अनुशासन पर्व · अध्याय 219
विद्या, दान और उनके फल
उमा भाग्य के भेदों के विषय में पूछती रहती हैं, और महेश्वर पूर्वकृत कर्मों के आधार पर उत्तर देते हैं। जो विद्वान किसी की सहायता नहीं करते वे निर्धन जन्मते हैं, क्योंकि जो बोया नहीं गया वह उगता नहीं; मूर्ख इसलिए समृद्ध होते हैं कि उन्होंने करुणा से दान दिया था; जिन्होंने गुरुओं की सेवा की और विधि से विद्या दी वे मेधावी और स्पष्टवक्ता होते हैं, और विद्या का अभिमान करने वाले मन्दबुद्धि। फिर वे बताते हैं कि उदार और संयमी जीवन का फल सर्वमंगल-सम्पन्न स्थिति है, और आसुरी, नास्तिक तथा निर्दय जीवन का फल दुःख-भरा जीवन।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.219.1)
भगवन्देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन । ज्ञानविज्ञानसम्पन्ना बुद्धिमन्तो विचक्षणाः ॥
bhagavandevadeveśa mānuṣeṣveva kecana | jñānavijñānasampannā buddhimanto vicakṣaṇāḥ
हे भगवन्, देवताओं के स्वामी! मनुष्यों में ही कुछ लोग ज्ञान और विज्ञान से सम्पन्न, बुद्धिमान और विवेकी होते हैं,
श्लोक 2 (13.219.2)
दुर्गतास्तु प्रदृश्यन्ते यतमाना यथाविधि । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
durgatāstu pradṛśyante yatamānā yathāvidhi | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
फिर भी विधिपूर्वक प्रयत्न करते हुए दुर्दशा में दिखाई देते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 3 (13.219.3)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥
tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu kalyāṇi kāraṇam
वह मैं तुम्हें बताऊँगा; हे कल्याणी, उसका कारण सुनो।
श्लोक 4 (13.219.4)
ये पुरा मनुजा देवि श्रुतवन्तोपि केवलम् । निराश्रया निरन्नाद्या भृशमात्मपरायणाः ॥
ye purā manujā devi śrutavantopi kevalam | nirāśrayā nirannādyā bhṛśamātmaparāyaṇāḥ
हे देवि, जो मनुष्य पूर्वकाल में शास्त्र सुने हुए तो थे, परन्तु दूसरों को न आश्रय देते थे न अन्न, और केवल अपने ही में लगे रहते थे,
श्लोक 5 (13.219.5)
ते पुनर्जन्मनि शुभे ज्ञानबुद्धियुता अपि । निष्किञ्चना भवन्त्येव अनुप्तं हि न रोहति ॥
te punarjanmani śubhe jñānabuddhiyutā api | niṣkiñcanā bhavantyeva anuptaṃ hi na rohati
अगले शुभ जन्म में ज्ञान और बुद्धि से युक्त होकर भी निर्धन ही हो जाते हैं; क्योंकि जो बोया नहीं गया वह उगता नहीं।
उमोवाच
श्लोक 6 (13.219.6)
मूर्खा लोके प्रदृश्यन्ते वृथा मूढा विचेतसः । ज्ञानविज्ञानरहिताः समृद्धाश्च समन्ततः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
mūrkhā loke pradṛśyante vṛthā mūḍhā vicetasaḥ | jñānavijñānarahitāḥ samṛddhāśca samantataḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
लोक में ऐसे मूर्ख दिखाई देते हैं जो व्यर्थ ही मूढ़ और बुद्धिहीन हैं, ज्ञान-विज्ञान से रहित हैं, फिर भी चारों ओर से समृद्ध हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 7 (13.219.7)
