अनुशासन पर्व · अध्याय 220
अन्धता, रोग और अंगहीनता के कारण
उमा शिव से पूछती हैं कि कुछ लोग जन्म से अन्धे क्यों होते हैं और कुछ लोग मुख, पेट, मूत्रेन्द्रिय, कण्ठ, त्वचा, अंगों, पैरों तथा वात-पित्त आदि के रोगों से क्यों पीड़ित रहते हैं। हर कष्ट के लिए शिव पूर्वजन्म के उन दुष्कर्मों को बताते हैं जिनसे वह आता है, जैसे पराई स्त्रियों पर बुरी दृष्टि, कटु वाणी, विष या अभक्ष्य भोजन देना, दूसरों को अंगहीन करना और निर्दयता। अन्त में वे कहते हैं कि अपने किए कर्म के फल से कोई बच नहीं सकता।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.220.1)
भगवन्देवदेवेश मम प्रीतिविवर्धन । जात्यन्धाश्चैव दृश्यन्ते जाता वा नष्टचक्षुषः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavandevadeveśa mama prītivivardhana | jātyandhāścaiva dṛśyante jātā vā naṣṭacakṣuṣaḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
“भगवन्, देवों के देव, मेरी प्रीति बढ़ानेवाले, कुछ लोग जन्म से अन्धे दिखाई देते हैं, और कुछ जन्म लेने के बाद अपनी आँखें खो बैठते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 2 (13.220.2)
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥
hanta te kathayiṣyāmi śṛṇu kalyāṇi kāraṇam
“अच्छा कल्याणी, सुनो; मैं तुम्हें इसका कारण बताता हूँ।”
श्लोक 3 (13.220.3)
ये पुरा कामकारेण परवेश्मसु लोलुपाः । परस्त्रियोऽभिवीक्षन्ते दुष्टेनैव स्वचक्षुषाः ॥
ye purā kāmakāreṇa paraveśmasu lolupāḥ | parastriyo'bhivīkṣante duṣṭenaiva svacakṣuṣāḥ
“जो लोग पूर्वजन्म में अपनी इच्छा के वश होकर पराए घरों में लोलुप रहते थे और अपनी दूषित आँखों से पराई स्त्रियों को ताकते थे,”
श्लोक 4 (13.220.4)
अन्धीकुर्वन्ति यन्मर्त्यान्क्रोधलोभसमन्विताः । लक्षणज्ञाश्च रूपेषु अयथावत्प्रदर्शकाः ॥
andhīkurvanti yanmartyānkrodhalobhasamanvitāḥ | lakṣaṇajñāśca rūpeṣu ayathāvatpradarśakāḥ
“और जो क्रोध और लोभ से भरकर दूसरों को अन्धा कर देते थे, तथा लक्षणों और रूपों के जानकार होकर भी उन्हें ग़लत बताते थे,”
श्लोक 5 (13.220.5)
एवं युक्तसमाचाराः कालधर्मवशास्तु ते । दण्डिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये ॥
evaṃ yuktasamācārāḥ kāladharmavaśāstu te | daṇḍitā yamadaṇḍena nirayasthāściraṃ priye
“इस प्रकार का आचरण करनेवाले वे मृत्यु को प्राप्त होकर यम के दण्ड से दण्डित होते हैं और हे प्रिये, लम्बे समय तक नरक में रहते हैं।”
श्लोक 6 (13.220.6)
यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथापि वा । स्वभावतो वा जाता वा अन्धा एव भवन्ति ते । अक्षिरोगयुता वाऽपि नास्ति तत्र विचारणा ॥
yadi cenmānuṣaṃ janma labheraṃste tathāpi vā | svabhāvato vā jātā vā andhā eva bhavanti te | akṣirogayutā vā'pi nāsti tatra vicāraṇā
“यदि वे मनुष्य जन्म पाएँ, तो भी वे जन्म से या स्वभाव से अन्धे ही होते हैं, अथवा आँखों के रोगों से पीड़ित रहते हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं।”
उमोवाच
श्लोक 7 (13.220.7)
मुखरोगयुताः केचिद्दृश्यन्ते सततं नराः । दन्तकण्ठकपोलस्थैर्व्याधिभिर्बहुपीडिताः ॥
