अनुशासन पर्व · अध्याय 230
पाँच नरक और पापियों का पुनर्जन्म
उमा के प्रश्न पर महेश्वर पृथ्वी के नीचे के पाँच नरक बताते हैं — रौरव, महारौरव, कण्टकावन, अग्निकुण्ड और पञ्चकष्ट, जो एक के बाद एक अधिक कष्टदायक हैं — और उनमें पड़े जीवों के दुःख का वर्णन करते हैं। वे पापियों के भोग की अवधि, एक लाख वर्ष से आरम्भ करके, और हर नरक में जाने वाले अपराधियों के प्रकार बताते हैं। अन्त में छूटकर वे कृमि, वनस्पति, पशु और पक्षी योनियों में जन्म लेकर फिर मनुष्य-पद पाते हैं। कौन-सा पाप किस योनि में ले जाता है, यह गिनाकर वे कहते हैं कि जैसे बार-बार आग में डाला हुआ लोहा शुद्ध होता है, वैसे ही दुःख से आत्मा शुद्ध होती है, इसलिए मनुष्य-जन्म अत्यन्त दुर्लभ है।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.230.1)
भगवंस्ते कथं तत्र दण्ड्यन्ते नरकेषु वै । कति ते नरका घोराः कीदृशास्ते महेश्वर ॥
bhagavaṃste kathaṃ tatra daṇḍyante narakeṣu vai | kati te narakā ghorāḥ kīdṛśāste maheśvara
हे भगवन्! नरकों में उन्हें किस प्रकार दण्ड दिया जाता है? वे भयंकर नरक कितने हैं और कैसे हैं, हे महेश्वर?
महेश्वर उवाच
श्लोक 2 (13.230.2)
शृणु भामिनि तत्सर्वं पञ्चैते नरकाः स्मृताः । भूमेरधस्ताद्विहिता घोरा दुष्कृतकर्मणाम् ॥
śṛṇu bhāmini tatsarvaṃ pañcaite narakāḥ smṛtāḥ | bhūmeradhastādvihitā ghorā duṣkṛtakarmaṇām
हे भामिनी! वह सब सुनो — पाँच नरक माने गए हैं; वे पृथ्वी के नीचे बने हैं, भयंकर हैं और दुष्कर्म करने वालों के लिए हैं।
श्लोक 3 (13.230.3)
प्रथमं रौरवं नाम शतयोजनमायतम् । तावत्प्रमाणविस्तीर्णं तामसं पापपीडितम् ॥
prathamaṃ rauravaṃ nāma śatayojanamāyatam | tāvatpramāṇavistīrṇaṃ tāmasaṃ pāpapīḍitam
पहला रौरव नामक है, जो सौ योजन लम्बा और उतना ही चौड़ा है, अन्धकारमय है और पापियों को पीड़ा देने वाला है।
श्लोक 4 (13.230.4)
भृशं दुर्गन्धि परुषं क्रिमिभिर्दारुणैर्वृतम् । अतिघोरमनिर्देश्यं प्रतिकूलं ततस्ततः ॥
bhṛśaṃ durgandhi paruṣaṃ krimibhirdāruṇairvṛtam | atighoramanirdeśyaṃ pratikūlaṃ tatastataḥ
वह अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त और कठोर है, भयंकर कीड़ों से ढका है, अति घोर और अवर्णनीय है तथा सब ओर से प्रतिकूल है।
श्लोक 5 (13.230.5)
ते चिरं तत्र तिष्ठन्ति न तत्र शयनासने । क्रिमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च विष्ठागन्धसमायुताः ॥
te ciraṃ tatra tiṣṭhanti na tatra śayanāsane | krimibhirbhakṣyamāṇāśca viṣṭhāgandhasamāyutāḥ
वे वहाँ बहुत समय तक रहते हैं; वहाँ न शय्या है, न आसन। कीड़े उन्हें खाते रहते हैं और वे मल की दुर्गन्ध से भरे रहते हैं।
श्लोक 6 (13.230.6)
एवंप्रमाणमुद्विग्ना यावत्तिष्ठन्ति तत्र ते । यातनाभ्यो दशगुणं नरके दुःखमिष्यते ॥
evaṃpramāṇamudvignā yāvattiṣṭhanti tatra te | yātanābhyo daśaguṇaṃ narake duḥkhamiṣyate
इस प्रकार उद्विग्न होकर वे जितने समय वहाँ रहते हैं, उतने समय नरक का दुःख यातनाओं से दस गुना माना गया है।
