अनुशासन पर्व · अध्याय 235
महान् दान: अन्न, स्वर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्या
उमा पूछती हैं कि धर्म के लिए मनुष्यों को क्या देना चाहिए, और महेश्वर नित्य तथा नैमित्तिक दानों का वर्णन करते हैं। वे अन्नदान और उससे मिलनेवाले स्वर्गीय भवनों की महिमा बताते हैं, फिर स्वर्ण, गौओं और भूमि के दान, उनकी विधि और फल का वर्णन करते हैं। अंत में वे कन्यादान और विद्यादान का वर्णन करते हैं और दरिद्रों को विद्या दिलवाने को स्वयं देने के बराबर बताते हैं।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.235.1)
भगवन्कानि देयानि धर्ममुद्दिश्य मानवैः । तान्यहं श्रोतुमिच्छामि तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavankāni deyāni dharmamuddiśya mānavaiḥ | tānyahaṃ śrotumicchāmi tanme śaṃsitumarhasi
“भगवन्, धर्म के उद्देश्य से मनुष्यों को कौन-कौन सी वस्तुएँ देनी चाहिए? मैं उन्हें सुनना चाहती हूँ; कृपया मुझे बताइए।”
महेश्वर उवाच
श्लोक 2 (13.235.2)
अजस्रं धर्मकार्यं च तथा नैमित्तिकं प्रिये । अन्नं प्रतिश्रयो दीपः पानीयं तृणमिन्धनम् ॥
ajasraṃ dharmakāryaṃ ca tathā naimittikaṃ priye | annaṃ pratiśrayo dīpaḥ pānīyaṃ tṛṇamindhanam
“हे प्रिये, धर्म के लिए दान दो प्रकार का होता है: नित्य और नैमित्तिक। नित्य दानों में अन्न, आश्रय, दीपक, पीने का जल, तृण और ईंधन आते हैं,”
श्लोक 3 (13.235.3)
स्नेहो गन्धश्च भैषज्यं तिलाश्च लवणं तथा । एवमादि तथाऽन्यश्च दानमाजस्रमुच्यते ॥
sneho gandhaśca bhaiṣajyaṃ tilāśca lavaṇaṃ tathā | evamādi tathā'nyaśca dānamājasramucyate
“तेल, सुगन्ध, औषधि, तिल और नमक भी। इन्हीं के समान जो और वस्तुएँ हैं, वे सब नित्य दान कहलाती हैं।”
श्लोक 4 (13.235.4)
अजस्रदानात्सततमाजस्रमिति निश्चितम् । सामान्यं सर्ववर्णानां दानं शृणु समाहिता ॥
ajasradānātsatatamājasramiti niścitam | sāmānyaṃ sarvavarṇānāṃ dānaṃ śṛṇu samāhitā
“निरन्तर दिए जाने के कारण ही इन्हें नित्य दान कहा जाता है, यह निश्चित है। अब सब वर्णों के लिए समान दान को ध्यान से सुनो।”
श्लोक 5 (13.235.5)
अन्नं प्राणो मनुष्याणामन्नदः प्राणदो भवेत् । तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छति मानवः ॥
annaṃ prāṇo manuṣyāṇāmannadaḥ prāṇado bhavet | tasmādannaṃ viśeṣeṇa dātumicchati mānavaḥ
“अन्न मनुष्यों का प्राण है, और अन्न देनेवाला प्राण देनेवाला होता है। इसलिए मनुष्य को विशेष रूप से अन्न देने की इच्छा करनी चाहिए।”
श्लोक 6 (13.235.6)
ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमीप्सितम् । निदधाति निधिं श्रेष्ठं सोऽनन्तं पारलौकिकम् ॥
brāhmaṇāyābhirūpāya yo dadyādannamīpsitam | nidadhāti nidhiṃ śreṣṭhaṃ so'nantaṃ pāralaukikam
“जो किसी योग्य ब्राह्मण को उसका मनचाहा अन्न देता है, वह परलोक के लिए अनन्त और श्रेष्ठ निधि संचित करता है।”
श्लोक 7 (13.235.7)
श्रान्तमध्वपरिश्रान्तमतिथिं गृहमागतम् । अर्चयीत प्रयत्नेन स हि यज्ञो वरप्रदः ॥
śrāntamadhvapariśrāntamatithiṃ gṛhamāgatam | arcayīta prayatnena sa hi yajño varapradaḥ
“जो अतिथि थका हुआ और मार्ग की थकान से चूर होकर घर आया हो, उसका यत्नपूर्वक सत्कार करना चाहिए; वह वरदायक यज्ञ ही है।”
श्लोक 8 (13.235.8)
कृत्वा तु पातकं कर्म यो दद्यादन्नमर्थिनाम् । ब्राह्मणानां विशेषेण सोपहन्ति स्वकं तमः ॥
kṛtvā tu pātakaṃ karma yo dadyādannamarthinām | brāhmaṇānāṃ viśeṣeṇa sopahanti svakaṃ tamaḥ
“पापकर्म करके भी जो याचकों को, और विशेष रूप से ब्राह्मणों को अन्न देता है, वह अपने अन्धकार का नाश कर देता है।”
श्लोक 9 (13.235.9)
पितरस्तस्य नन्दन्ति सुवृष्ट्या कर्षका इव । पुत्रो यस्य तु पौत्रो वा श्रोत्रियं भोजयिष्यति ॥
pitarastasya nandanti suvṛṣṭyā karṣakā iva | putro yasya tu pautro vā śrotriyaṃ bhojayiṣyati
