अनुशासन पर्व · अध्याय 208
चार वर्णों और चार आश्रमों के धर्म
शिव उमा को बताते हैं कि विधाता के मुख, भुजाओं, जंघाओं और चरणों से चार वर्ण कैसे रचे गए, और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के धर्म बताते हैं; वे चेताते हैं कि ब्राह्मण का अपमान स्वयं शिव का अपमान है। उमा के कहने पर वे फिर गृहस्थ, वानप्रस्थ, यति और ब्रह्मचारी के धर्म बताते हैं।
महेश्वर उवाच
श्लोक 1 (13.208.1)
हन्त ते कथयिष्यामि यत्ते देवि मनःप्रियम् । शृणु तत्सर्वमखिलं धर्मं वर्णाश्रमाश्रितम् ॥
hanta te kathayiṣyāmi yatte devi manaḥpriyam | śṛṇu tatsarvamakhilaṃ dharmaṃ varṇāśramāśritam
"अच्छा देवी, जो तुम्हारे मन को प्रिय है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। वर्णों और आश्रमों पर आधारित धर्म को सम्पूर्ण रूप में सुनो।"
श्लोक 2 (13.208.2)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शुद्राश्चेति चतुर्विधम् । ब्राह्मणा विहिताः पूर्वं लोकतन्त्रमभीप्सता । कर्माणि च तदर्हाणि शास्त्रेषु विहितानि वै ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śudrāśceti caturvidham | brāhmaṇā vihitāḥ pūrvaṃ lokatantramabhīpsatā | karmāṇi ca tadarhāṇi śāstreṣu vihitāni vai
"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र--इस प्रकार चार भेद हैं। लोक-व्यवस्था की इच्छा करनेवाले विधाता ने पहले ब्राह्मणों का विधान किया, और उनके योग्य कर्म शास्त्रों में निर्धारित किए गए हैं।"
श्लोक 3 (13.208.3)
यदीदमेकवर्णं स्याज्जगत्सर्वं विनश्यति । सहैव देवि वर्णानि चत्वारि विहितान्यतः ॥
yadīdamekavarṇaṃ syājjagatsarvaṃ vinaśyati | sahaiva devi varṇāni catvāri vihitānyataḥ
"यदि यह जगत् एक ही वर्ण का होता तो सब कुछ नष्ट हो जाता। इसीलिए हे देवी, चारों वर्ण साथ-साथ रचे गए।"
श्लोक 4 (13.208.4)
मुखतो ब्राह्मणाः सृष्टास्तस्मात्ते वाग्विशारदाः । बाहुभ्यां क्षत्रियाः सृष्टास्तस्मात्ते बाहुगर्विताः ॥
mukhato brāhmaṇāḥ sṛṣṭāstasmātte vāgviśāradāḥ | bāhubhyāṃ kṣatriyāḥ sṛṣṭāstasmātte bāhugarvitāḥ
"मुख से ब्राह्मण रचे गए, इसलिए वे वाणी में निपुण हैं; भुजाओं से क्षत्रिय रचे गए, इसलिए वे भुजबल पर गर्व करते हैं।"
श्लोक 5 (13.208.5)
ऊरुभ्यामुद्गता वैश्यास्तस्माद्वार्तोपजीविनः । शूद्राश्च पादतः सृष्टास्तस्मात्ते परिचारकाः ॥
ūrubhyāmudgatā vaiśyāstasmādvārtopajīvinaḥ | śūdrāśca pādataḥ sṛṣṭāstasmātte paricārakāḥ
"जंघाओं से वैश्य उत्पन्न हुए, इसलिए वे खेती, पशुपालन और व्यापार से जीविका चलाते हैं; और चरणों से शूद्र रचे गए, इसलिए वे सेवा करनेवाले हैं।"
श्लोक 6 (13.208.6)
तेषां धर्मांश्च कर्माणि शृणु देवि समाहिता । विप्राः कृता भूमिदेवा लोकानां धारणे कृताः । ते कैश्चिन्नावमन्तव्या ब्राह्मणा हितमिच्छुभिः ॥
