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अनुशासन पर्व · अध्याय 213

शिव का उमा को अहिंसा का उपदेश

महेश्वर उमा से कहते हैं कि अहिंसा सब धर्मों से बढ़कर है। उमा पूछती हैं कि फिर यज्ञ, राजाओं का शिकार और रन्तिदेव द्वारा प्रतिदिन गायों का वध कैसे उचित है। ईश्वर उत्तर देते हैं कि कोई भी सर्वथा अहिंसक नहीं है, क्योंकि हर प्राणी दूसरों को मारकर जीता है; उपवास और मन का संयम अहिंसा का मूल है, और प्रत्येक प्राणी को मृत्यु उसी समय आती है जो विधि ने नियत किया है।

अध्याय 212अध्याय-सूचीअध्याय 214

उमोवाच

श्लोक 1 (13.213.1)

देवदेव महादेव सर्वदेवनमस्कृत । यानि धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामि तान्यहम् ॥

devadeva mahādeva sarvadevanamaskṛta | yāni dharmarahasyāni śrotumicchāmi tānyaham

हे देवों के देव महादेव, सब देवताओं के वन्दनीय, मैं धर्म के जो रहस्य हैं, उन्हें सुनना चाहती हूँ।

महेश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.213.2)

रहस्यं श्रूयतां देवि मानुषाणां सुखावहम् । नपुंसकेषु वन्ध्यासु वियोनौ पृथिवीतले ॥

rahasyaṃ śrūyatāṃ devi mānuṣāṇāṃ sukhāvaham | napuṃsakeṣu vandhyāsu viyonau pṛthivītale

हे देवि, मनुष्यों को सुख देनेवाला एक रहस्य सुनो: नपुंसकों में, बाँझ स्त्रियों में, अयोनि में, अथवा पृथ्वी की भूमि पर,

श्लोक 3 (13.213.3)

उत्सर्गो रेतसस्तेषु न कार्यो धर्मकाङ्क्षिभिः । एतेषु बीजं प्रक्षिप्तं न च रोहति वै प्रिये ॥

utsargo retasasteṣu na kāryo dharmakāṅkṣibhiḥ | eteṣu bījaṃ prakṣiptaṃ na ca rohati vai priye

धर्म चाहनेवालों को वीर्य का त्याग नहीं करना चाहिए। हे प्रिये, इनमें डाला हुआ बीज उगता नहीं।

श्लोक 4 (13.213.4)

यत्र वा तत्र वा बीजं धर्मार्थी नोत्सृजेत्पुनः । नरो बीजविनाशेन लिप्यते ब्रह्महत्यया ॥

yatra vā tatra vā bījaṃ dharmārthī notsṛjetpunaḥ | naro bījavināśena lipyate brahmahatyayā

धर्म की इच्छा रखनेवाला पुरुष जहाँ-तहाँ फिर बीज का त्याग न करे; बीज के नाश से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से लिप्त होता है।

श्लोक 5 (13.213.5)

अहिंसा परमो धर्म अहिंसा परमं सुखम् । अहिंसा धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु परमं पदम् ॥

ahiṃsā paramo dharma ahiṃsā paramaṃ sukham | ahiṃsā dharmaśāstreṣu sarveṣu paramaṃ padam

अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम सुख है; सभी धर्मशास्त्रों में अहिंसा ही परम पद है।

श्लोक 6 (13.213.6)

देवतातिथिशुश्रूषा सततं धर्मशीलता । वेदाध्ययनयज्ञाश्च तपो दानं दमस्तथा ॥

devatātithiśuśrūṣā satataṃ dharmaśīlatā | vedādhyayanayajñāśca tapo dānaṃ damastathā

देवताओं और अतिथियों की सेवा, निरन्तर धर्म में लगे रहना, वेदों का अध्ययन, यज्ञ, तप, दान और दम,

श्लोक 7 (13.213.7)

आचार्यगुरुशुश्रूषा तीर्थाभिगमनं तथा । अहिंसाया वरारोहे कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

ācāryaguruśuśrūṣā tīrthābhigamanaṃ tathā | ahiṃsāyā varārohe kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm

आचार्य और गुरुजनों की सेवा तथा तीर्थयात्रा: हे वरारोहे, ये सब अहिंसा के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं।

श्लोक 8 (13.213.8)

