अनुशासन पर्व · अध्याय 225
ग्रह, मृत्यु और दीर्घायु
उमा पूछती हैं कि क्या ग्रह-नक्षत्र ही मनुष्यों के कर्म कराते हैं। महेश्वर उत्तर देते हैं कि वे केवल शुभ-अशुभ की सूचना देते हैं; हर कर्म कर्ता का अपना है। वे समझाते हैं कि पृथ्वी पर शुभ और अशुभ कर्मों का फल साथ-साथ भोगा जाता है, जबकि स्वर्ग और नरक में एक ही प्रकार का फल रहता है। फिर वे बताते हैं कि काल से जर्जर शरीर को कर्म के क्षय पर आत्मा छोड़ देती है तो मृत्यु होती है, और वे उस आचरण का वर्णन करते हैं जिससे दीर्घायु मिलती है और जिससे आयु घटती है।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.225.1)
भगवन्भगनेत्रघ्न मानुषाणां विचेष्टितम् । सर्वमात्मकृतं चेति श्रुतं मे भगवन्मतम् ॥
bhagavanbhaganetraghna mānuṣāṇāṃ viceṣṭitam | sarvamātmakṛtaṃ ceti śrutaṃ me bhagavanmatam
हे भगवन्, भग के नेत्र नष्ट करने वाले! मैंने आपका यह मत सुना है कि मनुष्यों की सारी चेष्टा उनकी अपनी ही की हुई है।
श्लोक 2 (13.225.2)
लोके ग्रहकृतं सर्वं मत्वा कर्म शुभाशुभम् । तदेव ग्रहनक्षत्रं प्रायशः पर्युपासते । एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि ॥
loke grahakṛtaṃ sarvaṃ matvā karma śubhāśubham | tadeva grahanakṣatraṃ prāyaśaḥ paryupāsate | eṣa me saṃśayo deva taṃ me tvaṃ chettumarhasi
फिर भी लोग संसार के सारे शुभ-अशुभ कर्म को ग्रहों का किया हुआ मानकर प्रायः उन्हीं ग्रहों और नक्षत्रों की उपासना करते हैं। हे देव! यही मेरी शंका है; आप इसे दूर कीजिए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 3 (13.225.3)
स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्वविनिश्चयम् ॥
sthāne saṃśayitaṃ devi śṛṇu tatvaviniścayam
हे देवी! तुमने ठीक ही शंका की। निश्चित तत्त्व सुनो।
श्लोक 4 (13.225.4)
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव शुभाशुभनिवेदकाः । मानवानां महाभागे न तु कर्मकराः स्वयम् ॥
nakṣatrāṇi grahāścaiva śubhāśubhanivedakāḥ | mānavānāṃ mahābhāge na tu karmakarāḥ svayam
हे महाभागे! नक्षत्र और ग्रह मनुष्यों को केवल शुभ और अशुभ की सूचना देने वाले हैं; वे स्वयं कर्म करने वाले नहीं हैं।
श्लोक 5 (13.225.5)
प्रजानां तु हितार्थाय शुभाशुभविधिं प्रति । अनागतमतिक्रान्तं ज्योतिश्चक्रेण बोध्यते ॥
prajānāṃ tu hitārthāya śubhāśubhavidhiṃ prati | anāgatamatikrāntaṃ jyotiścakreṇa bodhyate
प्राणियों के हित के लिए शुभ और अशुभ की गति के विषय में आने वाली और बीत चुकी बातें ज्योतिश्चक्र के द्वारा जतायी जाती हैं।
