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अनुशासन पर्व · अध्याय 211

शिव द्वारा उमा को गृहस्थ-धर्म का उपदेश

उमा सबमें व्याप्त धर्म के विषय में पूछती हैं, और महेश्वर ब्राह्मण और शूद्र के कर्तव्य, ब्राह्मण के छह कर्म, अतिथि-सत्कार तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति के दोनों मार्ग बताते हैं, और दान की विशेष प्रशंसा करते हैं। फिर उमा गृहस्थ के व्रतों और माता-पिता से रहित लोगों के आचरण के विषय में पूछती हैं; शिव गृहस्थ के दैनिक नियम बताते हैं, दिखाते हैं कि अन्य सब आश्रम गृहस्थ पर टिके हैं, और अन्त में मोक्ष चाहने वाले परिव्राजक का संक्षिप्त वर्णन करते हैं।

अध्याय 210अध्याय-सूचीअध्याय 212

उमोवाच

श्लोक 1 (13.211.1)

उक्तस्त्वया त्रिवर्गस्य धर्मश्च परमः शुभः । सर्वव्यापी तु यो धर्मो भगवंस्तं ब्रवीतु मे ॥

uktastvayā trivargasya dharmaśca paramaḥ śubhaḥ | sarvavyāpī tu yo dharmo bhagavaṃstaṃ bravītu me

आपने त्रिवर्ग के परम और कल्याणकारी धर्म का उपदेश दिया है। हे भगवन्, अब मुझे वह धर्म बताइए जो सबमें व्याप्त है।

महेश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.211.2)

ब्रह्मणा लोकसंसारे सृष्टा धात्रा गुणार्थिना । लोकांस्तारयितुं युक्ता मर्त्येषु क्षितिदेवताः ॥

brahmaṇā lokasaṃsāre sṛṣṭā dhātrā guṇārthinā | lokāṃstārayituṃ yuktā martyeṣu kṣitidevatāḥ

सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने उत्तम गुणों की इच्छा से इस संसार में मनुष्यों के बीच पृथ्वी के देवता, अर्थात् ब्राह्मण, रचे, जो लोकों को तार देने में समर्थ हैं।

श्लोक 3 (13.211.3)

तेषु तावत्प्रवक्ष्यामि धर्मं शुभफलोदयम् । ब्राह्मणेष्वभयो धर्मः परमः शुभलक्षणः ॥

teṣu tāvatpravakṣyāmi dharmaṃ śubhaphalodayam | brāhmaṇeṣvabhayo dharmaḥ paramaḥ śubhalakṣaṇaḥ

पहले मैं उन्हीं के विषय में वह धर्म कहूँगा जो शुभ फल उत्पन्न करता है। ब्राह्मणों में अभय अर्थात् सबको निर्भयता देना परम धर्म है, जो कल्याण के लक्षणों से युक्त है।

श्लोक 4 (13.211.4)

इमे च धर्मा लोकानां पूर्वं सृष्टाः स्वयंभुवा । पृथिव्यां सद्द्विजैर्नित्यं कीर्त्यमानं निबोध मे ॥

ime ca dharmā lokānāṃ pūrvaṃ sṛṣṭāḥ svayaṃbhuvā | pṛthivyāṃ saddvijairnityaṃ kīrtyamānaṃ nibodha me

लोकों के ये धर्म आरम्भ में स्वयम्भू ने रचे थे। पृथ्वी पर सज्जन द्विज जिस प्रकार इन्हें सदा बताते हैं, वह मुझसे सुनो।

श्लोक 5 (13.211.5)

स्वदारनिरतिर्धर्मो नित्यं जप्यं तथैव च । सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति दिवानिशम् ॥

svadāraniratirdharmo nityaṃ japyaṃ tathaiva ca | sarvātithyaṃ trivargasya yathāśakti divāniśam

अपनी ही पत्नी में निष्ठा, नित्य जप, और त्रिवर्ग के अनुकूल दिन-रात अपनी शक्ति भर सबका आतिथ्य करना।

श्लोक 6 (13.211.6)

शूद्रो धर्मपरो नित्यं शुश्रूषानिरतो भवेत् ॥

śūdro dharmaparo nityaṃ śuśrūṣānirato bhavet

धर्म में तत्पर शूद्र को सदा सेवा में लगा रहना चाहिए।

श्लोक 7 (13.211.7)

त्रैविद्यो ब्राह्मणो वृद्धो न चाध्ययनजीवकः । त्रिवर्गस्य व्यतिक्रान्तं तस्य धर्मः सनातनः ॥

traividyo brāhmaṇo vṛddho na cādhyayanajīvakaḥ | trivargasya vyatikrāntaṃ tasya dharmaḥ sanātanaḥ

