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अनुशासन पर्व · अध्याय 209

शिव द्वारा वानप्रस्थ ऋषियों के धर्म का उपदेश

उमा शिव से अपने सामने उपस्थित तपस्वी ऋषियों के धर्म के विषय में पूछती हैं और ऋषि उनके प्रश्न की सराहना करते हैं। शिव वानप्रस्थ वनवासी का जीवन बताते हैं — गृहस्थ के कर्तव्य पूरे करके घर छोड़ना, नित्य कर्म, अतिथि-सत्कार, व्रत-उपवास और शारीरिक तप, तथा उनके फलस्वरूप स्वर्ग और पुनर्जन्म। फिर वे बताते हैं कि जो वानप्रस्थ अपनी पत्नियों को साथ रखते हैं, वे कैसे रहते हैं और उन्हीं लोकों को कैसे पाते हैं।

अध्याय 208अध्याय-सूचीअध्याय 210

उमोवाच

श्लोक 1 (13.209.1)

भगवन्देवदेवेश त्रिपुरान्तक शङ्कर । अयं त्वृषिगणो देव तपस्तप इति प्रभो ॥

bhagavandevadeveśa tripurāntaka śaṅkara | ayaṃ tvṛṣigaṇo deva tapastapa iti prabho

“भगवन्, देवों के देव, त्रिपुर का अन्त करने वाले शंकर! प्रभो, यह ऋषिगण तो बस तप पर तप करता रहता है।”

श्लोक 2 (13.209.2)

तपसा कर्शितो नित्यं तपोऽर्जनपरायणः । अस्य किंलक्षणो धर्मः कीदृशश्चागमस्तथा । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे वद वरप्रद ॥

tapasā karśito nityaṃ tapo'rjanaparāyaṇaḥ | asya kiṃlakṣaṇo dharmaḥ kīdṛśaścāgamastathā | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tanme vada varaprada

“सदा तप से क्षीण, तप के संचय में ही लगे हुए इनका धर्म किन लक्षणों वाला है, और इसका आगम (शास्त्र-परम्परा) कैसा है? यह मैं सुनना चाहती हूँ; हे वर देने वाले, मुझे बताइए।”

नारद उवाच

श्लोक 3 (13.209.3)

एवं ब्रुवन्त्यां रुद्राण्यामृषयः साधुसाध्विति । अब्रुवन्हृष्टमनसः सर्वे तद्गतमानसाः ॥

evaṃ bruvantyāṃ rudrāṇyāmṛṣayaḥ sādhusādhviti | abruvanhṛṣṭamanasaḥ sarve tadgatamānasāḥ

रुद्र की पत्नी के इस प्रकार कहने पर सब ऋषि प्रसन्न मन से और उसी में चित्त लगाए हुए बोले — “साधु! साधु!”

श्लोक 4 (13.209.4)

शृण्वन्तीमृषिधर्मांस्तु ऋषयश्चाभ्यपूजयन् ॥

śṛṇvantīmṛṣidharmāṃstu ṛṣayaścābhyapūjayan

ऋषियों के धर्म सुनती हुई देवी का ऋषियों ने भी आदर किया।

ऋषय ऊचुः

श्लोक 5 (13.209.5)

त्वत्प्रसादाद्वयं देवि श्रोष्यामः परमं हितम् । धन्याः खलु वयं सर्वे पादमूलं तवाश्रिताः । इति सर्वे तदा देवीं वाचा समभिपूजयन् ॥

tvatprasādādvayaṃ devi śroṣyāmaḥ paramaṃ hitam | dhanyāḥ khalu vayaṃ sarve pādamūlaṃ tavāśritāḥ | iti sarve tadā devīṃ vācā samabhipūjayan

“हे देवि, आपकी कृपा से हम परम हितकारी बात सुनेंगे। हम सब धन्य हैं, जो आपके चरणों की शरण में आए हैं।” इस प्रकार तब सबने वाणी से देवी की स्तुति-पूजा की।

महेश्वर उवाच

श्लोक 6 (13.209.6)

