Skip to main content

अनुशासन पर्व · अध्याय 218

कर्मफल: धन, वृद्धावस्था, रूप और सौभाग्य

उमा पूछती हैं कि मनुष्यों के भाग्य में भेद क्यों है, और महेश्वर हर भेद को पहले किए कर्मों से जोड़ते हैं। जो बिना माँगे और विवेक से दान देते हैं वे बिना प्रयत्न के भोगते हैं; जो केवल माँगे जाने पर देते हैं उन्हें फल पाने के लिए परिश्रम करना पड़ता है; और कंजूसों को कुछ नहीं मिलता। वे समझाते हैं कि कोई बुढ़ापे में ही धन क्यों पाता है, कोई धनी होकर भी रोगी क्यों है, कोई रूपवान और कोई कुरूप क्यों है, और कोई स्त्रियों का प्रिय तथा कोई धनी होकर भी अप्रिय क्यों होता है।

अध्याय 217अध्याय-सूचीअध्याय 219

उमोवाच

श्लोक 1 (13.218.1)

भगवन्देवदेवेश त्र्यक्ष भो वृषभध्वज । मानुषास्त्रिविधा देव दृश्यन्ते सततं विभो ॥

bhagavandevadeveśa tryakṣa bho vṛṣabhadhvaja | mānuṣāstrividhā deva dṛśyante satataṃ vibho

हे भगवन्, देवताओं के स्वामी, त्रिनेत्र, वृषभध्वज! हे विभो, मनुष्य सदा तीन प्रकार के दिखाई देते हैं:

श्लोक 2 (13.218.2)

आसीना एव भुञ्जन्ते स्थानैश्वर्यपरिग्रहैः । अपरे यत्नपूर्वं तु लभन्ते भोगसङ्ग्रहम् ॥

āsīnā eva bhuñjante sthānaiśvaryaparigrahaiḥ | apare yatnapūrvaṃ tu labhante bhogasaṅgraham

कुछ लोग बैठे-बैठे ही पद, ऐश्वर्य और सम्पत्ति के द्वारा भोग भोगते हैं; दूसरे प्रयत्न करके ही भोग-सामग्री पाते हैं;

श्लोक 3 (13.218.3)

अपरे यतमानाश्च न लभन्ते तु किञ्चन । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

apare yatamānāśca na labhante tu kiñcana | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

और अन्य प्रयत्न करते हुए भी कुछ नहीं पाते। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 4 (13.218.4)

न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामाऽसि भामिनि ॥

nyāyatastvaṃ mahābhāge śrotukāmā'si bhāmini

हे महाभागे, हे भामिनी, तुम्हारा यह सुनना चाहना उचित ही है।

श्लोक 5 (13.218.5)

ये लोके मानुषा देवि दानधर्मपरायणाः । पात्राणि विधिवज्ज्ञात्वा दूरतोप्यनुमानतः ॥

ye loke mānuṣā devi dānadharmaparāyaṇāḥ | pātrāṇi vidhivajjñātvā dūratopyanumānataḥ

हे देवि, लोक में जो मनुष्य दान-धर्म में लगे रहते हैं, और विधि के अनुसार सत्पात्रों को पहचानकर दूर से भी अनुमान से उन्हें जान लेते हैं,

श्लोक 6 (13.218.6)

अभिगम्य स्वयं तत्र ग्राहयन्ति प्रसाद्य च । दानादि चेङ्गितैरेव तैरविज्ञातमेव वा ॥

abhigamya svayaṃ tatra grāhayanti prasādya ca | dānādi ceṅgitaireva tairavijñātameva vā

जो स्वयं उनके पास जाकर उन्हें मनाकर दान स्वीकार कराते हैं, और जो संकेतों से ही, या उनके जाने बिना ही दान देते हैं,

श्लोक 7 (13.218.7)

पुनर्जन्मनि ते देवि तादृशाः शोभना नराः । अयत्नतस्तु तान्येव फलानि प्राप्नुवन्त्युत ॥

punarjanmani te devi tādṛśāḥ śobhanā narāḥ | ayatnatastu tānyeva phalāni prāpnuvantyuta

हे देवि, ऐसे सज्जन अगले जन्म में उन्हीं फलों को बिना प्रयत्न के पा लेते हैं,

श्लोक 8 (13.218.8)

आसीना एव भुञ्जन्ते भोगान्सुकृतभोगिनः ॥

āsīnā eva bhuñjante bhogānsukṛtabhoginaḥ

और अपने पुण्य का फल भोगने वाले वे बैठे-बैठे ही भोग भोगते हैं।

श्लोक 9 (13.218.9)

