अनुशासन पर्व · अध्याय 229
यमलोक और मृतकों के मार्ग
उमा महेश्वर से पूछती हैं कि यम के दण्ड और उसके सेवक कैसे हैं और मृतक उसके लोक में कैसे पहुँचते हैं। महेश्वर दक्षिण दिशा में स्थित यम के भवन का वर्णन करते हैं, उन तीन मार्गों (रमणीय, निराबाध और दुर्दर्श) का, जिनसे उत्तम, मध्यम और अधम जीव ले जाए जाते हैं, तथा तीन प्रकार के शरीरों का। यम उत्तम जीवों का सत्कार करके उन्हें स्वर्ग भेजता है, मध्यमों को मनुष्यों में जन्म लेने का आदेश देता है, और अधमों को यातनाओं के हवाले करता है — गड्ढे, असिपत्रवन, वैतरणी नदी, काँटेदार शाल्मली, कुम्भीपाक और आरे — जब तक उनका पाप जल नहीं जाता।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.229.1)
भगवन्सर्वलोकेश त्रिपुरार्दन शङ्कर । कीदृशा यमदण्डास्ते कीदृशाः परिचारकाः ॥
bhagavansarvalokeśa tripurārdana śaṅkara | kīdṛśā yamadaṇḍāste kīdṛśāḥ paricārakāḥ
हे भगवन्, सब लोकों के स्वामी, त्रिपुर का नाश करने वाले शंकर! यम के दण्ड कैसे हैं और उसके सेवक कैसे हैं?
श्लोक 2 (13.229.2)
कथं मृतास्ते गच्छन्ति प्राणिनो यमसादनम् । कीदृशं भवनं तस्य कथं दण्डयति प्रजाः । एतत्सर्वं महादेव श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
kathaṃ mṛtāste gacchanti prāṇino yamasādanam | kīdṛśaṃ bhavanaṃ tasya kathaṃ daṇḍayati prajāḥ | etatsarvaṃ mahādeva śrotumicchāmyahaṃ prabho
मरे हुए प्राणी यम के भवन तक कैसे जाते हैं? उसका भवन कैसा है और वह प्रजा को कैसे दण्ड देता है? हे महादेव, हे प्रभो! यह सब मैं सुनना चाहती हूँ।
महेश्वर उवाच
श्लोक 3 (13.229.3)
शृणु कल्याणि तत्सर्वं यत्ते देवि मनःप्रियम् । दक्षिणस्यां दिशि शुभे यमस्य सदनं महत् ॥
śṛṇu kalyāṇi tatsarvaṃ yatte devi manaḥpriyam | dakṣiṇasyāṃ diśi śubhe yamasya sadanaṃ mahat
हे कल्याणी, हे देवी! जो कुछ तुम्हारे मन को प्रिय है, वह सब सुनो। शुभ दक्षिण दिशा में यम का विशाल भवन है,
श्लोक 4 (13.229.4)
विचित्रं रमणीयं च नानाभावसमन्वितम् । पितृभिः प्रेतसङ्घैश्च यमदूतैश्च सन्ततम् ॥
vicitraṃ ramaṇīyaṃ ca nānābhāvasamanvitam | pitṛbhiḥ pretasaṅghaiśca yamadūtaiśca santatam
जो विचित्र और रमणीय है, अनेक भावों से युक्त है और पितरों, प्रेतों के समूहों तथा यमदूतों से सदा भरा रहता है,
श्लोक 5 (13.229.5)
प्राणिसङ्घैश्च बहुभिः कर्मवश्यैश्च पूरितम् । तत्रास्ते दण्डयन्नित्यं यमो लोकहिते रतः ॥
prāṇisaṅghaiśca bahubhiḥ karmavaśyaiśca pūritam | tatrāste daṇḍayannityaṃ yamo lokahite rataḥ
और कर्मों के वश में पड़े बहुत-से प्राणियों के समूहों से पूर्ण रहता है। वहाँ लोक के हित में लगे हुए यम सदा बैठकर दण्ड देते रहते हैं।
श्लोक 6 (13.229.6)
मायया सततं वेत्ति प्राणिनां यच्छुभाशुभम् । मायया संहरंस्तत्र प्राणिसङ्घान्यतस्ततः ॥
māyayā satataṃ vetti prāṇināṃ yacchubhāśubham | māyayā saṃharaṃstatra prāṇisaṅghānyatastataḥ
वे अपनी माया से प्राणियों के शुभ और अशुभ को सदा जानते रहते हैं और उसी माया से प्राणियों के समूहों को इधर-उधर से समेट लाते हैं।
श्लोक 7 (13.229.7)
तस्य मायामयाः पाशा न वेद्यन्ते सुरासुरैः । को हि मानुषमात्रस्तु देवस्य चरितं महत् ॥
tasya māyāmayāḥ pāśā na vedyante surāsuraiḥ | ko hi mānuṣamātrastu devasya caritaṃ mahat
उनके माया के बने पाश देवताओं और असुरों को भी दिखाई नहीं देते। फिर केवल मनुष्य उस देव के महान चरित को कैसे जान सकता है?