teṣāṃ dharmāṃśca karmāṇi śṛṇu devi samāhitā | viprāḥ kṛtā bhūmidevā lokānāṃ dhāraṇe kṛtāḥ | te kaiścinnāvamantavyā brāhmaṇā hitamicchubhiḥ
"हे देवी, ध्यान से उनके धर्म और कर्म सुनो। ब्राह्मण भूमि के देवता बनाए गए और लोकों को धारण करने के लिए नियुक्त हुए। अपना हित चाहनेवाले किसी भी मनुष्य को उनका अपमान नहीं करना चाहिए।"
श्लोक 7 (13.208.7)
यदि ते ब्राह्मणा न स्युर्दानयोगवहाः सदा । उभयोर्लोकयोर्देवि स्थितिर्न स्यात्समासतः ॥
yadi te brāhmaṇā na syurdānayogavahāḥ sadā | ubhayorlokayordevi sthitirna syātsamāsataḥ
"यदि दान और योग का भार सदा वहन करनेवाले वे ब्राह्मण न होते, तो हे देवी, संक्षेप में दोनों लोकों की स्थिति ही न रहती।"
श्लोक 8 (13.208.8)
लोकेषु दुर्लभं किंतु ब्राह्मणत्वमिति स्मृतम् । अबुधो वा दरिद्रो वा पूजनीयः सदैव सः ॥
lokeṣu durlabhaṃ kiṃtu brāhmaṇatvamiti smṛtam | abudho vā daridro vā pūjanīyaḥ sadaiva saḥ
"फिर भी लोकों में ब्राह्मणत्व दुर्लभ माना गया है। अज्ञानी हो या दरिद्र, ब्राह्मण सदा पूजनीय है।"
श्लोक 9 (13.208.9)
ब्राह्मणान्योऽवमन्येत निन्देच्च क्रोधयेच्च वा । प्रहरेत हरेद्वाऽपि धनं तेषां नराधमः ॥
brāhmaṇānyo'vamanyeta nindecca krodhayecca vā | prahareta haredvā'pi dhanaṃ teṣāṃ narādhamaḥ
"जो अधम मनुष्य ब्राह्मणों का अपमान करे, उनकी निन्दा करे, उन्हें क्रोधित करे, उन पर प्रहार करे या उनका धन छीन ले,"
श्लोक 10 (13.208.10)
कारयेद्धीनकर्मणि कामलोभविमोहनात् । स च मामवमन्येत मां क्रोधयति निन्दति ॥
kārayeddhīnakarmaṇi kāmalobhavimohanāt | sa ca māmavamanyeta māṃ krodhayati nindati
"अथवा काम, लोभ या मोह के कारण उनसे नीच कर्म करवाए, वह मेरा अपमान करता है; वह मुझे क्रोधित करता है और मेरी निन्दा करता है।"
श्लोक 11 (13.208.11)
मामेव प्रहरेन्मूढो मद्धनस्यापहारकः । मामेव प्रेषणं कृत्वा निन्दते मूढचेतनः ॥
māmeva praharenmūḍho maddhanasyāpahārakaḥ | māmeva preṣaṇaṃ kṛtvā nindate mūḍhacetanaḥ
"वह मूढ़ मुझ पर ही प्रहार करता है और मेरे धन का अपहरण करनेवाला है। मुझे ही अपना सेवक बनाकर वह मूढ़चित्त मेरी निन्दा करता है।"
श्लोक 12 (13.208.12)
स्वाध्यायो यजनं दानं तस्य धर्म इति स्थितिः । कर्मण्यध्यापनं चैव याजनं च प्रतिग्रहः । सत्यं शान्तिस्तपः शौचं तस्य धर्मः सनातनः ॥
svādhyāyo yajanaṃ dānaṃ tasya dharma iti sthitiḥ | karmaṇyadhyāpanaṃ caiva yājanaṃ ca pratigrahaḥ | satyaṃ śāntistapaḥ śaucaṃ tasya dharmaḥ sanātanaḥ
"अध्ययन, यज्ञ और दान उसका धर्म है--यही स्थापित व्यवस्था है। अध्यापन, यज्ञ कराना और दान लेना उसके कर्म हैं; सत्य, शान्ति, तप और शौच उसका सनातन धर्म है।"
श्लोक 13 (13.208.13)
विक्रयो रसधान्यानां ब्राह्मणस्य विगर्हितः । अनापदि च शूद्रान्नं वृषलीसङ्ग्रहस्तथा ॥
vikrayo rasadhānyānāṃ brāhmaṇasya vigarhitaḥ | anāpadi ca śūdrānnaṃ vṛṣalīsaṅgrahastathā