अपरे ये च दानानि ददत्येव प्रयाचिताः । यदायदाऽर्थिने दत्त्वा पुनर्दानं च याचिताः ॥

apare ye ca dānāni dadatyeva prayācitāḥ | yadāyadā'rthine dattvā punardānaṃ ca yācitāḥ

दूसरे लोग माँगे जाने पर ही दान देते हैं: जब-जब याचक को देकर वे फिर से दान के लिए माँगे जाते हैं,

श्लोक 10 (13.218.10)

तावत्कालं ततो देवि पुनर्जन्मनि ते नराः । यत्नतः श्रमसंयुक्ताः पुनस्तान्प्राप्नुवन्ति च ॥

tāvatkālaṃ tato devi punarjanmani te narāḥ | yatnataḥ śramasaṃyuktāḥ punastānprāpnuvanti ca

तब-तब, हे देवि, उतने ही समय तक अगले जन्म में वे लोग उन फलों को फिर प्रयत्न और परिश्रम से ही पाते हैं।

श्लोक 11 (13.218.11)

याचिता अपि केचित्तु अदत्त्वैव कथञ्चन । अभ्यसूयापरा मर्त्या लोभोपहतचेतसः ॥

yācitā api kecittu adattvaiva kathañcana | abhyasūyāparā martyā lobhopahatacetasaḥ

कुछ लोग माँगे जाने पर भी किसी तरह कुछ नहीं देते; वे ईर्ष्यालु मनुष्य होते हैं और उनके चित्त लोभ से नष्ट हो चुके होते हैं।

श्लोक 12 (13.218.12)

ते पुनर्जन्मनि शुभे यतन्तो बहुधा नराः । न प्राप्नुवन्ति मनुजा मार्गन्तस्तेऽपि किञ्चन ॥

te punarjanmani śubhe yatanto bahudhā narāḥ | na prāpnuvanti manujā mārgantaste'pi kiñcana

अगले शुभ जन्म में वे अनेक प्रकार से प्रयत्न करते हुए और खोजते हुए भी कुछ नहीं पाते।

श्लोक 13 (13.218.13)

नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद्दानफलं विदुः । यद्यद्ददाति पुरुषस्तत्तत्प्राप्नोति केवलम् ॥

nānuptaṃ rohate sasyaṃ tadvaddānaphalaṃ viduḥ | yadyaddadāti puruṣastattatprāpnoti kevalam

जो बोया न जाए वह अन्न नहीं उगता; वैसे ही वे दान का फल जानते हैं: मनुष्य जो-जो देता है, केवल वही-वही पाता है।

श्लोक 14 (13.218.14)

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

iti te kathitaṃ devi bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi

हे देवि, तुमसे यह कह दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?

उमोवाच

श्लोक 15 (13.218.15)

भगवन्भगनेत्रघ्न केचिद्वार्धकसंयुताः । अभोगयोग्यकाले तु भोगांश्चैव धनानि च ॥

bhagavanbhaganetraghna kecidvārdhakasaṃyutāḥ | abhogayogyakāle tu bhogāṃścaiva dhanāni ca

हे भगवन्, भग के नेत्रों का नाश करने वाले! कुछ मनुष्य वृद्धावस्था में, जब भोग का समय नहीं रहता, भोग और धन पाते हैं,

श्लोक 16 (13.218.16)

लभन्ते स्थविरा भूता भोगैश्वर्यं यतस्ततः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

labhante sthavirā bhūtā bhogaiśvaryaṃ yatastataḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

और जहाँ-तहाँ से भोग का ऐश्वर्य प्राप्त कर लेते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 17 (13.218.17)

हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्वं समाहिता ॥

hanta te kathayiṣyāmi śṛṇu tatvaṃ samāhitā

अच्छा, मैं तुम्हें बताऊँगा; एकाग्र मन से इस तत्त्व को सुनो।

श्लोक 18 (13.218.18)

धर्मकार्यं चिरं कालं विस्मृत्य धनसंयुताः । प्राणान्तकाले सम्प्राप्ते व्याधिभिश्च निपीडिताः ॥

dharmakāryaṃ ciraṃ kālaṃ vismṛtya dhanasaṃyutāḥ | prāṇāntakāle samprāpte vyādhibhiśca nipīḍitāḥ

जो धन से सम्पन्न होकर भी बहुत समय तक धर्म-कार्य को भूले रहते हैं, और मृत्यु का समय आने पर रोगों से पीड़ित होते हैं,

श्लोक 19 (13.218.19)

