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अनुशासन पर्व · अध्याय 222

स्त्रियों के पतन, दासता के कारण और स्वामी का कर्तव्य

उमा पूछती हैं कि कुछ स्त्रियाँ व्यभिचारिणी, विधवा या पाखण्ड-मत के चिह्न धारण करनेवाली क्यों होती हैं, और कुछ पुरुष शिल्पी, नट-गायक और नीच वृत्तिवाले या दास क्यों होते हैं। शिव हर एक के पीछे पूर्वजन्म के दोष बताते हैं: पति से विश्वासघात, उसे विष देना, ईर्ष्या और लोभ, घमण्ड और अहंकार, तथा दूसरे का धन या धरोहर हड़प लेना। फिर वे बताते हैं कि सेवक अच्छी सेवा से मुक्ति पाए और स्वामी अपने कर्मचारियों के साथ न्यायपूर्वक व्यवहार करे, और पूछते हैं कि अब वे और क्या सुनना चाहती हैं।

अध्याय 221अध्याय-सूचीअध्याय 223

उमोवाच

श्लोक 1 (13.222.1)

भगवन्देवदेवेश शूलपाणे वृषध्वज । पुंश्चल्य इव या स्त्रीषु नीचवृत्तिरताः स्मृताः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

bhagavandevadeveśa śūlapāṇe vṛṣadhvaja | puṃścalya iva yā strīṣu nīcavṛttiratāḥ smṛtāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

“भगवन्, देवों के देव, त्रिशूलधारी, वृषध्वज, स्त्रियों में जो पुंश्चलियों की तरह नीच आचरण में रत मानी जाती हैं, वे किस कर्म के परिपाक से ऐसी होती हैं? कृपया मुझे बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.222.2)

याः पुरा मनुजा देवि बुद्धिमोहसमन्विताः । कामरागसमायुक्ताः पतीनतिचरन्ति वै ॥

yāḥ purā manujā devi buddhimohasamanvitāḥ | kāmarāgasamāyuktāḥ patīnaticaranti vai

“हे देवी, जो स्त्रियाँ पूर्वजन्म में बुद्धि के मोह से भरी हुई और काम-राग से युक्त होकर अपने पतियों के प्रति अनाचार करती हैं,”

श्लोक 3 (13.222.3)

प्रतिकूलपरा यास्तु पतीन्प्रति यथा तथा । शौचं लज्जां तु विस्मृत्य यथेष्टपरिचारणाः ॥

pratikūlaparā yāstu patīnprati yathā tathā | śaucaṃ lajjāṃ tu vismṛtya yatheṣṭaparicāraṇāḥ

“जो किसी न किसी रूप में अपने पतियों के प्रतिकूल रहती हैं, और पवित्रता तथा लज्जा को भूलकर जिसकी चाहें उसकी सेवा करती हैं,”

श्लोक 4 (13.222.4)

एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः । यदि वै मानुषं जन्म लभेरंस्तास्तथाविधाः । बहुसाधारणा एव पुंश्चल्यश्च भवन्ति ताः ॥

evaṃyuktasamācārā yamaloke sudaṇḍitāḥ | yadi vai mānuṣaṃ janma labheraṃstāstathāvidhāḥ | bahusādhāraṇā eva puṃścalyaśca bhavanti tāḥ

“इस प्रकार का आचरण करनेवाली वे यमलोक में कठोर दण्ड पाती हैं; यदि वैसी स्त्रियाँ मनुष्य जन्म पाएँ, तो वे बहुतों के लिए सुलभ और पुंश्चली हो जाती हैं।”

श्लोक 5 (13.222.5)

पौश्चल्यं यत्तु तद्वृत्तं स्त्रीणां कष्टतमं स्मृतम् । ततःप्रभृति ता देवि पतन्त्येव न संशयः ॥

pauścalyaṃ yattu tadvṛttaṃ strīṇāṃ kaṣṭatamaṃ smṛtam | tataḥprabhṛti tā devi patantyeva na saṃśayaḥ

