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अनुशासन पर्व · अध्याय 217

कर्म और वर्ण: भाग्य में भेद क्यों

उमा महेश्वर से पूछती हैं कि चारों वर्ण स्वभाव से बने हैं या कर्म से। वे उत्तर देते हैं कि प्रत्येक का जन्म और भाग्य उसके अपने कर्मों के अनुसार होता है: जो ब्राह्मण अपने धर्म छोड़ देता है वह शूद्र होकर जन्म लेता है, और सदाचारी शूद्र ब्राह्मण होकर। फिर जब उमा पूछती हैं कि कोई मनुष्य धनी और सुखी तथा कोई निर्धन क्यों है, तब वे बताते हैं कि पक्षपात का दोष लगाए जाने पर ब्रह्मा ने कहा था कि प्राणी अपने ही बोए का फल पाते हैं, और वे उदार, कंजूस, दबाव में दान देने वाले तथा निर्धन होकर भी देने वाले लोगों की भिन्न-भिन्न गतियाँ समझाते हैं।

अध्याय 216अध्याय-सूचीअध्याय 218

उमोवाच

श्लोक 1 (13.217.1)

भगवन्भगनेत्रघ्न कालसूदन शङ्कर । इमे वर्णाश्च चत्वारो विहिताः स्वस्वभावतः । उताहो क्रियया वर्णाः सम्भवन्ति महेश्वर ॥

bhagavanbhaganetraghna kālasūdana śaṅkara | ime varṇāśca catvāro vihitāḥ svasvabhāvataḥ | utāho kriyayā varṇāḥ sambhavanti maheśvara

हे भगवन्, भग के नेत्रों का नाश करने वाले, काल को मारने वाले शंकर! ये चारों वर्ण अपने-अपने स्वभाव से ही बने हैं, या हे महेश्वर, कर्म से वर्ण होते हैं?

श्लोक 2 (13.217.2)

एवं मे संशयप्रश्नस्तं मे छेत्तुं त्वमर्हसि ॥

evaṃ me saṃśayapraśnastaṃ me chettuṃ tvamarhasi

यह मेरी शंका का प्रश्न है; आप ही मेरे लिए इसे काट सकते हैं।

महेश्वर उवाच

श्लोक 3 (13.217.3)

स्वभावादेव विद्यन्ते चत्वारो ब्राह्मणादयः । एकजात्या सुदुष्प्रापमन्यवर्णत्वमागतम् ॥

svabhāvādeva vidyante catvāro brāhmaṇādayaḥ | ekajātyā suduṣprāpamanyavarṇatvamāgatam

ब्राह्मण आदि चारों वर्ण स्वभाव से ही हैं। किन्तु एक जाति में आ जाने पर दूसरे वर्ण को पाना अत्यन्त कठिन है।

श्लोक 4 (13.217.4)

तच्च कर्मविशेषेण पुनर्जन्मनि जायते । तस्मात्तेषां प्रवक्ष्यामि तत्सर्वं कर्मपाकजम् ॥

tacca karmaviśeṣeṇa punarjanmani jāyate | tasmātteṣāṃ pravakṣyāmi tatsarvaṃ karmapākajam

वह भी विशेष कर्म के कारण आगे के जन्म में होता है। इसलिए मैं तुम्हें वह सब बताऊँगा, जो कर्म के परिपाक से उत्पन्न होता है।

श्लोक 5 (13.217.5)

ब्राह्मणस्तु नरो भूत्वा स्वजातिमनुपालयन् । दृढं ब्राह्मणकर्माणि वेदोक्तानि समाचरेत् ॥

brāhmaṇastu naro bhūtvā svajātimanupālayan | dṛḍhaṃ brāhmaṇakarmāṇi vedoktāni samācaret

ब्राह्मण के रूप में जन्मा जो मनुष्य अपनी जाति का पालन करता रहे, वह वेद में कहे ब्राह्मण के कर्मों का दृढ़ता से आचरण करे;

श्लोक 6 (13.217.6)

