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अनुशासन पर्व · अध्याय 231

मन, वाणी और शरीर के पाप; मद्यपान की उत्पत्ति

उमा शुभ और अशुभ कर्म के विषय में पूछती हैं। महेश्वर बताते हैं कि दुष्कर्म तीन प्रकार का होता है — मन का, वाणी का और शरीर का — और प्रत्येक के भेद गिनाते हैं; शरीर का पाप सबसे भारी माना जाता है। फिर वे उन अवस्थाओं को बताते हैं जिनमें मनुष्य हिंसा या असत्य से पाप में लिप्त नहीं होता — जैसे प्राण-रक्षा, ग्राम या स्वामी की रक्षा, या अकाल में जीवन-निर्वाह। मद्यपान के विषय में पूछे जाने पर वे बताते हैं कि जब सब मनुष्य बुद्धिमान थे और कोई किसी का सेवक नहीं था, तब ब्रह्मा ने देवताओं से तमस् का सार निकलवाकर मनुष्यों में डलवाया, जिससे कर्म और यज्ञ चलते रहें; और मद्य से होने वाली मूढ़ता, निर्लज्जता और विनाश गिनाते हैं, जिसके कारण सज्जन उसे त्याग देते हैं।

अध्याय 230अध्याय-सूचीअध्याय 232

उमोवाच

श्लोक 1 (13.231.1)

भगवन्देवदेवेश शूलपाणे वृषध्वज । श्रुतं मे परमं गुह्यं प्रसादात्ते वरप्रद ॥

bhagavandevadeveśa śūlapāṇe vṛṣadhvaja | śrutaṃ me paramaṃ guhyaṃ prasādātte varaprada

हे भगवन्, देवों के देव, शूलपाणि, वृषध्वज, वर देने वाले! आपकी कृपा से मैंने परम गोपनीय बात सुन ली।

श्लोक 2 (13.231.2)

श्रोतुं भूयोऽहमिच्छामि प्रजानां हितकारणात् । शुभाशुभमिति प्रोक्तं कर्म स्वस्वं समासतः ॥

śrotuṃ bhūyo'hamicchāmi prajānāṃ hitakāraṇāt | śubhāśubhamiti proktaṃ karma svasvaṃ samāsataḥ

प्राणियों के हित के लिए मैं और सुनना चाहती हूँ — आपने शुभ और अशुभ कर्म को अलग-अलग संक्षेप में कहा है।

श्लोक 3 (13.231.3)

तन्मे विस्तरतो ब्रूहि शुभाशुभविधिं प्रति । अशुभं कीदृशं कर्म प्राणिनो यन्निपातयेत् ॥

tanme vistarato brūhi śubhāśubhavidhiṃ prati | aśubhaṃ kīdṛśaṃ karma prāṇino yannipātayet

शुभ और अशुभ की विधि के विषय में वह मुझे विस्तार से बताइए: कैसा अशुभ कर्म प्राणी को गिराता है?

श्लोक 4 (13.231.4)

शुभं वापि कथं देव प्रजानामूर्ध्वदं भवेत् । एतन्मे वद देवेश श्रोतुकामाऽस्मि कीर्तय ॥

śubhaṃ vāpi kathaṃ deva prajānāmūrdhvadaṃ bhavet | etanme vada deveśa śrotukāmā'smi kīrtaya

और हे देव! शुभ कर्म प्राणियों को ऊपर कैसे ले जाता है? हे देवेश! यह मुझे बताइए, मैं सुनना चाहती हूँ; कहिए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 5 (13.231.5)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि तत्सर्वं शृणु शोभने । सुकृतं दुष्कृतं चेति द्विविधं कर्मविस्तरम् ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi tatsarvaṃ śṛṇu śobhane | sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ ceti dvividhaṃ karmavistaram

मैं तुम्हें वह सब बताऊँगा; हे शोभने, सुनो। कर्म का विस्तार दो प्रकार का है — सुकृत और दुष्कृत।

श्लोक 6 (13.231.6)

तयोर्यद्दुष्कृतं कर्म तच्च सञ्जायते त्रिधा । मनसा कर्मणा वाचा बुद्धिमोहसमुद्भवात् ॥

tayoryadduṣkṛtaṃ karma tacca sañjāyate tridhā | manasā karmaṇā vācā buddhimohasamudbhavāt