श्लोक 6 (13.225.6)
किन्तु तत्र शुभं कर्म सुग्रहैस्तु निवेद्यते । दुष्कृतस्याशुभैरेव समवायो भवेदिति ॥
kintu tatra śubhaṃ karma sugrahaistu nivedyate | duṣkṛtasyāśubhaireva samavāyo bhavediti
किन्तु इसमें शुभ कर्म की सूचना शुभ ग्रहों से मिलती है, और दुष्कर्म करने वाले के अशुभ का अशुभ ग्रहों के साथ मेल होता है।
श्लोक 7 (13.225.7)
तस्मात्तु ग्रहवैषम्ये विषमं कुरुते जनः । ग्रहसाम्ये शुभं कुर्याज्ज्ञात्वाऽऽत्मानं तथा कृतम् ॥
tasmāttu grahavaiṣamye viṣamaṃ kurute janaḥ | grahasāmye śubhaṃ kuryājjñātvā''tmānaṃ tathā kṛtam
इसलिए ग्रहों के विषम होने पर लोग विषम कर्म करते हैं; ग्रहों के अनुकूल होने पर अपने को और अपने किए को जानकर शुभ कर्म करना चाहिए।
श्लोक 8 (13.225.8)
केवलं ग्रहनक्षत्रं न करोति शुभाशुभम् । सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादो ग्रहा इति ॥
kevalaṃ grahanakṣatraṃ na karoti śubhāśubham | sarvamātmakṛtaṃ karma lokavādo grahā iti
केवल ग्रह-नक्षत्र शुभ या अशुभ नहीं करते। सब कुछ अपना ही किया हुआ कर्म है; "यह ग्रहों का है" यह तो लोगों की कहावत भर है।
श्लोक 9 (13.225.9)
पृथग्ग्रहाः पृथक्कर्ता कर्ता स्वं भुञ्जते फलम् । इति ते कथितं सर्वं विशङ्कां जहि शोभने ॥
pṛthaggrahāḥ pṛthakkartā kartā svaṃ bhuñjate phalam | iti te kathitaṃ sarvaṃ viśaṅkāṃ jahi śobhane
ग्रह अलग हैं और कर्ता अलग; कर्ता अपना ही फल भोगता है। हे शोभने! इस प्रकार मैंने तुम्हें सब कह दिया; शंका त्याग दो।
उमोवाच
श्लोक 10 (13.225.10)
भगवन्विविधं कर्म कृत्वा जन्तुः शुभाशुभम् । किं तयोः पूर्वकतरं भुङ्क्ते जन्मान्तरे पुनः । एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि ॥
bhagavanvividhaṃ karma kṛtvā jantuḥ śubhāśubham | kiṃ tayoḥ pūrvakataraṃ bhuṅkte janmāntare punaḥ | eṣa me saṃśayo deva taṃ me tvaṃ chettumarhasi
हे भगवन्! जीव अनेक प्रकार के शुभ और अशुभ कर्म करके अगले जन्म में उन दोनों में से पहले किसका फल भोगता है? हे देव! यही मेरी शंका है; आप इसे दूर कीजिए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 11 (13.225.11)
स्थाने संशयितं देवि तत्ते वक्ष्यामि तत्वतः । अशुभं पूर्वमित्याहुरपरे शुभमित्यपि ॥
sthāne saṃśayitaṃ devi tatte vakṣyāmi tatvataḥ | aśubhaṃ pūrvamityāhurapare śubhamityapi
हे देवी! तुमने ठीक ही शंका की; मैं तुम्हें इसका तत्त्व बताऊँगा। कुछ लोग कहते हैं कि अशुभ पहले आता है, दूसरे कहते हैं कि शुभ।
