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अनुशासन पर्व · अध्याय 214

विधि की अटलता और संग्राम-यज्ञ

महेश्वर पतंगों, मृगों, मछलियों और किसानों के हल से मरनेवाले जीवों के उदाहरणों से दिखाते हैं कि विधि से बचा नहीं जा सकता, और बताते हैं कि रन्तिदेव की गायें अपने आप वध के लिए कैसे आईं और चर्मण्वती नदी कैसे बनी। फिर वे योद्धा के धर्म पर आते हैं: जिसने सम्मान दिया है उस स्वामी के लिए सैनिक को लड़ना चाहिए, युद्ध को यज्ञ के रूप में बताया गया है, मारा गया और मारनेवाला दोनों सम्मान पाते हैं, और राजा को सब धर्मों की रक्षा करनी चाहिए। अन्त में वे कहते हैं कि प्राणों का त्याग सारी पृथ्वी के दान से भी बढ़कर है।

अध्याय 213अध्याय-सूचीअध्याय 215

महेश्वर उवाच

श्लोक 1 (13.214.1)

श्रूयतां कारणं देवि यथा हि दुरतिक्रमः । विधिः सर्वेषु भूतेषु मर्तव्ये समुपस्थिते ॥

śrūyatāṃ kāraṇaṃ devi yathā hi duratikramaḥ | vidhiḥ sarveṣu bhūteṣu martavye samupasthite

हे देवि, कारण सुनो कि सब प्राणियों के लिए मृत्यु का समय आ जाने पर विधि को लाँघना क्यों इतना कठिन है।

श्लोक 2 (13.214.2)

आयुःक्षयेणोपहिताः समागम्य वरानने । कीटाः पतङ्गा बहवः स्थूलाः सूक्ष्माश्च मध्यमाः । प्रज्वलत्सु प्रदीपेषु स्वयमेव पतन्ति ते ॥

āyuḥkṣayeṇopahitāḥ samāgamya varānane | kīṭāḥ pataṅgā bahavaḥ sthūlāḥ sūkṣmāśca madhyamāḥ | prajvalatsu pradīpeṣu svayameva patanti te

हे वरानने, जिनकी आयु क्षीण हो चुकी है, वे जीव आ जुटते हैं: बहुत-से कीट और पतंगे, बड़े, छोटे और मध्यम, जलते हुए दीपकों में अपने आप गिर पड़ते हैं।

श्लोक 3 (13.214.3)

बहूनां मृगयूथानां नानावननिषेविणाम् । यस्तु कालं गतस्तेषां स वै पाशेन बध्यते ॥

bahūnāṃ mṛgayūthānāṃ nānāvananiṣeviṇām | yastu kālaṃ gatasteṣāṃ sa vai pāśena badhyate

नाना वनों में विचरनेवाले मृगों के बहुत-से झुण्डों में से जिसका काल आ गया है, वही फंदे में बँधता है।

श्लोक 4 (13.214.4)

सूनार्थं देवि बद्धानां क्षीणायुर्यो निबध्यते । अवशो घातकस्याथ हस्तं तदहरेति सः ॥

sūnārthaṃ devi baddhānāṃ kṣīṇāyuryo nibadhyate | avaśo ghātakasyātha hastaṃ tadahareti saḥ

हे देवि, वध के लिए बाँधे गए जीवों में से जिसकी आयु क्षीण हो चुकी है, वही बँधता है; और विवश होकर उसी दिन घातक के हाथ में पहुँच जाता है।

श्लोक 5 (13.214.5)

यथा पक्षिगणाः क्षिप्रं विस्तीर्णाकाशगामिनः । क्षीणायुषो निबध्यन्ते शक्ता अपि पलायितुम् ॥

yathā pakṣigaṇāḥ kṣipraṃ vistīrṇākāśagāminaḥ | kṣīṇāyuṣo nibadhyante śaktā api palāyitum

इसी प्रकार विस्तृत आकाश में तेज़ी से उड़नेवाले पक्षियों के झुण्ड भी, भाग निकलने में समर्थ होते हुए भी, आयु क्षीण होने पर बँध जाते हैं।

श्लोक 6 (13.214.6)

यथा वारिचरा मीना बहवोऽम्बुजजातयः । जालं समधिरोहन्ति स्वयमेव विधेर्वशात् ॥

yathā vāricarā mīnā bahavo'mbujajātayaḥ | jālaṃ samadhirohanti svayameva vidhervaśāt

इसी प्रकार मछलियाँ और जल में उत्पन्न बहुत-से अन्य जीव विधि के वश में होकर अपने आप जाल पर चढ़ जाते हैं।

श्लोक 7 (13.214.7)

शल्यकस्य च जिह्वाग्रं स्वयमारुह्य शोभने । आयुःक्षयेणोपहता निबध्यन्ते सरीसृपाः ॥

śalyakasya ca jihvāgraṃ svayamāruhya śobhane | āyuḥkṣayeṇopahatā nibadhyante sarīsṛpāḥ

और हे शोभने, रेंगनेवाले जीव शल्यक की जीभ की नोक पर अपने आप चढ़ जाते हैं; आयु के क्षय से मारे हुए वे बँध जाते हैं।