ये पुरा मनुजा देवि बालिशा अपि सर्वतः । समाचरन्ति दानानि दीनानुग्रहकारणात् ॥
ye purā manujā devi bāliśā api sarvataḥ | samācaranti dānāni dīnānugrahakāraṇāt
हे देवि, जो मनुष्य पूर्वकाल में हर तरह से भोले होते हुए भी दीनों पर दया करके दान करते थे,
श्लोक 8 (13.219.8)
अबुद्धिपूर्वं वा दानं ददत्येव यतस्ततः । ते पुनर्जन्मनि शुभे प्राप्नुवन्त्येव तत्तथा ॥
abuddhipūrvaṃ vā dānaṃ dadatyeva yatastataḥ | te punarjanmani śubhe prāpnuvantyeva tattathā
या बिना सोचे-विचारे जहाँ-तहाँ दान दे देते थे, वे अगले शुभ जन्म में वैसा ही फल पाते हैं।
श्लोक 9 (13.219.9)
पण्डितोऽपण्डितो वाऽपि भुङ्क्ते दानफलं नरः । बुद्ध्याऽनपेक्षितं दानं सर्वथा तत्फलत्युत ॥
paṇḍito'paṇḍito vā'pi bhuṅkte dānaphalaṃ naraḥ | buddhyā'napekṣitaṃ dānaṃ sarvathā tatphalatyuta
विद्वान हो या अविद्वान, मनुष्य दान का फल भोगता है। बुद्धि से बिना तौला हुआ दान भी सब प्रकार से फलता ही है।
उमोवाच
श्लोक 10 (13.219.10)
भगवन्देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन । मेधाविनः श्रुतधरा भवन्ति विशदाक्षराः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavandevadeveśa mānuṣeṣveva kecana | medhāvinaḥ śrutadharā bhavanti viśadākṣarāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
हे भगवन्, देवताओं के स्वामी! मनुष्यों में ही कुछ लोग मेधावी होते हैं, सुने हुए को धारण करते हैं और स्पष्ट अक्षरों में बोलते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 11 (13.219.11)
ये पुरा मनुजा देवि गुरुशुश्रूषका भृशम् । ज्ञानार्थं ते तु सङ्गृह्य तीर्थतो विधिपूर्वकम् ॥
ye purā manujā devi guruśuśrūṣakā bhṛśam | jñānārthaṃ te tu saṅgṛhya tīrthato vidhipūrvakam
हे देवि, जो मनुष्य पूर्वकाल में गुरुओं की बहुत सेवा करते थे, और ज्ञान के लिए योग्य स्रोत से विधिपूर्वक उसे ग्रहण करते थे,
श्लोक 12 (13.219.12)
विधिनैव परांश्चैव ग्राहयन्ति च नान्यथा । अश्लाघमाना ज्ञानेन प्रशान्ता यतवाचकाः । विद्यास्थानानि ये लोके स्थापयन्ति च यत्नतः ॥
vidhinaiva parāṃścaiva grāhayanti ca nānyathā | aślāghamānā jñānena praśāntā yatavācakāḥ | vidyāsthānāni ye loke sthāpayanti ca yatnataḥ
और दूसरों को भी विधि से ही देते थे, अन्यथा नहीं; जो ज्ञान पर इतराते नहीं थे, शान्त और संयत वाणी वाले थे, और जो लोक में प्रयत्न करके विद्या के स्थान स्थापित करते थे,
श्लोक 13 (13.219.13)
तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने । मेधाविनः श्रुतधरा भवन्ति विशदाक्षराः ॥
tādṛśā maraṇaṃ prāptāḥ punarjanmani śobhane | medhāvinaḥ śrutadharā bhavanti viśadākṣarāḥ
ऐसे लोग मृत्यु पाकर अगले शुभ जन्म में मेधावी होते हैं, सुने हुए को धारण करते हैं और स्पष्ट बोलने वाले होते हैं।
उमोवाच
श्लोक 14 (13.219.14)
अपरे मानुषा देव यतन्तोपि यतस्ततः । बहिष्कृताः प्रदृश्यन्ते श्रुतविज्ञानबुद्धितः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