सत्यार्जवपरो भूत्वा दानयज्ञपरस्तथा । सत्यां जात्यां समुदितो जातिधर्मान्न हापयेत् ॥

satyārjavaparo bhūtvā dānayajñaparastathā | satyāṃ jātyāṃ samudito jātidharmānna hāpayet

सत्य और सरलता में तत्पर रहे, तथा दान और यज्ञ में भी लगा रहे; उस उत्तम जाति से युक्त होकर वह अपनी जाति के धर्मों को न छोड़े।

श्लोक 7 (13.217.7)

एवं संवर्तमानस्तु कालधर्मं गतः पुनः । स्वर्गलोके हि जायेत स्वर्गभोगाय भामिनि ॥

evaṃ saṃvartamānastu kāladharmaṃ gataḥ punaḥ | svargaloke hi jāyeta svargabhogāya bhāmini

इस प्रकार रहता हुआ जब वह मृत्यु को प्राप्त होता है, तो हे भामिनी, वह स्वर्गलोक में स्वर्ग के भोग के लिए जन्म लेता है।

श्लोक 8 (13.217.8)

तत्क्षये ब्राह्मणो भूत्वा तथैव नृषु जायते । एवंस्वकर्मणा मर्त्यः स्वजातिं लभते पुनः ॥

tatkṣaye brāhmaṇo bhūtvā tathaiva nṛṣu jāyate | evaṃsvakarmaṇā martyaḥ svajātiṃ labhate punaḥ

उसके क्षीण होने पर वह ब्राह्मण होकर उसी प्रकार मनुष्यों में जन्म लेता है। इस तरह मनुष्य अपने कर्म से फिर अपनी जाति पाता है।

श्लोक 9 (13.217.9)

अपरस्तु तथा कश्चिद्ब्रह्मयोनिसमुद्भवः । अवमत्यैव तां जातिमज्ञानतमसा वृतः ॥

aparastu tathā kaścidbrahmayonisamudbhavaḥ | avamatyaiva tāṃ jātimajñānatamasā vṛtaḥ

परन्तु कोई दूसरा, ब्राह्मण-योनि में जन्म लेकर भी अज्ञान के अन्धकार से घिरा हुआ उस जाति का अनादर करता है।

श्लोक 10 (13.217.10)

अन्यथा वर्तमानस्तु जातिकर्माणि वर्जयेत् । शूद्रवद्विचरेल्लोके शूद्रकर्माभिलाषवान् । शूद्रैः सह चरन्नित्यं शौचमङ्गलवर्जितः ॥

anyathā vartamānastu jātikarmāṇi varjayet | śūdravadvicarelloke śūdrakarmābhilāṣavān | śūdraiḥ saha carannityaṃ śaucamaṅgalavarjitaḥ

वह दूसरी रीति से चलता हुआ अपनी जाति के कर्म छोड़ देता है; शूद्र के समान लोक में विचरता है, शूद्रों के कर्मों की इच्छा रखता है, सदा शूद्रों के साथ घूमता है और शुचिता तथा मंगल-कर्मों से रहित रहता है।

श्लोक 11 (13.217.11)

स चापि कालधर्मस्थो यमलोके सुदण्डितः । यदि जायेत मर्त्येषु शूद्र एवाभिजायते ॥

sa cāpi kāladharmastho yamaloke sudaṇḍitaḥ | yadi jāyeta martyeṣu śūdra evābhijāyate

वह भी मृत्यु को प्राप्त होकर यमलोक में कठोर दण्ड पाता है; और यदि वह मनुष्यों में जन्म लेता है, तो शूद्र ही होकर जन्मता है।

श्लोक 12 (13.217.12)

शूद्र एव भवेद्देवि ब्राह्मणोऽपि स्वकर्मणा ॥

śūdra eva bhaveddevi brāhmaṇo'pi svakarmaṇā

हे देवि, ब्राह्मण भी अपने कर्म से शूद्र ही हो जाता है।

श्लोक 13 (13.217.13)

तथैव शूद्रस्त्वपरः शूद्रकर्माणि वर्जयेत् । सत्यार्जवपरो भूत्वा दानधर्मपरस्तथा । मन्त्रब्राह्मणसत्कर्ता मनसा ब्राह्मणप्रियः ॥

tathaiva śūdrastvaparaḥ śūdrakarmāṇi varjayet | satyārjavaparo bhūtvā dānadharmaparastathā | mantrabrāhmaṇasatkartā manasā brāhmaṇapriyaḥ