mukharogayutāḥ keciddṛśyante satataṃ narāḥ | dantakaṇṭhakapolasthairvyādhibhirbahupīḍitāḥ
“कुछ मनुष्य निरन्तर मुख के रोगों से ग्रस्त दिखाई देते हैं; दाँतों, कण्ठ और गालों में बैठे रोगों से वे बहुत पीड़ित रहते हैं।”
श्लोक 8 (13.220.8)
आदिप्रभृति वै मर्त्या जाता वाऽप्यथ कारणात् । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
ādiprabhṛti vai martyā jātā vā'pyatha kāraṇāt | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
“चाहे मनुष्य आरम्भ से ही ऐसे उत्पन्न हों या बाद में किसी कारण से ऐसे हो जाएँ, यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 9 (13.220.9)
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता ॥
hanta te kathayiṣyāmi śṛṇu devi samāhitā
“अच्छा देवी, मैं तुम्हें बताता हूँ; ध्यान से सुनो।”
श्लोक 10 (13.220.10)
कुवक्तारस्तु ये देवि जिह्वया कटुकं भृशम् । असत्यं परुषं घोरं गुरून्प्रति परान्प्रति ॥
kuvaktārastu ye devi jihvayā kaṭukaṃ bhṛśam | asatyaṃ paruṣaṃ ghoraṃ gurūnprati parānprati
“हे देवी, जो लोग कटु बोलनेवाले हैं, जो अपनी जीभ से गुरुजनों और दूसरों के प्रति अत्यन्त कड़वी, झूठी, कठोर और भयानक बातें कहते हैं,”
श्लोक 11 (13.220.11)
जिह्वाबाधां तदाऽन्येषां कुर्वते कोपकारणात् । प्रायशोऽनृतभूयिष्ठा नराः कार्यवशेन वा । तेषां जिह्वाप्रदेशस्था व्याधयः सम्भवन्ति ते ॥
jihvābādhāṃ tadā'nyeṣāṃ kurvate kopakāraṇāt | prāyaśo'nṛtabhūyiṣṭhā narāḥ kāryavaśena vā | teṣāṃ jihvāpradeśasthā vyādhayaḥ sambhavanti te
“और जो क्रोधवश अपनी जीभ से दूसरों को सताते हैं, जो प्रायः झूठ से भरे रहते हैं या स्वार्थवश झूठ बोलते हैं, उनके जीभ के स्थान में रोग उत्पन्न होते हैं।”
श्लोक 12 (13.220.12)
कुश्रोतारस्तु ये चार्यं परेषां कर्णनाशकाः । कर्णरोगान्बहुविधाँल्लभन्ते ते पुनर्भवे ॥
kuśrotārastu ye cāryaṃ pareṣāṃ karṇanāśakāḥ | karṇarogānbahuvidhām̐llabhante te punarbhave
“और जो श्रेष्ठ बात को सुनने में बुरे श्रोता हैं तथा दूसरों के कान नष्ट करते हैं, वे अगले जन्म में अनेक प्रकार के कान के रोग पाते हैं।”
श्लोक 13 (13.220.13)
दन्तरोगशिरोरोगकर्णरोगास्तथैव च । अन्ये दुःखाश्रिता दोषाः सर्वे चात्मकृतं फलम् ॥
dantarogaśirorogakarṇarogāstathaiva ca | anye duḥkhāśritā doṣāḥ sarve cātmakṛtaṃ phalam
“दाँतों, सिर और कानों के रोग तथा दुःख देनेवाले अन्य दोष, ये सब अपने ही किए हुए कर्म का फल हैं।”
उमोवाच
श्लोक 14 (13.220.14)
पीड्यन्ते सततं देव मानुषेष्वेव केचन । कुक्षिपक्षाश्रितैर्दोषैर्व्याधिभिश्चोदराश्रितैः ॥
pīḍyante satataṃ deva mānuṣeṣveva kecana | kukṣipakṣāśritairdoṣairvyādhibhiścodarāśritaiḥ
“हे देव, मनुष्यों में ही कुछ लोग निरन्तर पेट और पसलियों में बैठे दोषों तथा उदर के रोगों से पीड़ित रहते हैं।”
श्लोक 15 (13.220.15)
तीक्ष्णशूलैश्च पीड्यन्ते नरा दुःखपरिप्लुताः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
tīkṣṇaśūlaiśca pīḍyante narā duḥkhapariplutāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