श्लोक 7 (13.230.7)
तत्र चात्यन्तिकं दुःखमिष्यते च शुभेक्षणे । क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनास्तत्र भुञ्जते ॥
tatra cātyantikaṃ duḥkhamiṣyate ca śubhekṣaṇe | krośantaśca rudantaśca vedanāstatra bhuñjate
हे सुन्दर नेत्रों वाली! वहाँ दुःख का अन्त नहीं है; वे चिल्लाते और रोते हुए वहाँ वेदनाएँ भोगते हैं।
श्लोक 8 (13.230.8)
भ्रमन्ति दुःखमोक्षार्थं ज्ञाता कश्चिन्न विद्यते । दुःखस्यान्तरमात्रं तु ज्ञानं वा न च लभ्यते ॥
bhramanti duḥkhamokṣārthaṃ jñātā kaścinna vidyate | duḥkhasyāntaramātraṃ tu jñānaṃ vā na ca labhyate
वे दुःख से छुटकारे के लिए भटकते हैं, पर कोई जानने वाला नहीं मिलता; दुःख में थोड़ा-सा अन्तर भी नहीं मिलता और न कोई ज्ञान ही प्राप्त होता है।
श्लोक 9 (13.230.9)
महारौरवसंज्ञं तु द्वितीयं नरकं प्रिये । तस्माद्द्विगुणितं विद्धि माने दुःखे च रौरवात् ॥
mahārauravasaṃjñaṃ tu dvitīyaṃ narakaṃ priye | tasmāddviguṇitaṃ viddhi māne duḥkhe ca rauravāt
हे प्रिये! दूसरा नरक महारौरव नाम का है; उसे आकार और दुःख दोनों में रौरव से दुगुना जानो।
श्लोक 10 (13.230.10)
तृतीयं नरकं तत्र कण्टकावनसंज्ञितम् । ततो द्विगुणितं तच्च पूर्वाभ्यां दुःखमानयोः । महापातकसंयुक्ता घोरास्तस्मिन्विशन्ति हि ॥
tṛtīyaṃ narakaṃ tatra kaṇṭakāvanasaṃjñitam | tato dviguṇitaṃ tacca pūrvābhyāṃ duḥkhamānayoḥ | mahāpātakasaṃyuktā ghorāstasminviśanti hi
वहाँ तीसरा नरक कण्टकावन नाम का है; वह दुःख और विस्तार में पहले दोनों से दुगुना है। महापातकों से युक्त भयंकर जीव उसमें प्रवेश करते हैं।
श्लोक 11 (13.230.11)
अग्निकुण्डमिति ख्यातं चतुर्थं नरकं प्रिये । एतद्द्विगुणितं तस्माद्यथानिष्टसुखं तथा ॥
agnikuṇḍamiti khyātaṃ caturthaṃ narakaṃ priye | etaddviguṇitaṃ tasmādyathāniṣṭasukhaṃ tathā
हे प्रिये! चौथा नरक अग्निकुण्ड नाम से प्रसिद्ध है। वह उससे दुगुना है, और उसमें जो सुख है भी, वह ऐसा है जिसे कोई न चाहे।
श्लोक 12 (13.230.12)
ततो दुःखं हि सुमहदमानुषमिति स्मृतम् । भुञ्जते तत्रतत्रैव दुःखं दुष्कृतकारिणः ॥
tato duḥkhaṃ hi sumahadamānuṣamiti smṛtam | bhuñjate tatratatraiva duḥkhaṃ duṣkṛtakāriṇaḥ
उससे आगे का दुःख बहुत बड़ा है और अमानुष कहा गया है। दुष्कर्म करने वाले उन-उन स्थानों में वही दुःख भोगते हैं।
श्लोक 13 (13.230.13)
तत्र दुःखमनिर्देश्यं वहद्धोरं यथा तथा । पञ्चेन्द्रियैरसम्बाधात्पञ्चकष्टमिति स्मृतम् । भुञ्जते तत्रतत्रैव दुःखं दुष्कृतकारिणः ॥
tatra duḥkhamanirdeśyaṃ vahaddhoraṃ yathā tathā | pañcendriyairasambādhātpañcakaṣṭamiti smṛtam | bhuñjate tatratatraiva duḥkhaṃ duṣkṛtakāriṇaḥ
वहाँ का दुःख अवर्णनीय है और हर प्रकार से भयंकर है। पाँचों इन्द्रियों के उससे मुक्त न रह पाने के कारण उसे पञ्चकष्ट कहा गया है। दुष्कर्म करने वाले उन-उन स्थानों में वही दुःख भोगते हैं।
श्लोक 14 (13.230.14)
