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अनुशासन पर्व · अध्याय 212

शिव द्वारा उमा को राजधर्म का उपदेश

उमा पूछती हैं कि जो राजा दूसरे मनुष्यों जैसा ही बना है, वह सबमें प्रधान क्यों है, और मनुष्यों को दण्ड देकर भी वह परलोक कैसे पाता है। महेश्वर बताते हैं कि राज्य महान् तप का फल है और ब्रह्मा ने मनु के द्वारा उसकी स्थापना की; फिर वे राजा को आत्मसंयम, इन्द्रियजय, मन्त्रियों के चुनाव, कोश की रक्षा, मन्त्रणा, युवराज की शिक्षा और पड़ोसी राज्यों के प्रति नीति का उपदेश देते हैं। अन्त में वे न्याय का अनुसरण करने वाले राज्य, जो स्वर्ग देता है, और केवल भाग्य के भरोसे चलने वाले राज्य, जो विनाश और नरक की ओर ले जाता है, की तुलना करते हैं।

अध्याय 211अध्याय-सूचीअध्याय 213

उमोवाच

श्लोक 1 (13.212.1)

देवदेव नमस्तुभ्यं त्र्यक्ष भो वृषभध्वज । श्रुतं मे भगवन्सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वर ॥

devadeva namastubhyaṃ tryakṣa bho vṛṣabhadhvaja | śrutaṃ me bhagavansarvaṃ tvatprasādānmaheśvara

हे देवदेव, त्रिनेत्र, वृषभध्वज, आपको नमस्कार है। हे भगवन् महेश्वर, आपकी कृपा से मैंने यह सब सुन लिया।

श्लोक 2 (13.212.2)

सङ्गृहीतं मया तच्च तव वाक्यमनुत्तमम् । इदानीमस्ति संदेहो मानुषेष्विह कश्चन ॥

saṅgṛhītaṃ mayā tacca tava vākyamanuttamam | idānīmasti saṃdeho mānuṣeṣviha kaścana

आपके उन उत्तम वचनों को मैंने ग्रहण कर लिया है। अब यहाँ मनुष्यों के विषय में मुझे एक सन्देह है।

श्लोक 3 (13.212.3)

तुल्यप्राणशिरःकायो राजाऽयमिति मृश्यते । केन कर्मविपाकेन सर्वप्राधान्यमर्हति ॥

tulyaprāṇaśiraḥkāyo rājā'yamiti mṛśyate | kena karmavipākena sarvaprādhānyamarhati

"यह राजा है" ऐसा माना जाता है, जबकि उसके प्राण, सिर और शरीर दूसरों के समान ही हैं। किन कर्मों के फल से वह सबमें प्रधानता के योग्य होता है?

श्लोक 4 (13.212.4)

स चापि दण्डयन्मर्त्यान्भर्त्सयन्विधमन्नपि । प्रेत्यभावे कथं लोकाँल्लभते पुण्यकर्मणा । राजवृत्तमहं तस्माच्छ्रोतुमिच्छामि मानद ॥

sa cāpi daṇḍayanmartyānbhartsayanvidhamannapi | pretyabhāve kathaṃ lokām̐llabhate puṇyakarmaṇā | rājavṛttamahaṃ tasmācchrotumicchāmi mānada

और वह मनुष्यों को दण्ड देता, फटकारता और कुचलता भी है, फिर परलोक में पुण्य कर्म से उसे लोक कैसे मिलते हैं? इसलिए हे मान देने वाले, मैं राजा के आचरण को सुनना चाहती हूँ।

महेश्वर उवाच

श्लोक 5 (13.212.5)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि राजधर्मं शुभानने ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi rājadharmaṃ śubhānane

तब हे सुमुखी, मैं तुम्हें राजधर्म बताऊँगा।

श्लोक 6 (13.212.6)

राजायत्तं हि यत्सर्वं लोकवृत्तं शुभाशुभम् । महतस्तपसो देवि फलं राज्यमिति स्मृतम् ॥

rājāyattaṃ hi yatsarvaṃ lokavṛttaṃ śubhāśubham | mahatastapaso devi phalaṃ rājyamiti smṛtam

लोक का सारा शुभ-अशुभ व्यवहार राजा पर निर्भर है। राज्य को महान् तप का फल कहा गया है।

श्लोक 7 (13.212.7)

तपोदानमयं राज्यं परं स्थानं विधीयते । तस्माद्राज्ञः सदा मर्त्याः प्रणमन्ति यतस्ततः ॥

tapodānamayaṃ rājyaṃ paraṃ sthānaṃ vidhīyate | tasmādrājñaḥ sadā martyāḥ praṇamanti yatastataḥ

राज्य तप और दान से बना है और परम स्थान माना गया है। इसीलिए मनुष्य जहाँ-तहाँ सदा राजा को प्रणाम करते हैं।

श्लोक 8 (13.212.8)

न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामाऽसि भामिनि । तस्मात्तस्यैव चरितं जगत्पथ्यं शृणु प्रिये ॥

nyāyatastvaṃ mahābhāge śrotukāmā'si bhāmini | tasmāttasyaiva caritaṃ jagatpathyaṃ śṛṇu priye

हे महाभागे भामिनि, तुम उचित ही सुनना चाहती हो। इसलिए हे प्रिये, उसी राजा का वह चरित सुनो जो जगत् के लिए हितकर है।

श्लोक 9 (13.212.9)