उनमें जो दुष्कर्म है, वह तीन प्रकार से उत्पन्न होता है — मन से, कर्म से और वाणी से, बुद्धि के मोह से।

श्लोक 7 (13.231.7)

मनःपूर्वं तु वा कर्म वर्तते वाङ्मयं ततः । जायते वै क्रियायोगमनु चेष्टाक्रमः प्रिये ॥

manaḥpūrvaṃ tu vā karma vartate vāṅmayaṃ tataḥ | jāyate vai kriyāyogamanu ceṣṭākramaḥ priye

कर्म पहले मन में होता है, फिर वाणी का रूप लेता है; तदनन्तर क्रिया के योग से हे प्रिये, शारीरिक चेष्टाओं का क्रम चलता है।

श्लोक 8 (13.231.8)

अभिद्रोहोऽभ्यसूया च परार्थेषु च वै स्पृहा । शुभाशुभानां मर्त्यानां वर्तनं परिवारितम् ॥

abhidroho'bhyasūyā ca parārtheṣu ca vai spṛhā | śubhāśubhānāṃ martyānāṃ vartanaṃ parivāritam

द्रोह, ईर्ष्या और दूसरों की वस्तुओं की लालसा — ये शुभ-अशुभ प्रकृति वाले मनुष्यों के आचरण को घेरे रहते हैं।

श्लोक 9 (13.231.9)

धर्मकार्ये यदाऽश्रद्धा पापकर्मणि हर्षणम् । एवमाद्यशुभं कर्म मनसा पापमुच्यते ॥

dharmakārye yadā'śraddhā pāpakarmaṇi harṣaṇam | evamādyaśubhaṃ karma manasā pāpamucyate

धर्म के कार्य में श्रद्धा न होना और पाप के कार्य में हर्ष होना — इस प्रकार के अशुभ कर्म मन के पाप कहे जाते हैं।

श्लोक 10 (13.231.10)

अनृतं यच्च परुषमबद्धवचनं कटु । असत्यं परिवादश्च पापमेतत्तु वाङ्मयम् ॥

anṛtaṃ yacca paruṣamabaddhavacanaṃ kaṭu | asatyaṃ parivādaśca pāpametattu vāṅmayam

असत्य, कठोर वचन, असंगत और कटु बात, मिथ्या कथन और निन्दा — यह वाणी का पाप है।

श्लोक 11 (13.231.11)

अगम्यागमनं चैव परदारनिषेवणम् । वधबन्धपरिक्लेशैः परप्राणोपतापनम् ॥

agamyāgamanaṃ caiva paradāraniṣevaṇam | vadhabandhaparikleśaiḥ paraprāṇopatāpanam

अगम्या से सम्बन्ध, परस्त्री-सेवन, और वध, बन्धन तथा क्लेश के द्वारा दूसरे के प्राणों को सताना,

श्लोक 12 (13.231.12)

चौर्यं परेषां द्रव्याणां हरणं नाशनं तथा । अभक्ष्यभक्षणं चैव व्यसनेष्वविषङ्गता ॥

cauryaṃ pareṣāṃ dravyāṇāṃ haraṇaṃ nāśanaṃ tathā | abhakṣyabhakṣaṇaṃ caiva vyasaneṣvaviṣaṅgatā

चोरी, दूसरों के धन को हर लेना या नष्ट करना, अभक्ष्य भक्षण और व्यसनों में आसक्ति,

श्लोक 13 (13.231.13)

दर्पात्स्तम्भाभिमानाच्च परेषामुपतापनम् । अकार्याणां च करणमशौचं पानसेवनम् ॥

darpātstambhābhimānācca pareṣāmupatāpanam | akāryāṇāṃ ca karaṇamaśaucaṃ pānasevanam

घमण्ड, हठ और अभिमान से दूसरों को सताना, न करने योग्य कर्म करना, अपवित्रता और मद्यपान,

श्लोक 14 (13.231.14)

दौःशील्यं पापसम्पर्के साहाय्यं पापकर्मणि । अधर्म्यमयशस्यं च कार्यं तस्य निषेवणम् । एवमाद्यशुभं चान्यच्छारीरं पापमुच्यते ॥

dauḥśīlyaṃ pāpasamparke sāhāyyaṃ pāpakarmaṇi | adharmyamayaśasyaṃ ca kāryaṃ tasya niṣevaṇam | evamādyaśubhaṃ cānyacchārīraṃ pāpamucyate