"रस और अन्न की बिक्री ब्राह्मण के लिए निन्दित है; इसी प्रकार आपत्ति न होने पर शूद्र का अन्न खाना और वृषली को रखना भी।"
श्लोक 14 (13.208.14)
तप एव सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः । स तु धर्मार्थमुत्पन्नः पूर्वं धात्रा तपोबलात् ॥
tapa eva sadā dharmo brāhmaṇasya na saṃśayaḥ | sa tu dharmārthamutpannaḥ pūrvaṃ dhātrā tapobalāt
"तप ही ब्राह्मण का सदा का धर्म है, इसमें संशय नहीं। पूर्वकाल में विधाता ने तप के बल से धर्म के लिए ही उसे उत्पन्न किया था।"
श्लोक 15 (13.208.15)
तस्योपनयनं धर्मो नित्यं चोदकधारणम् । शास्त्रस्य श्रवणं धर्मो देवव्रतनिषेवणम् ॥
tasyopanayanaṃ dharmo nityaṃ codakadhāraṇam | śāstrasya śravaṇaṃ dharmo devavrataniṣevaṇam
"उपनयन और सदा जल धारण करना उसका धर्म है; शास्त्र का श्रवण और देव-व्रतों का पालन भी उसका धर्म है;"
श्लोक 16 (13.208.16)
अग्निकार्यं परो धर्मो नित्ययज्ञोपवीतिता । शूद्रान्नवर्जनं धर्मो धर्मः सत्पथसेवनम् । धर्मो नित्योपवासित्वं ब्रह्मचर्यं परं तथा ॥
agnikāryaṃ paro dharmo nityayajñopavītitā | śūdrānnavarjanaṃ dharmo dharmaḥ satpathasevanam | dharmo nityopavāsitvaṃ brahmacaryaṃ paraṃ tathā
"अग्निकार्य परम धर्म है, सदा यज्ञोपवीत धारण किए रहना धर्म है; शूद्र का अन्न त्यागना धर्म है, सत्पथ पर चलना धर्म है, नित्य उपवास का नियम रखना धर्म है, और परम ब्रह्मचर्य भी धर्म है।"
श्लोक 17 (13.208.17)
गृहस्थस्य परो धर्मो गृहस्थाश्रमिणस्तथा । गृहसम्मार्जनं धर्म आलेपनविधिस्तथा ॥
gṛhasthasya paro dharmo gṛhasthāśramiṇastathā | gṛhasammārjanaṃ dharma ālepanavidhistathā
"गृहस्थ का धर्म सर्वोच्च है, और गृहस्थाश्रम में रहनेवालों का भी वैसा ही: घर में झाड़ू लगाना धर्म है और लीपने की विधि भी धर्म है।"
श्लोक 18 (13.208.18)
अतिथिप्रियता धर्मो धर्मस्त्रेताग्निधारणम् । इष्टिर्वा पशुबन्धाश्च विधिपूर्वं परंतप ॥
atithipriyatā dharmo dharmastretāgnidhāraṇam | iṣṭirvā paśubandhāśca vidhipūrvaṃ paraṃtapa
"अतिथि-प्रियता धर्म है, तीन अग्नियों को धारण करना धर्म है; और हे परंतप, विधिपूर्वक इष्टि अथवा पशुबन्ध यज्ञ करना भी।"
श्लोक 19 (13.208.19)
दम्पत्योः समशीलत्वं धर्मो वै गृहमेधिनाम् । एवं द्विजन्मनो धर्मो गार्हस्थ्ये धर्मधारणम् ॥
dampatyoḥ samaśīlatvaṃ dharmo vai gṛhamedhinām | evaṃ dvijanmano dharmo gārhasthye dharmadhāraṇam
"पति-पत्नी का समान स्वभाव होना गृहस्थों का धर्म है। द्विज का धर्म इस प्रकार है--गृहस्थ-जीवन में धर्म को धारण करना।"
श्लोक 20 (13.208.20)
यस्तु क्षत्रगतो धर्मस्त्वया देवि प्रचोदितः । तमहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता ॥
yastu kṣatragato dharmastvayā devi pracoditaḥ | tamahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu devi samāhitā