न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामा मनस्विनि । हन्त ते कथयिष्यामि मुनिधर्मं शुचिस्मिते ॥

nyāyatastvaṃ mahābhāge śrotukāmā manasvini | hanta te kathayiṣyāmi munidharmaṃ śucismite

“हे महाभाग्यवती, हे मनस्विनी, तुम उचित ही सुनना चाहती हो। हे सुन्दर मुस्कान वाली, लो, मैं तुम्हें मुनियों का धर्म बताता हूँ।”

श्लोक 7 (13.209.7)

वानप्रस्थं समाश्रित्य क्रियते बहुधा नरैः । बहुशाखो बहुविधो ऋषिधर्मः सनातनः ॥

vānaprasthaṃ samāśritya kriyate bahudhā naraiḥ | bahuśākho bahuvidho ṛṣidharmaḥ sanātanaḥ

“वानप्रस्थ आश्रम का आश्रय लेकर मनुष्य इसका अनेक प्रकार से पालन करते हैं। ऋषियों का धर्म सनातन है; उसकी बहुत-सी शाखाएँ और बहुत-से भेद हैं।”

श्लोक 8 (13.209.8)

प्रायशः सर्वभोगार्थमृषिभिः क्रियते तपः । तथा सञ्चरतां तेषां देवि धर्मविधिं शृणु ॥

prāyaśaḥ sarvabhogārthamṛṣibhiḥ kriyate tapaḥ | tathā sañcaratāṃ teṣāṃ devi dharmavidhiṃ śṛṇu

“प्रायः ऋषि सब प्रकार के भोगों के लिए तप करते हैं। हे देवि, इस प्रकार विचरने वालों की धर्म-विधि सुनो।”

श्लोक 9 (13.209.9)

भूत्वा पूर्वं गृहस्थस्तु पुत्रानृण्यमवाप्य च । कलत्रकार्यं संस्थाप्य कारणात्संत्यजेद्गृहम् ॥

bhūtvā pūrvaṃ gṛhasthastu putrānṛṇyamavāpya ca | kalatrakāryaṃ saṃsthāpya kāraṇātsaṃtyajedgṛham

“पहले गृहस्थ होकर, पुत्रों के द्वारा पितृ-ऋण से मुक्त होकर और पत्नी के कार्य ठीक-ठाक करके, उचित कारण से, वह घर छोड़ दे।”

श्लोक 10 (13.209.10)

अवस्थाप्य मनो धृत्या व्यवसायपुरःसरः । निर्दारो वा सदारो वा वनवासाय संव्रजेत् ॥

avasthāpya mano dhṛtyā vyavasāyapuraḥsaraḥ | nirdāro vā sadāro vā vanavāsāya saṃvrajet

“धैर्य से मन को स्थिर करके, दृढ़ निश्चय को आगे रखकर, पत्नी के बिना हो या पत्नी सहित, वह वन में रहने के लिए निकल पड़े।”

श्लोक 11 (13.209.11)

देशाः परमपुण्या ये नदीवनसमन्विताः । अबोधमुक्ताः प्रायेण तीर्थायतनसंयुताः ॥

deśāḥ paramapuṇyā ye nadīvanasamanvitāḥ | abodhamuktāḥ prāyeṇa tīrthāyatanasaṃyutāḥ

“ऐसे अत्यन्त पुण्य देश हैं जो नदियों और वनों से युक्त हैं, प्रायः अज्ञान से मुक्त हैं और तीर्थों तथा देवस्थानों से सम्पन्न हैं।”

श्लोक 12 (13.209.12)

तत्र गत्वा विधिं ज्ञात्वा दीक्षां कुर्याद्यथागमम् । दीक्षित्वैकमना भूत्वा परिचर्यां समाचरेत् ॥

tatra gatvā vidhiṃ jñātvā dīkṣāṃ kuryādyathāgamam | dīkṣitvaikamanā bhūtvā paricaryāṃ samācaret

“वहाँ जाकर और विधि जानकर वह शास्त्र के अनुसार दीक्षा ले; दीक्षित होकर एकाग्र मन से परिचर्या (नियत सेवा) का पालन करे।”