अमानुषार्हजं दुःखं महाभूतैश्च भुञ्जते । अतिघोरं चिरं कृत्वा महाभूतानि यान्ति तम् ॥
amānuṣārhajaṃ duḥkhaṃ mahābhūtaiśca bhuñjate | atighoraṃ ciraṃ kṛtvā mahābhūtāni yānti tam
जो दुःख मनुष्य के योग्य नहीं है, उसे महाभूत भोगते हैं; अत्यन्त घोर दुःख को बहुत समय तक सहकर महाभूत उसमें जाते हैं।
श्लोक 15 (13.230.15)
पञ्चकष्टेन हि समं नास्ति दुःखं तथा परम् । दुःखस्थानमिति प्राहुः पञ्चकष्टमिति प्रिये ॥
pañcakaṣṭena hi samaṃ nāsti duḥkhaṃ tathā param | duḥkhasthānamiti prāhuḥ pañcakaṣṭamiti priye
पञ्चकष्ट के समान दुःख कोई नहीं, और उससे बढ़कर भी कोई नहीं। हे प्रिये! उसे दुःख का ही स्थान कहते हैं — पञ्चकष्ट।
श्लोक 16 (13.230.16)
एवं त्वेतेषु तिष्ठन्ति प्राणिनो दुःखभागिनः । अन्ये च नरकाः सन्ति अवीचिप्रमुखाः प्रिये ॥
evaṃ tveteṣu tiṣṭhanti prāṇino duḥkhabhāginaḥ | anye ca narakāḥ santi avīcipramukhāḥ priye
इस प्रकार दुःख के भागी प्राणी इनमें रहते हैं। हे प्रिये! अवीचि आदि और भी नरक हैं।
श्लोक 17 (13.230.17)
क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनार्ता भृशातुराः । केचिद्भ्रमन्तश्चेष्टन्ते केचिद्धावन्ति चातुराः ॥
krośantaśca rudantaśca vedanārtā bhṛśāturāḥ | kecidbhramantaśceṣṭante keciddhāvanti cāturāḥ
चिल्लाते और रोते हुए, पीड़ा से व्याकुल और अत्यन्त आतुर होकर कुछ भटकते और छटपटाते हैं, कुछ घबराकर दौड़ते हैं।
श्लोक 18 (13.230.18)
आधावन्तो निवार्यन्ते शूलहस्तैर्यतस्ततः । रुजार्दितास्तृषायुक्ताः प्राणिनः पापकारिणः ॥
ādhāvanto nivāryante śūlahastairyatastataḥ | rujārditāstṛṣāyuktāḥ prāṇinaḥ pāpakāriṇaḥ
दौड़ते हुए उन्हें त्रिशूल हाथ में लिए पुरुष इधर-उधर रोक देते हैं — रोग से पीड़ित और प्यास से व्याकुल वे पापी प्राणी।
श्लोक 19 (13.230.19)
यावत्पूर्वकृतं तावन्न मुच्यन्ते कथञ्चन । क्रिमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च वेदनार्तास्तृषान्विताः ॥
yāvatpūrvakṛtaṃ tāvanna mucyante kathañcana | krimibhirbhakṣyamāṇāśca vedanārtāstṛṣānvitāḥ
जब तक पहले का किया हुआ शेष है, तब तक वे किसी प्रकार नहीं छूटते; कीड़ों से खाए जाते हुए वे पीड़ा से आर्त और प्यास से व्याकुल रहते हैं।
श्लोक 20 (13.230.20)
संस्मरन्तः स्वकं पापं कृतमात्मापराधजम् । शोचन्तस्तत्र तिष्ठन्ति यावत्पापक्षयं प्रिये । एवं भुक्त्वा तु नरकं मुच्यन्ते पापसंक्षयात् ॥
saṃsmarantaḥ svakaṃ pāpaṃ kṛtamātmāparādhajam | śocantastatra tiṣṭhanti yāvatpāpakṣayaṃ priye | evaṃ bhuktvā tu narakaṃ mucyante pāpasaṃkṣayāt
अपने किए पाप और अपने ही अपराध को याद करते हुए वे वहाँ शोक करते रहते हैं, हे प्रिये, जब तक पाप का क्षय नहीं हो जाता। इस प्रकार नरक भोगकर वे पाप के पूर्ण क्षय से छूट जाते हैं।
उमोवाच
श्लोक 21 (13.230.21)
भगवन्कतिकालं ते तिष्ठन्ति नरकेषु वै ॥
bhagavankatikālaṃ te tiṣṭhanti narakeṣu vai
हे भगवन्! वे नरकों में कितने समय तक रहते हैं?
