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अनुशासन पर्व · अध्याय 223

मनुष्य के दुःखों का कारण: कर्म और उनका फल

उमा महेश्वर से पूछती हैं कि कुछ मनुष्य चाण्डाल क्यों जन्म लेते हैं, और कुछ बड़े लोगों के द्वार पर व्यर्थ क्यों खड़े रहते हैं, अपना धन क्यों खो बैठते हैं, हिंसा से क्यों मारे जाते हैं या राजाओं से दण्ड क्यों पाते हैं। वे हर दशा को पूर्वजन्मों के कर्मों से जोड़ते हैं — अभिमान, कठोरता, चोरी और हत्या। वे समझाते हैं कि राजा का दण्ड यम के दण्ड का स्थान नहीं लेता, जानबूझकर किया पाप किसी प्रायश्चित्त से नहीं मिटता जबकि प्रमादवश हुआ पाप मिट जाता है, और कर्म करने वाला उसका फल भोगे बिना नहीं रहता।

अध्याय 222अध्याय-सूचीअध्याय 224

उमोवाच

श्लोक 1 (13.223.1)

भगवन्मानुषेष्वेव मानुषाः समदर्शनाः । चण्डाला इव दृश्यन्ते स्पर्शमात्रविदूषिताः ॥

bhagavanmānuṣeṣveva mānuṣāḥ samadarśanāḥ | caṇḍālā iva dṛśyante sparśamātravidūṣitāḥ

हे भगवन्! मनुष्यों में ही ऐसे मनुष्य दिखाई देते हैं जो रूप में औरों जैसे ही हैं, फिर भी चाण्डालों के समान दिखते हैं, जो केवल स्पर्श से दूषित माने जाते हैं।

श्लोक 2 (13.223.2)

नीचकर्मरता देव सर्वेषां मलहारकाः । दुर्गताः क्लेशभूयिष्ठा विरूपा दुष्टचेतसः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

nīcakarmaratā deva sarveṣāṃ malahārakāḥ | durgatāḥ kleśabhūyiṣṭhā virūpā duṣṭacetasaḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

हे देव! वे नीच कर्मों में लगे रहते हैं, सबका मैला उठाने वाले, दुर्दशा में पड़े, क्लेशों से भरे, कुरूप और दुष्ट मन वाले होते हैं। यह किस कर्मफल से होता है? कृपया मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 3 (13.223.3)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि तदेकाग्रमनाः शृणु ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi tadekāgramanāḥ śṛṇu

मैं तुम्हें वह बताऊँगा। एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 4 (13.223.4)

ये पुरा मनुजा देवि अतिमानयुता भृशम् । आत्मसम्भावनायुक्ताः स्तब्धा दर्पसमन्विताः ॥

ye purā manujā devi atimānayutā bhṛśam | ātmasambhāvanāyuktāḥ stabdhā darpasamanvitāḥ

हे देवी! जो मनुष्य पूर्वजन्म में अत्यन्त अभिमानी, आत्म-गौरव से भरे, अकड़ वाले और घमण्ड से फूले हुए थे,

श्लोक 5 (13.223.5)

प्रणामं तु न कुर्वन्ति गुरूणामपि पामराः । ये स्वधर्मार्पणं कार्यमतिमानान्न कुर्वते ॥

praṇāmaṃ tu na kurvanti gurūṇāmapi pāmarāḥ | ye svadharmārpaṇaṃ kāryamatimānānna kurvate

जो नीच जन गुरुजनों को भी प्रणाम नहीं करते थे, और अत्यधिक अभिमान के कारण अपने कर्तव्य-धर्म का समर्पण नहीं करते थे जो उन्हें करना चाहिए था,

श्लोक 6 (13.223.6)

परान्संनामयन्त्येव आज्ञयात्मनि ये बलात् । ऋद्धियोगात्परान्नित्यमवमन्यन्ति मानवान् । पानपाः सर्वभक्षाश्च परुषाः कटुका नराः ॥

parānsaṃnāmayantyeva ājñayātmani ye balāt | ṛddhiyogātparānnityamavamanyanti mānavān | pānapāḥ sarvabhakṣāśca paruṣāḥ kaṭukā narāḥ

जो अपनी आज्ञा से बलपूर्वक दूसरों को अपने आगे झुकाते थे, ऐश्वर्य के बल पर दूसरे मनुष्यों का सदा अपमान करते थे, जो मद्यप, सब कुछ खाने वाले, कठोर और कटुभाषी थे —

श्लोक 7 (13.223.7)

एवंयुक्तसमाचारा दण्डिता यमशासनैः । कथंचित्प्राप्य मानुष्यं चण्डालाः सम्भवन्ति ते ॥

evaṃyuktasamācārā daṇḍitā yamaśāsanaiḥ | kathaṃcitprāpya mānuṣyaṃ caṇḍālāḥ sambhavanti te

ऐसे आचरण वाले वे लोग यम के दूतों से दण्ड पाकर किसी प्रकार मनुष्य जन्म पाते हैं और चाण्डाल होकर जन्म लेते हैं।

श्लोक 8 (13.223.8)

नीचकर्मरताश्चैव सर्वेषां मलहारकाः । परेषां वन्दनपरास्ते भवन्त्येव मानिनः ॥

nīcakarmaratāścaiva sarveṣāṃ malahārakāḥ | pareṣāṃ vandanaparāste bhavantyeva māninaḥ

वे नीच कर्मों में लगे और सबका मैला उठाने वाले होते हैं; वे पहले के अभिमानी लोग अब दूसरों की वन्दना में ही लगे रहने वाले बन जाते हैं।

श्लोक 9 (13.223.9)

