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अनुशासन पर्व · अध्याय 234

दान के छह अंग और उसका फल

उमा की इस शंका पर कि सबकी साझा वस्तु देकर मनुष्य पुण्य कैसे पाता है, महेश्वर उत्तर देते हैं। वे दान के छह अंग बताते हैं (दाता, पात्र, देय वस्तु, उपक्रम, देश और काल), योग्य दाता और पात्र का वर्णन करते हैं, त्यागने योग्य धन और पुण्य स्थानों तथा कालों का उल्लेख करते हैं, और चेताते हैं कि पछतावा, बखान और फल की कामना दान को निष्फल कर देती है।

अध्याय 233अध्याय-सूचीअध्याय 235

महेश्वर उवाच

श्लोक 1 (13.234.1)

चेतनाचेतनैर्युक्तं यल्लोके विद्यते धनम् । एतदर्थमवाप्नोति नरः प्रेत्य शुभेक्षणे ॥

cetanācetanairyuktaṃ yalloke vidyate dhanam | etadarthamavāpnoti naraḥ pretya śubhekṣaṇe

“संसार में जो धन है, जो चेतन और अचेतन वस्तुओं से बना है—इसी के लिए, हे सुन्दर नेत्रोंवाली, मनुष्य परलोक में फल पाता है।”

उमोवाच

श्लोक 2 (13.234.2)

लोकसिद्धं तु यद्द्रव्यं सर्वसाधारणं भवेत् । तद्ददत्सर्वसामान्यं कथं धर्मं लभेन्नरः । एवं साधारणे द्रव्ये तस्य स्वत्वं कथं भवेत् ॥

lokasiddhaṃ tu yaddravyaṃ sarvasādhāraṇaṃ bhavet | taddadatsarvasāmānyaṃ kathaṃ dharmaṃ labhennaraḥ | evaṃ sādhāraṇe dravye tasya svatvaṃ kathaṃ bhavet

“संसार में जो वस्तु लोक-प्रसिद्ध है और सब की साझा है, उस सर्वसाधारण वस्तु को देता हुआ मनुष्य धर्म कैसे पा सकता है? जब द्रव्य इस प्रकार सबका साझा है, तब उस पर किसी का अपना स्वत्व कैसे हो सकता है?”

महेश्वर उवाच

श्लोक 3 (13.234.3)

लोके भूतमयं द्रव्यं सर्वसाधारणं तथा । तथैव तद्ददन्मर्त्यो लभेत्पुण्यं स तच्छृणु ॥

loke bhūtamayaṃ dravyaṃ sarvasādhāraṇaṃ tathā | tathaiva taddadanmartyo labhetpuṇyaṃ sa tacchṛṇu

“संसार में धन भूतों से बना है और सबके लिए साधारण है; फिर भी उसे वैसे ही देता हुआ मनुष्य पुण्य पाता है। उसे सुनो।”

श्लोक 4 (13.234.4)

दाता प्रतिग्रहीता च देयं सोपक्रमं तथा । देशकालौ च यत्त्वेतद्दानं षड्गुणमुच्यते । तेषां सम्पद्विशेषांश्च कीर्त्यमानान्निबोध मे ॥

dātā pratigrahītā ca deyaṃ sopakramaṃ tathā | deśakālau ca yattvetaddānaṃ ṣaḍguṇamucyate | teṣāṃ sampadviśeṣāṃśca kīrtyamānānnibodha me

“दाता, प्रतिग्रहीता, उपक्रम-सहित देय वस्तु, तथा देश और काल—इन छह अंगों से युक्त दान कहा जाता है। उनकी विशेष सम्पदाओं को, जैसे मैं बताता हूँ, मुझसे सुनो।”

श्लोक 5 (13.234.5)

आदिप्रभृति यः शुद्धो मनोवाक्कायकर्मभिः । सत्यवादी जितक्रोधस्त्वलुब्धो नाभ्यसूयकः । श्रद्धावानास्तिकश्चैव एवं दाता प्रशस्यते ॥

ādiprabhṛti yaḥ śuddho manovākkāyakarmabhiḥ | satyavādī jitakrodhastvalubdho nābhyasūyakaḥ | śraddhāvānāstikaścaiva evaṃ dātā praśasyate

“जो आरम्भ से ही मन, वाणी, शरीर और कर्म से शुद्ध है, सत्यवादी, क्रोध को जीतनेवाला, लोभरहित, दोष न निकालनेवाला, श्रद्धावान् और आस्तिक है—ऐसा दाता प्रशंसित होता है।”

श्लोक 6 (13.234.6)

