अनुशासन पर्व · अध्याय 210
वानप्रस्थ ऋषियों के कर्मों का फल
उमा के पूछने पर शिव बताते हैं कि वानप्रस्थ ऋषि अपनी तपस्याओं के अनुसार कौन-से स्वर्गीय लोक पाते हैं और उसके बाद उत्तम कुल में पुनर्जन्म कैसे लेते हैं। फिर वे घुमक्कड़ तपस्वियों, शाकटिकों, वैखानसों और अँगूठे जितने वालखिल्यों का वर्णन करते हैं और कहते हैं कि यह जगत् स्वयं तप से ही धारण किया जाता है। अन्त में नारद बताते हैं कि ऋषियों ने शिव की स्तुति की और और भी ऊँची साधना में लग गए।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.210.1)
भगवन्देवदेवेश तेषां कर्मफलं प्रभो । श्रोतुमिच्छाम्यहं देव प्रसादात्ते वरप्रद ॥
bhagavandevadeveśa teṣāṃ karmaphalaṃ prabho | śrotumicchāmyahaṃ deva prasādātte varaprada
“भगवन्, देवों के देव, प्रभो — मैं उनके कर्मों का फल सुनना चाहती हूँ। हे देव, हे वर देने वाले, आपकी कृपा से बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 2 (13.210.2)
वानप्रस्थगतं सर्वं फलपाकं शृणु प्रिये ॥
vānaprasthagataṃ sarvaṃ phalapākaṃ śṛṇu priye
“प्रिये, वानप्रस्थ-जीवन के फल का पूरा परिपाक सुनो।”
श्लोक 3 (13.210.3)
अग्नियोगं व्रजन्ग्रीष्मे ततो द्वादशवार्षिकम् । रुद्रलोकेऽभिजायेत विधिदृष्टेन कर्मणा ॥
agniyogaṃ vrajangrīṣme tato dvādaśavārṣikam | rudraloke'bhijāyeta vidhidṛṣṭena karmaṇā
“जो मनुष्य ग्रीष्म में अग्नि-साधना अपनाकर बारह वर्ष तक उसका पालन करता है, वह विधि के अनुसार किए गए कर्म से रुद्रलोक में जन्म लेता है।”
श्लोक 4 (13.210.4)
उपवासव्रतं कुर्वन्वर्षाकाले दृढव्रतः । सोमलोकेऽभिजायेत नरो द्वादशवार्षिकम् ॥
upavāsavrataṃ kurvanvarṣākāle dṛḍhavrataḥ | somaloke'bhijāyeta naro dvādaśavārṣikam
“जो दृढ़ व्रती वर्षा ऋतु में बारह वर्ष तक उपवास-व्रत करता है, वह सोमलोक में जन्म लेता है।”
श्लोक 5 (13.210.5)
काष्ठवन्मौनमास्थाय नरो द्वादशवार्षिकम् । मरुतां लोकमास्थाय तत्र भोगैश्च युज्यते ॥
kāṣṭhavanmaunamāsthāya naro dvādaśavārṣikam | marutāṃ lokamāsthāya tatra bhogaiśca yujyate
“जो मनुष्य बारह वर्ष तक काठ की तरह मौन धारण किए रहता है, वह मरुतों के लोक को पहुँचकर वहाँ भोगों से युक्त होता है।”
श्लोक 6 (13.210.6)
कुशशर्करसंयुक्ते स्थण्डिले संविशन्मुनिः । यक्षलोकेऽभिजायेत सहस्राणि चतुर्दश ॥
kuśaśarkarasaṃyukte sthaṇḍile saṃviśanmuniḥ | yakṣaloke'bhijāyeta sahasrāṇi caturdaśa
“जो मुनि कुश और कंकड़ों से भरी खुली भूमि पर सोता है, वह यक्षलोक में चौदह हज़ार —”
श्लोक 7 (13.210.7)