“जिसका पुत्र या पौत्र किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को भोजन कराएगा, उसके पितर वैसे ही प्रसन्न होते हैं जैसे अच्छी वर्षा से किसान।”
श्लोक 10 (13.235.10)
अपि चण्डालशूद्राणामन्नदानं न गर्हते । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन दद्यादन्नममत्सरः ॥
api caṇḍālaśūdrāṇāmannadānaṃ na garhate | tasmātsarvaprayatnena dadyādannamamatsaraḥ
“चाण्डालों और शूद्रों को भी अन्न का दान निन्दित नहीं है। इसलिए पूरे प्रयत्न से, बिना ईर्ष्या के अन्न देना चाहिए।”
श्लोक 11 (13.235.11)
कलत्रं पीडयित्वाऽपि पोषयेदतिथीन्सदा । जन्मापि मानुषे लोके तदर्थं हि विधीयते ॥
kalatraṃ pīḍayitvā'pi poṣayedatithīnsadā | janmāpi mānuṣe loke tadarthaṃ hi vidhīyate
“पत्नी को कष्ट देकर भी मनुष्य को सदा अतिथियों का पालन करना चाहिए; क्योंकि मनुष्य-लोक में जन्म भी इसी के लिए विहित है।”
श्लोक 12 (13.235.12)
अन्नदानाच्च लोकांस्तान्सम्प्रवक्ष्याम्यनिन्दिते । भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम् ॥
annadānācca lokāṃstānsampravakṣyāmyanindite | bhavanāni prakāśante divi teṣāṃ mahātmanām
“हे निर्दोष देवी, अब मैं तुम्हें अन्नदान से प्राप्त होनेवाले उन लोकों के विषय में बताऊँगा। स्वर्ग में उन महात्माओं के भवन चमकते हैं,”
श्लोक 13 (13.235.13)
अनेकशतभौमानि सान्तर्जलवनानि च । वैडूर्यार्चिःप्रकाशानि हेमरूप्यमयानि च ॥
anekaśatabhaumāni sāntarjalavanāni ca | vaiḍūryārciḥprakāśāni hemarūpyamayāni ca
“जो सैकड़ों मंज़िलों के हैं, जिनके भीतर जल और वन हैं, जो वैदूर्य मणि की किरणों से जगमगाते हैं और सोने-चाँदी के बने हैं,”
श्लोक 14 (13.235.14)
नानारूपाणि संस्थानां नानारत्नमयानि च । चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किङ्किणीजालवन्ति च ॥
nānārūpāṇi saṃsthānāṃ nānāratnamayāni ca | candramaṇḍalaśubhrāṇi kiṅkiṇījālavanti ca
“जो अनेक रूप और आकारों के हैं, अनेक प्रकार के रत्नों से बने हैं, चन्द्रमण्डल के समान उज्ज्वल हैं और घुँघरुओं की जालियों से सजे हैं,”
श्लोक 15 (13.235.15)
तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च । यथेष्टभक्ष्यभोज्यानि शयनासनवन्ति च ॥
taruṇādityavarṇāni sthāvarāṇi carāṇi ca | yatheṣṭabhakṣyabhojyāni śayanāsanavanti ca
“जो नवोदित सूर्य के समान कान्तिमान हैं, कुछ स्थिर और कुछ चलनेवाले, जिनमें मनचाहा खाना-पीना तथा शय्याएँ और आसन हैं।”
श्लोक 16 (13.235.16)
सर्वकामफलाश्चात्र वृक्षा भवनसंस्थिताः । वाप्यो बह्व्यश्च कूपाश्च दीर्घिकाश्च सहस्रशः ॥
sarvakāmaphalāścātra vṛkṣā bhavanasaṃsthitāḥ | vāpyo bahvyaśca kūpāśca dīrghikāśca sahasraśaḥ
“उन भवनों में ऐसे वृक्ष खड़े हैं जो सब मनचाहे फल देते हैं, और वहाँ हज़ारों बावड़ियाँ, कुएँ तथा लम्बे सरोवर हैं,”
श्लोक 17 (13.235.17)
अरुजानि विशोकानि नित्यानि विविधानि च । भवनानि विचित्राणि प्राणदानां त्रिविष्टपे ॥
arujāni viśokāni nityāni vividhāni ca | bhavanāni vicitrāṇi prāṇadānāṃ triviṣṭape
“जो रोग और शोक से रहित हैं, स्थायी हैं और अनेक प्रकार के हैं। स्वर्ग में प्राण देनेवालों के भवन ऐसे विचित्र होते हैं।”
श्लोक 18 (13.235.18)
विवस्वतश्च सोमस्य ब्रह्मणश्च प्रजापतेः । विशन्ति लोकांस्ते नित्यं जगत्यन्नोदकप्रदाः ॥
vivasvataśca somasya brahmaṇaśca prajāpateḥ | viśanti lokāṃste nityaṃ jagatyannodakapradāḥ
“जो लोग संसार में अन्न और जल का दान करते हैं, वे विवस्वान्, सोम और प्रजापति ब्रह्मा के लोकों में प्रवेश करते हैं और वहाँ सदा रहते हैं।”
श्लोक 19 (13.235.19)
तत्र ते सुचिरं कालं विहृत्याप्सरसां गणैः । जायन्ते मानुषे लोके सर्वकल्याणसंयुताः ॥
tatra te suciraṃ kālaṃ vihṛtyāpsarasāṃ gaṇaiḥ | jāyante mānuṣe loke sarvakalyāṇasaṃyutāḥ
“वहाँ अप्सराओं के समूहों के साथ बहुत दीर्घ काल तक विहार करके वे मनुष्य-लोक में सब कल्याणों से युक्त होकर जन्म लेते हैं।”
श्लोक 20 (13.235.20)