शुद्धो दान्तो जितक्रोधस्तथा दीनकुलोद्भवः । श्रुतचारित्रसम्पन्नस्तथा बहुकलत्रवान् ॥

śuddho dānto jitakrodhastathā dīnakulodbhavaḥ | śrutacāritrasampannastathā bahukalatravān

“शुद्ध, दमन करनेवाला, क्रोध को जीतनेवाला, दीन कुल में जन्मा, शास्त्र-ज्ञान और सदाचार से सम्पन्न और बहुत-सी पत्नियोंवाला—”

श्लोक 7 (13.234.7)

पञ्चयज्ञपरो नित्यं निर्विकारशरीरवान् । एतान्पात्रगुणान्विद्धि तादृक्पात्रं प्रशस्यते ॥

pañcayajñaparo nityaṃ nirvikāraśarīravān | etānpātraguṇānviddhi tādṛkpātraṃ praśasyate

“सदा पाँच यज्ञों में लगा हुआ और निर्दोष शरीरवाला—इन्हें पात्र के गुण जानो; ऐसा पात्र प्रशंसित होता है।”

श्लोक 8 (13.234.8)

पितृदेवाग्निकार्येषु तस्य दत्तं महाफलम् । यद्यदर्हति यो लोके पात्रं तस्य भवेच्च सः । मुच्येदापद आपन्नो येन पात्रं तदस्य तु ॥

pitṛdevāgnikāryeṣu tasya dattaṃ mahāphalam | yadyadarhati yo loke pātraṃ tasya bhavecca saḥ | mucyedāpada āpanno yena pātraṃ tadasya tu

“पितरों, देवताओं और अग्नि के कार्यों में उसे दिया हुआ दान महान् फल देता है। संसार में जो मनुष्य जिस वस्तु के योग्य है, वह उसके लिए पात्र होता है; और जिसके द्वारा विपत्ति में पड़ा हुआ मनुष्य विपत्ति से छूट जाए, वह उसके लिए पात्र है।”

श्लोक 9 (13.234.9)

अन्नस्य क्षुधितं पात्रं तृषितस्तु जलस्य वै । एवं पात्रेषु नानात्वमिष्यते पुरुषं प्रति ॥

annasya kṣudhitaṃ pātraṃ tṛṣitastu jalasya vai | evaṃ pātreṣu nānātvamiṣyate puruṣaṃ prati

“भूखा मनुष्य अन्न का पात्र है और प्यासा जल का। इस प्रकार मनुष्य-मनुष्य के अनुसार पात्रों में भेद माना जाता है।”

श्लोक 10 (13.234.10)

जारश्चोरश्च षण्डश्च हिंस्रः समयभेदकः । लोकविघ्नकराश्चान्ये वर्जितव्याः सर्वशः प्रिये ॥

jāraścoraśca ṣaṇḍaśca hiṃsraḥ samayabhedakaḥ | lokavighnakarāścānye varjitavyāḥ sarvaśaḥ priye

“व्यभिचारी, चोर, नपुंसक, हिंसक, मर्यादा तोड़नेवाला और लोक में विघ्न डालनेवाले दूसरे लोग, हे प्रिये, सर्वथा त्यागने योग्य हैं।”

श्लोक 11 (13.234.11)

परोपघाताद्यद्द्रव्यं चौर्याद्वा लभ्यते नृभिः । निर्दयाल्लभ्यते यच्च धूर्तभावेन वै तथा ॥

paropaghātādyaddravyaṃ cauryādvā labhyate nṛbhiḥ | nirdayāllabhyate yacca dhūrtabhāvena vai tathā

“जो धन मनुष्य दूसरों को हानि पहुँचाकर, चोरी से, निर्दयता से, या उसी प्रकार धूर्तता से पाते हैं,”

श्लोक 12 (13.234.12)

अधर्मादर्थमोहाद्वा बहूनामुपरोधनात् । यल्लभ्यते धनं देवि तदत्यन्तविगर्हितम् ॥

adharmādarthamohādvā bahūnāmuparodhanāt | yallabhyate dhanaṃ devi tadatyantavigarhitam

“अथवा अधर्म से, धन के मोह से, या बहुतों को रोककर जो धन मिलता है, हे देवी, वह अत्यन्त निन्दित है।”

श्लोक 13 (13.234.13)

तादृशेन कृतं धर्मं निष्फलं विद्धि भामिनि । तस्मान्न्यायागतेनैव दातव्यं शुभमिच्छता ॥

tādṛśena kṛtaṃ dharmaṃ niṣphalaṃ viddhi bhāmini | tasmānnyāyāgatenaiva dātavyaṃ śubhamicchatā

