अनुशासन पर्व · अध्याय 215
राजा की मृगया और ब्राह्मणों का सम्मान
महेश्वर उमा को बताते हैं कि राजा मृगया में मृगों को मारकर भी पाप से कैसे बचता है, क्योंकि फसल उजाड़ने वाले पशुओं पर अंकुश आवश्यक है, और राजा को कौन-से लोकहित के निर्माण कराने चाहिए। फिर वे विस्तार से चेताते हैं कि ब्राह्मणों का अपमान कभी नहीं करना चाहिए, और वातापि, नहुष तथा गौतम द्वारा इन्द्र की दुर्दशा के उदाहरण देते हैं। आगे राजाओं के लिए नियम हैं: सेवकों से हँसी-ठट्ठा न करना, सोच-समझकर विश्वास करना, अपराध के अनुरूप दण्ड देना, कौन अवध्य हैं, और अपने राष्ट्र की रक्षा में युद्ध में मारे गए राजा को मिलने वाला स्वर्ग।
महेश्वर उवाच
श्लोक 1 (13.215.1)
मृगयात्रां तु वक्ष्यामि शृणु तां धर्मचारिणि । मृगान्हत्वा महीपालो यथा पापैर्न लिप्यते ॥
mṛgayātrāṃ tu vakṣyāmi śṛṇu tāṃ dharmacāriṇi | mṛgānhatvā mahīpālo yathā pāpairna lipyate
हे धर्मचारिणी, अब मैं राजा की मृगया के विषय में बताता हूँ, सुनो — मृगों को मारकर भी राजा किस प्रकार पाप से लिप्त नहीं होता।
श्लोक 2 (13.215.2)
निर्मानुषामिमां सर्वे मृगा इच्छन्ति मेदिनीम् । भक्षयन्ति च सस्यानि शासितव्या नृपेण ते ॥
nirmānuṣāmimāṃ sarve mṛgā icchanti medinīm | bhakṣayanti ca sasyāni śāsitavyā nṛpeṇa te
सब मृग इस पृथ्वी को मनुष्यों से रहित देखना चाहते हैं और फसलें खा जाते हैं; इसलिए राजा को उन पर शासन करना चाहिए।
श्लोक 3 (13.215.3)
दुष्टानां शासनं धर्मः शिष्टानां परिपालनम् । कर्तव्यं भूमिपालेन नित्यं कार्येषु चार्जवम् । स्वर्गं मृगाश्च गच्छन्ति स्वयं नृपतिना हताः ॥
duṣṭānāṃ śāsanaṃ dharmaḥ śiṣṭānāṃ paripālanam | kartavyaṃ bhūmipālena nityaṃ kāryeṣu cārjavam | svargaṃ mṛgāśca gacchanti svayaṃ nṛpatinā hatāḥ
दुष्टों को दण्ड देना और सज्जनों की रक्षा करना धर्म है; राजा को यह सदा करना चाहिए और अपने सब कार्यों में सरल रहना चाहिए। राजा के अपने हाथ से मारे गए मृग स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 4 (13.215.4)
यथा गावो ह्यगोपालास्तथा राष्ट्रमनायकम् । तस्मादंशास्तु देवानां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । राज्ये नियुक्ता राष्ट्रेषु प्रजापालनकारणात् ॥
yathā gāvo hyagopālāstathā rāṣṭramanāyakam | tasmādaṃśāstu devānāṃ gandharvoragarakṣasām | rājye niyuktā rāṣṭreṣu prajāpālanakāraṇāt
जैसे ग्वाले के बिना गायें, वैसे ही नायक के बिना राष्ट्र होता है। इसीलिए प्रजा के पालन के लिए देवताओं, गन्धर्वों, नागों और राक्षसों के अंश राष्ट्रों में राजा के रूप में नियुक्त किए गए हैं।
श्लोक 5 (13.215.5)
अशिष्टशासने चैव शिष्टानां परिपालने । तेषां चर्यां प्रवक्ष्यामि श्रूयतामनुपूर्वशः ॥