एतत्ते परमं गुह्यमाख्यातं परमार्चितम् ॥

etatte paramaṃ guhyamākhyātaṃ paramārcitam

यह परम रहस्य, जो अत्यन्त पूजित है, मैंने तुम्हें बता दिया।

उमोवाच

श्लोक 9 (13.213.9)

यद्यधर्मस्तु हिंसायां किमर्थममरोत्तम । यज्ञेषु पशुबन्धेषु हन्यन्ते पशवो द्विजैः ॥

yadyadharmastu hiṃsāyāṃ kimarthamamarottama | yajñeṣu paśubandheṣu hanyante paśavo dvijaiḥ

हे देवश्रेष्ठ, यदि हिंसा अधर्म है, तो फिर यज्ञों में पशुओं को बाँधकर ब्राह्मण उन्हें क्यों मारते हैं?

श्लोक 10 (13.213.10)

कथं च भगवन्भूयो हिंसमाना नराधिपाः । स्वर्गं सुदुर्गमं यान्ति तदा स्म रिपुसूदन ॥

kathaṃ ca bhagavanbhūyo hiṃsamānā narādhipāḥ | svargaṃ sudurgamaṃ yānti tadā sma ripusūdana

और हे भगवन्, हे शत्रुसूदन, हिंसा करते रहनेवाले राजा अत्यन्त दुर्गम स्वर्ग को कैसे पहुँचते हैं?

श्लोक 11 (13.213.11)

यस्यैव गोसहस्राणि विंशतिः साधिकानि तु । अहन्यहनि हन्यन्ते द्विजानां मांसकारणात् ॥

yasyaiva gosahasrāṇi viṃśatiḥ sādhikāni tu | ahanyahani hanyante dvijānāṃ māṃsakāraṇāt

जिसकी बीस हज़ार से भी अधिक गायें प्रतिदिन ब्राह्मणों के लिए मांस के निमित्त मारी जाती थीं,

श्लोक 12 (13.213.12)

समांसं तु स दत्त्वाऽन्नं रन्तिदेवो नराधिपः । कथं स्वर्गमनुप्राप्तः परं कौतूहलं हि मे ॥

samāṃsaṃ tu sa dattvā'nnaṃ rantidevo narādhipaḥ | kathaṃ svargamanuprāptaḥ paraṃ kautūhalaṃ hi me

मांस सहित अन्न का दान करनेवाले उन राजा रन्तिदेव को स्वर्ग कैसे मिला? इस विषय में मेरा कौतूहल बहुत बड़ा है।

श्लोक 13 (13.213.13)

किन्तु धर्मं न शृण्वन्ति न श्रद्दधति वा श्रुतम् । मृगयां वै विनिर्गत्य मृगान्हन्ति नराधिपाः ॥

kintu dharmaṃ na śṛṇvanti na śraddadhati vā śrutam | mṛgayāṃ vai vinirgatya mṛgānhanti narādhipāḥ

फिर भी राजा धर्म को सुनते नहीं और सुने हुए पर श्रद्धा नहीं रखते; वे शिकार को निकलकर मृगों को मारते हैं।

श्लोक 14 (13.213.14)

एतत्सर्वं विशेषेण विस्तरेण वृषध्वज । श्रोतुमिच्छामि सर्वज्ञ तत्त्वमद्य ममोच्यताम् ॥

etatsarvaṃ viśeṣeṇa vistareṇa vṛṣadhvaja | śrotumicchāmi sarvajña tattvamadya mamocyatām

हे वृषध्वज, हे सर्वज्ञ, यह सब आज मुझे विस्तार से बताइए; मैं इसका तत्त्व सुनना चाहती हूँ।

ईश्वर उवाच

श्लोक 15 (13.213.15)

बहुमान्यमिदं देवि नास्ति कश्चिदहिंसकः । श्रूयतां कारणं चात्र यथाऽनेकविधं भवेत् ॥

bahumānyamidaṃ devi nāsti kaścidahiṃsakaḥ | śrūyatāṃ kāraṇaṃ cātra yathā'nekavidhaṃ bhavet

हे देवि, यह बात बड़े विचार की है: कोई भी सर्वथा अहिंसक नहीं है। इसका कारण सुनो, जो अनेक प्रकार का है।

श्लोक 16 (13.213.16)