बलसंहननोपेता नीरोगाश्चिरजीविनः । कुलीना मतिमन्तश्च भवन्त्यन्नप्रदा नराः ॥
balasaṃhananopetā nīrogāścirajīvinaḥ | kulīnā matimantaśca bhavantyannapradā narāḥ
“अन्न देनेवाले मनुष्य बल और सुगठित शरीर से युक्त, नीरोग, दीर्घायु, कुलीन और बुद्धिमान होते हैं।”
श्लोक 21 (13.235.21)
तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता । सर्वकालं च सर्वस्य सर्वत्र च सदैव च ॥
tasmādannaṃ viśeṣeṇa dātavyaṃ bhūtimicchatā | sarvakālaṃ ca sarvasya sarvatra ca sadaiva ca
“इसलिए जो समृद्धि चाहता है, उसे विशेष रूप से अन्न का दान करना चाहिए: सब समय, सबको, सब स्थानों पर और सदा।”
श्लोक 22 (13.235.22)
सुवर्णदानं परमं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् । तस्मात्ते वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥
suvarṇadānaṃ paramaṃ svargyaṃ svastyayanaṃ mahat | tasmātte varṇayiṣyāmi yathāvadanupūrvaśaḥ
“स्वर्ण का दान सर्वोत्तम है, स्वर्ग दिलानेवाला है और बड़ा मंगलकारी है। इसलिए मैं उसका वर्णन तुम्हारे सामने यथावत् और क्रम से करूँगा।”
श्लोक 23 (13.235.23)
अपि पापकृतं क्रूरं दत्तं रुक्मं प्रणाशयेत् ॥
api pāpakṛtaṃ krūraṃ dattaṃ rukmaṃ praṇāśayet
“दिया हुआ सोना किए हुए क्रूर पाप को भी नष्ट कर देता है।”
श्लोक 24 (13.235.24)
सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियेभ्यः सुचेतसः । देवतास्ते तर्पयन्ति समस्ता इति वैदिकम् ॥
suvarṇaṃ ye prayacchanti śrotriyebhyaḥ sucetasaḥ | devatāste tarpayanti samastā iti vaidikam
“जो शुद्ध मनवाले लोग वेदज्ञ ब्राह्मणों को सोना देते हैं, वे सब देवताओं को तृप्त करते हैं; ऐसा वेद का कथन है।”
श्लोक 25 (13.235.25)
अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं चाग्निरुच्यते । तस्मात्सुवर्णदानेन तृप्ताः स्युः सर्वदेवताः ॥
agnirhi devatāḥ sarvāḥ suvarṇaṃ cāgnirucyate | tasmātsuvarṇadānena tṛptāḥ syuḥ sarvadevatāḥ
“अग्नि ही सब देवता हैं और सोना अग्नि कहा जाता है। इसलिए स्वर्ण-दान से सब देवता तृप्त हो जाते हैं।”
श्लोक 26 (13.235.26)
अग्न्यभावे तु कुर्वन्ति वह्निस्थानेषु काञ्चनम् । तस्मात्सुवर्णदातारः सर्वान्कामानवाप्नुयुः ॥
agnyabhāve tu kurvanti vahnisthāneṣu kāñcanam | tasmātsuvarṇadātāraḥ sarvānkāmānavāpnuyuḥ
“अग्नि के अभाव में लोग अग्नि के स्थानों पर सोना रखते हैं। इसलिए स्वर्ण देनेवाले सब कामनाएँ प्राप्त करते हैं।”
श्लोक 27 (13.235.27)
आदित्यस्य हुताशस्य लोकान्नानाविधाञ्शुभान् । काञ्चनं सम्प्रदायाशु प्रविशन्ति न संशयः ॥
ādityasya hutāśasya lokānnānāvidhāñśubhān | kāñcanaṃ sampradāyāśu praviśanti na saṃśayaḥ
“सोना दान करके वे सूर्य और अग्नि के अनेक प्रकार के शुभ लोकों में शीघ्र प्रवेश करते हैं; इसमें संदेह नहीं।”
श्लोक 28 (13.235.28)
अलङ्कारं कृतं चापि केवलान्प्रविशिष्यते । सौवर्णैर्ब्राह्मणं काले तैरलङ्कृत्य भोजयेत् ॥
alaṅkāraṃ kṛtaṃ cāpi kevalānpraviśiṣyate | sauvarṇairbrāhmaṇaṃ kāle tairalaṅkṛtya bhojayet
“आभूषण के रूप में बना सोना केवल सोने से भी बढ़कर है। इसलिए उचित समय पर ब्राह्मण को सोने के आभूषणों से सजाकर भोजन कराना चाहिए।”
श्लोक 29 (13.235.29)
य एतत्परमं दानं दत्त्वा सौवर्णमद्भुतम् । द्युतिं मेधां वपुः कीर्तिं पुनर्जाते लभेद्ध्रुवम् ॥
ya etatparamaṃ dānaṃ dattvā sauvarṇamadbhutam | dyutiṃ medhāṃ vapuḥ kīrtiṃ punarjāte labheddhruvam
“जो इस परम और अद्भुत स्वर्ण-दान को देता है, वह पुनर्जन्म होने पर निश्चय ही तेज, मेधा, सुन्दर शरीर और कीर्ति पाता है।”
श्लोक 30 (13.235.30)
तस्मात्स्वशक्त्या दातव्यं काञ्चनं भुवि मानवैः । न ह्येतस्मात्परं लोकेष्वन्यत्पापात्प्रमुच्यते ॥
tasmātsvaśaktyā dātavyaṃ kāñcanaṃ bhuvi mānavaiḥ | na hyetasmātparaṃ lokeṣvanyatpāpātpramucyate