aśiṣṭaśāsane caiva śiṣṭānāṃ paripālane | teṣāṃ caryāṃ pravakṣyāmi śrūyatāmanupūrvaśaḥ
अब मैं दुष्टों के शासन और सज्जनों के पालन में उन राजाओं के आचरण का वर्णन करूँगा; उसे क्रम से सुनो।
श्लोक 6 (13.215.6)
यथा प्रचरतां तेषां पार्थिवानां यशस्विनाम् । राष्ट्रं धर्मो धनं चैव यशः कीर्तिश्च वर्धते ॥
yathā pracaratāṃ teṣāṃ pārthivānāṃ yaśasvinām | rāṣṭraṃ dharmo dhanaṃ caiva yaśaḥ kīrtiśca vardhate
जब वे यशस्वी राजा इस प्रकार आचरण करते हैं, तब उनका राष्ट्र, धर्म, धन, यश और कीर्ति बढ़ती है।
श्लोक 7 (13.215.7)
नृपाणां पूर्वमेवायं धर्मो धर्मभृतांवर । सभाप्रपातटाकानि देवतायतनानि च । ब्राह्मणावसथाश्चैव कर्तव्या नृपसत्तमैः ॥
nṛpāṇāṃ pūrvamevāyaṃ dharmo dharmabhṛtāṃvara | sabhāprapātaṭākāni devatāyatanāni ca | brāhmaṇāvasathāścaiva kartavyā nṛpasattamaiḥ
हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, राजाओं का यह धर्म सदा से रहा है कि श्रेष्ठ राजा सभाभवन, प्याऊ, तालाब, देवमन्दिर और ब्राह्मणों के निवासस्थान बनवाएँ।
श्लोक 8 (13.215.8)
ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः । कुलमुत्सादयेयुस्ते क्रोधाविष्टा द्विजातयः ॥
brāhmaṇā nāvamantavyā bhasmacchannā ivāgnayaḥ | kulamutsādayeyuste krodhāviṣṭā dvijātayaḥ
ब्राह्मणों का अपमान नहीं करना चाहिए; वे राख से ढकी अग्नियों के समान हैं। क्रोध से भर जाएँ तो वे द्विज पूरे कुल का उच्छेद कर सकते हैं।
श्लोक 9 (13.215.9)
ध्मायमानो यथा ह्यग्निर्निर्दहेत्सर्वमिन्धनम् । तथा क्रोधाग्निना विप्रा दहेयुः पृथिवीमिमाम् । न हि विप्रेषु क्रुद्धेषु राज्यं भुञ्जन्ति भूमिपाः ॥
dhmāyamāno yathā hyagnirnirdahetsarvamindhanam | tathā krodhāgninā viprā daheyuḥ pṛthivīmimām | na hi vipreṣu kruddheṣu rājyaṃ bhuñjanti bhūmipāḥ
जैसे धौंकी हुई अग्नि सारे ईंधन को जला देती है, वैसे ही ब्राह्मण क्रोधाग्नि से इस पृथ्वी को जला सकते हैं। ब्राह्मणों के क्रुद्ध होने पर राजा अपना राज्य नहीं भोग पाते।
श्लोक 10 (13.215.10)
परिभूय द्विजान्मोहाद्वातापिनहुषादयः । सबन्धुमित्रा नष्टास्ते दग्धा ब्राह्मणमन्युभिः । शरीरं चापि शक्रस्य कृतं भगनिरन्तरम् ॥
paribhūya dvijānmohādvātāpinahuṣādayaḥ | sabandhumitrā naṣṭāste dagdhā brāhmaṇamanyubhiḥ | śarīraṃ cāpi śakrasya kṛtaṃ bhaganirantaram
मोह के कारण ब्राह्मणों का अपमान करके वातापि, नहुष आदि अपने बन्धुओं और मित्रों सहित नष्ट हो गए; वे ब्राह्मणों के क्रोध से भस्म हो गए। इन्द्र का शरीर भी बिना अन्तर के सब ओर भगों (योनिचिह्नों) से भर दिया गया।
श्लोक 11 (13.215.11)
ततो देवगणाः सर्वे इन्द्रस्यार्थे महामुनिम् । प्रसादं कारयामासुः प्रणामस्तुतिवन्दनैः ॥