अराजके पुरा त्वासीत्प्रजानां सङ्कुलं महत् । तदृष्ट्वा सङ्कुलं ब्रह्मा मनुं राज्ये न्यवेदयत् । तदाप्रभृति संदृष्टं राज्ञां वृत्तं शुभाशुभम् ॥

arājake purā tvāsītprajānāṃ saṅkulaṃ mahat | tadṛṣṭvā saṅkulaṃ brahmā manuṃ rājye nyavedayat | tadāprabhṛti saṃdṛṣṭaṃ rājñāṃ vṛttaṃ śubhāśubham

पूर्वकाल में जब कोई राजा नहीं था, तब प्रजा में बड़ा उपद्रव था। उस उपद्रव को देखकर ब्रह्मा ने मनु को राज्य पर बैठाया। तभी से राजाओं का शुभ-अशुभ आचरण देखा जाने लगा।

श्लोक 10 (13.212.10)

तन्मे शृणु वरारोहे तस्य पथ्यं जगद्धितम् । यथा प्रेत्य लभेत्स्वर्गं यथा वीर्यं यशस्तथा ॥

tanme śṛṇu varārohe tasya pathyaṃ jagaddhitam | yathā pretya labhetsvargaṃ yathā vīryaṃ yaśastathā

हे वरारोहे, वह मुझसे सुनो जो उसके लिए हितकर और जगत् के लिए कल्याणकारी है: कैसे मरकर वह स्वर्ग पाता है और कैसे बल तथा यश।

श्लोक 11 (13.212.11)

पित्र्यं वा भूतपूर्वं वा स्वयमुत्पाद्य वा पुनः । राज्यधर्ममनुष्ठाय विधिवद्भोक्तुमर्हति ॥

pitryaṃ vā bhūtapūrvaṃ vā svayamutpādya vā punaḥ | rājyadharmamanuṣṭhāya vidhivadbhoktumarhati

राज्य पिता से मिला हो, पहले से रहा हो, या उसने स्वयं फिर से बनाया हो, राजधर्म का पालन करके ही वह उसे विधिपूर्वक भोगने योग्य होता है।

श्लोक 12 (13.212.12)

आत्मानमेव प्रथमं विनयैरुपपादयेत् । अनु भृत्यान्प्रजाः पश्चादित्येष विनयक्रमः ॥

ātmānameva prathamaṃ vinayairupapādayet | anu bhṛtyānprajāḥ paścādityeṣa vinayakramaḥ

उसे पहले अपने को विनय से सम्पन्न करना चाहिए, फिर सेवकों को और उसके बाद प्रजा को। यही विनय का क्रम है।

श्लोक 13 (13.212.13)

स्वामिनं चोपमां कृत्वा प्रजास्तद्वृत्तकाङ्क्षया । स्वयं विनयसम्पन्ना भवन्तीह शुभेक्षणे ॥

svāminaṃ copamāṃ kṛtvā prajāstadvṛttakāṅkṣayā | svayaṃ vinayasampannā bhavantīha śubhekṣaṇe

अपने स्वामी को आदर्श बनाकर प्रजा उसके आचरण का अनुसरण करना चाहती है, और हे शुभेक्षणे, इस प्रकार वह स्वयं विनयशील हो जाती है।

श्लोक 14 (13.212.14)

स्वस्मात्पूर्वतरा राजा विनयत्येव वै प्रजाः । अपहास्यो भवेत्तादृक्स्वदोषस्यानवेक्षणात् ॥

svasmātpūrvatarā rājā vinayatyeva vai prajāḥ | apahāsyo bhavettādṛksvadoṣasyānavekṣaṇāt

राजा प्रजा को तभी विनय सिखाता है जब वह पहले स्वयं विनीत हो; नहीं तो अपने दोषों को न देखने के कारण वह उपहास का पात्र बनेगा।

श्लोक 15 (13.212.15)

विद्याभ्यासैर्वृद्धयोगैरात्मानं विनयं नयेत् । विद्या धर्मार्थफलिनी तद्विदो वृद्धसंज्ञिताः ॥

vidyābhyāsairvṛddhayogairātmānaṃ vinayaṃ nayet | vidyā dharmārthaphalinī tadvido vṛddhasaṃjñitāḥ

उसे विद्या के अभ्यास और वृद्धजनों की संगति से अपने को विनय में लाना चाहिए। विद्या धर्म और अर्थ का फल देती है, और उसके जानने वाले वृद्ध कहलाते हैं।

श्लोक 16 (13.212.16)

इन्द्रियाणां जयो देवि अत ऊर्ध्वमुदाहृतः । अजये सुमहान्दोषो राजानं विनिपातयेत् ॥

indriyāṇāṃ jayo devi ata ūrdhvamudāhṛtaḥ | ajaye sumahāndoṣo rājānaṃ vinipātayet

इसके बाद हे देवि, इन्द्रियों पर विजय बताई गई है। विजय न होना बहुत बड़ा दोष है, जो राजा को गिरा सकता है।

श्लोक 17 (13.212.17)

पञ्चैव स्ववशे कृत्वा तदर्थान्पञ्च शोषयेत् । षडुत्सृज्य यथायोगं ज्ञानेन विनयेन च । शास्त्रचक्षुर्नयपरो भूत्वा भृत्यान्समाहरेत् ॥

pañcaiva svavaśe kṛtvā tadarthānpañca śoṣayet | ṣaḍutsṛjya yathāyogaṃ jñānena vinayena ca | śāstracakṣurnayaparo bhūtvā bhṛtyānsamāharet