“इसलिए पृथ्वी पर मनुष्यों को अपनी शक्ति के अनुसार सोना दान करना चाहिए; क्योंकि लोकों में पाप से छुड़ानेवाला इससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ नहीं है।”
श्लोक 31 (13.235.31)
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि गवां दानमनिन्दिते । नहि गोभ्यः परं दानं विद्यते जगति प्रिये ॥
ata ūrdhvaṃ pravakṣyāmi gavāṃ dānamanindite | nahi gobhyaḥ paraṃ dānaṃ vidyate jagati priye
“हे निर्दोष देवी, इसके बाद मैं गौओं के दान के विषय में कहूँगा। हे प्रिये, संसार में गौओं से बढ़कर कोई दान नहीं है।”
श्लोक 32 (13.235.32)
लोकान्सिसृक्षुणा पूर्वं गावः सृष्टाः स्वयंभुवा । वृत्त्यर्थं सर्वभूतानां तस्मात्ता मातरः स्मृताः ॥
lokānsisṛkṣuṇā pūrvaṃ gāvaḥ sṛṣṭāḥ svayaṃbhuvā | vṛttyarthaṃ sarvabhūtānāṃ tasmāttā mātaraḥ smṛtāḥ
“लोकों की सृष्टि करने की इच्छा से स्वयंभू ब्रह्मा ने पहले सब प्राणियों की जीविका के लिए गौओं को रचा; इसीलिए उन्हें माताएँ कहा गया है।”
श्लोक 33 (13.235.33)
लोकज्येष्ठा लोकवृत्त्या प्रवृत्ता । मय्यायत्ताः सोमनिष्यन्दभूताः । सौम्याः पुण्याः प्राणदाः कामदाश्च । तस्मात्पूज्याः पुण्यकामैर्मनुष्यैः ॥
lokajyeṣṭhā lokavṛttyā pravṛttā | mayyāyattāḥ somaniṣyandabhūtāḥ | saumyāḥ puṇyāḥ prāṇadāḥ kāmadāśca | tasmātpūjyāḥ puṇyakāmairmanuṣyaiḥ
“वे लोकों में सबसे ज्येष्ठ हैं, संसार की जीविका चलाने में लगी हैं, मेरे अधीन हैं और सोम के स्रवण से उत्पन्न हुई हैं। सौम्य, पवित्र, प्राण और कामनाओं को देनेवाली होने के कारण पुण्य चाहनेवाले मनुष्यों को उनकी पूजा करनी चाहिए।”
श्लोक 34 (13.235.34)
धेनुं दत्त्वा निभृतां सुशीलां । कल्याणवत्सां च पयस्विनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्याः । तावत्समाः स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ॥
dhenuṃ dattvā nibhṛtāṃ suśīlāṃ | kalyāṇavatsāṃ ca payasvinīṃ ca | yāvanti romāṇi bhavanti tasyāḥ | tāvatsamāḥ svargaphalāni bhuṅkte
“जो शान्त, सुशील, सुन्दर बछड़ेवाली और दूध देनेवाली गाय का दान करता है, वह उसके शरीर में जितने रोम हैं उतने वर्षों तक स्वर्ग के फल भोगता है।”
श्लोक 35 (13.235.35)
प्रयच्छते यः कपिलां सचेलां । सकांस्यदोहां कनकाग्र्यशृङ्गीम् । पुत्राश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्वम् । आसप्तमं तारयते परत्र च ॥
prayacchate yaḥ kapilāṃ sacelāṃ | sakāṃsyadohāṃ kanakāgryaśṛṅgīm | putrāśca pautrāṃśca kulaṃ ca sarvam | āsaptamaṃ tārayate paratra ca
“जो कपिला गाय को वस्त्र, काँसे के दोहन-पात्र और सोने से मढ़े हुए सींगों के साथ दान करता है, वह अपने पुत्रों, पौत्रों और सात पीढ़ी तक के पूरे कुल को परलोक में भी तार देता है।”
श्लोक 36 (13.235.36)
अन्तर्जाताः क्रीतका द्यूतलब्धाः । प्राणक्रीताः सोदकाश्चौजसा वा । कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणार्थागताश्च । द्वारैरेतैस्ताः प्रलब्धाः प्रदद्यात् ॥
antarjātāḥ krītakā dyūtalabdhāḥ | prāṇakrītāḥ sodakāścaujasā vā | kṛcchrotsṛṣṭāḥ poṣaṇārthāgatāśca | dvārairetaistāḥ pralabdhāḥ pradadyāt
“घर में उत्पन्न, खरीदी हुई, जुए में जीती हुई, प्राण देकर मोल ली हुई, जलसहित दान में मिली हुई, बल से प्राप्त, संकट में छोड़ी हुई, या पालन के लिए आई हुई गौएँ भी — इन द्वारों से जो गौएँ प्राप्त हुई हों, उनका दान किया जा सकता है।”
श्लोक 37 (13.235.37)
कृशाय बहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये । प्रदाय नीरुजां धेनुं लोकान्प्राप्नोत्यनुत्तमान् ॥
kṛśāya bahuputrāya śrotriyāyāhitāgnaye | pradāya nīrujāṃ dhenuṃ lokānprāpnotyanuttamān
“जो दुबले, बहुत पुत्रोंवाले, वेदज्ञ और अग्निहोत्री ब्राह्मण को नीरोग गाय देता है, वह सर्वोत्तम लोकों को प्राप्त करता है।”
श्लोक 38 (13.235.38)
नृशंसस्य कृतघ्नस्य लुब्धस्यानृतवादिनः । हव्यकव्यव्यपेतस्य न दद्याद्गाः कथञ्चन ॥
