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अनुशासन पर्व · अध्याय 236

तिल-दान और अनेक दानों के फल

उमा पूछती हैं कि तिल का दान कैसे करना चाहिए, और महेश्वर पूर्णिमा के दिन ब्राह्मणों को दी जानेवाली तिल की राशि का विधान बताते हैं। फिर वे अन्य दानों और कार्यों के फल गिनाते हैं: अन्न, जल, वस्त्र, दीप, छत्र, सेवक, वाहन, आश्रय, कुएँ, वृक्ष, पुल, मार्ग, औषधि और भवन। उमा के अगले प्रश्न पर वे समझाते हैं कि दान अपने प्रकार के अनुसार फल देता है, और फल की आशा से दिया हुआ दान कुछ नहीं देता।

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उमोवाच

श्लोक 1 (13.236.1)

भगवन्देवदेवेश कथं देयं तिलान्वितम् । तस्य तस्य फलं ब्रूहि दत्तस्य च कृतस्य च ॥

bhagavandevadeveśa kathaṃ deyaṃ tilānvitam | tasya tasya phalaṃ brūhi dattasya ca kṛtasya ca

“भगवन्, देवों के देव, तिल के साथ दान कैसे देना चाहिए? दिए हुए और किए हुए, दोनों के अलग-अलग फल मुझे बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.236.2)

तिलकल्पविधिं देवि तन्मे शृणु समाहिता ॥

tilakalpavidhiṃ devi tanme śṛṇu samāhitā

“हे देवि, तिल-विधि के नियम को मुझसे ध्यान से सुनो।”

श्लोक 3 (13.236.3)

समृद्धैरसमृद्धैर्वा तिला देया विशेषतः । तिलाः पवित्राः पापघ्नाः सुपुण्या इति संस्मृताः ॥

samṛddhairasamṛddhairvā tilā deyā viśeṣataḥ | tilāḥ pavitrāḥ pāpaghnāḥ supuṇyā iti saṃsmṛtāḥ

“धनी हों या निर्धन, तिल का दान विशेष रूप से करना चाहिए। तिल पवित्र, पापनाशक और अत्यन्त पुण्यदायक माने गए हैं।”

श्लोक 4 (13.236.4)

न्यायतस्तु तिलाञ्शुद्धान्संहृत्याथ स्वशक्तितः । तिलराशिं पुनः कुर्यात्पर्वताभं सरत्नकम् । महान्तं यदि वा स्तोकं नानाद्रव्यसमन्वितम् ॥

nyāyatastu tilāñśuddhānsaṃhṛtyātha svaśaktitaḥ | tilarāśiṃ punaḥ kuryātparvatābhaṃ saratnakam | mahāntaṃ yadi vā stokaṃ nānādravyasamanvitam

“न्यायपूर्वक शुद्ध तिल जुटाकर, अपनी शक्ति के अनुसार वह तिलों की पर्वत जैसी राशि बनाए, जिसमें रत्न हों, चाहे वह बड़ी हो या छोटी, और जिसमें अनेक प्रकार की वस्तुएँ मिली हों,”

श्लोक 5 (13.236.5)

सुवर्णरजताभ्यां च मणिमुक्ताप्रवालकैः । अलङ्कृत्य यथायोगं सपताकं सवेदिकम् । सभूषणं सवस्त्रं च शयनासनसंमितम् ॥

suvarṇarajatābhyāṃ ca maṇimuktāpravālakaiḥ | alaṅkṛtya yathāyogaṃ sapatākaṃ savedikam | sabhūṣaṇaṃ savastraṃ ca śayanāsanasaṃmitam

“सोने-चाँदी, मणि, मोती और मूँगों से यथायोग्य सजाकर, पताका और वेदी के साथ, आभूषणों और वस्त्र से युक्त तथा शय्या और आसनों से सम्पन्न करके,”

श्लोक 6 (13.236.6)