आरभन्ते पुनर्धर्मं दातुं दानानि वा नराः । ते पुनर्जन्मनि शुभे भूत्वा दुःखपरिप्लुताः ॥

ārabhante punardharmaṃ dātuṃ dānāni vā narāḥ | te punarjanmani śubhe bhūtvā duḥkhapariplutāḥ

वे मनुष्य फिर से धर्म करने या दान देने लगते हैं; तब अगले शुभ जन्म में होकर वे दुःख में डूबे रहते हैं,

श्लोक 20 (13.218.20)

अतीतयौवने काले स्थविरत्वमुपागताः । लभन्ते पूर्वदत्तानां फलानि शुभलक्षणे ॥

atītayauvane kāle sthaviratvamupāgatāḥ | labhante pūrvadattānāṃ phalāni śubhalakṣaṇe

और यौवन बीत जाने पर जब वे वृद्धावस्था को पहुँचते हैं, तब हे शुभ लक्षणों वाली, वे पहले दिए हुए दानों के फल पाते हैं।

श्लोक 21 (13.218.21)

एतत्कर्मफलं देवि कालयोगाद्भवत्युत ॥

etatkarmaphalaṃ devi kālayogādbhavatyuta

हे देवि, यह कर्म का फल है; यह काल के योग से होता है।

उमोवाच

श्लोक 22 (13.218.22)

भोगयुक्ता महादेव केचिद्व्याधिपरिप्लुताः । असमर्थाश्च तान्भोक्तं भवन्ति किमु कारणम् ॥

bhogayuktā mahādeva kecidvyādhipariplutāḥ | asamarthāśca tānbhoktaṃ bhavanti kimu kāraṇam

हे महादेव, कुछ लोग भोगों से युक्त होकर भी रोग से घिरे रहते हैं और उन्हें भोगने में असमर्थ हो जाते हैं। इसका क्या कारण है?

महेश्वर उवाच

श्लोक 23 (13.218.23)

व्याधियोगपरिक्लिष्टा ये निराशाः स्वजीविते । आरभन्ते तदा कर्तुं दानानि शुभलक्षणे ॥

vyādhiyogaparikliṣṭā ye nirāśāḥ svajīvite | ārabhante tadā kartuṃ dānāni śubhalakṣaṇe

जो लोग रोग से पीड़ित होकर अपने जीवन से निराश हो जाते हैं और तब दान देना आरम्भ करते हैं, हे शुभ लक्षणों वाली,

श्लोक 24 (13.218.24)

ते पुनर्जन्मनि शुभे प्राप्य तानि फलान्युत । असमर्थाश्च तान्भोक्तुं व्याधितास्ते भवन्त्युत ॥

te punarjanmani śubhe prāpya tāni phalānyuta | asamarthāśca tānbhoktuṃ vyādhitāste bhavantyuta

वे अगले शुभ जन्म में उन फलों को पाकर भी रोगी होने के कारण उन्हें भोगने में असमर्थ हो जाते हैं।

उमोवाच

श्लोक 25 (13.218.25)

भगवन्देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन । रूपयुक्ताः प्रदृश्यन्ते शुभाङ्गाः प्रियदर्शनाः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

bhagavandevadeveśa mānuṣeṣveva kecana | rūpayuktāḥ pradṛśyante śubhāṅgāḥ priyadarśanāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

हे भगवन्, देवताओं के स्वामी! मनुष्यों में ही कुछ लोग रूपवान, सुन्दर अंगों वाले और देखने में प्रिय दिखाई देते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 26 (13.218.26)

हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्वं समाहिता ॥

hanta te kathayiṣyāmi śṛṇu tatvaṃ samāhitā

अच्छा, मैं तुम्हें बताऊँगा; एकाग्र मन से इस तत्त्व को सुनो।

श्लोक 27 (13.218.27)

ये पुरा मनुजा देवि लज्जायुक्ताः प्रियंवदाः । शक्ताः सुमधुरा नित्यं भूत्वा चैव स्वभावतः ॥

ye purā manujā devi lajjāyuktāḥ priyaṃvadāḥ | śaktāḥ sumadhurā nityaṃ bhūtvā caiva svabhāvataḥ

हे देवि, जो मनुष्य पूर्वकाल में लज्जाशील और मधुरभाषी थे, समर्थ थे, और स्वभाव से सदा अत्यन्त कोमल थे,

श्लोक 28 (13.218.28)