श्लोक 8 (13.214.8)

कृषतां कर्षकाणां च नास्ति बुद्धिर्विहिंसने । अथैषां लाङ्गलाग्राद्यैर्हन्यन्ते जन्तवोऽक्षयाः ॥

kṛṣatāṃ karṣakāṇāṃ ca nāsti buddhirvihiṃsane | athaiṣāṃ lāṅgalāgrādyairhanyante jantavo'kṣayāḥ

हल चलानेवाले किसानों के मन में मारने का विचार नहीं होता; फिर भी हल की नोक आदि से असंख्य जीव मारे जाते हैं।

श्लोक 9 (13.214.9)

पादाग्रेणैव चैकेन यां हिंसां कुरुते नरः । मातङ्गोपि न तां कुर्यात्कूरो जन्मशतैरपि ॥

pādāgreṇaiva caikena yāṃ hiṃsāṃ kurute naraḥ | mātaṅgopi na tāṃ kuryātkūro janmaśatairapi

मनुष्य एक पैर की नोक से जितनी हिंसा कर बैठता है, उतनी हिंसा क्रूर मातंग भी सौ जन्मों में नहीं करेगा।

श्लोक 10 (13.214.10)

म्रियन्ते यैर्हि मर्तव्यं न तान्घ्नन्ति कृषीवलाः । कृषामीति मनस्तस्य नास्ति चिन्ता विहिंसने ॥

mriyante yairhi martavyaṃ na tānghnanti kṛṣīvalāḥ | kṛṣāmīti manastasya nāsti cintā vihiṃsane

जिन्हें मरना है, वे मरते हैं; किसान उन्हें नहीं मारते। 'मैं तो जोत रहा हूँ', बस यही उसके मन में रहता है; हिंसा की कोई चिन्ता उसमें नहीं होती।

श्लोक 11 (13.214.11)

तस्माज्जीवसहस्राणि हत्वाऽपि न स लिप्यते । विधिना स हतः पूर्वं पश्चात्प्राणि विपद्यते । एवं सर्वेषु भूतेषु विधिर्हि दुरतिक्रमः ॥

tasmājjīvasahasrāṇi hatvā'pi na sa lipyate | vidhinā sa hataḥ pūrvaṃ paścātprāṇi vipadyate | evaṃ sarveṣu bhūteṣu vidhirhi duratikramaḥ

इसलिए हज़ारों जीवों को मारकर भी वह लिप्त नहीं होता। वे पहले ही विधि के द्वारा मारे जा चुके होते हैं; बाद में प्राणी नष्ट होता है। इस प्रकार सब प्राणियों में विधि को लाँघना कठिन है।

श्लोक 12 (13.214.12)

गतायुषा मुहूर्तं तु न शक्यमुपजीवितुम् । जीवितव्ये न मर्तव्यं न भूतं न भविष्यति ॥

gatāyuṣā muhūrtaṃ tu na śakyamupajīvitum | jīvitavye na martavyaṃ na bhūtaṃ na bhaviṣyati

जिसकी आयु बीत चुकी है, वह एक क्षण भी नहीं जी सकता। जिसे जीना है, वह नहीं मरता; ऐसा न कभी हुआ है, न होगा।

श्लोक 13 (13.214.13)

शुभाशुभं कर्मफलं न शक्यमतिवर्तितुम् । तथा ताभिश्च मर्तव्यं मोक्तव्याश्चैव तास्तथा ॥

śubhāśubhaṃ karmaphalaṃ na śakyamativartitum | tathā tābhiśca martavyaṃ moktavyāścaiva tāstathā

शुभ और अशुभ कर्मों के फल का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। उसी के अनुसार उनके द्वारा मरना पड़ता है और उसी प्रकार उनसे मुक्त भी होना पड़ता है।

श्लोक 14 (13.214.14)

रन्तिदेवस्य गावो वै विधेर्हि वशमागताः । स्वयमायान्ति गावो वै हन्यन्ते यत्र सुन्दरि ॥

rantidevasya gāvo vai vidherhi vaśamāgatāḥ | svayamāyānti gāvo vai hanyante yatra sundari

रन्तिदेव की गायें भी विधि के वश में आ गई थीं। हे सुन्दरि, जहाँ वे मारी जाती थीं, वहाँ गायें अपने आप आ जाती थीं।

श्लोक 15 (13.214.15)

गवां वै हन्यमानानां रुधिरप्रभवा नदी । चर्मण्वतीति विख्याता खुरशृङ्गास्थिदुर्गमा ॥

gavāṃ vai hanyamānānāṃ rudhiraprabhavā nadī | carmaṇvatīti vikhyātā khuraśṛṅgāsthidurgamā

मारी जाती हुई गायों के रक्त से एक नदी निकली, जो चर्मण्वती नाम से प्रसिद्ध हुई और खुरों, सींगों और हड्डियों के कारण दुर्गम थी।

श्लोक 16 (13.214.16)