पाँचों को अपने वश में करके उनके पाँच विषयों को सुखा दे; ज्ञान और विनय से छहों को यथायोग्य छोड़कर, शास्त्र को नेत्र बनाकर और नीति में तत्पर होकर वह सेवकों को एकत्र करे।

श्लोक 18 (13.212.18)

वृत्तश्रुतकुलोपेतानुपधाभिः परीक्षितान् । अमात्यानुपधातीतान्सोपसर्पाञ्जितेन्द्रियान् । योजयेत यथायोगं यथार्हं स्वेषु कर्मसु ॥

vṛttaśrutakulopetānupadhābhiḥ parīkṣitān | amātyānupadhātītānsopasarpāñjitendriyān | yojayeta yathāyogaṃ yathārhaṃ sveṣu karmasu

सदाचार, विद्या और कुल से युक्त, गुप्त परीक्षाओं में परखे हुए, प्रलोभन से परे, गुप्तचरों वाले और जितेन्द्रिय मन्त्रियों को वह यथायोग्य अपने-अपने कर्मों में नियुक्त करे।

श्लोक 19 (13.212.19)

अमात्या बुद्धिसम्पन्ना राष्ट्रं बहुजनप्रियम् । दुराधर्षं पुरश्रेष्ठं कोशः कृच्छ्रसहः स्मृतः ॥

amātyā buddhisampannā rāṣṭraṃ bahujanapriyam | durādharṣaṃ puraśreṣṭhaṃ kośaḥ kṛcchrasahaḥ smṛtaḥ

बुद्धिसम्पन्न मन्त्री, बहुत लोगों को प्रिय राष्ट्र, दुर्धर्ष श्रेष्ठ नगर और संकट सहने में समर्थ कोश, ये प्रकृतियाँ मानी गई हैं।

श्लोक 20 (13.212.20)

अनुरक्तं बलं साम्नामद्वैधं मन्त्रमेव च । एताः प्रकृतयः स्वेषु स्वामी विनयतत्ववित् ॥

anuraktaṃ balaṃ sāmnāmadvaidhaṃ mantrameva ca | etāḥ prakṛtayaḥ sveṣu svāmī vinayatatvavit

अनुरक्त सेना, सामनीति के उपाय और अविभक्त मन्त्रणा, ये अपने राज्य की प्रकृतियाँ हैं, और राजा को विनय के तत्त्व का ज्ञाता होना चाहिए।

श्लोक 21 (13.212.21)

प्रजानां रक्षणार्थाय सर्वमेतद्विनिर्मितम् । आभिः करणभूताभिः कुर्याल्लोकहितं नृपः ॥

prajānāṃ rakṣaṇārthāya sarvametadvinirmitam | ābhiḥ karaṇabhūtābhiḥ kuryāllokahitaṃ nṛpaḥ

यह सब प्रजा की रक्षा के लिए बनाया गया है। इन साधनों से राजा को लोक का हित करना चाहिए।

श्लोक 22 (13.212.22)

आत्मरक्षा नरेन्द्रस्य प्रजारक्षार्थमिष्यते । तस्मात्सततमात्मानं संरक्षेदप्रमादवान् ॥

ātmarakṣā narendrasya prajārakṣārthamiṣyate | tasmātsatatamātmānaṃ saṃrakṣedapramādavān

राजा की आत्मरक्षा प्रजा की रक्षा के लिए ही अभीष्ट है। इसलिए उसे बिना प्रमाद के सदा अपनी रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 23 (13.212.23)

भोजनाच्छादनस्नानाद्बहिर्निष्क्रमणादपि । नित्यं स्त्रीगणसंयोगाद्रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥

bhojanācchādanasnānādbahirniṣkramaṇādapi | nityaṃ strīgaṇasaṃyogādrakṣedātmānamātmavān

भोजन, वस्त्र और स्नान में, बाहर निकलने में, और स्त्री-समूह के नित्य संसर्ग से आत्मवान् राजा अपनी रक्षा करे।

श्लोक 24 (13.212.24)

स्वेभ्यश्चैव परेभ्यश्च शस्त्रादपि विषादपि । सततं पुत्रदारेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् ॥

svebhyaścaiva parebhyaśca śastrādapi viṣādapi | satataṃ putradārebhyo rakṣedātmānamātmavān

अपनों से और परायों से, शस्त्र से और विष से, और सदा पुत्रों और पत्नियों से भी आत्मवान् राजा अपनी रक्षा करे।

श्लोक 25 (13.212.25)

सर्वेभ्य एव स्थानेभ्यो रक्षेदात्मानमात्मवान् । प्रजानां रक्षणार्थाय प्रजाहितकरो भवेत् ॥

sarvebhya eva sthānebhyo rakṣedātmānamātmavān | prajānāṃ rakṣaṇārthāya prajāhitakaro bhavet

आत्मवान् राजा सभी स्थानों से अपनी रक्षा करे; प्रजा की रक्षा के लिए वह प्रजा का हित करने वाला बने।

श्लोक 26 (13.212.26)

प्रजाकार्यं तु तत्कार्यं प्रजासौख्यं तु तत्सुखम् । प्रजाप्रियं प्रियं तस्य स्वहितं तु प्रजाहितम् । प्रजार्थं तस्य सर्वस्वमात्मार्थं न विधीयते ॥

prajākāryaṃ tu tatkāryaṃ prajāsaukhyaṃ tu tatsukham | prajāpriyaṃ priyaṃ tasya svahitaṃ tu prajāhitam | prajārthaṃ tasya sarvasvamātmārthaṃ na vidhīyate