तीनों वेदों का ज्ञाता, वृद्ध, अध्यापन से जीविका न चलाने वाला और त्रिवर्ग से परे गया हुआ जो ब्राह्मण है, उसका धर्म सनातन है।

श्लोक 8 (13.211.8)

षट् कर्माणि च प्रोक्तानि सृष्टानि ब्रह्मणा पुरा । धर्मिष्ठानि वरिष्ठानि तानितानि शृणूत्तमे ॥

ṣaṭ karmāṇi ca proktāni sṛṣṭāni brahmaṇā purā | dharmiṣṭhāni variṣṭhāni tānitāni śṛṇūttame

ब्रह्मा ने पूर्वकाल में छह कर्म बताए और रचे थे, जो अत्यन्त धर्ममय और श्रेष्ठ हैं। हे उत्तमे, उन्हें सुनो।

श्लोक 9 (13.211.9)

यजनं याजनं चैव दानं पात्रे प्रतिग्रहः । अध्यापनमध्ययनं षट्कर्मा धर्मभागृजुः ॥

yajanaṃ yājanaṃ caiva dānaṃ pātre pratigrahaḥ | adhyāpanamadhyayanaṃ ṣaṭkarmā dharmabhāgṛjuḥ

यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, योग्य पात्र से दान लेना, पढ़ाना और पढ़ना। इन छह कर्मों वाला सरल पुरुष धर्म का भागी होता है।

श्लोक 10 (13.211.10)

नित्यः स्वाध्यायतो धर्मः नित्ययज्ञः सनातनः । दानं प्रशंसते नित्यं ब्राह्मणेषु त्रिकर्मसु ॥

nityaḥ svādhyāyato dharmaḥ nityayajñaḥ sanātanaḥ | dānaṃ praśaṃsate nityaṃ brāhmaṇeṣu trikarmasu

नित्य स्वाध्याय में धर्म है, और नित्य यज्ञ सनातन है। तीन कर्म करने वाले ब्राह्मणों में दान की सदा प्रशंसा की जाती है।

श्लोक 11 (13.211.11)

अयमेव परो धर्मः संवृतः सत्सु विद्यते । गर्भस्थाने विशुद्धानां धर्मस्य नियमो महान् ॥

ayameva paro dharmaḥ saṃvṛtaḥ satsu vidyate | garbhasthāne viśuddhānāṃ dharmasya niyamo mahān

यही परम धर्म है, जो सुरक्षित रहकर सज्जनों में पाया जाता है। जो गर्भाधान के समय से ही शुद्ध किए गए हैं, उनके लिए धर्म का नियम बड़ा है।

श्लोक 12 (13.211.12)

पञ्चयज्ञविशुद्धात्मा ऋतुनित्योऽनसूयकः । दान्तो ब्राह्मणसत्कर्ता सुसंमृष्टनिवेशनः ॥

pañcayajñaviśuddhātmā ṛtunityo'nasūyakaḥ | dānto brāhmaṇasatkartā susaṃmṛṣṭaniveśanaḥ

जिसकी आत्मा पाँच यज्ञों से शुद्ध है, जो ऋतु-सम्बन्धी नियमों में नित्य लगा रहता है, ईर्ष्या से रहित, संयमी, ब्राह्मणों का सत्कार करने वाला और जिसका घर भली-भाँति झाड़ा-बुहारा रहता है,

श्लोक 13 (13.211.13)

चक्षुःश्रोत्रमनोजिह्वास्निग्धवर्णप्रदः सदा । अतिथ्यभ्यागतरतः शेषान्नकृतभोजनः ॥

cakṣuḥśrotramanojihvāsnigdhavarṇapradaḥ sadā | atithyabhyāgatarataḥ śeṣānnakṛtabhojanaḥ

जो आँख, कान, मन और जीभ को सदा कोमलता प्रदान करता है, अतिथियों और आगन्तुकों में रमा रहता है और उनके भोजन के बाद बचा अन्न खाता है,

श्लोक 14 (13.211.14)

पाद्यमर्घ्यं यथान्यायमासनं शयनं तथा । दीपं प्रतिश्रयं चैव यो ददाति स धार्मिकः ॥

pādyamarghyaṃ yathānyāyamāsanaṃ śayanaṃ tathā | dīpaṃ pratiśrayaṃ caiva yo dadāti sa dhārmikaḥ