“तीखे शूलों से मनुष्य पीड़ित होते हैं और दुःख में डूबे रहते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 16 (13.220.16)
ये पुरा मनुजा देवि कामक्रोधवशा भृशम् । आत्मार्थमेव चाहारं भुञ्जन्ते निरपेक्षकाः ॥
ye purā manujā devi kāmakrodhavaśā bhṛśam | ātmārthameva cāhāraṃ bhuñjante nirapekṣakāḥ
“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में काम और क्रोध के वश होकर दूसरों की परवाह किए बिना केवल अपने लिए भोजन करते थे,”
श्लोक 17 (13.220.17)
अभक्ष्याहारदानैश्च विश्वस्तानां विषप्रदाः । अभक्ष्यभक्षदाश्चैव शौचमङ्गलवर्जिताः ॥
abhakṣyāhāradānaiśca viśvastānāṃ viṣapradāḥ | abhakṣyabhakṣadāścaiva śaucamaṅgalavarjitāḥ
“जो अभक्ष्य भोजन देते थे, जो विश्वास करनेवालों को विष देते थे, जो दूसरों को न खाने योग्य वस्तुएँ खिलाते थे, और जो शुद्धि तथा मंगलमय आचरण से रहित थे,”
श्लोक 18 (13.220.18)
मांसयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । कथञ्चित्प्राप्य मानुष्यं तत्र ते व्याधिपीडिताः ॥
māṃsayuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane | kathañcitprāpya mānuṣyaṃ tatra te vyādhipīḍitāḥ
“और जिनका आचरण मांस खाने का था, हे शोभने, अगले जन्म में यदि वे किसी प्रकार मनुष्य जन्म पाते हैं तो वहाँ रोगों से पीड़ित होते हैं।”
श्लोक 19 (13.220.19)
तैस्तैर्बहुविधाकारैर्व्याधिभिर्दुःखसंश्रिताः । भवन्त्येवं तथा देवि यथा चैवं तथा कृतम् ॥
taistairbahuvidhākārairvyādhibhirduḥkhasaṃśritāḥ | bhavantyevaṃ tathā devi yathā caivaṃ tathā kṛtam
“अनेक प्रकार के रोगों से दुःख में पड़े हुए वे ऐसे ही होते हैं, हे देवी, जैसा उन्होंने कर्म किया था।”
उमोवाच
श्लोक 20 (13.220.20)
दृश्यन्ते सततं देव व्याधिभिर्मेहनाश्रितैः । पीड्यमानास्तथा मर्त्या अश्मरीशर्करादिभिः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
dṛśyante satataṃ deva vyādhibhirmehanāśritaiḥ | pīḍyamānāstathā martyā aśmarīśarkarādibhiḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
“हे देव, मनुष्य निरन्तर मूत्रेन्द्रिय में बैठे रोगों से तथा पथरी, कंकड़ी आदि से पीड़ित दिखाई देते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 21 (13.220.21)
ये पुरा मनुजा देवि परदारप्रधर्षकाः । तिर्यग्योनिषु धूर्ता वै मैथुनार्थं चरन्ति च ॥
ye purā manujā devi paradārapradharṣakāḥ | tiryagyoniṣu dhūrtā vai maithunārthaṃ caranti ca
“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में पराई स्त्रियों से बलात्कार करते थे, वे धूर्त बनकर पशु-योनियों में मैथुन के लिए विचरते हैं।”
श्लोक 22 (13.220.22)
कामदोषेण ये धूर्ताः कन्यासु विधवासु च । बलात्कारेण गच्छन्ति रूपदर्पसमन्विताः ॥
kāmadoṣeṇa ye dhūrtāḥ kanyāsu vidhavāsu ca | balātkāreṇa gacchanti rūpadarpasamanvitāḥ
“और जो धूर्त कामदोष से रूप के घमण्ड में भरकर कन्याओं और विधवाओं के पास बलपूर्वक जाते हैं,”
श्लोक 23 (13.220.23)
तादृशा मरणं पुनर्जन्मनि शोभने । यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः । मेहनस्थैस्तथा घोरैः पीड्यन्ते व्याधिभिः प्रिये ॥