वर्षाणां भोगसंयुक्तो नरो द्वादशवार्षिकम् । वीरासनगतो यस्तु कण्टकाफलकाश्रितः । गन्धर्वेष्वभिजायेत नरो द्वादशवार्षिकम् ॥
varṣāṇāṃ bhogasaṃyukto naro dvādaśavārṣikam | vīrāsanagato yastu kaṇṭakāphalakāśritaḥ | gandharveṣvabhijāyeta naro dvādaśavārṣikam
“वर्षों तक भोगों से युक्त होकर जन्म लेता है — यह बारह वर्ष की साधना वाले मनुष्य का फल है। और जो मनुष्य बारह वर्ष तक वीरासन में बैठकर काँटों के तख़्ते का आश्रय लेता है, वह गन्धर्वों में जन्म लेता है।”
श्लोक 8 (13.210.8)
वीरस्थायी चोर्ध्वबाहुर्नरो द्वादशवार्षिकम् । देवलोकेऽभिजायेत दिव्यभोगसमन्वितः ॥
vīrasthāyī cordhvabāhurnaro dvādaśavārṣikam | devaloke'bhijāyeta divyabhogasamanvitaḥ
“जो बारह वर्ष तक भुजाएँ ऊपर उठाए वीरस्थान में खड़ा रहता है, वह दिव्य भोगों से सम्पन्न होकर देवलोक में जन्म लेता है।”
श्लोक 9 (13.210.9)
पादाङ्गुष्ठेन यस्तिष्ठेदूर्ध्वबाहुर्जितेन्द्रियः । इन्द्रलोकेऽभिजायेत सहस्राणि चतुर्दश ॥
pādāṅguṣṭhena yastiṣṭhedūrdhvabāhurjitendriyaḥ | indraloke'bhijāyeta sahasrāṇi caturdaśa
“जो जितेन्द्रिय पुरुष भुजाएँ ऊपर उठाकर पैर के अँगूठे के सहारे खड़ा रहता है, वह इन्द्रलोक में चौदह हज़ार —”
श्लोक 10 (13.210.10)
आहारनियमं कृत्वा मुनिर्द्वादशवार्षिकम् । नागलोकेऽभिजायेत संवत्सरगणान्बहून् ॥
āhāraniyamaṃ kṛtvā munirdvādaśavārṣikam | nāgaloke'bhijāyeta saṃvatsaragaṇānbahūn
“वर्षों तक जन्म लेता है। जो मुनि बारह वर्ष तक आहार का नियम निभाता है, वह नागलोक में बहुत वर्षों के लिए जन्म लेता है।”
श्लोक 11 (13.210.11)
एवं दृढव्रता देवि वानप्रस्थाश्च कर्मभिः । स्थानेषु तत्र तिष्ठन्ति तत्तद्भोगसमन्विताः ॥
evaṃ dṛḍhavratā devi vānaprasthāśca karmabhiḥ | sthāneṣu tatra tiṣṭhanti tattadbhogasamanvitāḥ
“इस प्रकार, हे देवि, दृढ़ व्रत वाले वानप्रस्थ अपने कर्मों से उन-उन स्थानों में रहते हैं और उन-उन भोगों से सम्पन्न होते हैं।”
श्लोक 12 (13.210.12)
तेभ्यो भ्रष्टाः पुनर्देवि जायन्ते नृषु भोगिनः । वर्णोत्तमकुलेष्वेव धनधान्यसमन्विताः ॥
tebhyo bhraṣṭāḥ punardevi jāyante nṛṣu bhoginaḥ | varṇottamakuleṣveva dhanadhānyasamanvitāḥ
“हे देवि, उन लोकों से च्युत होकर वे फिर मनुष्यों में भोगी बनकर, वर्णों में श्रेष्ठ कुलों में, धन-धान्य से सम्पन्न होकर जन्म लेते हैं।”
श्लोक 13 (13.210.13)
एतत्ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
etatte kathitaṃ devi kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
“हे देवि, यह मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो?”