अमांसभोजिनश्चैव सदा प्राणिदयायुताः । प्रतिकर्मप्रदा वाऽपि वस्त्रदा धर्मकारणात् । भूमिशुद्धिकरा वाऽपि कारणादग्निपूजकाः ॥

amāṃsabhojinaścaiva sadā prāṇidayāyutāḥ | pratikarmapradā vā'pi vastradā dharmakāraṇāt | bhūmiśuddhikarā vā'pi kāraṇādagnipūjakāḥ

जो मांस नहीं खाते थे और सदा प्राणियों पर दया रखते थे, जो दूसरों की सेवा-शुश्रूषा करते थे या धर्म के लिए वस्त्र देते थे, जो भूमि को शुद्ध करते थे, या किसी उचित कारण से अग्नि की पूजा करते थे,

श्लोक 29 (13.218.29)

एवं युक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि ते नराः । रूपेण स्पृहणीयास्तु भवन्त्येव न संशयः ॥

evaṃ yuktasamācārāḥ punarjanmani te narāḥ | rūpeṇa spṛhaṇīyāstu bhavantyeva na saṃśayaḥ

इस प्रकार के आचरण वाले वे मनुष्य अगले जन्म में रूप से सबके लोभ के योग्य होते ही हैं; इसमें सन्देह नहीं।

उमोवाच

श्लोक 30 (13.218.30)

विरूपाश्च प्रदृश्यन्ते मानुषेष्वेव केचन । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

virūpāśca pradṛśyante mānuṣeṣveva kecana | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

मनुष्यों में ही कुछ लोग कुरूप दिखाई देते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 31 (13.218.31)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu kalyāṇi kāraṇam

वह मैं तुम्हें बताऊँगा; हे कल्याणी, उसका कारण सुनो।

श्लोक 32 (13.218.32)

रूपयोगात्पुरा मर्त्या दर्पाहंकारसंयुताः । विरूपहासकाश्चैव स्तुतिनिन्दादिभिर्भृशम् ॥

rūpayogātpurā martyā darpāhaṃkārasaṃyutāḥ | virūpahāsakāścaiva stutinindādibhirbhṛśam

पूर्वकाल में जो मनुष्य अपने रूप के कारण घमण्ड और अहंकार से भरे थे, और स्तुति तथा निन्दा आदि से कुरूपों की खूब हँसी उड़ाते थे,

श्लोक 33 (13.218.33)

परोपतापनाश्चैव मांसादाश्च तथैव च । अभ्यसूयापराश्चैव अशुद्धाश्च तथा नराः ॥

paropatāpanāścaiva māṃsādāśca tathaiva ca | abhyasūyāparāścaiva aśuddhāśca tathā narāḥ

जो दूसरों को सताते थे, मांस खाते थे, ईर्ष्यालु और अशुद्ध थे,

श्लोक 34 (13.218.34)

एवं युक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः । कथंचित्प्राप्य मानुष्यं तत्र ते रूपवर्जिताः । विरूपाः सम्भवन्त्येव नास्ति तत्र विचारणा ॥

evaṃ yuktasamācārā yamaloke sudaṇḍitāḥ | kathaṃcitprāpya mānuṣyaṃ tatra te rūpavarjitāḥ | virūpāḥ sambhavantyeva nāsti tatra vicāraṇā

इस प्रकार के आचरण वाले वे लोग यमलोक में कठोर दण्ड पाकर किसी तरह मनुष्य-जन्म पाते हैं, और वहाँ रूप से रहित, कुरूप ही उत्पन्न होते हैं; इसमें कोई विचार नहीं है।

उमोवाच

श्लोक 35 (13.218.35)

भगवन्देवदेवेश केचित्सौभाग्यसंयुताः । रूपभोग्यविहीनाश्च दृश्यन्ते प्रमदाप्रियाः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

bhagavandevadeveśa kecitsaubhāgyasaṃyutāḥ | rūpabhogyavihīnāśca dṛśyante pramadāpriyāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

हे भगवन्, देवताओं के स्वामी! कुछ लोग सौभाग्य से युक्त और स्त्रियों के प्रिय होते हैं, फिर भी रूप और भोग-सामग्री से रहित दिखाई देते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 36 (13.218.36)

ये पुरा मनुजा देवि सौम्यशीलाः प्रियंवदाः । स्वदारैरेव संतुष्टा दारेषु समवृत्तयः ॥

ye purā manujā devi saumyaśīlāḥ priyaṃvadāḥ | svadāraireva saṃtuṣṭā dāreṣu samavṛttayaḥ

हे देवि, जो मनुष्य पूर्वकाल में सौम्य स्वभाव के और मधुरभाषी थे, अपनी ही पत्नियों से सन्तुष्ट रहते थे और उनके प्रति समान भाव रखते थे,