दृश्यते चापि लोकेऽस्मिन्न हि कश्चिदहिंसकः । धरणीसंश्रिता देवि सुसूक्ष्मांश्चैव मध्यमान् ॥

dṛśyate cāpi loke'sminna hi kaścidahiṃsakaḥ | dharaṇīsaṃśritā devi susūkṣmāṃścaiva madhyamān

इस लोक में भी देखा जाता है कि कोई अहिंसक नहीं है। हे देवि, पृथ्वी पर रहनेवाले अत्यन्त सूक्ष्म और मध्यम जीवों को

श्लोक 17 (13.213.17)

सञ्चरंश्चरणाभ्यां च हन्ति जीवाननेकशः । अज्ञानाज्ज्ञानतो वाऽपि यो जीवः शयनासनात् । उपाविशञ्शयानश्च हन्ति जीवाननेकशः ॥

sañcaraṃścaraṇābhyāṃ ca hanti jīvānanekaśaḥ | ajñānājjñānato vā'pi yo jīvaḥ śayanāsanāt | upāviśañśayānaśca hanti jīvānanekaśaḥ

पैरों से चलनेवाला बार-बार मारता रहता है। अज्ञान से हो या जानकर, कोई भी प्राणी शय्या या आसन से उठते, बैठते या लेटते हुए अनेक जीवों को मारता है।

श्लोक 18 (13.213.18)

शिरोवस्त्रेषु ये जीवा नराणां स्वेदसम्भवाः । तांश्च हिंसन्ति सततं दंशांश्च मशकानपि ॥

śirovastreṣu ye jīvā narāṇāṃ svedasambhavāḥ | tāṃśca hiṃsanti satataṃ daṃśāṃśca maśakānapi

मनुष्यों के सिर के बालों और वस्त्रों में पसीने से उत्पन्न जो जीव रहते हैं, उन्हें वे निरन्तर मारते हैं, और डाँस तथा मच्छरों को भी।

श्लोक 19 (13.213.19)

जले जीवास्तथाऽऽकाशे पृथिवी जीवमालिनी । एवं जीवाकुले लोके कोसौ स्याद्यस्त्वहिंसकः ॥

jale jīvāstathā''kāśe pṛthivī jīvamālinī | evaṃ jīvākule loke kosau syādyastvahiṃsakaḥ

जल में जीव हैं, आकाश में जीव हैं, पृथ्वी जीवों की माला पहने हुए है। जीवों से भरे इस लोक में ऐसा कौन है जो अहिंसक हो?

श्लोक 20 (13.213.20)

स्थूलमध्यमसूक्ष्मैश्च स्वेदवारिमहीरुहैः । दृश्यरूपैरदृश्यैश्च नानारूपैश्च भामिनि ॥

sthūlamadhyamasūkṣmaiśca svedavārimahīruhaiḥ | dṛśyarūpairadṛśyaiśca nānārūpaiśca bhāmini

हे भामिनि, स्थूल, मध्यम और सूक्ष्म, स्वेद, जल और वृक्षों से उत्पन्न, दीखनेवाले और न दीखनेवाले, अनेक रूपोंवाले जीवों से

श्लोक 21 (13.213.21)

जीवैस्ततमिदं सर्वमाकाशं पृथिवी तथा । अन्योन्यं ते च हिंसन्ति दुर्बलान्बलवत्तराः ॥

jīvaistatamidaṃ sarvamākāśaṃ pṛthivī tathā | anyonyaṃ te ca hiṃsanti durbalānbalavattarāḥ

यह सारा आकाश और पृथ्वी व्याप्त है। और वे एक-दूसरे को मारते हैं, बलवान दुर्बलों को।

श्लोक 22 (13.213.22)

मत्स्या मत्स्यान्ग्रसन्तीह खगाश्चैव खगांस्तथा । सरीसृपैश्च जीवन्ति कपोताद्या विहङ्गमाः ॥

matsyā matsyāngrasantīha khagāścaiva khagāṃstathā | sarīsṛpaiśca jīvanti kapotādyā vihaṅgamāḥ

यहाँ मछलियाँ मछलियों को खाती हैं और पक्षी पक्षियों को; कबूतर आदि पक्षी रेंगनेवाले जीवों से जीते हैं।

श्लोक 23 (13.213.23)