प्रायशः कौमुदीमासे पौर्णमास्यां विशेषतः । भोजयित्वा च विधिवद्ब्राह्मणानर्हतो बहून् ॥

prāyaśaḥ kaumudīmāse paurṇamāsyāṃ viśeṣataḥ | bhojayitvā ca vidhivadbrāhmaṇānarhato bahūn

“प्रायः कौमुद (कार्तिक) मास में, विशेषकर पूर्णिमा के दिन, और योग्य ब्राह्मणों को विधिपूर्वक बहुत संख्या में भोजन कराकर,”

श्लोक 7 (13.236.7)

स्वयं कृतोपवासश्च वृत्तशौचसमन्वितः । दद्यात्प्रदक्षिणीकृत्य तिलराशिं सदक्षिणम् ॥

svayaṃ kṛtopavāsaśca vṛttaśaucasamanvitaḥ | dadyātpradakṣiṇīkṛtya tilarāśiṃ sadakṣiṇam

“स्वयं उपवास रखकर और सदाचार तथा शुद्धि से युक्त होकर, तिलों की राशि की प्रदक्षिणा करके दक्षिणा सहित उसका दान करे।”

श्लोक 8 (13.236.8)

एकस्यापि बहूनां वा दातव्यं भूतिमिच्छता । तस्य दानफलं देवि अग्निष्टोमेन संयुतम् ॥

ekasyāpi bahūnāṃ vā dātavyaṃ bhūtimicchatā | tasya dānaphalaṃ devi agniṣṭomena saṃyutam

“समृद्धि चाहनेवाला उसे एक को दे या बहुतों को। हे देवि, उस दान का फल अग्निष्टोम यज्ञ के बराबर है।”

श्लोक 9 (13.236.9)

केवलं वा तिलैरेव भूमौ कृत्वा गवाकृतिम् । सवस्त्रकं सरत्नं च पुंसा गोदानकाङ्क्षिणा । तदर्हाय प्रदातव्यं तस्य गोदानतः फलम् ॥

kevalaṃ vā tilaireva bhūmau kṛtvā gavākṛtim | savastrakaṃ saratnaṃ ca puṃsā godānakāṅkṣiṇā | tadarhāya pradātavyaṃ tasya godānataḥ phalam

“अथवा गोदान की इच्छा रखनेवाला मनुष्य केवल तिलों से भूमि पर गाय की आकृति बनाकर, वस्त्र और रत्नों सहित योग्य पात्र को उसे दे; उसे गोदान का फल मिलता है।”

श्लोक 10 (13.236.10)

शरावांस्तिलसम्पूर्णान्सहिरण्यान्सचम्पकान् । नृपो ददद्ब्राह्मणाय स पुण्यफलभाग्भवेत् ॥

śarāvāṃstilasampūrṇānsahiraṇyānsacampakān | nṛpo dadadbrāhmaṇāya sa puṇyaphalabhāgbhavet

“जो राजा किसी ब्राह्मण को तिलों से भरे हुए, सोने और चम्पा के फूलों सहित छोटे पात्र देता है, वह पुण्य के फल का भागी होता है।”

श्लोक 11 (13.236.11)

एवं तिलमयं देयं नरेण हितमिच्छता । नानादानफलं भूयः शृणु देवि समाहिता ॥

evaṃ tilamayaṃ deyaṃ nareṇa hitamicchatā | nānādānaphalaṃ bhūyaḥ śṛṇu devi samāhitā

“इस प्रकार अपना हित चाहनेवाले मनुष्य को तिल से बनी वस्तुएँ दान करनी चाहिए। अब हे देवि, अनेक प्रकार के दानों का फल फिर ध्यान से सुनो।”

श्लोक 12 (13.236.12)

बलमायुष्यमारोग्यमन्नदानाल्लभेन्नरः । पानीयदस्तु सौभाग्यं रसज्ञानं लभेन्नरः ॥

balamāyuṣyamārogyamannadānāllabhennaraḥ | pānīyadastu saubhāgyaṃ rasajñānaṃ labhennaraḥ