श्लोक 8 (13.229.8)
एवं संवसतस्तस्य यमस्य परिचारकाः । गृहीत्वा सन्नयन्त्येव प्राणिनः क्षीणकर्मणः । येन केनापदेशेन त्वपदेशसमुद्भवाः ॥
evaṃ saṃvasatastasya yamasya paricārakāḥ | gṛhītvā sannayantyeva prāṇinaḥ kṣīṇakarmaṇaḥ | yena kenāpadeśena tvapadeśasamudbhavāḥ
यम के इस प्रकार रहते हुए उसके सेवक उन प्राणियों को, जिनके कर्म क्षीण हो गए हैं, पकड़कर ले आते हैं — किसी न किसी बहाने से, क्योंकि बहाने तो अपने आप ही उत्पन्न हो जाते हैं।
श्लोक 9 (13.229.9)
कर्मणा प्राणिनो लोके उत्तमाधममध्यमाः । यथार्हं तान्समादाय नयन्ति यमसादनम् ॥
karmaṇā prāṇino loke uttamādhamamadhyamāḥ | yathārhaṃ tānsamādāya nayanti yamasādanam
संसार में प्राणी अपने कर्म के अनुसार उत्तम, अधम और मध्यम होते हैं; जो जैसा योग्य होता है, उसे वैसा ही लेकर सेवक यम के भवन तक ले जाते हैं।
श्लोक 10 (13.229.10)
धार्मिकानुत्तमान्विद्धि स्वर्गिणस्ते यथाऽमराः । त्रिषु जन्म लभन्ते ये कर्मणा मध्यमाः स्मृताः । तिर्यङ्नरकगन्तारो ह्यधमास्ते नराधमाः ॥
dhārmikānuttamānviddhi svargiṇaste yathā'marāḥ | triṣu janma labhante ye karmaṇā madhyamāḥ smṛtāḥ | tiryaṅnarakagantāro hyadhamāste narādhamāḥ
धार्मिकों को उत्तम जानो; वे स्वर्ग में देवताओं के समान होते हैं। जो कर्म से मध्यम माने गए हैं, वे तीन प्रकार से जन्म पाते हैं। अधम, नराधम मनुष्य तिर्यक् योनियों और नरक में जाने वाले होते हैं।
श्लोक 11 (13.229.11)
पन्थानस्त्रिविधा दृष्टाः सर्वेषां गतजीविनाम् । रमणीयं निराबाधं दुर्दर्शमिति नामतः ॥
panthānastrividhā dṛṣṭāḥ sarveṣāṃ gatajīvinām | ramaṇīyaṃ nirābādhaṃ durdarśamiti nāmataḥ
जिनके प्राण निकल चुके हैं, उन सबके लिए तीन मार्ग देखे गए हैं — रमणीय, निराबाध और दुर्दर्श, यही उनके नाम हैं।
श्लोक 12 (13.229.12)
रमणीयं तु यन्मार्गं पताकाध्वजसङ्कुलम् । धूपितं सिक्तसंमृष्टं पुष्पमालाभिसङ्कुलम् ॥
ramaṇīyaṃ tu yanmārgaṃ patākādhvajasaṅkulam | dhūpitaṃ siktasaṃmṛṣṭaṃ puṣpamālābhisaṅkulam
जो रमणीय मार्ग है, वह पताकाओं और ध्वजाओं से भरा है, धूप से सुगन्धित है, जल से सींचा और झाड़ा-बुहारा हुआ है और फूलों की मालाओं से सजा है,
श्लोक 13 (13.229.13)
मनोहरं सुखस्पर्शं गच्छतामेव तद्भवेत् । निराबाधं यथालोकं सुप्रशस्तं कृतं भवेत् ॥
manoharaṃ sukhasparśaṃ gacchatāmeva tadbhavet | nirābādhaṃ yathālokaṃ supraśastaṃ kṛtaṃ bhavet
वह मनोहर है और चलने वालों को सुखद स्पर्श देता है। निराबाध मार्ग लोक की रीति से अत्यन्त उत्तम बना हुआ है।
श्लोक 14 (13.229.14)
तृतीयं यत्तु दुर्दर्शं दुर्गन्धि तमसा वृतम् । परुषं शर्कराकीर्णं श्वदंष्ट्राबहुलं भृशम् । किमिकीटसमाकीर्णं भजतामतिदुर्गमम् ॥