भूचराः खेचराश्चान्ये क्रव्यादा मांसगृद्धिनः । समृद्धाः परमांसैस्तु भक्षेरंस्तेऽपि चापरैः ॥

bhūcarāḥ khecarāścānye kravyādā māṃsagṛddhinaḥ | samṛddhāḥ paramāṃsaistu bhakṣeraṃste'pi cāparaiḥ

पृथ्वी पर चलनेवाले और आकाश में उड़नेवाले अन्य मांसभक्षी, मांस के लोभी प्राणी दूसरों के मांस से पुष्ट होते हैं, और वे भी दूसरों के द्वारा खाए जाते हैं।

श्लोक 24 (13.213.24)

सत्वैः सत्वानि जीवन्ति शतशोथ सहस्रशः । अपीडयित्वा नैवान्यं जीवा जीवन्ति सुन्दरि ॥

satvaiḥ satvāni jīvanti śataśotha sahasraśaḥ | apīḍayitvā naivānyaṃ jīvā jīvanti sundari

सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में प्राणी प्राणियों के सहारे जीते हैं। हे सुन्दरि, दूसरे को पीड़ा दिए बिना कोई जीव नहीं जीता।

श्लोक 25 (13.213.25)

स्थूलकायस्य सत्वस्य खरस्य महिषस्य च । जीवस्यैकस्य मांसेन पयसा रुधिरेण वा । तृप्यन्ते बहवो जीवाः क्रव्यादा मांसजीविनः ॥

sthūlakāyasya satvasya kharasya mahiṣasya ca | jīvasyaikasya māṃsena payasā rudhireṇa vā | tṛpyante bahavo jīvāḥ kravyādā māṃsajīvinaḥ

गधे या भैंस जैसे एक ही स्थूल शरीरवाले जीव के मांस, दूध या रक्त से मांस पर जीनेवाले बहुत-से मांसभक्षी जीव तृप्त होते हैं।

श्लोक 26 (13.213.26)

एको जीवसहस्राणि सदा खादति मानवः । अन्नाद्यस्य च भोगेन धान्यसंज्ञानि यानि तु ॥

eko jīvasahasrāṇi sadā khādati mānavaḥ | annādyasya ca bhogena dhānyasaṃjñāni yāni tu

अन्न के उपभोग से और जो-जो धान्य कहलाते हैं, उनके सेवन से एक अकेला मनुष्य सदा हज़ारों जीवों को खाता है।

श्लोक 27 (13.213.27)

मांसधान्यैः सबीजैश्च भोजनं परिवर्जयेत् ॥

māṃsadhānyaiḥ sabījaiśca bhojanaṃ parivarjayet

मांस का और बीजसहित धान्यों का भोजन त्याग देना चाहिए।

श्लोक 28 (13.213.28)

त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा सप्तरात्रं तथाऽपि वा । धान्यानि यो न हिंसेताहिंसकः परिकीर्तितः ॥

trirātraṃ pañcarātraṃ vā saptarātraṃ tathā'pi vā | dhānyāni yo na hiṃsetāhiṃsakaḥ parikīrtitaḥ

जो तीन रात, पाँच रात या सात रात तक धान्यों की हिंसा नहीं करता, वह अहिंसक कहा गया है।

श्लोक 29 (13.213.29)

नाश्नाति यावतो जीवस्तावत्पुण्येन युज्यते । आहारस्य वियोगेन शरीरं परितप्यते ॥

nāśnāti yāvato jīvastāvatpuṇyena yujyate | āhārasya viyogena śarīraṃ paritapyate

जब तक मनुष्य भोजन नहीं करता, तब तक वह पुण्य से युक्त रहता है। आहार के अभाव से शरीर तप्त होता है।

श्लोक 30 (13.213.30)

तप्यमाने शरीरे तु शरीरे चेन्द्रियाणि तु । वशे तिष्ठन्ति सुश्रोणि नृपाणामिव किंकराः ॥

tapyamāne śarīre tu śarīre cendriyāṇi tu | vaśe tiṣṭhanti suśroṇi nṛpāṇāmiva kiṃkarāḥ

हे सुश्रोणि, शरीर के तप्त होने पर शरीर में स्थित इन्द्रियाँ भी राजाओं के सेवकों की तरह वश में रहती हैं।

श्लोक 31 (13.213.31)