इसी प्रकार कोई दूसरा शूद्र शूद्र के कर्म छोड़ देता है; वह सत्य और सरलता में तथा दान-धर्म में लगा रहता है, मन्त्रों और ब्राह्मणों का आदर करता है और मन से ब्राह्मणों का प्रिय होता है।

श्लोक 14 (13.217.14)

एवं युक्तसमाचारः शूद्रोपि मरणं गतः । स्वर्गलोके हि जायेत तत्क्षये नृषु जायते । ब्राह्मणानां कुले मुख्ये वेदस्वाध्यायसंयुते ॥

evaṃ yuktasamācāraḥ śūdropi maraṇaṃ gataḥ | svargaloke hi jāyeta tatkṣaye nṛṣu jāyate | brāhmaṇānāṃ kule mukhye vedasvādhyāyasaṃyute

ऐसे संयत आचरण वाला शूद्र भी मरने पर स्वर्गलोक में जन्म लेता है; उसके क्षीण होने पर वह मनुष्यों में, वेदाध्ययन से युक्त ब्राह्मणों के श्रेष्ठ कुल में जन्म लेता है।

श्लोक 15 (13.217.15)

एवमेव सदा लोके शूद्रो ब्राह्मण्यमाप्नुयात् ॥

evameva sadā loke śūdro brāhmaṇyamāpnuyāt

इसी प्रकार लोक में शूद्र सदा ब्राह्मणत्व पा सकता है।

श्लोक 16 (13.217.16)

एवं क्षत्रियवैश्याश्च जातिधर्मेण संयुताः । स्वकर्मणैव जायन्ते विशिष्टेष्वधमेषु च ॥

evaṃ kṣatriyavaiśyāśca jātidharmeṇa saṃyutāḥ | svakarmaṇaiva jāyante viśiṣṭeṣvadhameṣu ca

इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी, जो अपनी जाति के धर्म से युक्त हैं, अपने ही कर्म से ऊँचे और नीचे कुलों में जन्म लेते हैं।

श्लोक 17 (13.217.17)

एवं जातिविपर्यासः प्रेत्यभावे भवेन्नृणाम् । अन्यथा तु न शक्यं तल्लोकसंस्थितिकारणात् ॥

evaṃ jātiviparyāsaḥ pretyabhāve bhavennṛṇām | anyathā tu na śakyaṃ tallokasaṃsthitikāraṇāt

इस प्रकार मरने के बाद के जन्म में मनुष्यों की जाति उलट सकती है; लोक की व्यवस्था बनाए रखने के कारण यह अन्यथा नहीं हो सकता।

श्लोक 18 (13.217.18)

तस्माज्जातिं विशिष्टां तु कथंचित्प्राप्य पण्डितः । सर्वथा तां तथा रक्षेन्न पुनर्भ्रश्यते यथा । इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

tasmājjātiṃ viśiṣṭāṃ tu kathaṃcitprāpya paṇḍitaḥ | sarvathā tāṃ tathā rakṣenna punarbhraśyate yathā | iti te kathitaṃ devi bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi

इसलिए विवेकी पुरुष किसी प्रकार उत्तम जाति पाकर हर तरह से उसकी ऐसी रक्षा करे कि वह फिर उससे भ्रष्ट न हो। हे देवि, तुमसे यह कह दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?