tṛtīyaṃ yattu durdarśaṃ durgandhi tamasā vṛtam | paruṣaṃ śarkarākīrṇaṃ śvadaṃṣṭrābahulaṃ bhṛśam | kimikīṭasamākīrṇaṃ bhajatāmatidurgamam
तीसरा दुर्दर्श है — दुर्गन्ध से भरा, अन्धकार से घिरा, कठोर, कंकड़ों से पटा, कुत्तों की दाढ़ों से भरपूर, कीड़े-मकोड़ों से व्याप्त, जिस पर चलने वालों के लिए चलना अत्यन्त कठिन है।
श्लोक 15 (13.229.15)
मार्गैरेवं त्रिभिर्नित्यमुत्तमाधममध्यमान् । सन्नयन्ति यथा काले तन्मे शृणु शुचिस्मिते ॥
mārgairevaṃ tribhirnityamuttamādhamamadhyamān | sannayanti yathā kāle tanme śṛṇu śucismite
इन तीन मार्गों से वे उत्तम, अधम और मध्यम जीवों को समय आने पर ले जाते हैं। हे सुन्दर मुस्कान वाली, यह मुझसे सुनो।
श्लोक 16 (13.229.16)
उत्तमानन्तकाले तु यमदूताः सुसंवृताः । नयन्ति सुखमादाय रमणीयपथेन वै ॥
uttamānantakāle tu yamadūtāḥ susaṃvṛtāḥ | nayanti sukhamādāya ramaṇīyapathena vai
अन्त समय आने पर यमदूत संयत होकर उत्तम जीवों को सुखपूर्वक साथ लेकर रमणीय मार्ग से ले जाते हैं।
उमोवाच
श्लोक 17 (13.229.17)
भगवंस्तत्र चात्मानं त्यक्तदेहं निराश्रयम् । अदृश्यं कथमादाय सन्नयन्ति यमान्तिकम् ॥
bhagavaṃstatra cātmānaṃ tyaktadehaṃ nirāśrayam | adṛśyaṃ kathamādāya sannayanti yamāntikam
हे भगवन्! जिस आत्मा ने देह त्याग दी है, जिसका कोई आश्रय नहीं रहा और जो दिखाई भी नहीं देती, उसे वे यम के पास कैसे ले जाते हैं?
महेश्वर उवाच
श्लोक 18 (13.229.18)
शृणु भामिनि तत्सर्वं त्रिविधं देहकारणम् । कर्मवश्यं भोगवश्यं दुःखवश्यमिति प्रिये ॥
śṛṇu bhāmini tatsarvaṃ trividhaṃ dehakāraṇam | karmavaśyaṃ bhogavaśyaṃ duḥkhavaśyamiti priye
हे भामिनी! वह सब सुनो — देह धारण का कारण तीन प्रकार का है, हे प्रिये: कर्म के वश में, भोग के वश में और दुःख के वश में।
श्लोक 19 (13.229.19)
मानुषं कर्मवश्यं स्याद्द्वितीयं भोगसाधनम् । तृतीयं यातनावश्यं शरीरं मायया कृतम् । यमलोके न चान्यत्र दृश्यते यातनायुतम् ॥
mānuṣaṃ karmavaśyaṃ syāddvitīyaṃ bhogasādhanam | tṛtīyaṃ yātanāvaśyaṃ śarīraṃ māyayā kṛtam | yamaloke na cānyatra dṛśyate yātanāyutam
मनुष्य का शरीर कर्म के वश में होता है, दूसरा भोग का साधन है, और तीसरा यातना के वश में रहने वाला शरीर माया से रचा हुआ है। यातना के योग्य ऐसा शरीर केवल यमलोक में दिखाई देता है, अन्यत्र नहीं।
श्लोक 20 (13.229.20)
शरीरैर्यातनावश्यैर्जीवानामुच्य भामिनि । नयन्ति यामिकास्तत्र प्राणिनो मायया मृतान् ॥
śarīrairyātanāvaśyairjīvānāmucya bhāmini | nayanti yāmikāstatra prāṇino māyayā mṛtān
हे भामिनी! जीवों को यातना के योग्य उन शरीरों में डालकर यमदूत माया से मरे हुए प्राणियों को वहाँ ले जाते हैं।