निरुणद्धीन्द्रियाण्येव स सुखी स विचक्षणः । इन्द्रियाणां निरोधेन दानेन च दमेन च । नरः सर्वमवाप्नोति मनसा यद्यधिच्छति ॥

niruṇaddhīndriyāṇyeva sa sukhī sa vicakṣaṇaḥ | indriyāṇāṃ nirodhena dānena ca damena ca | naraḥ sarvamavāpnoti manasā yadyadhicchati

जो इन्द्रियों को रोकता है, वही सुखी है, वही विवेकी है। इन्द्रियों के निरोध, दान और दम से मनुष्य मन से जो चाहता है, वह सब पा लेता है।

श्लोक 32 (13.213.32)

एवं मूलमहिंसाया उपवासः प्रकीर्तितः ॥

evaṃ mūlamahiṃsāyā upavāsaḥ prakīrtitaḥ

इस प्रकार उपवास को अहिंसा का मूल कहा गया है।

श्लोक 33 (13.213.33)

आहारं कुरुते यस्तु भूमिमाक्रमते च यः । सर्वे ते हिंसका देवि यथा धर्मेषु दृश्यते ॥

āhāraṃ kurute yastu bhūmimākramate ca yaḥ | sarve te hiṃsakā devi yathā dharmeṣu dṛśyate

हे देवि, जो भोजन करता है और जो भूमि पर पैर रखता है, वे सब हिंसक हैं, जैसा धर्मशास्त्रों में दिखाई देता है।

श्लोक 34 (13.213.34)

यथैवाहिंसको देवि तत्वतो ज्ञायते नरः । तथा ते सम्प्रवक्ष्यामि श्रूयतां धर्मचारिणि ॥

yathaivāhiṃsako devi tatvato jñāyate naraḥ | tathā te sampravakṣyāmi śrūyatāṃ dharmacāriṇi

हे धर्मचारिणि, अब मैं तुम्हें बताऊँगा कि मनुष्य वास्तव में अहिंसक कैसे जाना जाता है; सुनो।

श्लोक 35 (13.213.35)

फलानि मूलपर्णानि भस्म वा योपि भक्षयेत् । आलेख्यमिव निश्चेष्टं तं मन्येऽहमहिंसकम् ॥

phalāni mūlaparṇāni bhasma vā yopi bhakṣayet | ālekhyamiva niśceṣṭaṃ taṃ manye'hamahiṃsakam

जो फल, मूल और पत्ते, या भस्म तक खाकर चित्र की तरह निश्चेष्ट रहता है, उसे मैं अहिंसक मानता हूँ।

श्लोक 36 (13.213.36)

आरम्भा हिंसया युक्ता धूमेनाग्निरिवावृताः । तस्माद्यस्तु निराहारस्तं मन्येऽहमहिंसकम् ॥

ārambhā hiṃsayā yuktā dhūmenāgnirivāvṛtāḥ | tasmādyastu nirāhārastaṃ manye'hamahiṃsakam

कर्म-आरम्भ हिंसा से जुड़े होते हैं, जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है। इसलिए जो आहार से सर्वथा रहित है, उसे मैं अहिंसक मानता हूँ।

श्लोक 37 (13.213.37)

यस्तु सर्वं समुत्सृज्य दीक्षित्वा नियतः शुचिः । कृत्वा मण्डलमर्यादां सङ्कल्पं कुरुते नरः ॥

yastu sarvaṃ samutsṛjya dīkṣitvā niyataḥ śuciḥ | kṛtvā maṇḍalamaryādāṃ saṅkalpaṃ kurute naraḥ

जो सब कुछ छोड़कर दीक्षा लेकर संयमी और शुद्ध हो गया है, और मण्डल की मर्यादा बाँधकर संकल्प करता है,

श्लोक 38 (13.213.38)

यावज्जीवमनाशित्वा कालकाङ्क्षी दृढव्रतः । ध्यानेन तपसा युक्तस्तं मन्येऽहमहिंसकम् ॥

yāvajjīvamanāśitvā kālakāṅkṣī dṛḍhavrataḥ | dhyānena tapasā yuktastaṃ manye'hamahiṃsakam

जो आजीवन अनशन करता है, अपने समय की प्रतीक्षा करता है, व्रत में दृढ़ है और ध्यान तथा तप से युक्त है, उसे मैं अहिंसक मानता हूँ।

श्लोक 39 (13.213.39)

