Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 216

जीविका और गृहस्थ का आचार

महेश्वर यज्ञ-विषयक उपदेश का समापन करते हुए बताते हैं कि यज्ञ में अर्पित पशु स्वर्ग जाते हैं और यजमान तथा उसके परिवार को भी फल मिलता है। फिर उमा पूछती हैं कि गृहस्थों को कैसे जीना चाहिए। महेश्वर जीविका के साधन बताते हैं — विद्या, वार्ता (कृषि-वाणिज्य), सेवा, शिल्प और नाट्य — प्रत्येक पर सलाह देते हैं, धन को धर्म, अर्थ, काम और आपत्ति के लिए चार भागों में बाँटने की शिक्षा देते हैं, और अच्छे गृहस्थ के दैनिक आचरण का वर्णन करते हैं।

अध्याय 215अध्याय-सूचीअध्याय 217

महेश्वर उवाच

श्लोक 1 (13.216.1)

पशवः पशुबन्धेषु ये हन्यन्तेऽध्वरेषु च । यूपे निबध्य मन्त्रैश्च यथान्यायं यथाविधि । मन्त्राहुतिविपूतास्ते स्वर्गं यान्ति यशस्विनि ॥

paśavaḥ paśubandheṣu ye hanyante'dhvareṣu ca | yūpe nibadhya mantraiśca yathānyāyaṃ yathāvidhi | mantrāhutivipūtāste svargaṃ yānti yaśasvini

पशुबन्ध और अन्य यज्ञों में विधि और न्याय के अनुसार मन्त्रों के साथ यूप से बाँधकर जिन पशुओं का वध किया जाता है, वे मन्त्र और आहुति से पवित्र होकर, हे यशस्विनी, स्वर्ग जाते हैं।

श्लोक 2 (13.216.2)

तर्पिता यज्ञभागेषु तेषां मांसैर्वरानने । अग्नयस्त्रिदशाश्चैव लोकपाला महेश्वराः ॥

tarpitā yajñabhāgeṣu teṣāṃ māṃsairvarānane | agnayastridaśāścaiva lokapālā maheśvarāḥ

यज्ञ के भागों में उन पशुओं के मांस से, हे सुमुखी, अग्नि, देवता, लोकपाल और महेश्वर तृप्त होते हैं।

श्लोक 3 (13.216.3)

तेषु तुष्टेषु जायेत यस्य यज्ञस्य यत्फलम् । तेन संयुज्यते देवि यजमानो न संशयः ॥

teṣu tuṣṭeṣu jāyeta yasya yajñasya yatphalam | tena saṃyujyate devi yajamāno na saṃśayaḥ

उनके सन्तुष्ट होने पर उस यज्ञ का जो फल है वह उत्पन्न होता है, और हे देवी, यजमान निःसन्देह उससे संयुक्त होता है।

श्लोक 4 (13.216.4)

सपत्नीकः सपुत्रश्च पित्रा च भ्रातृभिः सह । ये तत्र दीक्षिता देवि सर्वे स्वर्गं प्रयान्ति ते ॥

sapatnīkaḥ saputraśca pitrā ca bhrātṛbhiḥ saha | ye tatra dīkṣitā devi sarve svargaṃ prayānti te

पत्नी, पुत्र, पिता और भाइयों के साथ जो भी वहाँ दीक्षित होते हैं, हे देवी, वे सब स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 5 (13.216.5)

एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

etatte sarvamākhyātaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

यह सब मैंने तुम्हें बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो?

उमोवाच

श्लोक 6 (13.216.6)

भगवन्सर्वभूतेश शूलपाणे महाद्युते । श्रोतुमिच्छाम्यहं वृत्तं सर्वेषां गृहमेधिनाम् ॥

bhagavansarvabhūteśa śūlapāṇe mahādyute | śrotumicchāmyahaṃ vṛttaṃ sarveṣāṃ gṛhamedhinām

हे भगवन्, सब प्राणियों के स्वामी, शूलपाणि, महातेजस्वी, मैं सभी गृहस्थों की जीवनचर्या सुनना चाहती हूँ।

श्लोक 7 (13.216.7)

कीदृशं चरितं तेषां त्रिवर्गसहितं प्रभो । प्रत्यायतिः कथं तेषां जीवनार्थमुदाहृतम् ॥

kīdṛśaṃ caritaṃ teṣāṃ trivargasahitaṃ prabho | pratyāyatiḥ kathaṃ teṣāṃ jīvanārthamudāhṛtam

हे प्रभो, त्रिवर्ग से युक्त उनका आचरण कैसा हो? और उनकी जीविका के लिए आय किस प्रकार बताई गई है?