विरूपाः पापयोनिस्थाः स्पर्शनादिविवर्जिताः । कुवृत्तिमुपजीवन्ति भूत्वा ते रजकादयः । पुराऽतिमानदोषात्तु भुञ्जते स्वकृतं फलम् ॥

virūpāḥ pāpayonisthāḥ sparśanādivivarjitāḥ | kuvṛttimupajīvanti bhūtvā te rajakādayaḥ | purā'timānadoṣāttu bhuñjate svakṛtaṃ phalam

कुरूप, पाप-योनियों में पड़े और स्पर्श आदि से वंचित होकर वे धोबी आदि बनकर निन्दित वृत्ति से जीविका चलाते हैं। पूर्वजन्म के अभिमान के दोष से वे अपने ही किए का फल भोगते हैं।

श्लोक 10 (13.223.10)

तानप्यवस्थाकृपणांश्चण्डालानपि बुद्धिमान् । न च निन्देन्नापि कुप्येद्भुञ्जते स्वकृतं फलम् । चण्डाला अपि तां जातिं शोचन्तः शुद्धिमाप्नुयुः ॥

tānapyavasthākṛpaṇāṃścaṇḍālānapi buddhimān | na ca nindennāpi kupyedbhuñjate svakṛtaṃ phalam | caṇḍālā api tāṃ jātiṃ śocantaḥ śuddhimāpnuyuḥ

बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि इन दीन-दुर्दशाग्रस्त चाण्डालों की भी न निन्दा करे, न उन पर क्रोध करे; वे अपने ही किए का फल भोगते हैं। चाण्डाल भी अपनी उस जाति पर शोक करते हुए शुद्धि पा सकते हैं।

उमोवाच

श्लोक 11 (13.223.11)

भगवन्मानुषाः केचिदाशापाशशतैर्वृताः । परेषां द्वारि तिष्ठन्ति प्रतिषिद्धाः प्रवेशने ॥

bhagavanmānuṣāḥ kecidāśāpāśaśatairvṛtāḥ | pareṣāṃ dvāri tiṣṭhanti pratiṣiddhāḥ praveśane

हे भगवन्! कुछ मनुष्य आशा के सैकड़ों पाशों में बँधे हुए दूसरों के द्वार पर खड़े रहते हैं और भीतर जाने से रोक दिए जाते हैं;

श्लोक 12 (13.223.12)

द्रष्टुं ज्ञापयितुं चैव न लभन्ते च यत्नतः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

draṣṭuṃ jñāpayituṃ caiva na labhante ca yatnataḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

वे यत्न करने पर भी न दर्शन कर पाते हैं, न अपनी बात जता पाते हैं। यह किस कर्मफल से होता है? कृपया मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 13 (13.223.13)

ये पुरा मानुषा देवि ऐश्वर्यस्थानसंयुताः । संवादं तु न कुर्वन्ति परैरैश्वर्यमोहिताः ॥

ye purā mānuṣā devi aiśvaryasthānasaṃyutāḥ | saṃvādaṃ tu na kurvanti parairaiśvaryamohitāḥ

हे देवी! जो मनुष्य पूर्वजन्म में ऐश्वर्य के पदों पर थे, पर ऐश्वर्य के मोह में पड़कर दूसरों से बातचीत नहीं करते थे,

श्लोक 14 (13.223.14)

द्वाराणि न ददत्येव लोभमोहादिभिर्वृताः । अवस्थामोहसंयुक्ताः स्वार्थमात्रपरायणाः ॥

dvārāṇi na dadatyeva lobhamohādibhirvṛtāḥ | avasthāmohasaṃyuktāḥ svārthamātraparāyaṇāḥ

जो लोभ, मोह आदि से घिरे हुए किसी के लिए अपने द्वार नहीं खोलते थे, अपनी स्थिति के मोह में डूबे थे और केवल अपने स्वार्थ में लगे रहते थे,

श्लोक 15 (13.223.15)

सर्वभोगयुता वाऽपि सर्वेषां निष्फला भृशम् । अपि शक्ता न कुर्युस्ते परानुग्रहकारणात् ॥

sarvabhogayutā vā'pi sarveṣāṃ niṣphalā bhṛśam | api śaktā na kuryuste parānugrahakāraṇāt

या जो सब भोगों से सम्पन्न होकर भी सबके लिए अत्यन्त निष्फल रहे, और समर्थ होकर भी दूसरों पर अनुग्रह करने के लिए कुछ नहीं करते थे,

श्लोक 16 (13.223.16)

निर्दयाश्चैव निर्द्वारा भोगैश्वर्यगतिं प्रति । एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने ॥

nirdayāścaiva nirdvārā bhogaiśvaryagatiṃ prati | evaṃyuktasamācārāḥ punarjanmani śobhane

जो निर्दय थे और भोग-ऐश्वर्य के मार्ग में दूसरों के लिए द्वारहीन थे — हे शोभने! ऐसे आचरण वाले लोग अगले जन्म में

श्लोक 17 (13.223.17)

यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः । दुर्गता दुरवस्थाश्च कर्मव्याक्षेपसंयुताः ॥

yadi cenmānuṣaṃ janma labheraṃste tathāvidhāḥ | durgatā duravasthāśca karmavyākṣepasaṃyutāḥ

यदि वैसा ही मनुष्य जन्म पाते हैं, तो दुर्दशा में पड़े, बुरी अवस्था वाले और अपने कर्मों की बाधा से घिरे होते हैं।

श्लोक 18 (13.223.18)

अभिधावन्ति ते सर्वे तमर्थमभिवेदिनः । राज्ञां वा राजमात्राणां द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥

abhidhāvanti te sarve tamarthamabhivedinaḥ | rājñāṃ vā rājamātrāṇāṃ dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ

वे सब अपने उसी प्रयोजन के पीछे दौड़ते हैं, और राजाओं या राजकर्मचारियों के द्वार पर रोके जाकर खड़े रहते हैं।

श्लोक 19 (13.223.19)

कर्म विज्ञापितुं द्रष्टुं न लभन्ते कथञ्चन । प्रवेष्टुमपि ते द्वारं बहिस्तिष्ठन्ति काङ्क्षया ॥

karma vijñāpituṃ draṣṭuṃ na labhante kathañcana | praveṣṭumapi te dvāraṃ bahistiṣṭhanti kāṅkṣayā

वे किसी प्रकार न अपना काम बता पाते हैं, न किसी से मिल पाते हैं; द्वार के भीतर जाने की इच्छा लिए भी वे बाहर ही खड़े रहते हैं।

उमोवाच

श्लोक 20 (13.223.20)

भगवन्मानुषाः केचिन्मनुष्येषु बहुष्वपि । सहसा नष्टसर्वस्वा भ्रष्टकोशपरिग्रहाः ॥

bhagavanmānuṣāḥ kecinmanuṣyeṣu bahuṣvapi | sahasā naṣṭasarvasvā bhraṣṭakośaparigrahāḥ

हे भगवन्! बहुत से मनुष्यों के बीच भी कुछ मनुष्य अचानक अपना सब कुछ गँवा देते हैं, उनके कोश और परिग्रह नष्ट हो जाते हैं;

श्लोक 21 (13.223.21)

दृश्यन्ते मानुषाः केचिद्राजचोरोदकादिभिः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

dṛśyante mānuṣāḥ kecidrājacorodakādibhiḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

और कुछ मनुष्य राजा, चोर, जल आदि के कारण ऐसे ही दिखाई देते हैं। यह किस कर्मफल से होता है? कृपया मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 22 (13.223.22)

ये पुरा मानुषा देवि आसुरं भावमाश्रिताः । परेषां वृत्तिनाशं तु कुर्वते द्वेषलोभतः ॥

ye purā mānuṣā devi āsuraṃ bhāvamāśritāḥ | pareṣāṃ vṛttināśaṃ tu kurvate dveṣalobhataḥ

हे देवी! जो मनुष्य पूर्वजन्म में आसुरी वृत्ति अपनाकर द्वेष और लोभ से दूसरों की जीविका नष्ट करते थे,

श्लोक 23 (13.223.23)

उत्कोचनपराश्चैव पिशुनाश्च तथाविधाः । परद्रव्यहरा घोराश्चौर्याद्वाऽन्येन कर्मणा ॥

utkocanaparāścaiva piśunāśca tathāvidhāḥ | paradravyaharā ghorāścauryādvā'nyena karmaṇā

जो घूस लेने में लगे रहते थे, वैसे ही चुगलखोर थे, और चोरी या किसी अन्य कर्म से दूसरों का धन हर लेने वाले भयंकर लोग थे,

श्लोक 24 (13.223.24)

निर्दया निरनुक्रोशाः परेषां वृत्तिनाशकाः । नास्तिकाऽनृतभूयिष्ठाः परद्रव्यापहारिणः ॥

nirdayā niranukrośāḥ pareṣāṃ vṛttināśakāḥ | nāstikā'nṛtabhūyiṣṭhāḥ paradravyāpahāriṇaḥ

जो निर्दय, दयाहीन, दूसरों की जीविका छीनने वाले, नास्तिक, झूठ से भरे और पराया धन हड़पने वाले थे —

श्लोक 25 (13.223.25)

एवंयुक्तसमाचारा दण्डिता यमशासनैः । निरयस्थाश्चिरं कालं तत्र दुःखसमन्विताः ॥

evaṃyuktasamācārā daṇḍitā yamaśāsanaiḥ | nirayasthāściraṃ kālaṃ tatra duḥkhasamanvitāḥ

ऐसे आचरण वाले लोग यम के दूतों से दण्ड पाकर बहुत समय तक नरक में रहते हैं और वहाँ दुःख से घिरे रहते हैं।

श्लोक 26 (13.223.26)

यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः । तत्रस्थाः प्राप्नुवन्त्येव सहसा द्रव्यनाशनम् ॥

yadi cenmānuṣaṃ janma labheraṃste tathāvidhāḥ | tatrasthāḥ prāpnuvantyeva sahasā dravyanāśanam

यदि वैसे लोग मनुष्य जन्म पाते हैं, तो उसमें रहते हुए अचानक उनके धन का नाश हो जाता है,

श्लोक 27 (13.223.27)

कष्टं तत्प्राप्नुवन्त्येव कारणाकारणादपि । नाशं विनाशं द्रव्याणामुपघातं च सर्वशः ॥

kaṣṭaṃ tatprāpnuvantyeva kāraṇākāraṇādapi | nāśaṃ vināśaṃ dravyāṇāmupaghātaṃ ca sarvaśaḥ

और कारण से या बिना कारण भी वे कष्ट पाते हैं — सब ओर से धन का नाश, विनाश और हानि।

उमोवाच

श्लोक 28 (13.223.28)

भगवन्मानुषाः केचिद्बान्धवैः सहसा पृथक् । कारणादेव सहसा सर्वेषां प्राणनाशनम् ॥

bhagavanmānuṣāḥ kecidbāndhavaiḥ sahasā pṛthak | kāraṇādeva sahasā sarveṣāṃ prāṇanāśanam

हे भगवन्! कुछ मनुष्य अचानक अपने बन्धुओं से बिछुड़ जाते हैं, और किसी कारण से अचानक उन सबके प्राण चले जाते हैं;

श्लोक 29 (13.223.29)