“अन्न के दान से मनुष्य बल, आयु और आरोग्य पाता है; और पीने का जल देनेवाला सौभाग्य तथा रसों का ज्ञान पाता है।”

श्लोक 13 (13.236.13)

वस्त्रदानाद्वपुःशोभामलङ्कारं लभेन्नरः । दीपदो बुद्धिवैशद्यं द्युतिशोभां लभेन्नरः ॥

vastradānādvapuḥśobhāmalaṅkāraṃ labhennaraḥ | dīpado buddhivaiśadyaṃ dyutiśobhāṃ labhennaraḥ

“वस्त्र के दान से मनुष्य शरीर की शोभा और आभूषण पाता है; दीप देनेवाला बुद्धि की निर्मलता और तेज की शोभा पाता है।”

श्लोक 14 (13.236.14)

राजपीडाविमोक्षं तु छत्रदो लभते फलम् । दासीदासप्रदानात्तु भवेत्कर्मान्तभाङ्नरः । दासीदासं च विविधं लभेत्प्रेत्य गुणान्वितम् ॥

rājapīḍāvimokṣaṃ tu chatrado labhate phalam | dāsīdāsapradānāttu bhavetkarmāntabhāṅnaraḥ | dāsīdāsaṃ ca vividhaṃ labhetpretya guṇānvitam

“छत्र देनेवाला राजा की पीड़ा से छुटकारे का फल पाता है। दासी-दासों के दान से मनुष्य अपने कार्यों को पूरा कर पाता है, और मरने के बाद अनेक प्रकार के गुणवान् दासी-दास पाता है।”

श्लोक 15 (13.236.15)

यानानि वाहनं चैव तदर्हाय ददन्नरः । पादरोगपरिक्लेशान्मुक्तः श्वसनवाहवान् । विचित्रं रमणीयं च लभते यानवाहनम् ॥

yānāni vāhanaṃ caiva tadarhāya dadannaraḥ | pādarogaparikleśānmuktaḥ śvasanavāhavān | vicitraṃ ramaṇīyaṃ ca labhate yānavāhanam

“जो मनुष्य योग्य व्यक्ति को रथ-गाड़ियाँ और वाहन देता है, वह पैरों के रोग के कष्ट से मुक्त हो जाता है, वायु के समान वेगवाले वाहनों का स्वामी होता है, और उसे विचित्र तथा सुन्दर रथ-वाहन प्राप्त होता है।”

श्लोक 16 (13.236.16)

प्रतिश्रयप्रदानं च तदर्हाय तदिच्छते । वर्षाकाले तु रात्रौ वा लभेत्पक्षबलं शुभम् ॥

pratiśrayapradānaṃ ca tadarhāya tadicchate | varṣākāle tu rātrau vā labhetpakṣabalaṃ śubham

“जो वर्षा-ऋतु में या रात में, शरण चाहनेवाले योग्य व्यक्ति को आश्रय देता है, वह सहायकों का शुभ बल पाता है।”

श्लोक 17 (13.236.17)

सेतुकूपतटाकानां कर्ता तु लभते नरः । दीर्घायुष्यं च सौभाग्यं तथा प्रेत्य गतिं शुभां ॥

setukūpataṭākānāṃ kartā tu labhate naraḥ | dīrghāyuṣyaṃ ca saubhāgyaṃ tathā pretya gatiṃ śubhāṃ

“बाँध, कुएँ और तालाब बनानेवाला दीर्घ आयु और सौभाग्य पाता है, और मरने के बाद शुभ गति।”

श्लोक 18 (13.236.18)

वृक्षसंरोपको यस्तु छायापुष्पफलप्रदः । प्रेत्यभावे लभेत्पुण्यमभिगम्यो भवेन्नरः ॥

vṛkṣasaṃropako yastu chāyāpuṣpaphalapradaḥ | pretyabhāve labhetpuṇyamabhigamyo bhavennaraḥ