apare mānuṣā deva yatantopi yatastataḥ | bahiṣkṛtāḥ pradṛśyante śrutavijñānabuddhitaḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
हे देव, दूसरे मनुष्य जहाँ-तहाँ प्रयत्न करते हुए भी शास्त्र-ज्ञान, विज्ञान और बुद्धि से बाहर रखे हुए दिखाई देते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 15 (13.219.15)
ये पुरा मनुजा देवि ज्ञानदर्पसमन्विताः । श्लाघमानाश्च तत्प्राप्य ज्ञानाहङ्कारमोहिताः ॥
ye purā manujā devi jñānadarpasamanvitāḥ | ślāghamānāśca tatprāpya jñānāhaṅkāramohitāḥ
हे देवि, जो मनुष्य पूर्वकाल में ज्ञान के घमण्ड से भरे थे, ज्ञान पाकर डींग हाँकते थे और ज्ञान के अहंकार से मोहित थे,
श्लोक 16 (13.219.16)
वदन्ति ये परान्नित्यं ज्ञानाधिक्येन दर्पिताः । ज्ञानादसूयां कुर्वन्ति न सहन्ते च चापरान् ॥
vadanti ye parānnityaṃ jñānādhikyena darpitāḥ | jñānādasūyāṃ kurvanti na sahante ca cāparān
जो अधिक ज्ञान के कारण घमण्डी होकर सदा दूसरों को कटु वचन कहते थे, ज्ञान के कारण ईर्ष्या करते थे और दूसरों को सह नहीं पाते थे,
श्लोक 17 (13.219.17)
तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने । मानुष्यं सुचिरात्प्राप्य तत्र बोधविवर्जिताः । भवन्ति सततं देवि यतन्तो हीनमेधसः ॥
tādṛśā maraṇaṃ prāptāḥ punarjanmani śobhane | mānuṣyaṃ sucirātprāpya tatra bodhavivarjitāḥ | bhavanti satataṃ devi yatanto hīnamedhasaḥ
ऐसे लोग मृत्यु पाकर अगले शुभ जन्म में बहुत समय बाद मनुष्य-जन्म पाकर वहाँ समझ से रहित रहते हैं, और हे देवि, प्रयत्न करते हुए भी सदा मन्दबुद्धि ही रहते हैं।
उमोवाच
श्लोक 18 (13.219.18)
भगवन्मानुषाः केचित्सर्वकल्याणसंयुताः । पुत्रैर्दारैर्गुणयुतैर्दासीदासपरिच्छदैः ॥
bhagavanmānuṣāḥ kecitsarvakalyāṇasaṃyutāḥ | putrairdārairguṇayutairdāsīdāsaparicchadaiḥ
हे भगवन्, कुछ मनुष्य सब प्रकार के कल्याण से युक्त हैं: गुणवान पुत्रों और पत्नियों से, दास-दासियों और परिजनों से,
श्लोक 19 (13.219.19)
परमं बुद्धिसंयुक्ताः स्थानैश्वर्यपरिग्रहैः । व्याधिहीना निराबाधाश्च रूपारोग्यबलैर्युताः ॥
paramaṃ buddhisaṃyuktāḥ sthānaiśvaryaparigrahaiḥ | vyādhihīnā nirābādhāśca rūpārogyabalairyutāḥ
परम बुद्धि से युक्त, पद, ऐश्वर्य और सम्पत्ति से सम्पन्न, रोग-रहित और बाधा-रहित, तथा रूप, आरोग्य और बल से युक्त हैं,
श्लोक 20 (13.219.20)
धनधान्येन सम्पन्नाः प्रासादैर्यानवाहनैः । सर्वोपभोगसंयुक्ता नानाचित्रैर्मनोहरैः ॥
dhanadhānyena sampannāḥ prāsādairyānavāhanaiḥ | sarvopabhogasaṃyuktā nānācitrairmanoharaiḥ
धन-धान्य से सम्पन्न, महलों, रथों और वाहनों वाले, सब भोगों से युक्त, और नाना प्रकार की विचित्र एवं मनोहर वस्तुओं वाले हैं,
श्लोक 21 (13.219.21)
ज्ञातिभिः सह मोदन्ते अविघ्नं तु दिनेदिने । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
jñātibhiḥ saha modante avighnaṃ tu dinedine | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