प्रजा का कार्य उसका कार्य है, प्रजा का सुख उसका सुख है, प्रजा का प्रिय उसका प्रिय है और प्रजा का हित ही उसका अपना हित है। उसका सर्वस्व प्रजा के लिए है, अपने लिए कुछ विहित नहीं है।

श्लोक 27 (13.212.27)

प्रकृतीनां हि रक्षार्थं रागद्वेषौ व्युदस्य च । उभयोः पक्षयोर्वादं श्रुत्वा चैव यथातथम् । तमर्थं विमृशेद्बुद्ध्या स्वयमातत्वदर्शनात् ॥

prakṛtīnāṃ hi rakṣārthaṃ rāgadveṣau vyudasya ca | ubhayoḥ pakṣayorvādaṃ śrutvā caiva yathātatham | tamarthaṃ vimṛśedbuddhyā svayamātatvadarśanāt

प्रकृतियों की रक्षा के लिए राग और द्वेष को छोड़कर, दोनों पक्षों की बात जैसी है वैसी सुनकर, वह स्वयं बुद्धि से उस विषय का विचार करे, जब तक सत्य दिखाई न दे।

श्लोक 28 (13.212.28)

तत्वविद्भिश्च बहुभिर्वृद्धैः सह नरोत्तमैः । कर्तारमपराधं च देशकालौ नयानयौ ॥

tatvavidbhiśca bahubhirvṛddhaiḥ saha narottamaiḥ | kartāramaparādhaṃ ca deśakālau nayānayau

सत्य को जानने वाले बहुत-से वृद्ध श्रेष्ठ पुरुषों के साथ वह कर्ता, अपराध, देश और काल, तथा न्याय और अन्याय का विचार करे,

श्लोक 29 (13.212.29)

ज्ञात्वा सम्यग्यथाशास्त्रं ततो दण्डं नयेन्नृषु । एवं कुर्वंल्लभेद्धर्मं पक्षपातविवर्जनात् ॥

jñātvā samyagyathāśāstraṃ tato daṇḍaṃ nayennṛṣu | evaṃ kurvaṃllabheddharmaṃ pakṣapātavivarjanāt

और शास्त्र के अनुसार भली-भाँति जानकर तब मनुष्यों को दण्ड दे। ऐसा करने से, पक्षपात छोड़ने के कारण, वह धर्म पाता है।

श्लोक 30 (13.212.30)

प्रत्यक्षाप्तोपदेशाभ्यामनुमानेन वा पुनः । बोद्धव्यं सततं राज्ञा देशवृत्तं शुभाशुभम् ॥

pratyakṣāptopadeśābhyāmanumānena vā punaḥ | boddhavyaṃ satataṃ rājñā deśavṛttaṃ śubhāśubham

प्रत्यक्ष से, विश्वसनीय जनों के उपदेश से, अथवा अनुमान से राजा को देश के शुभ-अशुभ व्यवहार का सदा ज्ञान रखना चाहिए।

श्लोक 31 (13.212.31)

चारैः कर्मप्रवृत्त्या च तद्विज्ञाय विचारयेत् । अशुभं निर्हरेत्सद्यो जोषयेच्छुभमात्मनः ॥

cāraiḥ karmapravṛttyā ca tadvijñāya vicārayet | aśubhaṃ nirharetsadyo joṣayecchubhamātmanaḥ

गुप्तचरों से और कर्मों की प्रवृत्ति से उसे जानकर वह विचार करे; अशुभ को शीघ्र दूर करे और शुभ को अपने लिए अपनाए।

श्लोक 32 (13.212.32)

गर्ह्यान्विगर्हयेदेव पूज्यान्सम्पूजयेत्तथा । दण्ड्यांश्च दण्डयेद्देवि नात्र कार्या विचारणा ॥

garhyānvigarhayedeva pūjyānsampūjayettathā | daṇḍyāṃśca daṇḍayeddevi nātra kāryā vicāraṇā

निन्दनीय की निन्दा करे, पूजनीय की पूजा करे और दण्डनीय को दण्ड दे, हे देवि; इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 33 (13.212.33)

पञ्चावेक्षन्सदा मन्त्रं कुर्याद्बुद्धियुतैर्नरैः । कुलवृत्तश्रुतोपेतैर्नित्यं मन्त्रपरो भवेत् ॥

pañcāvekṣansadā mantraṃ kuryādbuddhiyutairnaraiḥ | kulavṛttaśrutopetairnityaṃ mantraparo bhavet

पाँच बातों पर दृष्टि रखते हुए वह कुल, आचरण और शास्त्रज्ञान से युक्त बुद्धिमान् पुरुषों के साथ सदा मन्त्रणा करे और नित्य मन्त्रणा में तत्पर रहे।

श्लोक 34 (13.212.34)

कामकारेण वै मुख्यैर्न च मन्त्रमना भवेत् । राजा राष्ट्रहितापेक्षं सत्यधर्माणि कारयेत् ॥

kāmakāreṇa vai mukhyairna ca mantramanā bhavet | rājā rāṣṭrahitāpekṣaṃ satyadharmāṇi kārayet

वह मनमाने ढंग से प्रमुख जनों के साथ मन्त्रणा न करे। राष्ट्र का हित देखने वाला राजा सत्य और धर्म के कार्य कराए।

श्लोक 35 (13.212.35)