“हे भामिनी, ऐसे धन से किया हुआ धर्म निष्फल जानो। इसलिए शुभ चाहनेवाले को न्याय से प्राप्त धन से ही दान देना चाहिए।”

श्लोक 14 (13.234.14)

यद्यदात्मप्रियं नित्यं तत्तद्देयमिति स्थितिः । उपक्रममिमं विद्धि दातॄणां परमं हितम् ॥

yadyadātmapriyaṃ nityaṃ tattaddeyamiti sthitiḥ | upakramamimaṃ viddhi dātṝṇāṃ paramaṃ hitam

“जो वस्तु अपने को सदा प्रिय हो, वही देनी चाहिए—ऐसी मर्यादा है। इसे दाताओं के लिए उपक्रम जानो, जो उनका परम हित है।”

श्लोक 15 (13.234.15)

पात्रभूतं तु दूरस्थमभिगम्य प्रसाद्य च । दाता दानं तथा दद्याद्यथा तुष्येत तेन सः । एष दानविधिः श्रेष्ठः समाहूय तु मध्यमः ॥

pātrabhūtaṃ tu dūrasthamabhigamya prasādya ca | dātā dānaṃ tathā dadyādyathā tuṣyeta tena saḥ | eṣa dānavidhiḥ śreṣṭhaḥ samāhūya tu madhyamaḥ

“दूर रहनेवाले योग्य पात्र के पास स्वयं जाकर और उसे प्रसन्न करके दाता ऐसे दान दे कि वह उससे सन्तुष्ट हो। यह दान की श्रेष्ठ विधि है; बुलाकर देना मध्यम है।”

श्लोक 16 (13.234.16)

पूर्वं च पात्रतां ज्ञात्वा समाहूय निवेद्य च । शौचाचमनसंयुक्तं दातव्यं श्रद्धया प्रिये ॥

pūrvaṃ ca pātratāṃ jñātvā samāhūya nivedya ca | śaucācamanasaṃyuktaṃ dātavyaṃ śraddhayā priye

“पहले पात्र की योग्यता जानकर, उसे बुलाकर और सूचित करके, हे प्रिये, शौच और आचमन से युक्त होकर श्रद्धा के साथ दान देना चाहिए।”

श्लोक 17 (13.234.17)

याचितॄणां तु परममाभिमुख्यं पुरस्कृतम् । संमानपूर्वं सङ्ग्राह्यं दातव्यं देशकालयोः ॥

yācitṝṇāṃ tu paramamābhimukhyaṃ puraskṛtam | saṃmānapūrvaṃ saṅgrāhyaṃ dātavyaṃ deśakālayoḥ

“माँगनेवालों के प्रति सबसे उत्तम बात यह है कि उनकी ओर मुख करके उन्हें आगे रखा जाए; उन्हें सम्मानपूर्वक स्वीकार करके उचित देश और काल में देना चाहिए।”

श्लोक 18 (13.234.18)

अपात्रेभ्योऽपि चान्येभ्यो दातव्यं भूतिमिच्छता । पात्राणि सम्परीक्ष्यैव दात्रा वै नाममात्रया ॥

apātrebhyo'pi cānyebhyo dātavyaṃ bhūtimicchatā | pātrāṇi samparīkṣyaiva dātrā vai nāmamātrayā

“समृद्धि चाहनेवाले को अपात्रों और दूसरों को भी देना चाहिए; परन्तु दाता पात्रों की परीक्षा करके ही, केवल नाम-मात्र की मात्रा में दे।”

श्लोक 19 (13.234.19)

अतिशक्त्या परं दानं यथाशक्ति तु मध्यमम् । तृतीयं चापरं दानं नानुरूपमिवात्मनः ॥

atiśaktyā paraṃ dānaṃ yathāśakti tu madhyamam | tṛtīyaṃ cāparaṃ dānaṃ nānurūpamivātmanaḥ

“सामर्थ्य से बढ़कर दिया हुआ दान उत्तम है, सामर्थ्य के अनुसार दिया हुआ मध्यम, और तीसरा निम्न दान वह है जो अपनी स्थिति के अनुरूप न हो।”

श्लोक 20 (13.234.20)

यथा सम्भाषितं पूर्वं दातव्यं तत्तथैव च । पुण्यक्षेत्रेषु यद्दत्तं पुण्यकालेषु वा यथा । तच्छोभनतरं विद्धि गौरवाद्देशकालयोः ॥

yathā sambhāṣitaṃ pūrvaṃ dātavyaṃ tattathaiva ca | puṇyakṣetreṣu yaddattaṃ puṇyakāleṣu vā yathā | tacchobhanataraṃ viddhi gauravāddeśakālayoḥ