जो विधि के अनुसार पैर धोने का जल, अर्घ्य, आसन और शय्या, दीपक तथा आश्रय देता है, वह धार्मिक है।

श्लोक 15 (13.211.15)

प्रातरुत्थाय वै पश्चाद्भोजने तु निमन्त्रयेत् । सत्कृत्याऽनुव्रजेद्यश्च तस्य धर्मः सनातनः ॥

prātarutthāya vai paścādbhojane tu nimantrayet | satkṛtyā'nuvrajedyaśca tasya dharmaḥ sanātanaḥ

जो प्रातः उठकर पीछे अतिथि को भोजन के लिए निमन्त्रित करता है, उसका सत्कार करता है और विदा के समय उसके पीछे-पीछे जाता है, उसका धर्म सनातन है।

श्लोक 16 (13.211.16)

प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो गृहस्थेषु विधीयते । तदहं कीर्तयिष्यामि त्रिवर्गेषु च यद्यथा ॥

pravṛttilakṣaṇo dharmo gṛhastheṣu vidhīyate | tadahaṃ kīrtayiṣyāmi trivargeṣu ca yadyathā

प्रवृत्ति के लक्षणों वाला धर्म गृहस्थों के लिए विहित है। उसे मैं त्रिवर्ग के सम्बन्ध में जैसा है वैसा कहूँगा।

श्लोक 17 (13.211.17)

एकेनांशेन धर्मार्थः कर्तव्यो हितमिच्छता । एकेनांशेन कामार्थमेकमंशं विवर्धयेत् ॥

ekenāṃśena dharmārthaḥ kartavyo hitamicchatā | ekenāṃśena kāmārthamekamaṃśaṃ vivardhayet

अपना हित चाहने वाले को एक अंश धर्म और अर्थ के लिए लगाना चाहिए, एक अंश काम के लिए, और एक अंश को बढ़ाना चाहिए।

श्लोक 18 (13.211.18)

निवृत्तिलक्षणः पुण्यो धर्मो मोक्षो विधीयते । तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि तां शृणुष्व समाहिता ॥

nivṛttilakṣaṇaḥ puṇyo dharmo mokṣo vidhīyate | tasya vṛttiṃ pravakṣyāmi tāṃ śṛṇuṣva samāhitā

निवृत्ति के लक्षणों वाला पुण्यमय धर्म मोक्ष के लिए विहित है। उसका आचरण मैं बताऊँगा; तुम एकाग्र होकर सुनो।

श्लोक 19 (13.211.19)

सर्वभूतदया धर्मो निवृत्तेः परमः सदा । बुभुक्षितं पिपासार्तमतिथिं श्रान्तमागतम् । अर्चयन्ति वरारोहे तेषामपि फलं महत् ॥

sarvabhūtadayā dharmo nivṛtteḥ paramaḥ sadā | bubhukṣitaṃ pipāsārtamatithiṃ śrāntamāgatam | arcayanti varārohe teṣāmapi phalaṃ mahat

सब प्राणियों पर दया ही धर्म है, जो निवृत्ति में सदा सर्वोपरि है। हे वरारोहे, जो भूखे, प्यासे और थके हुए आए अतिथि का सत्कार करते हैं, उन्हें भी महान् फल मिलता है।

श्लोक 20 (13.211.20)

पात्रमित्येव दातव्यं सर्वस्मै धर्मकाङ्क्षिभिः । आगमिष्यति यत्पात्रं तत्पात्रं तारयिष्यति ॥

pātramityeva dātavyaṃ sarvasmai dharmakāṅkṣibhiḥ | āgamiṣyati yatpātraṃ tatpātraṃ tārayiṣyati

धर्म चाहने वालों को सबको यह सोचकर दान देना चाहिए कि यह पात्र है। जो भी पात्र बनकर आएगा, वही पात्र दाता को तार देगा।

श्लोक 21 (13.211.21)

काले सम्प्राप्तमतिथिं भोक्तुकाममुपस्थितम् । यस्तं सम्भावयेत्तत्र व्यासोऽयं समुपस्थितः ॥

kāle samprāptamatithiṃ bhoktukāmamupasthitam | yastaṃ sambhāvayettatra vyāso'yaṃ samupasthitaḥ

जो ठीक समय पर आए हुए, भोजन की इच्छा से उपस्थित अतिथि का वहाँ सत्कार करता है, वह यह मानकर करे कि स्वयं व्यास आ पहुँचे हैं।

श्लोक 22 (13.211.22)