"हे देवी! क्षत्रिय का जो धर्म है, जिसके विषय में तुमने पूछा था, उसे मैं तुम्हें बताता हूँ; हे देवी, ध्यान से सुनो।"
श्लोक 21 (13.208.21)
क्षत्रियास्तु ततो देवि द्विजानां पालने स्मृताः । यदि निःक्षत्रियो लोको जगत्स्यादधरोत्तरम् ॥
kṣatriyāstu tato devi dvijānāṃ pālane smṛtāḥ | yadi niḥkṣatriyo loko jagatsyādadharottaram
"हे देवी! क्षत्रिय द्विजों की रक्षा के लिए माने गए हैं। यदि संसार क्षत्रियों से रहित हो, तो वह उलट-पुलट हो जाए।"
श्लोक 22 (13.208.22)
रक्षणात्क्षत्रियैरेव जगद्भवति शाश्वतम् । तस्याप्यध्ययनं दानं यजनं धर्मतः स्मृतम् ॥
rakṣaṇātkṣatriyaireva jagadbhavati śāśvatam | tasyāpyadhyayanaṃ dānaṃ yajanaṃ dharmataḥ smṛtam
"क्षत्रियों की रक्षा से ही जगत् शाश्वत रहता है। उसके लिए भी अध्ययन, दान और यज्ञ धर्मानुसार माने गए हैं।"
श्लोक 23 (13.208.23)
दीनानां रक्षणं चैव पापानामनुशासनम् । सतां सम्पोषणं चैव कर्मषण्मार्गजीवनम् ॥
dīnānāṃ rakṣaṇaṃ caiva pāpānāmanuśāsanam | satāṃ sampoṣaṇaṃ caiva karmaṣaṇmārgajīvanam
"दीनों की रक्षा, पापियों पर शासन, सज्जनों का पोषण, और अपने कर्म के छह मार्गों से जीविका चलाना,"
श्लोक 24 (13.208.24)
उत्साहः शस्त्रजीवित्वं तस्य धर्मः सनातनः । भृत्यानां भरणं धर्मः कृते कर्मण्यमोघता ॥
utsāhaḥ śastrajīvitvaṃ tasya dharmaḥ sanātanaḥ | bhṛtyānāṃ bharaṇaṃ dharmaḥ kṛte karmaṇyamoghatā
"उत्साह और शस्त्र से जीविका उसका सनातन धर्म है। भृत्यों का भरण-पोषण धर्म है, और किए हुए कर्म का निष्फल न होना भी।"
श्लोक 25 (13.208.25)
सम्यग्गुणयुतो धर्मो धर्मः पौरहितक्रिया । व्यवहारस्थितिर्नित्यं गुणयुक्तो महीपतिः ॥
samyagguṇayuto dharmo dharmaḥ paurahitakriyā | vyavahārasthitirnityaṃ guṇayukto mahīpatiḥ
"उत्तम गुणों से सम्पन्न होना धर्म है, नगरवासियों के हित का कार्य धर्म है, और गुणवान् राजा का व्यवहार में सदा स्थिर रहना भी।"
श्लोक 26 (13.208.26)
आर्तवित्तप्रदो राजा धर्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । एवं तैर्विहितः पूर्वैर्धर्मः कर्मविधानतः ॥
ārtavittaprado rājā dharmaṃ prāpnotyanuttamam | evaṃ tairvihitaḥ pūrvairdharmaḥ karmavidhānataḥ
"जो राजा दुखियों को धन देता है, वह सर्वोत्तम धर्म को प्राप्त करता है। इस प्रकार पूर्वजों ने कर्मों के विभाग के अनुसार धर्म का विधान किया।"
श्लोक 27 (13.208.27)
तथैव देवि वैश्याश्च लोकयात्राहिताः स्मृताः । अन्ये तानुपजीवन्ति प्रत्यक्षफलदा हि ते ॥
tathaiva devi vaiśyāśca lokayātrāhitāḥ smṛtāḥ | anye tānupajīvanti pratyakṣaphaladā hi te
"उसी प्रकार हे देवी, वैश्य लोक-यात्रा के लिए हितकर माने गए हैं। दूसरे उन्हीं पर निर्भर रहते हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं।"
