अनुशासन पर्व · अध्याय 232
संयम के सुकृत: सत्य, व्रत और शौच
महेश्वर उमा को बताते हैं कि सुकृत तीन प्रकार का होता है और पहले प्रकार का वर्णन करते हैं, अर्थात् मन, वाणी और शरीर से पाप का त्याग कर देने का पुण्य। फिर वे नियम-रूप सुकृतों की, विशेषकर सत्य की चर्चा करते हैं, और उमा के प्रश्नों के उत्तर में बताते हैं कि व्रत कैसे निभाया जाता है, बाह्य और आन्तरिक शौच कैसे मिलता है और कौन-सा आहार शुद्ध है।
महेश्वर उवाच
श्लोक 1 (13.232.1)
विधानं सुकृतस्यापि भूयः शृणु शुचिस्मिते । प्रोच्यते तत्त्रिधा देवि सुकृतं च समासतः ॥
vidhānaṃ sukṛtasyāpi bhūyaḥ śṛṇu śucismite | procyate tattridhā devi sukṛtaṃ ca samāsataḥ
“हे शुचिस्मिते, सुकृत का विधान फिर से सुनो। हे देवी, संक्षेप में सुकृत तीन प्रकार का कहा जाता है।”
श्लोक 2 (13.232.2)
यदौपरमिकं चैव सुकृतं निरुपद्रवम् । तथैव सोपकरणं तावता सुकृतं विदुः ॥
yadauparamikaṃ caiva sukṛtaṃ nirupadravam | tathaiva sopakaraṇaṃ tāvatā sukṛtaṃ viduḥ
“एक सुकृत औपरमिक है, जो सब प्रकार के उपद्रव से रहित है, और वैसे ही एक सोपकरण है, जिसमें साधनों की आवश्यकता होती है; विद्वान् उतने ही को सुकृत मानते हैं।”
श्लोक 3 (13.232.3)
निवृत्तिः पापकर्मभ्यस्तदौपरमिकं प्रिये । मनोवाक्कायजा दोषाः शृणु मे वर्जनाच्छुभम् ॥
nivṛttiḥ pāpakarmabhyastadauparamikaṃ priye | manovākkāyajā doṣāḥ śṛṇu me varjanācchubham
“प्रिये, पापकर्मों से निवृत्त हो जाना ही औपरमिक सुकृत है। मन, वाणी और शरीर से उत्पन्न होनेवाले दोषों को, और उनके त्याग से मिलनेवाले शुभ फल को मुझसे सुनो।”
श्लोक 4 (13.232.4)
त्रैविध्यदोषोपरमे यस्तु दोषव्यपेक्षया । स हि प्राप्नोति सकलं सर्वदुष्कृतवर्जनात् ॥
traividhyadoṣoparame yastu doṣavyapekṣayā | sa hi prāpnoti sakalaṃ sarvaduṣkṛtavarjanāt
“जब तीनों प्रकार के दोष शान्त हो जाते हैं, तब जो दोष की ओर ध्यान रखता है, वह सब दुष्कर्मों के त्याग से सम्पूर्ण फल पाता है।”
श्लोक 5 (13.232.5)
प्रथमं वर्जयेद्दोषान्युगपत्पृथगेव वा । तथा धर्ममवाप्नोति दोषत्यागो हि दुष्करः । दोषसाकल्यसंत्यागान्मुनिर्भवति मानवः ॥
prathamaṃ varjayeddoṣānyugapatpṛthageva vā | tathā dharmamavāpnoti doṣatyāgo hi duṣkaraḥ | doṣasākalyasaṃtyāgānmunirbhavati mānavaḥ
“पहले दोषों को छोड़ना चाहिए, चाहे सब एक साथ छोड़े, चाहे एक-एक करके; इसी प्रकार धर्म की प्राप्ति होती है, क्योंकि दोषों का त्याग कठिन है। दोषों का पूर्ण त्याग करने से मनुष्य मुनि हो जाता है।”
श्लोक 6 (13.232.6)
सौकर्यं परस्य धर्मस्य कार्यारम्भादृतेऽपि च । आत्मा च लब्धोपरमो लभन्ते सुकृतं परम् ॥