उमोवाच

श्लोक 19 (13.217.19)

जन्मप्रभृति कः शुद्धो लभेज्जन्मफलं नरः । शोभनाशोभनं सर्वमधिकारवशात्स्वकम् ॥

janmaprabhṛti kaḥ śuddho labhejjanmaphalaṃ naraḥ | śobhanāśobhanaṃ sarvamadhikāravaśātsvakam

कौन मनुष्य जन्म से ही शुद्ध रहकर जन्म का फल पाता है? जो कुछ शुभ और अशुभ है, वह सब अपने अधिकार के वश से अपना ही होता है।

महेश्वर उवाच

श्लोक 20 (13.217.20)

कर्म कुर्वन्न लिप्येत आर्जवेन समाचरेत् । आत्मैव तच्छुभं कुर्यादशुभे योजयेत्परान् ॥

karma kurvanna lipyeta ārjavena samācaret | ātmaiva tacchubhaṃ kuryādaśubhe yojayetparān

कर्म करता हुआ वह उससे लिप्त न हो और सरलता से आचरण करे। वह स्वयं वही करे जो शुभ है, और दूसरों को अशुभ में लगाए।

श्लोक 21 (13.217.21)

शठेषु शठवत्कुर्योदार्यष्वार्यवदाचरेत् । आपत्सु नावसीदेच्च घोरान्सङ्ग्रामयेत्परात् । साम्नैव सर्वकार्याणि कर्तुं पूर्वं समारभेत् ॥

śaṭheṣu śaṭhavatkuryodāryaṣvāryavadācaret | āpatsu nāvasīdecca ghorānsaṅgrāmayetparāt | sāmnaiva sarvakāryāṇi kartuṃ pūrvaṃ samārabhet

दुष्टों के साथ दुष्ट की तरह और श्रेष्ठ जनों के साथ श्रेष्ठ की तरह व्यवहार करे; विपत्तियों में हताश न हो; भयानक शत्रुओं से युद्ध करे। सभी कार्य करने में पहले साम से ही आरम्भ करे।

श्लोक 22 (13.217.22)

अनर्थाधर्मशोकानां यथा न प्राप्नुयात्स्वयम् । प्रीयते तत्तथा कर्तुमेतद्वृत्तं समासतः ॥

anarthādharmaśokānāṃ yathā na prāpnuyātsvayam | prīyate tattathā kartumetadvṛttaṃ samāsataḥ

वह ऐसा करने में प्रसन्न होता है कि स्वयं अनर्थ, अधर्म और शोक को प्राप्त न हो। यही संक्षेप में सदाचार है।

श्लोक 23 (13.217.23)

एवं वृत्तं समासाद्य गृहमाश्रित्य मानवाः । निराहारा निरुद्वेगाः प्राप्नुवन्त्युत्तमां गतिम् ॥

evaṃ vṛttaṃ samāsādya gṛhamāśritya mānavāḥ | nirāhārā nirudvegāḥ prāpnuvantyuttamāṃ gatim

इस आचरण को अपनाकर और गृहस्थ-आश्रम में रहकर मनुष्य भूख और उद्वेग से रहित होकर उत्तम गति पाते हैं।

श्लोक 24 (13.217.24)

एतज्जन्मफलं नित्यं सर्वेषां गृहवासिनाम् । एवं गृहस्थितैर्नित्यं वर्तितव्यमिति स्थितिः । एतत्सर्वं मया प्रोक्तं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

etajjanmaphalaṃ nityaṃ sarveṣāṃ gṛhavāsinām | evaṃ gṛhasthitairnityaṃ vartitavyamiti sthitiḥ | etatsarvaṃ mayā proktaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

सब गृहस्थों के जन्म का यही सदा का फल है; घर में रहने वालों को सदा इसी प्रकार चलना चाहिए, यही मर्यादा है। यह सब मैंने कह दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?

उमोवाच

श्लोक 25 (13.217.25)

सुरासुरपते देव वरद प्रीतिवर्धन । मानुषेष्वेव ये के चिदाढ्याः क्लेशविवर्जिताः । भुञ्जाना विविधान्भोगान्दृश्यन्ते निरुपद्रवाः ॥

surāsurapate deva varada prītivardhana | mānuṣeṣveva ye ke cidāḍhyāḥ kleśavivarjitāḥ | bhuñjānā vividhānbhogāndṛśyante nirupadravāḥ

हे सुरों और असुरों के स्वामी, वर देने वाले, प्रीति बढ़ाने वाले देव! मनुष्यों में ही कुछ लोग धनी और क्लेश से रहित हैं, नाना प्रकार के भोग भोगते हैं और निश्चिन्त दिखाई देते हैं;