तस्य पूजां यथाशक्त्या सौम्यचित्तः प्रयोजयेत् । चित्तमूलो भवेद्धर्मो धर्ममूलं भवेद्यशः ॥

tasya pūjāṃ yathāśaktyā saumyacittaḥ prayojayet | cittamūlo bhaveddharmo dharmamūlaṃ bhavedyaśaḥ

सौम्य चित्त से अपनी शक्ति के अनुसार उसकी पूजा करे। धर्म का मूल चित्त है और यश का मूल धर्म है।

श्लोक 23 (13.211.23)

तस्मात्सौम्येन चित्तेन दातव्यं देवि सर्वथा । सौम्यचित्तस्तु यो दद्यात्तद्धि दानमनुत्तमम् ॥

tasmātsaumyena cittena dātavyaṃ devi sarvathā | saumyacittastu yo dadyāttaddhi dānamanuttamam

इसलिए हे देवि, सदा सौम्य चित्त से दान देना चाहिए। जो सौम्य चित्त से देता है, उसका वही दान सर्वोत्तम है।

श्लोक 24 (13.211.24)

यथाम्बुबिन्दुभिः सूक्ष्मैः पतद्भिर्मेदिनीतले । केदाराश्च तटाकानि सरांसि सरितस्तथा ॥

yathāmbubindubhiḥ sūkṣmaiḥ patadbhirmedinītale | kedārāśca taṭākāni sarāṃsi saritastathā

जैसे पृथ्वी पर गिरती हुई जल की सूक्ष्म बूँदों से खेत, तालाब, सरोवर और नदियाँ

श्लोक 25 (13.211.25)

तोयपूर्णानि दृश्यन्ते अप्रतर्क्योऽतिशोभने । अल्पमल्पमपि ह्येकं दीयमानं विवर्धते ॥

toyapūrṇāni dṛśyante apratarkyo'tiśobhane | alpamalpamapi hyekaṃ dīyamānaṃ vivardhate

जल से भरी हुई दिखाई देती हैं, हे अत्यन्त शोभने, यह तर्क से परे है; वैसे ही थोड़ा-थोड़ा भी दिया जाता हुआ एक-एक दान बढ़ता जाता है।

श्लोक 26 (13.211.26)

पीडयाऽपि च भृत्यानां दानमेव विशिष्यते । पुत्रदारधनं धान्यं न मृताननुगच्छति ॥

pīḍayā'pi ca bhṛtyānāṃ dānameva viśiṣyate | putradāradhanaṃ dhānyaṃ na mṛtānanugacchati

सेवकों को कष्ट पहुँचाकर भी दान देना श्रेष्ठ है, क्योंकि पुत्र, पत्नी, धन और अन्न मरे हुए के पीछे नहीं जाते।

श्लोक 27 (13.211.27)

श्रेयो दानं च भोगश्च धनं प्राप्य यशस्विनि । दानेन हि महाभागा भवन्ति मनुजाधिपाः ॥

śreyo dānaṃ ca bhogaśca dhanaṃ prāpya yaśasvini | dānena hi mahābhāgā bhavanti manujādhipāḥ

हे यशस्विनी, धन पाकर दान श्रेष्ठ है और भोग भी। दान से ही महाभाग्यशाली लोग मनुष्यों के स्वामी बनते हैं।

श्लोक 28 (13.211.28)

नास्ति भूमौ दानसमं नास्ति दानसमो निधिः । नास्ति सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम् ॥

nāsti bhūmau dānasamaṃ nāsti dānasamo nidhiḥ | nāsti satyātparo dharmo nānṛtātpātakaṃ param

पृथ्वी पर दान के समान कुछ नहीं है, दान के समान कोई निधि नहीं है। सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं और असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं।

श्लोक 29 (13.211.29)

आश्रमे यस्तु तप्येत तपो मूलफलाशनः । आदित्याभिमुखो भूत्वा जटावल्कलसंवृतः । मण्डूकशायी हेमन्ते ग्रीष्मे पञ्चतपा भवेत् ॥

āśrame yastu tapyeta tapo mūlaphalāśanaḥ | ādityābhimukho bhūtvā jaṭāvalkalasaṃvṛtaḥ | maṇḍūkaśāyī hemante grīṣme pañcatapā bhavet

जो आश्रम में रहकर कन्द-मूल और फल खाते हुए तप करता है, सूर्य की ओर मुख किए, जटा और वल्कल पहने, शीत ऋतु में मेंढक की तरह पड़ा रहता है और ग्रीष्म में पंचाग्नि तप करता है,

श्लोक 30 (13.211.30)