श्लोक 13 (13.209.13)

काल्योत्थानं च शौचं च सर्वदेवप्रणामनम् । सकृदालेपनं काये त्यक्तदोषोऽप्रमादिता ॥

kālyotthānaṃ ca śaucaṃ ca sarvadevapraṇāmanam | sakṛdālepanaṃ kāye tyaktadoṣo'pramāditā

“प्रातःकाल उठना, शौच, सब देवताओं को प्रणाम, शरीर पर एक बार लेप लगाना, दोषों का त्याग और सावधानी —”

श्लोक 14 (13.209.14)

सायंप्रातश्चाभिषेकं चाग्निहोत्रं यथाविधि । काले शौचं च कार्यं च जटावल्कलधारणम् ॥

sāyaṃprātaścābhiṣekaṃ cāgnihotraṃ yathāvidhi | kāle śaucaṃ ca kāryaṃ ca jaṭāvalkaladhāraṇam

“सायं और प्रातः स्नान, विधि के अनुसार अग्निहोत्र, समय पर शौच और कर्तव्य-पालन तथा जटा और वल्कल धारण करना;”

श्लोक 15 (13.209.15)

सततं वनचर्या च समित्कुसुमकारणात् । नीवाराग्रयणं काले शाकमूलोपचायनम् ॥

satataṃ vanacaryā ca samitkusumakāraṇāt | nīvārāgrayaṇaṃ kāle śākamūlopacāyanam

“समिधा और फूल लाने के लिए निरन्तर वन में घूमना, समय पर नीवार (जंगली धान) से नवान्न-यज्ञ करना और शाक तथा कन्द-मूल एकत्र करना;”

श्लोक 16 (13.209.16)

सदायतनशौचं च तस्य धर्माय चेष्यते । अतिथीनामाभिमुख्यं तत्परत्वं च सर्वदा ॥

sadāyatanaśaucaṃ ca tasya dharmāya ceṣyate | atithīnāmābhimukhyaṃ tatparatvaṃ ca sarvadā

“अपने निवास को सदा स्वच्छ रखना — यह उसके धर्म के लिए विहित है — और अतिथियों के सामने सदा तत्पर तथा उनकी सेवा में लगा रहना;”

श्लोक 17 (13.209.17)

पाद्यासनाभ्यां सम्पूज्य तथाऽऽहारनिमन्त्रणम् । अग्राम्यपचनं काले पितृदेवार्चनं तथा ॥

pādyāsanābhyāṃ sampūjya tathā''hāranimantraṇam | agrāmyapacanaṃ kāle pitṛdevārcanaṃ tathā

“पाद्य और आसन से उनका सत्कार करके फिर भोजन का निमन्त्रण देना, समय पर ग्रामीण अन्न से भिन्न भोजन पकाना, और पितरों तथा देवताओं का पूजन करना;”

श्लोक 18 (13.209.18)

पश्चादतिथिसत्कारस्तस्य धर्मः सनातनः । शिष्टैर्धर्मासने चैव धर्मार्थसहिताः कथाः ॥

paścādatithisatkārastasya dharmaḥ sanātanaḥ | śiṣṭairdharmāsane caiva dharmārthasahitāḥ kathāḥ

“उसके बाद अतिथि-सत्कार करना — यही उसका सनातन धर्म है; और शिष्ट जनों के साथ धर्मासन पर बैठकर धर्म और अर्थ से जुड़ी कथाएँ करना;”

श्लोक 19 (13.209.19)

प्रतिश्रयविभागश्च भूमिशय्या शिलासु वा । व्रतोपवासयोगश्च क्षमा चेन्द्रियनिग्रहः ॥

pratiśrayavibhāgaśca bhūmiśayyā śilāsu vā | vratopavāsayogaśca kṣamā cendriyanigrahaḥ

“अपना आश्रय दूसरों के साथ बाँटना, भूमि या शिलाओं पर सोना, व्रत और उपवास का योग, क्षमा और इन्द्रियों का संयम;”

श्लोक 20 (13.209.20)