सर्वोद्योगं स्वयं कुर्याद्दुर्गादिषु सदा नृषु । देशवृद्धिकरान्भृत्यानप्रमादेन कारयेत् ॥

sarvodyogaṃ svayaṃ kuryāddurgādiṣu sadā nṛṣu | deśavṛddhikarānbhṛtyānapramādena kārayet

वह दुर्ग आदि में, अपने लोगों के बीच, सदा स्वयं सब प्रकार का उद्योग करे, और देश की वृद्धि करने वाले सेवकों से बिना प्रमाद के काम कराए।

श्लोक 36 (13.212.36)

देशक्षयकरान्सर्वानप्रियांश्च विवर्जयेत् । अहन्यहनि सम्पश्येदनुजीविगणं स्वयम् ॥

deśakṣayakarānsarvānapriyāṃśca vivarjayet | ahanyahani sampaśyedanujīvigaṇaṃ svayam

देश का क्षय करने वाले सबको और अप्रिय लोगों को दूर रखे; प्रतिदिन स्वयं अपने आश्रितों के समूह को देखे।

श्लोक 37 (13.212.37)

सुमुखः सुप्रियो दत्त्वा सम्यग्वृत्तं समाचरेत् । अधर्म्यं परुषं तीक्ष्णं वाक्यं वक्तुं न चार्हति ॥

sumukhaḥ supriyo dattvā samyagvṛttaṃ samācaret | adharmyaṃ paruṣaṃ tīkṣṇaṃ vākyaṃ vaktuṃ na cārhati

प्रसन्नमुख और प्रिय बनकर, देने योग्य देकर, वह सम्यक् आचरण करे। उसे अधर्मयुक्त, कठोर और तीखा वचन नहीं बोलना चाहिए।

श्लोक 38 (13.212.38)

असंविश्वास्य वचनं वक्तुं सत्सु न चार्हति । नरेनरे गुणान्दोषान्सम्यग्वेदितुमर्हति ॥

asaṃviśvāsya vacanaṃ vaktuṃ satsu na cārhati | narenare guṇāndoṣānsamyagveditumarhati

सज्जनों के बीच उसे ऐसा वचन नहीं बोलना चाहिए जिस पर विश्वास न हो। उसे प्रत्येक मनुष्य के गुण-दोषों को भली-भाँति जानना चाहिए।

श्लोक 39 (13.212.39)

स्वेङ्गितं वृणुयाद्धैर्यं न कुर्यात्क्षुद्रसंविदम् । परेङ्गितज्ञो लोकेषु भूत्वा संसर्गमाचरेत् ॥

sveṅgitaṃ vṛṇuyāddhairyaṃ na kuryātkṣudrasaṃvidam | pareṅgitajño lokeṣu bhūtvā saṃsargamācaret

वह धैर्य से अपने अभिप्राय को ढके रखे और क्षुद्र सन्धि न करे। लोगों के बीच दूसरों के अभिप्राय को जानकर तब संसर्ग करे।

श्लोक 40 (13.212.40)

स्वतश्च परतश्चैव परस्परभयादपि । अमानुषभयेभ्यश्च स्वाः प्रजाः पालयेन्नृपः ॥

svataśca parataścaiva parasparabhayādapi | amānuṣabhayebhyaśca svāḥ prajāḥ pālayennṛpaḥ

अपनी ओर से और दूसरों की ओर से, परस्पर के भय से, और अमानुष भयों से राजा अपनी प्रजा की रक्षा करे।

श्लोक 41 (13.212.41)

लुब्धाः कठोराश्चाप्यस्य मानवा दस्युवृत्तयः । निग्राह्या एव ते राज्ञा सङ्गृहीत्वा यतस्ततः ॥

lubdhāḥ kaṭhorāścāpyasya mānavā dasyuvṛttayaḥ | nigrāhyā eva te rājñā saṅgṛhītvā yatastataḥ

उसके जो लोग लोभी, कठोर और डाकुओं जैसी वृत्ति वाले हैं, उन्हें राजा जहाँ-कहीं पकड़कर अवश्य रोके।

श्लोक 42 (13.212.42)

कुमारान्विनयोद्बोधैर्जन्मप्रभृति योजयेत् । तेषामात्मगुणोपेतं यौवराज्येन योजयेत् ॥

kumārānvinayodbodhairjanmaprabhṛti yojayet | teṣāmātmaguṇopetaṃ yauvarājyena yojayet

वह राजकुमारों को जन्म से ही विनय और बोध में लगाए, और उनमें से गुणवान् को युवराज-पद पर नियुक्त करे।

श्लोक 43 (13.212.43)

प्रकृतीनां यथा न स्याद्राज्यभ्रंशो भवेद्भयम् । एतत्संचिन्तयेन्नित्यं तद्विधानं तथार्हति ॥

prakṛtīnāṃ yathā na syādrājyabhraṃśo bhavedbhayam | etatsaṃcintayennityaṃ tadvidhānaṃ tathārhati

वह सदा यह सोचे कि प्रकृतियों को राज्य के नष्ट होने का भय न हो; उसके लिए प्रबन्ध करना उसके योग्य है।

श्लोक 44 (13.212.44)

अराजकं क्षणमपि राज्यं न स्याद्धि शोभने । आत्मनोऽनुविधानाय यौवराज्यं सदेष्यते ॥

arājakaṃ kṣaṇamapi rājyaṃ na syāddhi śobhane | ātmano'nuvidhānāya yauvarājyaṃ sadeṣyate

हे शोभने, राज्य क्षण भर भी राजा के बिना न रहे। अपनी व्यवस्था के अनुसरण के लिए युवराज-पद सदा अभीष्ट है।

