अनुशासन पर्व · अध्याय 226
आत्मा न स्त्री है, न पुरुष
उमा पूछती हैं कि स्त्री और पुरुष के प्राण एक ही हैं या अलग-अलग। महेश्वर उत्तर देते हैं कि आत्मा निर्विकार है और उसमें स्त्रीत्व-पुरुषत्व नहीं है; मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार स्त्री या पुरुष होकर जन्म लेता है। सारा कर्म प्रकृति के द्वारा सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों से होता है, जिनके कार्य वे गिनाते हैं; आत्मा स्वयं अकर्ता है। जब उमा पूछती हैं कि शरीर के कट जाने पर आत्मा क्यों चला जाता है, तो वे कहते हैं कि जिस कर्म से वह शरीर टिका था उसके क्षीण होने पर आत्मा उसे छोड़ देता है।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.226.1)
देवदेव महादेव श्रुतं मे भगवन्निदम् । आत्मनो जातिसम्बन्धं ब्रूहि स्त्रीपुरुषान्तरम् ॥
devadeva mahādeva śrutaṃ me bhagavannidam | ātmano jātisambandhaṃ brūhi strīpuruṣāntaram
हे देवों के देव, महादेव, भगवन्! यह मैंने सुन लिया। अब मुझे बताइए कि आत्मा का जन्म से क्या सम्बन्ध है और स्त्री तथा पुरुष में क्या अन्तर है।
श्लोक 2 (13.226.2)
स्त्रीप्राणाः पुरुषप्राणा एकतः पृथगेव वा । एष मे संशयो देव तं मे छेत्तुं त्वमर्हसि ॥
strīprāṇāḥ puruṣaprāṇā ekataḥ pṛthageva vā | eṣa me saṃśayo deva taṃ me chettuṃ tvamarhasi
क्या स्त्री के प्राण और पुरुष के प्राण एक ही हैं, या अलग-अलग? हे देव, यह मेरा संशय है; इसे दूर करना आपके ही योग्य है।
महेश्वर उवाच
श्लोक 3 (13.226.3)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं समाहिता । स्त्रीत्वं पुंस्त्वमिति प्राणे स्थितिर्नास्ति शुभेक्षणे ॥
tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu sarvaṃ samāhitā | strītvaṃ puṃstvamiti prāṇe sthitirnāsti śubhekṣaṇe
वह मैं तुम्हें बताऊँगा; हे सुन्दर नेत्रों वाली, सब ध्यान से सुनो। प्राण में स्त्रीत्व या पुरुषत्व की कोई स्थिति नहीं है।
श्लोक 4 (13.226.4)
निर्विकारः सदैवात्मा स्त्रीत्वं पुंस्त्वं न चात्मनि । कर्मप्रकारेण तथा जात्यां जात्यां प्रजायते ॥
nirvikāraḥ sadaivātmā strītvaṃ puṃstvaṃ na cātmani | karmaprakāreṇa tathā jātyāṃ jātyāṃ prajāyate
आत्मा सदा निर्विकार है; आत्मा में न स्त्रीत्व है, न पुरुषत्व। वह अपने कर्म के प्रकार के अनुसार जन्म-जन्म में उत्पन्न होता है।
श्लोक 5 (13.226.5)
कृत्वा कर्म पुमान्स्त्री वा स्त्री पुमानपि जायते । स्त्रीभावं यत्पुमान्कृत्वा कर्मणा प्रमदा भवेत् ॥
kṛtvā karma pumānstrī vā strī pumānapi jāyate | strībhāvaṃ yatpumānkṛtvā karmaṇā pramadā bhavet
किए हुए कर्म के अनुसार पुरुष स्त्री होकर जन्म लेता है और स्त्री पुरुष होकर। जो पुरुष स्त्री के-से भाव से कर्म करता है, वह उस कर्म से स्त्री हो जाता है।
उमोवाच
श्लोक 6 (13.226.6)
भगवन्सर्वलोकेश कर्मात्मा न करोति चेत् । कोऽन्यः कर्मकरो देहे तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥
bhagavansarvalokeśa karmātmā na karoti cet | ko'nyaḥ karmakaro dehe tanme tvaṃ vaktumarhasi