उमोवाच
श्लोक 14 (13.210.14)
एषां यथा वराणां तु धर्ममिच्छामि मानद । कृपया परयाऽऽविष्टस्तन्मे ब्रूहि महेश्वर ॥
eṣāṃ yathā varāṇāṃ tu dharmamicchāmi mānada | kṛpayā parayā''viṣṭastanme brūhi maheśvara
“हे मान देने वाले, मैं इन दूसरे श्रेष्ठ जनों का भी धर्म जानना चाहती हूँ। परम करुणा से भरकर, हे महेश्वर, वह मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 15 (13.210.15)
धर्मं यथा वराणां त्वं शृणु भामिनि तत्परा ॥
dharmaṃ yathā varāṇāṃ tvaṃ śṛṇu bhāmini tatparā
“हे तेजस्विनी, ध्यान से उन श्रेष्ठ जनों का धर्म सुनो।”
श्लोक 16 (13.210.16)
व्रतोपवासशुद्धाङ्गास्तीर्थस्नानपरायणाः । धृतिमन्तः क्षमायुक्ताः सत्यव्रतपरायणाः ॥
vratopavāsaśuddhāṅgāstīrthasnānaparāyaṇāḥ | dhṛtimantaḥ kṣamāyuktāḥ satyavrataparāyaṇāḥ
“व्रत और उपवास से शुद्ध देह वाले, तीर्थ-स्नान में तत्पर, धैर्यवान, क्षमाशील और सत्य-व्रत में लगे हुए,”
श्लोक 17 (13.210.17)
पक्षमासोपवासैश्च कर्शिता धर्मदर्शिनः । वर्षैः शीतातपैश्चैव कुर्वन्तः परमं तपः ॥
pakṣamāsopavāsaiśca karśitā dharmadarśinaḥ | varṣaiḥ śītātapaiścaiva kurvantaḥ paramaṃ tapaḥ
“पक्ष और मास भर के उपवासों से कृश, धर्म को देखने वाले, वर्षा, शीत और धूप में परम तप करते हुए,”
श्लोक 18 (13.210.18)
कालयोगेन गच्छन्ति शक्रलोकं शुचिस्मिते । तत्र ते भोगसंयुक्ता दिव्यगन्धसमन्विताः ॥
kālayogena gacchanti śakralokaṃ śucismite | tatra te bhogasaṃyuktā divyagandhasamanvitāḥ
“हे सुन्दर मुस्कान वाली, समय आने पर वे शक्र (इन्द्र) के लोक को जाते हैं। वहाँ वे भोगों से युक्त और दिव्य सुगन्ध से सम्पन्न होते हैं,”
श्लोक 19 (13.210.19)
दिव्यभूषणसंयुक्ता विमानवरसंयुताः । विचरन्ति यथाकामं दिव्यस्त्रीगणसंयुताः । एतत्ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
divyabhūṣaṇasaṃyuktā vimānavarasaṃyutāḥ | vicaranti yathākāmaṃ divyastrīgaṇasaṃyutāḥ | etatte kathitaṃ devi kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
“दिव्य आभूषणों से सजे और उत्तम विमानों से युक्त होकर दिव्य स्त्रियों के समूहों के साथ इच्छानुसार विचरते हैं। हे देवि, यह मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो?”
उमोवाच
श्लोक 20 (13.210.20)
तेषां चक्रचराणां च धर्ममिच्छामि वै प्रभो ॥
teṣāṃ cakracarāṇāṃ ca dharmamicchāmi vai prabho
“प्रभो, मैं चक्रचरों के धर्म को जानना चाहती हूँ।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 21 (13.210.21)
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु शाकटिकं शुभे ॥
hanta te kathayiṣyāmi śṛṇu śākaṭikaṃ śubhe
“लो, मैं तुम्हें बताता हूँ; हे शुभे, शाकटिकों (गाड़ी वालों) के विषय में सुनो।”
श्लोक 22 (13.210.22)
संवहन्तो धुरं दानैः शकटानां तु सर्वदा । प्रार्थयन्ते यथाकालं शकटैर्भैक्षचर्यया ॥
saṃvahanto dhuraṃ dānaiḥ śakaṭānāṃ tu sarvadā | prārthayante yathākālaṃ śakaṭairbhaikṣacaryayā
“दानों के सहारे सदा अपनी गाड़ियों का जुआ ढोते हुए वे समय-समय पर गाड़ियों से भिक्षावृत्ति द्वारा याचना करते हैं।”
श्लोक 23 (13.210.23)
तपोर्जनपरा धीरास्तपसा क्षीणकल्मषाः । पर्यटन्तो दिशः सर्वाः कामक्रोधविवर्जिताः ॥
taporjanaparā dhīrāstapasā kṣīṇakalmaṣāḥ | paryaṭanto diśaḥ sarvāḥ kāmakrodhavivarjitāḥ
“तप के संचय में लगे, धीर, तप से पाप क्षीण किए हुए, काम और क्रोध से रहित, सब दिशाओं में घूमते हुए,”
श्लोक 24 (13.210.24)
तेनैव कालयोगेन त्रिदिवं यान्ति शोभने । तत्र प्रमुदिता भोगैर्विचरन्ति यथासुखम् ॥
tenaiva kālayogena tridivaṃ yānti śobhane | tatra pramuditā bhogairvicaranti yathāsukham
“हे शोभने, उसी काल-क्रम से वे स्वर्ग को जाते हैं; वहाँ भोगों से प्रसन्न होकर सुख से विचरते हैं।”
श्लोक 25 (13.210.25)
एतत्ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
etatte kathitaṃ devi kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
“हे देवि, यह मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो?”