“स्त्रियों के लिए पुंश्चलता का वह आचरण सबसे कष्टकर माना गया है; हे देवी, उसी से वे निश्चय ही गिरती हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं।”

श्लोक 6 (13.222.6)

शोचन्ति चेत्तु तद्वृत्तं मनसा हितमाप्नुयुः ॥

śocanti cettu tadvṛttaṃ manasā hitamāpnuyuḥ

“फिर भी यदि वे उस आचरण पर शोक करें, तो मन से अपना कल्याण पा सकती हैं।”

उमोवाच

श्लोक 7 (13.222.7)

भगवन्देवदेवेश प्रमदा विधवा भृशम् ॥

bhagavandevadeveśa pramadā vidhavā bhṛśam

“भगवन्, देवों के देव, जो स्त्रियाँ विधवा हैं, अत्यन्त दीन,”

श्लोक 8 (13.222.8)

दृश्यन्ते मानुषा लोके सर्वकल्याणवर्जिताः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

dṛśyante mānuṣā loke sarvakalyāṇavarjitāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

“मनुष्य-लोक में सब प्रकार के कल्याण से रहित दिखाई देती हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 9 (13.222.9)

याः पुरा मनुजा देवि बुद्धिमोहसमन्विताः । कुटुम्बं तत्र वै पत्युर्नाशयन्ति वृथा तथा ॥

yāḥ purā manujā devi buddhimohasamanvitāḥ | kuṭumbaṃ tatra vai patyurnāśayanti vṛthā tathā

“हे देवी, जो स्त्रियाँ पूर्वजन्म में बुद्धि के मोह से भरकर अपने पति के कुटुम्ब को व्यर्थ ही नष्ट करती थीं,”

श्लोक 10 (13.222.10)

विषदाश्चाग्निदाश्चैव पतीन्प्रति सुनिर्दयाः । अन्यासां हि पतीन्यान्ति स्वपतिद्वेषकारणात् ॥

viṣadāścāgnidāścaiva patīnprati sunirdayāḥ | anyāsāṃ hi patīnyānti svapatidveṣakāraṇāt

“जो विष और आग देती थीं, पतियों के प्रति अत्यन्त निर्दय थीं, और अपने पति के प्रति द्वेष के कारण दूसरी स्त्रियों के पतियों के पास जाती थीं,”

श्लोक 11 (13.222.11)

एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः । निरयस्थाश्चिरं कालं कथंचित्प्राप्य मानुषम् । तत्र ता भोगरहिता विधवास्तु भवन्ति वै ॥

evaṃyuktasamācārā yamaloke sudaṇḍitāḥ | nirayasthāściraṃ kālaṃ kathaṃcitprāpya mānuṣam | tatra tā bhogarahitā vidhavāstu bhavanti vai

“इस प्रकार का आचरण करनेवाली वे यमलोक में कठोर दण्ड पाती हैं, लम्बे समय तक नरक में रहती हैं, और किसी प्रकार मनुष्य जन्म पाने पर वहाँ भोग से रहित विधवाएँ होती हैं।”

उमोवाच

श्लोक 12 (13.222.12)

भगवन्प्रमदा लोके पत्यौ ज्ञातिषु सत्सु च । लिङ्गिन्यः सम्प्रदृश्यन्ते पाषण्डं मतमाश्रिताः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

bhagavanpramadā loke patyau jñātiṣu satsu ca | liṅginyaḥ sampradṛśyante pāṣaṇḍaṃ matamāśritāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

“भगवन्, संसार में कुछ स्त्रियाँ पति और जाति-बन्धुओं के रहते हुए भी सम्प्रदायों के चिह्न धारण किए और पाखण्ड-मत का आश्रय लिए दिखाई देती हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 13 (13.222.13)

याः पुरा भावदोषेण लोभमोहसमन्विताः । परद्रव्यपरा लोभात्परेषां द्रव्यहारकाः ॥

yāḥ purā bhāvadoṣeṇa lobhamohasamanvitāḥ | paradravyaparā lobhātpareṣāṃ dravyahārakāḥ