nṛśaṃsasya kṛtaghnasya lubdhasyānṛtavādinaḥ | havyakavyavyapetasya na dadyādgāḥ kathañcana
“क्रूर, कृतघ्न, लोभी, झूठ बोलनेवाले और देवों-पितरों के हव्य-कव्य से रहित मनुष्य को गौएँ कभी नहीं देनी चाहिए।”
श्लोक 39 (13.235.39)
समानवत्सां यो दद्याद्धेनुं विप्रे पयस्विनीम् । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां सोमलोके महीयते ॥
samānavatsāṃ yo dadyāddhenuṃ vipre payasvinīm | suvṛttāṃ vastrasaṃchannāṃ somaloke mahīyate
“जो ब्राह्मण को अपने जैसे बछड़ेवाली, दूध देनेवाली, सुशील और वस्त्र से ढकी हुई गाय देता है, वह सोमलोक में सम्मानित होता है।”
श्लोक 40 (13.235.40)
समानवत्सां यो दद्यात्कृष्णां धेनुं पयस्विनीम् । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां लोकान्प्राप्नोत्यपांपतेः ॥
samānavatsāṃ yo dadyātkṛṣṇāṃ dhenuṃ payasvinīm | suvṛttāṃ vastrasaṃchannāṃ lokānprāpnotyapāṃpateḥ
“जो अपने जैसे बछड़ेवाली, दूध देनेवाली, सुशील और वस्त्र से ढकी हुई काली गाय देता है, वह जल के स्वामी वरुण के लोकों को पाता है।”
श्लोक 41 (13.235.41)
हिरण्यवर्णां पिङ्गाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसम्पन्नां यान्ति कौबेरसद्मनि ॥
hiraṇyavarṇāṃ piṅgākṣīṃ savatsāṃ kāṃsyadohanām | pradāya vastrasampannāṃ yānti kauberasadmani
“जो सुनहरे रंग की, पिंगल नेत्रोंवाली गाय को बछड़े, काँसे के दोहन-पात्र और वस्त्र के साथ दान करते हैं, वे कुबेर के भवन को जाते हैं।”
श्लोक 42 (13.235.42)
वायुरेणुसवर्णां च सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसम्पन्नां वायुलोके महीयते ॥
vāyureṇusavarṇāṃ ca savatsāṃ kāṃsyadohanām | pradāya vastrasampannāṃ vāyuloke mahīyate
“जो हवा से उड़ी धूल के रंग की गाय को बछड़े, काँसे के दोहन-पात्र और वस्त्र के साथ दान करता है, वह वायुलोक में सम्मानित होता है।”
श्लोक 43 (13.235.43)
समानवत्सां यो धेनुं दत्त्वा गौरीं पयस्विनीम् । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नामग्निलोके महीयते ॥
samānavatsāṃ yo dhenuṃ dattvā gaurīṃ payasvinīm | suvṛttāṃ vastrasaṃchannāmagniloke mahīyate
“जो अपने जैसे बछड़ेवाली, दूध देनेवाली, सुशील और वस्त्र से ढकी हुई गौरी (उजले रंग की) गाय देता है, वह अग्निलोक में सम्मानित होता है।”
श्लोक 44 (13.235.44)
युवानं बलिनं श्यामं शतेन सह यूथपम् । गवेन्द्रं ब्राह्मणेन्द्राय भूरिशृङ्गमलंकृतम् ॥
yuvānaṃ balinaṃ śyāmaṃ śatena saha yūthapam | gavendraṃ brāhmaṇendrāya bhūriśṛṅgamalaṃkṛtam
“एक युवा, बलवान् और श्याम वर्ण का साँड़, जो सौ गौओं के साथ यूथ का स्वामी हो, गौओं में श्रेष्ठ, बड़े सींगोंवाला और अलंकृत, श्रेष्ठ ब्राह्मण को —”
श्लोक 45 (13.235.45)
ऋषभं ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियाणां महात्मनाम् । ऐश्वर्यमभिजायन्ते जायमानाः पुनःपुनः ॥
ṛṣabhaṃ ye prayacchanti śrotriyāṇāṃ mahātmanām | aiśvaryamabhijāyante jāyamānāḥ punaḥpunaḥ
“जो लोग महात्मा वेदज्ञ ब्राह्मणों को साँड़ का दान करते हैं, वे बार-बार जन्म लेकर हर जन्म में ऐश्वर्य के अधिकारी होते हैं।”
श्लोक 46 (13.235.46)
गवां मूत्रपुरीषाणि नोद्विजेत कदाचन । न चासां मांसमश्नीयाद्गोषु भक्तः सदा भवेत् ॥
gavāṃ mūtrapurīṣāṇi nodvijeta kadācana | na cāsāṃ māṃsamaśnīyādgoṣu bhaktaḥ sadā bhavet
“गौओं के मूत्र और गोबर से कभी घृणा नहीं करनी चाहिए, उनका मांस नहीं खाना चाहिए, और सदा गौओं के प्रति भक्ति रखनी चाहिए।”
श्लोक 47 (13.235.47)
ग्रासमुष्टिं परगवे दद्यात्संवत्सरं शुचि । अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत्सार्वकामिकम् ॥
grāsamuṣṭiṃ paragave dadyātsaṃvatsaraṃ śuci | akṛtvā svayamāhāraṃ vrataṃ tatsārvakāmikam
“एक वर्ष तक पवित्र रहकर, स्वयं भोजन करने से पहले दूसरे की गाय को मुट्ठी भर चारा देना चाहिए; वह व्रत सब कामनाओं को पूरा करनेवाला है।”
श्लोक 48 (13.235.48)