श्लोक 12 (13.225.12)
मिथ्या तदुभयं प्रोक्तं केवलं तद्ब्रवीमि ते ॥
mithyā tadubhayaṃ proktaṃ kevalaṃ tadbravīmi te
ये दोनों बातें मिथ्या कही गई हैं। मैं तुम्हें केवल यथार्थ बताता हूँ।
श्लोक 13 (13.225.13)
मानुषे तु पदे कर्म युगपद्भुज्यते सदा । यथाकृतं यथायोगमुभयं भुज्यते क्रमात् ॥
mānuṣe tu pade karma yugapadbhujyate sadā | yathākṛtaṃ yathāyogamubhayaṃ bhujyate kramāt
मनुष्य की अवस्था में कर्म सदा साथ-साथ भोगे जाते हैं; जैसा किया गया और जैसा उचित हो, दोनों क्रम से भोगे जाते हैं।
श्लोक 14 (13.225.14)
भुञ्जानाश्चापि दृश्यन्ते क्रमशो भुवि मानवाः । ऋद्धिं हानिं सुखं दुःखं तत्सर्वमुभयं भयम् ॥
bhuñjānāścāpi dṛśyante kramaśo bhuvi mānavāḥ | ṛddhiṃ hāniṃ sukhaṃ duḥkhaṃ tatsarvamubhayaṃ bhayam
पृथ्वी पर मनुष्य क्रम से उन्हें भोगते दिखाई देते हैं — समृद्धि और हानि, सुख और दुःख; वह सब, दोनों साथ, और भय भी।
श्लोक 15 (13.225.15)
दुःखान्यनुभवन्त्याढ्या दरिद्राश्च सुखानि च । यौगपद्याद्धि भुञ्जाना दृश्यन्ते लोकसाक्षिकम् ॥
duḥkhānyanubhavantyāḍhyā daridrāśca sukhāni ca | yaugapadyāddhi bhuñjānā dṛśyante lokasākṣikam
धनी लोग दुःख अनुभव करते हैं और निर्धन सुख; सारा संसार साक्षी है कि वे दोनों को एक साथ भोगते दिखाई देते हैं।
श्लोक 16 (13.225.16)
नरके स्वर्गलोके च न तथा संस्थितिः प्रिये । नित्यं दुःखं हि नरके स्वर्गे नित्यं सुखं तथा ॥
narake svargaloke ca na tathā saṃsthitiḥ priye | nityaṃ duḥkhaṃ hi narake svarge nityaṃ sukhaṃ tathā
हे प्रिये! नरक और स्वर्गलोक में ऐसी स्थिति नहीं है। नरक में निरन्तर दुःख है और स्वर्ग में निरन्तर सुख।
श्लोक 17 (13.225.17)
शुभाशुभानामाधिक्यं कर्मणां तत्र सेव्यते । निरन्तरं सुखं दुःखं स्वर्गे च नरके भवेत् ॥
śubhāśubhānāmādhikyaṃ karmaṇāṃ tatra sevyate | nirantaraṃ sukhaṃ duḥkhaṃ svarge ca narake bhavet
वहाँ शुभ या अशुभ कर्मों की अधिकता का ही भोग होता है। स्वर्ग में सुख और नरक में दुःख निरन्तर रहता है।
श्लोक 18 (13.225.18)
तत्रापि सुमहद्भुक्त्वा पूर्वमल्पं पुनः शुभे । एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
tatrāpi sumahadbhuktvā pūrvamalpaṃ punaḥ śubhe | etatte sarvamākhyātaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
वहाँ भी पहले बहुत बड़े भाग को भोगकर फिर छोटे भाग को शुभ अवस्था में भोगा जाता है। यह सब तुमसे कह दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?