श्लोक 8 (13.216.8)

वर्तमानाः कथं सर्वे प्राप्नुवन्त्युत्तमां गतिम् । एतत्सर्वं समासेन वक्तुमर्हसि मानद ॥

vartamānāḥ kathaṃ sarve prāpnuvantyuttamāṃ gatim | etatsarvaṃ samāsena vaktumarhasi mānada

किस प्रकार रहते हुए वे सब उत्तम गति पाते हैं? हे मान देने वाले, यह सब आप संक्षेप में कहने योग्य हैं।

महेश्वर उवाच

श्लोक 9 (13.216.9)

न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामाऽसि भामिनि । प्रायशो लोकसद्वृत्तमिष्यते गृहवासिनाम् ॥

nyāyatastvaṃ mahābhāge śrotukāmā'si bhāmini | prāyaśo lokasadvṛttamiṣyate gṛhavāsinām

हे महाभागे, हे भामिनि, तुम न्यायपूर्वक ही सुनना चाहती हो। गृहस्थों के लिए प्रायः लोक में सद्वृत्त ही अपेक्षित है।

श्लोक 10 (13.216.10)

तेषां संरक्षणार्थाय राजानः संस्कृता भुवि । सर्वेषामथ मर्त्यानां वृत्तिं सामान्यतः शृणु ॥

teṣāṃ saṃrakṣaṇārthāya rājānaḥ saṃskṛtā bhuvi | sarveṣāmatha martyānāṃ vṛttiṃ sāmānyataḥ śṛṇu

उनकी रक्षा के लिए पृथ्वी पर राजा अभिषिक्त किए गए हैं। अब सब मनुष्यों की जीविका के विषय में सामान्य रूप से सुनो।

श्लोक 11 (13.216.11)

विद्या वार्ता च सेवा च कारुत्वं नाट्यता तथा । इत्येते जीवनार्थाय मर्त्यानां विहिताः प्रिये ॥

vidyā vārtā ca sevā ca kārutvaṃ nāṭyatā tathā | ityete jīvanārthāya martyānāṃ vihitāḥ priye

विद्या, वार्ता (कृषि-वाणिज्य), सेवा, शिल्पकर्म और नाट्य — हे प्रिये, ये ही मनुष्यों की जीविका के लिए विहित साधन हैं।

श्लोक 12 (13.216.12)

अपि जन्मफलं तावन्मानुषाणां विशेषतः । विहितं तत्स्ववृत्तेन तन्मे शृणु समाहिता ॥

api janmaphalaṃ tāvanmānuṣāṇāṃ viśeṣataḥ | vihitaṃ tatsvavṛttena tanme śṛṇu samāhitā

विशेषतः मनुष्यों के जन्म का फल भी अपनी वृत्ति के द्वारा सिद्ध होता है। हे एकाग्रचित्त देवी, वह मुझसे सुनो।

श्लोक 13 (13.216.13)

कर्मक्षेत्रं हि मानुष्यं सुखदुःखयुताः परे । सर्वेषां प्राणिनां तस्मान्मानुष्ये वृत्तिरिष्यते ॥

karmakṣetraṃ hi mānuṣyaṃ sukhaduḥkhayutāḥ pare | sarveṣāṃ prāṇināṃ tasmānmānuṣye vṛttiriṣyate

मनुष्य-जन्म कर्मक्षेत्र है; अन्य योनियाँ सुख-दुःख से बँधी हैं। इसलिए सब प्राणियों में मनुष्य-जन्म में ही वृत्ति का विधान माना गया है।

श्लोक 14 (13.216.14)

विद्यायोगस्तु सर्वेषां पूर्वमेव विधीयते । कार्याकार्यं विजानन्ति विद्यया देवि नान्यथा ॥

vidyāyogastu sarveṣāṃ pūrvameva vidhīyate | kāryākāryaṃ vijānanti vidyayā devi nānyathā

सबके लिए सबसे पहले विद्या का अभ्यास विहित है। हे देवी, विद्या से ही लोग कार्य और अकार्य को जानते हैं, अन्यथा नहीं।

श्लोक 15 (13.216.15)

विद्यया स्फीयते ज्ञानं ज्ञानात्तत्वनिदर्शनम् । दृष्टतत्वो विनीतात्मा सर्वार्थस्य च भाजनम् ॥

vidyayā sphīyate jñānaṃ jñānāttatvanidarśanam | dṛṣṭatatvo vinītātmā sarvārthasya ca bhājanam

विद्या से ज्ञान बढ़ता है और ज्ञान से तत्त्व का साक्षात्कार होता है। जिसने तत्त्व को देखा है और जिसका आत्मा विनीत है, वह सब प्रकार के प्रयोजनों का पात्र बनता है।

श्लोक 16 (13.216.16)

शक्यं विद्याविनीतेन लोके संजीवनं शुभम् ॥

śakyaṃ vidyāvinītena loke saṃjīvanaṃ śubham

विद्या से विनीत व्यक्ति संसार में शुभ जीविका प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 17 (13.216.17)

आत्मानं विद्यया तस्मात्पूर्वं वृत्वा तु भाजनम् । वश्येन्द्रियो जितक्रोधो भूतात्मानं तु भावयेत् । भावयित्वा तदाऽऽत्मानं पूजनीयः सतामपि ॥