“जो छाया, फूल और फल देनेवाले वृक्ष लगाता है, वह मरने के बाद पुण्य पाता है और ऐसा मनुष्य बनता है जिसके पास लोग आश्रय के लिए आते हैं।”

श्लोक 19 (13.236.19)

यस्तु सङ्क्रमकृल्लोके नदीषु जलहारिणाम् । लभेत्पुण्यफलं प्रेत्य व्यसनेभ्यो विमोक्षणम् ॥

yastu saṅkramakṛlloke nadīṣu jalahāriṇām | labhetpuṇyaphalaṃ pretya vyasanebhyo vimokṣaṇam

“जो संसार में नदियों पर जल ढोनेवालों के लिए पुल बनाता है, वह मरने के बाद पुण्य का फल और विपत्तियों से छुटकारा पाता है।”

श्लोक 20 (13.236.20)

मार्गकृत्सततं मर्त्यो भवेत्सन्तानवान्नरः । कायदोषविमुक्तस्तु तीर्थकृत्सततं भवेत् ॥

mārgakṛtsatataṃ martyo bhavetsantānavānnaraḥ | kāyadoṣavimuktastu tīrthakṛtsatataṃ bhavet

“सड़क बनानेवाला मनुष्य सदा सन्तानवान् होता है, और तीर्थ बनानेवाला सदा शारीरिक दोषों से मुक्त रहता है।”

श्लोक 21 (13.236.21)

औषधानां प्रदानात्तु सततं कृपयाऽन्वितः । भवेद्व्याधिविहीनश्च दीर्घायुश्च विशेषतः ॥

auṣadhānāṃ pradānāttu satataṃ kṛpayā'nvitaḥ | bhavedvyādhivihīnaśca dīrghāyuśca viśeṣataḥ

“जो सदा दयालु रहकर औषधियों का दान करता है, वह रोगरहित और विशेष रूप से दीर्घायु होता है।”

श्लोक 22 (13.236.22)

अनाथान्पोषयेद्यस्तु कृपणान्धकपङ्गुकान् । स च पुण्यफलं प्रेत्य लभते कृच्छ्रमोक्षणम् ॥

anāthānpoṣayedyastu kṛpaṇāndhakapaṅgukān | sa ca puṇyaphalaṃ pretya labhate kṛcchramokṣaṇam

“जो अनाथों, दीन-दुःखियों, अन्धों और लँगड़ों का पालन करता है, वह मरने के बाद पुण्य का फल और कष्टों से मुक्ति पाता है।”

श्लोक 23 (13.236.23)

वेदगोष्ठाः शुभाः शाला भिक्षूणां च प्रतिश्रयम् । यः कुर्याल्लभते नित्यं नरः प्रेत्य फलं शुभम् ॥

vedagoṣṭhāḥ śubhāḥ śālā bhikṣūṇāṃ ca pratiśrayam | yaḥ kuryāllabhate nityaṃ naraḥ pretya phalaṃ śubham

“जो वेद-सभाओं के सुन्दर भवन, शालाएँ और भिक्षुओं के लिए आश्रय बनवाता है, उसे मरने के बाद सदा शुभ फल मिलता है।”

श्लोक 24 (13.236.24)

प्रासादवासं विविधं यक्षशोभां लभेत्पुनः । विविधं विविधाकारं भक्ष्यभोज्यगुणान्वितम् ॥

prāsādavāsaṃ vividhaṃ yakṣaśobhāṃ labhetpunaḥ | vividhaṃ vividhākāraṃ bhakṣyabhojyaguṇānvitam

“वह अनेक प्रकार के महलों में निवास और यक्ष की शोभा पाता है, तथा अनेक प्रकार और आकृतियों के उत्तम भक्ष्य-भोज्य पदार्थ पाता है।”

