अनुशासन पर्व · अध्याय 207
शिव का श्मशान-वास और चन्द्रमा को धारण करना
नारद उमा और शिव का संवाद आगे सुनाते हैं। शिव बताते हैं कि वे श्मशान में इसलिए रहते हैं कि ब्रह्मा के कहने पर उन्होंने भयंकर भूतगणों को वहीं बसाकर रोका; उनका आग्नेय रूप विष्णु के सौम्य रूप के साथ मिलकर लोकों को धारण करता है; और दक्ष-यज्ञ में सोम को ठोकर मारने के प्रायश्चित्त के रूप में वे उसे मस्तक पर धारण करते हैं। ऋषि उनकी स्तुति करते हैं और उमा उनसे वर्णों और आश्रमों के धर्म बताने को कहती हैं।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.207.1)
भगवन्सर्वभूतेश शूलपाणे वृषध्वज । आवासेषु विचित्रेषु रम्येषु च शुभेषु च ॥
bhagavansarvabhūteśa śūlapāṇe vṛṣadhvaja | āvāseṣu vicitreṣu ramyeṣu ca śubheṣu ca
"हे सब भूतों के स्वामी, शूलपाणि, वृषध्वज! विचित्र, रमणीय और सुन्दर आवासों के होते हुए,"
श्लोक 2 (13.207.2)
सत्सु चान्येषु भूतेषु श्मशाने रमसे कथम् । केशास्थिकलिले भीमे कपालशतसङ्कुले ॥
satsu cānyeṣu bhūteṣu śmaśāne ramase katham | keśāsthikalile bhīme kapālaśatasaṅkule
"और दूसरे प्राणियों के रहते हुए भी, आप केश और हड्डियों के कीचड़ से भरे, भीषण, सैकड़ों कपालों से पटे हुए श्मशान में कैसे रमते हैं,"
श्लोक 3 (13.207.3)
सृगालगृध्रसम्पूर्णे शवधूमसमाकुले । चिताग्निविषमे घोरे गहने च भयानके ॥
sṛgālagṛdhrasampūrṇe śavadhūmasamākule | citāgniviṣame ghore gahane ca bhayānake
"जो सियारों और गिद्धों से भरा है, शवों के धुएँ से व्याप्त है, चिताओं की आग से ऊबड़-खाबड़ है, घोर, गहन और भयानक है?"
श्लोक 4 (13.207.4)
एवं कलेवरक्षेत्रे दुर्दर्शे रमसे कथम् । एष मे संशयो देव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
evaṃ kalevarakṣetre durdarśe ramase katham | eṣa me saṃśayo deva tanme śaṃsitumarhasi
"इस प्रकार के, देखने में कठिन, शरीरों के क्षेत्र में आप कैसे रमते हैं? हे देव! यही मेरा संशय है; आप इसे मुझे बताइए।"
महादेव उवाच
श्लोक 5 (13.207.5)
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता । आवासार्थं पुरा देवि शुद्धान्वेषी शुचिस्मिते ॥
hanta te kathayiṣyāmi śṛṇu devi samāhitā | āvāsārthaṃ purā devi śuddhānveṣī śucismite
"अच्छा, मैं तुम्हें बताता हूँ; हे देवी, ध्यान से सुनो। हे शुचिस्मिते! पूर्वकाल में रहने के लिए मैं एक शुद्ध स्थान खोज रहा था,"
श्लोक 6 (13.207.6)
नाध्यगच्छं चिरं कालं देशं शुचितमं शुभे । एष मेऽभिनिवेशोऽभूत्तस्मिन्काले प्रजापतिः ॥
nādhyagacchaṃ ciraṃ kālaṃ deśaṃ śucitamaṃ śubhe | eṣa me'bhiniveśo'bhūttasminkāle prajāpatiḥ
"पर हे शुभे! बहुत समय तक मुझे अत्यन्त पवित्र कोई स्थान नहीं मिला। यही मेरा दृढ़ संकल्प था। उसी समय प्रजापति की सृष्टि में"