शस्त्रेण वाऽन्यथा वाऽपि प्राप्नुवन्ति वधं नराः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

śastreṇa vā'nyathā vā'pi prāpnuvanti vadhaṃ narāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

और मनुष्य शस्त्र से या अन्य प्रकार से मृत्यु पाते हैं। यह किस कर्मफल से होता है? कृपया मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 30 (13.223.30)

ये पुरा मनुजा देवि घोरकर्मरतानृताः । आसुराः प्रायशो मूर्खाः प्राणिहिंसाप्रिया भृशं ॥

ye purā manujā devi ghorakarmaratānṛtāḥ | āsurāḥ prāyaśo mūrkhāḥ prāṇihiṃsāpriyā bhṛśaṃ

हे देवी! जो मनुष्य पूर्वजन्म में भयंकर कर्मों और झूठ में रत रहते थे, असुर-स्वभाव के, प्रायः मूर्ख और प्राणियों की हिंसा के अत्यन्त प्रेमी थे,

श्लोक 31 (13.223.31)

निर्दयाः प्राणिहिंसायां तथा प्राणिविघातकाः । विश्वस्तघातकाश्चैव तथा सुप्तविघातकाः । प्रायशोऽनृतभूयिष्ठा नास्तिका मांसभोजनाः ॥

nirdayāḥ prāṇihiṃsāyāṃ tathā prāṇivighātakāḥ | viśvastaghātakāścaiva tathā suptavighātakāḥ | prāyaśo'nṛtabhūyiṣṭhā nāstikā māṃsabhojanāḥ

जो प्राणियों की हिंसा में निर्दय थे, प्राणों का घात करने वाले, विश्वास करने वालों के हत्यारे और सोते हुओं को मारने वाले थे, प्रायः झूठ से भरे, नास्तिक और मांसभोजी थे —

श्लोक 32 (13.223.32)

एवंयुक्तसमाचाराः कालधर्मं गताः पुनः । दण्डिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये ॥

evaṃyuktasamācārāḥ kāladharmaṃ gatāḥ punaḥ | daṇḍitā yamadaṇḍena nirayasthāściraṃ priye

ऐसे आचरण वाले वे मरकर यम के दण्ड से फिर दण्डित होते हैं और हे प्रिये! बहुत काल तक नरक में रहते हैं।

श्लोक 33 (13.223.33)

तिर्यग्योनिं पुनः प्राप्य तत्र दुःखपरिक्षयात् । यदि चेन्मानुषं जन्म लभेरंस्ते तथाविधाः । तत्र ते प्राप्नुवन्त्येव वधबन्धान्यथा तथा ॥

tiryagyoniṃ punaḥ prāpya tatra duḥkhaparikṣayāt | yadi cenmānuṣaṃ janma labheraṃste tathāvidhāḥ | tatra te prāpnuvantyeva vadhabandhānyathā tathā

फिर पशु-योनि पाकर और वहाँ का दुःख चुका लेने पर यदि वैसे लोग मनुष्य जन्म पाते हैं, तो वहाँ किसी न किसी रूप में वध और बन्धन पाते हैं।

श्लोक 34 (13.223.34)

आढ्या वा दुर्गता वाऽपि भुञ्जते स्वकृतं फलम् । सुप्ता मत्ताश्च विश्वस्तास्तथा ते प्राप्नुवन्त्युत ॥

āḍhyā vā durgatā vā'pi bhuñjate svakṛtaṃ phalam | suptā mattāśca viśvastāstathā te prāpnuvantyuta

धनी हों या निर्धन, वे अपने किए का फल भोगते हैं; सोए हुए, मतवाले या विश्वास में बैठे हुए भी वे उसे पाते हैं।

श्लोक 35 (13.223.35)

प्राणबाधकृतं दुःखं बान्धवैः सहसा पृथक् । पुत्रदारविनाशं वा शस्त्रेणान्येन वा वधम् ॥

prāṇabādhakṛtaṃ duḥkhaṃ bāndhavaiḥ sahasā pṛthak | putradāravināśaṃ vā śastreṇānyena vā vadham

वे प्राणों को पीड़ा देने वाला दुःख, बन्धुओं से अचानक बिछोह, पुत्र और पत्नी का नाश, या शस्त्र आदि से वध पाते हैं।

उमोवाच

श्लोक 36 (13.223.36)

भगवन्मानुषाः केचिद्राजनीतिविशारदैः । दण्ड्यन्ते मानुषे लोके मानुषाः सर्वतोभयाः । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

bhagavanmānuṣāḥ kecidrājanītiviśāradaiḥ | daṇḍyante mānuṣe loke mānuṣāḥ sarvatobhayāḥ | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

हे भगवन्! राजनीति में निपुण राजाओं द्वारा मनुष्य-लोक में कुछ मनुष्य दण्डित किए जाते हैं, जो चारों ओर से भयभीत रहते हैं। यह किस कर्मफल से होता है? कृपया मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 37 (13.223.37)

ये पुरा मनुजा देवि मानुषांश्चेतराणि वा । क्लिष्टघातेन निघ्नन्ति प्राणान्प्राणिषु निर्दयाः । आसुरा घोरकर्माणः क्रूरदण्डवधप्रियाः ॥

ye purā manujā devi mānuṣāṃścetarāṇi vā | kliṣṭaghātena nighnanti prāṇānprāṇiṣu nirdayāḥ | āsurā ghorakarmāṇaḥ krūradaṇḍavadhapriyāḥ

हे देवी! जो मनुष्य पूर्वजन्म में मनुष्यों और अन्य प्राणियों को पीड़ा देकर मारते थे, प्राणियों के प्रति निर्दय, आसुरी, भयंकर कर्म करने वाले और क्रूर दण्ड तथा वध के प्रेमी थे,