उमोवाच
श्लोक 26 (13.210.26)
वैखानसानां वै धर्मं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
vaikhānasānāṃ vai dharmaṃ śrotumicchāmyahaṃ prabho
“प्रभो, मैं वैखानसों का धर्म सुनना चाहती हूँ।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 27 (13.210.27)
ते वै वैखानसा नाम वानप्रस्थाः शुभेक्षणे । तीव्रेण तपसा युक्ता दीप्तिमन्तः स्वतेजसा । सत्यव्रतपरा धीरास्तेषां निष्कल्मषं तपः ॥
te vai vaikhānasā nāma vānaprasthāḥ śubhekṣaṇe | tīvreṇa tapasā yuktā dīptimantaḥ svatejasā | satyavrataparā dhīrāsteṣāṃ niṣkalmaṣaṃ tapaḥ
“हे सुन्दर नेत्रों वाली, वे ही वैखानस नामक वानप्रस्थ हैं — उग्र तप से युक्त, अपने तेज से दीप्तिमान, सत्य-व्रत में दृढ़ और धीर; उनका तप निष्कलंक है।”
श्लोक 28 (13.210.28)
अश्मकुट्टास्तथाऽन्ये च दन्तोलूखलिनस्तथा । शीर्णपर्णाशिनश्चान्ये उञ्छवृत्तास्तथा परे ॥
aśmakuṭṭāstathā'nye ca dantolūkhalinastathā | śīrṇaparṇāśinaścānye uñchavṛttāstathā pare
“कुछ अश्मकुट्ट (पत्थर से कूटकर खाने वाले) हैं, कुछ दाँतों को ही ओखली बनाने वाले हैं; अन्य गिरे हुए सूखे पत्ते खाते हैं और दूसरे उञ्छवृत्ति से, अर्थात् बिखरे दाने चुनकर, जीते हैं।”
श्लोक 29 (13.210.29)
कपोतवृत्तयश्चान्ये कापोतीं वृत्तिमाश्रिताः । पशुप्रचारनिरताः फेनपाश्च तथा परे ॥
kapotavṛttayaścānye kāpotīṃ vṛttimāśritāḥ | paśupracāraniratāḥ phenapāśca tathā pare
“अन्य कबूतर की तरह जीविका अपनाए हुए कापोती वृत्ति का आश्रय लेते हैं; कुछ पशुओं के साथ विचरने में लगे रहते हैं और दूसरे केवल झाग पीकर रहते हैं।”
श्लोक 30 (13.210.30)
मृगवन्मृगचर्यायां सञ्चरन्ति तथा परे । अब्भक्षा वायुभक्षाश्च निराहारास्तथैव च ॥
mṛgavanmṛgacaryāyāṃ sañcaranti tathā pare | abbhakṣā vāyubhakṣāśca nirāhārāstathaiva ca
“दूसरे मृग की तरह मृगों की चर्या में विचरते हैं; कुछ केवल जल पर, कुछ केवल वायु पर और कुछ बिना आहार के रहते हैं।”
श्लोक 31 (13.210.31)
केचिच्चरन्ति सद्विष्णोः पादपूजनमुत्तमम् । सञ्चरन्ति तपो घोरं व्याधिमृत्युविवर्जिताः । स्ववशादेव ते मृत्युं भीषयन्ति च नित्यशः ॥
keciccaranti sadviṣṇoḥ pādapūjanamuttamam | sañcaranti tapo ghoraṃ vyādhimṛtyuvivarjitāḥ | svavaśādeva te mṛtyuṃ bhīṣayanti ca nityaśaḥ
“कुछ सदा सत्स्वरूप विष्णु के चरणों की परम पूजा करते हैं। वे रोग और मृत्यु से रहित होकर घोर तप करते हैं और अपनी इच्छा से ही मृत्यु को नित्य डराते हैं।”
श्लोक 32 (13.210.32)
