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अनुशासन पर्व · अध्याय 233

मांस, गुरु, उपवास, ब्रह्मचर्य और तीर्थ-स्नान

उमा पूछती हैं कि कुछ लोग मांस क्यों खाते हैं और कुछ क्यों छोड़ देते हैं। महेश्वर मांस खाने का दोष और न खाने का गुण बताते हैं, और यह भी कि जो मनुष्य उसे न छोड़ सके, वह किन स्थितियों में बिना पाप के खा सकता है। फिर वे बताते हैं कि गुरुओं का सम्मान कैसे किया जाए, गुरु किन्हें माना जाए, और क्यों उनकी आज्ञा का पालन यज्ञ और तप से भी बढ़कर है। उमा के आगे के प्रश्नों पर वे उपवास की विधि और आवश्यकता में उपवास तोड़ने की छूट, ब्रह्मचर्य की पाँच प्रकार की रक्षा, तथा तीर्थों की उत्पत्ति और उनमें स्नान की विधि कहते हैं। अन्त में वे दान तथा देवताओं और पितरों की पूजा का वर्णन करने का वचन देते हैं।

अध्याय 232अध्याय-सूचीअध्याय 234

उमोवाच

श्लोक 1 (13.233.1)

भक्षयन्त्यपरे मांसं वर्जयन्त्यपरे भुवि । तन्मे वद महादेव भक्ष्याभक्ष्यस्य कारणम् ॥

bhakṣayantyapare māṃsaṃ varjayantyapare bhuvi | tanme vada mahādeva bhakṣyābhakṣyasya kāraṇam

“कुछ लोग मांस खाते हैं और कुछ लोग पृथ्वी पर उसे त्याग देते हैं। हे महादेव, क्या खाने योग्य है और क्या नहीं—इसका कारण मुझे बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.233.2)

मांसस्य भक्षणे दोषो यश्चास्याभक्षणे गुणः । तदहं कीर्तयिष्यामि तन्निबोध यथातथम् ॥

māṃsasya bhakṣaṇe doṣo yaścāsyābhakṣaṇe guṇaḥ | tadahaṃ kīrtayiṣyāmi tannibodha yathātatham

“मांस खाने में जो दोष है और न खाने में जो गुण है, वह मैं कहूँगा; उसे यथार्थ रूप में सुनो।”

श्लोक 3 (13.233.3)

इष्टं दत्तमधीतं च क्रतवश्च सदक्षिणाः । अमांसभक्षणस्यैते कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

iṣṭaṃ dattamadhītaṃ ca kratavaśca sadakṣiṇāḥ | amāṃsabhakṣaṇasyaite kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm

“यज्ञ, दान, अध्ययन और दक्षिणा-सहित किए गए यज्ञ—ये सब मांस न खाने वाले की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं होते।”

श्लोक 4 (13.233.4)

आत्मार्थं यः परप्राणान्हिंस्यात्स्वादुफलेप्सया । व्यालगृध्रसृगालैश्च राक्षसैश्च समस्तु सः ॥

ātmārthaṃ yaḥ paraprāṇānhiṃsyātsvāduphalepsayā | vyālagṛdhrasṛgālaiśca rākṣasaiśca samastu saḥ

“जो अपने लिए, स्वाद के सुख के फल की इच्छा से दूसरे प्राणियों के प्राण लेता है, वह हिंसक पशुओं, गिद्धों, सियारों और राक्षसों के समान है।”

श्लोक 5 (13.233.5)

यो वृथानित्यमांसाशी स पुमानधमो भवेत् । ततः कष्टतरं नास्ति स्वयमाहृत्य भक्षणात् ॥

yo vṛthānityamāṃsāśī sa pumānadhamo bhavet | tataḥ kaṣṭataraṃ nāsti svayamāhṛtya bhakṣaṇāt

“जो मनुष्य बिना किसी प्रयोजन के नित्य मांस खाता है, वह अधम होता है। स्वयं लाकर खाने से बढ़कर कष्टदायक कुछ नहीं है।”

श्लोक 6 (13.233.6)

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति । उद्विग्नवासं लभते यत्र यत्रोपजायते ॥

svamāṃsaṃ paramāṃsena yo vardhayitumicchati | udvignavāsaṃ labhate yatra yatropajāyate

“जो अपने मांस को दूसरे के मांस से बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ-जहाँ जन्म लेता है, वहाँ-वहाँ भय और उद्वेग से भरा जीवन पाता है।”

श्लोक 7 (13.233.7)

संछेदनं स्वमांसस्य यथा संजनयेद्रुजम् । तथैव परमांसेऽपि वेदितव्यं विजानता ॥

saṃchedanaṃ svamāṃsasya yathā saṃjanayedrujam | tathaiva paramāṃse'pi veditavyaṃ vijānatā

“जैसे अपने मांस को काटना पीड़ा उत्पन्न करता है, वैसे ही दूसरे के मांस के विषय में भी समझदार को जानना चाहिए।”