दुराचार, पापियों की संगति, पाप-कर्म में सहायता, तथा जो अधर्मयुक्त और अपयश देने वाला कार्य है उसका सेवन — इस प्रकार का यह और दूसरा अशुभ शारीरिक पाप कहा जाता है।

श्लोक 15 (13.231.15)

मानसाद्वाङ्मयं पापं विशिष्टमिति लक्ष्यते । वाङ्मयादपि वै पापाच्छारीरं गण्यते बहु ॥

mānasādvāṅmayaṃ pāpaṃ viśiṣṭamiti lakṣyate | vāṅmayādapi vai pāpācchārīraṃ gaṇyate bahu

मन के पाप से वाणी का पाप बढ़कर माना जाता है, और वाणी के पाप से भी शरीर का पाप बहुत अधिक गिना जाता है।

श्लोक 16 (13.231.16)

एवं पापयुतं कर्म त्रिविधं पातयेन्नरम् । परापकारजननमत्यन्तं पातकं स्मृतम् ॥

evaṃ pāpayutaṃ karma trividhaṃ pātayennaram | parāpakārajananamatyantaṃ pātakaṃ smṛtam

इस प्रकार तीन प्रकार का पापयुक्त कर्म मनुष्य को गिराता है। जो दूसरे का अत्यन्त अपकार करने वाला है, वह पातक माना गया है।

श्लोक 17 (13.231.17)

त्रिविधं तत्कृतं पापं कर्तारं पापकं नयेत् । पातकं चापि यत्कर्म कर्मणा बुद्धिपूर्वकम् ॥

trividhaṃ tatkṛtaṃ pāpaṃ kartāraṃ pāpakaṃ nayet | pātakaṃ cāpi yatkarma karmaṇā buddhipūrvakam

तीन प्रकार से किया हुआ पाप कर्ता को पाप की ओर ले जाता है। और जो पातक कर्म जान-बूझकर कर्म से किया जाए,

श्लोक 18 (13.231.18)

सापदेशमवश्यं तत्कर्तव्यमिति तत्कृतम् । कथञ्चित्तत्कृतमपि कर्ता तेन स लिप्यते ॥

sāpadeśamavaśyaṃ tatkartavyamiti tatkṛtam | kathañcittatkṛtamapi kartā tena sa lipyate

किसी बहाने से, यह मानकर कि यह करना ही पड़ेगा, किया गया हो — तो भी किसी प्रकार किए जाने पर कर्ता उससे लिप्त होता है।

श्लोक 19 (13.231.19)

अवश्यं पापदेशेन प्रतिहन्येत कारणम् ॥

avaśyaṃ pāpadeśena pratihanyeta kāraṇam

अवश्य ही पाप का नाम लेने से उस कारण का खण्डन हो जाता है।

उमोवाच

श्लोक 20 (13.231.20)

भगवन्पापकं कर्म यथा कृत्वा न लिप्यते ॥

bhagavanpāpakaṃ karma yathā kṛtvā na lipyate

हे भगवन्! कौन-सा पापकर्म करके मनुष्य लिप्त नहीं होता?

महेश्वर उवाच

श्लोक 21 (13.231.21)

यो नरोऽनपराधी च स्वात्मप्राणस्य रक्षणात् । शत्रुमुद्यतशस्त्रं वा पूर्वं तेन हतोपि वा । प्रतिहन्यान्नरो हिंस्यान्न स पापेन लिप्यते ॥

yo naro'naparādhī ca svātmaprāṇasya rakṣaṇāt | śatrumudyataśastraṃ vā pūrvaṃ tena hatopi vā | pratihanyānnaro hiṃsyānna sa pāpena lipyate

जो मनुष्य स्वयं निरपराध है और अपने प्राणों की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए हुए शत्रु को, या जिसने पहले उस पर प्रहार किया हो उसे, पलटकर मार डालता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 22 (13.231.22)

चोरादधिकसंत्रस्तस्तत्प्रतीकारचेष्टया । यः प्रजघ्नन्नरो हन्यान्न स पापेन लिप्यते ॥

corādadhikasaṃtrastastatpratīkāraceṣṭayā | yaḥ prajaghnannaro hanyānna sa pāpena lipyate