दिवारात्रं यथायोगं शौचं धर्मस्य चिन्तनम् । एवं धर्माः पुरा दृष्टाः सामान्या वनवासिनाम् ॥

divārātraṃ yathāyogaṃ śaucaṃ dharmasya cintanam | evaṃ dharmāḥ purā dṛṣṭāḥ sāmānyā vanavāsinām

“दिन और रात यथा-अवसर शौच और धर्म का चिन्तन। पूर्वकाल में वनवासियों के ये सामान्य धर्म इसी प्रकार देखे गए हैं।”

श्लोक 21 (13.209.21)

एवं वै यतमानस्य कालधर्मो यथा भवेत् । तथैव सोऽभिजयति स्वर्गलोकं शुचिस्मिते ॥

evaṃ vai yatamānasya kāladharmo yathā bhavet | tathaiva so'bhijayati svargalokaṃ śucismite

“हे सुन्दर मुस्कान वाली, इस प्रकार यत्न करने वाला मनुष्य जब मृत्यु का समय आता है, तभी स्वर्गलोक को जीत लेता है।”

श्लोक 22 (13.209.22)

तत्र संविदिता भोगाः स्वर्गस्त्रीभिरनिन्दिते । परिभ्रष्टो यथा स्वर्गाद्विशिष्टस्तु भवेन्नृषु ॥

tatra saṃviditā bhogāḥ svargastrībhiranindite | paribhraṣṭo yathā svargādviśiṣṭastu bhavennṛṣu

“हे निर्दोष, वहाँ स्वर्ग की स्त्रियों के साथ भोग उसके लिए सुलभ रहते हैं; और जब वह स्वर्ग से च्युत होता है, तब मनुष्यों में श्रेष्ठ बनता है।”

श्लोक 23 (13.209.23)

एवं धर्मस्तथा देवि सर्वेषां वनवासिनाम् । एतत्ते कथितं सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

evaṃ dharmastathā devi sarveṣāṃ vanavāsinām | etatte kathitaṃ sarvaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

“हे देवि, सब वनवासियों का धर्म ऐसा ही है। यह सब मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो?”

उमोवाच

श्लोक 24 (13.209.24)

भगवन्देवदेवेश ऋषीणां चरितं शुभम् । विशेषधर्मानिच्छामि श्रोतुं कौतूहलं हि मे ॥

bhagavandevadeveśa ṛṣīṇāṃ caritaṃ śubham | viśeṣadharmānicchāmi śrotuṃ kautūhalaṃ hi me

“भगवन्, देवों के देव, ऋषियों का आचरण शुभ है। मैं उनके विशेष धर्म सुनना चाहती हूँ, क्योंकि मुझे बड़ा कौतूहल है।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 25 (13.209.25)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu devi samāhitā

“वह मैं तुम्हें बताऊँगा। हे देवि, एकाग्र होकर सुनो।”

श्लोक 26 (13.209.26)

वननित्यैर्वनरतैर्वानप्रस्थैर्महर्षिभिः । वनं गुरुमिवालम्ब्य वस्तव्यमिति निश्चयः ॥

vananityairvanaratairvānaprasthairmaharṣibhiḥ | vanaṃ gurumivālambya vastavyamiti niścayaḥ

“वन में नित्य रहने वाले, वन में रमने वाले वानप्रस्थ महर्षि वन को ही गुरु की तरह आश्रय बनाकर यह निश्चय रखते हैं कि वन में ही रहना है।”

श्लोक 27 (13.209.27)

वीरशय्यामुपासद्भिर्वीरस्थानोपसेविभिः । व्रतोपवासैर्बहुलैर्ग्रीष्मे पञ्चतपैस्तथा ॥

vīraśayyāmupāsadbhirvīrasthānopasevibhiḥ | vratopavāsairbahulairgrīṣme pañcatapaistathā

“कुछ वीरशय्या का सेवन करते हैं और वीरस्थान में रहते हैं; वे बहुत-से व्रत-उपवास करते हैं और ग्रीष्म में पंचाग्नि का तप करते हैं;”

श्लोक 28 (13.209.28)