श्लोक 8 (13.233.8)

यस्तु सर्वाणि मांसानि यावज्जीवं न भक्षयेत् । स स्वर्गे विपुलं स्थानं लभते नात्र संशयः ॥

yastu sarvāṇi māṃsāni yāvajjīvaṃ na bhakṣayet | sa svarge vipulaṃ sthānaṃ labhate nātra saṃśayaḥ

“परन्तु जो जीवन भर किसी भी प्रकार का मांस नहीं खाता, वह स्वर्ग में विशाल स्थान पाता है; इसमें कोई संशय नहीं।”

श्लोक 9 (13.233.9)

यस्तु वर्षशतं पूर्णं तप्यते परमं तपः । यश्चापि वर्जयेन्मांसं सममेतन्न वा समम् ॥

yastu varṣaśataṃ pūrṇaṃ tapyate paramaṃ tapaḥ | yaścāpi varjayenmāṃsaṃ samametanna vā samam

“जो पूरे सौ वर्ष तक परम तप करता है और जो केवल मांस का त्याग करता है—यह समान है, अथवा शायद समान भी नहीं।”

श्लोक 10 (13.233.10)

न हि प्राणैः प्रियतमं लोके किं चन विद्यते । तस्मात्प्राणिदया कार्या यथात्मनि तथा परे ॥

na hi prāṇaiḥ priyatamaṃ loke kiṃ cana vidyate | tasmātprāṇidayā kāryā yathātmani tathā pare

“इस लोक में प्राणों से अधिक प्रिय कुछ भी नहीं है। इसलिए प्राणियों पर दया करनी चाहिए—जैसी अपने पर, वैसी ही दूसरों पर।”

श्लोक 11 (13.233.11)

सर्वे यज्ञा न तत्कुर्युः सर्वे वेदाश्च भामिनि । यन्मांसरसमास्वाद्य पुनर्मांसानि वर्जयेत् ॥

sarve yajñā na tatkuryuḥ sarve vedāśca bhāmini | yanmāṃsarasamāsvādya punarmāṃsāni varjayet

“हे भामिनी, सब यज्ञ और सब वेद मिलकर भी वह नहीं कर सकते, जो वह मनुष्य करता है जो मांस के रस का स्वाद चखकर फिर मांस छोड़ देता है।”

श्लोक 12 (13.233.12)

धर्म्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् । इत्येवं मुनयः प्राहुर्मांसस्याभक्षणे गुणान् ॥

dharmyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ svargyaṃ svastyayanaṃ mahat | ityevaṃ munayaḥ prāhurmāṃsasyābhakṣaṇe guṇān

“वह धर्मयुक्त है, यश और आयु देने वाला है, स्वर्ग दिलाने वाला है और बड़ा कल्याणकारी है। इस प्रकार मुनियों ने मांस न खाने के गुण कहे हैं।”

श्लोक 13 (13.233.13)

एवं बहुगुणं देवि नृणां मांसविवर्जनम् । न शक्नुयाद्यदा जीवंस्त्यक्तुं मांसं कथं चन ॥

evaṃ bahuguṇaṃ devi nṛṇāṃ māṃsavivarjanam | na śaknuyādyadā jīvaṃstyaktuṃ māṃsaṃ kathaṃ cana

“हे देवी, इस प्रकार मनुष्यों के लिए मांस का त्याग बहुत गुणों वाला है। परन्तु यदि जीता हुआ मनुष्य किसी भी प्रकार मांस को पूरी तरह न छोड़ सके,”

श्लोक 14 (13.233.14)

त्रिपुण्यमासमात्रं वा वर्जनीयं विशेषतः । न शक्नुयादपि तथा कौमुदीमासमेव च ॥

tripuṇyamāsamātraṃ vā varjanīyaṃ viśeṣataḥ | na śaknuyādapi tathā kaumudīmāsameva ca

“तो वह कम-से-कम तीन पुण्य मासों में उसे विशेष रूप से छोड़े; और यदि वैसा भी न कर सके, तो केवल कौमुदी मास में छोड़े,”

श्लोक 15 (13.233.15)

जन्मनक्षत्रतिथिषु सदा पर्वसु रात्रिषु । वर्जनीयं तथा मांसं परत्र हितमिच्छता ॥

janmanakṣatratithiṣu sadā parvasu rātriṣu | varjanīyaṃ tathā māṃsaṃ paratra hitamicchatā

“तथा अपने जन्म-नक्षत्र और जन्म-तिथियों पर, पर्वों पर और रात्रियों में सदा छोड़े। परलोक में अपना हित चाहने वाले को इसी प्रकार मांस छोड़ना चाहिए।”

श्लोक 16 (13.233.16)

अशक्तः कारणान्मर्त्यो भोक्तुमिच्छेद्विधिं शृणु । अनेन विधिना खादन्कल्मषेण न लिप्यते ॥

aśaktaḥ kāraṇānmartyo bhoktumicchedvidhiṃ śṛṇu | anena vidhinā khādankalmaṣeṇa na lipyate