सम्यक्तपश्चरन्तीह श्रद्दधाना वनाश्रमे । गृहाश्रमस्य ते देवि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

samyaktapaścarantīha śraddadhānā vanāśrame | gṛhāśramasya te devi kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm

ऐसे लोग भी, जो श्रद्धा के साथ वन के आश्रम में भली-भाँति तप करते हैं, हे देवि, गृहस्थाश्रम की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं ठहरते।

उमोवाच

श्लोक 31 (13.211.31)

गृहाश्रमस्य या चर्या व्रतानि नियमाश्च ये । तथा च देवताः पूज्याः सततं गृहमेधिना ॥

gṛhāśramasya yā caryā vratāni niyamāśca ye | tathā ca devatāḥ pūjyāḥ satataṃ gṛhamedhinā

गृहस्थाश्रम का आचरण, उसके व्रत और नियम, और गृहस्थ को देवताओं की पूजा सदा किस प्रकार करनी चाहिए,

श्लोक 32 (13.211.32)

यद्यच्च परिहर्तव्यं गृहिणातिथिपर्वसु । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथ्यमानं त्वया विभो ॥

yadyacca parihartavyaṃ gṛhiṇātithiparvasu | tatsarvaṃ śrotumicchāmi kathyamānaṃ tvayā vibho

तथा गृहस्थ को अतिथि-दिनों और तिथियों-पर्वों पर जो-जो त्यागना चाहिए, वह सब मैं आपसे सुनना चाहती हूँ, हे विभो।

महेश्वर उवाच

श्लोक 33 (13.211.33)

गृहाश्रमस्य यन्मूलं फलं धर्मोऽयमुत्तमम् । पादैश्चतुर्भिः सततं धर्मो यत्र प्रतिष्ठितः ॥

gṛhāśramasya yanmūlaṃ phalaṃ dharmo'yamuttamam | pādaiścaturbhiḥ satataṃ dharmo yatra pratiṣṭhitaḥ

गृहस्थाश्रम का जो मूल और फल है, वह यही उत्तम धर्म है, जिसमें धर्म सदा चारों पादों पर प्रतिष्ठित रहता है।

श्लोक 34 (13.211.34)

सारभूतं वरारोहे दध्नो घृतमिवोद्धृतम् । तदहं ते प्रवक्ष्यामि श्रूयतां धर्मचारिणि ॥

sārabhūtaṃ varārohe dadhno ghṛtamivoddhṛtam | tadahaṃ te pravakṣyāmi śrūyatāṃ dharmacāriṇi

हे वरारोहे, यह उसका सार है, जैसे दही से निकाला हुआ घी। मैं उसे तुम्हें बताऊँगा; हे धर्मचारिणी, सुनो।

श्लोक 35 (13.211.35)

दंपत्यलङ्करिष्णुश्च गृहदानरतिर्नरः । कलत्रसौख्यं विन्देत नास्ति तत्र विचारणा ॥

daṃpatyalaṅkariṣṇuśca gṛhadānaratirnaraḥ | kalatrasaukhyaṃ vindeta nāsti tatra vicāraṇā

जो पुरुष दम्पतियों को सजाने का शौकीन है और घर में दान देने में रुचि रखता है, उसे पत्नी का सुख मिलता है; इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 36 (13.211.36)

स्त्रियो वा पुरुषो वाऽपि दम्पतीन्पूजयन्ति ते । मनोभिलषितान्कामान्प्राप्नुवन्ति न संशयः ॥

striyo vā puruṣo vā'pi dampatīnpūjayanti te | manobhilaṣitānkāmānprāpnuvanti na saṃśayaḥ

स्त्री हो या पुरुष, जो दम्पतियों का सम्मान करते हैं, वे मनचाही कामनाएँ पाते हैं; इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 37 (13.211.37)

शुश्रूषन्ते ये पितरं मातरं च गृहाश्रमे । भर्तारं चैव या नारी अग्निहोत्रं च ये द्विजाः ॥

śuśrūṣante ye pitaraṃ mātaraṃ ca gṛhāśrame | bhartāraṃ caiva yā nārī agnihotraṃ ca ye dvijāḥ

जो गृहस्थाश्रम में पिता और माता की सेवा करते हैं, जो स्त्री पति की सेवा करती है और जो द्विज अग्निहोत्र की सेवा करते हैं,

श्लोक 38 (13.211.38)

तेषुतेषु च प्रीणन्ति देवा इन्द्रपुरोगमाः । पितरः पितृलोकस्थाः स्वधर्मेण स रज्यते ॥

teṣuteṣu ca prīṇanti devā indrapurogamāḥ | pitaraḥ pitṛlokasthāḥ svadharmeṇa sa rajyate