जो मनुष्य चोर से अत्यन्त भयभीत होकर उसका प्रतिकार करने की चेष्टा में उसे मार डालता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 23 (13.231.23)

ग्रामार्थं भर्तृपिण्डार्थं दीनानुग्रहकारणात् । वधबन्धपरिक्लेशान्कुर्वन्पापात्प्रमुच्यते ॥

grāmārthaṃ bhartṛpiṇḍārthaṃ dīnānugrahakāraṇāt | vadhabandhaparikleśānkurvanpāpātpramucyate

जो ग्राम के लिए, स्वामी के अन्न के लिए या दीनों पर कृपा करने के कारण वध, बन्धन और क्लेश देता है, वह पाप से छूट जाता है।

श्लोक 24 (13.231.24)

दुर्भिक्षे चात्मवृत्त्यर्थमेकायतनगस्तथा । अकार्यं वाऽप्यभक्ष्यं वा कृत्वा पापान्न लिप्यते ॥

durbhikṣe cātmavṛttyarthamekāyatanagastathā | akāryaṃ vā'pyabhakṣyaṃ vā kṛtvā pāpānna lipyate

अकाल में अपनी जीविका के लिए, अन्य कोई सहारा न रहने पर, जो न करने योग्य कर्म या न खाने योग्य भोजन भी कर ले, वह पाप से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 25 (13.231.25)

विधिरेष गृहस्थानां प्रायेणैवोपदिश्यते । अवाच्यं वाऽप्यकार्यं वा देशकालवशेन तु ॥

vidhireṣa gṛhasthānāṃ prāyeṇaivopadiśyate | avācyaṃ vā'pyakāryaṃ vā deśakālavaśena tu

यह विधि प्रायः गृहस्थों के लिए बताई जाती है — जो न कहने योग्य या न करने योग्य है, उसके विषय में देश और काल के वश के अनुसार।

श्लोक 26 (13.231.26)

बुद्धिपूर्वं नरः कुर्वस्तत्प्रयोजनमात्रया । किञ्चिद्वा लिप्यते पापैरथवा न च लिप्यते ॥

buddhipūrvaṃ naraḥ kurvastatprayojanamātrayā | kiñcidvā lipyate pāpairathavā na ca lipyate

जान-बूझकर कर्म करने वाला मनुष्य, केवल अपने प्रयोजन भर के अनुसार, या तो थोड़ा-सा पाप से लिप्त होता है या बिल्कुल नहीं होता।

श्लोक 27 (13.231.27)

एवं देवि विजानीहि नास्ति तत्र विचारणा ॥

evaṃ devi vijānīhi nāsti tatra vicāraṇā

हे देवी! इसे ऐसा ही जानो; इसमें कोई सन्देह नहीं।

उमोवाच

श्लोक 28 (13.231.28)

भगवन्पानदोषांश्च पेयापेयत्वकारणम् । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे वद महेश्वर ॥

bhagavanpānadoṣāṃśca peyāpeyatvakāraṇam | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tanme vada maheśvara

हे भगवन्! मैं मद्यपान के दोषों के विषय में, और क्या पीने योग्य है तथा क्या नहीं इसके कारण के विषय में सुनना चाहती हूँ। हे महेश्वर! मुझे वह बताइए।

महेश्वर उवाच

श्लोक 29 (13.231.29)

हन्त ते कथयिष्यामि पानोत्पत्तिं शुचिस्मिते ॥

hanta te kathayiṣyāmi pānotpattiṃ śucismite

अच्छा, हे सुन्दर मुस्कान वाली, मैं तुम्हें मद्य की उत्पत्ति बताता हूँ।

श्लोक 30 (13.231.30)

पुरा सर्वेऽभवन्मर्त्या बुद्धिमन्तो नयानुगाः । शुचयश्च शुभाचाराः सर्वे चोन्मनसः प्रिये ॥

purā sarve'bhavanmartyā buddhimanto nayānugāḥ | śucayaśca śubhācārāḥ sarve conmanasaḥ priye

प्राचीन काल में सभी मनुष्य बुद्धिमान, नीति का अनुसरण करने वाले, पवित्र, सदाचारी और ऊँचे मन वाले थे, हे प्रिये।