श्लोक 45 (13.212.45)

कुलजानां च वैद्यानां श्रोत्रियाणां तपस्विनाम् । अन्येषां वृत्तियुक्तानां विशेषं कर्तुमर्हति ॥

kulajānāṃ ca vaidyānāṃ śrotriyāṇāṃ tapasvinām | anyeṣāṃ vṛttiyuktānāṃ viśeṣaṃ kartumarhati

वह कुलीनों, वैद्यों, श्रोत्रियों, तपस्वियों और सदाचार से जीविका चलाने वाले अन्य लोगों का विशेष सम्मान करे।

श्लोक 46 (13.212.46)

आत्मार्थं राज्यतन्त्रार्थं कोशार्थं च समाचरेत् । दुर्गाद्राष्ट्रात्समुद्राच्च वणिग्भ्यः पुरुषात्ययात् ॥

ātmārthaṃ rājyatantrārthaṃ kośārthaṃ ca samācaret | durgādrāṣṭrātsamudrācca vaṇigbhyaḥ puruṣātyayāt

अपने लिए, राज्यतन्त्र के लिए और कोश के लिए वह दुर्गों से, देहात से, समुद्र से, वणिकों से और पुरुषों के अपराध-दण्ड से धन ले।

श्लोक 47 (13.212.47)

परात्मगुणसाराभ्यां भृत्यपोषणमाचरेत् । वाहनानां प्रकुर्वीत पोषणं योधकर्मसु ॥

parātmaguṇasārābhyāṃ bhṛtyapoṣaṇamācaret | vāhanānāṃ prakurvīta poṣaṇaṃ yodhakarmasu

वह दूसरों और अपनों के गुण और बल के अनुसार सेवकों का पोषण करे, और योद्धाओं के कामों में आने वाले वाहनों का पोषण करे।

श्लोक 48 (13.212.48)

सादरः सततं भूत्वा अवेक्षाव्रतमाचरेत् । चतुर्दा विभजेत्कोशं धर्मभृत्यात्मकारणात् ॥

sādaraḥ satataṃ bhūtvā avekṣāvratamācaret | caturdā vibhajetkośaṃ dharmabhṛtyātmakāraṇāt

वह सदा सावधान रहकर सतर्कता का व्रत निभाए। वह धर्म, सेवकों और अपने लिए कोश को चार भागों में बाँटे,

श्लोक 49 (13.212.49)

आपदर्थं च नीतिज्ञो देशकालवशेन तु । अनाथान्व्यथितान्वृद्धान्स्वे देशे पोषयेन्नृपः ॥

āpadarthaṃ ca nītijño deśakālavaśena tu | anāthānvyathitānvṛddhānsve deśe poṣayennṛpaḥ

और नीति का ज्ञाता होकर देश-काल के अनुसार आपत्ति के लिए भी एक भाग रखे। राजा अपने देश में अनाथों, दुखियों और वृद्धों का पोषण करे।

श्लोक 50 (13.212.50)

सन्धिं च विग्रहं चैव तद्विशेषांस्तथा परान् । यथावत्संविमृश्यैव बुद्धिपूर्वं समाचरेत् ॥

sandhiṃ ca vigrahaṃ caiva tadviśeṣāṃstathā parān | yathāvatsaṃvimṛśyaiva buddhipūrvaṃ samācaret

सन्धि और विग्रह, उनके विशेष भेदों और अन्य उपायों का भली-भाँति विचार करके ही वह सोच-समझकर काम करे।

श्लोक 51 (13.212.51)

सर्वेषां सम्प्रियो भूत्वा मण्डलं सततं चरेत् । शुभेष्वपि च कार्येषु न चैकान्तः समाचरेत् ॥

sarveṣāṃ sampriyo bhūtvā maṇḍalaṃ satataṃ caret | śubheṣvapi ca kāryeṣu na caikāntaḥ samācaret

सबका प्रिय होकर वह सदा मण्डल में विचरे। शुभ कार्यों में भी वह एकान्तिक होकर आचरण न करे।

श्लोक 52 (13.212.52)

स्वतश्च परतश्चैव व्यसनानि विमृश्य सः । परेण धार्मिकान्योगान्नातीयाद्द्वेषलोभतः ॥

svataśca parataścaiva vyasanāni vimṛśya saḥ | pareṇa dhārmikānyogānnātīyāddveṣalobhataḥ

अपने और शत्रु के संकटों का विचार करके वह द्वेष या लोभ से शत्रु के साथ भी धर्मसंगत उपायों का उल्लंघन न करे।

श्लोक 53 (13.212.53)

रक्ष्यत्वं वै प्रजाधर्मः क्षत्रधर्मस्तु रक्षणम् । कुनृपैः पीडितास्तस्मात्प्रजाः सर्वत्र पालयेत् ॥

rakṣyatvaṃ vai prajādharmaḥ kṣatradharmastu rakṣaṇam | kunṛpaiḥ pīḍitāstasmātprajāḥ sarvatra pālayet

रक्षित होना प्रजा का धर्म है और रक्षा करना क्षत्रिय का धर्म। इसलिए दुष्ट राजाओं से पीड़ित प्रजा की वह सर्वत्र रक्षा करे।

श्लोक 54 (13.212.54)

यात्राकालेऽनवेक्ष्यैव पश्चात्कोपफलोदयः । तद्युक्ताश्चापदश्चैव शासनादिति चिन्तयेत् ॥

yātrākāle'navekṣyaiva paścātkopaphalodayaḥ | tadyuktāścāpadaścaiva śāsanāditi cintayet