श्लोक 26 (13.217.26)

अपरे क्लेशसंयुक्ता दरिद्रा भोगवर्जिताः ॥

apare kleśasaṃyuktā daridrā bhogavarjitāḥ

जबकि दूसरे क्लेशों से घिरे, दरिद्र और भोगों से वंचित हैं।

श्लोक 27 (13.217.27)

किमर्थं मानुषे लोके न समत्वेन कल्पिताः । एतच्छ्रोतुं महादेव कौतूहलमतीव मे ॥

kimarthaṃ mānuṣe loke na samatvena kalpitāḥ | etacchrotuṃ mahādeva kautūhalamatīva me

मनुष्य-लोक में उन्हें समान क्यों नहीं बनाया गया? हे महादेव, यह सुनने की मुझे बहुत उत्सुकता है।

महेश्वर उवाच

श्लोक 28 (13.217.28)

न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामासि भामिनि । शृणु तत्सर्वमखिलं मानुषाणां हितं वचः ॥

nyāyatastvaṃ mahābhāge śrotukāmāsi bhāmini | śṛṇu tatsarvamakhilaṃ mānuṣāṇāṃ hitaṃ vacaḥ

हे महाभागे, हे भामिनी, तुम्हारा यह सुनना चाहना उचित ही है। मनुष्यों के हित का वह सारा वचन पूरा-पूरा सुनो।

श्लोक 29 (13.217.29)

आदिसर्गे पुरा ब्रह्मा समत्वेनासृजत्प्रजाः । नित्यं न भवतो ह्यस्य रागद्वेषौ प्रजापतेः । तदा तस्मात्सुराः सर्वे बभूवुः समतो नराः ॥

ādisarge purā brahmā samatvenāsṛjatprajāḥ | nityaṃ na bhavato hyasya rāgadveṣau prajāpateḥ | tadā tasmātsurāḥ sarve babhūvuḥ samato narāḥ

पहली सृष्टि में प्राचीन काल में ब्रह्मा ने प्राणियों को समान रूप से रचा था। इन प्रजापति में कभी राग या द्वेष नहीं होता। इसलिए तब सब देवता और मनुष्य समान थे।

श्लोक 30 (13.217.30)

एवं संवर्तमाने तु युगे कालविपर्ययात् । केचित्प्रपेदिरे तत्र विषमं बुद्धिमोहिताः ॥

evaṃ saṃvartamāne tu yuge kālaviparyayāt | kecitprapedire tatra viṣamaṃ buddhimohitāḥ

परन्तु युग के बीतते-बीतते काल के फेर से उनमें से कुछ लोग मोह में पड़कर विषमता को प्राप्त हो गए।

श्लोक 31 (13.217.31)

तेषां हानिं ततो दृष्ट्वा तुल्यानामेव भामिनि । ब्राह्मणास्ते समाजग्मुस्तत्तत्कारणवेदकाः ॥

teṣāṃ hāniṃ tato dṛṣṭvā tulyānāmeva bhāmini | brāhmaṇāste samājagmustattatkāraṇavedakāḥ

हे भामिनी, समान रहे हुए उन लोगों की हानि देखकर उन-उन कारणों को जानने वाले ब्राह्मण एकत्र हुए।

ब्राह्मणा ऊचुः

श्लोक 32 (13.217.32)

कर्तुं नार्हसि देवेश पक्षपातं त्वमीदृशम् । पुत्रभावे समे देव किमर्थं नो भवेत्कलिः ॥

kartuṃ nārhasi deveśa pakṣapātaṃ tvamīdṛśam | putrabhāve same deva kimarthaṃ no bhavetkaliḥ

हे देवेश, आपको ऐसा पक्षपात नहीं करना चाहिए। हे देव, पुत्र होने में हम सब समान हैं, तो हमारे बीच कलह क्यों हो?