श्लोक 28 (13.208.28)
यदि न स्युस्तथा वैश्या न भवेयुस्तथा परे । तेषामध्ययनं दानं यजनं धर्म उच्यते ॥
yadi na syustathā vaiśyā na bhaveyustathā pare | teṣāmadhyayanaṃ dānaṃ yajanaṃ dharma ucyate
"यदि वैश्य न हों तो दूसरे भी न रहें। उनके लिए अध्ययन, दान और यज्ञ धर्म कहे गए हैं।"
श्लोक 29 (13.208.29)
वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा । अग्निहोत्रपरिस्पन्दास्त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥
vaiśyasya satataṃ dharmaḥ pāśupālyaṃ kṛṣistathā | agnihotraparispandāstrayo varṇā dvijātayaḥ
"वैश्य का नित्य धर्म पशुपालन और खेती है। तीनों वर्ण द्विजाति हैं, जो अग्निहोत्र की सामग्री से युक्त रहते हैं।"
श्लोक 30 (13.208.30)
वाणिज्यं सत्पथे स्थानमातिथेयत्वमेव च । विप्राणां स्वागतन्यायो वैश्यधर्मः सनातनः ॥
vāṇijyaṃ satpathe sthānamātitheyatvameva ca | viprāṇāṃ svāgatanyāyo vaiśyadharmaḥ sanātanaḥ
"व्यापार, सत्पथ पर टिके रहना, अतिथि-सत्कार और ब्राह्मणों का स्वागत करने की रीति--यह वैश्य का सनातन धर्म है।"
श्लोक 31 (13.208.31)
तिलगन्धरसाश्चैव न विक्रेयाः कथञ्चन । वणिक्पथमुपासद्भिर्वैश्यैर्वैश्यपथि स्थितैः ॥
tilagandharasāścaiva na vikreyāḥ kathañcana | vaṇikpathamupāsadbhirvaiśyairvaiśyapathi sthitaiḥ
"तिल, गन्ध और रस वैश्यों को कभी नहीं बेचने चाहिए, जो वणिक् के मार्ग का अनुसरण करते हैं और वैश्य-पथ पर स्थित हैं।"
श्लोक 32 (13.208.32)
सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति दिवानिशम् । एवं ते विहिता देवि लोकयात्रा स्वयंभुवा ॥
sarvātithyaṃ trivargasya yathāśakti divāniśam | evaṃ te vihitā devi lokayātrā svayaṃbhuvā
"तीनों वर्गों के सब लोगों का यथाशक्ति दिन-रात आतिथ्य करना चाहिए। इस प्रकार हे देवी, स्वयम्भू ने उनके लिए लोक-यात्रा का विधान किया।"
श्लोक 33 (13.208.33)
तथैव शूद्रा विहिताः सर्वधर्मप्रसाधकाः । शूद्राश्च यदि ते न स्युः कर्मकर्ता न विद्यते ॥
tathaiva śūdrā vihitāḥ sarvadharmaprasādhakāḥ | śūdrāśca yadi te na syuḥ karmakartā na vidyate
"उसी प्रकार शूद्र सब धर्मों को सिद्ध करनेवाले के रूप में विहित हुए। और यदि शूद्र न हों, तो काम करनेवाला कोई नहीं रहेगा।"
श्लोक 34 (13.208.34)
त्रयः पूर्वे शूद्रमूलाः सर्वे कर्मकराः स्मृताः । ब्राह्मणादिषु शुश्रूषा दासधर्म इति स्मृतः ॥
trayaḥ pūrve śūdramūlāḥ sarve karmakarāḥ smṛtāḥ | brāhmaṇādiṣu śuśrūṣā dāsadharma iti smṛtaḥ
"पहले तीनों वर्णों का मूल शूद्र है, और सब कर्म करनेवाले माने गए हैं। ब्राह्मण आदि की सेवा दास का धर्म कही गई है।"
श्लोक 35 (13.208.35)
वार्ता च कारुकर्माणि शिल्पं नाट्यं तथैव च । अहिंसकः शुभाचारो देवतद्विजवन्दकः ॥
vārtā ca kārukarmāṇi śilpaṃ nāṭyaṃ tathaiva ca | ahiṃsakaḥ śubhācāro devatadvijavandakaḥ