tato devagaṇāḥ sarve indrasyārthe mahāmunim | prasādaṃ kārayāmāsuḥ praṇāmastutivandanaiḥ
तब सब देवगणों ने इन्द्र के लिए प्रणाम, स्तुति और वन्दना के द्वारा उन महामुनि को प्रसन्न किया।
श्लोक 12 (13.215.12)
तेन प्रीतेन सुश्रोणि गौतमेन महात्मना । तच्छरीरं तु शक्रस्य सहस्रभगचिह्नितम् । कृतं नेत्रसहस्रेण क्षणेनैव निरन्तरम् ॥
tena prītena suśroṇi gautamena mahātmanā | taccharīraṃ tu śakrasya sahasrabhagacihnitam | kṛtaṃ netrasahasreṇa kṣaṇenaiva nirantaram
हे सुन्दर कटि वाली, इससे प्रसन्न होकर महात्मा गौतम ने क्षणभर में इन्द्र के उस हजार भगचिह्नों वाले शरीर को निरन्तर हजार नेत्रों से युक्त कर दिया।
श्लोक 13 (13.215.13)
छित्त्वा मेषस्य वृषणौ गौतमेनाभिमन्त्रितौ । इन्द्रस्य वृषणौ भूत्वा क्षिप्रं वै श्लेषमागतौ ॥
chittvā meṣasya vṛṣaṇau gautamenābhimantritau | indrasya vṛṣaṇau bhūtvā kṣipraṃ vai śleṣamāgatau
गौतम ने मेढ़े के अण्डकोश काटकर उन्हें मन्त्र से अभिमन्त्रित किया; वे इन्द्र के अण्डकोश बनकर शीघ्र ही उनके शरीर से जुड़ गए।
श्लोक 14 (13.215.14)
एवं विप्रेषु क्रुद्धेषु देवराजः शतक्रतुः । अशक्तः शासितुं राज्यं किंपुनर्मानुषा भुवि ॥
evaṃ vipreṣu kruddheṣu devarājaḥ śatakratuḥ | aśaktaḥ śāsituṃ rājyaṃ kiṃpunarmānuṣā bhuvi
इस प्रकार ब्राह्मणों के क्रुद्ध होने पर देवराज शतक्रतु इन्द्र भी अपना राज्य चलाने में असमर्थ हो जाते हैं; फिर पृथ्वी के मनुष्यों की क्या बात?
श्लोक 15 (13.215.15)
क्रोधाविष्टो दहेद्विप्रः शुष्केन्धनमिवानलः । भस्मीकृत्य जगत्सर्वं सृजेदन्यज्जगत्पुनः ॥
krodhāviṣṭo dahedvipraḥ śuṣkendhanamivānalaḥ | bhasmīkṛtya jagatsarvaṃ sṛjedanyajjagatpunaḥ
क्रोध से भरा ब्राह्मण सूखे ईंधन में लगी आग के समान जला सकता है; सारे जगत् को भस्म करके वह फिर दूसरा जगत् रच सकता है।
श्लोक 16 (13.215.16)
अदेवानपि देवान्स कुर्याद्देवानदेवताः । तस्मान्नोत्पादयेन्मन्युं मन्युप्रहरणा द्विजाः ॥
adevānapi devānsa kuryāddevānadevatāḥ | tasmānnotpādayenmanyuṃ manyupraharaṇā dvijāḥ
वह अदेवों को देवता और देवताओं को अदेवता बना सकता है। इसलिए क्रोध ही जिनका शस्त्र है, उन ब्राह्मणों में कभी क्रोध उत्पन्न न करे।
श्लोक 17 (13.215.17)
महत्स्वप्यपराधेषु शासनं नार्हति द्विजः । न च शस्त्रनिपातानि न च प्राणैर्वियोजनम् । दृश्यते त्रिषु लोकेषु ब्राह्मणानामनिन्दिते ॥
mahatsvapyaparādheṣu śāsanaṃ nārhati dvijaḥ | na ca śastranipātāni na ca prāṇairviyojanam | dṛśyate triṣu lokeṣu brāhmaṇānāmanindite
बड़े-बड़े अपराधों में भी ब्राह्मण दण्ड के योग्य नहीं है। हे निष्पाप, तीनों लोकों में ब्राह्मणों पर शस्त्र का प्रहार या उनके प्राणों का वियोग कहीं नहीं देखा जाता।