यात्रा के काल का विचार किए बिना चल पड़ने पर बाद में क्रोध-रूप फल उत्पन्न होता है। ऐसे लोगों पर आपत्तियाँ भी आती हैं; शास्त्र के आदेश से वह ऐसा विचार करे।

श्लोक 55 (13.212.55)

व्यसनेभ्यो बलं रक्षेन्नयतो व्ययतोऽपि वा । प्रायशो वर्जयेद्युद्धं प्राणरक्षणकारणात् ॥

vyasanebhyo balaṃ rakṣennayato vyayato'pi vā | prāyaśo varjayedyuddhaṃ prāṇarakṣaṇakāraṇāt

वह नीति से या धन खर्च करके भी अपनी सेना को संकटों से बचाए। प्राणों की रक्षा के लिए प्रायः युद्ध से बचे।

श्लोक 56 (13.212.56)

कारणादेव योद्धव्यं नात्मनः परदोषतः । सुयुद्धे प्राणमोक्षश्च तस्य धर्माय इष्यते ॥

kāraṇādeva yoddhavyaṃ nātmanaḥ paradoṣataḥ | suyuddhe prāṇamokṣaśca tasya dharmāya iṣyate

युद्ध किसी कारण से ही करना चाहिए, अपने लिए शत्रु के दोष के कारण नहीं। भली-भाँति लड़े हुए युद्ध में प्राण त्यागना उसके लिए धर्म माना जाता है।

श्लोक 57 (13.212.57)

अभियुक्तो बलवता कुर्यादापद्विधिं नृपः । अनुनीय तथा सर्वान्प्रजानां हितकारणात् ॥

abhiyukto balavatā kuryādāpadvidhiṃ nṛpaḥ | anunīya tathā sarvānprajānāṃ hitakāraṇāt

बलवान् से आक्रान्त होने पर राजा सबको मनाकर प्रजा के हित के लिए आपत्काल की विधि अपनाए।

श्लोक 58 (13.212.58)

अन्यप्रकृतियुक्तानां राज्ञां वृत्तिविचारिणाम् । अन्यांश्चापत्प्रपन्नानां न तान्संयोक्तुमर्हति ॥

anyaprakṛtiyuktānāṃ rājñāṃ vṛttivicāriṇām | anyāṃścāpatprapannānāṃ na tānsaṃyoktumarhati

जो राजा दूसरी प्रकृतियों से जुड़े हैं और नीति का विचार करते हैं, और जो अन्य लोग आपत्ति में पड़े हैं, उनके साथ उसे अपने को नहीं जोड़ना चाहिए।

श्लोक 59 (13.212.59)

शुभाशुभं यदा देवि व्रतं तूभयसाधनम् । आत्मैव तच्छुभं कुर्यादशुभं योजयेत्परान् ॥

śubhāśubhaṃ yadā devi vrataṃ tūbhayasādhanam | ātmaiva tacchubhaṃ kuryādaśubhaṃ yojayetparān

हे देवि, जब कोई व्रत शुभ और अशुभ दोनों का साधन हो, तब वह शुभ को स्वयं करे और अशुभ को दूसरों से कराए।

श्लोक 60 (13.212.60)

एवमुद्देशतः प्रोक्तमलेपत्वं यथा भवेत् । एष देवि समासेन राजधर्मः प्रकीर्तितः ॥

evamuddeśataḥ proktamalepatvaṃ yathā bhavet | eṣa devi samāsena rājadharmaḥ prakīrtitaḥ

इस प्रकार संक्षेप में बताया गया कि वह निर्लिप्त कैसे रहे। हे देवि, यही राजधर्म संक्षेप में कहा गया है।

श्लोक 61 (13.212.61)

एवं संवर्तमानस्तु दण्डयन्भर्त्सयन्प्रजाः । निष्कल्मषमवाप्नोति पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

evaṃ saṃvartamānastu daṇḍayanbhartsayanprajāḥ | niṣkalmaṣamavāpnoti padmapatramivāmbhasā

इस प्रकार आचरण करते हुए, प्रजा को दण्ड देने और फटकारने पर भी, वह निष्कलंक रहता है, जैसे कमल का पत्ता जल से।

श्लोक 62 (13.212.62)

एवं संवर्तमानस्य कालधर्मो यदा भवेत् । स्वर्गलोके तदा राजा त्रिदशैः सह तोष्यते ॥

evaṃ saṃvartamānasya kāladharmo yadā bhavet | svargaloke tadā rājā tridaśaiḥ saha toṣyate

ऐसा आचरण करने वाले की जब मृत्यु होती है, तब वह राजा स्वर्गलोक में त्रिदश देवताओं के साथ आनन्द पाता है।

श्लोक 63 (13.212.63)

द्विविधं राज्यवृत्तं च न्यायभाग्यसमन्वितम् । एवं न्यायानुगं वृत्तं कथितं ते शुभेक्षणे ॥

dvividhaṃ rājyavṛttaṃ ca nyāyabhāgyasamanvitam | evaṃ nyāyānugaṃ vṛttaṃ kathitaṃ te śubhekṣaṇe

राजा का व्यवहार दो प्रकार का है: न्याय से युक्त और भाग्य से युक्त। हे शुभेक्षणे, न्याय का अनुसरण करने वाला व्यवहार इस प्रकार तुम्हें बताया गया।

श्लोक 64 (13.212.64)