श्लोक 37 (13.218.37)

दाक्षिण्येनैव वर्तन्ते प्रमदास्वप्रियास्वपि । न तु प्रत्यादिशन्त्येव स्त्रीदोषान्गुणसंश्रितान् ॥

dākṣiṇyenaiva vartante pramadāsvapriyāsvapi | na tu pratyādiśantyeva strīdoṣānguṇasaṃśritān

जो अप्रिय स्त्रियों के प्रति भी शिष्टता से व्यवहार करते थे, और उनके गुणों के साथ लगे दोषों के कारण उन्हें ठुकराते नहीं थे,

श्लोक 38 (13.218.38)

अन्नपानीयदाः काले नृणां स्वादुप्रदाश्च ये । स्वदारवर्तिनश्चैव धृतिमन्तो निरत्ययाः ॥

annapānīyadāḥ kāle nṛṇāṃ svādupradāśca ye | svadāravartinaścaiva dhṛtimanto niratyayāḥ

जो समय पर लोगों को अन्न और जल देते थे और मीठी वस्तुएँ देते थे, जो अपनी ही पत्नियों में रमे रहते थे, धैर्यवान और निर्दोष थे,

श्लोक 39 (13.218.39)

एवं युक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । मानुषास्ते भवन्त्येव सततं सुभगा भृशम् । अर्थादृतेऽपि ते देवि भवन्ति प्रमदाप्रियाः ॥

evaṃ yuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane | mānuṣāste bhavantyeva satataṃ subhagā bhṛśam | arthādṛte'pi te devi bhavanti pramadāpriyāḥ

इस प्रकार के आचरण वाले वे मनुष्य अगले शुभ जन्म में सदा अत्यन्त सौभाग्यशाली होते हैं; हे देवि, धन के बिना भी वे स्त्रियों के प्रिय होते हैं।

उमोवाच

श्लोक 40 (13.218.40)

दुर्भगाः सम्प्रदृश्यन्ते आढ्या भोगयुता अपि । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

durbhagāḥ sampradṛśyante āḍhyā bhogayutā api | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

कुछ लोग धनी और भोगों से युक्त होने पर भी अभागे और अप्रिय दिखाई देते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 41 (13.218.41)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं समाहिता ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu sarvaṃ samāhitā

वह मैं तुम्हें बताऊँगा; एकाग्र मन से सब कुछ सुनो।

श्लोक 42 (13.218.42)

ये पुरा मनुजा देवि स्वदारेष्वनपेक्षया । यथेष्टवृत्तयश्चैव निर्लज्जा वीतसम्भ्रमाः ॥

ye purā manujā devi svadāreṣvanapekṣayā | yatheṣṭavṛttayaścaiva nirlajjā vītasambhramāḥ

हे देवि, जो मनुष्य पूर्वकाल में अपनी पत्नियों की उपेक्षा करते थे, मनमाना जीवन बिताते थे, निर्लज्ज और बेधड़क थे,

श्लोक 43 (13.218.43)

परेषां विप्रियकरा वाङ्मनःकायकर्मभिः । निराश्रया निरानन्दाः स्त्रीणां हृदयकोपनाः ॥

pareṣāṃ vipriyakarā vāṅmanaḥkāyakarmabhiḥ | nirāśrayā nirānandāḥ strīṇāṃ hṛdayakopanāḥ

जो वाणी, मन, शरीर और कर्म से दूसरों का अप्रिय करते थे, जो न आश्रय देते थे न आनन्द, और जो स्त्रियों के हृदय को क्रोधित करते थे,

श्लोक 44 (13.218.44)

एवं युक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि ते नराः । दुर्भगास्तु भवन्त्येव स्त्रीणां हृदयविप्रियाः ॥

evaṃ yuktasamācārāḥ punarjanmani te narāḥ | durbhagāstu bhavantyeva strīṇāṃ hṛdayavipriyāḥ

इस प्रकार के आचरण वाले वे मनुष्य अगले जन्म में अभागे होते हैं और स्त्रियों के हृदय में अप्रिय रहते हैं,

श्लोक 45 (13.218.45)

नास्ति तेषां रतिसुखं स्वदारेष्वपि किञ्चन ॥

nāsti teṣāṃ ratisukhaṃ svadāreṣvapi kiñcana

और अपनी पत्नियों के साथ भी उन्हें रति का कोई सुख नहीं मिलता।

अध्याय 217अध्याय-सूचीअध्याय 219