“हे देवी, जो स्त्रियाँ पूर्वजन्म में भाव के दोष से लोभ और मोह से भरी थीं, दूसरों के धन में लगी रहती थीं और लोभ से दूसरों का धन हर लेती थीं,”

श्लोक 14 (13.222.14)

अभ्यसूयापरा यास्तु सपत्नीनां प्रदूषकाः । ईर्ष्यापराः कोपनाश्च बन्धूनां विफलाः सदा ॥

abhyasūyāparā yāstu sapatnīnāṃ pradūṣakāḥ | īrṣyāparāḥ kopanāśca bandhūnāṃ viphalāḥ sadā

“जो ईर्ष्यालु थीं, सौतों को कलंकित करती थीं, डाह रखनेवाली और क्रोधी थीं, और अपने बन्धुओं के लिए सदा निष्फल थीं,”

श्लोक 15 (13.222.15)

एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि ताः स्त्रियः । अलक्षणसमायुक्ताः पाषण्डं धर्ममाश्रिताः । स्त्रियः प्रव्राजशीलाश्च भवन्त्येव न संशयः ॥

evaṃyuktasamācārāḥ punarjanmani tāḥ striyaḥ | alakṣaṇasamāyuktāḥ pāṣaṇḍaṃ dharmamāśritāḥ | striyaḥ pravrājaśīlāśca bhavantyeva na saṃśayaḥ

“इस प्रकार का आचरण करनेवाली वे स्त्रियाँ अगले जन्म में अशुभ लक्षणों से युक्त होकर पाखण्ड-धर्म का आश्रय लेती हैं और संन्यास लेकर घूमनेवाली स्वभाव की हो जाती हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं।”

उमोवाच

श्लोक 16 (13.222.16)

भगवन्मानुषाः केचित्कारुवृत्तिसमाश्रिताः । प्रदृश्यन्ते मनुष्येषु नीचकर्मरतास्तथा । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

bhagavanmānuṣāḥ kecitkāruvṛttisamāśritāḥ | pradṛśyante manuṣyeṣu nīcakarmaratāstathā | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

“भगवन्, मनुष्यों में कुछ लोग कारीगरों की वृत्ति से जीविका चलाते और नीच कर्मों में लगे दिखाई देते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 17 (13.222.17)

ये पुरा मनुजा देवि स्तब्धमानयुता भृशम् । दर्पाहङ्कारसंयुक्ताः केवलात्मपरायणाः ॥

ye purā manujā devi stabdhamānayutā bhṛśam | darpāhaṅkārasaṃyuktāḥ kevalātmaparāyaṇāḥ

“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में बहुत अकड़ और अभिमान से भरे थे, घमण्ड और अहंकार से युक्त थे और केवल अपने ही में लगे रहते थे,”

श्लोक 18 (13.222.18)

तादृशा मानुषा देवि पुनर्जन्मनि शोभने । कारवो नटगन्धर्वाः सम्भवन्ति यथा तथा ॥

tādṛśā mānuṣā devi punarjanmani śobhane | kāravo naṭagandharvāḥ sambhavanti yathā tathā

“ऐसे मनुष्य, हे देवी, अगले जन्म में, हे शोभने, जैसा-तैसा संयोग हो, कारीगर, नट और गन्धर्व (गायक) हो जाते हैं,”

श्लोक 19 (13.222.19)

नापिता बन्दिनश्चैव तथा वैतालिकाः प्रिये । एवंभूतास्त्वधोवृत्तिं जीवन्त्याश्रित्य मानवाः ॥

nāpitā bandinaścaiva tathā vaitālikāḥ priye | evaṃbhūtāstvadhovṛttiṃ jīvantyāśritya mānavāḥ

“नाई, वन्दी और वैतालिक, हे प्रिये; ऐसे बने हुए ये लोग दूसरों का आश्रय लेकर नीची वृत्ति से जीते हैं।”

श्लोक 20 (13.222.20)