"वार्ता, कारीगरों के काम, शिल्प और नाट्य भी, तथा अहिंसक, सदाचारी और देवताओं तथा द्विजों का वन्दन करनेवाला होना,"
श्लोक 36 (13.208.36)
शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः स्वधर्मेणोपपद्यते । एवमादि तथाऽन्यच्च शूद्रधर्म इति स्मृतः ॥
śūdro dharmaphalairiṣṭaiḥ svadharmeṇopapadyate | evamādi tathā'nyacca śūdradharma iti smṛtaḥ
"शूद्र अपने धर्म से धर्म के इष्ट फल प्राप्त करता है। ये और इसी प्रकार के अन्य कर्म शूद्र का धर्म कहे गए हैं।"
श्लोक 37 (13.208.37)
तेऽप्येवं विहिता लोके कर्मयोग्याः शुभानने ॥
te'pyevaṃ vihitā loke karmayogyāḥ śubhānane
"हे शुभानने! वे भी इस प्रकार संसार में अपने कर्म के योग्य विहित किए गए हैं।"
श्लोक 38 (13.208.38)
एवं चतुर्णां वर्णानां वर्णलोकाः परत्र च । विहिताश्च तथा दृष्टा यथावद्धर्मचारिणि ॥
evaṃ caturṇāṃ varṇānāṃ varṇalokāḥ paratra ca | vihitāśca tathā dṛṣṭā yathāvaddharmacāriṇi
"इस प्रकार चारों वर्णों के लिए परलोक में भी अपने-अपने वर्ण के अनुकूल लोक विहित हैं, और हे धर्मचारिणी, जो ठीक-ठीक धर्म का आचरण करते हैं उन्हें वे वैसे ही प्राप्त होते भी देखे गए हैं।"
श्लोक 39 (13.208.39)
एष वर्णाश्रयो धर्मः कर्म चैव तदर्पणम् । कथितं श्रोतुकामायाः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
eṣa varṇāśrayo dharmaḥ karma caiva tadarpaṇam | kathitaṃ śrotukāmāyāḥ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
"यह वर्ण पर आश्रित धर्म है, और उसके कर्मों का समर्पण भी। सुनने की इच्छा रखनेवाली तुम्हें यह बता दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?"
उमोवाच
श्लोक 40 (13.208.40)
भगवन्देवदेवेश नमस्ते वृषभध्वज । श्रोतुमिच्छाम्यहं देव धर्ममाश्रमिणां विभो ॥
bhagavandevadeveśa namaste vṛṣabhadhvaja | śrotumicchāmyahaṃ deva dharmamāśramiṇāṃ vibho
"हे भगवन्, देवदेवेश, वृषभध्वज! आपको नमस्कार। हे देव, हे विभो! मैं आश्रमों में रहनेवालों का धर्म सुनना चाहती हूँ।"
महेश्वर उवाच
श्लोक 41 (13.208.41)
तथाऽऽश्रमगतं धर्मं शृणु देवि समाहिता । आश्रमाणां तु यो धर्मः क्रियते ब्रह्मवादिभिः ॥
tathā''śramagataṃ dharmaṃ śṛṇu devi samāhitā | āśramāṇāṃ tu yo dharmaḥ kriyate brahmavādibhiḥ
"तो हे देवी, ध्यान से आश्रमों से सम्बन्धित धर्म को सुनो--वह धर्म, जिसका पालन आश्रमों में ब्रह्मवादी करते हैं।"
श्लोक 42 (13.208.42)
गृहस्थः प्रवरस्तेषां गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रितः । पञ्चयज्ञक्रियाशौचं दारतुष्टिरतन्द्रिता ॥
gṛhasthaḥ pravarasteṣāṃ gārhasthyaṃ dharmamāśritaḥ | pañcayajñakriyāśaucaṃ dāratuṣṭiratandritā
"उनमें गृहस्थ श्रेष्ठ है, जो गृहस्थ-धर्म का आश्रय लिए रहता है: पाँच यज्ञों की क्रिया, शुचिता, पत्नी में सन्तोष और आलस्यरहित उद्यम;"