“जो मनुष्य किसी कारण से मांस छोड़ने में असमर्थ होकर उसे खाना चाहे, वह विधि सुने। इस विधि से खाने वाला पाप से लिप्त नहीं होता।”

श्लोक 17 (13.233.17)

सूनायां च गतप्राणं क्रीत्वा न्यायेन भामिनि । ब्राह्मणातिथिपूजार्थं भोक्तव्यं हितमिच्छता ॥

sūnāyāṃ ca gataprāṇaṃ krītvā nyāyena bhāmini | brāhmaṇātithipūjārthaṃ bhoktavyaṃ hitamicchatā

“हे भामिनी, अपना हित चाहने वाला मनुष्य वधस्थान से पहले ही मरे हुए पशु का मांस न्यायपूर्वक मोल लेकर ब्राह्मणों और अतिथियों के सम्मान के लिए खाए।”

श्लोक 18 (13.233.18)

भैषज्यकारणाद्व्याधौ खादन्पापैर्न लिप्यते । पितृशेषं तथैवाश्नन्मांसं नाशुभमृच्छति ॥

bhaiṣajyakāraṇādvyādhau khādanpāpairna lipyate | pitṛśeṣaṃ tathaivāśnanmāṃsaṃ nāśubhamṛcchati

“रोग में औषधि के रूप में खाने वाला पापों से लिप्त नहीं होता; और जो पितरों के भाग से बचा हुआ मांस खाता है, उसे भी कोई अशुभ फल नहीं मिलता।”

उमोवाच

श्लोक 19 (13.233.19)

गुरुपूजा कथं देव क्रियते धर्मकाङ्क्षिभिः ॥

gurupūjā kathaṃ deva kriyate dharmakāṅkṣibhiḥ

“हे देव, धर्म की कामना करने वाले लोग गुरु की पूजा कैसे करें?”

महेश्वर उवाच

श्लोक 20 (13.233.20)

गुरुपूजां प्रवक्ष्यामि यथावत्तव शोभने ॥

gurupūjāṃ pravakṣyāmi yathāvattava śobhane

“हे शोभने, मैं तुम्हें गुरु-पूजा का विधान यथावत् बताऊँगा।”

श्लोक 21 (13.233.21)

कृतज्ञानां परो धर्म इति वेदानुशासनम् । तस्मात्स्वगुरवः पूज्यास्ते हि पूर्वोपकारिणः ॥

kṛtajñānāṃ paro dharma iti vedānuśāsanam | tasmātsvaguravaḥ pūjyāste hi pūrvopakāriṇaḥ

“कृतज्ञों का परम धर्म यही है—ऐसा वेद का उपदेश है। इसलिए अपने गुरुओं की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वे पहले उपकार करने वाले हैं।”

श्लोक 22 (13.233.22)

गुरूणां च गरीयांसस्त्रयो लोकेषु पूजिताः । उपाध्यायः पिता माता संपूज्यास्ते विशेषतः ॥

gurūṇāṃ ca garīyāṃsastrayo lokeṣu pūjitāḥ | upādhyāyaḥ pitā mātā saṃpūjyāste viśeṣataḥ

“गुरुओं में भी तीनों लोकों में तीन सबसे श्रेष्ठ माने गए हैं—उपाध्याय, पिता और माता। इनकी विशेष रूप से पूजा करनी चाहिए।”

श्लोक 23 (13.233.23)

ये पितृभ्रातरो ज्येष्ठा ये च तस्यानुजास्तथा । पितुः पिता च सर्वे ते पूजनीया यथा पिता ॥

ye pitṛbhrātaro jyeṣṭhā ye ca tasyānujāstathā | pituḥ pitā ca sarve te pūjanīyā yathā pitā

“पिता के जो बड़े भाई हैं और जो उनके छोटे भाई हैं, तथा पिता के पिता—ये सब पिता के समान पूजनीय हैं।”

श्लोक 24 (13.233.24)

मातुर्या भगिनी ज्येष्ठा मातुर्या च यवीयसी । मातामही च धात्री च सर्वास्ता मातरः स्मृताः ॥

māturyā bhaginī jyeṣṭhā māturyā ca yavīyasī | mātāmahī ca dhātrī ca sarvāstā mātaraḥ smṛtāḥ

“माता की जो बड़ी बहन है और जो छोटी बहन है, नानी और धाय—ये सब माताएँ ही मानी गई हैं।”

श्लोक 25 (13.233.25)

उपाध्यायस्य यः पुत्रो यश्च तस्य भवेद्गुरुः । ऋत्विग्गुरुः पिता चेति गुरवः परिकीर्तिताः ॥

upādhyāyasya yaḥ putro yaśca tasya bhavedguruḥ | ṛtvigguruḥ pitā ceti guravaḥ parikīrtitāḥ

“उपाध्याय का पुत्र, जो उसका गुरु हो, ऋत्विक्, गुरु और पिता—ये गुरु कहे गए हैं।”