और वे दिन-प्रतिदिन बिना किसी विघ्न के अपने सम्बन्धियों के साथ आनन्द करते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 22 (13.219.22)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं समाहिता ॥
tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu sarvaṃ samāhitā
वह मैं तुम्हें बताऊँगा; एकाग्र मन से सब कुछ सुनो।
श्लोक 23 (13.219.23)
ये पुरा मनुजा देवि आढ्या वा इतरेऽपि वा । श्रुतवृत्तसमायुक्ता दानकामाः श्रुतप्रियाः ॥
ye purā manujā devi āḍhyā vā itare'pi vā | śrutavṛttasamāyuktā dānakāmāḥ śrutapriyāḥ
हे देवि, जो मनुष्य पूर्वकाल में, चाहे धनी हों या न हों, शास्त्र-ज्ञान और सदाचार से युक्त थे, दान की इच्छा रखते थे और श्रवण-प्रिय थे,
श्लोक 24 (13.219.24)
परेङ्गितपरा नित्यं दातव्यमिति निश्चिताः । सत्यसन्धाः क्षमाशीला लोभमोहविवर्जिताः ॥
pareṅgitaparā nityaṃ dātavyamiti niścitāḥ | satyasandhāḥ kṣamāśīlā lobhamohavivarjitāḥ
जो दूसरों के संकेतों पर सदा ध्यान रखते थे और यह निश्चय किए हुए थे कि देना चाहिए, जो सत्य पर टिके रहने वाले, क्षमाशील स्वभाव के और लोभ तथा मोह से रहित थे,
श्लोक 25 (13.219.25)
दातारः पात्रतो दानं व्रतैर्नियमसंयुताः । स्वदुःखमिव संस्मृत्य परदुःखविवर्जिताः । सौम्यशीलाः शुभाचारा देवब्राह्मणपूजकाः ॥
dātāraḥ pātrato dānaṃ vratairniyamasaṃyutāḥ | svaduḥkhamiva saṃsmṛtya paraduḥkhavivarjitāḥ | saumyaśīlāḥ śubhācārā devabrāhmaṇapūjakāḥ
जो सत्पात्र को दान देने वाले थे, व्रतों और नियमों से युक्त थे, और अपने दुःख को याद करके दूसरों को दुःख से बचाते थे; सौम्य स्वभाव के, सदाचारी, देवताओं और ब्राह्मणों के पूजक थे,
श्लोक 26 (13.219.26)
एवंशीलसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । दिवि वा भुवि वा देवि जायन्ते कर्मभोगिनः ॥
evaṃśīlasamācārāḥ punarjanmani śobhane | divi vā bhuvi vā devi jāyante karmabhoginaḥ
इस प्रकार के शील और आचरण वाले वे लोग अगले शुभ जन्म में, हे देवि, अपने कर्मों का फल भोगते हुए स्वर्ग में या पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।
श्लोक 27 (13.219.27)
मानुषेष्वपि ये जातास्तादृशाः सम्भवन्ति ते । यादृशास्तु तथा प्रोक्ताः सर्वे कल्याणसंयुताः ॥
mānuṣeṣvapi ye jātāstādṛśāḥ sambhavanti te | yādṛśāstu tathā proktāḥ sarve kalyāṇasaṃyutāḥ
जो मनुष्यों में जन्म लेते हैं, वे भी वैसे ही होते हैं जैसे मैंने बताए, सब प्रकार के कल्याण से युक्त।
श्लोक 28 (13.219.28)
रूपं द्रव्यं बलं चायुर्भोगैश्वर्यं कुलं श्रुतम् । इत्येतत्सर्वसाद्गुण्यं दानाद्भवति नान्यथा । तपोदानमयं सर्वमिति विद्धि शुभानने ॥
rūpaṃ dravyaṃ balaṃ cāyurbhogaiśvaryaṃ kulaṃ śrutam | ityetatsarvasādguṇyaṃ dānādbhavati nānyathā | tapodānamayaṃ sarvamiti viddhi śubhānane
रूप, धन, बल, आयु, भोग और ऐश्वर्य, कुल और शास्त्र-ज्ञान: ये सब उत्तम गुण दान से ही प्राप्त होते हैं, अन्यथा नहीं। हे शुभानने, जान लो कि यह सब तप और दान से ही बना है।