saukaryaṃ parasya dharmasya kāryārambhādṛte'pi ca | ātmā ca labdhoparamo labhante sukṛtaṃ param
“श्रेष्ठ धर्म सरल है, क्योंकि उसमें किसी कार्य को आरम्भ करने की भी आवश्यकता नहीं होती; और जिनका आत्मा उपरति को प्राप्त हो चुका है, वे परम सुकृत को पाते हैं।”
श्लोक 7 (13.232.7)
अहो नृशंसाः पच्यन्ते मानुषाः स्वल्पबुद्धयः । एतादृशं न बुध्यन्ते आत्माधीनं न निर्व्यथाः ॥
aho nṛśaṃsāḥ pacyante mānuṣāḥ svalpabuddhayaḥ | etādṛśaṃ na budhyante ātmādhīnaṃ na nirvyathāḥ
“हाय, निर्दय और अल्पबुद्धि मनुष्य कष्ट की आग में पकते रहते हैं! वे ऐसी बात को नहीं समझते जो उनके अपने ही अधीन है, इसीलिए वे पीड़ा से मुक्त नहीं होते।”
श्लोक 8 (13.232.8)
दुष्कृतत्यागमात्रेण पदमूर्ध्वं हि लभ्यते ॥
duṣkṛtatyāgamātreṇa padamūrdhvaṃ hi labhyate
“केवल दुष्कर्मों को छोड़ देने से ही ऊँचा पद प्राप्त हो जाता है।”
श्लोक 9 (13.232.9)
पापभीरुत्वमात्रेण दोषाणां परिवर्जनात् । सुशोभनो भवेद्देवि ऋजुर्धर्मव्यपेक्षया । इत्यौपरमिकं देवि कथितं सुकृतं तव ॥
pāpabhīrutvamātreṇa doṣāṇāṃ parivarjanāt | suśobhano bhaveddevi ṛjurdharmavyapekṣayā | ityauparamikaṃ devi kathitaṃ sukṛtaṃ tava
“केवल पाप के भय से, दोषों को छोड़ देने से ही, हे देवी, सरल हृदय मनुष्य धर्म की दृष्टि से अत्यन्त शोभन हो जाता है। हे देवी, इस प्रकार औपरमिक सुकृत तुम्हें बता दिया गया।”
श्लोक 10 (13.232.10)
श्रुत्वा च वृद्धसंयोगादिन्द्रियाणां च निग्रहात् । सन्तोषाच्च धृतेश्चैव शक्यते दोषवर्जनम् ॥
śrutvā ca vṛddhasaṃyogādindriyāṇāṃ ca nigrahāt | santoṣācca dhṛteścaiva śakyate doṣavarjanam
“शास्त्र के श्रवण से, वृद्धजनों की संगति से, इन्द्रियों के निग्रह से, सन्तोष और धैर्य से दोषों का त्याग सम्भव होता है।”
श्लोक 11 (13.232.11)
तदेव धर्ममित्याहुर्दोषसंयमनं प्रिये । यमधर्मेण धर्मोऽस्ति नान्यः शुभतरः प्रिये । यमधर्मेण यतयः प्राप्नुवन्त्युत्तमां गतिम् ॥
tadeva dharmamityāhurdoṣasaṃyamanaṃ priye | yamadharmeṇa dharmo'sti nānyaḥ śubhataraḥ priye | yamadharmeṇa yatayaḥ prāpnuvantyuttamāṃ gatim
“प्रिये, दोषों के उसी संयम को वे धर्म कहते हैं। यम-धर्म से बढ़कर कोई दूसरा धर्म अधिक कल्याणकारी नहीं है; यम-धर्म से ही यति परम गति को पाते हैं।”
श्लोक 12 (13.232.12)
ईश्वराणां प्रभवतां दरिद्राणां च वै नृणाम् । सफलो दोषसंत्यागो दानादपि शुभादपि ॥
īśvarāṇāṃ prabhavatāṃ daridrāṇāṃ ca vai nṛṇām | saphalo doṣasaṃtyāgo dānādapi śubhādapi
“समर्थ और निर्धन, दोनों प्रकार के मनुष्यों के लिए दोषों का त्याग सफल होता है, शुभ दान से भी अधिक।”
श्लोक 13 (13.232.13)
तपो दानं महादेवि दोषमल्पं हि निर्भरेत् । सुकृतं यामिकं चोक्तं वक्ष्ये निरुपसाधनम् ॥