अन्यथा हि न पश्यामि नरो यः स्यादहिंसकः । बहु चिन्त्यमिदं देवि नास्ति कश्चिदहिंसकः ॥

anyathā hi na paśyāmi naro yaḥ syādahiṃsakaḥ | bahu cintyamidaṃ devi nāsti kaścidahiṃsakaḥ

इसके सिवा मैं ऐसा कोई मनुष्य नहीं देखता जो अहिंसक हो। हे देवि, इस पर बहुत विचार करना चाहिए: कोई भी अहिंसक नहीं है।

श्लोक 40 (13.213.40)

यतो यतो महाभागे हिंसा स्यान्महती ततः । निवृत्तो मधुमांसाभ्यां हिंसा त्वल्पतरा भवेत् ॥

yato yato mahābhāge hiṃsā syānmahatī tataḥ | nivṛtto madhumāṃsābhyāṃ hiṃsā tvalpatarā bhavet

हे महाभागे, जहाँ-जहाँ बड़ी हिंसा होती है, वहाँ मधु और मांस से निवृत्त हुए मनुष्य के लिए हिंसा बहुत कम रह जाती है।

श्लोक 41 (13.213.41)

निवृत्तिः परमो धर्मो निवृत्तिः परमं सुखम् । मनसा विनिवृत्तानां धर्मस्य निचयो महान् ॥

nivṛttiḥ paramo dharmo nivṛttiḥ paramaṃ sukham | manasā vinivṛttānāṃ dharmasya nicayo mahān

निवृत्ति परम धर्म है, निवृत्ति परम सुख है। जो मन से निवृत्त हो गए हैं, उनके लिए धर्म का भारी संचय होता है।

श्लोक 42 (13.213.42)

मनःपूर्वागमा धर्मा अधर्माश्च न संशयः । मनसा बध्यते चापि मुच्यते चापि मानवः ॥

manaḥpūrvāgamā dharmā adharmāśca na saṃśayaḥ | manasā badhyate cāpi mucyate cāpi mānavaḥ

धर्म और अधर्म दोनों मन से ही आरम्भ होते हैं, इसमें संशय नहीं। मन से ही मनुष्य बँधता है और मन से ही छूटता है।

श्लोक 43 (13.213.43)

निगृहीते भवेत्स्वर्गो विसृष्टे नरको ध्रुवः । घातकः शस्त्रमुद्यम्य मनसा चिन्तयेद्यदि ॥

nigṛhīte bhavetsvargo visṛṣṭe narako dhruvaḥ | ghātakaḥ śastramudyamya manasā cintayedyadi

मन को रोक लेने पर स्वर्ग होता है और खुला छोड़ देने पर नरक निश्चित है। यदि कोई घातक शस्त्र उठाकर मन में सोचे:

श्लोक 44 (13.213.44)

आयुःक्षयं गतेऽन्येषां मृते तु प्रहराम्यहम् । इति यो घातको हन्यान्न स पापेन लिप्यते ॥

āyuḥkṣayaṃ gate'nyeṣāṃ mṛte tu praharāmyaham | iti yo ghātako hanyānna sa pāpena lipyate

'दूसरों की आयु समाप्त हो चुकने पर मैं केवल मरे हुए को ही मारता हूँ', तो इस विचार से मारनेवाला घातक पाप से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 45 (13.213.45)

विधिना निहताः पूर्वं निमित्तं स तु घातकः । विधिर्हि बलवान्देवि दुस्त्यजं वै पुराकृतम् ॥

vidhinā nihatāḥ pūrvaṃ nimittaṃ sa tu ghātakaḥ | vidhirhi balavāndevi dustyajaṃ vai purākṛtam

वे पहले ही विधि के द्वारा मारे जा चुके थे; घातक तो केवल निमित्त है। हे देवि, विधि बलवान है; पूर्वकृत कर्म को त्यागना कठिन है।

श्लोक 46 (13.213.46)

जीवाः पुराकृतेनैव तिर्यग्योनिसरीसृपाः । नानायोनिषु जायन्ते स्वकर्मपरिवेष्टिताः ॥

jīvāḥ purākṛtenaiva tiryagyonisarīsṛpāḥ | nānāyoniṣu jāyante svakarmapariveṣṭitāḥ

पूर्वकृत कर्म के कारण ही जीव पशु-पक्षी और रेंगनेवाले प्राणियों के रूप में, अपने कर्मों से घिरे हुए, अनेक योनियों में जन्म लेते हैं।