उमोवाच
श्लोक 29 (13.219.29)
अथ केचित्प्रदृश्यन्ते मानुषेष्वेव मानुषाः । दुर्गताः क्लेशभूयिष्ठा दानभोगविवर्जिताः ॥
atha kecitpradṛśyante mānuṣeṣveva mānuṣāḥ | durgatāḥ kleśabhūyiṣṭhā dānabhogavivarjitāḥ
अब मनुष्यों में ही कुछ मनुष्य दुर्दशा में, अत्यन्त क्लेश से भरे और दान तथा भोग से वंचित दिखाई देते हैं,
श्लोक 30 (13.219.30)
भयैस्त्रिभिः समाजुष्टाः व्याधिक्षुद्भयसंयुताः । दुष्कलत्राभिभूताश्च सततं विघ्नदर्शकाः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhayaistribhiḥ samājuṣṭāḥ vyādhikṣudbhayasaṃyutāḥ | duṣkalatrābhibhūtāśca satataṃ vighnadarśakāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
जो तीन भयों से घिरे हैं, रोग, भूख और भय से जुड़े हैं, दुष्ट पत्नी से दबे हुए हैं और सदा विघ्न ही देखते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? आप मुझे बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 31 (13.219.31)
ये पुरा मनुजा देवि आसुरं भावमाश्रिताः । क्रोधलोभसमायुक्ता निरन्नाद्याश्च निष्क्रियाः ॥
ye purā manujā devi āsuraṃ bhāvamāśritāḥ | krodhalobhasamāyuktā nirannādyāśca niṣkriyāḥ
हे देवि, जो मनुष्य पूर्वकाल में आसुरी भाव का आश्रय लेते थे, क्रोध और लोभ से भरे थे, किसी को अन्न नहीं देते थे और कोई सत्कर्म नहीं करते थे,
श्लोक 32 (13.219.32)
नास्तिकाश्चैव धूर्ताश्च मूर्खाश्चात्मपरायणाः । परोपतापिनो देवि प्रायशः प्राणिनिर्दयाः ॥
nāstikāścaiva dhūrtāśca mūrkhāścātmaparāyaṇāḥ | paropatāpino devi prāyaśaḥ prāṇinirdayāḥ
जो नास्तिक, धूर्त, मूर्ख और केवल अपने ही में लगे रहने वाले थे, जो दूसरों को सताते थे, हे देवि, और प्रायः प्राणियों के प्रति निर्दय थे,
श्लोक 33 (13.219.33)
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । कथंचित्प्राप्य मानुष्यं तत्र ते दुःखपीडिताः ॥
evaṃyuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane | kathaṃcitprāpya mānuṣyaṃ tatra te duḥkhapīḍitāḥ
इस प्रकार के आचरण वाले वे लोग अगले शुभ जन्म में किसी तरह मनुष्य-जन्म पाकर वहाँ दुःख से पीड़ित रहते हैं,
श्लोक 34 (13.219.34)
सर्वतः सम्भवन्त्येव पूर्वमात्मप्रमादतः । यथा ते पूर्वकथितास्तथा ते सम्भवन्त्युत ॥
sarvataḥ sambhavantyeva pūrvamātmapramādataḥ | yathā te pūrvakathitāstathā te sambhavantyuta
और अपने ही पूर्व प्रमाद के कारण वे हर प्रकार से वैसे ही उत्पन्न होते हैं; जैसा पहले बताया गया, वैसे ही वे होते हैं।
श्लोक 35 (13.219.35)
शुभाशुभं कृतं कर्म सुखदुःखफलोदयम् । इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
śubhāśubhaṃ kṛtaṃ karma sukhaduḥkhaphalodayam | iti te kathitaṃ devi bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi
किया हुआ शुभ या अशुभ कर्म सुख या दुःख रूपी फल को जन्म देता है। हे देवि, तुमसे यह कह दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?