हे भगवन्, सब लोकों के स्वामी! यदि आत्मा कर्म नहीं करता, तो देह में कर्म करने वाला दूसरा कौन है? कृपया मुझे यह बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 7 (13.226.7)
शृणु भामिनि कर्तारमात्मा हि न च कर्मकृत् । प्रकृत्या गुणयुक्तेन क्रियते कर्म नित्यशः ॥
śṛṇu bhāmini kartāramātmā hi na ca karmakṛt | prakṛtyā guṇayuktena kriyate karma nityaśaḥ
हे भामिनी, कर्ता के विषय में सुनो: आत्मा कर्म करने वाला नहीं है। गुणों से युक्त प्रकृति के द्वारा ही सदा कर्म किया जाता है।
श्लोक 8 (13.226.8)
शरीरं प्राणिनां लोके यथा पित्तकफानिलैः । व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्दोषैस्तथा व्याप्तं त्रिभिर्गुणैः ॥
śarīraṃ prāṇināṃ loke yathā pittakaphānilaiḥ | vyāptamebhistribhirdoṣaistathā vyāptaṃ tribhirguṇaiḥ
जैसे लोक में प्राणियों का शरीर पित्त, कफ और वायु, इन तीन दोषों से व्याप्त है, वैसे ही वह तीन गुणों से व्याप्त है।
श्लोक 9 (13.226.9)
सत्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्वेते शरीरिणः । प्रकाशात्मकमेतेषां सत्वं सततमिष्यते ॥
satvaṃ rajastamaścaiva guṇāstvete śarīriṇaḥ | prakāśātmakameteṣāṃ satvaṃ satatamiṣyate
सत्त्व, रजस् और तमस्, ये देहधारियों के गुण हैं। इनमें सत्त्व को सदा प्रकाश-स्वरूप माना गया है।
श्लोक 10 (13.226.10)
रजो दुःखात्मकं तत्र तमो मोहात्मकं स्मृतम् । त्रिभिरेतैर्गुणैर्युक्तं लोके कर्म प्रवर्तते ॥
rajo duḥkhātmakaṃ tatra tamo mohātmakaṃ smṛtam | tribhiretairguṇairyuktaṃ loke karma pravartate
रजस् दुःख-स्वरूप है और तमस् मोह-स्वरूप कहा गया है। इन तीनों गुणों से युक्त होकर लोक में कर्म चलता है।
श्लोक 11 (13.226.11)
सत्यं प्राणिदया शौचं श्रेयः प्रीतिः क्षमा दमः । एवमादि तथाऽन्यच्च कर्म सात्विकमुच्यते ॥
satyaṃ prāṇidayā śaucaṃ śreyaḥ prītiḥ kṣamā damaḥ | evamādi tathā'nyacca karma sātvikamucyate
सत्य, प्राणियों पर दया, शुचिता, कल्याण, प्रीति, क्षमा, दम और इसी प्रकार के अन्य कर्म सात्त्विक कहे जाते हैं।
श्लोक 12 (13.226.12)
दाक्ष्यं कर्मपरत्वं च लोभो मोहो विधिं प्रति । कलत्रसङ्गो माधुर्यं नित्यमैश्वर्यलुब्धता । रजसश्चोद्भवं चैतत्कर्म नानाविधं सदा ॥
dākṣyaṃ karmaparatvaṃ ca lobho moho vidhiṃ prati | kalatrasaṅgo mādhuryaṃ nityamaiśvaryalubdhatā | rajasaścodbhavaṃ caitatkarma nānāvidhaṃ sadā
कुशलता, कर्म में लगे रहना, लोभ, विधि के विषय में मोह, पत्नी में आसक्ति, मधुरता और ऐश्वर्य की निरन्तर लालसा: यह अनेक प्रकार का कर्म सदा रजस् से उत्पन्न होता है।
श्लोक 13 (13.226.13)
अनृतं चैव पारुष्यं धृतिर्विद्वेषिता भृशम् । हिंसाऽसत्यं च नास्तिक्यं निद्रालस्यभयानि च । तमसश्चोद्भवं चैतत्कर्म पापयुतं तथा ॥
anṛtaṃ caiva pāruṣyaṃ dhṛtirvidveṣitā bhṛśam | hiṃsā'satyaṃ ca nāstikyaṃ nidrālasyabhayāni ca | tamasaścodbhavaṃ caitatkarma pāpayutaṃ tathā
असत्य और कठोरता, तीव्र द्वेष-भाव, हिंसा और मिथ्याचार, नास्तिकता, निद्रा, आलस्य और भय: पाप से युक्त यह कर्म तमस् से उत्पन्न होता है।
श्लोक 14 (13.226.14)