रुधिरं तां नदीं प्राप्य तोयं भवति शोभने । मेध्यं पुण्यं पवित्रं च गन्धवर्णरसैर्युतम् ॥

rudhiraṃ tāṃ nadīṃ prāpya toyaṃ bhavati śobhane | medhyaṃ puṇyaṃ pavitraṃ ca gandhavarṇarasairyutam

हे शोभने, वह रक्त उस नदी में पहुँचकर जल बन जाता था: शुद्ध, पुण्य और पवित्र, गन्ध, वर्ण और रस से युक्त।

श्लोक 17 (13.214.17)

तत्राऽभिषेकं कुर्वन्ति कृतजप्याः कृताह्निकाः । द्विजा देवगणाश्चापि लोकपाला महेश्वराः ॥

tatrā'bhiṣekaṃ kurvanti kṛtajapyāḥ kṛtāhnikāḥ | dvijā devagaṇāścāpi lokapālā maheśvarāḥ

वहाँ जप और नित्यकर्म पूरे कर चुके ब्राह्मण, देवगण, लोकपाल और महान ईश्वर स्नान करते हैं।

श्लोक 18 (13.214.18)

तस्य राज्ञः सदा सत्रे स्वयमागम्य सुन्दरि । विधिना पूर्वदृष्टेन तन्मांसमुपकल्पितम् । मन्त्रवत्प्रतिगृह्णन्ति यथान्यायं यथाविधि ॥

tasya rājñaḥ sadā satre svayamāgamya sundari | vidhinā pūrvadṛṣṭena tanmāṃsamupakalpitam | mantravatpratigṛhṇanti yathānyāyaṃ yathāvidhi

हे सुन्दरि, उस राजा के सत्र में गायें सदा अपने आप आ जाती थीं और पूर्वदृष्ट विधि से उनका मांस तैयार किया जाता था; उसे वे मन्त्रपूर्वक, न्याय और विधि के अनुसार ग्रहण करते थे।

श्लोक 19 (13.214.19)

समांसं च सदा ह्यन्नं शतशोऽथ सहस्रशः । भुञ्जानानां द्विजातीनामस्तमेति दिवाकरः ॥

samāṃsaṃ ca sadā hyannaṃ śataśo'tha sahasraśaḥ | bhuñjānānāṃ dvijātīnāmastameti divākaraḥ

मांस सहित अन्न सदा सैकड़ों और हज़ारों की मात्रा में रहता था; द्विजों के भोजन करते-करते सूर्य अस्त हो जाता था।

श्लोक 20 (13.214.20)

गावो यास्तत्र हन्यन्ते राज्ञस्तस्य क्रतूत्तमे । पठ्यमानेषु मन्त्रेषु यथान्यायं यथाविधि ॥

gāvo yāstatra hanyante rājñastasya kratūttame | paṭhyamāneṣu mantreṣu yathānyāyaṃ yathāvidhi

उस राजा के श्रेष्ठ यज्ञ में, मन्त्रों के पाठ के बीच, न्याय और विधि के अनुसार जो गायें वहाँ मारी जाती थीं,

श्लोक 21 (13.214.21)

ताश्च स्वर्गं गता गावो रन्तिदेवश्च पार्थिवः । सदा सत्रविधानेन सिद्धिं प्राप्तो नरोत्तमः ॥

tāśca svargaṃ gatā gāvo rantidevaśca pārthivaḥ | sadā satravidhānena siddhiṃ prāpto narottamaḥ

वे गायें स्वर्ग गईं, और राजा रन्तिदेव भी; सत्र के नित्य अनुष्ठान से उन नरश्रेष्ठ ने सिद्धि पाई।

श्लोक 22 (13.214.22)

अथ यस्तु सहायार्थमुक्तः स्यात्पार्थिवैर्नरैः । भोगानां संविभागेन वस्त्राभरणभूषणैः ॥

atha yastu sahāyārthamuktaḥ syātpārthivairnaraiḥ | bhogānāṃ saṃvibhāgena vastrābharaṇabhūṣaṇaiḥ

अब, जिस मनुष्य को राजाओं ने सहायता के लिए नियुक्त किया हो, और भोगों के बँटवारे से, वस्त्र, आभरण और अलंकारों से,

श्लोक 23 (13.214.23)

सहभोजनसम्बद्धैः सत्कारैर्विविधैरपि । सहायकाले सम्प्राप्ते सङ्ग्रामे शस्त्रमुद्धरेत् ॥

sahabhojanasambaddhaiḥ satkārairvividhairapi | sahāyakāle samprāpte saṅgrāme śastramuddharet

तथा साथ भोजन से जुड़े नाना प्रकार के सत्कारों से जिसका मान किया गया हो, वह सहायता का समय आने पर युद्ध में शस्त्र उठाए,

श्लोक 24 (13.214.24)

व्यूढानीके यथा सास्त्रं सेनयोरुभयोरपि । हस्त्यश्वरथसम्पूर्णे पदातिबलसङ्कुले । चामरच्छत्रशबले ध्वजचर्मायुधोज्ज्वले ॥

vyūḍhānīke yathā sāstraṃ senayorubhayorapi | hastyaśvarathasampūrṇe padātibalasaṅkule | cāmaracchatraśabale dhvajacarmāyudhojjvale