श्लोक 21 (13.229.21)
मध्यमान्योधवेषेण मध्यमेन पथा तथा ॥
madhyamānyodhaveṣeṇa madhyamena pathā tathā
मध्यम जीवों को वे योद्धाओं का वेश बनाकर और वैसे ही मध्य मार्ग से ले जाते हैं।
श्लोक 22 (13.229.22)
चण्डालवेषास्त्वधमान्गृहीत्वा भर्त्सतर्जनैः । आकर्षन्तस्तथा पाशैर्दुर्दर्शेन नयन्ति तान् ॥
caṇḍālaveṣāstvadhamāngṛhītvā bhartsatarjanaiḥ | ākarṣantastathā pāśairdurdarśena nayanti tān
चाण्डालों का वेश धरे हुए वे अधम जीवों को डाँट-फटकार और धमकियों के साथ पकड़कर पाशों से खींचते हुए दुर्दर्श मार्ग से ले जाते हैं।
श्लोक 23 (13.229.23)
त्रिविधानेवमादाय नयन्ति यमसादनम् । धर्मासनगतं दक्षं भ्राजमानं स्वतेजसा ॥
trividhānevamādāya nayanti yamasādanam | dharmāsanagataṃ dakṣaṃ bhrājamānaṃ svatejasā
इस प्रकार तीनों प्रकार के जीवों को लेकर वे उन्हें यम के भवन में ले जाते हैं, जहाँ धर्मासन पर बैठे, कुशल और अपने तेज से दीप्त यम विराजमान हैं,
श्लोक 24 (13.229.24)
लोकपालं सहाध्यक्षं तथैव परिषद्गतम् । दर्शयन्ति महाभागे यामिकास्तं निवेद्य ते ॥
lokapālaṃ sahādhyakṣaṃ tathaiva pariṣadgatam | darśayanti mahābhāge yāmikāstaṃ nivedya te
जो लोकपाल हैं, अपने अध्यक्ष के साथ सभा में बैठे हैं। हे महाभागे! यमदूत उन्हें निवेदित करके उनके सामने प्रस्तुत करते हैं।
श्लोक 25 (13.229.25)
पूजयन्दण्डयन्कांश्चित्तेषां शृण्वञ्शुभाशुभम् । व्याहृतो बहुसाहस्रैस्तत्रास्ते सततं यमः ॥
pūjayandaṇḍayankāṃścitteṣāṃ śṛṇvañśubhāśubham | vyāhṛto bahusāhasraistatrāste satataṃ yamaḥ
किन्हीं का सत्कार करते, किन्हीं को दण्ड देते और उनके शुभ-अशुभ को सुनते हुए यम वहाँ बहुत-से हजारों गणों से पुकारे जाते हुए सदा बैठे रहते हैं।
श्लोक 26 (13.229.26)
गतानां तु यमस्तेषामुत्तमानभिपूजया । अभिसङ्गृह्य विधिवत्पृष्ट्वा स्वागतकौशलम् । प्रस्तुत्य तत्कृतं तेषां लोकं संदिशते यमः ॥
gatānāṃ tu yamasteṣāmuttamānabhipūjayā | abhisaṅgṛhya vidhivatpṛṣṭvā svāgatakauśalam | prastutya tatkṛtaṃ teṣāṃ lokaṃ saṃdiśate yamaḥ
आए हुए जीवों में जो उत्तम हैं, उनका यम आदर के साथ सत्कार करते हैं, विधिपूर्वक उन्हें अपनाकर कुशल-क्षेम पूछते हैं और उनके किए कर्म की चर्चा करके उन्हें उनका लोक बता देते हैं।
श्लोक 27 (13.229.27)
यमेनैवमनुज्ञाता यान्ति पश्चात्त्रिविष्टपम् ॥
yamenaivamanujñātā yānti paścāttriviṣṭapam
यम से इस प्रकार अनुमति पाकर वे फिर स्वर्ग को चले जाते हैं।
श्लोक 28 (13.229.28)
मध्यमानां यमस्तेषां श्रुत्वा कर्म यथातथम् । जायन्तां मानुषेष्वेव इति संदिशते च तान् ॥
madhyamānāṃ yamasteṣāṃ śrutvā karma yathātatham | jāyantāṃ mānuṣeṣveva iti saṃdiśate ca tān