श्लोक 18 (13.215.18)
क्रोधाश्च विपुला घोराः प्रसादाश्चाप्यनुत्तमाः । तस्मान्नोत्पादयेत्क्रोधं नित्यं पूज्या द्विजातयः ॥
krodhāśca vipulā ghorāḥ prasādāścāpyanuttamāḥ | tasmānnotpādayetkrodhaṃ nityaṃ pūjyā dvijātayaḥ
उनके क्रोध विशाल और भयंकर होते हैं, पर उनकी कृपाएँ भी अनुपम होती हैं। इसलिए उनका क्रोध कभी न जगाए; द्विज सदा पूजनीय हैं।
श्लोक 19 (13.215.19)
दृश्यते न स लोकेऽस्मिन्भूते वाऽथ भविष्यति । क्रुद्धेषु यो वै विप्रेषु राज्यं भुङ्क्ते नराधिपः ॥
dṛśyate na sa loke'sminbhūte vā'tha bhaviṣyati | kruddheṣu yo vai vipreṣu rājyaṃ bhuṅkte narādhipaḥ
इस लोक में न कभी ऐसा राजा देखा गया है और न होगा, जो ब्राह्मणों के क्रुद्ध रहते हुए राज्य का भोग कर सके।
श्लोक 20 (13.215.20)
न चैवापहसेद्विप्रान्न चैवोपालभेच्च तान् । कालमासाद्य कुप्येच्च काले कुर्यादनुग्रहम् ॥
na caivāpahasedviprānna caivopālabhecca tān | kālamāsādya kupyecca kāle kuryādanugraham
राजा ब्राह्मणों की न हँसी उड़ाए, न उन्हें उलाहना दे। उचित समय पाकर ही क्रोध करे और उचित समय पर कृपा करे।
श्लोक 21 (13.215.21)
सम्प्रहासश्च भृत्येषु न कर्तव्यो नराधिपैः । लघुत्वं चैव प्राप्नोति आज्ञा चास्य निवर्तते ॥
samprahāsaśca bhṛtyeṣu na kartavyo narādhipaiḥ | laghutvaṃ caiva prāpnoti ājñā cāsya nivartate
राजाओं को सेवकों के साथ हँसी-ठट्ठा नहीं करना चाहिए। इससे वह हलका पड़ जाता है और उसकी आज्ञा का पालन रुक जाता है।
श्लोक 22 (13.215.22)
भृत्यानां सम्प्रहासेन पार्थिवः परिभूयते । अयाच्यानि च याचन्ति अवक्तव्यं ब्रुवन्ति च ॥
bhṛtyānāṃ samprahāsena pārthivaḥ paribhūyate | ayācyāni ca yācanti avaktavyaṃ bruvanti ca
सेवकों से हँसी-मजाक करने से राजा का अनादर होता है। वे न माँगने योग्य चीजें माँगने लगते हैं और न कहने योग्य बातें कहने लगते हैं।
श्लोक 23 (13.215.23)
पूर्वमप्यर्पितैर्लोभैः परितोषं न यान्ति ते । तस्माद्भृत्येषु नृपतिः सम्प्रहासं विवर्जयेत् ॥
pūrvamapyarpitairlobhaiḥ paritoṣaṃ na yānti te | tasmādbhṛtyeṣu nṛpatiḥ samprahāsaṃ vivarjayet
लोभ के कारण वे पहले दिए हुए से भी कभी सन्तुष्ट नहीं होते। इसलिए राजा सेवकों से हँसी-ठट्ठा छोड़ दे।
श्लोक 24 (13.215.24)
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । सगोत्रेषु विशेषेण सर्वोपायैर्न विश्वसेत् ॥
na viśvasedaviśvaste viśvaste nātiviśvaset | sagotreṣu viśeṣeṇa sarvopāyairna viśvaset
अविश्वसनीय पर विश्वास न करे, और विश्वासपात्र पर भी अधिक विश्वास न करे। विशेषकर सगोत्र बन्धुओं का किसी भी उपाय से विश्वास न करे।
श्लोक 25 (13.215.25)