ātmānaṃ vidyayā tasmātpūrvaṃ vṛtvā tu bhājanam | vaśyendriyo jitakrodho bhūtātmānaṃ tu bhāvayet | bhāvayitvā tadā''tmānaṃ pūjanīyaḥ satāmapi

इसलिए पहले विद्या के द्वारा अपने को योग्य पात्र बनाकर, इन्द्रियों को वश में करके और क्रोध को जीतकर देहधारी आत्मा को संस्कारित करे; इस प्रकार आत्मा को संस्कारित कर लेने पर वह सज्जनों में भी पूजनीय होता है।

श्लोक 18 (13.216.18)

कुलानुवृत्तं वृत्तं वा पूर्वमात्मा समाश्रयेत् । इत्येतत्कुलवासाय दानकर्म यथा पुरा ॥

kulānuvṛttaṃ vṛttaṃ vā pūrvamātmā samāśrayet | ityetatkulavāsāya dānakarma yathā purā

वह पहले अपने कुल की परम्परा से चली आई वृत्ति या आचार का आश्रय ले। कुल में रहने के लिए यही, और पहले की तरह दान-कर्म, अपेक्षित हैं।

श्लोक 19 (13.216.19)

यदि चेद्विद्यया चैव वृत्तिं काङ्क्षेदथात्मनः । राजविद्यानुवादेऽपि लोकविद्यामथापि वा । तीर्थतश्चापि गृह्णीयाच्छुश्रूषादिगुणैर्युतः ॥

yadi cedvidyayā caiva vṛttiṃ kāṅkṣedathātmanaḥ | rājavidyānuvāde'pi lokavidyāmathāpi vā | tīrthataścāpi gṛhṇīyācchuśrūṣādiguṇairyutaḥ

यदि वह विद्या से अपनी जीविका चाहे — चाहे राजविद्या और उसके व्याख्यान से, चाहे लोकविद्या से — तो शुश्रूषा आदि गुणों से युक्त होकर उसे योग्य गुरु से ग्रहण करे।

श्लोक 20 (13.216.20)

ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव दृढं कुर्यात्प्रयत्नतः । एवं विद्याफलं देवि प्राप्नुयान्नान्यथा नरः । न्यायाद्विद्याफलानीच्छेदधर्मं तत्र वर्जयेत् ॥

granthataścārthataścaiva dṛḍhaṃ kuryātprayatnataḥ | evaṃ vidyāphalaṃ devi prāpnuyānnānyathā naraḥ | nyāyādvidyāphalānīcchedadharmaṃ tatra varjayet

वह ग्रन्थ और अर्थ दोनों से प्रयत्नपूर्वक उसे दृढ़ करे। हे देवी, मनुष्य विद्या का फल इसी प्रकार पाता है, अन्यथा नहीं। वह विद्या के फल न्यायपूर्वक चाहे और उसमें अधर्म का त्याग करे।

श्लोक 21 (13.216.21)

यदिच्छेद्वार्तया वृत्तिं काङ्क्षेत विधिपूर्वकम् । क्षेत्रे जलोपपन्ने च तद्योग्यां कृषिमाचरेत् ॥

yadicchedvārtayā vṛttiṃ kāṅkṣeta vidhipūrvakam | kṣetre jalopapanne ca tadyogyāṃ kṛṣimācaret

यदि वह वार्ता से जीविका चाहे तो विधिपूर्वक चले; जल से युक्त खेत में उसके योग्य खेती करे।

श्लोक 22 (13.216.22)

वाणिज्यं वा यथाकालं कुर्यात्तद्देशयोगतः । मूल्यमर्थं प्रयासं च विचार्यैव व्ययोदयौ ॥

vāṇijyaṃ vā yathākālaṃ kuryāttaddeśayogataḥ | mūlyamarthaṃ prayāsaṃ ca vicāryaiva vyayodayau

अथवा समय और स्थान के अनुकूल वाणिज्य करे, मूल्य, पूँजी और परिश्रम तथा व्यय और लाभ को विचारकर ही।

श्लोक 23 (13.216.23)

पशुसंजीवनं चैव दश गाः पोषयेद्ध्रुवम् । बहुप्रकारा बहवः पशवस्तस्य साधकाः ॥

paśusaṃjīvanaṃ caiva daśa gāḥ poṣayeddhruvam | bahuprakārā bahavaḥ paśavastasya sādhakāḥ

अथवा पशुपालन से जीविका करे और निश्चय ही दस गायों का पोषण करे; अनेक प्रकार के बहुत से पशु उसके साधक होते हैं।

श्लोक 24 (13.216.24)

यः कश्चित्सेवया वृत्तिं काङ्क्षेत मतिमान्नरः । यतात्मा श्रवणीयानां भवेद्वै सम्प्रयोजकः ॥

yaḥ kaścitsevayā vṛttiṃ kāṅkṣeta matimānnaraḥ | yatātmā śravaṇīyānāṃ bhavedvai samprayojakaḥ