मध्यम जीवों के कर्म ठीक-ठीक सुनकर यम उन्हें आज्ञा देते हैं कि "मनुष्यों में ही जन्म लो।"
श्लोक 29 (13.229.29)
अधमान्पाशसंयुक्तान्यमो नावेक्षते गतान् । यमस्य पुरुषा घोराश्चण्डालसमदर्शनाः । यातनाः प्रापयन्त्येताँल्लोकपालस्य शासनात् ॥
adhamānpāśasaṃyuktānyamo nāvekṣate gatān | yamasya puruṣā ghorāścaṇḍālasamadarśanāḥ | yātanāḥ prāpayantyetām̐llokapālasya śāsanāt
जो अधम जीव पाशों में बँधे आते हैं, उनकी ओर यम देखते तक नहीं। यम के भयंकर, चाण्डालों-जैसे दिखने वाले पुरुष लोकपाल की आज्ञा से उन्हें यातनाएँ भोगने को पहुँचा देते हैं।
श्लोक 30 (13.229.30)
भिन्दन्तश्च तुदन्तश्च प्रकर्षन्तो यतस्ततः । क्रोशन्तः पातयन्त्येतान्मिथो गर्तेष्ववाङ्मुखान् ॥
bhindantaśca tudantaśca prakarṣanto yatastataḥ | krośantaḥ pātayantyetānmitho garteṣvavāṅmukhān
वे उन्हें चीरते, कोंचते और इधर-उधर घसीटते हुए चिल्लाकर एक-दूसरे के ऊपर औंधे मुँह गड्ढों में गिरा देते हैं।
श्लोक 31 (13.229.31)
संयामिन्यः शिलास्तेषां पतन्ति शिरसि प्रिये । अयोमुखाः कङ्कवला भक्षयन्ति सुदारुणाः ॥
saṃyāminyaḥ śilāsteṣāṃ patanti śirasi priye | ayomukhāḥ kaṅkavalā bhakṣayanti sudāruṇāḥ
हे प्रिये! उनके सिरों पर शिलाएँ गिरती हैं और लोहे की चोंच वाले अत्यन्त भयंकर पक्षी उन्हें खाते हैं।
श्लोक 32 (13.229.32)
असिपत्रवने घोरे चारयन्ति तथा परान् । तीक्ष्णदंष्ट्रास्तथा श्वानः कांश्चित्तत्र ह्यदन्ति वै ॥
asipatravane ghore cārayanti tathā parān | tīkṣṇadaṃṣṭrāstathā śvānaḥ kāṃścittatra hyadanti vai
दूसरों को वे भयानक असिपत्र वन में भटकाते हैं, और तीखी दाढ़ों वाले कुत्ते वहाँ कुछ को खा जाते हैं।
श्लोक 33 (13.229.33)
तत्र वैतरणी नाम नदी ग्राहसमाकुला । दुष्प्रवेशा च घोरा च मूत्रशोणितवाहिनी । तस्यां सम्मज्जयन्त्येते तृषितान्पाययन्ति तान् ॥
tatra vaitaraṇī nāma nadī grāhasamākulā | duṣpraveśā ca ghorā ca mūtraśoṇitavāhinī | tasyāṃ sammajjayantyete tṛṣitānpāyayanti tān
वहाँ वैतरणी नाम की नदी है, जो मगरमच्छों से भरी, भयंकर और जिसमें उतरना कठिन है, और मूत्र तथा रक्त बहाती है। उसमें वे प्यासे जीवों को डुबोते हैं और उन्हें वही पिलाते हैं।
श्लोक 34 (13.229.34)
आरोपयन्ति वै कांश्चित्तत्र कण्टकशल्मलीम् । यन्त्रचक्रेषु तिलवत्पीड्यन्ते तत्र केचन ॥
āropayanti vai kāṃścittatra kaṇṭakaśalmalīm | yantracakreṣu tilavatpīḍyante tatra kecana
वहाँ किन्हीं को वे काँटों वाले शाल्मली वृक्ष पर चढ़ाते हैं; कुछ यन्त्रों के चक्रों में तिल की तरह पेरे जाते हैं।
श्लोक 35 (13.229.35)
