर के पंख जैसा नीलापन हो गया, हे शुभे; और तभी से मैं नीलकण्ठ कहलाता हूँ। यह सब तुम्हें बता दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?"

उमोवाच

श्लोक 18 (13.206.18)

नीलकण्ठ नमस्तेऽस्तु सर्वलोकसुखावह । बहूनामायुधानां त्वं पिनाकं धर्तुमिच्छसि । किमर्थं देवदेवेश तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

nīlakaṇṭha namaste'stu sarvalokasukhāvaha | bahūnāmāyudhānāṃ tvaṃ pinākaṃ dhartumicchasi | kimarthaṃ devadeveśa tanme śaṃsitumarhasi

"हे नीलकण्ठ, समस्त लोकों को सुख देनेवाले! आपको नमस्कार है। बहुत-से आयुधों में से आप पिनाक धनुष को ही धारण करना चाहते हैं—हे देवदेवेश, ऐसा क्यों? यह मुझे बताइए।"

महेश्वर उवाच

श्लोक 19 (13.206.19)

शस्त्रागमं ते वक्ष्यामि शृणु धर्म्यं शुचिस्मिते । युगान्तरे महादेवि कण्वो नाम महामुनिः ॥

śastrāgamaṃ te vakṣyāmi śṛṇu dharmyaṃ śucismite | yugāntare mahādevi kaṇvo nāma mahāmuniḥ

"हे शुचिस्मिते! मैं तुम्हें शस्त्रों की उत्पत्ति बताऊँगा; यह धर्मयुक्त कथा सुनो। हे महादेवी! एक युग के बदलने पर कण्व नाम के एक महामुनि थे।"

श्लोक 20 (13.206.20)

स हि दिव्यां तपश्चर्यां कर्तुमेवोपचक्रमे । तथा तस्य तपो घोरं चरतः कालपर्ययात् । वल्मीकं पुनरुद्भूतं तस्यैव शिरसि प्रिये ॥

sa hi divyāṃ tapaścaryāṃ kartumevopacakrame | tathā tasya tapo ghoraṃ carataḥ kālaparyayāt | valmīkaṃ punarudbhūtaṃ tasyaiva śirasi priye

"उन्होंने दिव्य तपस्या आरम्भ की। इस प्रकार घोर तप करते हुए, समय बीतने पर, हे प्रिये, उनके सिर पर ही फिर से एक बाँबी उठ आई।"

श्लोक 21 (13.206.21)

वेणुर्वल्मीकसंयोगान्मूर्ध्नि तस्य बभूव ह । धरमाणश्च तत्सर्वं तपश्चर्यां तथाऽकरोत् ॥

veṇurvalmīkasaṃyogānmūrdhni tasya babhūva ha | dharamāṇaśca tatsarvaṃ tapaścaryāṃ tathā'karot

"उस बाँबी के संयोग से उनके सिर पर बाँस उग आया। यह सब सिर पर धारण किए हुए ही वे तपस्या करते रहे।"

श्लोक 22 (13.206.22)

तस्मै ब्रह्मा वरं दातुं जगाम तपसार्चितः । दत्त्वा तस्मै वरं देवो वेणुं दृष्ट्वा त्वचिन्तयत् ॥

tasmai brahmā varaṃ dātuṃ jagāma tapasārcitaḥ | dattvā tasmai varaṃ devo veṇuṃ dṛṣṭvā tvacintayat

"उनके तप से सम्मानित होकर ब्रह्मा उन्हें वर देने गए। वर देकर उस देव ने बाँस को देखा और विचार किया।"

श्लोक 23 (13.206.23)

लोककार्यं समुद्दिश्य वेणुनाऽनेन भामिनि । चिन्तयित्वा तमादाय कार्मुकार्थे न्ययोजयत् ॥

lokakāryaṃ samuddiśya veṇunā'nena bhāmini | cintayitvā tamādāya kārmukārthe nyayojayat

"हे भामिनी! लोक के कार्य को ध्यान में रखकर उसने इस बाँस के विषय में सोचा, और उसे लेकर धनुष बनाने के काम में लगा दिया।"

श्लोक 24 (13.206.24)

विष्णोर्मम च सामर्थ्यं ज्ञात्वा लोकपितामहः । धनुषी द्वे तदा प्रादाद्विष्णवे च ममैव च ॥

viṣṇormama ca sāmarthyaṃ jñātvā lokapitāmahaḥ | dhanuṣī dve tadā prādādviṣṇave ca mamaiva ca

"विष्णु और मेरी सामर्थ्य को जानकर लोकपितामह ने तब दो धनुष दिए—एक विष्णु को और एक मुझको।"

श्लोक 25 (13.206.25)

पिनाकं नाम मे चापं शार्ङ्गं नाम हरेर्धनुः । तृतीयमवशेषेण गाण्डीवमभवद्धनुः ॥

pinākaṃ nāma me cāpaṃ śārṅgaṃ nāma harerdhanuḥ | tṛtīyamavaśeṣeṇa gāṇḍīvamabhavaddhanuḥ

"मेरे धनुष का नाम पिनाक है और हरि के धनुष का नाम शार्ङ्ग। जो शेष बचा, उससे तीसरा धनुष गाण्डीव बना।"

श्लोक 26 (13.206.26)

तच्च सोमाय निर्दिश्य ब्रह्मा लोकं गतः पुनः । एतत्ते सर्वमाख्यातं शस्त्रागममनिन्दिते ॥

tacca somāya nirdiśya brahmā lokaṃ gataḥ punaḥ | etatte sarvamākhyātaṃ śastrāgamamanindite