श्लोक 26 (13.233.26)

ज्येष्ठो भ्राता नरेन्द्रश्च मातुलः श्वशुरस्तथा । भयत्राता च भर्ता च गुरवस्ते प्रकीर्तिताः ॥

jyeṣṭho bhrātā narendraśca mātulaḥ śvaśurastathā | bhayatrātā ca bhartā ca guravaste prakīrtitāḥ

“बड़ा भाई, राजा, मामा, ससुर, भय से बचाने वाला और भरण करने वाला पति या स्वामी—ये गुरु कहे गए हैं।”

श्लोक 27 (13.233.27)

इत्येष कथितः स्वर्ग्यो गुरूणां सर्वसंग्रहः । अनुवृत्तिं च पूजां च तेषामपि निबोध मे ॥

ityeṣa kathitaḥ svargyo gurūṇāṃ sarvasaṃgrahaḥ | anuvṛttiṃ ca pūjāṃ ca teṣāmapi nibodha me

“इस प्रकार स्वर्ग देने वाली गुरुओं की यह पूरी सूची मैंने तुम्हें बता दी। अब उनकी आज्ञा-पालन और पूजा का प्रकार भी मुझसे सुनो।”

श्लोक 28 (13.233.28)

अवध्यौ मातृपितरौ उपाध्यायस्तथैव च । कथं चिन्नावमन्तव्या नरेण हितमिच्छता ॥

avadhyau mātṛpitarau upādhyāyastathaiva ca | kathaṃ cinnāvamantavyā nareṇa hitamicchatā

“माता और पिता अवध्य हैं, और उपाध्याय भी। अपना हित चाहने वाले मनुष्य को इनका किसी भी प्रकार अपमान नहीं करना चाहिए।”

श्लोक 29 (13.233.29)

येन प्रीणाति च पिता तेन प्रीतः प्रजापतिः । येन प्रीणाति चेन्माता प्रीताः स्युर्देवमातरः ॥

yena prīṇāti ca pitā tena prītaḥ prajāpatiḥ | yena prīṇāti cenmātā prītāḥ syurdevamātaraḥ

“जिस कार्य से पिता प्रसन्न होता है, उससे प्रजापति प्रसन्न होते हैं; और जिससे माता प्रसन्न होती है, उससे देवमाताएँ प्रसन्न होती हैं।”

श्लोक 30 (13.233.30)

येन प्रीणात्युपाध्यायो ब्रह्मा तेनाभिपूजितः । अप्रीतेषु पुनस्तेषु नरो नरकमेति हि ॥

yena prīṇātyupādhyāyo brahmā tenābhipūjitaḥ | aprīteṣu punasteṣu naro narakameti hi

“जिससे उपाध्याय प्रसन्न होता है, उससे ब्रह्मा की पूजा हो जाती है। पर उनके अप्रसन्न रहने पर मनुष्य निश्चय ही नरक को जाता है।”

श्लोक 31 (13.233.31)

गुरूणां वैरनिर्बन्धो न कर्तव्यः कथं चन । नरकं स गुरुप्रीत्या मनसापि न गच्छति ॥

gurūṇāṃ vairanirbandho na kartavyaḥ kathaṃ cana | narakaṃ sa guruprītyā manasāpi na gacchati

“गुरुओं के साथ किसी भी प्रकार वैर नहीं पालना चाहिए। गुरु की प्रसन्नता से मनुष्य मन से भी नरक की ओर नहीं जाता।”

श्लोक 32 (13.233.32)

न ब्रूयाद्विप्रियं तेषामनिष्टे न प्रवर्तयेत् । विगृह्य न वदेत्तेषां समीपे स्पर्धया क्व चित् ॥

na brūyādvipriyaṃ teṣāmaniṣṭe na pravartayet | vigṛhya na vadetteṣāṃ samīpe spardhayā kva cit

“उन्हें अप्रिय बात न कहे, उनके अनिष्ट कार्य में प्रवृत्त न हो, और स्पर्धा के कारण कभी उनके निकट झगड़ालू बात न बोले।”

श्लोक 33 (13.233.33)

यद्यदिच्छन्ति ते कर्तुमस्वतन्त्रस्तदाचरेत् । वेदानुशासनसमं गुरुशासनमिष्यते ॥

yadyadicchanti te kartumasvatantrastadācaret | vedānuśāsanasamaṃ guruśāsanamiṣyate

“वे जो-जो करना चाहें, वही वह अपनी स्वतन्त्रता छोड़कर करे। गुरु की आज्ञा वेद की आज्ञा के समान मानी गई है।”

श्लोक 34 (13.233.34)

कलहांश्च विवादांश्च गुरुभिः सह वर्जयेत् । कैतवं परिहासांश्च मन्युकामाश्रयाः कथाः ॥

kalahāṃśca vivādāṃśca gurubhiḥ saha varjayet | kaitavaṃ parihāsāṃśca manyukāmāśrayāḥ kathāḥ