जो बुद्धिमान मनुष्य सेवा से जीविका चाहे, वह संयमी होकर, जिनकी आज्ञा सुननी है उनके कार्यों को ठीक से सिद्ध करने वाला बने।

श्लोक 25 (13.216.25)

बुद्ध्या वा कर्मयोगाद्वा बोधनाद्वा समाश्रयेत् । मार्गतस्तु समाश्रित्य तदा तत्सम्प्रयोजयेत् ॥

buddhyā vā karmayogādvā bodhanādvā samāśrayet | mārgatastu samāśritya tadā tatsamprayojayet

वह बुद्धि से, कर्मकुशलता से, या परामर्श देकर आश्रय ले; उचित मार्ग से आश्रय पाकर फिर स्वामी के कार्यों को सिद्ध करे।

श्लोक 26 (13.216.26)

यथायथा सु तुष्येत तथा संतोषयेत्तु तम् । अनुजीविगुणोपेतः कुर्यादात्मार्थमाश्रितम् ॥

yathāyathā su tuṣyeta tathā saṃtoṣayettu tam | anujīviguṇopetaḥ kuryādātmārthamāśritam

जिस-जिस प्रकार स्वामी प्रसन्न हो, उसी प्रकार उसे सन्तुष्ट करे। आश्रित के गुणों से युक्त होकर वह अपने आश्रयदाता के कार्य को अपना ही कार्य समझे।

श्लोक 27 (13.216.27)

विप्रियं नाचरेत्तस्य एषा सेवा समासतः । विप्रयोगात्पुरा तेन गतिमन्यां न लक्षयेत् ॥

vipriyaṃ nācarettasya eṣā sevā samāsataḥ | viprayogātpurā tena gatimanyāṃ na lakṣayet

वह उसका अप्रिय कार्य न करे — संक्षेप में यही सेवा है। उससे अलग होने से पहले वह दूसरी गति की ओर दृष्टि न रखे।

श्लोक 28 (13.216.28)

कारुकर्म च नाट्यं च प्रायशो नीचयोनिषु । तयोरपि यथायोगं न्यायतः कर्मवेतनम् ॥

kārukarma ca nāṭyaṃ ca prāyaśo nīcayoniṣu | tayorapi yathāyogaṃ nyāyataḥ karmavetanam

शिल्पकर्म और नाट्य प्रायः नीच योनियों में पाए जाते हैं। इन दोनों में भी कर्म का वेतन यथायोग्य और न्यायपूर्ण होना चाहिए।

श्लोक 29 (13.216.29)

आजीवेभ्योऽपि सर्वेभ्यः स्वार्जवाद्वेतनं हरेत् । अनार्जवादाहरतस्तत्तु पापाय कल्पते ॥

ājīvebhyo'pi sarvebhyaḥ svārjavādvetanaṃ haret | anārjavādāharatastattu pāpāya kalpate

सभी जीविका-साधनों से वह अपनी सरलता (ईमानदारी) के द्वारा ही वेतन ले। बेईमानी से लेने वाले के लिए वह पाप का कारण बनता है।

श्लोक 30 (13.216.30)

सर्वेषां पूर्वमारम्भांश्चिन्तयेन्नयपूर्वकम् । आत्मशक्तिमुपायांश्च देशकालौ च युक्तितः । कारणानि प्रयासं च प्रक्षेपं च फलोदयम् ॥

sarveṣāṃ pūrvamārambhāṃścintayennayapūrvakam | ātmaśaktimupāyāṃśca deśakālau ca yuktitaḥ | kāraṇāni prayāsaṃ ca prakṣepaṃ ca phalodayam

सबसे पहले वह नीति के साथ अपने कार्यों पर विचार करे — अपनी शक्ति, उपाय, स्थान और समय को युक्ति से तौले, तथा कारण, परिश्रम, लगाई जाने वाली पूँजी और फल की प्राप्ति को भी।

श्लोक 31 (13.216.31)

एवमादीनि सञ्चिन्त्य दृष्ट्वा दैवानुकूलताम् । अतः परं समारम्भेद्यत्रात्महितमाहितम् ॥

evamādīni sañcintya dṛṣṭvā daivānukūlatām | ataḥ paraṃ samārambhedyatrātmahitamāhitam

इन बातों पर और ऐसी अन्य बातों पर विचार करके और दैव को अनुकूल देखकर वह तब वही कार्य आरम्भ करे जिसमें अपना हित भली-भाँति निहित हो।

श्लोक 32 (13.216.32)

वृत्तिमेव समासाद्य तां सदा परिपालयेत् । देवमानुषविघ्नेभ्यो न पुनर्मन्यते यथा ॥

vṛttimeva samāsādya tāṃ sadā paripālayet | devamānuṣavighnebhyo na punarmanyate yathā

जीविका पाकर वह सदा उसकी रक्षा करे, दैवी और मानवी विघ्नों से इस प्रकार बचाए कि फिर चिन्ता न करनी पड़े।