श्लोक 25 (13.236.25)

रम्यं तं दैवगोवाटं यः कुर्याल्लभते नरः । प्रेत्य भावे शुभां जातिं व्याधिमोक्षं तथैव च ॥

ramyaṃ taṃ daivagovāṭaṃ yaḥ kuryāllabhate naraḥ | pretya bhāve śubhāṃ jātiṃ vyādhimokṣaṃ tathaiva ca

“जो मनुष्य देवताओं के लिए सुन्दर गोशाला बनवाता है, वह मरने के बाद उत्तम जन्म और रोग से छुटकारा भी पाता है।”

श्लोक 26 (13.236.26)

एवं नानाविधं द्रव्यं दानकर्ता लभेत्फलम् ॥

evaṃ nānāvidhaṃ dravyaṃ dānakartā labhetphalam

“इस प्रकार दान करनेवाला अनेक प्रकार की वस्तुओं से फल पाता है।”

उमोवाच

श्लोक 27 (13.236.27)

कृतं दत्तं यथा यावत्तस्य तल्लभते फलम् । एतन्मे देवदेवेश तत्र कौतूहलं महत् ॥

kṛtaṃ dattaṃ yathā yāvattasya tallabhate phalam | etanme devadeveśa tatra kautūhalaṃ mahat

“जितना किया या दिया गया हो, उसके अनुरूप और उसी मात्रा में उसका फल मिलता है। हे देवों के देव, इस विषय में मुझे बड़ी जिज्ञासा है।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 28 (13.236.28)

प्रेत्यभावे शृणु फलं दत्तस्य च कृतस्य च । दानं षङ्गुणयुक्तं तु तदर्हाय यथाविधिः । यथाविभवतो दानं दातव्यमिति मानवैः ॥

pretyabhāve śṛṇu phalaṃ dattasya ca kṛtasya ca | dānaṃ ṣaṅguṇayuktaṃ tu tadarhāya yathāvidhiḥ | yathāvibhavato dānaṃ dātavyamiti mānavaiḥ

“मरने के बाद दिए हुए और किए हुए का फल सुनो। छह गुणों से युक्त दान योग्य पात्र को विधिपूर्वक देना चाहिए, और मनुष्यों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना चाहिए।”

श्लोक 29 (13.236.29)

बुद्धिमायुष्यमारोग्यं बलं भाग्यं तथाऽऽगमम् । रूपेण सप्तधा भूत्वा मानुष्यं फलति ध्रुवम् ॥

buddhimāyuṣyamārogyaṃ balaṃ bhāgyaṃ tathā''gamam | rūpeṇa saptadhā bhūtvā mānuṣyaṃ phalati dhruvam

“बुद्धि, आयु, आरोग्य, बल, भाग्य और इसी प्रकार आय, तथा रूप — इस प्रकार सात रूप होकर वह मनुष्य को निश्चय ही फल देता है।”

श्लोक 30 (13.236.30)

इदं दत्तमिदं देयमित्येवं फलकाङ्क्षया । यद्दत्तं तत्तदेव स्यान्न तु किञ्चन लभ्यते ॥

idaṃ dattamidaṃ deyamityevaṃ phalakāṅkṣayā | yaddattaṃ tattadeva syānna tu kiñcana labhyate

““यह मैंने दिया, यह देना है” — इस प्रकार फल की इच्छा से जो दिया जाता है, वह जितना दिया गया उतना ही रह जाता है; उससे और कुछ प्राप्त नहीं होता।”

श्लोक 31 (13.236.31)

ध्रुवं देव्युत्तमे दाने मध्यमे त्वधमे फलम् ॥

dhruvaṃ devyuttame dāne madhyame tvadhame phalam

“हे देवि, निश्चय ही उत्तम दान में उत्तम फल होता है, और मध्यम तथा निम्न दान में उसी के अनुसार फल होता है।”

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