उन-उन में इन्द्र आदि देवता प्रसन्न होते हैं, और पितृलोक में रहने वाले पितर भी; ऐसा मनुष्य अपने धर्म से आनन्दित होता है।

उमोवाच

श्लोक 39 (13.211.39)

मातापितृवियुक्तानां का चर्या गृहमेधिनाम् । विधवानां च नारीणां भवानेव ब्रवीतु मे ॥

mātāpitṛviyuktānāṃ kā caryā gṛhamedhinām | vidhavānāṃ ca nārīṇāṃ bhavāneva bravītu me

जिन गृहस्थों के माता-पिता नहीं रहे, और जो विधवा स्त्रियाँ हैं, उनका आचरण कैसा हो? यह आप ही मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 40 (13.211.40)

देवतातिथिशुश्रूषा गुरुवृद्धाभिवादनम् । अहिंसा सर्वभूतानामलोभः सत्यसन्धता ॥

devatātithiśuśrūṣā guruvṛddhābhivādanam | ahiṃsā sarvabhūtānāmalobhaḥ satyasandhatā

देवताओं और अतिथियों की सेवा, गुरुजनों और वृद्धों को प्रणाम, सब प्राणियों के प्रति अहिंसा, लोभ का अभाव, सत्य पर दृढ़ता,

श्लोक 41 (13.211.41)

ब्रह्मचर्यं शरण्यत्वं शौचं पूर्वाभिभाषणम् । कृतज्ञत्वमपैशुन्यं सततं धर्मशीलता ॥

brahmacaryaṃ śaraṇyatvaṃ śaucaṃ pūrvābhibhāṣaṇam | kṛtajñatvamapaiśunyaṃ satataṃ dharmaśīlatā

ब्रह्मचर्य, शरण देना, शुचिता, पहले बोलकर अभिवादन करना, कृतज्ञता, चुगली न करना और सदा धर्मशील स्वभाव,

श्लोक 42 (13.211.42)

दिने द्विरभिषेकं च पितृदैवतपूजनम् । गवाह्निकप्रदानं च संविभागोऽतिथिष्वपि ॥

dine dvirabhiṣekaṃ ca pitṛdaivatapūjanam | gavāhnikapradānaṃ ca saṃvibhāgo'tithiṣvapi

दिन में दो बार स्नान, पितरों और देवताओं की पूजा, प्रतिदिन गाय को ग्रास देना और अतिथियों को भी भाग देना,

श्लोक 43 (13.211.43)

दीपप्रतिश्रयं चैव दद्यात्पाद्यासनं तथा । पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा द्वादशेऽप्यष्टमेऽथवा । चतुर्दशे पञ्चदशे ब्रह्मचारी सदा भवेत् ॥

dīpapratiśrayaṃ caiva dadyātpādyāsanaṃ tathā | pañcame'hani ṣaṣṭhe vā dvādaśe'pyaṣṭame'thavā | caturdaśe pañcadaśe brahmacārī sadā bhavet

दीपक और आश्रय देना, पैर धोने का जल और आसन देना। पाँचवें या छठे दिन, बारहवें या आठवें दिन, तथा चौदहवें और पन्द्रहवें दिन वह सदा ब्रह्मचारी रहे।

श्लोक 44 (13.211.44)

श्मश्रुकर्म शिरोभ्यङ्गमञ्जनं दन्तधावनम् । नैतेष्वहस्तु कुर्वीत तेषु लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता ॥

śmaśrukarma śirobhyaṅgamañjanaṃ dantadhāvanam | naiteṣvahastu kurvīta teṣu lakṣmīḥ pratiṣṭhitā

दाढ़ी-मूँछ बनवाना, सिर पर तेल लगाना, अंजन लगाना और दातुन करना, इन दिनों में ये न करे, क्योंकि उनमें लक्ष्मी प्रतिष्ठित रहती है।

श्लोक 45 (13.211.45)

व्रतोपवासनियमस्तपो दानं च शक्तितः । भरणं भृत्यवर्गस्य दीनानामनुकम्पनम् ॥

vratopavāsaniyamastapo dānaṃ ca śaktitaḥ | bharaṇaṃ bhṛtyavargasya dīnānāmanukampanam

व्रत, उपवास और नियम, शक्ति के अनुसार तप और दान, सेवकों का भरण-पोषण और दीनों पर दया,

श्लोक 46 (13.211.46)