श्लोक 31 (13.231.31)

एवंभूते तदा लोके प्रेष्यकृन्न परस्परम् । प्रेष्याभावान्मनुष्याणां कर्मारम्भो ननाश ह ॥

evaṃbhūte tadā loke preṣyakṛnna parasparam | preṣyābhāvānmanuṣyāṇāṃ karmārambho nanāśa ha

जब संसार ऐसा था, तब कोई किसी को सेवक नहीं बनाता था; सेवकों के अभाव से मनुष्यों का कर्म आरम्भ करना ही नष्ट हो गया।

श्लोक 32 (13.231.32)

उभयोर्लोकयोर्नाशं दृष्ट्वा कर्मक्षयात्प्रभुः । यज्ञकर्म कथं लोके वर्तेतेति पितामहः ॥

ubhayorlokayornāśaṃ dṛṣṭvā karmakṣayātprabhuḥ | yajñakarma kathaṃ loke varteteti pitāmahaḥ

कर्म के क्षय से दोनों लोकों का नाश होते देखकर और यह सोचकर कि संसार में यज्ञ-कर्म कैसे चलेगा, पितामह ने

श्लोक 33 (13.231.33)

आज्ञापयत्सुरान्देवि मोहयस्वेति मानुषान् । तमसः सारमुद्धृत्य पानं बुद्धिप्रणाशनम् । न्यपातयन्मनुष्येषु पापदोषावहं प्रिये ॥

ājñāpayatsurāndevi mohayasveti mānuṣān | tamasaḥ sāramuddhṛtya pānaṃ buddhipraṇāśanam | nyapātayanmanuṣyeṣu pāpadoṣāvahaṃ priye

हे देवी! देवताओं को आज्ञा दी कि "मनुष्यों को मोहित करो।" तब उन्होंने तमस् का सार निकालकर, बुद्धि का नाश करने वाला और पाप-दोष लाने वाला मद्य मनुष्यों में गिरा दिया, हे प्रिये।

श्लोक 34 (13.231.34)

तदाप्रभृति तत्पानान्मुमुहुर्मानवा भुवि । कार्याकार्यमजानन्तो वाच्यावाच्यं गुणागुणम् ॥

tadāprabhṛti tatpānānmumuhurmānavā bhuvi | kāryākāryamajānanto vācyāvācyaṃ guṇāguṇam

तब से उसे पीकर पृथ्वी के मनुष्य मोहित हो गए; वे कर्तव्य-अकर्तव्य, कहने योग्य-न कहने योग्य और गुण-दोष को नहीं जानते थे।

श्लोक 35 (13.231.35)

केचिद्धसन्ति तत्पीत्वा प्रवदन्ति तथा परे । नृत्यन्ति मुदिताः केचिद्गायन्ति शुभाशुभान् ॥

keciddhasanti tatpītvā pravadanti tathā pare | nṛtyanti muditāḥ kecidgāyanti śubhāśubhān

कोई उसे पीकर हँसते हैं, दूसरे बकवास करते हैं; कोई प्रसन्न होकर नाचते हैं, कोई भले-बुरे गीत गाते हैं।

श्लोक 36 (13.231.36)

कलिं ते कुर्वतेऽभीष्टं प्रहरन्ति परस्परम् । क्वचिद्धावन्ति सहसा प्रस्खलन्ति पतन्ति च ॥

kaliṃ te kurvate'bhīṣṭaṃ praharanti parasparam | kvaciddhāvanti sahasā praskhalanti patanti ca

वे मनचाहा झगड़ा करते हैं और एक-दूसरे पर प्रहार करते हैं; कोई अचानक दौड़ते हैं, लड़खड़ाते हैं और गिर पड़ते हैं।

श्लोक 37 (13.231.37)

अयुक्तं बहु भाषन्ते यत्र क्वचन शोभने । नग्ना विक्षिप्य गात्राणि नष्टज्ञाना इवासते ॥

ayuktaṃ bahu bhāṣante yatra kvacana śobhane | nagnā vikṣipya gātrāṇi naṣṭajñānā ivāsate

हे शोभने! वे जहाँ-तहाँ बहुत अनुचित बातें बोलते हैं; नंगे होकर अंग फेंकते हुए वे बेहोश लोगों की तरह पड़े रहते हैं।