अङ्गारेषु च दह्यन्ते तथा दुष्कृतकारिणः । कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते पच्यन्ते सिकतासु वै ॥
aṅgāreṣu ca dahyante tathā duṣkṛtakāriṇaḥ | kumbhīpākeṣu pacyante pacyante sikatāsu vai
पापकर्म करने वाले अंगारों पर जलाए जाते हैं; वे कुम्भीपाक में पकाए जाते हैं और बालू में भी पकाए जाते हैं।
श्लोक 36 (13.229.36)
पाट्यन्ते तरुवच्छस्त्रैः पापिनः क्रकचादिभिः । भिद्यन्ते भागशः शूलैस्तुद्यन्ते सूक्ष्मसूचिभिः ॥
pāṭyante taruvacchastraiḥ pāpinaḥ krakacādibhiḥ | bhidyante bhāgaśaḥ śūlaistudyante sūkṣmasūcibhiḥ
पापी आरे आदि शस्त्रों से वृक्ष की तरह चीरे जाते हैं, शूलों से टुकड़े-टुकड़े किए जाते हैं और बारीक सुइयों से बींधे जाते हैं।
श्लोक 37 (13.229.37)
एवं त्वया कृतं दोषं तदर्थं दण्डनं त्विति । वाचैव घोषयन्ति स्म दण्डमानाः समन्ततः ॥
evaṃ tvayā kṛtaṃ doṣaṃ tadarthaṃ daṇḍanaṃ tviti | vācaiva ghoṣayanti sma daṇḍamānāḥ samantataḥ
"तुमने यह दोष किया था, उसी के लिए यह दण्ड है" — इस प्रकार दण्ड देते हुए वे चारों ओर वाणी से ही घोषणा करते रहते हैं।
श्लोक 38 (13.229.38)
एवं ते यातनां प्राप्य शरीरैर्यातनाशयैः । प्रसहन्तश्च तद्दुःखं स्मरन्तः स्वापराधजम् ॥
evaṃ te yātanāṃ prāpya śarīrairyātanāśayaiḥ | prasahantaśca tadduḥkhaṃ smarantaḥ svāparādhajam
इस प्रकार यातना के योग्य शरीरों में यातनाएँ पाकर, वह दुःख सहते हुए और अपने किए अपराध को याद करते हुए,
श्लोक 39 (13.229.39)
क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च न मुच्यन्ते कथञ्चन । स्मरन्तस्तत्र तप्यन्ते पापमात्मकृतं भृशम् ॥
krośantaśca rudantaśca na mucyante kathañcana | smarantastatra tapyante pāpamātmakṛtaṃ bhṛśam
वे चिल्लाते और रोते हैं, पर किसी तरह छूटते नहीं; अपने ही किए पाप को याद करते हुए वहाँ बहुत जलते हैं।
श्लोक 40 (13.229.40)
एवं बहुविधा दण्डा भुज्यन्ते पापकारिभिः । यातनाभिश्च पच्यन्ते नरकेषु पुनः पुनः ॥
evaṃ bahuvidhā daṇḍā bhujyante pāpakāribhiḥ | yātanābhiśca pacyante narakeṣu punaḥ punaḥ
इस प्रकार पापी अनेक प्रकार के दण्ड भोगते हैं और यातनाओं से नरकों में बार-बार पकाए जाते हैं।
श्लोक 41 (13.229.41)
अपरे यातनां भुक्त्वा मुच्यन्ते तत्र किल्बिषात् । पापदोषक्षयकरा यातनाः संस्मृता नृणाम् । बहुतप्तं यथा लोहममलं तत्तथा भवेत् ॥
apare yātanāṃ bhuktvā mucyante tatra kilbiṣāt | pāpadoṣakṣayakarā yātanāḥ saṃsmṛtā nṛṇām | bahutaptaṃ yathā lohamamalaṃ tattathā bhavet
दूसरे लोग यातनाएँ भोगकर वहाँ पाप से छूट जाते हैं। यातनाएँ मनुष्यों के पाप-दोष को नष्ट करने वाली मानी गई हैं; जैसे बहुत तपाया हुआ लोहा निर्मल हो जाता है, वैसे ही वे भी हो जाते हैं।