परदारान्निवृत्तिश्च स्वदारेषु रतिः सदा । शरीरमेकं दंपत्योर्विधात्रा पूर्वनिर्मितम् । तस्मात्स्वदारनिरतो ब्रह्मचारी विधीयते ॥

paradārānnivṛttiśca svadāreṣu ratiḥ sadā | śarīramekaṃ daṃpatyorvidhātrā pūrvanirmitam | tasmātsvadāranirato brahmacārī vidhīyate

परायी स्त्रियों से दूर रहना और अपनी स्त्री में सदा रमे रहना। विधाता ने दम्पती का एक ही शरीर पहले से बनाया है; इसलिए अपनी पत्नी में रत पुरुष ब्रह्मचारी माना जाता है।

श्लोक 47 (13.211.47)

शीलवृत्तविनीतस्य निगृहीतेन्द्रियस्य च । आर्जवे वर्तमानस्य सर्वभूतहितैषिणः ॥

śīlavṛttavinītasya nigṛhītendriyasya ca | ārjave vartamānasya sarvabhūtahitaiṣiṇaḥ

जो शील और आचरण में संयत है, जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, जो सरलता से रहता है और सब प्राणियों का हित चाहता है,

श्लोक 48 (13.211.48)

प्रियातिथेश्च क्षान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च । गृहाश्रमपदस्थस्य किमन्यैः कृत्यमाश्रमैः ॥

priyātitheśca kṣāntasya dharmārjitadhanasya ca | gṛhāśramapadasthasya kimanyaiḥ kṛtyamāśramaiḥ

जो अतिथियों का प्रिय है, क्षमाशील है और जिसका धन धर्म से कमाया हुआ है, और जो गृहस्थाश्रम के पद पर स्थित है, उसे अन्य आश्रमों से क्या करना है?

श्लोक 49 (13.211.49)

यथा मातरमाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः । तथा गृहाश्रमं प्राप्य सर्वे जीवन्ति चाश्रमाः ॥

yathā mātaramāśritya sarve jīvanti jantavaḥ | tathā gṛhāśramaṃ prāpya sarve jīvanti cāśramāḥ

जैसे सब प्राणी माता का आश्रय लेकर जीते हैं, वैसे ही सब आश्रम गृहस्थाश्रम का आश्रय पाकर जीते हैं।

श्लोक 50 (13.211.50)

राजानः सर्वपाषण्डाः सर्वे रङ्गोपजीविनः । व्यालग्रहाश्च दम्भाश्च चोरा राजभटास्तथा ॥

rājānaḥ sarvapāṣaṇḍāḥ sarve raṅgopajīvinaḥ | vyālagrahāśca dambhāśca corā rājabhaṭāstathā

राजा, सब पाखण्डी, रंगमंच से जीविका चलाने वाले सब लोग, साँप पकड़ने वाले, दम्भी, चोर और राजा के सैनिक,

श्लोक 51 (13.211.51)

सविद्याः सर्वजीवज्ञाः सर्वे वै विचिकित्सकाः । दूराध्वानं प्रपन्नाश्च क्षीणपथ्योदना नराः । एते चान्ये च बहवस्तर्कयन्ति गृहाश्रमम् ॥

savidyāḥ sarvajīvajñāḥ sarve vai vicikitsakāḥ | dūrādhvānaṃ prapannāśca kṣīṇapathyodanā narāḥ | ete cānye ca bahavastarkayanti gṛhāśramam

विद्वान्, सब जीवों को जानने वाले, सब वैद्य, और लम्बे मार्ग पर निकले हुए वे लोग जिनका पाथेय समाप्त हो गया है। ये और बहुत-से अन्य गृहस्थाश्रम की ओर आशा से देखते हैं।

श्लोक 52 (13.211.52)

मार्जारा मूषिकाः श्वानः सूकराश्च शुकास्तथा । कपोतका काकचटकाः सरीसृपनिषेवणाः । अरण्यवासिनश्चान्ये सङ्घा ये मृगपक्षिणाम् ॥

mārjārā mūṣikāḥ śvānaḥ sūkarāśca śukāstathā | kapotakā kākacaṭakāḥ sarīsṛpaniṣevaṇāḥ | araṇyavāsinaścānye saṅghā ye mṛgapakṣiṇām

बिल्लियाँ, चूहे, कुत्ते, सूअर, तोते, कबूतर, कौए और गौरैया, रेंगने वाले जीवों के बीच रहने वाले प्राणी, और वन में रहने वाले पशु-पक्षियों के अन्य झुंड।

श्लोक 53 (13.211.53)