“गुरुओं के साथ कलह और विवाद, छल, परिहास तथा क्रोध और कामना पर आधारित बातों से वह बचे।”

श्लोक 35 (13.233.35)

गुरूणां योऽनहंवादी करोत्याज्ञामतन्द्रितः । न तस्मात्सर्वमर्त्येषु विद्यते पुण्यकृत्तमः ॥

gurūṇāṃ yo'nahaṃvādī karotyājñāmatandritaḥ | na tasmātsarvamartyeṣu vidyate puṇyakṛttamaḥ

“जो गुरुओं के सामने अहंकार की बात नहीं करता और आलस्य छोड़कर उनकी आज्ञा का पालन करता है, उससे बढ़कर पुण्य करने वाला सब मनुष्यों में कोई नहीं है।”

श्लोक 36 (13.233.36)

असूयामपवादांश्च गुरूणां परिवर्जयेत् । तेषां प्रियहितान्वेषी भूत्वा परिचरेत्सदा ॥

asūyāmapavādāṃśca gurūṇāṃ parivarjayet | teṣāṃ priyahitānveṣī bhūtvā paricaretsadā

“गुरुओं के प्रति ईर्ष्या और निन्दा से वह बचे, और उनका प्रिय तथा हित चाहने वाला होकर सदा उनकी सेवा करे।”

श्लोक 37 (13.233.37)

न तद्यज्ञफलं कुर्यात्तपो वाचरितं महत् । यत्कुर्यात्पुरुषस्येह गुरुपूजा सदा कृता ॥

na tadyajñaphalaṃ kuryāttapo vācaritaṃ mahat | yatkuryātpuruṣasyeha gurupūjā sadā kṛtā

“सदा की हुई गुरु-पूजा मनुष्य के लिए यहाँ जो फल देती है, वह न यज्ञ का फल दे सकता है, न किया हुआ महान् तप।”

श्लोक 38 (13.233.38)

अनुवृत्तेर्विना धर्मो नास्ति सर्वाश्रमेष्वपि । तस्मात्समादृतः काले गुरुवृत्तिं समाचरेत् ॥

anuvṛttervinā dharmo nāsti sarvāśrameṣvapi | tasmātsamādṛtaḥ kāle guruvṛttiṃ samācaret

“आज्ञा-पालन के बिना किसी भी आश्रम में धर्म नहीं है। इसलिए आदरपूर्वक वह उचित समय पर गुरु की सेवा का आचरण करे।”

श्लोक 39 (13.233.39)

स्वमर्थं स्वशरीरं च गुर्वर्थं संत्यजेद्बुधः । विवादं धनहेतोर्वा मोहाद्वा तैर्न रोचयेत् ॥

svamarthaṃ svaśarīraṃ ca gurvarthaṃ saṃtyajedbudhaḥ | vivādaṃ dhanahetorvā mohādvā tairna rocayet

“समझदार मनुष्य गुरु के लिए अपना धन और अपना शरीर भी त्याग दे; धन के कारण या मोह से उनके साथ विवाद करना न चाहे।”

श्लोक 40 (13.233.40)

ब्रह्मचर्यमहिंसा च दानानि विविधानि च । गुरुभिः प्रतिषिद्धस्य सर्वमेतदपार्थकम् ॥

brahmacaryamahiṃsā ca dānāni vividhāni ca | gurubhiḥ pratiṣiddhasya sarvametadapārthakam

“ब्रह्मचर्य, अहिंसा और अनेक प्रकार के दान—ये सब उसके लिए निष्फल हैं जिसे गुरुओं ने रोक दिया हो।”

श्लोक 41 (13.233.41)

उपाध्यायं पितरं मातरं च । येऽभिद्रुह्युर्मनसा कर्मणा वा । तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं । तेभ्यो नान्यः पापकृदस्ति लोके ॥

upādhyāyaṃ pitaraṃ mātaraṃ ca | ye'bhidruhyurmanasā karmaṇā vā | teṣāṃ pāpaṃ bhrūṇahatyāviśiṣṭaṃ | tebhyo nānyaḥ pāpakṛdasti loke

“जो उपाध्याय, पिता और माता से मन या कर्म से द्रोह करते हैं, उनका पाप भ्रूणहत्या से भी बढ़कर है; संसार में उनसे बड़ा पाप करने वाला कोई नहीं।”

उमोवाच

श्लोक 42 (13.233.42)

उपवासविधिं तत्र तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

upavāsavidhiṃ tatra tanme śaṃsitumarhasi

“तब आप मुझे उपवास की विधि बताने की कृपा करें।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 43 (13.233.43)

शरीरमलकार्श्यार्थमिन्द्रियोच्छोषणाय च । एकभुक्तोपवासैस्तु धारयन्ते व्रतं नराः ॥

śarīramalakārśyārthamindriyocchoṣaṇāya ca | ekabhuktopavāsaistu dhārayante vrataṃ narāḥ