परप्रसाधनकरास्ते परैः कृतवेतनाः । परावमानस्य फलं भुञ्जते पौर्वदैहिकम् ॥

paraprasādhanakarāste paraiḥ kṛtavetanāḥ | parāvamānasya phalaṃ bhuñjate paurvadaihikam

“वे दूसरों का श्रृंगार करते हैं और दूसरों से वेतन पाकर काम करते हैं; दूसरों का अपमान करने का जो फल था, उसे वे पूर्वदेह से लाकर भोगते हैं।”

उमोवाच

श्लोक 21 (13.222.21)

भगवन्देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन । दासभूताः प्रदृश्यन्ते सर्वकर्मपरा भृशम् ॥

bhagavandevadeveśa mānuṣeṣveva kecana | dāsabhūtāḥ pradṛśyante sarvakarmaparā bhṛśam

“भगवन्, देवों के देव, मनुष्यों में कुछ लोग दास बने हुए दिखाई देते हैं, जो सदा सब प्रकार के काम में लगे रहते हैं,”

श्लोक 22 (13.222.22)

आघातभर्त्सनसहाः पीड्यमानाश्च सर्वशः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

āghātabhartsanasahāḥ pīḍyamānāśca sarvaśaḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

“मार और फटकार सहते हैं और सब ओर से पीड़ित किए जाते हैं। यह किस कर्म के परिपाक से होता है? कृपया मुझे बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 23 (13.222.23)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu kalyāṇi kāraṇam

“मैं तुम्हें वह बताता हूँ; हे कल्याणी, कारण सुनो।”

श्लोक 24 (13.222.24)

ये पुरा मनुजा देवि परेषां वित्तहारकाः । ऋणवृद्धिकरं कृष्या न्यासदत्तं तथैव च ॥

ye purā manujā devi pareṣāṃ vittahārakāḥ | ṛṇavṛddhikaraṃ kṛṣyā nyāsadattaṃ tathaiva ca

“हे देवी, जो मनुष्य पूर्वजन्म में दूसरों का धन हर लेते थे, ब्याज से बढ़े हुए ऋण से, खेती से, और धरोहर के रूप में दी गई वस्तुओं से,”

श्लोक 25 (13.222.25)

निक्षेपकारणाद्दत्तपरद्रव्यापहारिणः । प्रमादाद्विस्मृतं नष्टं परेषां धनहारकाः ॥

nikṣepakāraṇāddattaparadravyāpahāriṇaḥ | pramādādvismṛtaṃ naṣṭaṃ pareṣāṃ dhanahārakāḥ

“जो दूसरों की जमा के रूप में दी हुई सम्पत्ति को हड़प लेते थे, और असावधानी से भूली या खोई हुई दूसरों की सम्पत्ति को ले लेते थे,”

श्लोक 26 (13.222.26)

वधबन्धपरिक्लेशैर्दासत्वं कुर्वते परान् । तादृशा मरणं प्राप्ता दण्डिता यमशासनैः ॥

vadhabandhaparikleśairdāsatvaṃ kurvate parān | tādṛśā maraṇaṃ prāptā daṇḍitā yamaśāsanaiḥ

“और जो मार-पीट, बन्धन और पीड़ा के द्वारा दूसरों को दास बना लेते थे, ऐसे लोग मरते हैं और यम के शासन से दण्डित होते हैं।”

श्लोक 27 (13.222.27)

कथञ्चित्प्राप्य मानुष्यं तत्र ते देवि सर्वथा । दासभूता भविष्यन्ति जन्मप्रभृति मानवाः ॥

kathañcitprāpya mānuṣyaṃ tatra te devi sarvathā | dāsabhūtā bhaviṣyanti janmaprabhṛti mānavāḥ

“हे देवी, किसी प्रकार मनुष्य जन्म पाकर वे हर तरह से जन्म से ही दास होंगे।”

श्लोक 28 (13.222.28)