श्लोक 38 (13.223.38)

ये दण्डयन्त्यदण्ड्यांश्च राजानः कोपमोहिताः । हिंसाहङ्कारपरुषा मांसादा नास्तिकाशुभाः ॥

ye daṇḍayantyadaṇḍyāṃśca rājānaḥ kopamohitāḥ | hiṃsāhaṅkāraparuṣā māṃsādā nāstikāśubhāḥ

और जो राजा क्रोध से मोहित होकर दण्ड न पाने योग्यों को दण्ड देते थे — हिंसा और अहंकार से कठोर, मांसभक्षी, नास्तिक और अशुभ आचरण वाले,

श्लोक 39 (13.223.39)

केचित्स्त्रीपुरुषघ्नाश्च गुरुघ्नाश्च तथा प्रिये । एवंयुक्तसमाचारा प्राणिधर्मं गताः पुनः ॥

kecitstrīpuruṣaghnāśca gurughnāśca tathā priye | evaṃyuktasamācārā prāṇidharmaṃ gatāḥ punaḥ

तथा कुछ जो स्त्रियों और पुरुषों के हत्यारे और गुरुओं के हत्यारे थे, हे प्रिये — ऐसे आचरण वाले लोग मरकर

श्लोक 40 (13.223.40)

दण्डिता यमदण्डेन निरयस्थाश्चिरं प्रिये । पूर्वजन्मकृतं कर्म भुञ्जते तदिह प्रजाः ॥

daṇḍitā yamadaṇḍena nirayasthāściraṃ priye | pūrvajanmakṛtaṃ karma bhuñjate tadiha prajāḥ

यम के दण्ड से दण्डित होकर, हे प्रिये! बहुत काल तक नरक में रहते हैं। पूर्वजन्म में किए कर्म का फल ये लोग यहाँ भोगते हैं।

श्लोक 41 (13.223.41)

इहैव यत्कर्म कृतं तत्परत्र फलत्युत । एषा व्यवस्थितिर्देवि मानुषेष्वेव दृश्यते ॥

ihaiva yatkarma kṛtaṃ tatparatra phalatyuta | eṣā vyavasthitirdevi mānuṣeṣveva dṛśyate

यहाँ जो कर्म किया जाता है, वह परलोक में फलता है। यह व्यवस्था केवल मनुष्यों में ही देखी जाती है।

श्लोक 42 (13.223.42)

न चर्षीणां न देवानाममृतत्वात्तपोबलात् । तैरेकेन शरीरेण भुज्यते कर्मणः फलम् ॥

na carṣīṇāṃ na devānāmamṛtatvāttapobalāt | tairekena śarīreṇa bhujyate karmaṇaḥ phalam

ऋषियों और देवताओं के लिए ऐसा नहीं है; अमरता और तपोबल के कारण वे अपने कर्म का फल एक ही शरीर से भोग लेते हैं।

श्लोक 43 (13.223.43)

न तथा मानुषाणां स्यादन्तर्धाय भवेद्धि तत् ॥

na tathā mānuṣāṇāṃ syādantardhāya bhaveddhi tat

मनुष्यों के लिए ऐसा नहीं होता; उनके लिए वह फल कुछ व्यवधान के बाद आता है।

उमोवाच

श्लोक 44 (13.223.44)

किमर्थं मानुषा लोके दण्ड्यन्ते पृथिवीश्वरैः । कृतापराधमुद्दिश्य हन्ता हर्ताऽयमित्युत ॥

kimarthaṃ mānuṣā loke daṇḍyante pṛthivīśvaraiḥ | kṛtāparādhamuddiśya hantā hartā'yamityuta

संसार में राजा लोग मनुष्यों को किए हुए अपराध का आरोप लगाकर क्यों दण्ड देते हैं, यह कहकर कि "यह हत्यारा है, यह चोर है"?

श्लोक 45 (13.223.45)

पुत्रार्थी पुत्रकामेष्ट्या इहैव लभते सुतान् । तैरेव हि शरीरेण भुञ्जन्ते कर्मणां फलम् ॥

putrārthī putrakāmeṣṭyā ihaiva labhate sutān | taireva hi śarīreṇa bhuñjante karmaṇāṃ phalam

पुत्र चाहने वाला पुत्रकामेष्टि यज्ञ से यहीं पुत्र पा लेता है; इस प्रकार लोग कर्मों का फल इसी शरीर से भोगते हैं।

श्लोक 46 (13.223.46)

दृश्यन्ते मानुषे लोके तद्भवान्नानुमन्यते । एतन्मे संशयस्थानं तन्मे त्वं छेत्तुमर्हसि ॥

dṛśyante mānuṣe loke tadbhavānnānumanyate | etanme saṃśayasthānaṃ tanme tvaṃ chettumarhasi

मनुष्य-लोक में यह देखा जाता है, पर आप इसे स्वीकार नहीं करते। यही मेरी शंका का स्थान है; आप उसे मेरे लिए दूर कीजिए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 47 (13.223.47)

स्थाने संशयितं देवि तत्त्वं शृणु समाहिता । कर्म कर्मफलं चेति युगपद्भुवि नेष्यते ॥

sthāne saṃśayitaṃ devi tattvaṃ śṛṇu samāhitā | karma karmaphalaṃ ceti yugapadbhuvi neṣyate

हे देवी! तुमने ठीक ही शंका की। ध्यान से सत्य सुनो। कर्म और कर्मफल पृथ्वी पर एक साथ नहीं माने जाते।

श्लोक 48 (13.223.48)