श्लोक 7 (13.207.7)
आकुलः सुमहाघोरः प्रादुरासीत्समन्ततः । सम्भूता भूतसृष्टिश्च घोरा लोकभयावहा ॥
ākulaḥ sumahāghoraḥ prādurāsītsamantataḥ | sambhūtā bhūtasṛṣṭiśca ghorā lokabhayāvahā
"चारों ओर अत्यन्त भयंकर उथल-पुथल प्रकट हुई, और भूतों की एक सृष्टि उत्पन्न हुई, जो घोर थी और लोक में भय फैलानेवाली थी।"
श्लोक 8 (13.207.8)
नानावर्णा विरूपाश्च तीक्ष्णदंष्ट्राः प्रहारिणः । पिशाचरक्षोवदनाः प्राणिनां प्राणहारिणः । इतश्चरन्ति निघ्नन्तः प्राणिनो भृशमेव च ॥
nānāvarṇā virūpāśca tīkṣṇadaṃṣṭrāḥ prahāriṇaḥ | piśācarakṣovadanāḥ prāṇināṃ prāṇahāriṇaḥ | itaścaranti nighnantaḥ prāṇino bhṛśameva ca
"वे अनेक रंगों के और विकृत रूपवाले थे, उनकी दाढ़ें तीखी थीं, वे प्रहार करनेवाले थे, उनके मुख पिशाचों और राक्षसों जैसे थे, और वे प्राणियों के प्राण हर लेते थे। वे इधर-उधर घूमते हुए प्राणियों का बुरी तरह संहार करते थे।"
श्लोक 9 (13.207.9)
एवं लोके प्राणिहीने क्षयं याते पितामहः । चिन्तयंस्तत्प्रतीकारं मां च शक्तं हि निग्रहे ॥
evaṃ loke prāṇihīne kṣayaṃ yāte pitāmahaḥ | cintayaṃstatpratīkāraṃ māṃ ca śaktaṃ hi nigrahe
"इस प्रकार लोक के प्राणियों से रहित होकर विनाश की ओर जाने पर पितामह उसका उपाय सोचने लगे, और उन्होंने जाना कि मैं उन्हें रोकने में समर्थ हूँ।"
श्लोक 10 (13.207.10)
एवं ज्ञात्वा ततो ब्रह्मा तस्मिन्कर्मण्योजयत् । तच्च प्राणिहितार्थं तु मयाऽप्यनुमतं प्रिये ॥
evaṃ jñātvā tato brahmā tasminkarmaṇyojayat | tacca prāṇihitārthaṃ tu mayā'pyanumataṃ priye
"यह जानकर ब्रह्मा ने मुझे उस कार्य में नियुक्त किया; और हे प्रिये, प्राणियों के हित के लिए मैंने भी उसे स्वीकार किया।"
श्लोक 11 (13.207.11)
तस्मात्संरक्षिता देवि भूतेभ्यः प्राणिनो भयात् । अस्माच्छ्मशानान्मेध्यं तु नास्ति किञ्चिदनिन्दिते । निःसम्पातान्मनुष्याणां तस्माच्छुचितमं स्मृतं ॥
tasmātsaṃrakṣitā devi bhūtebhyaḥ prāṇino bhayāt | asmācchmaśānānmedhyaṃ tu nāsti kiñcidanindite | niḥsampātānmanuṣyāṇāṃ tasmācchucitamaṃ smṛtaṃ
"इस प्रकार हे देवी, उन भूतों के भय से प्राणियों की रक्षा हुई। हे अनिन्दिते! इस श्मशान से बढ़कर पवित्र कुछ भी नहीं है; यहाँ मनुष्यों का आना-जाना नहीं होता, इसलिए इसे सबसे अधिक पवित्र माना गया है।"
श्लोक 12 (13.207.12)
भूतसृष्टिं च तां चाहं श्मशाने संन्यवेशयम् । तत्रस्थः सर्वभूतानां विनिहन्मि प्रिये भयम् ॥
bhūtasṛṣṭiṃ ca tāṃ cāhaṃ śmaśāne saṃnyaveśayam | tatrasthaḥ sarvabhūtānāṃ vinihanmi priye bhayam
"उस भूत-सृष्टि को मैंने श्मशान में बसा दिया; हे प्रिये, वहाँ रहकर मैं सब प्राणियों का भय दूर करता हूँ।"
श्लोक 13 (13.207.13)
न च भूतगणेनाहं विना वसितुमुत्सहे । तस्मान्मे सन्निवासाय श्मशाने रोचते मनः ॥