तस्माद्गुणमयः सर्वः कार्यारम्भः शुभाशुभः । तस्मादात्मानमव्यग्रं विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
tasmādguṇamayaḥ sarvaḥ kāryārambhaḥ śubhāśubhaḥ | tasmādātmānamavyagraṃ viddhyakartāramavyayam
इसलिए शुभ या अशुभ सारा कार्य-आरम्भ गुणमय है। इसलिए आत्मा को अविचल, अकर्ता और अविनाशी जानो।
श्लोक 15 (13.226.15)
सात्विकाः पुण्यलोकेषु राजसा मानुषे पदे । तिर्यग्योनौ च नरके तिष्ठेयुस्तामसा नराः ॥
sātvikāḥ puṇyalokeṣu rājasā mānuṣe pade | tiryagyonau ca narake tiṣṭheyustāmasā narāḥ
सात्त्विक लोग पुण्यलोकों में, राजस मनुष्य-योनि में रहते हैं, और तामस मनुष्य पशु-योनियों में तथा नरक में रहेंगे।
उमोवाच
श्लोक 16 (13.226.16)
किमर्थमात्मा भिन्नेऽस्मिन्देहे शस्त्रेण वा हते । स्वयं प्रयास्यति तदा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
kimarthamātmā bhinne'smindehe śastreṇa vā hate | svayaṃ prayāsyati tadā tanme śaṃsitumarhasi
जब यह शरीर टूट जाता है या शस्त्र से मारा जाता है, तब आत्मा अपने-आप क्यों चला जाता है? आप मुझे यह बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 17 (13.226.17)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् । एतन्निर्णायकैश्चापि मुह्यन्ते सूक्ष्मबुद्धिभिः ॥
tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu kalyāṇi kāraṇam | etannirṇāyakaiścāpi muhyante sūkṣmabuddhibhiḥ
वह मैं तुम्हें बताऊँगा; हे कल्याणी, उसका कारण सुनो। सूक्ष्म बुद्धि वाले, इसका निर्णय करने वाले लोग भी इसमें मोह में पड़ जाते हैं।
श्लोक 18 (13.226.18)
कर्मक्षये तु सम्प्राप्ते प्राणिनां जन्मधारिणाम् । उपद्रवो भवेद्देहे येन केनापि हेतुना ॥
karmakṣaye tu samprāpte prāṇināṃ janmadhāriṇām | upadravo bhaveddehe yena kenāpi hetunā
जन्म धारण करने वाले प्राणियों का कर्म जब क्षीण हो जाता है, तब किसी भी कारण से देह में उपद्रव उत्पन्न हो जाता है।
श्लोक 19 (13.226.19)
तन्निमित्तं शरीरी तु शरीरं प्राप्य संक्षयम् । अपयाति परित्यज्य ततः कर्मवशेन सः ॥
tannimittaṃ śarīrī tu śarīraṃ prāpya saṃkṣayam | apayāti parityajya tataḥ karmavaśena saḥ
उसी कारण देहधारी, शरीर को नष्ट होता पाकर, उसे छोड़कर चला जाता है; तब वह कर्म के वश में होता है।
श्लोक 20 (13.226.20)
देहक्षयेपि नैवात्मा वेदनाभिर्न चाल्यते । तिष्ठेत्कर्मफलं यावद्व्रजेत्कर्मक्षये पुनः ॥
dehakṣayepi naivātmā vedanābhirna cālyate | tiṣṭhetkarmaphalaṃ yāvadvrajetkarmakṣaye punaḥ
देह के नष्ट होने पर भी आत्मा वेदनाओं से विचलित नहीं होता। जब तक कर्म का फल रहता है वह रुका रहता है, और कर्म के क्षीण होने पर फिर चला जाता है।
श्लोक 21 (13.226.21)
आदिप्रभृति लोकेऽस्मिन्नेवमात्मगतिः स्मृता । एतत्ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
ādiprabhṛti loke'sminnevamātmagatiḥ smṛtā | etatte kathitaṃ devi kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
लोक के आदि से आत्मा की गति ऐसी ही मानी गई है। हे देवी, यह तुम्हें बता दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?