विश्वासाद्भयमुत्पन्नं हन्याद्वृक्षमिवाशनिः । प्रमादाद्धन्यते राजा लोभेन च वशीकृतः । तस्मात्प्रमादं लोभं च न च कुर्यान्न विश्वसेत् ॥
viśvāsādbhayamutpannaṃ hanyādvṛkṣamivāśaniḥ | pramādāddhanyate rājā lobhena ca vaśīkṛtaḥ | tasmātpramādaṃ lobhaṃ ca na ca kuryānna viśvaset
विश्वास से उत्पन्न भय उसे वैसे ही मार गिराता है जैसे बिजली वृक्ष को। प्रमाद से और लोभ के वश में होकर राजा मारा जाता है। इसलिए वह न प्रमाद करे, न लोभ करे, और न अन्धविश्वास करे।
श्लोक 26 (13.215.26)
भयार्तानां भयत्राता दीनानुग्रहकारणात् । कार्याकार्यविशेषज्ञो नित्यं राष्ट्रहिते रतः ॥
bhayārtānāṃ bhayatrātā dīnānugrahakāraṇāt | kāryākāryaviśeṣajño nityaṃ rāṣṭrahite rataḥ
वह भयभीतों का रक्षक हो, दीनों पर अनुग्रह करने वाला हो, करने और न करने योग्य का भेद जानने वाला हो और सदा राष्ट्र के हित में लगा रहे।
श्लोक 27 (13.215.27)
सत्यसन्धः स्थितो राज्ये प्रजापालनतत्परः । अलुब्धो न्यायवादी च षड्भागमुपजीवति ॥
satyasandhaḥ sthito rājye prajāpālanatatparaḥ | alubdho nyāyavādī ca ṣaḍbhāgamupajīvati
वह वचन का पक्का, राज्य में स्थिर, प्रजापालन में तत्पर, लोभरहित और न्यायपूर्ण बोलने वाला होकर छठे भाग से जीवन-निर्वाह करे।
श्लोक 28 (13.215.28)
कार्याकार्यविशेषज्ञः सर्वं धर्मेण पश्यति । स्वराष्ट्रेषु दयां कुर्यादकार्ये न प्रवर्तते ॥
kāryākāryaviśeṣajñaḥ sarvaṃ dharmeṇa paśyati | svarāṣṭreṣu dayāṃ kuryādakārye na pravartate
करने और न करने योग्य को जानने वाला राजा सब कुछ धर्म की दृष्टि से देखे। वह अपने राष्ट्रों पर दया करे और अकार्य में प्रवृत्त न हो।
श्लोक 29 (13.215.29)
ये चैवैनं प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवाः । शत्रुं च मित्रवत्पश्येदपराधविवर्जितम् ॥
ye caivainaṃ praśaṃsanti ye ca nindanti mānavāḥ | śatruṃ ca mitravatpaśyedaparādhavivarjitam
लोग चाहे उसकी प्रशंसा करें या निन्दा, वह निरपराध शत्रु को भी मित्र के समान देखे।
श्लोक 30 (13.215.30)
अपराधानुरूपेण दुष्टं दण्डेन शासयेत् । धर्मः प्रवर्तते तत्र यत्र दण्डरुचिर्नृपः । न धर्मो विद्यते तत्र यत्र राजा क्षमान्वितः ॥
aparādhānurūpeṇa duṣṭaṃ daṇḍena śāsayet | dharmaḥ pravartate tatra yatra daṇḍarucirnṛpaḥ | na dharmo vidyate tatra yatra rājā kṣamānvitaḥ
अपराध के अनुरूप दण्ड देकर दुष्ट को शासित करे। जहाँ राजा को दण्ड देना रुचता है, वहाँ धर्म चलता है; जहाँ राजा केवल क्षमाशील है, वहाँ धर्म नहीं रहता।
श्लोक 31 (13.215.31)
अशिष्टशासनं धर्मः शिष्टानां परिपालनम् । वध्यांश्च घातयेद्यस्तु अवध्यान्परिरक्षति ॥
aśiṣṭaśāsanaṃ dharmaḥ śiṣṭānāṃ paripālanam | vadhyāṃśca ghātayedyastu avadhyānparirakṣati