tapo dānaṃ mahādevi doṣamalpaṃ hi nirbharet | sukṛtaṃ yāmikaṃ coktaṃ vakṣye nirupasādhanam
“हे महादेवी, तप और दान तो थोड़े-से दोष को ही दूर कर सकते हैं। अब मैं उस सुकृत को कहूँगा जो यामिक कहा गया है और जिसमें किसी साधन की आवश्यकता नहीं।”
श्लोक 14 (13.232.14)
सुखाभिसन्धिर्लोकानां सत्यं शौचमथार्जवम् । व्रतोपवासः प्रीतिश्च ब्रह्मचर्यं दमः शमः ॥
sukhābhisandhirlokānāṃ satyaṃ śaucamathārjavam | vratopavāsaḥ prītiśca brahmacaryaṃ damaḥ śamaḥ
“लोगों के सुख का संकल्प, सत्य, शुद्धि, सरलता, व्रत और उपवास, प्रेम, ब्रह्मचर्य, दम और शम—”
श्लोक 15 (13.232.15)
एवमादि शुभं कर्म सुकृतं नियमाश्रितम् । शृणु तेषां विशेषांश्च कीर्तयिष्यामि भामिनि ॥
evamādi śubhaṃ karma sukṛtaṃ niyamāśritam | śṛṇu teṣāṃ viśeṣāṃśca kīrtayiṣyāmi bhāmini
“इस प्रकार के जो नियमों पर आधारित शुभ कर्म हैं, वे ही नियमाश्रित सुकृत हैं। हे भामिनी, सुनो; मैं उनकी विशेषताएँ बताऊँगा।”
श्लोक 16 (13.232.16)
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव । नास्ति सत्यात्परं दानं नास्ति सत्यात्परं तपः ॥
satyaṃ svargasya sopānaṃ pārāvārasya nauriva | nāsti satyātparaṃ dānaṃ nāsti satyātparaṃ tapaḥ
“सत्य स्वर्ग की सीढ़ी है, समुद्र पार करने की नाव के समान है। सत्य से बढ़कर कोई दान नहीं और सत्य से बढ़कर कोई तप नहीं।”
श्लोक 17 (13.232.17)
यथा श्रुतं यथा दृष्टमात्मना यद्यथा कृतम् । तथा तस्याविकारेण वचनं सत्यलक्षणम् ॥
yathā śrutaṃ yathā dṛṣṭamātmanā yadyathā kṛtam | tathā tasyāvikāreṇa vacanaṃ satyalakṣaṇam
“जैसा सुना हो, जैसा देखा हो, और जैसा स्वयं किया हो, वैसा ही बिना किसी परिवर्तन के कहना सत्य का लक्षण है।”
श्लोक 18 (13.232.18)
यच्छलेनाभिसंयुक्तं सत्यरूपं मृषैव तत् । सत्यमेव प्रवक्तव्यं पारावर्यं विजानता ॥
yacchalenābhisaṃyuktaṃ satyarūpaṃ mṛṣaiva tat | satyameva pravaktavyaṃ pārāvaryaṃ vijānatā
“जो बात छल से मिली हो, वह सत्य के रूप में दिखने पर भी झूठ ही है। जो इस पार और उस पार को जानता है, उसे केवल सत्य ही बोलना चाहिए।”
श्लोक 19 (13.232.19)
दीर्घायुश्च भवेत्सत्यात्कुलसन्तानपालकः । लोकसंस्थितिपालश्च भवेत्सत्येन मानवः ॥
dīrghāyuśca bhavetsatyātkulasantānapālakaḥ | lokasaṃsthitipālaśca bhavetsatyena mānavaḥ
“सत्य से मनुष्य दीर्घायु, कुल की सन्तान-परम्परा का रक्षक और लोक-मर्यादा का पालक होता है।”
उमोवाच
श्लोक 20 (13.232.20)
कथं सन्धारयन्मर्त्यो व्रतं शुभमवाप्नुयात् ॥
kathaṃ sandhārayanmartyo vrataṃ śubhamavāpnuyāt
“व्रत को धारण करता हुआ मनुष्य किस प्रकार शुभ फल प्राप्त कर सकता है?”