“जैसा पहले कहा गया हो, वैसा ही देना चाहिए। जो दान पुण्य क्षेत्रों में या पुण्य काल में दिया जाए, उसे देश और काल के गौरव के कारण और भी श्रेष्ठ जानो।”

उमोवाच

श्लोक 21 (13.234.21)

यश्च पुण्यतमो देशस्तथा कालश्च शंस मे ॥

yaśca puṇyatamo deśastathā kālaśca śaṃsa me

“यह भी मुझे बताइए कि सबसे पुण्य देश कौन-सा है और कौन-सा काल।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 22 (13.234.22)

कुरुक्षेत्रं महानद्यो यश्च देवर्षिसेवितः । गिरिर्वरश्च तीर्थानि देशभागेषु पूजितः । ग्रहीतुमीप्सितो यत्र तत्र दत्तं महाफलम् ॥

kurukṣetraṃ mahānadyo yaśca devarṣisevitaḥ | girirvaraśca tīrthāni deśabhāgeṣu pūjitaḥ | grahītumīpsito yatra tatra dattaṃ mahāphalam

“कुरुक्षेत्र, महानदियाँ, जो स्थान देवर्षियों द्वारा सेवित है, श्रेष्ठ पर्वत और तीर्थ, जो अपने-अपने क्षेत्रों में पूजित हैं, तथा जहाँ पात्र ग्रहण करना चाहे—वहाँ दिया हुआ दान महान् फल देता है।”

श्लोक 23 (13.234.23)

शरद्वसन्तकालश्च पुण्यमासस्तथैव च । शुक्लपक्षश्च पक्षाणां पौर्णमासी च पर्वसु ॥

śaradvasantakālaśca puṇyamāsastathaiva ca | śuklapakṣaśca pakṣāṇāṃ paurṇamāsī ca parvasu

“शरद् और वसन्त ऋतुएँ, पुण्य मास, पक्षों में शुक्ल पक्ष और पर्वों में पूर्णिमा,”

श्लोक 24 (13.234.24)

पितृदैवतनक्षत्रनिर्मलो दिवसस्तथा । तच्छोभनतरं विद्धि चन्द्रसूर्यग्रहे तथा ॥

pitṛdaivatanakṣatranirmalo divasastathā | tacchobhanataraṃ viddhi candrasūryagrahe tathā

“पितरों या देवताओं का नक्षत्र, निर्मल दिन तथा चन्द्र और सूर्य का ग्रहण—इन्हें और भी श्रेष्ठ जानो।”

श्लोक 25 (13.234.25)

प्रतिग्रहीतुर्यः कालो मनसा कीर्तितः शुभे । एवमादिष्टकालेषु दत्तं दानं महद्भवेत् ॥

pratigrahīturyaḥ kālo manasā kīrtitaḥ śubhe | evamādiṣṭakāleṣu dattaṃ dānaṃ mahadbhavet

“और हे शुभे, पात्र ने मन में जिस काल का संकल्प किया हो, वह भी; इस प्रकार के इष्ट कालों में दिया हुआ दान महान् होता है।”

श्लोक 26 (13.234.26)

दाता देयं च पात्रं च उपक्रमयुता क्रिया । देशकालं तथा तेषां सम्पच्छुद्धिः प्रकीर्तिता ॥

dātā deyaṃ ca pātraṃ ca upakramayutā kriyā | deśakālaṃ tathā teṣāṃ sampacchuddhiḥ prakīrtitā

“दाता, देय वस्तु, पात्र, उपक्रम से युक्त क्रिया, और देश तथा काल—इनकी सम्पन्नता और शुद्धि बताई गई है।”

श्लोक 27 (13.234.27)

यथैव युगपत्सम्पत्तत्र दानं महद्भवेत् ॥

yathaiva yugapatsampattatra dānaṃ mahadbhavet

“जहाँ ये सम्पदाएँ एक साथ मिल जाती हैं, वहाँ दान महान् होता है।”

श्लोक 28 (13.234.28)

अत्यल्पमपि यद्दानमेभिः षड्भिर्गुणैर्युतम् । भूत्वाऽनन्तं नयेत्स्वर्गं दातारं दोषवर्जितम् ॥

atyalpamapi yaddānamebhiḥ ṣaḍbhirguṇairyutam | bhūtvā'nantaṃ nayetsvargaṃ dātāraṃ doṣavarjitam