श्लोक 43 (13.208.43)
ऋतुकालाभिगमनं दानयज्ञतपांसि च । अविप्रवासस्तस्येष्टः स्वाध्यायश्चाग्निपूर्वकम् ॥
ṛtukālābhigamanaṃ dānayajñatapāṃsi ca | avipravāsastasyeṣṭaḥ svādhyāyaścāgnipūrvakam
"ऋतुकाल में पत्नी के पास जाना, दान, यज्ञ और तप; घर से दूर न रहना उसके लिए विहित है, तथा अग्नियों के साथ स्वाध्याय।"
श्लोक 44 (13.208.44)
अतिथीनामाभिमुख्यं शक्त्या चेष्टनिमन्त्रणम् । अनुग्रहश्च सर्वेषां मनोवाक्कायकर्मभिः ॥
atithīnāmābhimukhyaṃ śaktyā ceṣṭanimantraṇam | anugrahaśca sarveṣāṃ manovākkāyakarmabhiḥ
"अतिथियों का सामने जाकर स्वागत करना, यथाशक्ति उनकी इष्ट वस्तुओं के साथ उन्हें निमन्त्रित करना, और मन, वचन, शरीर तथा कर्म से सब पर अनुग्रह करना।"
श्लोक 45 (13.208.45)
एवमादि शुभं चान्यत्कुर्यात्तद्वृत्तिमान्गृही । एवं सञ्चरतस्तस्य पुण्यलोका न संशयः ॥
evamādi śubhaṃ cānyatkuryāttadvṛttimāngṛhī | evaṃ sañcaratastasya puṇyalokā na saṃśayaḥ
"इन और अन्य शुभ कर्मों को उस वृत्ति से जीनेवाला गृहस्थ करे। इस प्रकार आचरण करनेवाले को पुण्य लोक प्राप्त होते हैं, इसमें संशय नहीं।"
श्लोक 46 (13.208.46)
तथैव वानप्रस्थस्य धर्माः प्रोक्ताः सनातनाः ॥
tathaiva vānaprasthasya dharmāḥ proktāḥ sanātanāḥ
"इसी प्रकार वानप्रस्थ के सनातन धर्म भी कहे गए हैं।"
श्लोक 47 (13.208.47)
गृहवासं समुत्सृज्य निश्चित्यैकमनाः शुभैः । वन्यैरेव तदाहारैः वर्तयेदिति च स्थितिः ॥
gṛhavāsaṃ samutsṛjya niścityaikamanāḥ śubhaiḥ | vanyaireva tadāhāraiḥ vartayediti ca sthitiḥ
"घर छोड़कर, निश्चय करके, एकाग्र मन से और शुभ नियमों के साथ, उसे वन के फल-मूल आदि आहार से ही जीवन चलाना चाहिए--यही मर्यादा है।"
श्लोक 48 (13.208.48)
भूमिशय्या जटाश्मश्रुचर्मवल्कलधारणम् । देवतातिथिसत्कारो महाकृच्छ्राभिपूजनम् ॥
bhūmiśayyā jaṭāśmaśrucarmavalkaladhāraṇam | devatātithisatkāro mahākṛcchrābhipūjanam
"भूमि पर सोना, जटा और दाढ़ी-मूँछ रखना, चर्म और वल्कल धारण करना, देवताओं और अतिथियों का सत्कार, तथा महाकृच्छ्र व्रतों का पालन।"
श्लोक 49 (13.208.49)
अग्निहोत्रं त्रिषवणं नित्यं तस्य विधीयते । ब्रह्मचर्यं क्षमा शौचं तस्य धर्मः सनातनः । एवं स विगते प्राणे देवलोके महीयते ॥
agnihotraṃ triṣavaṇaṃ nityaṃ tasya vidhīyate | brahmacaryaṃ kṣamā śaucaṃ tasya dharmaḥ sanātanaḥ | evaṃ sa vigate prāṇe devaloke mahīyate
"अग्निहोत्र और तीनों समय स्नान उसके लिए सदा विहित हैं; ब्रह्मचर्य, क्षमा और शुचिता उसका सनातन धर्म है। इस प्रकार प्राण छूटने पर वह देवलोक में सम्मानित होता है।"
श्लोक 50 (13.208.50)
यतिधर्मास्तथा देवि गृहांस्त्यक्त्वा यतस्ततः । आकिञ्चन्यमनारम्भः सर्वतः शौचमार्जवम् ॥
yatidharmāstathā devi gṛhāṃstyaktvā yatastataḥ | ākiñcanyamanārambhaḥ sarvataḥ śaucamārjavam