जब दोनों सेनाएँ अस्त्रों से सज्जित होकर व्यूह में खड़ी हों, हाथी, घोड़े और रथों से भरी, पैदल सेना के बल से ठसाठस, चँवरों और छत्रों से विचित्र, ध्वजाओं, ढालों और शस्त्रों से दीप्त,

श्लोक 25 (13.214.25)

शक्तितोमरकुन्तासिशूलमुद्गरपाणिभिः । कूटमुद्गरचापेषु मुसुण्ठीजुष्टमुष्टिभिः ॥

śaktitomarakuntāsiśūlamudgarapāṇibhiḥ | kūṭamudgaracāpeṣu musuṇṭhījuṣṭamuṣṭibhiḥ

शक्ति, तोमर, कुन्त, खड्ग, शूल और मुद्गर हाथों में लिए योद्धाओं से, तथा लोहे के मुद्गरों, गदाओं, धनुषों और मुसुण्ठियों को पकड़े हुए मुट्ठियों से,

श्लोक 26 (13.214.26)

भिण्डिपालगदाचक्रप्रासकर्पटधारिभिः । नानाप्रहरणैर्योधैः सेनयोरुभयोरपि । युद्धशौण्डैः प्रगर्जद्भिर्वृषेषु वृषभैरिव ॥

bhiṇḍipālagadācakraprāsakarpaṭadhāribhiḥ | nānāpraharaṇairyodhaiḥ senayorubhayorapi | yuddhaśauṇḍaiḥ pragarjadbhirvṛṣeṣu vṛṣabhairiva

भिन्दिपाल, गदा, चक्र, प्रास और कर्पट धारण करनेवाले, नाना शस्त्रों से सज्जित, युद्ध में चतुर और बैलों के बीच बैलों की तरह गरजते दोनों सेनाओं के योद्धाओं से युक्त,

श्लोक 27 (13.214.27)

शङ्खदुन्दुभिनादेन नानातूर्यरवेण च । हयहेषितशब्देन कुञ्जराणां तु बृंहितैः ॥

śaṅkhadundubhinādena nānātūryaraveṇa ca | hayaheṣitaśabdena kuñjarāṇāṃ tu bṛṃhitaiḥ

शंखों और दुन्दुभियों के नाद से, नाना बाजों की ध्वनि से, घोड़ों की हिनहिनाहट से और हाथियों की चिंघाड़ से,

श्लोक 28 (13.214.28)

योधानां सिंहनादैश्च घण्टानां शिञ्जितस्वनैः । दिशश्च विदिशश्चैव समन्ताद्बधिरीकृताः ॥

yodhānāṃ siṃhanādaiśca ghaṇṭānāṃ śiñjitasvanaiḥ | diśaśca vidiśaścaiva samantādbadhirīkṛtāḥ

योद्धाओं की सिंहगर्जना और घण्टों की झनकार से जब दिशाएँ और विदिशाएँ चारों ओर बहरी हो गई हों,

श्लोक 29 (13.214.29)

ग्रीष्मान्तेष्विव गर्जद्भिर्नभसीव बलाहकैः । रथनेमिखुरोद्धूतैररुणै रणरेणुभिः । कपिलाभिरिवाकाशे छाद्यमाने समन्ततः ॥

grīṣmānteṣviva garjadbhirnabhasīva balāhakaiḥ | rathanemikhuroddhūtairaruṇai raṇareṇubhiḥ | kapilābhirivākāśe chādyamāne samantataḥ

ग्रीष्म के अन्त में आकाश में गरजते बादलों की तरह, और रथ के पहियों के घेरों तथा खुरों से उठी रण की अरुण धूल से आकाश चारों ओर कपिल वर्ण की वस्तुओं से ढका हुआ-सा हो,

श्लोक 30 (13.214.30)

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते योधानां तत्र सेनयोः । तेषां प्रहारक्षतजं रक्तचन्दनसन्निभम् ॥

pravṛtte śastrasampāte yodhānāṃ tatra senayoḥ | teṣāṃ prahārakṣatajaṃ raktacandanasannibham

जब वहाँ दोनों सेनाओं के योद्धाओं के बीच शस्त्रों की वर्षा आरम्भ हो गई हो, और उनके प्रहारों से बहता रक्त लाल चन्दन जैसा हो,

श्लोक 31 (13.214.31)

तेषामस्राणि गात्रेभ्य स्रवन्ते रणमूर्धनि । पलाशाशोकपुष्पाणां जङ्गमा इव राशयः ॥

teṣāmasrāṇi gātrebhya sravante raṇamūrdhani | palāśāśokapuṣpāṇāṃ jaṅgamā iva rāśayaḥ

रणभूमि के अग्रभाग में उनके शरीरों से बह रहा हो, जैसे पलाश और अशोक के फूलों की चलती-फिरती राशियाँ हों,

श्लोक 32 (13.214.32)

रणे समभिवर्तन्त उद्यतायुधपाणयः । शोभमाना रणे शूरा आह्वयन्तः परस्परम् ॥

raṇe samabhivartanta udyatāyudhapāṇayaḥ | śobhamānā raṇe śūrā āhvayantaḥ parasparam