जो वध के योग्य को मरवाता है और अवध्यों की रक्षा करता है, उसके लिए दुष्टों का शासन और सज्जनों का पालन ही धर्म है।
श्लोक 32 (13.215.32)
अवध्या ब्राह्मणा गावो दूताश्चैव पिता तथा । विद्यां ग्राहयते यश्च ये च पूर्वोपकारिणः । स्त्रियश्चैव न हन्तव्या यच्च सर्वातिथिर्नरः ॥
avadhyā brāhmaṇā gāvo dūtāścaiva pitā tathā | vidyāṃ grāhayate yaśca ye ca pūrvopakāriṇaḥ | striyaścaiva na hantavyā yacca sarvātithirnaraḥ
ब्राह्मण, गायें, दूत, पिता, विद्या सिखाने वाला, पहले उपकार करने वाले, स्त्रियाँ और जो सबका अतिथि है ऐसा मनुष्य — ये अवध्य हैं; इन्हें नहीं मारना चाहिए।
श्लोक 33 (13.215.33)
धरणीं गां हिरण्यं च सिद्धान्नं च तिलान्घृतम् । ददन्नित्यं द्विजातिभ्यो मुच्यते राजकिल्बिषात् ॥
dharaṇīṃ gāṃ hiraṇyaṃ ca siddhānnaṃ ca tilānghṛtam | dadannityaṃ dvijātibhyo mucyate rājakilbiṣāt
द्विजातियों को सदा भूमि, गौ, सोना, पका अन्न, तिल और घी देने से राजा राजा होने के दोष से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 34 (13.215.34)
एवं चरति यो नित्यं राजा राष्ट्रहिते रतः । तस्य राष्ट्रं धनं धर्मो यशः कीर्तिश्च वर्धते । न च पापैर्न चानर्थैर्युज्यते स नराधिपः ॥
evaṃ carati yo nityaṃ rājā rāṣṭrahite rataḥ | tasya rāṣṭraṃ dhanaṃ dharmo yaśaḥ kīrtiśca vardhate | na ca pāpairna cānarthairyujyate sa narādhipaḥ
जो राजा राष्ट्र के हित में लगा रहकर सदा इस प्रकार आचरण करता है, उसका राष्ट्र, धन, धर्म, यश और कीर्ति बढ़ती है, और वह न पापों से और न अनर्थों से युक्त होता है।
श्लोक 35 (13.215.35)
षड्भागमुपभुञ्जानः प्रजा राजा न रक्षति । स्वचक्रपरचक्राभ्यां धर्मैर्वा विक्रमेण वा ॥
ṣaḍbhāgamupabhuñjānaḥ prajā rājā na rakṣati | svacakraparacakrābhyāṃ dharmairvā vikrameṇa vā
राजा छठा भाग तो भोगता है, किन्तु प्रजा की रक्षा नहीं करता — न धर्मपूर्वक उपायों से, न पराक्रम से — अपनी या शत्रु की सेना से।
श्लोक 36 (13.215.36)
निरुद्योगो नृपो यश्च परराष्ट्रनिघातने । स्वराष्ट्रं निष्प्रतापस्य परचक्रेण हन्यते ॥
nirudyogo nṛpo yaśca pararāṣṭranighātane | svarāṣṭraṃ niṣpratāpasya paracakreṇa hanyate
जो राजा शत्रु-राष्ट्र पर आघात करने में उद्योगहीन है, उस तेजहीन राजा का अपना राष्ट्र शत्रु की सेना से नष्ट कर दिया जाता है।
श्लोक 37 (13.215.37)
यत्पापं सकलं राजा हतराष्ट्रः प्रपद्यते । मातुलं भागिनेयं वा मातरं श्वशुरं गुरुम् ॥
yatpāpaṃ sakalaṃ rājā hatarāṣṭraḥ prapadyate | mātulaṃ bhāgineyaṃ vā mātaraṃ śvaśuraṃ gurum
जिसका राष्ट्र नष्ट हो गया है, वह राजा समस्त पाप को अपने ऊपर लेता है। मामा, भानजा, माता, ससुर, गुरु —