महेश्वर उवाच
श्लोक 22 (13.230.22)
शतवर्षसहस्राणामादिं कृत्वा हि जन्तवः । तिष्ठन्ति नरकावासाः प्रलयान्तमिति स्थितिः ॥
śatavarṣasahasrāṇāmādiṃ kṛtvā hi jantavaḥ | tiṣṭhanti narakāvāsāḥ pralayāntamiti sthitiḥ
एक लाख वर्ष से आरम्भ करके प्राणी नरकों में प्रलय के अन्त तक रहते हैं — ऐसी व्यवस्था है।
उमोवाच
श्लोक 23 (13.230.23)
भगवंस्तेषु के तत्र तिष्ठन्तीति वद प्रभो ॥
bhagavaṃsteṣu ke tatra tiṣṭhantīti vada prabho
हे प्रभो! उनमें कौन-कौन रहते हैं? यह बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 24 (13.230.24)
रौरवे शतसाहस्रं वर्षाणामिति संस्थितिः । मानुषघ्नाः कृतघ्नाश्च तथैवानृतवादिनः ॥
raurave śatasāhasraṃ varṣāṇāmiti saṃsthitiḥ | mānuṣaghnāḥ kṛtaghnāśca tathaivānṛtavādinaḥ
रौरव में एक लाख वर्ष की अवधि निश्चित है — मनुष्यों के हत्यारों, कृतघ्नों और वैसे ही झूठ बोलने वालों के लिए।
श्लोक 25 (13.230.25)
द्वितीये द्विगुणं कालं पच्यन्ते तादृशा नराः । महापातकयुक्तास्तु तृतीये दुःखमाप्नुयुः ॥
dvitīye dviguṇaṃ kālaṃ pacyante tādṛśā narāḥ | mahāpātakayuktāstu tṛtīye duḥkhamāpnuyuḥ
दूसरे में ऐसे मनुष्य दुगुने समय तक पकाए जाते हैं; महापातकों से युक्त लोग तीसरे में दुःख पाते हैं।
श्लोक 26 (13.230.26)
एतावन्मानुषसहं परमन्येषु लक्ष्यते ॥
etāvanmānuṣasahaṃ paramanyeṣu lakṣyate
इतना ही मनुष्य सह सकता है; इससे आगे दूसरों के विषय में देखा जाता है।
श्लोक 27 (13.230.27)
यक्षा विद्याधराश्चैव काद्रवेयाश्च किंनराः । गन्धर्वभूतसङ्घाश्च तेषां पापयुता भृशम् । चतुर्थे परिपच्यन्ते तादृशा नरकाः स्मृताः । चतुर्थे परितप्यन्ते यावद्युगविपर्ययः ॥
yakṣā vidyādharāścaiva kādraveyāśca kiṃnarāḥ | gandharvabhūtasaṅghāśca teṣāṃ pāpayutā bhṛśam | caturthe paripacyante tādṛśā narakāḥ smṛtāḥ | caturthe paritapyante yāvadyugaviparyayaḥ
यक्ष, विद्याधर, कद्रू के पुत्र, किन्नर, गन्धर्व और भूतों के समूह, जो बहुत पाप से युक्त हैं, चौथे में पकाए जाते हैं; ऐसे ही नरक कहे गए हैं। चौथे में वे युग के पलटने तक तपाए जाते हैं।
श्लोक 28 (13.230.28)
सहन्तस्तादृशं घोरं पञ्चकष्टे तु यादृशम् । तत्रास्य चिरदुःखस्य ह्यधोन्यान्विद्धि मानुषान् ॥
sahantastādṛśaṃ ghoraṃ pañcakaṣṭe tu yādṛśam | tatrāsya ciraduḥkhasya hyadhonyānviddhi mānuṣān
वे वैसा ही घोर दुःख सहते हैं जैसा पञ्चकष्ट में होता है। इस दीर्घ दुःख के विषय में दूसरों की अपेक्षा मनुष्यों को नीचे जानो।