“शरीर के मल को क्षीण करने और इन्द्रियों को सुखाने के लिए मनुष्य उपवास और एक बार भोजन करके व्रत धारण करते हैं,”

श्लोक 44 (13.233.44)

लभन्ते विपुलं धर्मं तथाहारपरिक्षयात् । बहूनामुपरोधं तु न कुर्यादात्मकारणात् ॥

labhante vipulaṃ dharmaṃ tathāhāraparikṣayāt | bahūnāmuparodhaṃ tu na kuryādātmakāraṇāt

“और आहार घटाने से वे बहुत धर्म पाते हैं। परन्तु अपने लिए बहुतों को कष्ट नहीं देना चाहिए,”

श्लोक 45 (13.233.45)

जीवोपघातं च तथा धान्यं संजीव्यमिष्यते । तस्मात्पुण्यं लभेन्मर्त्यः स्वयमाहारकर्शनात् ॥

jīvopaghātaṃ ca tathā dhānyaṃ saṃjīvyamiṣyate | tasmātpuṇyaṃ labhenmartyaḥ svayamāhārakarśanāt

“और जीवों की हानि भी नहीं करनी चाहिए; अन्न को जीवों को जिलाने वाला माना गया है। इसलिए मनुष्य स्वयं अपना आहार घटाने से पुण्य पाता है।”

श्लोक 46 (13.233.46)

तद्गृहस्थैर्यथाशक्ति कर्तव्यमिति निश्चयः । उपवासार्दिते काय आपदर्थं पयो जलम् । भुञ्जन्न व्रतघाती स्याद्ब्राह्मणाननुमान्य च ॥

tadgṛhasthairyathāśakti kartavyamiti niścayaḥ | upavāsārdite kāya āpadarthaṃ payo jalam | bhuñjanna vrataghātī syādbrāhmaṇānanumānya ca

“इसलिए गृहस्थों को यह यथाशक्ति करना चाहिए—यह निश्चय है। उपवास से शरीर के पीड़ित होने पर आपत्ति में वह दूध या जल ले सकता है, और ब्राह्मणों की अनुमति लेकर लेने से वह व्रत का नाशक नहीं होता।”

उमोवाच

श्लोक 47 (13.233.47)

ब्रह्मचर्यं कथं देव रक्षितव्यं विजानता ॥

brahmacaryaṃ kathaṃ deva rakṣitavyaṃ vijānatā

“हे देव, ज्ञानी पुरुष को ब्रह्मचर्य की रक्षा कैसे करनी चाहिए?”

महेश्वर उवाच

श्लोक 48 (13.233.48)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता । ब्रह्मचर्यं परं शौचं ब्रह्मचर्यं परं तपः ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi śṛṇu devi samāhitā | brahmacaryaṃ paraṃ śaucaṃ brahmacaryaṃ paraṃ tapaḥ

“वह मैं तुम्हें बताऊँगा; हे देवी, एकाग्र होकर सुनो। ब्रह्मचर्य परम शुद्धि है, ब्रह्मचर्य परम तप है;”

श्लोक 49 (13.233.49)

केवलं ब्रह्मचर्येण प्राप्यते परमं पदम् । संकल्पाद्दर्शनाच्चैव तद्युक्तवचनादपि ॥

kevalaṃ brahmacaryeṇa prāpyate paramaṃ padam | saṃkalpāddarśanāccaiva tadyuktavacanādapi

“केवल ब्रह्मचर्य से परम पद प्राप्त होता है—संकल्प से, दर्शन से और उससे सम्बन्धित वचन से रक्षा करते हुए,”

श्लोक 50 (13.233.50)

संस्पर्शादथ संयोगात्पञ्चधा रक्षितं परम् । व्रतवद्धारितं चैव ब्रह्मचर्यमकल्मषम् ॥

saṃsparśādatha saṃyogātpañcadhā rakṣitaṃ param | vratavaddhāritaṃ caiva brahmacaryamakalmaṣam

“स्पर्श से और संयोग से भी। इन पाँच प्रकारों से रक्षित ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ है, और व्रत की तरह धारण किया जाए तो निष्कलंक है।”

श्लोक 51 (13.233.51)

नित्यसंरक्षणं तस्य नैष्ठिकानां विधीयते । तदिष्यते गृहस्थानां कालमुद्दिश्य कारणम् ॥

nityasaṃrakṣaṇaṃ tasya naiṣṭhikānāṃ vidhīyate | tadiṣyate gṛhasthānāṃ kālamuddiśya kāraṇam

“आजीवन ब्रह्मचारियों के लिए उसकी निरन्तर रक्षा का विधान है; गृहस्थों के लिए समय और कारण को ध्यान में रखकर उसका विधान माना गया है—”

श्लोक 52 (13.233.52)

जन्मनक्षत्रयोगेषु पुण्यवासेषु पर्वसु । देवताधर्मकार्येषु ब्रह्मचर्यव्रतं चरेत् ॥

janmanakṣatrayogeṣu puṇyavāseṣu parvasu | devatādharmakāryeṣu brahmacaryavrataṃ caret