na ca bhūtagaṇenāhaṃ vinā vasitumutsahe | tasmānme sannivāsāya śmaśāne rocate manaḥ
"मैं भूतगणों के बिना नहीं रह सकता; इसीलिए श्मशान में निवास करना मेरे मन को अच्छा लगता है।"
श्लोक 14 (13.207.14)
मेध्यकामैर्द्विजैर्नित्यं मेध्यमित्यभिधीयते । आचरद्भिर्व्रतं नित्यं मोक्षकामैश्च सेव्यते ॥
medhyakāmairdvijairnityaṃ medhyamityabhidhīyate | ācaradbhirvrataṃ nityaṃ mokṣakāmaiśca sevyate
"पवित्रता चाहनेवाले द्विज उसे सदा पवित्र कहते हैं, और नित्य व्रत का आचरण करनेवाले तथा मोक्ष चाहनेवाले उसका सेवन करते हैं।"
श्लोक 15 (13.207.15)
स्थानं मे तत्र विहितं वीरस्थानमिति प्रिये । कपालशतसम्पूर्णमभिरूपं भयानकम् ॥
sthānaṃ me tatra vihitaṃ vīrasthānamiti priye | kapālaśatasampūrṇamabhirūpaṃ bhayānakam
"हे प्रिये! वहाँ मेरे लिए 'वीरस्थान' नाम का एक स्थान निश्चित किया गया है--सैकड़ों कपालों से भरा, उपयुक्त होते हुए भी भयानक।"
श्लोक 16 (13.207.16)
मध्याह्ने सन्ध्ययोस्तत्र नक्षत्रे रुद्रदेवते । आयुष्कामैरशुद्धैर्वा न गन्तव्यमिति स्थितिः ॥
madhyāhne sandhyayostatra nakṣatre rudradevate | āyuṣkāmairaśuddhairvā na gantavyamiti sthitiḥ
"यह नियम है कि मध्याह्न में, दोनों सन्ध्याओं में, और रुद्र-देवतावाले नक्षत्र में वहाँ कोई न जाए--न दीर्घायु चाहनेवाला, न अशुद्ध व्यक्ति।"
श्लोक 17 (13.207.17)
मदन्येन न शक्यं हि निहन्तुं भूतजं भयम् । तत्रस्थोऽहं प्रजाः सर्वाः पालयामि दिनेदिने ॥
madanyena na śakyaṃ hi nihantuṃ bhūtajaṃ bhayam | tatrastho'haṃ prajāḥ sarvāḥ pālayāmi dinedine
"भूतों से उत्पन्न होनेवाले भय को मेरे सिवा कोई नष्ट नहीं कर सकता। वहाँ रहकर मैं प्रतिदिन सब प्रजा की रक्षा करता हूँ।"
श्लोक 18 (13.207.18)
मन्नियोगाद्भूतसङ्घा न च घ्नन्तीह कञ्चन । तांस्तु लोकहितार्ताय श्मशाने रमयाम्यहम् । एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
manniyogādbhūtasaṅghā na ca ghnantīha kañcana | tāṃstu lokahitārtāya śmaśāne ramayāmyaham | etatte sarvamākhyātaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
"मेरी आज्ञा से भूतगण यहाँ किसी को हानि नहीं पहुँचाते। लोक के हित के लिए मैं उन्हें श्मशान में रमाए रखता हूँ। यह सब तुम्हें बता दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?"
उमोवाच
श्लोक 19 (13.207.19)
भगवन्देवदेवेश त्रिनेत्र वृषभध्वज । पिङ्गलं विकृतं भाति रूपं ते तु भयानकम् ॥
bhagavandevadeveśa trinetra vṛṣabhadhvaja | piṅgalaṃ vikṛtaṃ bhāti rūpaṃ te tu bhayānakam
"हे भगवन्, देवदेवेश, त्रिनेत्र, वृषभध्वज! आपका रूप पीला-भूरा, विकृत और भयानक दिखाई देता है,"
श्लोक 20 (13.207.20)
भस्मदिग्धं विरूपाक्षं तीक्ष्णदंष्ट्रं जटाकुलम् । व्याघ्रोदरत्वक्संवीतं कपिलश्मश्रुसंततम् ॥