श्लोक 38 (13.231.38)

एवं बहुविधान्भावान्कुर्वन्ति भ्रान्तचेतनाः । ये पिबन्ति महामोहं पानं पापयुता नराः ॥

evaṃ bahuvidhānbhāvānkurvanti bhrāntacetanāḥ | ye pibanti mahāmohaṃ pānaṃ pāpayutā narāḥ

इस प्रकार भ्रान्त चित्त वाले वे अनेक प्रकार के कर्म करते हैं — जो पापी मनुष्य उस महामोह मद्य को पीते हैं।

श्लोक 39 (13.231.39)

धृतिं लज्जां च बुद्धिं च पानं पीतं प्रणाशयेत् । तस्मान्नराः सम्भवन्ति निर्लज्जा निरपत्रपाः ॥

dhṛtiṃ lajjāṃ ca buddhiṃ ca pānaṃ pītaṃ praṇāśayet | tasmānnarāḥ sambhavanti nirlajjā nirapatrapāḥ

पिया हुआ मद्य धैर्य, लज्जा और बुद्धि का नाश कर देता है; इसी से मनुष्य निर्लज्ज और संकोचरहित हो जाते हैं।

श्लोक 40 (13.231.40)

बुद्धिसत्वैः परिक्षीणास्तेजोहीना मलान्विताः । पीत्वापीत्वा तृषायुक्ताः पानपाः सम्भवन्ति च ॥

buddhisatvaiḥ parikṣīṇāstejohīnā malānvitāḥ | pītvāpītvā tṛṣāyuktāḥ pānapāḥ sambhavanti ca

बुद्धि और सत्त्व से क्षीण, तेज से हीन, मलिन, पी-पीकर प्यासे होते हुए वे पियक्कड़ बन जाते हैं।

श्लोक 41 (13.231.41)

पानकामाः पानकथाः पानकालाभिकाङ्क्षिणः । पानार्थं कर्मवश्यास्ते सम्भवन्ति नराधमाः ॥

pānakāmāḥ pānakathāḥ pānakālābhikāṅkṣiṇaḥ | pānārthaṃ karmavaśyāste sambhavanti narādhamāḥ

मद्य के चाहने वाले, मद्य की ही बातें करने वाले, मद्य के समय की प्रतीक्षा करने वाले और मद्य के लिए कर्म के वश में पड़े हुए वे अधम मनुष्य बन जाते हैं।

श्लोक 42 (13.231.42)

पानकामास्तृषायोगाद्बुद्धिसत्वपरिक्षयात् । पानदानां प्रेष्यकाराः पानपाः सहसाऽभवन् ॥

pānakāmāstṛṣāyogādbuddhisatvaparikṣayāt | pānadānāṃ preṣyakārāḥ pānapāḥ sahasā'bhavan

प्यास के कारण और बुद्धि तथा सत्त्व के क्षय से मद्य के लालची पियक्कड़ अचानक मद्य देने वालों के सेवक हो गए।

श्लोक 43 (13.231.43)

तदाप्रभृति वै लोके दीनैः पानवशैर्नरैः । कारयन्ति च कर्माणि बुद्धिमन्तस्त्वपानपाः ॥

tadāprabhṛti vai loke dīnaiḥ pānavaśairnaraiḥ | kārayanti ca karmāṇi buddhimantastvapānapāḥ

तब से संसार में जो बुद्धिमान लोग मद्य नहीं पीते, वे मद्य के वश में पड़े दीन मनुष्यों से काम करवाते हैं।

श्लोक 44 (13.231.44)

कारुत्वमथ दासत्वं प्रेष्यतामेत्य पानपाः । सर्वकर्मकराश्चासन्पशुवद्रज्जुबन्धिताः ॥

kārutvamatha dāsatvaṃ preṣyatāmetya pānapāḥ | sarvakarmakarāścāsanpaśuvadrajjubandhitāḥ

पियक्कड़ कारीगर, दास और सेवक की दशा को पहुँचकर सब प्रकार के काम करने वाले हो गए और पशुओं की तरह रस्सियों से बाँधे गए।

श्लोक 45 (13.231.45)