तेषां कर्माणि कुर्वन्ति येषां ते धनहारकाः । आसमाप्तेः स्वपापस्य कुर्वन्तीति विनिश्चयः ॥

teṣāṃ karmāṇi kurvanti yeṣāṃ te dhanahārakāḥ | āsamāpteḥ svapāpasya kurvantīti viniścayaḥ

“जिनका धन उन्होंने हरा था, उन्हीं का काम वे करते हैं; अपने पाप के पूरा हो जाने तक वे करते रहते हैं, यह निश्चय है।”

श्लोक 29 (13.222.29)

पशुभूतास्तथा चान्ये भवन्ति धनहारकाः । तत्तथा क्षीयते कर्म तेषां पूर्वापराधजम् । अतोऽन्यथा न तच्छक्यं कर्म भोक्तुं सुरासुरैः ॥

paśubhūtāstathā cānye bhavanti dhanahārakāḥ | tattathā kṣīyate karma teṣāṃ pūrvāparādhajam | ato'nyathā na tacchakyaṃ karma bhoktuṃ surāsuraiḥ

“धन हरनेवाले दूसरे लोग पशु बन जाते हैं; इस प्रकार उनके पूर्व अपराध से उत्पन्न कर्म क्षीण होता है। इसके सिवा किसी और रीति से देवता और असुर भी उस कर्म को नहीं भोगकर चुका सकते।”

श्लोक 30 (13.222.30)

किन्तु मोक्षविधिस्तेषां सर्वता तत्प्रसादनम् । अयथावन्मोक्षकामः पुनर्जन्मनि चेष्यते ॥

kintu mokṣavidhisteṣāṃ sarvatā tatprasādanam | ayathāvanmokṣakāmaḥ punarjanmani ceṣyate

“किन्तु उनकी मुक्ति का विधान सर्वथा उसी स्वामी को प्रसन्न करने में है। जो अनुचित रीति से मुक्ति चाहता है, उसे अगले जन्म में फिर उसी की आवश्यकता होती है।”

श्लोक 31 (13.222.31)

मोक्षकामी यथान्यायं कुर्वन्कर्माणि सर्वशः । भर्तुः प्रसादमाकाङ्क्षेदायासान्सर्वथा सहन् ॥

mokṣakāmī yathānyāyaṃ kurvankarmāṇi sarvaśaḥ | bhartuḥ prasādamākāṅkṣedāyāsānsarvathā sahan

“मुक्ति चाहनेवाले को सब काम यथोचित रूप से करने चाहिए और सब प्रकार का कष्ट सहते हुए स्वामी की कृपा की आकांक्षा करनी चाहिए।”

श्लोक 32 (13.222.32)

प्रीतिपूर्वं तु यो भर्त्रा मुक्तो मुक्तः स्वपापतः । तथाभूतान्कर्मकरान्सदा सन्तोषयेत्पतिः ॥

prītipūrvaṃ tu yo bhartrā mukto muktaḥ svapāpataḥ | tathābhūtānkarmakarānsadā santoṣayetpatiḥ

“जो सेवक स्वामी द्वारा प्रेमपूर्वक छोड़ा जाता है वह अपने पाप से मुक्त हो जाता है; स्वामी को ऐसे कर्मचारियों को सदा सन्तुष्ट रखना चाहिए।”

श्लोक 33 (13.222.33)

यथार्हं कारयेत्कर्म दण्डकारणतः क्षिपेत् । वृद्धान्बालांस्तथा क्षीणान्पालयन्धर्ममाप्नुयात् ॥

yathārhaṃ kārayetkarma daṇḍakāraṇataḥ kṣipet | vṛddhānbālāṃstathā kṣīṇānpālayandharmamāpnuyāt

“उसे उचित काम कराना चाहिए और दण्ड कारण होने पर ही देना चाहिए; बूढ़ों, बच्चों और दुर्बलों की रक्षा करता हुआ वह धर्म प्राप्त करेगा।”

श्लोक 34 (13.222.34)

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

iti te kathitaṃ devi bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi

“हे देवी, मैंने तुम्हें यह बताया; अब और क्या सुनना चाहती हो?”

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