गवामुभयतः काले नित्यं स्वस्त्ययनं वदेत् । न चासां चिन्तयेत्पापमिति धर्मविदो विदुः ॥
gavāmubhayataḥ kāle nityaṃ svastyayanaṃ vadet | na cāsāṃ cintayetpāpamiti dharmavido viduḥ
“दोनों समय गौओं के लिए सदा मंगल-वचन कहना चाहिए और उनके अनिष्ट की बात कभी नहीं सोचनी चाहिए; ऐसा धर्म जाननेवाले कहते हैं।”
श्लोक 49 (13.235.49)
गावः पवित्रं परमं गोषु लोकाः प्रतिष्ठिताः । कथञ्चिन्नावमन्तव्या गावो लोकस्य मातरः ॥
gāvaḥ pavitraṃ paramaṃ goṣu lokāḥ pratiṣṭhitāḥ | kathañcinnāvamantavyā gāvo lokasya mātaraḥ
“गौएँ परम पवित्र हैं, और लोक गौओं पर ही टिके हैं। संसार की माताएँ गौएँ किसी भी प्रकार अवहेलना के योग्य नहीं हैं।”
श्लोक 50 (13.235.50)
तस्मादेव गवां दानं विशिष्टमिति कथ्यते । गोषु पूजा च भक्तिश्च नरस्यायुष्यतां वहेत् ॥
tasmādeva gavāṃ dānaṃ viśiṣṭamiti kathyate | goṣu pūjā ca bhaktiśca narasyāyuṣyatāṃ vahet
“इसीलिए गौओं का दान सबसे उत्तम कहा जाता है; गौओं की पूजा और उनमें भक्ति मनुष्य को दीर्घ आयु प्रदान करती है।”
श्लोक 51 (13.235.51)
अतःपरं प्रवक्ष्यामि भूमिदानं महाफलम् । भूमिदानसमं दानं लोके नास्तीति निश्चयः ॥
ataḥparaṃ pravakṣyāmi bhūmidānaṃ mahāphalam | bhūmidānasamaṃ dānaṃ loke nāstīti niścayaḥ
“इसके बाद मैं महान् फलवाले भूमिदान के विषय में कहूँगा। यह निश्चय है कि संसार में भूमिदान के बराबर कोई दान नहीं है।”
श्लोक 52 (13.235.52)
गृहयुक्क्षेत्रयुग्वाऽपि भूमिभागः प्रदीयते । सुखभोगं निराक्रोशं वास्तुपूर्वं प्रकल्प्य च ॥
gṛhayukkṣetrayugvā'pi bhūmibhāgaḥ pradīyate | sukhabhogaṃ nirākrośaṃ vāstupūrvaṃ prakalpya ca
“भूमि का ऐसा भाग दिया जाता है जो घर या खेत से युक्त हो; पहले घर की भूमि ठीक करके उसे सुखपूर्वक भोगने योग्य और विवाद से रहित बना देना चाहिए।”
श्लोक 53 (13.235.53)
ग्रहीतारमलङ्कृत्य वस्त्रपुष्पानुलोपनैः । सभृत्यं सपरीवारं भोजयित्वा यथेष्टतः । यो दद्याद्दक्षिणां काले त्रिरद्भिर्गृह्यतामिति ॥
grahītāramalaṅkṛtya vastrapuṣpānulopanaiḥ | sabhṛtyaṃ saparīvāraṃ bhojayitvā yatheṣṭataḥ | yo dadyāddakṣiṇāṃ kāle triradbhirgṛhyatāmiti
“पाने वाले को वस्त्र, पुष्प और अनुलेपनों से सम्मानित करके, उसे सेवकों और परिवार सहित इच्छानुसार भोजन कराकर, उचित समय पर जल के साथ तीन बार “ग्रहण कीजिए” कहते हुए दक्षिणा देनी चाहिए।”
श्लोक 54 (13.235.54)
एवं भूम्यां प्रदत्तायां श्रद्धया वीतमत्सरैः । यावत्तिष्ठति सा भूमिस्तावद्दत्तफलं विदुः ॥
evaṃ bhūmyāṃ pradattāyāṃ śraddhayā vītamatsaraiḥ | yāvattiṣṭhati sā bhūmistāvaddattaphalaṃ viduḥ
“इस प्रकार श्रद्धा से और बिना ईर्ष्या के भूमि दान किए जाने पर, जब तक वह भूमि बनी रहती है तब तक दान का फल रहता है, ऐसा कहा जाता है।”
श्लोक 55 (13.235.55)
भूमिदः स्वर्गमारुह्य रमते शाश्वतीः समाः । अचला ह्यक्षया भूमिः सर्वकामान्दुधुक्षति ॥
bhūmidaḥ svargamāruhya ramate śāśvatīḥ samāḥ | acalā hyakṣayā bhūmiḥ sarvakāmāndudhukṣati
“भूमि देनेवाला स्वर्ग में चढ़कर अनन्त वर्षों तक आनन्द करता है। भूमि अचल और अक्षय है, और वह सब कामनाओं को दुहना चाहती है।”
श्लोक 56 (13.235.56)
यत्किञ्चित्कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शितः । अपि गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन मुच्यते ॥
yatkiñcitkurute pāpaṃ puruṣo vṛttikarśitaḥ | api gokarṇamātreṇa bhūmidānena mucyate
“आजीविका के कष्ट से दबा हुआ मनुष्य जो भी पाप करे, वह गाय के कान जितनी भूमि के दान से भी उससे छूट जाता है।”
श्लोक 57 (13.235.57)
सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च । सर्वमेतन्महाभागे भूमिदाने प्रतिष्ठितम् ॥
suvarṇaṃ rajataṃ vastraṃ maṇimuktāvasūni ca | sarvametanmahābhāge bhūmidāne pratiṣṭhitam
“सोना, चाँदी, वस्त्र, मणि, मोती और धन — हे महाभागे, यह सब भूमिदान में ही प्रतिष्ठित है।”