“जन्म-नक्षत्र के योगों में, पुण्य दिनों में, पर्वों में, तथा देवकार्य और धर्मकार्य के अवसरों पर वह ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करे।”

श्लोक 53 (13.233.53)

ब्रह्मचर्यव्रतफलं लभेद्दारव्रती सदा । शौचमायुस्तथारोग्यं लभ्यते ब्रह्मचारिभिः ॥

brahmacaryavrataphalaṃ labheddāravratī sadā | śaucamāyustathārogyaṃ labhyate brahmacāribhiḥ

“जो केवल अपनी पत्नी के प्रति ही व्रतधारी है, वह सदा ब्रह्मचर्य-व्रत का फल पाता है। ब्रह्मचारियों को शुद्धि, आयु और आरोग्य प्राप्त होते हैं।”

उमोवाच

श्लोक 54 (13.233.54)

तीर्थचर्या कथं देव क्रियते धर्मकाङ्क्षिभिः । कानि तीर्थानि लोकेश तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

tīrthacaryā kathaṃ deva kriyate dharmakāṅkṣibhiḥ | kāni tīrthāni lokeśa tanme śaṃsitumarhasi

“हे देव, धर्म की कामना करने वाले लोग तीर्थयात्रा कैसे करते हैं? और हे लोकेश्वर, तीर्थ कौन-से हैं? यह मुझे बताने की कृपा करें।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 55 (13.233.55)

हन्त ते कथयिष्यामि तीर्थस्नानविधिं प्रिये । पावनार्थं च शौचार्थं ब्रह्मणा निर्मिताः पुरा ॥

hanta te kathayiṣyāmi tīrthasnānavidhiṃ priye | pāvanārthaṃ ca śaucārthaṃ brahmaṇā nirmitāḥ purā

“अच्छा प्रिये, मैं तुम्हें तीर्थ-स्नान की विधि बताता हूँ। पुराने समय में ब्रह्मा ने इन्हें पवित्र करने और शुद्ध करने के लिए बनाया था।”

श्लोक 56 (13.233.56)

यास्तु लोके महानद्यस्ताः सर्वास्तीर्थसंज्ञिताः । तासां प्राक्स्रोतसः श्रेष्ठाः संगमश्च परस्परम् ॥

yāstu loke mahānadyastāḥ sarvāstīrthasaṃjñitāḥ | tāsāṃ prāksrotasaḥ śreṣṭhāḥ saṃgamaśca parasparam

“संसार में जो महानदियाँ हैं, वे सब तीर्थ कहलाती हैं। उनमें पूर्व की ओर बहने वाली धाराएँ श्रेष्ठ हैं, और एक-दूसरे से उनका संगम भी;”

श्लोक 57 (13.233.57)

तासां सागरसंयोगो वरिष्ठश्चेति विद्यते । तासामुभयतः कूलं यत्र तत्र महर्षिभिः ॥

tāsāṃ sāgarasaṃyogo variṣṭhaśceti vidyate | tāsāmubhayataḥ kūlaṃ yatra tatra maharṣibhiḥ

“और उनका समुद्र से मिलन सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। उन नदियों के दोनों तटों पर जहाँ कहीं महर्षियों ने”

श्लोक 58 (13.233.58)

देवैर्वा सेवितं देवि तत्तीर्थं परमं स्मृतम् । समुद्रश्च महातीर्थं पावनं परमं शुभम् ॥

devairvā sevitaṃ devi tattīrthaṃ paramaṃ smṛtam | samudraśca mahātīrthaṃ pāvanaṃ paramaṃ śubham

“या देवताओं ने निवास किया हो, हे देवी, वह तीर्थ परम माना गया है। समुद्र भी महातीर्थ है—पावन, परम और शुभ;”

श्लोक 59 (13.233.59)

तस्य कूलगतास्तीर्था महद्भिश्च समाप्लुताः । स्रोतसां पर्वतानां च जोषितानां महर्षिभिः ॥

tasya kūlagatāstīrthā mahadbhiśca samāplutāḥ | srotasāṃ parvatānāṃ ca joṣitānāṃ maharṣibhiḥ

“उसके तटों पर स्थित तीर्थ महापुरुषों के स्नान से पवित्र हुए हैं, और महर्षियों से सेवित नदियों तथा पर्वतों के तीर्थ भी,”

श्लोक 60 (13.233.60)

अपि कूपतटाकं वा मुनिभिः सेवितं प्रिये । तत्तु तीर्थमिति ज्ञेयं प्रभावात्तु तपस्विनाम् ॥

api kūpataṭākaṃ vā munibhiḥ sevitaṃ priye | tattu tīrthamiti jñeyaṃ prabhāvāttu tapasvinām

“और हे प्रिये, मुनियों से सेवित कुआँ या तालाब भी तपस्वियों के प्रभाव से तीर्थ ही जानना चाहिए।”

श्लोक 61 (13.233.61)