महेश्वर उवाच
श्लोक 21 (13.232.21)
पूर्वमुक्तं तु यत्पापं मनोवाक्कायकर्मभिः । व्रतवत्तस्य संत्यागस्तपोव्रतमिति स्मृतम् ॥
pūrvamuktaṃ tu yatpāpaṃ manovākkāyakarmabhiḥ | vratavattasya saṃtyāgastapovratamiti smṛtam
“पहले जिस पाप का वर्णन किया गया, जो मन, वाणी और शरीर के कर्मों से होता है, उसका व्रत की तरह त्याग करना तपोव्रत कहा गया है।”
श्लोक 22 (13.232.22)
त्याज्यं वा यदि वा जोष्यमव्रतेन वृथा चरन् । तथा फलं न लभते तस्माद्धर्मं वृथा चरेत् ॥
tyājyaṃ vā yadi vā joṣyamavratena vṛthā caran | tathā phalaṃ na labhate tasmāddharmaṃ vṛthā caret
“चाहे वह त्यागने योग्य हो या ग्रहण करने योग्य, जो बिना व्रत के व्यर्थ आचरण करता है, उसे फल नहीं मिलता; इसलिए उसका धर्म-आचरण व्यर्थ ही होगा।”
श्लोक 23 (13.232.23)
शुद्धकायो नरो भूत्वा स्नात्वा तीर्थे यथाविधि । पञ्चभूतानि चन्द्रार्कौ संध्ये धर्मयमौ पितॄन् ॥
śuddhakāyo naro bhūtvā snātvā tīrthe yathāvidhi | pañcabhūtāni candrārkau saṃdhye dharmayamau pitṝn
“शरीर को शुद्ध करके, विधि के अनुसार तीर्थ में स्नान करके, पाँचों भूतों, चन्द्र और सूर्य, दोनों सन्ध्याओं, धर्म, यम और पितरों को—”
श्लोक 24 (13.232.24)
आत्मनैव तथाऽऽत्मानं निवेद्य व्रतवच्चरेत् । व्रतमामरणाद्वाऽपि कालच्छेदेन वा हरेत् ॥
ātmanaiva tathā''tmānaṃ nivedya vratavaccaret | vratamāmaraṇādvā'pi kālacchedena vā haret
“इस प्रकार अपने आपको स्वयं ही उन्हें समर्पित करके व्रत की भाँति आचरण करे—मृत्यु-पर्यन्त, अथवा समय की अवधि बाँधकर उसे ग्रहण करे।”
श्लोक 25 (13.232.25)
शाकादिषु व्रतं कुर्यात्तथा पुष्पफलादिषु । ब्रह्मचर्यव्रतं कुर्यादुपवासव्रतं तथा ॥
śākādiṣu vrataṃ kuryāttathā puṣpaphalādiṣu | brahmacaryavrataṃ kuryādupavāsavrataṃ tathā
“साग आदि के विषय में व्रत करे, वैसे ही फूल-फल आदि के विषय में भी; ब्रह्मचर्य का व्रत करे और उसी प्रकार उपवास का व्रत करे।”
श्लोक 26 (13.232.26)
एवमन्येषु बहुषु व्रतं कार्यं हितैषिणा । व्रतभङ्गो यथा न स्याद्रक्षितव्यं तथा बुधैः । व्रतभङ्गे महत्पापमिति विद्धि शुभेक्षणे ॥
evamanyeṣu bahuṣu vrataṃ kāryaṃ hitaiṣiṇā | vratabhaṅgo yathā na syādrakṣitavyaṃ tathā budhaiḥ | vratabhaṅge mahatpāpamiti viddhi śubhekṣaṇe
“इसी प्रकार और भी बहुत-सी बातों में अपना हित चाहनेवाले को व्रत करना चाहिए। विद्वानों को ऐसी रक्षा करनी चाहिए कि व्रत भंग न हो; हे सुन्दर नेत्रोंवाली, जान लो कि व्रत का भंग होना बड़ा पाप है।”
श्लोक 27 (13.232.27)
औषधार्थं यदज्ञानाद्गुरूणां वचनादपि । अनुग्रहार्थं बन्धूनां व्रतभङ्गो न दुष्यते ॥
auṣadhārthaṃ yadajñānādgurūṇāṃ vacanādapi | anugrahārthaṃ bandhūnāṃ vratabhaṅgo na duṣyate
“औषधि के लिए, अज्ञान से, गुरुजनों के कहने से, या बन्धुओं पर अनुग्रह करने के लिए व्रत का भंग हो जाना दोष नहीं माना जाता।”
श्लोक 28 (13.232.28)
व्रतापवर्गकाले तु दैवब्राह्मणपूजनम् । नरेण तु यथा विद्धि कार्यसिद्धिं यथाऽऽप्तुयात् ॥