ये त्वयाऽभिहिता देवि हन्ता हर्ताऽयमित्यपि । तेषां तत्पूर्वकं कर्म दण्ड्यते यत्र राजभिः ॥

ye tvayā'bhihitā devi hantā hartā'yamityapi | teṣāṃ tatpūrvakaṃ karma daṇḍyate yatra rājabhiḥ

हे देवी! तुमने जिनके विषय में कहा कि "यह हत्यारा है, यह चोर है" — उनका कोई पहले का कर्म ही उसके पीछे होता है, जब राजा उन्हें दण्ड देते हैं।

श्लोक 49 (13.223.49)

देवि कर्म कृतं चैषां हेतुर्भवति शासने । अपराधापदेशेन राजा दण्डयति प्रजाः ॥

devi karma kṛtaṃ caiṣāṃ heturbhavati śāsane | aparādhāpadeśena rājā daṇḍayati prajāḥ

हे देवी! उनका पहले किया हुआ कर्म ही दण्ड-विधान में कारण होता है। अपराध के बहाने से राजा प्रजा को दण्ड देता है।

श्लोक 50 (13.223.50)

इह लोके व्यवस्थार्थं राजभिर्दण्डनं स्मृतम् । उद्वेजनार्थं शेषाणामपराधं तमुद्दिशन् ॥

iha loke vyavasthārthaṃ rājabhirdaṇḍanaṃ smṛtam | udvejanārthaṃ śeṣāṇāmaparādhaṃ tamuddiśan

इस लोक में व्यवस्था बनाए रखने के लिए राजाओं का दण्ड विहित है, और उस अपराध को निमित्त बनाकर शेष लोगों को सचेत करने के लिए भी।

श्लोक 51 (13.223.51)

पुराकृतफलं दण्डो दण्ड्यमानस्य तद्ध्रुवम् । प्रागेव च मया प्रोक्तं तत्र निःसंशया भव ॥

purākṛtaphalaṃ daṇḍo daṇḍyamānasya taddhruvam | prāgeva ca mayā proktaṃ tatra niḥsaṃśayā bhava

दण्ड पाने वाले का दण्ड निश्चय ही उसके पहले किए कर्म का फल है। यह मैं पहले ही कह चुका हूँ; इस विषय में निःशंक हो जाओ।

उमोवाच

श्लोक 52 (13.223.52)

भगवन्भुवि मर्त्यानां दण्डितानां नरेश्वरैः । दण्डेनैव तु तेनेह पापनाशो भवेन्न वा ॥

bhagavanbhuvi martyānāṃ daṇḍitānāṃ nareśvaraiḥ | daṇḍenaiva tu teneha pāpanāśo bhavenna vā

हे भगवन्! पृथ्वी पर जिन मनुष्यों को राजाओं ने दण्ड दिया, क्या उसी दण्ड से यहाँ उनके पाप का नाश हो जाता है, या नहीं?

श्लोक 53 (13.223.53)

एतन्मया संशयितं तद्भवांश्छेत्तुमर्हति ॥

etanmayā saṃśayitaṃ tadbhavāṃśchettumarhati

यही मैंने शंका की है; आप इसे दूर करें।

महेश्वर उवाच

श्लोक 54 (13.223.54)

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्वं समाहिता ॥

sthāne saṃśayitaṃ devi śṛṇu tatvaṃ samāhitā

हे देवी! तुमने ठीक ही शंका की। ध्यान से सत्य सुनो।

श्लोक 55 (13.223.55)

ये नृपैर्दण्डिता भूमावपराधापदेशतः । यमलोके न दण्ड्यन्ते तत्र ते यमदण्डनैः ॥

ye nṛpairdaṇḍitā bhūmāvaparādhāpadeśataḥ | yamaloke na daṇḍyante tatra te yamadaṇḍanaiḥ

जिन्हें राजाओं ने पृथ्वी पर अपराध के बहाने दण्ड दिया है, उन्हें यमलोक में यम के दण्ड देने वाले फिर दण्ड नहीं देते।

श्लोक 56 (13.223.56)

अदण्डिता वा ये मिथ्या मिथ्या वा दण्डिता भुवि । तान्यमो दण्डयत्येव स हि वेद कृताकृतम् । नातिक्रमेद्यमं कश्चित्कर्म कृत्वेह मानुषः ॥

adaṇḍitā vā ye mithyā mithyā vā daṇḍitā bhuvi | tānyamo daṇḍayatyeva sa hi veda kṛtākṛtam | nātikramedyamaṃ kaścitkarma kṛtveha mānuṣaḥ

पर जो दण्ड से बच गए, या पृथ्वी पर अन्याय से दण्डित हुए, उन्हें यम दण्ड देता ही है, क्योंकि वह किए और न किए को जानता है। यहाँ कर्म करके कोई मनुष्य यम का उल्लंघन नहीं कर सकता।

श्लोक 57 (13.223.57)

राजा यमश्च कुर्वाते दण्डमात्रं तु शोभने । उभाभ्यां यमराजाभ्यां दण्डितोऽदण्डितोपि वा । पश्चात्कर्मफलं भुङ्क्ते नरके मानुषेषु वा ॥

rājā yamaśca kurvāte daṇḍamātraṃ tu śobhane | ubhābhyāṃ yamarājābhyāṃ daṇḍito'daṇḍitopi vā | paścātkarmaphalaṃ bhuṅkte narake mānuṣeṣu vā

हे शोभने! राजा और यम दोनों केवल दण्ड ही देते हैं। राजा और यम दोनों से दण्डित हो या न हो, मनुष्य बाद में अपने कर्म का फल नरक में या मनुष्यों के बीच भोगता है।

श्लोक 58 (13.223.58)