tādṛśā maraṇaṃ punarjanmani śobhane | yadi cenmānuṣaṃ janma labheraṃste tathāvidhāḥ | mehanasthaistathā ghoraiḥ pīḍyante vyādhibhiḥ priye
“ऐसे लोग मरते हैं, हे शोभने, और अगले जन्म में यदि वैसे लोग मनुष्य जन्म पाएँ तो हे प्रिये, मूत्रेन्द्रिय में बैठे भयंकर रोगों से पीड़ित होते हैं।”
उमोवाच
श्लोक 24 (13.220.24)
भगवन्मानुषाः केचिद्दृश्यन्ते शोषिणः कृशाः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavanmānuṣāḥ keciddṛśyante śoṣiṇaḥ kṛśāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
“भगवन्, कुछ मनुष्य सूखे और दुबले दिखाई देते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 25 (13.220.25)
ये पुरा मनुजा देवि मांसलुब्धाः सुलोलुपाः । आत्मार्थे स्वादुगृद्धाश्च परभोगोपतापिनः ॥
ye purā manujā devi māṃsalubdhāḥ sulolupāḥ | ātmārthe svādugṛddhāśca parabhogopatāpinaḥ
“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में मांस के लोभी और अत्यन्त लोलुप थे, अपने लिए स्वादिष्ट भोजन चाहते थे और दूसरों के भोग देखकर जलते थे,”
श्लोक 26 (13.220.26)
अभ्यसूयाश्चोपतापाः परभोगेषु ये नराः । एवं युक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ॥
abhyasūyāścopatāpāḥ parabhogeṣu ye narāḥ | evaṃ yuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane
“और जो मनुष्य दूसरों के भोगों के प्रति ईर्ष्या से जलते थे, इस प्रकार का आचरण करनेवाले वे अगले जन्म में, हे शोभने,”
श्लोक 27 (13.220.27)
शोषव्याधियुतास्तत्र नरा धमनिसंतताः । भवन्त्येव नरा देवि पापकर्मोपभोगिनः ॥
śoṣavyādhiyutāstatra narā dhamanisaṃtatāḥ | bhavantyeva narā devi pāpakarmopabhoginaḥ
“वहाँ क्षय के रोगों से ग्रस्त होते हैं और उनकी नसें उभरी रहती हैं। हे देवी, पाप-कर्म करनेवाले मनुष्य इसी प्रकार उसका फल भोगते हैं।”
उमोवाच
श्लोक 28 (13.220.28)
भगवन्मानुषाः केचित्क्लिश्यन्ते कण्ठरोगिणः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavanmānuṣāḥ kecitkliśyante kaṇṭharogiṇaḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
“भगवन्, कुछ मनुष्य कण्ठ के रोगों से कष्ट पाते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 29 (13.220.29)
ये पुरा मनुजा देवि परेषां रूपनाशनाः । आघातवधबन्धैश्च वृथा दण्डेन मोहिताः ॥
ye purā manujā devi pareṣāṃ rūpanāśanāḥ | āghātavadhabandhaiśca vṛthā daṇḍena mohitāḥ
“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में दूसरों का रूप बिगाड़ते थे, और मार-पीट, वध तथा बन्धन के द्वारा व्यर्थ दण्ड देने के मोह में पड़े रहते थे,”
श्लोक 30 (13.220.30)
इष्टनाशकरा ये तु अपथ्याहारदा नराः । चिकित्सका वा दुष्टाश्च द्वेषलोभसमन्विताः ॥
iṣṭanāśakarā ye tu apathyāhāradā narāḥ | cikitsakā vā duṣṭāśca dveṣalobhasamanvitāḥ
“जो दूसरों की प्रिय वस्तु नष्ट करते थे, जो अपथ्य भोजन देते थे, अथवा जो दुष्ट वैद्य बनकर द्वेष और लोभ से भरे थे,”
श्लोक 31 (13.220.31)
निर्दयाः प्राणिहिंसायां मलदाश्चित्तनाशनाः । एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ॥
nirdayāḥ prāṇihiṃsāyāṃ maladāścittanāśanāḥ | evaṃyuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane
“जो प्राणियों की हिंसा में निर्दय थे, मल देनेवाले थे, और चित्त को नष्ट करनेवाले थे, ऐसे आचरणवाले वे अगले जन्म में, हे शोभने,”
श्लोक 32 (13.220.32)
यदि वै मानुषं जन्म लभेरंस्तेषु दुःखिताः । अत्र ते क्लेशसंयुक्ताः कण्ठरोगशतैर्वृताः ॥
yadi vai mānuṣaṃ janma labheraṃsteṣu duḥkhitāḥ | atra te kleśasaṃyuktāḥ kaṇṭharogaśatairvṛtāḥ
“यदि मनुष्य जन्म पाते हैं तो उसमें दुःखी रहते हैं; यहाँ वे क्लेश से घिरे रहते हैं और सैकड़ों कण्ठ-रोगों से घिरे होते हैं।”
श्लोक 33 (13.220.33)
केचित्त्वग्दोषसंयुक्ता व्रणकुष्ठैश्च संयुताः । श्वित्रकुष्ठयुता वाऽपि बहुधा कृच्छ्रसंयुताः । भवन्त्येव नरा देवि यथा तेन कृतं फलम् ॥
kecittvagdoṣasaṃyuktā vraṇakuṣṭhaiśca saṃyutāḥ | śvitrakuṣṭhayutā vā'pi bahudhā kṛcchrasaṃyutāḥ | bhavantyeva narā devi yathā tena kṛtaṃ phalam
“कुछ लोग त्वचा के दोषों से युक्त होते हैं, घावों और कोढ़ से ग्रस्त होते हैं, या श्वित्र कुष्ठ से पीड़ित होकर अनेक प्रकार से कष्ट पाते हैं। हे देवी, मनुष्य वैसे ही होते हैं जैसा उनका किया हुआ फल होता है।”
उमोवाच
श्लोक 34 (13.220.34)
भगवन्मानुषाः केचिदङ्गहीनाश्च पङ्गवः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavanmānuṣāḥ kecidaṅgahīnāśca paṅgavaḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
“भगवन्, कुछ मनुष्य अंगहीन होते हैं और कुछ लँगड़े। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 35 (13.220.35)
ये पुरा मनुजा देवि लोभमोहसमावृताः । प्राणिनां प्राणहिंसार्थमङ्गविघ्नं प्रकुर्वते । शस्त्रेणोत्कृत्य वा देवि प्राणिनां चेष्टनाशकाः ॥
ye purā manujā devi lobhamohasamāvṛtāḥ | prāṇināṃ prāṇahiṃsārthamaṅgavighnaṃ prakurvate | śastreṇotkṛtya vā devi prāṇināṃ ceṣṭanāśakāḥ
“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में लोभ और मोह में डूबकर प्राणियों के प्राण लेने के लिए उनके अंग भंग करते थे, या शस्त्र से काटकर उनकी चलने-फिरने की शक्ति नष्ट कर देते थे,”
श्लोक 36 (13.220.36)
एवं युक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । तदङ्गहीना वै प्रेत्य भवन्त्येव न संशयः । स्वभावतो वा जाता वा पङ्गवश्च भवन्ति ते ॥
evaṃ yuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane | tadaṅgahīnā vai pretya bhavantyeva na saṃśayaḥ | svabhāvato vā jātā vā paṅgavaśca bhavanti te
“इस प्रकार का आचरण करनेवाले वे अगले जन्म में, हे शोभने, मरने के बाद उन्हीं अंगों से रहित हो जाते हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं। जन्म से हो या स्वभाव से, वे लँगड़े हो जाते हैं।”
उमोवाच
श्लोक 37 (13.220.37)
भगवन्मानुषाः केचिद्ग्रन्थिभिः पिलकैस्तथा । क्लिश्यमानाः प्रदृश्यन्ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavanmānuṣāḥ kecidgranthibhiḥ pilakaistathā | kliśyamānāḥ pradṛśyante tanme śaṃsitumarhasi
“भगवन्, कुछ मनुष्य गाँठों और फुन्सियों से कष्ट पाते दिखाई देते हैं। कृपया मुझे इसका कारण बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 38 (13.220.38)