bhasmadigdhaṃ virūpākṣaṃ tīkṣṇadaṃṣṭraṃ jaṭākulam | vyāghrodaratvaksaṃvītaṃ kapilaśmaśrusaṃtatam
"भस्म से लिपा हुआ, विचित्र नेत्रोंवाला, तीखी दाढ़ोंवाला, जटाओं से भरा हुआ, बाघ के पेट की खाल ओढ़े हुए और पीली-भूरी दाढ़ी-मूँछ से ढका हुआ,"
श्लोक 21 (13.207.21)
रौद्रं भयानकं घोरं शूलपट्टससंयुतम् । किमर्थं त्वीदृशं रूपं तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
raudraṃ bhayānakaṃ ghoraṃ śūlapaṭṭasasaṃyutam | kimarthaṃ tvīdṛśaṃ rūpaṃ tanme śaṃsitumarhasi
"रौद्र, भयानक, घोर, शूल और पट्टिश धारण किए हुए। आपका ऐसा रूप किसलिए है? यह मुझे बताइए।"
महेश्वर उवाच
श्लोक 22 (13.207.22)
तदहं कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता । द्विविधो लौकिको भावः शीतमुष्णमिति प्रिये ॥
tadahaṃ kathayiṣyāmi śṛṇu tattvaṃ samāhitā | dvividho laukiko bhāvaḥ śītamuṣṇamiti priye
"मैं बताऊँगा; ध्यान से इस तत्त्व को सुनो। हे प्रिये! संसार की अवस्था दो प्रकार की है--शीत और उष्ण।"
श्लोक 23 (13.207.23)
तयोर्हि ग्रसितं सर्वं सौम्याग्नेयमिदं जगत् ॥
tayorhi grasitaṃ sarvaṃ saumyāgneyamidaṃ jagat
"इन्हीं दोनों ने सब कुछ ग्रस रखा है; यह जगत् सौम्य और आग्नेय दोनों से बना है।"
श्लोक 24 (13.207.24)
सौम्यत्वं सततं विष्णौ मय्याग्नेयं प्रतिष्ठितम् । अनेन वपुषा नित्यं सर्वलोकान्बिभर्म्यहम् ॥
saumyatvaṃ satataṃ viṣṇau mayyāgneyaṃ pratiṣṭhitam | anena vapuṣā nityaṃ sarvalokānbibharmyaham
"सौम्य भाव सदा विष्णु में स्थित है और आग्नेय भाव मुझमें। इस शरीर से मैं सदा सब लोकों को धारण करता हूँ।"
श्लोक 25 (13.207.25)
रौद्राकृतिं विरूपाक्षं शूलपट्टससंयुतम् । आग्नेयमिति मे रूपं देवि लोकहिते रतम् ॥
raudrākṛtiṃ virūpākṣaṃ śūlapaṭṭasasaṃyutam | āgneyamiti me rūpaṃ devi lokahite ratam
"भयंकर आकृतिवाला, विचित्र नेत्रोंवाला, शूल और पट्टिश से युक्त मेरा यह रूप आग्नेय है, हे देवी, और लोक के हित में लगा हुआ है।"
श्लोक 26 (13.207.26)
यद्यहं विपरीतः स्यामेतत्त्यक्त्वा शुभानने । तदैव सर्वलोकानां विपरीतं प्रवर्तते ॥
yadyahaṃ viparītaḥ syāmetattyaktvā śubhānane | tadaiva sarvalokānāṃ viparītaṃ pravartate
"हे शुभानने! यदि मैं इसे छोड़कर इसके विपरीत हो जाऊँ, तो उसी क्षण सब लोकों का सब कुछ उलटा चलने लगे।"
श्लोक 27 (13.207.27)
तस्मान्मयेदं ध्रियते रूपं लोकहितैषिणा । इति ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
tasmānmayedaṃ dhriyate rūpaṃ lokahitaiṣiṇā | iti te kathitaṃ devi kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
"इसीलिए लोक का हित चाहनेवाला मैं यह रूप धारण करता हूँ। हे देवी, यह तुम्हें बता दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?"