vratāpavargakāle tu daivabrāhmaṇapūjanam | nareṇa tu yathā viddhi kāryasiddhiṃ yathā''ptuyāt
“व्रत की समाप्ति के समय देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन करना चाहिए। जान लो कि इसी से मनुष्य अपने कार्य की सिद्धि पा सकता है।”
उमोवाच
श्लोक 29 (13.232.29)
कथं शौचविधिस्तत्र तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
kathaṃ śaucavidhistatra tanme śaṃsitumarhasi
“इस विषय में शौच की विधि क्या है? कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 30 (13.232.30)
बाह्यमाभ्यन्तरं चेति द्विविधं शौचमिष्यते । मानसं सुकृतं यत्तच्छौचमाभ्यन्तरं स्मृतम् ॥
bāhyamābhyantaraṃ ceti dvividhaṃ śaucamiṣyate | mānasaṃ sukṛtaṃ yattacchaucamābhyantaraṃ smṛtam
“शौच दो प्रकार का माना जाता है—बाह्य और आभ्यन्तर। मन का जो सुकृत है, उसे आभ्यन्तर शौच कहा गया है।”
श्लोक 31 (13.232.31)
सदाऽऽहारविशुद्धिश्च कायप्रक्षालनं च यत् । बाह्यशौचं भवेदेतत्तथैवाचमनादिना ॥
sadā''hāraviśuddhiśca kāyaprakṣālanaṃ ca yat | bāhyaśaucaṃ bhavedetattathaivācamanādinā
“सदा आहार को शुद्ध रखना और शरीर को धोना—यह बाह्य शौच है; इसी प्रकार आचमन आदि भी।”
श्लोक 32 (13.232.32)
मृच्चैव शुद्धदेशस्था गोशकृन्मूत्रमेव च । द्रव्याणि गन्धयुक्तानि यानि पुष्टिकराणि च । एतैः सम्मार्जयेत्कायमम्भसा च पुनः पुनः ॥
mṛccaiva śuddhadeśasthā gośakṛnmūtrameva ca | dravyāṇi gandhayuktāni yāni puṣṭikarāṇi ca | etaiḥ sammārjayetkāyamambhasā ca punaḥ punaḥ
“शुद्ध स्थान की मिट्टी, गोबर और गोमूत्र, तथा जो सुगन्धित और पुष्टि करनेवाले पदार्थ हैं—इनसे और बार-बार जल से शरीर को शुद्ध करे।”
श्लोक 33 (13.232.33)
अक्षोभ्यं यत्प्रकीर्णं च नित्यस्रोतं च यज्जलम् । प्रायशस्तादृशे मज्जेदन्यथा च विवर्जयेत् ॥
akṣobhyaṃ yatprakīrṇaṃ ca nityasrotaṃ ca yajjalam | prāyaśastādṛśe majjedanyathā ca vivarjayet
“जो जल अक्षुब्ध हो, फैला हुआ हो और सदा बहता रहता हो, प्रायः ऐसे जल में स्नान करे; अन्यथा उसे छोड़ दे।”
श्लोक 34 (13.232.34)
त्रिस्त्रिराचमनं श्रेष्ठं निष्फेनैर्निर्मलैर्जलैः । तथा विण्मूत्रयोः शुद्धिरद्भिर्बहुमृदा भवेत् । तथैव जलसंशुद्धिर्यत्संशुद्धं तु संस्पृशेत् ॥
tristrirācamanaṃ śreṣṭhaṃ niṣphenairnirmalairjalaiḥ | tathā viṇmūtrayoḥ śuddhiradbhirbahumṛdā bhavet | tathaiva jalasaṃśuddhiryatsaṃśuddhaṃ tu saṃspṛśet
“फेन से रहित निर्मल जल से तीन-तीन बार आचमन करना श्रेष्ठ है। मल और मूत्र की शुद्धि जल और बहुत-सी मिट्टी से होती है। इसी प्रकार जल की भी शुद्धि होती है, और जो शुद्ध हो चुका हो उसी का स्पर्श करे।”
श्लोक 35 (13.232.35)
शकृता भूमिशुद्धिः स्याल्लौहानां भस्मना स्मृतम् । तक्षणं घर्षणं चैव दारवाणां विशोधनम् ॥
śakṛtā bhūmiśuddhiḥ syāllauhānāṃ bhasmanā smṛtam | takṣaṇaṃ gharṣaṇaṃ caiva dāravāṇāṃ viśodhanam