जब शस्त्र उठाए हाथोंवाले शूर वीर एक-दूसरे को ललकारते, युद्ध में शोभित होते हुए आमने-सामने बढ़ रहे हों,

श्लोक 33 (13.214.33)

हन्यमानेष्वभिघ्नत्सु शूरेषु रणसङ्कटे । पृष्ठं दत्त्वा च ये तत्र नायकस्य नराधमाः ॥

hanyamāneṣvabhighnatsu śūreṣu raṇasaṅkaṭe | pṛṣṭhaṃ dattvā ca ye tatra nāyakasya narādhamāḥ

जब रण के संकट में शूर मार रहे हों और मारे जा रहे हों, और जो नीच पुरुष वहाँ अपने नायक को पीठ दिखाकर

श्लोक 34 (13.214.34)

अनाहता निवर्तन्ते नायके चाप्यनीप्सति । ते दुष्कृतं प्रपद्यन्ते नायकस्याखिलं नराः । यच्चास्ति सुकृतं तेषां युज्यते तेन नायकः ॥

anāhatā nivartante nāyake cāpyanīpsati | te duṣkṛtaṃ prapadyante nāyakasyākhilaṃ narāḥ | yaccāsti sukṛtaṃ teṣāṃ yujyate tena nāyakaḥ

बिना घायल हुए लौट आते हैं, चाहे नायक उसे न चाहता हो: वे पुरुष नायक का सारा दुष्कृत अपने ऊपर ले लेते हैं, और जो कुछ उनका पुण्य है, उससे नायक युक्त हो जाता है।

श्लोक 35 (13.214.35)

अहिंसा परमो धर्म इति येऽपि नरा विदुः । सङ्ग्रामेषु न युध्यन्ते भृत्याश्चैवानुरूपतः । नरकं यान्ति ते घोरं भर्तृपिण्डापहारिणः ॥

ahiṃsā paramo dharma iti ye'pi narā viduḥ | saṅgrāmeṣu na yudhyante bhṛtyāścaivānurūpataḥ | narakaṃ yānti te ghoraṃ bhartṛpiṇḍāpahāriṇaḥ

'अहिंसा परम धर्म है' ऐसा जाननेवाले जो पुरुष संग्रामों में नहीं लड़ते, और उसी प्रकार भृत्य भी, जैसा उचित है, वे अपने स्वामी के अन्न को हड़पनेवाले होकर घोर नरक में जाते हैं।

श्लोक 36 (13.214.36)

यस्तु प्राणान्परित्यज्य प्रविशेदुद्यतायुधः । सङ्ग्राममग्निप्रतिमं पतङ्ग इव निर्भयः । स्वर्गमाविशते प्रेत्य ज्ञात्वा योधस्य निश्चयम् ॥

yastu prāṇānparityajya praviśedudyatāyudhaḥ | saṅgrāmamagnipratimaṃ pataṅga iva nirbhayaḥ | svargamāviśate pretya jñātvā yodhasya niścayam

परन्तु जो प्राणों को त्यागकर शस्त्र उठाए, अग्नि के समान जलते संग्राम में पतंगे की तरह निर्भय होकर प्रवेश करता है, वह योद्धा के निश्चय को जानकर मरने के बाद स्वर्ग में प्रवेश करता है।

श्लोक 37 (13.214.37)

आविष्टश्चैव सत्त्वेन निर्घृणो जायते नरः । प्रहारैर्नन्दयेद्देवि सत्वेनाधिष्ठितो हि सः । प्रहारव्यथितश्चैव न वैक्लब्यमुपैति सः ॥

āviṣṭaścaiva sattvena nirghṛṇo jāyate naraḥ | prahārairnandayeddevi satvenādhiṣṭhito hi saḥ | prahāravyathitaścaiva na vaiklabyamupaiti saḥ

साहस से आविष्ट होकर मनुष्य निर्दय हो जाता है। हे देवि, वह अपने प्रहारों से आनन्द देता है, क्योंकि वह साहस के अधीन होता है; और प्रहारों से व्यथित होकर भी वह कातर नहीं होता।

श्लोक 38 (13.214.38)

यस्तु स्वं नायकं रक्षेदतिघोरे रणाङ्गणे । तापयन्नरिसैन्यानि सिंहो मृगगणानिव । आदित्य इव मध्याह्ने दुर्निरीक्ष्यो रणाजिरे ॥

yastu svaṃ nāyakaṃ rakṣedatighore raṇāṅgaṇe | tāpayannarisainyāni siṃho mṛgagaṇāniva | āditya iva madhyāhne durnirīkṣyo raṇājire

जो अत्यन्त भयंकर रणभूमि में अपने नायक की रक्षा करता है, शत्रु की सेनाओं को वैसे ही तपाता है जैसे सिंह मृगों के झुण्डों को, और रणांगण में दोपहर के सूर्य की तरह जिसकी ओर देखना कठिन है,

श्लोक 39 (13.214.39)

निर्दयो यस्तु सङ्ग्रामे प्रहरन्नुद्यतायुधः । यजते स तु पूतात्मा सङ्ग्रामेण महाक्रतुम् ॥

nirdayo yastu saṅgrāme praharannudyatāyudhaḥ | yajate sa tu pūtātmā saṅgrāmeṇa mahākratum