महेश्वर उवाच

श्लोक 33 (13.217.33)

एवमेतैरुपालब्धो ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । यूयं मा ब्रूत मे दोषं स्वकृतं स्मरथ प्रजाः ॥

evametairupālabdho brahmā vacanamabravīt | yūyaṃ mā brūta me doṣaṃ svakṛtaṃ smaratha prajāḥ

इस प्रकार उनसे उलाहना पाकर ब्रह्मा ने कहा: "मुझ पर दोष मत लगाओ; हे प्रजाओ, अपने किए को स्मरण करो।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 34 (13.217.34)

युष्माभिरेव युष्माकं ग्रथितं हि शुभाशुभम् । यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते । स्वकृतस्य फलं भुङ्क्ते नान्यस्तद्बोक्तुमर्हति ॥

yuṣmābhireva yuṣmākaṃ grathitaṃ hi śubhāśubham | yādṛśaṃ kurute karma tādṛśaṃ phalamaśnute | svakṛtasya phalaṃ bhuṅkte nānyastadboktumarhati

"तुम्हारा शुभ और अशुभ तुम्हीं ने अपने हाथों बुना है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है। अपने किए का फल वह स्वयं भोगता है; कोई दूसरा उसे भोगने योग्य नहीं।"

महेश्वर उवाच

श्लोक 35 (13.217.35)

एवं संबोधितास्तेन कालकर्त्रा स्वयंभुवा । पुनर्विवृत्य कर्माणि शुभान्येव प्रपेदिरे ॥

evaṃ saṃbodhitāstena kālakartrā svayaṃbhuvā | punarvivṛtya karmāṇi śubhānyeva prapedire

इस प्रकार काल के कर्ता स्वयम्भू से समझाए जाने पर उन्होंने लौटकर फिर शुभ कर्मों को ही अपनाया।

श्लोक 36 (13.217.36)

एवं विज्ञाततत्वास्ते दानधर्मपरायणाः । शुभानि विधिवत्कृत्वा कालधर्मगताः पुनः । तानि दानफलान्येव भुञ्जते सुखभोगिनः ॥

evaṃ vijñātatatvāste dānadharmaparāyaṇāḥ | śubhāni vidhivatkṛtvā kāladharmagatāḥ punaḥ | tāni dānaphalānyeva bhuñjate sukhabhoginaḥ

इस प्रकार तत्त्व को जानकर वे दान और धर्म में लगे रहे; विधिपूर्वक शुभ कर्म करके मृत्यु के बाद वे फिर सुख-भोग करते हुए दान के उन्हीं फलों को भोगते हैं।

श्लोक 37 (13.217.37)

स्वकृतं तु नरस्तस्मात्स्वयमेव प्रपद्यते ॥

svakṛtaṃ tu narastasmātsvayameva prapadyate

इसलिए मनुष्य अपने किए को स्वयं ही पाता है।

श्लोक 38 (13.217.38)

अपरे धर्मकामेभ्यो निवृत्ताश्च शुभेक्षणे । कदर्या निरनुक्रोशाः प्रायेणात्मपरायणाः ॥

apare dharmakāmebhyo nivṛttāśca śubhekṣaṇe | kadaryā niranukrośāḥ prāyeṇātmaparāyaṇāḥ

हे सुन्दर नेत्रों वाली, कुछ दूसरे लोग धर्म करने की इच्छा से विमुख हो गए हैं; वे कंजूस, निर्दय और प्रायः केवल अपने ही में लगे रहने वाले हैं।

श्लोक 39 (13.217.39)

तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने । दरिद्राः क्लेशभूयिष्ठा भवन्त्येव न संशयः ॥

tādṛśā maraṇaṃ prāptāḥ punarjanmani śobhane | daridrāḥ kleśabhūyiṣṭhā bhavantyeva na saṃśayaḥ

ऐसे लोग मृत्यु पाकर अगले जन्म में, हे शोभने, दरिद्र और अत्यन्त क्लेशों से भरे होते ही हैं; इसमें सन्देह नहीं।

उमोवाच

श्लोक 40 (13.217.40)

मानुषेष्वथ ये केचिद्धनधान्यसमन्विताः । भोगहीनाः प्रदृश्यन्ते सर्वभोगेषु सत्स्वपि । न भुञ्जते किमर्थं ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

mānuṣeṣvatha ye keciddhanadhānyasamanvitāḥ | bhogahīnāḥ pradṛśyante sarvabhogeṣu satsvapi | na bhuñjate kimarthaṃ te tanme śaṃsitumarhasi