नास्ति कर्मफलच्छेत्ता कश्चिल्लोकत्रयेऽपि च । इति ते कथितं सर्वं निर्विशङ्का भव प्रिये ॥

nāsti karmaphalacchettā kaścillokatraye'pi ca | iti te kathitaṃ sarvaṃ nirviśaṅkā bhava priye

तीनों लोकों में कोई भी कर्मफल को काटने वाला नहीं है। हे प्रिये! इस प्रकार मैंने तुमसे सब कह दिया; निःशंक हो जाओ।

उमोवाच

श्लोक 59 (13.223.59)

किमर्थं दुष्कृतं कृत्वा मानुषा भुवि नित्यशः । पुनस्तत्कर्मनाशाय प्रायश्चित्तानि कुर्वते ॥

kimarthaṃ duṣkṛtaṃ kṛtvā mānuṣā bhuvi nityaśaḥ | punastatkarmanāśāya prāyaścittāni kurvate

मनुष्य पृथ्वी पर बार-बार पाप करके फिर उस कर्म को नष्ट करने के लिए प्रायश्चित्त क्यों करते हैं?

श्लोक 60 (13.223.60)

सर्वपापहरं चेति हयमेधं वदन्ति च । प्रायश्चित्तानि चान्यानि पापनाशाय कुर्वते । तस्मान्मया संशयितं त्वं तच्छेत्तुमिहार्हसि ॥

sarvapāpaharaṃ ceti hayamedhaṃ vadanti ca | prāyaścittāni cānyāni pāpanāśāya kurvate | tasmānmayā saṃśayitaṃ tvaṃ tacchettumihārhasi

कहते हैं कि अश्वमेध सब पापों को हरने वाला है, और पाप के नाश के लिए वे अन्य प्रायश्चित्त भी करते हैं। इसलिए मुझे शंका हुई है; आप उसे दूर करें।

महेश्वर उवाच

श्लोक 61 (13.223.61)

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्वं समाहिता । संशयो हि महानेव पूर्वेषां च मनीषिणाम् ॥

sthāne saṃśayitaṃ devi śṛṇu tatvaṃ samāhitā | saṃśayo hi mahāneva pūrveṣāṃ ca manīṣiṇām

हे देवी! तुमने ठीक ही शंका की। ध्यान से सत्य सुनो। यह शंका पूर्वकाल के मनीषियों की भी बड़ी शंका रही है।

श्लोक 62 (13.223.62)

द्विधा तु क्रियते पापं सद्भिश्चासद्भिरेव च । अभिसन्धाय वा नित्यमन्यथा वा यदृच्छया ॥

dvidhā tu kriyate pāpaṃ sadbhiścāsadbhireva ca | abhisandhāya vā nityamanyathā vā yadṛcchayā

पाप दो प्रकार से किया जाता है, सज्जनों द्वारा भी और दुर्जनों द्वारा भी — या तो जानबूझकर संकल्प के साथ, या अन्यथा अकस्मात्।

श्लोक 63 (13.223.63)

केवलं चाभिसन्धाय संरम्भाच्च करोति यत् । कर्मणस्तस्य नाशस्तु न कथंचन विद्यते ॥

kevalaṃ cābhisandhāya saṃrambhācca karoti yat | karmaṇastasya nāśastu na kathaṃcana vidyate

जो कर्म केवल संकल्प करके और क्रोध के आवेश में किया जाता है, उसका नाश किसी प्रकार नहीं होता।

श्लोक 64 (13.223.64)

अभिसन्धिकृतस्यैव नैव नाशोस्ति कर्मणः । अश्वमेधसहस्रैश्च प्रायश्चित्तशतैरपि ॥

abhisandhikṛtasyaiva naiva nāśosti karmaṇaḥ | aśvamedhasahasraiśca prāyaścittaśatairapi

संकल्पपूर्वक किए गए कर्म का नाश नहीं होता, हजारों अश्वमेधों और सैकड़ों प्रायश्चित्तों से भी नहीं।

श्लोक 65 (13.223.65)

अन्यथा यत्कृतं पापं प्रमादाद्वा यदृच्छया । प्रायश्चित्ताश्वमेधाभ्यां श्रेयसा तत्प्रणश्यति ॥

anyathā yatkṛtaṃ pāpaṃ pramādādvā yadṛcchayā | prāyaścittāśvamedhābhyāṃ śreyasā tatpraṇaśyati

पर जो पाप दूसरे प्रकार से, प्रमाद से या अकस्मात् हुआ हो, वह प्रायश्चित्त, अश्वमेध और पुण्य से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 66 (13.223.66)

लोकसंव्यवहारार्थं प्रायश्चित्तादिरिष्यते । विद्ध्येवं पापके कार्ये निर्विशङ्का भव प्रिये ॥

lokasaṃvyavahārārthaṃ prāyaścittādiriṣyate | viddhyevaṃ pāpake kārye nirviśaṅkā bhava priye

लोक-व्यवहार के लिए प्रायश्चित्त आदि का विधान किया गया है। पाप-कर्म के विषय में ऐसा ही जानो और हे प्रिये! निःशंक हो जाओ।

श्लोक 67 (13.223.67)

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

iti te kathitaṃ devi bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi

हे देवी! मैंने तुम्हें यह बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो?