जो युद्ध में निर्दय होकर शस्त्र उठाए प्रहार करता है, वह पवित्र आत्मा संग्राम के द्वारा महायज्ञ करता है।

श्लोक 40 (13.214.40)

चर्म कृष्णाजिनं तस्य दन्तकाष्ठं धनुः स्मृतम् । रथो वेदिर्ध्वजो यूपः कुशाश्च रथरश्मयः ॥

carma kṛṣṇājinaṃ tasya dantakāṣṭhaṃ dhanuḥ smṛtam | ratho vedirdhvajo yūpaḥ kuśāśca ratharaśmayaḥ

उसका चर्म कृष्णमृगचर्म है और धनुष उसका दातौन कहा गया है; रथ वेदी है, ध्वज यूप है, और रथ की रास कुश हैं।

श्लोक 41 (13.214.41)

मानो दर्पस्त्वहङ्कारस्त्रयस्त्रेताग्नयः स्मृताः । प्रमोदश्च स्रुवस्तस्य उपाध्यायो हि सारथिः ॥

māno darpastvahaṅkārastrayastretāgnayaḥ smṛtāḥ | pramodaśca sruvastasya upādhyāyo hi sārathiḥ

मान, दर्प और अहंकार, ये तीन त्रेताग्नियाँ कही गई हैं; आनन्द उसका स्रुवा है और सारथि उसका उपाध्याय है।

श्लोक 42 (13.214.42)

स्रुग्भाण्डं चापि यत्किञ्चिद्यज्ञोपकरणानि च । आयुधान्यस्य तत्सर्वं समिधः सायकाः स्मृताः ॥

srugbhāṇḍaṃ cāpi yatkiñcidyajñopakaraṇāni ca | āyudhānyasya tatsarvaṃ samidhaḥ sāyakāḥ smṛtāḥ

जो कुछ स्रुक्, पात्र और यज्ञ के उपकरण हैं, वे सब उसके आयुध हैं; बाण समिधाएँ कहे गए हैं।

श्लोक 43 (13.214.43)

स्वेदस्रवश्च गात्रेभ्यः क्षौद्रं तस्य यशस्विनः । पुरोडाशा नृशीर्षाणि रुधिरं चाहुतिः स्मृता । तूणाश्चैव चरुर्ज्ञेया वसोर्धारा वसाः स्मृताः ॥

svedasravaśca gātrebhyaḥ kṣaudraṃ tasya yaśasvinaḥ | puroḍāśā nṛśīrṣāṇi rudhiraṃ cāhutiḥ smṛtā | tūṇāścaiva carurjñeyā vasordhārā vasāḥ smṛtāḥ

उस यशस्वी के अंगों से बहता पसीना मधु है; पुरोडाश मनुष्यों के सिर हैं, रक्त आहुति कहा गया है; तरकश चरु जानने चाहिए और वसा घी की धारा कही गई है।

श्लोक 44 (13.214.44)

क्रव्यादा भूतसङ्घाश्च तस्मिन्यज्ञे द्विजातयः । तेषां भक्षान्नपानानि हता नृगजवाजिनः । भुञ्जते ते यथाकामं यथा यज्ञे किमिच्छति ॥

kravyādā bhūtasaṅghāśca tasminyajñe dvijātayaḥ | teṣāṃ bhakṣānnapānāni hatā nṛgajavājinaḥ | bhuñjate te yathākāmaṃ yathā yajñe kimicchati

उस यज्ञ में मांसभक्षी भूतगण द्विज हैं; मारे गए मनुष्य, हाथी और घोड़े उनके खाने-पीने की वस्तुएँ हैं; वे यज्ञ की तरह, जैसी जिसकी इच्छा हो, यथेच्छ भोजन करते हैं।

श्लोक 45 (13.214.45)

निहतानां तु योधानां वस्त्राभरणभूषणम् । हिरण्यं च सुवर्णं च यद्वै यज्ञस्य दक्षिणा ॥

nihatānāṃ tu yodhānāṃ vastrābharaṇabhūṣaṇam | hiraṇyaṃ ca suvarṇaṃ ca yadvai yajñasya dakṣiṇā

मारे गए योद्धाओं के वस्त्र, आभरण और अलंकार, तथा हिरण्य और सुवर्ण, ये उस यज्ञ की दक्षिणा हैं।

श्लोक 46 (13.214.46)

यस्तत्र हन्यते देवि गजस्कन्धगतो नरः । ब्रह्मलोकमवाप्नोति रणेष्वभिमुखो हतः ॥

yastatra hanyate devi gajaskandhagato naraḥ | brahmalokamavāpnoti raṇeṣvabhimukho hataḥ

हे देवि, जो मनुष्य वहाँ हाथी के कन्धे पर बैठा हुआ, रण में शत्रु की ओर मुख किए मारा जाता है, वह ब्रह्मलोक को पाता है।

श्लोक 47 (13.214.47)