"हे देवी! इसी प्रकार यति के धर्म हैं--जो घर छोड़कर जहाँ-तहाँ विचरता है: अकिंचनता, कर्मों का आरम्भ न करना, सर्वत्र शुचिता और सरलता,"
श्लोक 51 (13.208.51)
सर्वत्र भैक्षचर्या च सर्वत्रैव विवासनम् । सदा ध्यानपरत्वं च देहशुद्धिः क्षमा दया । तत्वानुगतबुद्धित्वं तस्य धर्मविधिर्भवेत् ॥
sarvatra bhaikṣacaryā ca sarvatraiva vivāsanam | sadā dhyānaparatvaṃ ca dehaśuddhiḥ kṣamā dayā | tatvānugatabuddhitvaṃ tasya dharmavidhirbhavet
"सर्वत्र भिक्षा माँगना, कहीं भी ठहर जाना, सदा ध्यान में लगे रहना, देह की शुद्धि, क्षमा और दया, तथा तत्त्व का अनुसरण करनेवाली बुद्धि--यही उसके धर्म की विधि होगी।"
श्लोक 52 (13.208.52)
ब्रह्मचारी च यो देवि जन्मप्रभृति भिक्षितः । ब्रह्मचर्यपरो भूत्वा साधयेद्गुरुमात्मनः । सर्वकालेषु सर्वत्र गुरुपूजां समाचरेत् ॥
brahmacārī ca yo devi janmaprabhṛti bhikṣitaḥ | brahmacaryaparo bhūtvā sādhayedgurumātmanaḥ | sarvakāleṣu sarvatra gurupūjāṃ samācaret
"हे देवी! जो ब्रह्मचारी जन्म से ही भिक्षा पर निर्वाह करता है, उसे ब्रह्मचर्य में तत्पर होकर अपने कल्याण के लिए गुरु को प्रसन्न करना चाहिए, और सब समय तथा सब स्थानों में गुरु की पूजा करनी चाहिए।"
श्लोक 53 (13.208.53)
भैक्षचर्याग्निकार्यं च सदा जलनिषेवणम् । स्वाध्यायः सततं तस्य एष धर्मः सनातनः ॥
bhaikṣacaryāgnikāryaṃ ca sadā jalaniṣevaṇam | svādhyāyaḥ satataṃ tasya eṣa dharmaḥ sanātanaḥ
"भिक्षा माँगना, अग्निकार्य, सदा जल का सेवन, और निरन्तर स्वाध्याय--यही उसका सनातन धर्म है।"
श्लोक 54 (13.208.54)
तस्य चेष्टा तु गुर्वर्थमाप्राणान्तमिति स्थितिः । गुरोरभावे तत्पुत्रे गुरुवद्वृत्तिमाचरेत् ॥
tasya ceṣṭā tu gurvarthamāprāṇāntamiti sthitiḥ | gurorabhāve tatputre guruvadvṛttimācaret
"उसका सारा प्रयत्न प्राण-पर्यन्त गुरु के लिए ही होता है--यही मर्यादा है। गुरु के न रहने पर वह उनके पुत्र के प्रति गुरु जैसा ही व्यवहार करे।"
श्लोक 55 (13.208.55)
एवं सोप्यमलाँल्लोकान्ब्राह्मणः प्रतिपद्यते । एष ते कथितो देवि धर्मश्चाश्रमवासिनाम् ॥
evaṃ sopyamalām̐llokānbrāhmaṇaḥ pratipadyate | eṣa te kathito devi dharmaścāśramavāsinām
"इस प्रकार वह ब्राह्मण भी निर्मल लोकों को प्राप्त होता है। हे देवी! आश्रमों में रहनेवालों का यह धर्म तुम्हें बता दिया।"
श्लोक 56 (13.208.56)
चतुर्णामाश्रमो युक्तो लोक इत्येव विद्यते । कथितं ते समासेन किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
caturṇāmāśramo yukto loka ityeva vidyate | kathitaṃ te samāsena kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
"चारों आश्रमों के लिए अपने-अपने आश्रम से जुड़ा एक लोक निर्धारित है--ऐसा ही जाना जाता है। यह तुम्हें संक्षेप में बता दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?"