श्लोक 33 (13.216.33)

पालयन्वर्धयन्भुञ्जंस्तां प्राप्य न विनाशयेत् । क्षीयते गिरिसङ्काशमश्नतो ह्यनपेक्षया ॥

pālayanvardhayanbhuñjaṃstāṃ prāpya na vināśayet | kṣīyate girisaṅkāśamaśnato hyanapekṣayā

उसे पाकर वह उसका पालन करे, बढ़ाए और उसका उपभोग करे, पर उसे नष्ट न करे। बिना विचार के खाते रहने से पर्वत के समान भण्डार भी क्षीण हो जाता है।

श्लोक 34 (13.216.34)

आजीवेभ्यो धनं प्राप्य चतुर्धा विभजेद्बुधः । धर्मायार्थाय कामाय आपत्प्रशमनाय च ॥

ājīvebhyo dhanaṃ prāpya caturdhā vibhajedbudhaḥ | dharmāyārthāya kāmāya āpatpraśamanāya ca

जीविका से धन पाकर बुद्धिमान उसके चार भाग करे — धर्म के लिए, अर्थ के लिए, काम के लिए और आपत्ति के निवारण के लिए।

श्लोक 35 (13.216.35)

चतुर्ष्वपि विभागेषु विधानं शृणु शोभने ॥

caturṣvapi vibhāgeṣu vidhānaṃ śṛṇu śobhane

हे शोभने, इन चारों भागों के विषय में विधान सुनो।

श्लोक 36 (13.216.36)

यज्ञार्थं चान्नदानार्थं दीनानुग्रहकारणात् । देवब्राह्मणपूजार्थं पितृपूजार्थमेव च ॥

yajñārthaṃ cānnadānārthaṃ dīnānugrahakāraṇāt | devabrāhmaṇapūjārthaṃ pitṛpūjārthameva ca

यज्ञ के लिए, अन्नदान के लिए, दीनों पर दया के कारण, देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा के लिए, और पितरों की पूजा के लिए —

श्लोक 37 (13.216.37)

मूलार्थं सन्निवासार्थं क्रियानित्यैश्च धार्मिकैः । एवमादिषु चान्येषु धर्मार्थं संत्यजेद्धनम् ॥

mūlārthaṃ sannivāsārthaṃ kriyānityaiśca dhārmikaiḥ | evamādiṣu cānyeṣu dharmārthaṃ saṃtyajeddhanam

मूल के लिए, निवास के लिए, और धार्मिक जनों के साथ नित्य क्रियाओं के लिए — इनमें और ऐसे ही अन्य कार्यों में वह धर्म के निमित्त धन व्यय करे।

श्लोक 38 (13.216.38)

धर्मकार्ये धनं दद्यादनवेक्ष्य फलोदयम् । ऐश्वर्यस्थानलाभार्थं राजवाल्लभ्यकारणात् ॥

dharmakārye dhanaṃ dadyādanavekṣya phalodayam | aiśvaryasthānalābhārthaṃ rājavāllabhyakāraṇāt

धर्म के कार्य में वह फल की अपेक्षा किए बिना धन दे। ऐश्वर्य और ऊँचा पद पाने के लिए तथा राजा की कृपा पाने के लिए,

श्लोक 39 (13.216.39)

वार्तायां च समारम्भेऽमात्यमित्रपरिग्रहे । आवाहे च विवाहे च पुत्राणां वृत्तिकारणात् ॥

vārtāyāṃ ca samārambhe'mātyamitraparigrahe | āvāhe ca vivāhe ca putrāṇāṃ vṛttikāraṇāt

व्यापार आरम्भ करने के लिए, अमात्यों और मित्रों को अपनाने के लिए, आवाह और विवाह में, और पुत्रों की जीविका के लिए,

श्लोक 40 (13.216.40)

अर्थोदयसमावाप्तावनर्थस्य विघातने । एवमादिषु चान्येषु अर्थार्थं विसृजेद्धनम् ॥

arthodayasamāvāptāvanarthasya vighātane | evamādiṣu cānyeṣu arthārthaṃ visṛjeddhanam

धन की वृद्धि पाने के लिए और अनर्थ को दूर करने के लिए — इन और ऐसे अन्य कार्यों में वह अर्थ के निमित्त धन व्यय करे।

श्लोक 41 (13.216.41)

अनुबन्धं हेतुयुक्तं दृष्ट्वा वित्तं परित्यजेत् । अनर्थं बाधते ह्यर्थो अर्थं चैव फलान्युत ॥

anubandhaṃ hetuyuktaṃ dṛṣṭvā vittaṃ parityajet | anarthaṃ bādhate hyartho arthaṃ caiva phalānyuta

परिणाम और उसके कारण को देखकर वह धन का त्याग करे। क्योंकि धन अनर्थ को रोकता है, और धन तथा फल भी देता है।

श्लोक 42 (13.216.42)

नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थं नरा यत्नशतैरपि । तस्माद्धनं रक्षितव्यं दातव्यं च विधानतः ॥

nādhanāḥ prāpnuvantyarthaṃ narā yatnaśatairapi | tasmāddhanaṃ rakṣitavyaṃ dātavyaṃ ca vidhānataḥ

निर्धन मनुष्य सैकड़ों प्रयत्नों से भी अर्थ नहीं पाते। इसलिए धन की रक्षा करनी चाहिए और उसे विधि के अनुसार दान भी करना चाहिए।

श्लोक 43 (13.216.43)

शरीरपोषणार्थाय आहारस्य विशोषणे । नटगान्धर्वसंयोगे कामयात्राविहारयोः ॥

śarīrapoṣaṇārthāya āhārasya viśoṣaṇe | naṭagāndharvasaṃyoge kāmayātrāvihārayoḥ

शरीर के पोषण के लिए, भोजन की तैयारी के लिए, नट और गायकों के संग के लिए, तथा विहार-यात्राओं और मनोरंजन के लिए,

श्लोक 44 (13.216.44)

मनःप्रियाणां संयोगे प्रीतिदाने तथैव च । एवमादिषु चान्येषु कामार्थं विसृजेद्धनम् ॥

manaḥpriyāṇāṃ saṃyoge prītidāne tathaiva ca | evamādiṣu cānyeṣu kāmārthaṃ visṛjeddhanam

मन को प्रिय लगने वालों के संग में और प्रीतिपूर्वक दिए जाने वाले दान में — इन और ऐसे अन्य कार्यों में वह काम के निमित्त धन व्यय करे।

श्लोक 45 (13.216.45)

विचार्य गुणदोषांस्तु त्रयाणां तत्र संत्यजेत् । चतुर्थं सन्निदध्याच्च आपदर्थं शुचिस्मिते ॥

vicārya guṇadoṣāṃstu trayāṇāṃ tatra saṃtyajet | caturthaṃ sannidadhyācca āpadarthaṃ śucismite

तीनों भागों के गुण-दोष का विचार करके वह उनमें धन व्यय करे; चौथा भाग, हे शुचिस्मिते, आपत्ति के लिए सुरक्षित रखे,

श्लोक 46 (13.216.46)

राज्यभ्रंशविनाशार्थं दुर्भिक्षार्थं च शोभने । महाव्याधिविमोक्षार्थं वार्धकस्यैव कारणात् ॥

rājyabhraṃśavināśārthaṃ durbhikṣārthaṃ ca śobhane | mahāvyādhivimokṣārthaṃ vārdhakasyaiva kāraṇāt

राज्य के छिन जाने के संकट के लिए, दुर्भिक्ष के लिए, हे शोभने, महारोग से मुक्ति के लिए, और वृद्धावस्था के कारण,

श्लोक 47 (13.216.47)

शत्रूणां प्रतिकाराय साहसैश्चाप्यमर्षणात् । प्रस्थाने चान्यदेशार्थमापदां विप्रमोक्षणे । एवमादि समुद्दिश्य सन्निदध्यात्स्वकं धनम् ॥

śatrūṇāṃ pratikārāya sāhasaiścāpyamarṣaṇāt | prasthāne cānyadeśārthamāpadāṃ vipramokṣaṇe | evamādi samuddiśya sannidadhyātsvakaṃ dhanam

शत्रुओं से बदला लेने के लिए, क्रोधवश किए गए साहसिक कार्यों के लिए, दूसरे देश में प्रस्थान के लिए, और विपत्तियों से छुटकारे के लिए — ऐसे कार्यों को लक्ष्य में रखकर वह अपना धन सुरक्षित रखे।

श्लोक 48 (13.216.48)

सुखमर्थवतां लोके कृच्छ्राणां विप्रमोक्षणम् । यस्य नास्ति धनं किञ्चित्तस्य लोकद्वयं न च ॥

sukhamarthavatāṃ loke kṛcchrāṇāṃ vipramokṣaṇam | yasya nāsti dhanaṃ kiñcittasya lokadvayaṃ na ca

संसार में धनवानों को सुख है और कठिनाइयों से छुटकारा भी। जिसके पास कुछ भी धन नहीं, उसके लिए दोनों लोक नहीं हैं।

श्लोक 49 (13.216.49)

अशनादिन्द्रियाणीव सर्वमर्थात्प्रवर्तते । निधानमात्रं यस्तेषामन्यथा विलयं व्रजेत् । एवं देवि मनुष्याणां लोकानां जीवनं प्रति ॥

aśanādindriyāṇīva sarvamarthātpravartate | nidhānamātraṃ yasteṣāmanyathā vilayaṃ vrajet | evaṃ devi manuṣyāṇāṃ lokānāṃ jīvanaṃ prati

जैसे इन्द्रियाँ भोजन पर निर्भर हैं, वैसे ही सब कुछ धन से चलता है। इन भागों में जो केवल संचय ही करता है, उसका धन अन्यथा नष्ट हो जाता है। हे देवी, मनुष्यों की लोक में जीविका इसी प्रकार की है।