श्लोक 58 (13.235.58)
भर्तुर्निः श्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः । ब्रह्मलोकाय संसिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥
bharturniḥ śreyase yuktāstyaktātmāno raṇe hatāḥ | brahmalokāya saṃsiddhā nātikrāmanti bhūmidam
“जो स्वामी के कल्याण में लगे रहकर प्राणों का त्याग करते हुए युद्ध में मारे जाते हैं, वे ब्रह्मलोक के लिए सिद्ध हो जाते हैं, फिर भी भूमि-दाता का अतिक्रमण नहीं कर पाते।”
श्लोक 59 (13.235.59)
हलकृष्टां महीं दद्यात्सर्वबीजफलान्विताम् । सुकूपशरणां वाऽपि सा भवेत्सर्वकामदा ॥
halakṛṣṭāṃ mahīṃ dadyātsarvabījaphalānvitām | sukūpaśaraṇāṃ vā'pi sā bhavetsarvakāmadā
“हल से जोती हुई, सब प्रकार के बीज और फलों से युक्त, या अच्छे कुएँ के आश्रयवाली भूमि दान करनी चाहिए; वह सब कामनाओं को देनेवाली होगी।”
श्लोक 60 (13.235.60)
निष्पन्नसस्यां पृथिवीं यो ददाति द्विजन्मनाम् । विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शक्रलोकं स गच्छति ॥
niṣpannasasyāṃ pṛthivīṃ yo dadāti dvijanmanām | vimuktaḥ kaluṣaiḥ sarvaiḥ śakralokaṃ sa gacchati
“जो द्विजों को पकी हुई फ़सलवाली भूमि देता है, वह सब पापों से मुक्त होकर इन्द्रलोक को जाता है।”
श्लोक 61 (13.235.61)
यथा जनित्री क्षीरेण स्वपुत्रमभिवर्धयेत् । एवं सर्वफलैर्भूमिर्दातारमभिवर्धयेत् ॥
yathā janitrī kṣīreṇa svaputramabhivardhayet | evaṃ sarvaphalairbhūmirdātāramabhivardhayet
“जैसे माता अपने पुत्र को दूध से पालती है, वैसे ही भूमि अपने दाता को सब फलों से बढ़ाती है।”
श्लोक 62 (13.235.62)
ब्राह्मणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् । ग्राहयित्वा निजां भूमिं न यान्ति यमसादनम् ॥
brāhmaṇaṃ vṛttasampannamāhitāgniṃ śucivratam | grāhayitvā nijāṃ bhūmiṃ na yānti yamasādanam
“जो सदाचारी, अग्निहोत्री और शुद्ध व्रतोंवाले ब्राह्मण से अपनी भूमि ग्रहण करवाते हैं, वे यमलोक नहीं जाते।”
श्लोक 63 (13.235.63)
यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि दृश्यते । तथा भूमेः कृतं दानं सस्येसस्ये विवर्धते ॥
yathā candramaso vṛddhirahanyahani dṛśyate | tathā bhūmeḥ kṛtaṃ dānaṃ sasyesasye vivardhate
“जैसे चन्द्रमा की वृद्धि प्रतिदिन दिखाई देती है, वैसे ही भूमि का दान प्रत्येक फ़सल के साथ बढ़ता जाता है।”
श्लोक 64 (13.235.64)
यथा बीजानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले । तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानगुणार्जिताः ॥
yathā bījāni rohanti prakīrṇāni mahītale | tathā kāmāḥ prarohanti bhūmidānaguṇārjitāḥ
“जैसे भूमि पर बिखेरे हुए बीज उगते हैं, वैसे ही भूमिदान के गुण से अर्जित कामनाएँ उगती हैं।”
श्लोक 65 (13.235.65)
पितरः पितृलोकस्था देवताश्च दिवि स्थिताः । सन्तर्पयन्ति भोगैस्तं यो ददाति वसुन्धराम् ॥
pitaraḥ pitṛlokasthā devatāśca divi sthitāḥ | santarpayanti bhogaistaṃ yo dadāti vasundharām
“पितृलोक में रहनेवाले पितर और स्वर्ग में स्थित देवता, पृथ्वी का दान करनेवाले को भोगों से तृप्त करते हैं।”
श्लोक 66 (13.235.66)
दीर्घायुष्यं वराङ्गत्वं स्फीतां च श्रियमुत्तमाम् । परत्र लभते मर्त्यः सम्प्रदाय वसुन्धराम् ॥
dīrghāyuṣyaṃ varāṅgatvaṃ sphītāṃ ca śriyamuttamām | paratra labhate martyaḥ sampradāya vasundharām
“जो मनुष्य पृथ्वी का दान करता है, वह परलोक में दीर्घ आयु, सुन्दर शरीर और उत्तम बढ़ी हुई लक्ष्मी पाता है।”
श्लोक 67 (13.235.67)
एतत्सर्वं मयोद्दिष्टं भूमिदानस्य यत्फलम् । श्रद्दधानैर्नरैर्नित्यं श्राव्यमेतत्सनातनम् ॥
etatsarvaṃ mayoddiṣṭaṃ bhūmidānasya yatphalam | śraddadhānairnarairnityaṃ śrāvyametatsanātanam
“भूमिदान के फल के विषय में मैंने जो यह सब कहा है, उसे श्रद्धालु मनुष्यों को सदा सुनाना चाहिए; यह सनातन है।”
श्लोक 68 (13.235.68)