ये पुरा मनुजा देवि ग्रन्थिभेदकरा नृणाम् । मुष्टिप्रहारपरुषा नृशंसाः पापकारिणः । पाटकास्तोटकाश्चैव शूलतुन्नास्तथैव च ॥
ye purā manujā devi granthibhedakarā nṛṇām | muṣṭiprahāraparuṣā nṛśaṃsāḥ pāpakāriṇaḥ | pāṭakāstoṭakāścaiva śūlatunnāstathaiva ca
“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में दूसरों की गाँठें फोड़ते थे, मुक्कों की मार से कठोर, क्रूर और पाप करनेवाले थे, जो फाड़नेवाले और छेदनेवाले थे, और जो शूलों से बींधे हुए थे,”
श्लोक 39 (13.220.39)
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । ग्रन्थिभिः पिलकैश्चैव क्लिश्यन्ते भृशदुःखिताः ॥
evaṃyuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane | granthibhiḥ pilakaiścaiva kliśyante bhṛśaduḥkhitāḥ
“इस प्रकार का आचरण करनेवाले वे अगले जन्म में, हे शोभने, गाँठों और फुन्सियों से पीड़ित होकर बहुत दुःखी रहते हैं।”
उमोवाच
श्लोक 40 (13.220.40)
भगवन्मानुषाः केचित्पादरोगसमन्विताः । दृश्यन्ते सततं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavanmānuṣāḥ kecitpādarogasamanvitāḥ | dṛśyante satataṃ deva tanme śaṃsitumarhasi
“भगवन्, कुछ मनुष्य निरन्तर पैरों के रोगों से ग्रस्त दिखाई देते हैं। कृपया मुझे इसका कारण बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 41 (13.220.41)
ये पुरा मनुजा देवि क्रोधलोभसमन्विताः । मनुजा देवतास्थानं स्वपादैर्भ्रंशयन्त्युत । जानुभिः पार्ष्णिभिश्चैव प्राणिहिंसां प्रकुर्वते ॥
ye purā manujā devi krodhalobhasamanvitāḥ | manujā devatāsthānaṃ svapādairbhraṃśayantyuta | jānubhiḥ pārṣṇibhiścaiva prāṇihiṃsāṃ prakurvate
“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में क्रोध और लोभ से भरकर अपने पैरों से देवताओं के स्थान गिरा देते थे और घुटनों तथा एड़ियों से प्राणियों की हिंसा करते थे,”
श्लोक 42 (13.220.42)
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । पादरोगैर्बहुविधैर्बाध्यन्ते विपदादिभिः ॥
evaṃyuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane | pādarogairbahuvidhairbādhyante vipadādibhiḥ
“इस प्रकार का आचरण करनेवाले वे अगले जन्म में, हे शोभने, पैरों के अनेक रोगों और विपत्तियों आदि से पीड़ित होते हैं।”
उमोवाच
श्लोक 43 (13.220.43)
भगवन्मानुषाः केचिद्दृश्यन्ते बहवो भुवि । वातजैः पित्तजै रोगैर्युगपत्सान्निपातकैः ॥
bhagavanmānuṣāḥ keciddṛśyante bahavo bhuvi | vātajaiḥ pittajai rogairyugapatsānnipātakaiḥ
“भगवन्, पृथ्वी पर बहुत से मनुष्य वात से और पित्त से उत्पन्न रोगों तथा एक साथ सब दोषों के मेल से बने रोगों से ग्रस्त दिखाई देते हैं,”
श्लोक 44 (13.220.44)
रोगैर्बहुविधैर्देव क्लिश्यमानाः सुदुःखिताः । असमस्तैः समस्तैश्च आढ्या वा दुर्गतास्तथा । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
rogairbahuvidhairdeva kliśyamānāḥ suduḥkhitāḥ | asamastaiḥ samastaiśca āḍhyā vā durgatāstathā | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi
“वे अनेक प्रकार के अकेले या मिले हुए रोगों से बहुत दुःखी होकर कष्ट पाते हैं; उनमें कोई धनी होते हैं और कोई दरिद्र। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 45 (13.220.45)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥
tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu kalyāṇi kāraṇam
“मैं तुम्हें वह बताता हूँ; हे कल्याणी, कारण सुनो।”
श्लोक 46 (13.220.46)
ये पुरा मनुजा देवि त्वासुरं भावमाश्रिताः । स्ववशाः कोपनपरा गुरुविद्वेषिणस्तथा ॥
ye purā manujā devi tvāsuraṃ bhāvamāśritāḥ | svavaśāḥ kopanaparā guruvidveṣiṇastathā
“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में आसुरी भाव का आश्रय लेते थे, स्वेच्छाचारी थे, क्रोध में लगे रहते थे और गुरुजनों से द्वेष करते थे,”
श्लोक 47 (13.220.47)
परेषां दुःखजनका मनोवाक्कायकर्मभिः । छिन्दन्भिन्दन्स्तुदन्नेव नित्यं प्राणिषु निर्दयाः ॥
pareṣāṃ duḥkhajanakā manovākkāyakarmabhiḥ | chindanbhindanstudanneva nityaṃ prāṇiṣu nirdayāḥ
“जो मन, वाणी, शरीर और कर्म से दूसरों को दुःख देते थे, और निर्दय होकर प्राणियों को सदा काटते, चीरते और बींधते रहते थे,”
श्लोक 48 (13.220.48)
एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । यदि वै मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः । तत्र ते बहुभिर्घोरैस्तप्यन्ते व्याधिभिः प्रिये ॥
evaṃyuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane | yadi vai mānuṣaṃ janma labheraṃste tathāvidhāḥ | tatra te bahubhirghoraistapyante vyādhibhiḥ priye
“इस प्रकार का आचरण करनेवाले वे अगले जन्म में, हे शोभने, यदि वैसे लोग मनुष्य जन्म पाएँ तो वहाँ अनेक भयंकर रोगों से तपते हैं, हे प्रिये।”
श्लोक 49 (13.220.49)
केचिद्वातादिसंयुक्ताः केचित्काससमन्विताः । ज्वरातिसारतृष्णाभिः पीड्यमानास्तथा परे ॥
kecidvātādisaṃyuktāḥ kecitkāsasamanvitāḥ | jvarātisāratṛṣṇābhiḥ pīḍyamānāstathā pare
“कुछ वात आदि के रोगों से युक्त होते हैं, कुछ खाँसी से ग्रस्त होते हैं, और दूसरे ज्वर, अतिसार और प्यास से पीड़ित होते हैं;”
श्लोक 50 (13.220.50)
पादगुल्मैश्च बहुभिः श्लेष्मदोषसमन्विताः । पादरोगैश्च विविधैर्व्रणकुष्ठभगंदरैः । आढ्या वा दुर्गता वाऽपि दृश्यन्ते व्याधिपीडिताः ॥
pādagulmaiśca bahubhiḥ śleṣmadoṣasamanvitāḥ | pādarogaiśca vividhairvraṇakuṣṭhabhagaṃdaraiḥ | āḍhyā vā durgatā vā'pi dṛśyante vyādhipīḍitāḥ
“पैरों की अनेक गाँठों और कफ के दोषों से युक्त, पैरों के विविध रोगों, घावों, कोढ़ और भगन्दर से ग्रस्त, चाहे धनी हों या दरिद्र, वे रोग से पीड़ित दिखाई देते हैं।”
श्लोक 51 (13.220.51)
एवमात्मकृतं कर्म भुञ्जन्ते तत्रतत्र ते । अभिभूतुं न शक्यं हि केनचित्स्वकृतं फलम् । इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
evamātmakṛtaṃ karma bhuñjante tatratatra te | abhibhūtuṃ na śakyaṃ hi kenacitsvakṛtaṃ phalam | iti te kathitaṃ devi bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi
“इस प्रकार वे जहाँ-तहाँ अपने ही किए हुए कर्म का फल भोगते हैं। अपने किए हुए फल को कोई भी लाँघ नहीं सकता। हे देवी, मैंने तुम्हें यह बताया; अब और क्या सुनना चाहती हो?”