इन्द्रलोके तथा तेषां निर्मिता भोगसञ्चयाः । अमरैः समतां यान्ति देववद्भोगसंयुताः ॥
indraloke tathā teṣāṃ nirmitā bhogasañcayāḥ | amaraiḥ samatāṃ yānti devavadbhogasaṃyutāḥ
“इन्द्रलोक में उनके लिए भोगों के भण्डार रचे गए हैं; वे देवताओं के समान भोगों से युक्त होकर अमरों की समता को प्राप्त होते हैं,”
श्लोक 33 (13.210.33)
वराप्सरोभिः संयुक्ताश्चिरकालमनिन्दिते । एतत्ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
varāpsarobhiḥ saṃyuktāścirakālamanindite | etatte kathitaṃ devi bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi
“हे निर्दोष, श्रेष्ठ अप्सराओं के साथ चिरकाल तक संयुक्त रहते हैं। हे देवि, यह मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो?”
उमोवाच
श्लोक 34 (13.210.34)
भगवञ्श्रोतुमिच्छामि वालखिल्यांस्तपोधनान् ॥
bhagavañśrotumicchāmi vālakhilyāṃstapodhanān
“भगवन्, मैं तपोधन वालखिल्यों के विषय में सुनना चाहती हूँ।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 35 (13.210.35)
धर्मचर्यां तथा देवि वालखिल्यगतां शृणु ॥
dharmacaryāṃ tathā devi vālakhilyagatāṃ śṛṇu
“हे देवि, वालखिल्यों की धर्मचर्या सुनो।”
श्लोक 36 (13.210.36)
मृगनिर्मोकवसना निर्द्वन्द्वास्ते तपोधनाः । अङ्गुष्ठमात्राः सुश्रोणि तेष्वेवाङ्गेषु संश्रिताः ॥
mṛganirmokavasanā nirdvandvāste tapodhanāḥ | aṅguṣṭhamātrāḥ suśroṇi teṣvevāṅgeṣu saṃśritāḥ
“मृगों की उतारी हुई खालें पहने, द्वन्द्वों से मुक्त वे तपोधन अँगूठे के बराबर होते हैं, हे सुन्दर कटि वाली, और अपने ही अंगों में स्थित रहते हैं।”
श्लोक 37 (13.210.37)
उद्यन्तं सततं सूर्यं स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः । भास्करस्येव किरणैः सहसा यान्ति नित्यदा । द्योतयन्तो दिशः सर्वा धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥
udyantaṃ satataṃ sūryaṃ stuvanto vividhaiḥ stavaiḥ | bhāskarasyeva kiraṇaiḥ sahasā yānti nityadā | dyotayanto diśaḥ sarvā dharmajñāḥ satyavādinaḥ
“उगते हुए सूर्य की नाना स्तुतियों से निरन्तर स्तुति करते हुए वे नित्य सूर्य की किरणों के साथ चलते हैं और सब दिशाओं को प्रकाशित करते हैं — धर्म को जानने वाले, सत्यवादी।”
श्लोक 38 (13.210.38)
तेष्वेव निर्मलं सत्यं लोकार्थं तु प्रतिष्ठितम् । लोकोऽयं धार्यते देवि तेषामेव तपोबलात् ॥
teṣveva nirmalaṃ satyaṃ lokārthaṃ tu pratiṣṭhitam | loko'yaṃ dhāryate devi teṣāmeva tapobalāt
“उन्हीं में लोक के हित के लिए निर्मल सत्य प्रतिष्ठित है। हे देवि, यह लोक उन्हीं के तप के बल से धारण किया जाता है।”