अतः परं प्रवक्ष्यामि कन्यादानं यथाविधि । कन्या देया महादेवि परेषामात्मनोपि वा ॥
ataḥ paraṃ pravakṣyāmi kanyādānaṃ yathāvidhi | kanyā deyā mahādevi pareṣāmātmanopi vā
“इसके बाद मैं विधिपूर्वक कन्यादान के विषय में कहूँगा। हे महादेवि, कन्या का दान दूसरों की कन्या का भी हो सकता है और अपनी का भी।”
श्लोक 69 (13.235.69)
कन्यां शुद्धव्रताचारां कुलरूपसमन्विताम् । यस्मै दित्सति पात्राय तेनापि भृशकामिताम् ॥
kanyāṃ śuddhavratācārāṃ kularūpasamanvitām | yasmai ditsati pātrāya tenāpi bhṛśakāmitām
“शुद्ध व्रत और आचारवाली, उत्तम कुल और रूप से युक्त कन्या, जिसे वह किसी योग्य पात्र को देना चाहता हो और जो पात्र भी उसे बहुत चाहता हो,”
श्लोक 70 (13.235.70)
प्रथमं तत्समाकल्प्य बन्धुभिः कृतनिश्चयः । कारयित्वा गृहं पूर्वं दासीदासपरिच्छदैः ॥
prathamaṃ tatsamākalpya bandhubhiḥ kṛtaniścayaḥ | kārayitvā gṛhaṃ pūrvaṃ dāsīdāsaparicchadaiḥ
“पहले बन्धुओं के साथ यह सब ठहराकर और निश्चय करके, पहले एक घर बनवाकर, उसे दासियों, दासों और उनकी आवश्यक वस्तुओं से युक्त करके,”
श्लोक 71 (13.235.71)
गृहोपकरणैश्चैव पशुधान्येन संयुताम् । तदर्थिने तदर्हाय कन्यां तां समलङ्कृताम् ॥
gṛhopakaraṇaiścaiva paśudhānyena saṃyutām | tadarthine tadarhāya kanyāṃ tāṃ samalaṅkṛtām
“घर के उपकरणों, पशुओं और अन्न के साथ, उस योग्य वर को जो उसे चाहता हो, अलंकृत की हुई वह कन्या देनी चाहिए,”
श्लोक 72 (13.235.72)
सविवाहं यथान्यायं प्रयच्छेदग्निसाक्षिकम् । वृत्त्यायतिं यथा कृत्वा सद्गृहे तौ निवेशयेत् ॥
savivāhaṃ yathānyāyaṃ prayacchedagnisākṣikam | vṛttyāyatiṃ yathā kṛtvā sadgṛhe tau niveśayet
“विवाह-संस्कार सहित, विधिपूर्वक, अग्नि को साक्षी बनाकर, और उनकी आजीविका तथा भविष्य का प्रबन्ध करके उन दोनों को अच्छे घर में बसाना चाहिए।”
श्लोक 73 (13.235.73)
एवं कृत्वा वधूदानं तस्य दानस्य गौरवात् । प्रेत्यभावे महीयेत स्वर्गलोके यथासुखम् ॥
evaṃ kṛtvā vadhūdānaṃ tasya dānasya gauravāt | pretyabhāve mahīyeta svargaloke yathāsukham
“इस प्रकार वधू का दान करके, उस दान की महिमा के कारण वह मरने के बाद स्वर्गलोक में सुखपूर्वक सम्मानित होता है।”
श्लोक 74 (13.235.74)
पुनर्जातस्य सौभाग्यं कुलवृद्धिं तथाऽऽप्नुयात् ॥
punarjātasya saubhāgyaṃ kulavṛddhiṃ tathā''pnuyāt
“और अगले जन्म में वह सौभाग्य तथा कुल की वृद्धि पाता है।”
श्लोक 75 (13.235.75)
विद्यादानं तथा देवि पात्रभूताय वै ददत् । प्रेत्यभावे लभेन्मर्त्यो मेधां वृद्धिं धृतिं स्मृतिम् ॥
vidyādānaṃ tathā devi pātrabhūtāya vai dadat | pretyabhāve labhenmartyo medhāṃ vṛddhiṃ dhṛtiṃ smṛtim
“इसी प्रकार हे देवि, जो योग्य पात्र को विद्या का दान करता है, वह मरने के बाद मेधा, समृद्धि, धैर्य और स्मृति पाता है।”
श्लोक 76 (13.235.76)
अनुरूपाय शिष्याय यश्च विद्यां प्रयच्छति । यथोक्तस्य प्रदानस्य फलमानन्त्यमश्नुते ॥
anurūpāya śiṣyāya yaśca vidyāṃ prayacchati | yathoktasya pradānasya phalamānantyamaśnute
“जो योग्य शिष्य को विद्या देता है, वह ऊपर कहे गए दान के अनन्त फल को पाता है।”
श्लोक 77 (13.235.77)
दापनं त्वथ विद्यानां दरिद्रेभ्योऽर्थवेदनैः । स्वयं दत्तेन तुल्यं स्यादिति विद्धि शुभानने ॥
dāpanaṃ tvatha vidyānāṃ daridrebhyo'rthavedanaiḥ | svayaṃ dattena tulyaṃ syāditi viddhi śubhānane
“और धन देकर दरिद्रों को विद्या दिलवाना स्वयं देने के बराबर है, हे सुमुखि, यह जान लो।”
श्लोक 78 (13.235.78)
एवं ते कथितान्येव महादानानि मानिनि । त्वत्प्रियार्थं मया देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
evaṃ te kathitānyeva mahādānāni mānini | tvatpriyārthaṃ mayā devi bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi
“हे मानिनि, इस प्रकार मैंने तुम्हें महान् दान बताए, हे देवि, यह तुम्हारी प्रसन्नता के लिए है। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो?”