तदाप्रभृति तीर्थत्वं लेभे लोकहिताय वै । एवं तीर्थोद्भवं विद्धि तस्य स्नानविधिं शृणु ॥

tadāprabhṛti tīrthatvaṃ lebhe lokahitāya vai | evaṃ tīrthodbhavaṃ viddhi tasya snānavidhiṃ śṛṇu

“तभी से उसे लोक के हित के लिए तीर्थ का पद मिला। इस प्रकार तीर्थों की उत्पत्ति जानो, और अब उनमें स्नान की विधि सुनो।”

श्लोक 62 (13.233.62)

तन्मना व्रतभूयिष्ठो गत्वा तीर्थाभिकाङ्क्षया । उपवासत्रयं कुर्यादेकं वा नियमान्वितः ॥

tanmanā vratabhūyiṣṭho gatvā tīrthābhikāṅkṣayā | upavāsatrayaṃ kuryādekaṃ vā niyamānvitaḥ

“मन को उसी में लगाकर, व्रतों में तत्पर होकर, तीर्थ की इच्छा से जाए, और नियमपूर्वक तीन दिन का उपवास करे, अथवा एक दिन का,”

श्लोक 63 (13.233.63)

पुण्यमासयुते काले पौर्णमास्यां यथाविधि । बहिरेव शुचिर्भूत्वा तत्तीर्थं तन्मनाविशेत् ॥

puṇyamāsayute kāle paurṇamāsyāṃ yathāvidhi | bahireva śucirbhūtvā tattīrthaṃ tanmanāviśet

“किसी पुण्य मास से युक्त समय में, पूर्णिमा के दिन, विधि के अनुसार। पहले बाहर शुद्ध होकर वह उस तीर्थ में मन लगाकर प्रवेश करे।”

श्लोक 64 (13.233.64)

त्रिराप्लुत्य जलाभ्याशे दत्त्वा ब्राह्मणदक्षिणाम् । अभ्यर्च्य देवायतनं ततः प्रायाद्यथागतम् ॥

trirāplutya jalābhyāśe dattvā brāhmaṇadakṣiṇām | abhyarcya devāyatanaṃ tataḥ prāyādyathāgatam

“जल के समीप तीन बार डुबकी लगाकर, ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर और देवमन्दिर में पूजा करके वह जैसे आया था वैसे ही लौट जाए।”

श्लोक 65 (13.233.65)

एतद्विधानं सर्वेषां तीर्थंतीर्थमिति प्रिये । समीपतीर्थस्नानात्तु दूरतीर्थं सुपूजितम् ॥

etadvidhānaṃ sarveṣāṃ tīrthaṃtīrthamiti priye | samīpatīrthasnānāttu dūratīrthaṃ supūjitam

“प्रिये, यह विधान सब तीर्थों के लिए, एक-एक तीर्थ के लिए, है। पास के तीर्थ में स्नान करने की अपेक्षा दूर के तीर्थ का अधिक आदर किया गया है।”

श्लोक 66 (13.233.66)

आदिप्रभृतिशुद्धस्य तीर्थस्नानं शुभं भवेत् । तपोऽर्थं पापनाशार्थं शौचार्थं तीर्थगाहनम् ॥

ādiprabhṛtiśuddhasya tīrthasnānaṃ śubhaṃ bhavet | tapo'rthaṃ pāpanāśārthaṃ śaucārthaṃ tīrthagāhanam

“जो आरम्भ से ही शुद्ध है, उसके लिए तीर्थ-स्नान शुभ होता है। तीर्थ में स्नान तप के लिए, पाप के नाश के लिए और शुद्धि के लिए है।”

श्लोक 67 (13.233.67)

एवं पुण्येषु मासेषु तीर्थस्नानं शुभं भवेत् । एतन्नैयमिकं सर्वं सुकृतं कथितं तव ॥

evaṃ puṇyeṣu māseṣu tīrthasnānaṃ śubhaṃ bhavet | etannaiyamikaṃ sarvaṃ sukṛtaṃ kathitaṃ tava

“इस प्रकार पुण्य मासों में तीर्थ-स्नान शुभ होता है। नियमों से सम्बन्धित यह सब सुकृत मैंने तुम्हें बता दिया।”

श्लोक 68 (13.233.68)

दानानि देवपूजां च पितृपूजां तथैव च । अन्यानि धर्मकार्याणि सुकृतं सोपसाधनम् । तत्सर्वं शृणु कल्याणि प्रजानां हितकाम्यया ॥

dānāni devapūjāṃ ca pitṛpūjāṃ tathaiva ca | anyāni dharmakāryāṇi sukṛtaṃ sopasādhanam | tatsarvaṃ śṛṇu kalyāṇi prajānāṃ hitakāmyayā

“दान, देव-पूजा, पितृ-पूजा तथा अन्य धर्मकार्य—साधनों-सहित वह सुकृत: हे कल्याणी, प्रजा के हित की कामना से वह सब सुनो।”

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