उमोवाच
श्लोक 28 (13.207.28)
भगवन्देवदेवेश शूलपाणे वृषध्वज । किमर्थं चन्द्ररेखा ते शिरोभागे विरोचते । श्रोतुमिच्छाम्यहं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavandevadeveśa śūlapāṇe vṛṣadhvaja | kimarthaṃ candrarekhā te śirobhāge virocate | śrotumicchāmyahaṃ deva tanme śaṃsitumarhasi
"हे भगवन्, देवदेवेश, शूलपाणि, वृषध्वज! आपके मस्तक पर चन्द्रमा की यह कला किसलिए शोभित होती है? हे देव! मैं यह सुनना चाहती हूँ; आप मुझे बताइए।"
महेश्वर उवाच
श्लोक 29 (13.207.29)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् । पुराऽहं कारणाद्देवि कोपयुक्तः शुचिस्मिते । दक्षयज्ञवधार्थाय भूतसङ्घैः समावृतः ॥
tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu kalyāṇi kāraṇam | purā'haṃ kāraṇāddevi kopayuktaḥ śucismite | dakṣayajñavadhārthāya bhūtasaṅghaiḥ samāvṛtaḥ
"हे कल्याणी! मैं तुम्हें उसका कारण बताता हूँ, सुनो। हे शुचिस्मिते! पूर्वकाल में एक कारण से मैं क्रोध से भर गया था, और भूतगणों से घिरा हुआ दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने गया।"
श्लोक 30 (13.207.30)
तस्मिन्क्रतुवरे घोरे यज्ञभागनिमित्ततः । देवा विभ्रंशितास्ते वै येषां भागः क्रतौ कृतः ॥
tasminkratuvare ghore yajñabhāganimittataḥ | devā vibhraṃśitāste vai yeṣāṃ bhāgaḥ kratau kṛtaḥ
"उस भयंकर, श्रेष्ठ यज्ञ में यज्ञ-भाग के प्रश्न पर, जिन देवताओं के लिए यज्ञ में भाग निश्चित किया गया था, वे अपने स्थान से गिरा दिए गए।"
श्लोक 31 (13.207.31)
सोमस्तत्र मया देवि कुपितेन भृशार्दितः । पश्यंश्चानपराधी सन्पादङ्गुष्ठेन ताडितः ॥
somastatra mayā devi kupitena bhṛśārditaḥ | paśyaṃścānaparādhī sanpādaṅguṣṭhena tāḍitaḥ
"हे देवी! वहाँ मैंने क्रोध में सोम को बहुत पीड़ित किया; वह निरपराध था और केवल देख रहा था, फिर भी मैंने उसे पैर के अँगूठे से ठोकर मार दी।"
श्लोक 32 (13.207.32)
तथापि विकृतेनाहं सामपूर्वं प्रसादितः । तन्मे चिन्तयतश्चासीत्पश्चात्तापः पुरा प्रिये ॥
tathāpi vikṛtenāhaṃ sāmapūrvaṃ prasāditaḥ | tanme cintayataścāsītpaścāttāpaḥ purā priye
"फिर भी, उस विकृत अवस्था में भी, उसने पहले मीठे वचनों से मुझे प्रसन्न किया। हे प्रिये! बाद में उस बात को सोचते हुए मुझे पश्चात्ताप हुआ।"
श्लोक 33 (13.207.33)
तदाप्रभृति सोमं वै शिरसा धारयाम्यहम् । एवं मे पापहानिस्तु भवेदिति मतिर्मम । तदाप्रभृति वै सोमो मूर्ध्नि संदृश्यते सदा ॥
tadāprabhṛti somaṃ vai śirasā dhārayāmyaham | evaṃ me pāpahānistu bhavediti matirmama | tadāprabhṛti vai somo mūrdhni saṃdṛśyate sadā
"तभी से मैं सोम को सिर पर धारण करता हूँ--मेरी यह सोच थी कि इस प्रकार मेरा पाप दूर हो जाएगा। और तभी से सोम सदा मेरे मस्तक पर दिखाई देता है।"
नारद उवाच
श्लोक 34 (13.207.34)
एवं ब्रुवति देवेशे विस्मिताः परमर्षयः । वाग्भिः साञ्जलिमालाभिरभितुष्टुवुरीश्वरम् ॥
evaṃ bruvati deveśe vismitāḥ paramarṣayaḥ | vāgbhiḥ sāñjalimālābhirabhituṣṭuvurīśvaram
देवेश के इस प्रकार कहने पर विस्मित महर्षियों ने माला की तरह जुड़ी हुई अंजलियाँ उठाकर वाणी से ईश्वर की स्तुति की।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 35 (13.207.35)
नमः शङ्कर सर्वेश नमः सर्वजगद्गुरो । नमो देवादिदेवाय नमः शशिकलाधर ॥