राज्यं न्यायानुगं तात बुद्धिशास्त्रानुगं भवेत् । धर्म्यं पथ्यं यशस्यं च स्वर्ग्यं चैव तथा भवेत् ॥

rājyaṃ nyāyānugaṃ tāta buddhiśāstrānugaṃ bhavet | dharmyaṃ pathyaṃ yaśasyaṃ ca svargyaṃ caiva tathā bhavet

हे तात, जो राज्य न्याय का अनुसरण करता है और बुद्धि तथा शास्त्र के अनुसार चलता है, वह धर्मयुक्त, हितकर, यशस्वी और स्वर्ग देने वाला भी होता है।

श्लोक 65 (13.212.65)

राज्यं भाग्यानुगं नाम अयथावत्प्रदृश्यते । तत्तु शास्त्रविनिर्मुक्तं सतां कोपकरं भवेत् । अधर्म्यमयशस्यं च दुरन्तं च भवेद्ध्रुवम् ॥

rājyaṃ bhāgyānugaṃ nāma ayathāvatpradṛśyate | tattu śāstravinirmuktaṃ satāṃ kopakaraṃ bhavet | adharmyamayaśasyaṃ ca durantaṃ ca bhaveddhruvam

भाग्य का अनुसरण करने वाला राज्य, जैसा कि कहा जाता है, विधिहीन दिखाई देता है। वह शास्त्र से रहित, सज्जनों का क्रोध भड़काने वाला, अधर्मयुक्त, अयशस्वी और निश्चय ही बुरे अन्त वाला होता है।

श्लोक 66 (13.212.66)

यत्र स्वच्छन्दतः सर्वं क्रियते कर्म राजभिः । तत्र भाग्यवशाद्भृत्या लभन्ते न विशेषतः ॥

yatra svacchandataḥ sarvaṃ kriyate karma rājabhiḥ | tatra bhāgyavaśādbhṛtyā labhante na viśeṣataḥ

जहाँ राजा सब कर्म मनमाने ढंग से करते हैं, वहाँ भाग्य के वश सेवकों को योग्यता के अनुसार कोई विशेष फल नहीं मिलता।

श्लोक 67 (13.212.67)

यत्र दण्ड्या न दण्ड्यन्ते पूज्यन्ते वा नराधमाः । यत्र सन्तोऽपि हन्यन्ते तत्र भाग्यानुगं भवेत् ॥

yatra daṇḍyā na daṇḍyante pūjyante vā narādhamāḥ | yatra santo'pi hanyante tatra bhāgyānugaṃ bhavet

जहाँ दण्ड के योग्य दण्डित नहीं होते, या अधम मनुष्यों का सम्मान होता है, और जहाँ सज्जन भी मारे जाते हैं, वहाँ राज्य भाग्य का अनुसरण करने वाला होता है।

श्लोक 68 (13.212.68)

शुभाशुभं यथा यत्र विपरीतं प्रदृश्यते । राज्ञि चासुरपक्षे तु तत्र भाग्यानुगं भवेत् ॥

śubhāśubhaṃ yathā yatra viparītaṃ pradṛśyate | rājñi cāsurapakṣe tu tatra bhāgyānugaṃ bhavet

जहाँ शुभ और अशुभ उलटे दिखाई देते हैं और राजा असुरों के पक्ष में होता है, वहाँ राज्य भाग्य का अनुसरण करने वाला होता है।

श्लोक 69 (13.212.69)

भाग्यानुगे तु राजानो वर्तमाना यथातथा । प्राप्याकीर्तिमनर्थं च इह लोके शुभेक्षणे ॥

bhāgyānuge tu rājāno vartamānā yathātathā | prāpyākīrtimanarthaṃ ca iha loke śubhekṣaṇe

हे शुभेक्षणे, भाग्य के अनुसार चलने वाले राज्य में जैसे-तैसे वर्तने वाले राजा इस लोक में अपकीर्ति और अनर्थ पाते हैं,

श्लोक 70 (13.212.70)

परत्र सुमहाघोरं तमः प्राप्य दुरत्ययम् । तिष्ठन्ति नरके देवि प्रलयान्तादिति स्थितिः ॥

paratra sumahāghoraṃ tamaḥ prāpya duratyayam | tiṣṭhanti narake devi pralayāntāditi sthitiḥ

और परलोक में अत्यन्त घोर, दुस्तर अन्धकार में पहुँचते हैं। हे देवि, वे प्रलय के अन्त तक नरक में रहते हैं; ऐसी स्थिति है।

श्लोक 71 (13.212.71)

मोक्षं दुष्कृतिनां चापि विद्यते कालपर्ययात् । नास्त्येव मोक्षणं देवि राज्ञां दुष्कृतिकारिणाम् ॥

mokṣaṃ duṣkṛtināṃ cāpi vidyate kālaparyayāt | nāstyeva mokṣaṇaṃ devi rājñāṃ duṣkṛtikāriṇām

दुष्कर्म करने वालों के लिए भी काल के फेर से मुक्ति होती है; किन्तु हे देवि, दुष्कर्म करने वाले राजाओं की तो मुक्ति होती ही नहीं।

श्लोक 72 (13.212.72)

एतत्सर्वं समासेन राजवृत्तं शुभाशुभम् । कथितं ते महाभागे भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

etatsarvaṃ samāsena rājavṛttaṃ śubhāśubham | kathitaṃ te mahābhāge bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi

हे महाभागे, राजा का यह सारा शुभ-अशुभ आचरण संक्षेप में तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो?

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