उमोवाच
श्लोक 19 (13.225.19)
भगवन्प्राणिनो लोके म्रियन्ते केन हेतुना । जाताजाता न तिष्ठन्ति तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavanprāṇino loke mriyante kena hetunā | jātājātā na tiṣṭhanti tanme śaṃsitumarhasi
हे भगवन्! संसार में प्राणी किस कारण मरते हैं? बार-बार जन्म लेकर भी वे टिकते नहीं। यह मुझे बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 20 (13.225.20)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सत्यं समाहिता । आत्मा कर्मक्षयाद्देहं यथा मुञ्चति तच्छृणु ॥
tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu satyaṃ samāhitā | ātmā karmakṣayāddehaṃ yathā muñcati tacchṛṇu
मैं तुम्हें वह बताऊँगा। ध्यान से सत्य सुनो — कर्म के क्षय होने पर आत्मा जिस प्रकार देह को छोड़ती है, वह सुनो।
श्लोक 21 (13.225.21)
शरीरात्मसमाहारो जन्तुरित्यभिधीयते । तत्रात्मानं नित्यमाहुरनित्यं क्षेत्रमुच्यते ॥
śarīrātmasamāhāro janturityabhidhīyate | tatrātmānaṃ nityamāhuranityaṃ kṣetramucyate
शरीर और आत्मा का संयोग ही प्राणी कहलाता है। उनमें आत्मा को नित्य कहते हैं, और क्षेत्र अर्थात् शरीर को अनित्य कहा जाता है।
श्लोक 22 (13.225.22)
एवं कालेन सङ्क्रान्तं शरीरं जर्झरीकृतम् । अकर्मयोग्यं संशीर्णं त्यक्त्वा देही ततो व्रजेत् ॥
evaṃ kālena saṅkrāntaṃ śarīraṃ jarjharīkṛtam | akarmayogyaṃ saṃśīrṇaṃ tyaktvā dehī tato vrajet
इस प्रकार काल से जकड़ा हुआ शरीर जर्जर हो जाता है; वह कर्म के अयोग्य और बिखरता हुआ देह छोड़कर देहधारी आगे चला जाता है।
श्लोक 23 (13.225.23)
नित्यस्यानित्यसंत्यागाल्लोके तन्मरणं विदुः । कालं नातिक्रमेरन्हि सदेवासुरमानवाः ॥
nityasyānityasaṃtyāgālloke tanmaraṇaṃ viduḥ | kālaṃ nātikrameranhi sadevāsuramānavāḥ
नित्य के द्वारा अनित्य के त्याग को ही लोग मृत्यु कहते हैं। देवता, असुर और मनुष्य कोई भी काल का उल्लंघन नहीं कर सकते।
श्लोक 24 (13.225.24)
यथाऽऽकाशे न तिष्ठेत द्रव्यं किञ्चिदचेतनम् । तथा धावति कालोऽयं क्षणं किञ्चिन्न तिष्ठति ॥
yathā''kāśe na tiṣṭheta dravyaṃ kiñcidacetanam | tathā dhāvati kālo'yaṃ kṣaṇaṃ kiñcinna tiṣṭhati
जैसे आकाश में कोई जड़ वस्तु ठहर नहीं सकती, वैसे ही यह काल दौड़ता रहता है; क्षण भर भी नहीं ठहरता।
श्लोक 25 (13.225.25)
स पुनर्जायतेऽन्यत्र शरीरं नवमाविशन् । एवंलोकगतिर्नित्यमादिप्रभृति वर्तते ॥
sa punarjāyate'nyatra śarīraṃ navamāviśan | evaṃlokagatirnityamādiprabhṛti vartate
वह दूसरी जगह नया शरीर धारण करके फिर जन्म लेता है। इसी प्रकार संसार की गति आदि से चली आ रही है।
उमोवाच
श्लोक 26 (13.225.26)
भगवन्प्राणिनो बाला दृश्यन्ते मरणं गताः । अतिवृद्धाश्च जीवन्तो दृश्यन्ते चिरजीविनः ॥
bhagavanprāṇino bālā dṛśyante maraṇaṃ gatāḥ | ativṛddhāśca jīvanto dṛśyante cirajīvinaḥ
हे भगवन्! प्राणियों में बालक मरते दिखाई देते हैं, और अति वृद्ध लोग बहुत समय तक जीते दिखाई देते हैं।