उमोवाच

श्लोक 68 (13.223.68)

भगवन्देवदेवेश मानुषाश्चेतरा अपि । म्रियन्ते मानुषा लोके कारणाकारणादपि । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

bhagavandevadeveśa mānuṣāścetarā api | mriyante mānuṣā loke kāraṇākāraṇādapi | kena karmavipākena tanme śaṃsitumarhasi

हे भगवन्, देवताओं के देव! मनुष्य और अन्य प्राणी भी संसार में कारण से या बिना कारण के मर जाते हैं। यह किस कर्मफल से होता है? कृपया मुझे बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 69 (13.223.69)

ये पुरा मनुजा देवि कारणाकारणादपि । यथाऽसुभिर्वियुज्यन्ते प्राणिनः प्राणिनिर्दयैः ॥

ye purā manujā devi kāraṇākāraṇādapi | yathā'subhirviyujyante prāṇinaḥ prāṇinirdayaiḥ

हे देवी! जो मनुष्य पूर्वजन्म में कारण से या बिना कारण निर्दयतापूर्वक प्राणियों को उनके प्राणों से अलग करते थे,

श्लोक 70 (13.223.70)

तथैव ते प्राप्नुवन्ति यथैवात्मकृतं फलम् । विषदास्तु विषेणैव शस्त्रैः शस्त्रेण घातकाः ॥

tathaiva te prāpnuvanti yathaivātmakṛtaṃ phalam | viṣadāstu viṣeṇaiva śastraiḥ śastreṇa ghātakāḥ

वे अपने किए का फल वैसे ही पाते हैं — विष देने वाले विष से, और मारने वाले शस्त्र से।

श्लोक 71 (13.223.71)

एवमेव यथा लोके मानुषान्घ्नन्ति मानुषाः । कारणेनैव तेनाथ तथा स्वप्राणनाशनम् । प्राप्नुवन्ति पुनर्देवि नास्ति तत्र विचारणा ॥

evameva yathā loke mānuṣānghnanti mānuṣāḥ | kāraṇenaiva tenātha tathā svaprāṇanāśanam | prāpnuvanti punardevi nāsti tatra vicāraṇā

जैसे संसार में मनुष्य मनुष्यों को मारते हैं, उसी कारण से वे बाद में अपने प्राणों का नाश पाते हैं। हे देवी! इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 72 (13.223.72)

इति ते कथितं सर्वं कर्मपाकफलं प्रिये । भूयस्तव समासेन कथयिष्यामि तच्छृणु ॥

iti te kathitaṃ sarvaṃ karmapākaphalaṃ priye | bhūyastava samāsena kathayiṣyāmi tacchṛṇu

हे प्रिये! इस प्रकार मैंने कर्म के परिपाक का सारा फल तुम्हें कह दिया। अब संक्षेप में और कुछ कहूँगा; उसे सुनो।

श्लोक 73 (13.223.73)

सत्यप्रमाणकरणान्नित्यमव्यभिचारि च । यैः पुरा मनुजैर्देवि यस्मिन्काले यथा कृतम् ॥

satyapramāṇakaraṇānnityamavyabhicāri ca | yaiḥ purā manujairdevi yasminkāle yathā kṛtam

यह सत्य, प्रमाणित और कभी न चूकने वाला है कि पूर्वकाल में जिन मनुष्यों ने जिस समय और जिस प्रकार

श्लोक 74 (13.223.74)

येनैव कारणेनापि कर्म यत्तु शुभाशुभम् । तस्मिन्काले तथा देवि कारणेनैव तेन तु ॥

yenaiva kāraṇenāpi karma yattu śubhāśubham | tasminkāle tathā devi kāraṇenaiva tena tu

और जिस कारण से जो शुभ या अशुभ कर्म किया, हे देवी! उसी समय और उसी कारण से

श्लोक 75 (13.223.75)

प्राप्नुवन्ति नराः प्रेत्य निःसन्देहं शुभाशुभम् । इति सत्यं प्रजानीहि लोके तत्र विधिं प्रति ॥

prāpnuvanti narāḥ pretya niḥsandehaṃ śubhāśubham | iti satyaṃ prajānīhi loke tatra vidhiṃ prati

मनुष्य मरने के बाद निःसन्देह उस शुभ या अशुभ को पाते हैं। लोक के इस विधान के विषय में इसे सत्य जानो।

श्लोक 76 (13.223.76)

कर्मकर्ता नरो भोक्ता स नास्ति दिवि वा भुवि । न शक्यं कर्म चाभोक्तुं सदेवासुरमानुषैः ॥

karmakartā naro bhoktā sa nāsti divi vā bhuvi | na śakyaṃ karma cābhoktuṃ sadevāsuramānuṣaiḥ

जो मनुष्य कर्म करता है, वही उसका भोक्ता है; स्वर्ग या पृथ्वी पर ऐसा कोई नहीं जो इससे भिन्न हो। देवता, असुर और मनुष्य मिलकर भी कर्म को बिना भोगे नहीं रह सकते।

श्लोक 77 (13.223.77)

कर्मणा ग्रथितो लोक आदिप्रभृति वर्तते । एतदुद्देशतः प्रोक्तं कर्मपाकफलं प्रति ॥

karmaṇā grathito loka ādiprabhṛti vartate | etaduddeśataḥ proktaṃ karmapākaphalaṃ prati

यह संसार आदि से ही कर्मों से गुँथा हुआ चला आ रहा है। कर्म-परिपाक के फल के विषय में यह संक्षेप में कहा गया।

श्लोक 78 (13.223.78)

यदन्यच्च मया नोक्तं यस्मिंस्ते कर्मसङ्ग्रहे । बुद्धितर्केण तत्सर्वं तथा वेदितुमर्हसि । कथितं श्रोतुकामाया भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥

yadanyacca mayā noktaṃ yasmiṃste karmasaṅgrahe | buddhitarkeṇa tatsarvaṃ tathā veditumarhasi | kathitaṃ śrotukāmāyā bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi

इस कर्म-संग्रह के विषय में जो और कुछ मैंने नहीं कहा, उसे तुम अपनी बुद्धि और विचार से समझ सकती हो। सुनने की इच्छुक तुमसे मैंने कह दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?

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