एवं बहुविधा देवि लोकेऽस्मिन्सचराचराः । गृहे क्षेत्रे बिले चैव शतशोऽथ सहस्रशः ॥

evaṃ bahuvidhā devi loke'sminsacarācarāḥ | gṛhe kṣetre bile caiva śataśo'tha sahasraśaḥ

हे देवि, इस प्रकार इस लोक में चर और अचर अनेक प्रकार के प्राणी हैं, घरों में, खेतों में और बिलों में, सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में।

श्लोक 54 (13.211.54)

गृहस्थेन कृतं कर्म सर्वैस्तैरिह भुज्यते । उपयुक्तं च यत्तेषां मतिमान्नानुशोचति ॥

gṛhasthena kṛtaṃ karma sarvaistairiha bhujyate | upayuktaṃ ca yatteṣāṃ matimānnānuśocati

गृहस्थ के किए हुए कर्म का फल वे सभी यहाँ भोगते हैं; और उन्होंने जो खा लिया, उसके लिए बुद्धिमान् शोक नहीं करता।

श्लोक 55 (13.211.55)

धर्म इत्येव सङ्कल्प्य यस्तु तस्य फलं शृणु । सर्वयज्ञप्रणीतस्य हयमेधेन यत्फलम् । वर्षे स द्वादशे देवि फलेनैतेन युज्यते ॥

dharma ityeva saṅkalpya yastu tasya phalaṃ śṛṇu | sarvayajñapraṇītasya hayamedhena yatphalam | varṣe sa dvādaśe devi phalenaitena yujyate

"यह धर्म है" ऐसा संकल्प करके जो करता है, उसका फल सुनो: सब यज्ञ पूरे कर चुके पुरुष को अश्वमेध से जो फल मिलता है, उसी फल से वह बारहवें वर्ष में, हे देवि, युक्त हो जाता है।

श्लोक 56 (13.211.56)

आशापाशविमोक्षं च विधिधर्ममनुत्तमम् । वृक्षमूलचरो नित्यं शून्यागारनिवेशनम् ॥

āśāpāśavimokṣaṃ ca vidhidharmamanuttamam | vṛkṣamūlacaro nityaṃ śūnyāgāraniveśanam

आशा के पाशों से छुटकारा और विधि-रूप सर्वोत्तम धर्म: सदा वृक्षों की जड़ों के पास विचरना और सूने घरों में निवास करना,

श्लोक 57 (13.211.57)

नदीपुलिनशायी च नदीतीरमनुव्रजन् । विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यः स्नेहबन्धेन वै द्विजः ॥

nadīpulinaśāyī ca nadītīramanuvrajan | vimuktaḥ sarvasaṅgebhyaḥ snehabandhena vai dvijaḥ

नदी के तट पर सोना और नदी के किनारे-किनारे चलना, सब आसक्तियों और स्नेह के बन्धन से मुक्त द्विज,

श्लोक 58 (13.211.58)

आत्मन्येवात्मना भावं समायोज्येह तेन वै । आत्मभूतो यताहारो मोक्षदृष्टेन कर्मणा ॥

ātmanyevātmanā bhāvaṃ samāyojyeha tena vai | ātmabhūto yatāhāro mokṣadṛṣṭena karmaṇā

यहाँ आत्मा के द्वारा अपने भाव को आत्मा में ही लगाकर, आत्मरूप होकर, संयत आहार वाला, मोक्ष की दृष्टि से कर्म करने वाला,

श्लोक 59 (13.211.59)

पवित्रनित्यो युक्तश्च तस्य धर्मः सनातनः । नैकत्र रमते सक्तो न चैकग्रामगोचरः । युक्तोऽप्यटति यो युक्तो न चैकपुलिनाश्रयः ॥

pavitranityo yuktaśca tasya dharmaḥ sanātanaḥ | naikatra ramate sakto na caikagrāmagocaraḥ | yukto'pyaṭati yo yukto na caikapulināśrayaḥ

सदा पवित्र और संयमी रहने वाले का धर्म सनातन है। वह आसक्त होकर एक स्थान में नहीं रमता, न एक ही गाँव में विचरता है। जो स्थिर चित्त है, वह स्थिर होकर भी घूमता रहता है और किसी एक नदी-तट का आश्रय नहीं लेता।

श्लोक 60 (13.211.60)

एष मोक्षविदां धर्मो वेदोक्तः सत्पथे स्थितः ॥

eṣa mokṣavidāṃ dharmo vedoktaḥ satpathe sthitaḥ

मोक्ष को जानने वालों का यही धर्म है, जो वेद में कहा गया है और सज्जनों के मार्ग पर स्थित है।

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