"उसे सोम को सौंपकर ब्रह्मा फिर अपने लोक को चले गए। हे अनिन्दिते! शस्त्रों की उत्पत्ति की यह सारी कथा तुम्हें बता दी।"

उमोवाच

श्लोक 27 (13.206.27)

भगवन्देवदेवेश पिनाकपरमप्रिय । वाहनेषु तथाऽन्येषु सत्सु भूतपते तव ॥

bhagavandevadeveśa pinākaparamapriya | vāhaneṣu tathā'nyeṣu satsu bhūtapate tava

"हे भगवन्, देवदेवेश, पिनाक के परम प्रेमी, भूतपति! आपके और भी वाहन होते हुए,"

श्लोक 28 (13.206.28)

अयं तु वृषभः कस्माद्वाहनं स यथाऽभवत् । एष मे संशयो देव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

ayaṃ tu vṛṣabhaḥ kasmādvāhanaṃ sa yathā'bhavat | eṣa me saṃśayo deva tanme śaṃsitumarhasi

"यह बैल ही आपका वाहन कैसे और क्यों हुआ? हे देव! यह मेरा संशय है; आप इसे मुझे बताइए।"

महादेव उवाच

श्लोक 29 (13.206.29)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि वाहनं स यथाऽभवत् ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi vāhanaṃ sa yathā'bhavat

"वह मेरा वाहन कैसे बना, यह मैं तुम्हें बताऊँगा।"

श्लोक 30 (13.206.30)

आदिसर्गे पुरा गावः श्वेतवर्णाः शुचिस्मिते । बलसंहनना गावो दर्पयुक्ताश्चरन्ति ताः ॥

ādisarge purā gāvaḥ śvetavarṇāḥ śucismite | balasaṃhananā gāvo darpayuktāścaranti tāḥ

"हे शुचिस्मिते! सृष्टि के आदि में, प्राचीन काल में, गौएँ श्वेत रंग की थीं। वे बलिष्ठ देहवाली और घमण्ड से भरी हुई विचरती थीं।"

श्लोक 31 (13.206.31)

अहं तु तप आतिष्ठं तस्मिन्काले शुभानने । एकपादश्चोर्ध्वबाहुर्लोकार्थं हिमवद्गिरौ ॥

ahaṃ tu tapa ātiṣṭhaṃ tasminkāle śubhānane | ekapādaścordhvabāhurlokārthaṃ himavadgirau

"हे शुभानने! उस समय मैं लोक के हित के लिए हिमालय पर्वत पर एक पैर से खड़ा और भुजाएँ ऊपर उठाए तप कर रहा था।"

श्लोक 32 (13.206.32)

गावो मे पार्श्वमागम्य दर्पोत्सिक्ताः समन्ततः । स्थानभ्रंशं तदा देवि चक्रिरे बहुशस्तदा ॥

gāvo me pārśvamāgamya darpotsiktāḥ samantataḥ | sthānabhraṃśaṃ tadā devi cakrire bahuśastadā

"गौएँ घमण्ड में चूर होकर चारों ओर से मेरे पास आ गईं, और हे देवी, उन्होंने मुझे बार-बार मेरे स्थान से हटा दिया।"

श्लोक 33 (13.206.33)

अपचारेण वै तासां मनःक्षोभोऽभवन्मम । तस्माद्दग्धा यदा गावो रोषाविष्टेन चेतसा ॥

apacāreṇa vai tāsāṃ manaḥkṣobho'bhavanmama | tasmāddagdhā yadā gāvo roṣāviṣṭena cetasā

"उनके इस अनुचित आचरण से मेरा मन क्षुब्ध हो गया, और क्रोध से भरे चित्त से मैंने उन गौओं को जला दिया।"

श्लोक 34 (13.206.34)

तस्मिंस्तु व्यसने घोरे वर्तमाने पशून्प्रति । अनेन वृषभेणाहं शमितः सम्प्रसादनैः ॥

tasmiṃstu vyasane ghore vartamāne paśūnprati | anena vṛṣabheṇāhaṃ śamitaḥ samprasādanaiḥ

"पशुओं पर आई उस भयंकर विपत्ति के बीच इसी बैल ने मुझे शान्त करनेवाले उपायों से शान्त किया।"

श्लोक 35 (13.206.35)

तदाप्रभृति शान्ताश्च वर्णभेदत्वमागताः । श्वेतोऽयं वृषभो देवि पूर्वसंस्कारसंयुतः । वाहनत्वे ध्वजत्वे मे तदाप्रभृति योजितः ॥

tadāprabhṛti śāntāśca varṇabhedatvamāgatāḥ | śveto'yaṃ vṛṣabho devi pūrvasaṃskārasaṃyutaḥ | vāhanatve dhvajatve me tadāprabhṛti yojitaḥ

"तभी से वे शान्त हो गईं और उनमें रंगों का भेद आ गया। हे देवी! यह श्वेत बैल अपने पूर्व संस्कार को लिए हुए ही उसी समय से मेरा वाहन और मेरी ध्वजा बना दिया गया।"

श्लोक 36 (13.206.36)

तस्मान्मे गोपतित्वं च देवैर्गोभिश्च कल्पितम् । प्रसन्नश्चाभवं देवि तदा गोपतितां गतः ॥

tasmānme gopatitvaṃ ca devairgobhiśca kalpitam | prasannaścābhavaṃ devi tadā gopatitāṃ gataḥ

"इसीलिए देवताओं ने और गौओं ने मुझे गोपति ठहराया; और हे देवी, मैं प्रसन्न हुआ और तब गोपति के पद को प्राप्त हुआ।"

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