श्लोक 27 (13.225.27)
केवलं कालमरणं न प्रमाणं महेश्वर । तस्मान्मे संशयं ब्रूहि प्राणिनां जीवकारणम् ॥
kevalaṃ kālamaraṇaṃ na pramāṇaṃ maheśvara | tasmānme saṃśayaṃ brūhi prāṇināṃ jīvakāraṇam
हे महेश्वर! केवल काल से मृत्यु होना प्रमाण नहीं है। इसलिए मेरी शंका दूर कीजिए और प्राणियों के जीवन का कारण बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 28 (13.225.28)
शृणु तत्कारणं देवि निर्णयस्त्वेक एव सः । जीर्णत्वमात्रं कुरुते कालो देहं न पातयेत् ॥
śṛṇu tatkāraṇaṃ devi nirṇayastveka eva saḥ | jīrṇatvamātraṃ kurute kālo dehaṃ na pātayet
हे देवी! उसका कारण सुनो; इसका निर्णय एक ही है। काल केवल जीर्णता लाता है; वह देह को गिराता नहीं।
श्लोक 29 (13.225.29)
जीर्णे कर्मणि संघातः स्वयमेव विशीर्यते । पूर्वकर्मप्रमाणेन जीवितं मृत्युरेव वा ॥
jīrṇe karmaṇi saṃghātaḥ svayameva viśīryate | pūrvakarmapramāṇena jīvitaṃ mṛtyureva vā
कर्म के जीर्ण होने पर यह संघात अपने आप बिखर जाता है। जीवन या मृत्यु पूर्वकर्म के परिमाण के अनुसार होती है।
श्लोक 30 (13.225.30)
यावत्पूर्वकृतं कर्म तावज्जीवति मानवः । तत्र कर्मवशाद्बाला म्रियन्ते कालसंक्षयात् ॥
yāvatpūrvakṛtaṃ karma tāvajjīvati mānavaḥ | tatra karmavaśādbālā mriyante kālasaṃkṣayāt
पहले किया हुआ कर्म जब तक रहता है, तब तक मनुष्य जीता है। उनमें बालक कर्म के वश काल के क्षीण होने पर मर जाते हैं।
श्लोक 31 (13.225.31)
चिरं जीवन्ति वृद्धाश्च तथा कर्मप्रमाणतः । इति ते कथितं देवि निर्विशङ्का भव प्रिये ॥
ciraṃ jīvanti vṛddhāśca tathā karmapramāṇataḥ | iti te kathitaṃ devi nirviśaṅkā bhava priye
और वृद्ध भी कर्म के परिमाण के अनुसार ही देर तक जीते हैं। हे देवी! मैंने तुम्हें यह कह दिया; हे प्रिये! निःशंक हो जाओ।
उमोवाच
श्लोक 32 (13.225.32)
भगवन्केन वृत्तेन भवन्ति चिरजीविनः । अल्पायुषो नराः केन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavankena vṛttena bhavanti cirajīvinaḥ | alpāyuṣo narāḥ kena tanme śaṃsitumarhasi
हे भगवन्! किस आचरण से मनुष्य दीर्घायु होते हैं, और किससे अल्पायु? यह मुझे बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 33 (13.225.33)
शृणु तत्सर्वमखिलं गुह्यं पथ्यतरं नृणाम् । येन वृत्तेन सम्पन्ना भवन्ति चिरजीविनः ॥
śṛṇu tatsarvamakhilaṃ guhyaṃ pathyataraṃ nṛṇām | yena vṛttena sampannā bhavanti cirajīvinaḥ
वह सब पूरा सुनो, जो मनुष्यों के लिए अत्यन्त हितकर रहस्य है — जिस आचरण से वे दीर्घजीवी होते हैं।
श्लोक 34 (13.225.34)
अहिंसा सत्यवचनमक्रोधः क्षान्तिरार्जवम् । गुरूणां नित्यशुश्रूषा वृद्धानामपि पूजनम् ॥
ahiṃsā satyavacanamakrodhaḥ kṣāntirārjavam | gurūṇāṃ nityaśuśrūṣā vṛddhānāmapi pūjanam
अहिंसा, सत्य वचन, क्रोध का अभाव, क्षमा, सरलता, गुरुजनों की निरन्तर सेवा और वृद्धों का सम्मान,
श्लोक 35 (13.225.35)