“भूमि की शुद्धि गोबर से होती है, और धातु के पात्रों की शुद्धि राख से कही गई है। लकड़ी की वस्तुओं को छीलना और घिसना शुद्ध करता है।”
श्लोक 36 (13.232.36)
दहनं मृण्मयानां च मर्त्यानां कृच्छ्रधारणम् । शेषाणां देवि सर्वेषामातपेन जलेन च । ब्राह्मणानां च वाक्येन सदा संशोधनं भवेत् ॥
dahanaṃ mṛṇmayānāṃ ca martyānāṃ kṛcchradhāraṇam | śeṣāṇāṃ devi sarveṣāmātapena jalena ca | brāhmaṇānāṃ ca vākyena sadā saṃśodhanaṃ bhavet
“मिट्टी के पात्रों की शुद्धि जलाने से होती है, मनुष्यों की कठोर तप धारण करने से, और शेष सब वस्तुओं की, हे देवी, धूप और जल से तथा सदा ब्राह्मणों के वचन से।”
श्लोक 37 (13.232.37)
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते । एवमापदि संशुद्धिरेवं शौचं विधीयते ॥
adṛṣṭamadbhirnirṇiktaṃ yacca vācā praśasyate | evamāpadi saṃśuddhirevaṃ śaucaṃ vidhīyate
“जिसमें कोई दोष दिखाई न दिया हो और जिसे जल से धो लिया गया हो, तथा जिसे विद्वानों की वाणी शुद्ध ठहराए—इस प्रकार आपत्ति के समय शुद्धि होती है; इसी तरह शौच का विधान किया गया है।”
उमोवाच
श्लोक 38 (13.232.38)
आहारशुद्धिस्तु कथं देवदेव महेश्वर ॥
āhāraśuddhistu kathaṃ devadeva maheśvara
“और हे देवों के देव महेश्वर, आहार की शुद्धि कैसे होती है?”
महेश्वर उवाच
श्लोक 39 (13.232.39)
अमांसमद्यमक्लेद्यमपर्युषितमेव च । अतिकट्वम्ललवणहीनं च शुभगन्धि च ॥
amāṃsamadyamakledyamaparyuṣitameva ca | atikaṭvamlalavaṇahīnaṃ ca śubhagandhi ca
“जो मांस और मद्य से रहित हो, गला-सड़ा न हो, बासी न हो, अत्यन्त कटु, खट्टे और नमकीन स्वाद से रहित हो और सुगन्धित हो—”
श्लोक 40 (13.232.40)
क्रिमिकेशमलैर्हीनं संवृतं शुद्धदर्शम् । एवंविधं सदाहार्यं देवब्राह्मणसात्कृतम् ॥
krimikeśamalairhīnaṃ saṃvṛtaṃ śuddhadarśam | evaṃvidhaṃ sadāhāryaṃ devabrāhmaṇasātkṛtam
“कीड़ों, बालों और मैल से रहित हो, ढका हुआ हो और देखने में स्वच्छ हो—ऐसा आहार, देवताओं और ब्राह्मणों को अर्पित करके, सदा खाना चाहिए।”
श्लोक 41 (13.232.41)
श्रुतमित्येव तज्ज्ञेयमन्यथा मन्यसेऽशुभम् । ग्राम्यादारण्यकैः सिद्धं श्रेष्ठमित्यवधारय ॥
śrutamityeva tajjñeyamanyathā manyase'śubham | grāmyādāraṇyakaiḥ siddhaṃ śreṣṭhamityavadhāraya
“उसे शास्त्र-सम्मत जानना चाहिए; नहीं तो तुम उसे अशुभ मानोगी। ग्राम के पदार्थों की अपेक्षा वन के पदार्थों से पका हुआ भोजन श्रेष्ठ है, ऐसा समझो।”
श्लोक 42 (13.232.42)
अतिमात्रगृहीतात्तु अल्पदत्तं भवेच्छुचि । यज्ञशेषं हविःशेषं पितृशेषं च निर्मलम् । इति ते कथितं देवि भूयः किं श्रोतुमिच्छसि ॥
atimātragṛhītāttu alpadattaṃ bhavecchuci | yajñaśeṣaṃ haviḥśeṣaṃ pitṛśeṣaṃ ca nirmalam | iti te kathitaṃ devi bhūyaḥ kiṃ śrotumicchasi
“बहुत अधिक ग्रहण की हुई वस्तु में से थोड़ा दिया हुआ शुद्ध हो जाता है। यज्ञ का शेष, हविष् का शेष और पितरों के भाग का शेष निर्मल होता है। हे देवी, यह तुम्हें बता दिया; अब और क्या सुनना चाहती हो?”