रथमध्यगतो वाऽपि हयपृष्ठगतोपि वा । हन्यते यस्तु सङ्ग्रामे शक्रलोके महीयते ॥

rathamadhyagato vā'pi hayapṛṣṭhagatopi vā | hanyate yastu saṅgrāme śakraloke mahīyate

अथवा जो रथ के बीच में या घोड़े की पीठ पर बैठा संग्राम में मारा जाता है, वह इन्द्रलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 48 (13.214.48)

स्वर्गे हताः प्रपूज्यते हन्ता त्वत्रैव पूज्यते । द्वावेतौ सुखमेधेते हन्ता यश्चैव हन्यते ॥

svarge hatāḥ prapūjyate hantā tvatraiva pūjyate | dvāvetau sukhamedhete hantā yaścaiva hanyate

मारा गया स्वर्ग में पूजित होता है और मारनेवाला यहीं पूजित होता है। ये दोनों, मारनेवाला और मारा जानेवाला, सुख से बढ़ते हैं।

श्लोक 49 (13.214.49)

तस्मात्सङ्ग्राममासाद्य प्रहर्तव्यमभीतवत् ॥

tasmātsaṅgrāmamāsādya prahartavyamabhītavat

इसलिए संग्राम में पहुँचकर निर्भय होकर प्रहार करना चाहिए।

श्लोक 50 (13.214.50)

निर्भयो यस्तु सङ्ग्रामे प्रहरेदुद्यतायुधः । यथा नदीसहस्राणि प्रविष्टानि महोदधिम् ॥

nirbhayo yastu saṅgrāme praharedudyatāyudhaḥ | yathā nadīsahasrāṇi praviṣṭāni mahodadhim

जो संग्राम में निर्भय होकर शस्त्र उठाए प्रहार करता है: जैसे हज़ारों नदियाँ महासागर में समा जाती हैं,

श्लोक 51 (13.214.51)

तथा सर्वे न सन्देहो धर्मा धर्मभृतां वरे । प्रविष्टा राजधर्मेण आचारविनयस्तथा ॥

tathā sarve na sandeho dharmā dharmabhṛtāṃ vare | praviṣṭā rājadharmeṇa ācāravinayastathā

वैसे ही, इसमें सन्देह नहीं, हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, सब धर्म राजधर्म में समा जाते हैं, आचार और विनय के साथ।

श्लोक 52 (13.214.52)

वेदोक्ताश्चैव ये धर्माः पाषण्डेषु च कीर्तिताः । तथैव मानुषा धर्मा धर्माश्चान्ये तथेतरे ॥

vedoktāścaiva ye dharmāḥ pāṣaṇḍeṣu ca kīrtitāḥ | tathaiva mānuṣā dharmā dharmāścānye tathetare

वेद में कहे गए जो धर्म हैं और पाषण्डों में बताए गए जो धर्म हैं, मनुष्यों के धर्म और अन्य सब धर्म,

श्लोक 53 (13.214.53)

देशजातिकुलानां च ग्रामधर्मास्तथैव च । ये धर्माः पार्वतीयेषु ये धर्माः पत्तनादिषु । तेषां पूर्वप्रवृत्तानां कर्तव्यं परिरक्षणम् ॥

deśajātikulānāṃ ca grāmadharmāstathaiva ca | ye dharmāḥ pārvatīyeṣu ye dharmāḥ pattanādiṣu | teṣāṃ pūrvapravṛttānāṃ kartavyaṃ parirakṣaṇam

देशों, जातियों और कुलों के धर्म, और उसी प्रकार गाँवों के धर्म; पहाड़ी लोगों के जो धर्म हैं और नगरों आदि के जो धर्म हैं: इन पूर्व से चले आते हुए धर्मों की रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 54 (13.214.54)

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः पार्थिवेन विशेषतः ॥

dharma eva hato hanti dharmo rakṣati rakṣitaḥ | tasmāddharmo na hantavyaḥ pārthivena viśeṣataḥ

नष्ट किया हुआ धर्म ही नष्ट करता है और रक्षित धर्म रक्षा करता है। इसलिए धर्म को नष्ट नहीं करना चाहिए, विशेषकर राजा को।

श्लोक 55 (13.214.55)

प्रजाः पालयते यत्र धर्मेण वसुधाधिपः । षट्कर्मनिरता विप्राः पूज्यन्ते पितृदेवताः ॥

prajāḥ pālayate yatra dharmeṇa vasudhādhipaḥ | ṣaṭkarmaniratā viprāḥ pūjyante pitṛdevatāḥ

जहाँ पृथ्वी का स्वामी प्रजा का पालन धर्म से करता है, वहाँ अपने छह कर्मों में लगे ब्राह्मण, पितर और देवता पूजे जाते हैं।

श्लोक 56 (13.214.56)

नैव तस्मिन्ननावृष्टिर्न रोगा नाप्युपद्रवाः । धर्मशीलाः प्रजाः सर्वाः स्वधर्मनिरते नृपे ॥

naiva tasminnanāvṛṣṭirna rogā nāpyupadravāḥ | dharmaśīlāḥ prajāḥ sarvāḥ svadharmanirate nṛpe