पानपस्तु सुरां पीत्वा तदा बुद्धिप्रणाशनात् । कार्याकार्यस्य चाज्ञानाद्यथेष्टकरणात्स्वयम् । विदुषामविधेयत्वात्पापमेवाभिपद्यते ॥

pānapastu surāṃ pītvā tadā buddhipraṇāśanāt | kāryākāryasya cājñānādyatheṣṭakaraṇātsvayam | viduṣāmavidheyatvātpāpamevābhipadyate

मद्य पीने वाला मद्य पीकर बुद्धि के नाश से, कर्तव्य-अकर्तव्य के अज्ञान से, स्वयं मनमानी करने से और विद्वानों के वश में न रहने से केवल पाप को ही प्राप्त होता है।

श्लोक 46 (13.231.46)

परिभूतो भवेल्लोके मद्यपो मित्रभेदकः । सर्वकालमशुद्धिं च सर्वभक्षस्तथा भवेत् ॥

paribhūto bhavelloke madyapo mitrabhedakaḥ | sarvakālamaśuddhiṃ ca sarvabhakṣastathā bhavet

मद्य पीने वाला संसार में तिरस्कृत होता है और मित्रों में फूट डालने वाला होता है; वह सदा अशुद्ध रहता है और सब कुछ खाने वाला हो जाता है।

श्लोक 47 (13.231.47)

विनष्टो ज्ञातिविद्वद्भ्यः सततं कलिभावगः । परुषं कटुकं घोरं वाक्यं वदति सर्वशः ॥

vinaṣṭo jñātividvadbhyaḥ satataṃ kalibhāvagaḥ | paruṣaṃ kaṭukaṃ ghoraṃ vākyaṃ vadati sarvaśaḥ

जाति-बन्धुओं और विद्वानों से बिछुड़ा हुआ, सदा कलह में लगा हुआ वह चारों ओर कठोर, कड़वी और भयंकर बातें बोलता है।

श्लोक 48 (13.231.48)

गुरूनतिवदेन्मत्तः परदारान्प्रधर्षयेत् । संविदं कुरुते शौण्डैर्न शृणोति हितं क्वचित् ॥

gurūnativadenmattaḥ paradārānpradharṣayet | saṃvidaṃ kurute śauṇḍairna śṛṇoti hitaṃ kvacit

मदमत्त होकर वह गुरुजनों का अपमान करता है, परस्त्रियों पर बलात्कार करता है, पियक्कड़ों से मेल-जोल करता है और कभी अपने हित की बात नहीं सुनता।

श्लोक 49 (13.231.49)

एवं बहुविधा दोषाः पानपे सन्ति शोभने । केवलं नरकं यान्ति नास्ति तत्र विचारणा । तस्मात्तद्वर्जितं सद्भिः पानमात्महितैषिभिः ॥

evaṃ bahuvidhā doṣāḥ pānape santi śobhane | kevalaṃ narakaṃ yānti nāsti tatra vicāraṇā | tasmāttadvarjitaṃ sadbhiḥ pānamātmahitaiṣibhiḥ

हे शोभने! इस प्रकार मद्य पीने वाले में अनेक दोष होते हैं। वे केवल नरक में जाते हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं। इसलिए अपना हित चाहने वाले सज्जन मद्य का त्याग करते हैं।

श्लोक 50 (13.231.50)

यदि पानं न वर्जेरन्सन्तश्चारित्रकारणात् । भवेदेतज्जगत्सर्वममर्यादं च निष्क्रियम् ॥

yadi pānaṃ na varjeransantaścāritrakāraṇāt | bhavedetajjagatsarvamamaryādaṃ ca niṣkriyam

यदि सज्जन सदाचार के लिए मद्य को न छोड़ें, तो यह सारा जगत् मर्यादाहीन और कर्महीन हो जाएगा।

श्लोक 51 (13.231.51)

तस्माद्बुद्धेर्हि रक्षार्थं सद्भिः पानं विवर्जितम् । इति ते दुष्कृतं सर्वं कथितं त्रिविधं प्रिये ॥

tasmādbuddherhi rakṣārthaṃ sadbhiḥ pānaṃ vivarjitam | iti te duṣkṛtaṃ sarvaṃ kathitaṃ trividhaṃ priye

इसलिए बुद्धि की रक्षा के लिए सज्जनों ने मद्य का त्याग किया है। हे प्रिये! इस प्रकार तुम्हें तीन प्रकार का समस्त दुष्कर्म बता दिया।

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