पञ्चयज्ञपरैर्नित्यं पौर्णमास्यापरायणैः । मण्डूकशायैर्हेमन्ते शैवालाङ्कुरभोजनैः ॥

pañcayajñaparairnityaṃ paurṇamāsyāparāyaṇaiḥ | maṇḍūkaśāyairhemante śaivālāṅkurabhojanaiḥ

“कुछ सदा पंच-यज्ञों में लगे रहते हैं और पूर्णिमा के कर्मों में तत्पर रहते हैं; हेमन्त में कुछ मेंढकों की तरह जल में पड़े रहते हैं और शैवाल तथा अंकुर खाकर रहते हैं;”

श्लोक 29 (13.209.29)

चीरवल्कलसंवीतैर्मृगाजिनधरैस्तथा । चातुर्मास्यपरैः कैश्चिद्देवधर्मपरायणैः ॥

cīravalkalasaṃvītairmṛgājinadharaistathā | cāturmāsyaparaiḥ kaiściddevadharmaparāyaṇaiḥ

“कुछ चीर और वल्कल पहनते हैं, कुछ मृगचर्म धारण करते हैं, और कुछ चातुर्मास्य के व्रतों में तथा देवताओं के प्रति धर्म में तत्पर रहते हैं।”

श्लोक 30 (13.209.30)

एवंविधैर्वनेवासैस्तप्यते सुमहत्तपः । एवं कृत्वा शुभं कर्म पश्चाद्याति त्रिविष्टपम् ॥

evaṃvidhairvanevāsaistapyate sumahattapaḥ | evaṃ kṛtvā śubhaṃ karma paścādyāti triviṣṭapam

“ऐसे वनवासियों द्वारा महान तप किया जाता है। इस प्रकार शुभ कर्म करके वह बाद में स्वर्ग को जाता है।”

श्लोक 31 (13.209.31)

तत्रापि सुमहत्कालं संविहृत्य यथासुखम् । जायते मानुषे लोके दानभोगसमन्वितः ॥

tatrāpi sumahatkālaṃ saṃvihṛtya yathāsukham | jāyate mānuṣe loke dānabhogasamanvitaḥ

“वहाँ भी बहुत लम्बे समय तक सुख से विहार करके वह मनुष्य लोक में दान और भोग से सम्पन्न होकर जन्म लेता है।”

श्लोक 32 (13.209.32)

तपोविशेषसंयुक्ताः कथितास्ते शुचिस्मिते ॥

tapoviśeṣasaṃyuktāḥ kathitāste śucismite

“हे सुन्दर मुस्कान वाली, विशेष तप से युक्त उन ऋषियों का वर्णन तुम्हें कर दिया।”

उमोवाच

श्लोक 33 (13.209.33)

भगवन्देवदेवेश तेषु ये दारसंयुताः । कीदृशं चरितं तेषां तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

bhagavandevadeveśa teṣu ye dārasaṃyutāḥ | kīdṛśaṃ caritaṃ teṣāṃ tanme śaṃsitumarhasi

“भगवन्, देवों के देव, उनमें जो पत्नियों के साथ रहते हैं, उनका आचरण कैसा है? वह मुझे बताने की कृपा कीजिए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 34 (13.209.34)

य एकपत्नीधर्माणश्चरन्ति विपुलं तपः । विंध्यपादेषु ये केचिद्ये च नैमिषवासिनः ॥

ya ekapatnīdharmāṇaścaranti vipulaṃ tapaḥ | viṃdhyapādeṣu ye kecidye ca naimiṣavāsinaḥ

“जो एक-पत्नी-धर्म का पालन करते हुए विपुल तप करते हैं — कुछ विन्ध्य की तलहटी में, और कुछ जो नैमिष में रहते हैं,”

श्लोक 35 (13.209.35)

पुष्करेषु च ये चान्ये नदीवनसमाश्रिताः । सर्वे ते विधिदृष्टेन चरन्ति विपुलं तपः ॥

puṣkareṣu ca ye cānye nadīvanasamāśritāḥ | sarve te vidhidṛṣṭena caranti vipulaṃ tapaḥ