namaḥ śaṅkara sarveśa namaḥ sarvajagadguro | namo devādidevāya namaḥ śaśikalādhara
"हे शंकर, सर्वेश्वर! आपको नमस्कार; हे सारे जगत् के गुरु! आपको नमस्कार; देवों के आदिदेव को नमस्कार; हे चन्द्रकलाधारी! आपको नमस्कार;"
श्लोक 36 (13.207.36)
नमो घोरतराद्घोर नमो रुद्राय शङ्कर । नमः शान्ततराच्छान्त नमश्चन्द्रस्य पालक ॥
namo ghoratarādghora namo rudrāya śaṅkara | namaḥ śāntatarācchānta namaścandrasya pālaka
"घोर से भी घोर! आपको नमस्कार; रुद्र, शंकर को नमस्कार; शान्त से भी शान्त! आपको नमस्कार; हे चन्द्रमा के रक्षक! आपको नमस्कार;"
श्लोक 37 (13.207.37)
नमः सोमाय देवाय नमस्तुभ्यं चतुर्मुख । नमो भूतपते शंभो जह्नुकन्याम्बुशेखर ॥
namaḥ somāya devāya namastubhyaṃ caturmukha | namo bhūtapate śaṃbho jahnukanyāmbuśekhara
"सोम देव को नमस्कार; हे चतुर्मुख! आपको नमस्कार; हे भूतपति, शम्भु, जह्नुकन्या के जल को मस्तक पर धारण करनेवाले! आपको नमस्कार;"
श्लोक 38 (13.207.38)
नमस्त्रिशूलहस्ताय पन्नगाभरणाय च । नमोस्तु विषमाक्षाय दक्षयज्ञप्रदाहक ॥
namastriśūlahastāya pannagābharaṇāya ca | namostu viṣamākṣāya dakṣayajñapradāhaka
"त्रिशूल हाथ में लिए और सर्पों के आभूषण पहने हुए को नमस्कार; हे विषम नेत्रोंवाले, दक्ष-यज्ञ को भस्म करनेवाले! आपको नमस्कार;"
श्लोक 39 (13.207.39)
नमोस्तु बहुनेत्राय लोकरक्षणतत्पर । अहो देवस्य महात्म्यमहो देवस्य वै कृपा । एवं धर्मपरत्वं च देवदेवस्य चार्हति ॥
namostu bahunetrāya lokarakṣaṇatatpara | aho devasya mahātmyamaho devasya vai kṛpā | evaṃ dharmaparatvaṃ ca devadevasya cārhati
"हे बहुत नेत्रोंवाले, लोकों की रक्षा में तत्पर! आपको नमस्कार। अहो, देव की महिमा! अहो, देव की कृपा! देवाधिदेव के लिए ऐसा धर्मपरायण होना ही उचित है।"
नारद उवाच
श्लोक 40 (13.207.40)
एवं ब्रुवत्सु मुनिषु वचो देव्यब्रवीद्धरम् । सम्प्रीत्यर्थं मुनीनां सा क्षणज्ञा परमं हितम् ॥
evaṃ bruvatsu muniṣu vaco devyabravīddharam | samprītyarthaṃ munīnāṃ sā kṣaṇajñā paramaṃ hitam
मुनियों के इस प्रकार कहते रहने पर, उचित अवसर को जाननेवाली देवी ने मुनियों की प्रसन्नता के लिए हर से परम हितकर वचन कहा।
उमोवाच
श्लोक 41 (13.207.41)
भगवन्देवदेवेश सर्वलोकनमस्कृत । अस्यैव ऋषिसङ्घस्य मम च प्रियकाम्यया ॥
bhagavandevadeveśa sarvalokanamaskṛta | asyaiva ṛṣisaṅghasya mama ca priyakāmyayā
"हे भगवन्, देवदेवेश, सब लोकों के वन्दनीय! इन ऋषियों के समूह और मेरी प्रसन्नता की इच्छा से,"
श्लोक 42 (13.207.42)
वर्णाश्रमकृतं धर्मं वक्तुमर्हस्यशेषतः । न तृप्तिरस्ति देवेश श्रवणीयं हि ते वचः ॥
varṇāśramakṛtaṃ dharmaṃ vaktumarhasyaśeṣataḥ | na tṛptirasti deveśa śravaṇīyaṃ hi te vacaḥ
"आप वर्णों और आश्रमों के लिए निर्धारित धर्म को पूरा-पूरा कहने की कृपा करें। हे देवेश! तृप्ति नहीं होती, क्योंकि आपके वचन सुनने योग्य हैं।"
श्लोक 43 (13.207.43)
सधर्मचारिणी चेयं भक्ता चेयमिति प्रभो । वक्तुमर्हसि देवेश लोकानां हितकाम्यया । याथातथ्येन तत्सर्वं वक्तुमर्हसि शंकर ॥
sadharmacāriṇī ceyaṃ bhaktā ceyamiti prabho | vaktumarhasi deveśa lokānāṃ hitakāmyayā | yāthātathyena tatsarvaṃ vaktumarhasi śaṃkara
"हे प्रभो! मैं आपकी सहधर्मचारिणी और भक्त हूँ--यह सोचकर, लोकों के हित के लिए आप कहने की कृपा करें। हे शंकर! वह सब यथार्थ रूप में कहिए।"