श्लोक 50 (13.216.50)

एवं लोकस्य वृत्तस्य लोकवृत्तं पुनः शृणु । धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं च परमं यशः ॥

evaṃ lokasya vṛttasya lokavṛttaṃ punaḥ śṛṇu | dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ svargyaṃ ca paramaṃ yaśaḥ

इस प्रकार लोक के आचरण के विषय में फिर सुनो — वह कल्याणकारी, यशदायक, आयुवर्धक और स्वर्ग दिलाने वाला है, और परम कीर्ति है।

श्लोक 51 (13.216.51)

त्रिवर्गो हि वशे युक्तः सर्वेषां संविधीयते । तथा संवर्तमानास्तु लोकयोर्हितमाप्नुयुः ॥

trivargo hi vaśe yuktaḥ sarveṣāṃ saṃvidhīyate | tathā saṃvartamānāstu lokayorhitamāpnuyuḥ

सबके लिए त्रिवर्ग को वश में रखकर उचित रीति से व्यवस्थित किया जाता है; इस प्रकार चलते हुए लोग दोनों लोकों का हित पाते हैं।

श्लोक 52 (13.216.52)

काल्योत्थानं च शौचं च देवब्राह्मणभक्तितः । गुरुणामेव शुश्रूषा ब्राह्मणेष्वभिवादनम् ॥

kālyotthānaṃ ca śaucaṃ ca devabrāhmaṇabhaktitaḥ | guruṇāmeva śuśrūṣā brāhmaṇeṣvabhivādanam

प्रातः उठना, शुद्धता, देवताओं और ब्राह्मणों के प्रति भक्ति, गुरुजनों की सेवा और ब्राह्मणों को प्रणाम,

श्लोक 53 (13.216.53)

प्रत्युत्थानं च वृद्धानां देवस्थानप्रणामनम् । आभिमुख्यं पुरस्कृत्य अतिथीनां च पूजनम् ॥

pratyutthānaṃ ca vṛddhānāṃ devasthānapraṇāmanam | ābhimukhyaṃ puraskṛtya atithīnāṃ ca pūjanam

वृद्धों के आने पर उठकर खड़े होना, देवस्थानों में प्रणाम करना, अतिथियों का सम्मुख होकर आदर करना और उनकी पूजा,

श्लोक 54 (13.216.54)

वृद्धोपदेशकरणं श्रवणं हितपथ्ययोः । पोषणं भृत्यवर्गस्य सान्त्वदानपरिग्रहे ॥

vṛddhopadeśakaraṇaṃ śravaṇaṃ hitapathyayoḥ | poṣaṇaṃ bhṛtyavargasya sāntvadānaparigrahe

वृद्धों के उपदेश का पालन, हित और पथ्य की बातें सुनना, और सान्त्वना, दान तथा आश्रय देकर सेवकजनों का पोषण,

श्लोक 55 (13.216.55)

न्यायतः कर्मकरणमन्यायाहितवर्जितम् । सम्यग्वृत्तं स्वदारेषु दोषाणां प्रतिषेधनम् ॥

nyāyataḥ karmakaraṇamanyāyāhitavarjitam | samyagvṛttaṃ svadāreṣu doṣāṇāṃ pratiṣedhanam

कर्म को न्यायपूर्वक करना, अन्याय और अहित से दूर रहना, अपनी पत्नियों के प्रति उत्तम व्यवहार और दोषों का निवारण,

श्लोक 56 (13.216.56)

पुत्राणां विनयं कुर्यात्तत्तत्कार्यनियोजनम् । वर्जनं चाशुभार्थानां शुभानां जोषणं तथा ॥

putrāṇāṃ vinayaṃ kuryāttattatkāryaniyojanam | varjanaṃ cāśubhārthānāṃ śubhānāṃ joṣaṇaṃ tathā

पुत्रों को विनय सिखाना और उन्हें उनके योग्य कार्यों में लगाना, अशुभ का त्याग और शुभ का सेवन,

श्लोक 57 (13.216.57)

कुलोचितानां धर्माणां यथावत्परिपालनम् । कुलसन्धारणं चैव पौरुषेणैव सर्वशः । एवमादि शुभं सर्वं तस्य वृत्तमिति स्थितम् ॥

kulocitānāṃ dharmāṇāṃ yathāvatparipālanam | kulasandhāraṇaṃ caiva pauruṣeṇaiva sarvaśaḥ | evamādi śubhaṃ sarvaṃ tasya vṛttamiti sthitam

कुल के योग्य धर्मों का यथावत् पालन और अपने पुरुषार्थ से सब प्रकार कुल को धारण करना — यह सब शुभ आचरण उसकी वृत्ति कही गई है।

श्लोक 58 (13.216.58)