श्लोक 29 (13.230.29)
एवं ते नरकान्भुक्त्वा तत्र क्षपितकल्मषाः । नरकेभ्यो विमुक्ताश्च जायन्ते कृमिजातिषु ॥
evaṃ te narakānbhuktvā tatra kṣapitakalmaṣāḥ | narakebhyo vimuktāśca jāyante kṛmijātiṣu
इस प्रकार नरकों को भोगकर और वहाँ अपने पापों को क्षीण करके वे नरकों से छूटते हैं और कृमि-योनियों में जन्म लेते हैं।
श्लोक 30 (13.230.30)
उद्भेदजेषु वा केचिदत्रापि क्षीणकल्मषाः । पुनरेव प्रजायन्ते मृगपक्षिषु शोभने । मृगपक्षिषु तद्भुक्त्वा लभन्ते मानुषं पदम् ॥
udbhedajeṣu vā kecidatrāpi kṣīṇakalmaṣāḥ | punareva prajāyante mṛgapakṣiṣu śobhane | mṛgapakṣiṣu tadbhuktvā labhante mānuṣaṃ padam
कुछ, वहाँ भी पाप क्षीण हो जाने पर, उद्भिज योनियों में जन्म लेते हैं; हे शोभने! कुछ फिर पशु-पक्षियों में जन्म लेते हैं। पशु-पक्षियों में वह भोगकर वे मनुष्य-पद पाते हैं।
उमोवाच
श्लोक 31 (13.230.31)
नानाजातिषु केनैव जायन्ते पापकारिणः ॥
nānājātiṣu kenaiva jāyante pāpakāriṇaḥ
पापी जीव अनेक प्रकार की योनियों में किस कारण से जन्म लेते हैं?
महेश्वर उवाच
श्लोक 32 (13.230.32)
तदहं ते प्रवक्ष्यामि यत्त्वमिच्छसि शोभने । सर्वदाऽऽत्मा कर्मवशो नानाजातिषु जायते ॥
tadahaṃ te pravakṣyāmi yattvamicchasi śobhane | sarvadā''tmā karmavaśo nānājātiṣu jāyate
हे शोभने! तुम जो जानना चाहती हो, वह मैं तुम्हें बताऊँगा। आत्मा सदा कर्म के वश होकर अनेक प्रकार की योनियों में जन्म लेती है।
श्लोक 33 (13.230.33)
यश्च मांसप्रियो नित्यं काकगृध्रान्स संस्पृशेत् । सुरापः सततं मर्त्यः सूकरत्वं व्रजेद्भुवम् ॥
yaśca māṃsapriyo nityaṃ kākagṛdhrānsa saṃspṛśet | surāpaḥ satataṃ martyaḥ sūkaratvaṃ vrajedbhuvam
जो सदा मांस का प्रेमी रहता है, वह कौओं और गिद्धों के बीच आ पड़ता है; जो मनुष्य निरन्तर सुरापान करता है, वह निश्चय ही सूअर की योनि में जाता है।
श्लोक 34 (13.230.34)
अभक्ष्यभक्षणो मर्त्यः काकजातिषु जायते । आत्मघ्नो यो नरः कोपात्प्रेतजातिषु तिष्ठति ॥
abhakṣyabhakṣaṇo martyaḥ kākajātiṣu jāyate | ātmaghno yo naraḥ kopātpretajātiṣu tiṣṭhati
जो मनुष्य अभक्ष्य खाता है, वह कौओं की योनियों में जन्म लेता है; जो मनुष्य क्रोध में आत्महत्या करता है, वह प्रेतयोनियों में रहता है।
श्लोक 35 (13.230.35)
पैशुन्यात्परिवादाच्च कुक्कुटत्वमवाप्नुयात् । नास्तिकश्चैव यो मूर्खो मृगजातिं स गच्छति ॥
paiśunyātparivādācca kukkuṭatvamavāpnuyāt | nāstikaścaiva yo mūrkho mṛgajātiṃ sa gacchati