उसके राज्य में न अनावृष्टि होती है, न रोग, न उपद्रव; राजा के अपने धर्म में लगे रहने पर सारी प्रजा धर्मशील होती है।

श्लोक 57 (13.214.57)

एष्टव्यः सततं देवि युक्ताचारो नराधिपः । छिद्रज्ञश्चैव शत्रूणामप्रमत्तः प्रतापवान् ॥

eṣṭavyaḥ satataṃ devi yuktācāro narādhipaḥ | chidrajñaścaiva śatrūṇāmapramattaḥ pratāpavān

हे देवि, ऐसा राजा सदा खोजना चाहिए जो आचार में स्थिर हो, शत्रुओं के छिद्र जाननेवाला हो, सावधान और प्रतापी हो।

श्लोक 58 (13.214.58)

शूद्राः पृथिव्यां बहवो राज्ञां बहुविनाशकाः । तस्मात्प्रमादं सुश्रोणि न कुर्यात्पण्डितो नृपः ॥

śūdrāḥ pṛthivyāṃ bahavo rājñāṃ bahuvināśakāḥ | tasmātpramādaṃ suśroṇi na kuryātpaṇḍito nṛpaḥ

पृथ्वी पर बहुत-से शूद्र हैं जो राजाओं के विनाश का कारण बनते हैं; इसलिए हे सुश्रोणि, बुद्धिमान राजा को प्रमाद नहीं करना चाहिए।

श्लोक 59 (13.214.59)

तेषु मित्रेषु त्यक्तेषु तथा मर्त्येषु हस्तिषु । विस्रम्भो नोपगन्तव्यः स्नानपानेषु नित्यशः ॥

teṣu mitreṣu tyakteṣu tathā martyeṣu hastiṣu | visrambho nopagantavyaḥ snānapāneṣu nityaśaḥ

उनमें से त्यागे हुए मित्रों, मनुष्यों और हाथियों पर स्नान और पान के समय सदा विश्वास नहीं करना चाहिए।

श्लोक 60 (13.214.60)

राज्ञो वल्लभतामेति कुलं भावयते स्वकम् । यस्तु राष्ट्रहितार्थाय गोब्राह्मणकृते तथा । बन्दीग्रहाय मित्रार्थे प्राणांस्त्यजति दुस्त्यजान् ॥

rājño vallabhatāmeti kulaṃ bhāvayate svakam | yastu rāṣṭrahitārthāya gobrāhmaṇakṛte tathā | bandīgrahāya mitrārthe prāṇāṃstyajati dustyajān

जो राष्ट्र के हित के लिए, गौ और ब्राह्मण के लिए, बन्दियों के लिए या मित्र के लिए अपने कठिनता से छूटनेवाले प्राणों को त्याग देता है, वह राजा का प्रिय बन जाता है और अपने कुल को ऊँचा उठाता है।

श्लोक 61 (13.214.61)

सर्वकामदुघां धेनुं धरणीं लोकधारिणीम् । समुद्रान्तां वरारोहे सशैलवनकाननाम् ॥

sarvakāmadughāṃ dhenuṃ dharaṇīṃ lokadhāriṇīm | samudrāntāṃ varārohe saśailavanakānanām

सब कामनाओं को देनेवाली धेनु, लोकों को धारण करनेवाली पृथ्वी, जो हे वरारोहे, समुद्र तक फैली है और पर्वतों, वनों तथा उपवनों सहित है,

श्लोक 62 (13.214.62)

दद्याद्देवि द्विजातिभ्यो वसुपूर्णां वसुन्धराम् । न तत्समं वरारोहे प्राणत्यागी विशिष्यते ॥

dadyāddevi dvijātibhyo vasupūrṇāṃ vasundharām | na tatsamaṃ varārohe prāṇatyāgī viśiṣyate

हे देवि, यदि कोई उस धन से भरी पृथ्वी को द्विजों को दे दे, तो भी वह दान उसके बराबर नहीं है; प्राण त्यागनेवाला उससे बढ़कर है।

श्लोक 63 (13.214.63)

सहस्रमपि यज्ञानां यजते यदि चर्द्धिमान् । यज्ञैस्तस्य किमाश्चर्यं प्राणत्यागः सुदुष्करः ॥

sahasramapi yajñānāṃ yajate yadi carddhimān | yajñaistasya kimāścaryaṃ prāṇatyāgaḥ suduṣkaraḥ

समृद्ध पुरुष हज़ार यज्ञ भी कर ले, तो उसके यज्ञों में आश्चर्य की क्या बात है? प्राणों का त्याग अत्यन्त कठिन है।

श्लोक 64 (13.214.64)

तस्मात्सर्वेषु यज्ञेषु प्राणयज्ञो विशिष्यते । एवं सङ्ग्रामयज्ञास्ते यथार्थं समुदाहृताः ॥

tasmātsarveṣu yajñeṣu prāṇayajño viśiṣyate | evaṃ saṅgrāmayajñāste yathārthaṃ samudāhṛtāḥ

इसलिए सब यज्ञों में प्राणयज्ञ श्रेष्ठ है। इस प्रकार संग्रामयज्ञ तुम्हें यथार्थ रूप में बता दिए गए।

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