वृद्धसेवी भवेन्नित्यं हितार्थं ज्ञानकाङ्क्षया । परार्थं नाहरेद्द्रव्यमनामन्त्र्य तु सर्वथा । न याचेत परान्धीरः स्वबाहुबलमाश्रयेत् ॥

vṛddhasevī bhavennityaṃ hitārthaṃ jñānakāṅkṣayā | parārthaṃ nāhareddravyamanāmantrya tu sarvathā | na yāceta parāndhīraḥ svabāhubalamāśrayet

वह अपने हित और ज्ञान की इच्छा से सदा वृद्धों की सेवा करे; बिना आमन्त्रण या अनुमति के दूसरे का धन कभी न ले; दूसरों से याचना न करे, वरन् धैर्यपूर्वक अपने बाहुबल का आश्रय ले।

श्लोक 59 (13.216.59)

स्वशरीरं सदा रक्षेदाहाराचारयोरपि । हितं पथ्यं सदाहारं जीर्णं भुञ्जीत मात्रया ॥

svaśarīraṃ sadā rakṣedāhārācārayorapi | hitaṃ pathyaṃ sadāhāraṃ jīrṇaṃ bhuñjīta mātrayā

वह आहार और आचरण दोनों में अपने शरीर की सदा रक्षा करे। हितकर और पथ्य भोजन, पहले का पचने पर, मात्रा के अनुसार करे।

श्लोक 60 (13.216.60)

देवतातिथिसत्कारं कृत्वा सर्वं यथाविधि । शेषं भुञ्जेच्छुचिर्भूत्वा न च भाषेत विप्रियम् ॥

devatātithisatkāraṃ kṛtvā sarvaṃ yathāvidhi | śeṣaṃ bhuñjecchucirbhūtvā na ca bhāṣeta vipriyam

देवताओं और अतिथियों का सब प्रकार से विधिपूर्वक सत्कार करके वह पवित्र होकर शेष भोजन करे, और अप्रिय बात न बोले।

श्लोक 61 (13.216.61)

प्रतिश्रयं च पानीयं बलिं भिक्षां च सर्वतः । गृहस्थवासी सततं दद्याद्गाश्चैव पोषयेत् ॥

pratiśrayaṃ ca pānīyaṃ baliṃ bhikṣāṃ ca sarvataḥ | gṛhasthavāsī satataṃ dadyādgāścaiva poṣayet

गृहस्थ सदा आश्रय, जल, बलि और भिक्षा सबको दे, और गायों का पालन भी करे।

श्लोक 62 (13.216.62)

बहिर्निष्क्रमणं चैव कुर्यात्कारणतोऽपि वा । मध्याह्ने वाऽर्धरात्रे वा गमनाय न रोचयेत् ॥

bahirniṣkramaṇaṃ caiva kuryātkāraṇato'pi vā | madhyāhne vā'rdharātre vā gamanāya na rocayet

वह कारण होने पर भी घर से बाहर जा सकता है; पर दोपहर या आधी रात में यात्रा करना उसे उचित न लगे।

श्लोक 63 (13.216.63)

विषयान्नावगाहेत स्वशक्त्या तु समाचरेत् । यथाऽऽयव्ययता लोके गृहस्थानां प्रपूजितम् ॥

viṣayānnāvagāheta svaśaktyā tu samācaret | yathā''yavyayatā loke gṛhasthānāṃ prapūjitam

वह विषयों में न डूबे, अपनी शक्ति के अनुसार ही आचरण करे। संसार में गृहस्थों के लिए आय के अनुरूप व्यय करना प्रशंसित है।

श्लोक 64 (13.216.64)

अयशस्करमर्थघ्नं कर्म यत्परपीडनम् । भयाद्वा यदि लोभाद्वा न कुर्वीत कदाचन ॥

ayaśaskaramarthaghnaṃ karma yatparapīḍanam | bhayādvā yadi lobhādvā na kurvīta kadācana

जो कर्म अपयश देने वाला, धन का नाश करने वाला या दूसरों को पीड़ा देने वाला हो, उसे वह भय से या लोभ से कभी न करे।

श्लोक 65 (13.216.65)

बुद्धिपूर्वं समालोक्य दूरतो गुणदोषतः । आरभेत तदा कर्म शुभं वा यदि वेतरत् ॥

buddhipūrvaṃ samālokya dūrato guṇadoṣataḥ | ārabheta tadā karma śubhaṃ vā yadi vetarat

बुद्धिपूर्वक दूर से ही गुण-दोष को भलीभाँति देखकर तब कर्म आरम्भ करे, चाहे वह शुभ हो या उससे भिन्न।

श्लोक 66 (13.216.66)

आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनस्तु शुभाशुभे । मनसा कर्मणा वाचा न च काङ्क्षेत पातकम् ॥

ātmasākṣī bhavennityamātmanastu śubhāśubhe | manasā karmaṇā vācā na ca kāṅkṣeta pātakam

अपने शुभ और अशुभ कर्मों में वह सदा स्वयं अपना साक्षी रहे, और मन, कर्म तथा वाणी से पाप की इच्छा न करे।

अध्याय 215अध्याय-सूचीअध्याय 217