चुगली और निन्दा से मनुष्य मुर्गे का जन्म पाता है; जो मूर्ख नास्तिक है, वह मृगयोनि में जाता है।
श्लोक 36 (13.230.36)
हिंसाविहारस्तु नरः क्रिमिकीटेषु जायते । अतिमानयुतो नित्यं प्रेत्य गर्दभतां व्रजेत् ॥
hiṃsāvihārastu naraḥ krimikīṭeṣu jāyate | atimānayuto nityaṃ pretya gardabhatāṃ vrajet
हिंसा में रमने वाला मनुष्य कृमि-कीटों में जन्म लेता है; जो सदा अत्यन्त अभिमानी रहता है, वह मरकर गधा हो जाता है।
श्लोक 37 (13.230.37)
अगम्यागमनाच्चैव परदारनिषेवणात् । मूषिकत्वं व्रजेन्मर्त्यो नास्ति तत्र विचारणा ॥
agamyāgamanāccaiva paradāraniṣevaṇāt | mūṣikatvaṃ vrajenmartyo nāsti tatra vicāraṇā
अगम्या स्त्री से सम्बन्ध और परस्त्री-सेवन से मनुष्य चूहे की योनि में जाता है; इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 38 (13.230.38)
कृतघ्नो मित्रघाती च सृगालवृकजातिषु । कृतघ्नः पुत्रघाती च स्थावरेष्वथ तिष्ठति ॥
kṛtaghno mitraghātī ca sṛgālavṛkajātiṣu | kṛtaghnaḥ putraghātī ca sthāvareṣvatha tiṣṭhati
कृतघ्न और मित्र की हत्या करने वाला सियार-भेड़ियों की योनियों में जन्म लेता है; कृतघ्न और पुत्र की हत्या करने वाला स्थावरों में रहता है।
श्लोक 39 (13.230.39)
एवमाद्यशुभं कृत्वा नरा निरयगामिनः । तांस्तान्भावान्प्रपद्यन्ते स्वकृतस्यैव कारणात् ॥
evamādyaśubhaṃ kṛtvā narā nirayagāminaḥ | tāṃstānbhāvānprapadyante svakṛtasyaiva kāraṇāt
ऐसे और इसी प्रकार के अशुभ कर्म करके नरक में जाने वाले मनुष्य अपने ही किए के कारण उन-उन भावों को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 40 (13.230.40)
एवंजातिषु निर्देश्याः प्राणिनः पापकारिणः । कथंचित्पुनरुत्पद्य लभन्ते मानुषं पदम् ॥
evaṃjātiṣu nirdeśyāḥ prāṇinaḥ pāpakāriṇaḥ | kathaṃcitpunarutpadya labhante mānuṣaṃ padam
पापी प्राणी ऐसी योनियों में बताए गए हैं; किसी प्रकार फिर उत्पन्न होकर वे मनुष्य-पद पाते हैं।
श्लोक 41 (13.230.41)
बहुशश्चाग्निसङ्क्रान्तं लोहं शुचिमयं तथा । बहुदुःखाभिसन्तप्तस्तथाऽऽत्मा शोध्यते बलात् । तस्मात्सुदुर्लभं चेति विद्धि जन्मसु मानुषम् ॥
bahuśaścāgnisaṅkrāntaṃ lohaṃ śucimayaṃ tathā | bahuduḥkhābhisantaptastathā''tmā śodhyate balāt | tasmātsudurlabhaṃ ceti viddhi janmasu mānuṣam
जैसे बार-बार आग में डाला गया लोहा शुद्ध हो जाता है, वैसे ही बहुत दुःखों से तपाई गई आत्मा बलपूर्वक शुद्ध की जाती है। इसलिए जन्मों में मनुष्य-जन्म को अत्यन्त दुर्लभ जानो।