“बहुत छोटा दान भी यदि इन छहों गुणों से युक्त हो, तो अनन्त होकर दोषरहित दाता को स्वर्ग पहुँचा देता है।”

श्लोक 29 (13.234.29)

सुमहद्वाऽपि यद्दानं गुणैरेभिर्विनाकृतम् । अत्यल्पफलनिर्योगमफलं वा फलोद्धतम् ॥

sumahadvā'pi yaddānaṃ guṇairebhirvinākṛtam | atyalpaphalaniryogamaphalaṃ vā phaloddhatam

“परन्तु बहुत बड़ा दान भी यदि इन गुणों से रहित हो, तो उसका फल बहुत थोड़ा होता है, या फल होता ही नहीं; उसका फल मारा जाता है।”

उमोवाच

श्लोक 30 (13.234.30)

एवंगुणयुतं दानं दत्तं च फलतां व्रजेत् । तदस्ति चेन्महद्देयं तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

evaṃguṇayutaṃ dānaṃ dattaṃ ca phalatāṃ vrajet | tadasti cenmahaddeyaṃ tanme śaṃsitumarhasi

“इस प्रकार के गुणों से युक्त दान, दिया जाने पर, फलवान् हो जाएगा। यदि कोई महान् देय वस्तु हो, तो वह मुझे बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 31 (13.234.31)

तदप्यस्ति महाभागे नराणां भावदोषतः ॥

tadapyasti mahābhāge narāṇāṃ bhāvadoṣataḥ

“हे महाभागे, वह भी होता है—मनुष्यों के भाव के दोष से।”

श्लोक 32 (13.234.32)

कृत्वा धर्मं तु विधिवत्पश्चात्तापं करोति चेत् । श्लाघया वा यदि ब्रूयाद्वृथा संसदि यत्कृतम् ॥

kṛtvā dharmaṃ tu vidhivatpaścāttāpaṃ karoti cet | ślāghayā vā yadi brūyādvṛthā saṃsadi yatkṛtam

“यदि मनुष्य विधि के अनुसार धर्म करके पीछे पछताए, अथवा सभा में अपने किए का व्यर्थ बखान करे,”

श्लोक 33 (13.234.33)

प्रकल्पयेच्च मनसा तत्फलं प्रेत्यभावतः । कर्म धर्मकृतं यच्च सततं फलकाङ्क्षया । एतत्कृतं वा दत्तं वा परत्र विफलं भवेत् ॥

prakalpayecca manasā tatphalaṃ pretyabhāvataḥ | karma dharmakṛtaṃ yacca satataṃ phalakāṅkṣayā | etatkṛtaṃ vā dattaṃ vā paratra viphalaṃ bhavet

“अथवा मन में परलोक में उसके फल की कल्पना करे; या धर्म का कर्म सदा फल की इच्छा से करे—तो वह किया हुआ या दिया हुआ दान परलोक में निष्फल हो जाता है।”

श्लोक 34 (13.234.34)

एते दोषा विवर्ज्याश्च दातृभिः पुण्यकाङ्क्षिभिः । सनातनमिदं वृत्तं सद्भिराचरितं तथा ॥

ete doṣā vivarjyāśca dātṛbhiḥ puṇyakāṅkṣibhiḥ | sanātanamidaṃ vṛttaṃ sadbhirācaritaṃ tathā

“पुण्य चाहनेवाले दाताओं को इन दोषों से बचना चाहिए। यह सनातन आचार है और सज्जनों ने भी इसका पालन किया है।”

श्लोक 35 (13.234.35)

अनुग्रहात्परेषां तु गृहस्थानामृणं हि तत् । इत्येवं मन आविश्य दातव्यं सततं बुधैः ॥

anugrahātpareṣāṃ tu gṛhasthānāmṛṇaṃ hi tat | ityevaṃ mana āviśya dātavyaṃ satataṃ budhaiḥ

“दूसरों पर अनुग्रह करके देना गृहस्थों के लिए ऋण है। ऐसा मन में रखकर विद्वानों को सदा दान देना चाहिए।”

श्लोक 36 (13.234.36)

एवमेव कृतं नित्यं सुकृतं तद्भवेन्महत् । सर्वसाधारणं द्रव्यमेवं दत्त्वा महत्फलम् ॥

evameva kṛtaṃ nityaṃ sukṛtaṃ tadbhavenmahat | sarvasādhāraṇaṃ dravyamevaṃ dattvā mahatphalam

“इसी प्रकार सदा किया हुआ कर्म महान् सुकृत बन जाता है। सबकी साझा वस्तु को इस रीति से देकर महान् फल प्राप्त होता है।”

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