मनुष्यों में कुछ लोग धन-धान्य से सम्पन्न हैं, फिर भी सब भोग उपलब्ध होने पर भी भोग से रहित दिखाई देते हैं। वे क्यों नहीं भोगते? यह मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 41 (13.217.41)

परैः संचोदिता धर्मं कुर्वते न स्वकामतः । स्वयं श्रद्धां बहिष्कृत्य कुर्वन्ति च रुदन्ति च ॥

paraiḥ saṃcoditā dharmaṃ kurvate na svakāmataḥ | svayaṃ śraddhāṃ bahiṣkṛtya kurvanti ca rudanti ca

वे दूसरों के प्रेरित करने पर धर्म करते हैं, अपनी इच्छा से नहीं; अपने भीतर श्रद्धा को निकालकर वे करते भी हैं और रोते भी हैं।

श्लोक 42 (13.217.42)

तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने । फलानि तानि सम्प्राप्य भुञ्जते न कदाचन । रक्षन्तो वर्धयन्तश्च आसते निधिपालवत् ॥

tādṛśā maraṇaṃ prāptāḥ punarjanmani śobhane | phalāni tāni samprāpya bhuñjate na kadācana | rakṣanto vardhayantaśca āsate nidhipālavat

ऐसे लोग मृत्यु पाकर अगले जन्म में, हे शोभने, उन फलों को पाकर भी कभी उन्हें नहीं भोगते; वे निधि के रखवाले की तरह उनकी रक्षा और वृद्धि करते हुए बैठे रहते हैं।

उमोवाच

श्लोक 43 (13.217.43)

केचिद्धनवियुक्ताश्च भोगयुक्ता महेश्वर । मानुषाः सम्प्रदृश्यन्ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

keciddhanaviyuktāśca bhogayuktā maheśvara | mānuṣāḥ sampradṛśyante tanme śaṃsitumarhasi

हे महेश्वर, कुछ मनुष्य धन से रहित होकर भी भोगों से युक्त दिखाई देते हैं; यह मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 44 (13.217.44)

आनृशंस्यपरा ये तु धर्मकामाश्च दुर्गताः । परोपकारं कुर्वन्ति दीनानुग्रहकारणात् ॥

ānṛśaṃsyaparā ye tu dharmakāmāśca durgatāḥ | paropakāraṃ kurvanti dīnānugrahakāraṇāt

जो दयालु हैं और धर्म को चाहने वाले हैं, और स्वयं विपत्ति में पड़े होकर भी दीनों पर अनुग्रह करने के लिए दूसरों का उपकार करते हैं,

श्लोक 45 (13.217.45)

प्रतिपद्युः परधनं नष्टं वाऽन्यैर्नरैर्हृतम् । नित्यं ये दातुमनसो नरा वित्तेष्वसत्स्वपि ॥

pratipadyuḥ paradhanaṃ naṣṭaṃ vā'nyairnarairhṛtam | nityaṃ ye dātumanaso narā vitteṣvasatsvapi

जो दूसरे का खोया हुआ या दूसरों द्वारा हरा हुआ धन लौटा देते हैं, और धन न रहने पर भी सदा देने का मन रखते हैं,

श्लोक 46 (13.217.46)

कालधर्मवशं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि ते नराः । एते धनविहीनाश्च भोगयुक्ता भवन्त्युत ॥

kāladharmavaśaṃ prāptāḥ punarjanmani te narāḥ | ete dhanavihīnāśca bhogayuktā bhavantyuta

वे मनुष्य काल के वश में जाकर अगले जन्म में धन से रहित होकर भी भोगों से युक्त होते हैं।

श्लोक 47 (13.217.47)

धर्मदानोपदेशं वा कर्तव्यमिति निश्चयः । इति ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

dharmadānopadeśaṃ vā kartavyamiti niścayaḥ | iti te kathitaṃ devi kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

अथवा धर्म और दान का उपदेश करना चाहिए, यह निश्चय है। हे देवि, तुमसे यह कह दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?

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