“और अन्य जो पुष्कर में तथा नदियों और वनों के आश्रय में रहते हैं — वे सभी विधि के अनुसार विपुल तप करते हैं।”

श्लोक 36 (13.209.36)

हिंसाद्रोहविमुक्ताश्च सर्वभूतानुकम्पिनः । शान्ता दान्ता जितक्रोधाः सर्वातिथ्यपरायणाः ॥

hiṃsādrohavimuktāśca sarvabhūtānukampinaḥ | śāntā dāntā jitakrodhāḥ sarvātithyaparāyaṇāḥ

“हिंसा और द्रोह से मुक्त, सब प्राणियों पर दया करने वाले, शान्त, संयमी, क्रोध को जीतने वाले और सबके आतिथ्य में तत्पर,”

श्लोक 37 (13.209.37)

प्राणिष्वात्मोपमा नित्यमृतुकालाभिगामिनः । स्वदारसहिता देवि चरन्ति व्रतमुत्तमम् ॥

prāṇiṣvātmopamā nityamṛtukālābhigāminaḥ | svadārasahitā devi caranti vratamuttamam

“प्राणियों को सदा अपने समान मानने वाले और ऋतुकाल में ही पत्नी के पास जाने वाले, हे देवि, वे अपनी पत्नियों के साथ उत्तम व्रत का पालन करते हैं।”

श्लोक 38 (13.209.38)

वसन्ति सुखमव्यग्राः पुत्रदारसमन्विताः । तेषां परिच्छदारम्भाः कृतोपकरणानि च ॥

vasanti sukhamavyagrāḥ putradārasamanvitāḥ | teṣāṃ paricchadārambhāḥ kṛtopakaraṇāni ca

“वे पुत्रों और पत्नियों के साथ सुख से और निश्चिन्त होकर रहते हैं; उनके गृह-सम्बन्धी आयोजन और बनाए हुए उपकरण भी होते हैं।”

श्लोक 39 (13.209.39)

गृहस्थवद्द्वितीयं ते यथायोगं प्रमाणतः । पोषणार्थं स्वदाराणामग्निकार्यार्थमेव च । गावश्च कर्षणं चैव सर्वमेतद्विधीयते ॥

gṛhasthavaddvitīyaṃ te yathāyogaṃ pramāṇataḥ | poṣaṇārthaṃ svadārāṇāmagnikāryārthameva ca | gāvaśca karṣaṇaṃ caiva sarvametadvidhīyate

“गृहस्थ की तरह उनका भी एक दूसरा घर-बार यथोचित और उचित मात्रा में होता है: पत्नियों के पोषण और अग्निकार्य के लिए, तथा गायें और खेती — यह सब विहित है।”

श्लोक 40 (13.209.40)

एवं वनगतैर्देवि कर्तव्यं दारसङ्ग्रहैः । ते स्वदारैः समायान्ति पुण्याँल्लोकान्दृढव्रताः ॥

evaṃ vanagatairdevi kartavyaṃ dārasaṅgrahaiḥ | te svadāraiḥ samāyānti puṇyām̐llokāndṛḍhavratāḥ

“हे देवि, वन में गए हुए जो लोग पत्नियों को साथ रखते हैं, उन्हें इसी प्रकार करना चाहिए। दृढ़ व्रत वाले वे अपनी पत्नियों के साथ पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं।”

श्लोक 41 (13.209.41)

पतिभिः सह ये दाराश्चरन्ति विपुलं तपः । अव्यग्रभावादैकात्म्यात्ताश्च गच्छन्ति वै दिवम् । एतत्ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

patibhiḥ saha ye dārāścaranti vipulaṃ tapaḥ | avyagrabhāvādaikātmyāttāśca gacchanti vai divam | etatte kathitaṃ devi kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

“जो पत्नियाँ पतियों के साथ विपुल तप करती हैं, वे भी निश्चिन्त भाव और एकात्मता के कारण स्वर्ग को जाती हैं। हे देवि, यह मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो?”

अध्याय 208अध्याय-सूचीअध्याय 210