शौचादकार्यसंत्यागात्सदा पथ्यस्य भोजनम् । एवमादिगुणं वृत्तं नराणां दीर्घजीविनाम् ॥
śaucādakāryasaṃtyāgātsadā pathyasya bhojanam | evamādiguṇaṃ vṛttaṃ narāṇāṃ dīrghajīvinām
पवित्रता, न करने योग्य कार्यों का त्याग और सदा हितकर भोजन — ऐसे गुणों वाला आचरण दीर्घजीवी मनुष्यों का होता है।
श्लोक 36 (13.225.36)
तपसा ब्रह्मचर्येण रसायननिषेवणात् । उदग्रसत्त्वा बलिनो भवन्ति चिरजीविनः । स्वर्गे वा मानुषे वाऽपि चिरं तिष्ठन्ति धार्मिकाः ॥
tapasā brahmacaryeṇa rasāyananiṣevaṇāt | udagrasattvā balino bhavanti cirajīvinaḥ | svarge vā mānuṣe vā'pi ciraṃ tiṣṭhanti dhārmikāḥ
तप, ब्रह्मचर्य और रसायन के सेवन से मनुष्य उत्कृष्ट सत्त्व वाले और बलवान होकर दीर्घजीवी होते हैं। धार्मिक लोग स्वर्ग में या मनुष्यों के बीच बहुत समय तक रहते हैं।
श्लोक 37 (13.225.37)
अपरे पापकर्माणः प्रायशोऽनृतवादिनः । हिंसाप्रिया गुरुद्विष्टा निष्क्रियाः शौचवर्जिताः ॥
apare pāpakarmāṇaḥ prāyaśo'nṛtavādinaḥ | hiṃsāpriyā gurudviṣṭā niṣkriyāḥ śaucavarjitāḥ
दूसरे लोग पापकर्म करने वाले, प्रायः झूठ बोलने वाले, हिंसा-प्रिय, गुरुओं से द्वेष रखने वाले, कर्म से रहित और शुद्धि से हीन होते हैं,
श्लोक 38 (13.225.38)
नास्तिका घोरकर्माणः सततं मांसपानपाः । पापाचारा गुरुद्विष्टाः कोपनाः कलहप्रियाः ॥
nāstikā ghorakarmāṇaḥ satataṃ māṃsapānapāḥ | pāpācārā gurudviṣṭāḥ kopanāḥ kalahapriyāḥ
नास्तिक, भयंकर कर्म करने वाले, सदा मद्य और मांस का सेवन करने वाले, पापाचारी, गुरुओं से द्वेष रखने वाले, क्रोधी और कलहप्रिय होते हैं;
श्लोक 39 (13.225.39)
एवमेवाशुभाचारास्तिष्ठन्ति नरके चिरम् । तिर्यग्योनौ तथाऽत्यन्तमल्पास्तिष्ठन्ति मानवाः । तस्मादल्पायुषो मर्त्यास्तादृशाः सम्भवन्ति ते ॥
evamevāśubhācārāstiṣṭhanti narake ciram | tiryagyonau tathā'tyantamalpāstiṣṭhanti mānavāḥ | tasmādalpāyuṣo martyāstādṛśāḥ sambhavanti te
इस प्रकार अशुभ आचरण वाले लोग बहुत समय तक नरक में रहते हैं। पशु-योनि में भी वे बहुत समय रहते हैं, पर मनुष्य होकर थोड़े समय ही टिकते हैं। इसीलिए वैसे मनुष्य अल्पायु होकर जन्म लेते हैं।
श्लोक 40 (13.225.40)
अगम्यदेशगमनादपथ्यानां च भोजनात् । आयुःक्षयो भवेन्नॄणामायुःक्षयकरा हि ते ॥
agamyadeśagamanādapathyānāṃ ca bhojanāt | āyuḥkṣayo bhavennṝṇāmāyuḥkṣayakarā hi te
न जाने योग्य स्थानों में जाने और अहितकर भोजन करने से मनुष्यों की आयु का क्षय होता है; वे ही आयु घटाने वाले कारण हैं।
श्लोक 41 (13.225.41)
भवन्त्यल्पायुषस्तैस्तैरन्यथा चिरजीविनः । एतत्ते कथितं सर्वं भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
bhavantyalpāyuṣastaistairanyathā cirajīvinaḥ | etatte kathitaṃ sarvaṃ bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi
इन-इन कारणों से वे अल्पायु होते हैं, और अन्यथा दीर्घजीवी। यह सब तुमसे कह दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?