श्लोक 39 (13.210.39)
महात्मनां तु तपसा सत्येन च शुचिस्मिते । क्षमया च महाभागे भूतानां संस्थितिं विदुः ॥
mahātmanāṃ tu tapasā satyena ca śucismite | kṣamayā ca mahābhāge bhūtānāṃ saṃsthitiṃ viduḥ
“हे सुन्दर मुस्कान वाली, उन महात्माओं के तप, सत्य और क्षमा से, हे महाभागे, प्राणियों की स्थिति टिकी हुई जानी जाती है।”
श्लोक 40 (13.210.40)
प्रजार्थमपि लोकार्थं महद्भिः क्रियते तपः । तपसा प्राप्यते सर्वं तपसा प्राप्यते फलम् । दुष्प्रापमपि यल्लोके तपसा प्राप्यते हि तत् ॥
prajārthamapi lokārthaṃ mahadbhiḥ kriyate tapaḥ | tapasā prāpyate sarvaṃ tapasā prāpyate phalam | duṣprāpamapi yalloke tapasā prāpyate hi tat
“प्रजा के लिए और लोक के लिए भी महान पुरुषों द्वारा तप किया जाता है। तप से सब कुछ पाया जाता है, तप से फल पाया जाता है; संसार में जो कुछ दुर्लभ है, वह भी तप से प्राप्त होता है।”
श्लोक 41 (13.210.41)
पञ्चभूतार्थतत्वे च लोकसृष्टिविवर्धनम् । एतत्सर्वं समासेन तपोयोगाद्विनिर्मितम् ॥
pañcabhūtārthatatve ca lokasṛṣṭivivardhanam | etatsarvaṃ samāsena tapoyogādvinirmitam
“पंचभूतों के तत्त्व तथा लोक की सृष्टि और वृद्धि — यह सब संक्षेप में तप के योग से ही रचा गया है।”
श्लोक 42 (13.210.42)
तस्मादयं त्वृषिगणस्तपस्तप इति प्रिये । धर्मान्वेषी तपः कर्तुं यतते सततं प्रिये ॥
tasmādayaṃ tvṛṣigaṇastapastapa iti priye | dharmānveṣī tapaḥ kartuṃ yatate satataṃ priye
“इसीलिए, प्रिये, ‘तप, तप’ कहता हुआ यह ऋषिगण धर्म की खोज में, प्रिये, निरन्तर तप करने का यत्न करता है।”
श्लोक 43 (13.210.43)
अमरत्वं शिवत्वं च तपसा प्रापयेत्सदा । एतत्ते कथितं सर्वं शृण्वन्त्यास्ते श्रुतं प्रिये । प्रियार्थमृषिसङ्घस्य प्रजानां हितकाम्यया ॥
amaratvaṃ śivatvaṃ ca tapasā prāpayetsadā | etatte kathitaṃ sarvaṃ śṛṇvantyāste śrutaṃ priye | priyārthamṛṣisaṅghasya prajānāṃ hitakāmyayā
“तप से मनुष्य सदा अमरत्व और शिवत्व पा सकता है। प्रिये, यह सब मैंने तुम्हें बताया और तुमने सुना — ऋषि-समूह के प्रिय के लिए और प्राणियों के हित की कामना से।”
नारद उवाच
श्लोक 44 (13.210.44)
एवं ब्रुवन्तं देवेशमृषयश्चापि तुष्टुवुः । भूयः परतरं यत्तु तदाप्रभृति चक्रिरे ॥
evaṃ bruvantaṃ deveśamṛṣayaścāpi tuṣṭuvuḥ | bhūyaḥ parataraṃ yattu tadāprabhṛti cakrire
देवेश्वर के इस प्रकार कहने पर ऋषियों ने भी उनकी स्तुति की; और उसी समय से वे और भी ऊँची साधना में लग गए।