श्लोक 38 (13.215.38)
पितरं वर्जयित्वैकं हन्याद्धातकमागतम् ॥
pitaraṃ varjayitvaikaṃ hanyāddhātakamāgatam
केवल पिता को छोड़कर, मारने के लिए आए हुए हत्यारे को मार डालना चाहिए।
श्लोक 39 (13.215.39)
स्वस्य राष्ट्रस्य रक्षार्थं युध्यमानश्च यो हतः । सङ्ग्रामे परचक्रेण श्रूयतां तस्य या गतिः ॥
svasya rāṣṭrasya rakṣārthaṃ yudhyamānaśca yo hataḥ | saṅgrāme paracakreṇa śrūyatāṃ tasya yā gatiḥ
अब सुनो, जो अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए युद्ध करता हुआ संग्राम में शत्रु की सेना द्वारा मारा जाता है, उसकी क्या गति होती है।
श्लोक 40 (13.215.40)
विमानेन वरारोहे अप्सरोगणसेवितः । शक्रलोकमितो याति सङ्ग्रामे निहतो नृपः ॥
vimānena varārohe apsarogaṇasevitaḥ | śakralokamito yāti saṅgrāme nihato nṛpaḥ
हे सुन्दरी, संग्राम में मारा गया राजा अप्सराओं के समूह से सेवित होकर विमान में बैठकर यहाँ से इन्द्रलोक को जाता है।
श्लोक 41 (13.215.41)
यावन्तो रोमकूपाः स्युस्तस्य गात्रेषु सुन्दरि । तावद्वर्षसहस्राणि शक्रलोके महीयते ॥
yāvanto romakūpāḥ syustasya gātreṣu sundari | tāvadvarṣasahasrāṇi śakraloke mahīyate
हे सुन्दरी, उसके शरीर में जितने रोमकूप होते हैं, उतने हजार वर्षों तक वह इन्द्रलोक में सम्मान पाता है।
श्लोक 42 (13.215.42)
यदि वै मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते । राजा वा राजमात्रो वा भूयो भवति वीर्यवान् ॥
yadi vai mānuṣe loke kadācidupapadyate | rājā vā rājamātro vā bhūyo bhavati vīryavān
यदि वह कभी फिर मनुष्य-लोक में जन्म लेता है, तो राजा या राजा के समान प्रतिष्ठित होकर पुनः पराक्रमी होता है।
श्लोक 43 (13.215.43)
तस्माद्यत्नेन कर्तव्यं स्वराष्ट्रपरिपालनम् । व्यवहाराश्च चारश्च सततं सत्यसन्धता ॥
tasmādyatnena kartavyaṃ svarāṣṭraparipālanam | vyavahārāśca cāraśca satataṃ satyasandhatā
इसलिए अपने राष्ट्र के पालन के लिए प्रयत्न करना चाहिए — न्याय-व्यवहार, गुप्तचर-व्यवस्था और निरन्तर सत्यप्रतिज्ञता।
श्लोक 44 (13.215.44)
अप्रमादः प्रमोदश्च व्यवसायेऽप्यचण्डता । भरणं चैव भृत्यानां वाहनानां च पोषणम् ॥
apramādaḥ pramodaśca vyavasāye'pyacaṇḍatā | bharaṇaṃ caiva bhṛtyānāṃ vāhanānāṃ ca poṣaṇam
सावधानी और प्रसन्नता, कार्य में उग्रता का अभाव, सेवकों का भरण और वाहनों का पोषण।
श्लोक 45 (13.215.45)
योधानां चैव सत्कारः कृते कर्मण्यमोघता । श्रेय एव नरेन्द्राणामिह चैव परत्र च ॥
yodhānāṃ caiva satkāraḥ kṛte karmaṇyamoghatā | śreya eva narendrāṇāmiha caiva paratra ca
योद्धाओं का सत्कार और किए हुए कार्य का निष्फल न होना — यही राजाओं के लिए इस लोक में और परलोक में कल्याणकारी है।