श्लोक 47 (13.213.47)

नानाविधविचित्राङ्गा नानाशौर्यपराक्रमाः । नानाभूमिप्रदेशेषु नानाहारश्च जन्तवः ॥

nānāvidhavicitrāṅgā nānāśauryaparākramāḥ | nānābhūmipradeśeṣu nānāhāraśca jantavaḥ

अनेक प्रकार के जीव हैं, नाना और विचित्र अंगोंवाले, नाना शौर्य और पराक्रमवाले, भिन्न-भिन्न भूभागों में रहनेवाले और भिन्न-भिन्न आहारवाले।

श्लोक 48 (13.213.48)

जायमानस्य जीवस्य मृत्युः पूर्वं प्रजायते । सुखं वा यदि वा दुःखं यथापूर्वं कृतं तु वा ॥

jāyamānasya jīvasya mṛtyuḥ pūrvaṃ prajāyate | sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ yathāpūrvaṃ kṛtaṃ tu vā

जन्म लेनेवाले जीव के लिए मृत्यु पहले से ही निश्चित होती है, और सुख या दुःख भी, जैसा पहले किया गया हो।

श्लोक 49 (13.213.49)

प्राप्नुवन्ति नरा मृत्युं यदा यत्र च येन च । नातिक्रान्तुं हि शक्यः स्यान्निदेशः पूर्वकर्मणः ॥

prāpnuvanti narā mṛtyuṃ yadā yatra ca yena ca | nātikrāntuṃ hi śakyaḥ syānnideśaḥ pūrvakarmaṇaḥ

मनुष्य जब, जहाँ और जिसके द्वारा नियत है, तभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं; पूर्वकर्म के आदेश का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

श्लोक 50 (13.213.50)

अप्रमत्तः प्रमत्तेषु विधिर्जागर्ति जन्तुषु । न हि तस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यो न च मध्यमः ॥

apramattaḥ pramatteṣu vidhirjāgarti jantuṣu | na hi tasya priyaḥ kaścinna dveṣyo na ca madhyamaḥ

प्रमत्त प्राणियों के बीच विधि सावधान होकर जागती रहती है। न उसे कोई प्रिय है, न कोई द्वेष्य, न कोई मध्यम।

श्लोक 51 (13.213.51)

समः सर्वेषु भूतेषु कालः कालं निरीक्षते । गतायुषो ह्याक्षिपते जीवः सर्वस्य देहिनः ॥

samaḥ sarveṣu bhūteṣu kālaḥ kālaṃ nirīkṣate | gatāyuṣo hyākṣipate jīvaḥ sarvasya dehinaḥ

सब प्राणियों के प्रति समान काल अपने नियत क्षण को देखता रहता है। आयु बीत जाने पर प्रत्येक देहधारी का जीव खींच लिया जाता है।

श्लोक 52 (13.213.52)

यथा येन च मर्तव्यं नान्यथा म्रियते हि सः । दृश्यते न च लोकेऽस्मिन्भूतो भव्यो द्विधा पुनः ॥

yathā yena ca martavyaṃ nānyathā mriyate hi saḥ | dṛśyate na ca loke'sminbhūto bhavyo dvidhā punaḥ

जैसे और जिस कारण से जिसे मरना है, वह वैसे ही मरता है, अन्यथा नहीं। इस लोक में कभी नहीं दिखता कि जो हो चुका या जो होनेवाला है, वह दो प्रकार से हो।

श्लोक 53 (13.213.53)

विज्ञानैर्विक्रमैर्वाऽपि नानामन्त्रौषधैरपि । यो हि वञ्चयितुं शक्तो विधेस्तु नियतां गतिम् ॥

vijñānairvikramairvā'pi nānāmantrauṣadhairapi | yo hi vañcayituṃ śakto vidhestu niyatāṃ gatim

ज्ञान से, पराक्रम से, या नाना मन्त्रों और औषधियों से भी कौन विधि की निश्चित गति को धोखा दे सकता है?

श्लोक 54 (13.213.54)

एष तेऽभिहितो देवि जीवहिंसाविधिक्रमः ॥

eṣa te'bhihito devi jīvahiṃsāvidhikramaḥ

हे देवि, इस प्रकार जीवहिंसा से सम्बन्धित विधि का क्रम तुम्हें बता दिया गया।

अध्याय 212अध्याय-सूचीअध्याय 214