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अनुशासन पर्व · अध्याय 237

यज्ञ और देवताओं की पूजा

उमा यज्ञ के विषय में पूछती हैं, लौकिक और वैदिक दोनों। महेश्वर बताते हैं कि सारी सृष्टि यज्ञ के लिए ही रची गई है, यज्ञ से देवता प्रसन्न होकर लोकों का पोषण करते हैं, और वे उत्सव, मालाओं, धूप, संगीत और स्तुतियों से की जानेवाली लौकिक पूजा का भी वर्णन करते हैं। स्वर्ग के देवता पृथ्वी पर मनुष्यों के कर्म कैसे जानते हैं, इस प्रश्न पर वे कहते हैं कि प्रत्येक शरीर में स्थित आत्मा, जो परम देव है, हर कर्म को जानता है, और कर्म का फल मन की स्थिति पर निर्भर करता है।

अध्याय 236अध्याय-सूचीअध्याय 238

उमोवाच

श्लोक 1 (13.237.1)

भगवन्देवदेवेश विशिष्टं यज्ञमुच्यते । लौकिकं वैदिकं चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

bhagavandevadeveśa viśiṣṭaṃ yajñamucyate | laukikaṃ vaidikaṃ caiva tanme śaṃsitumarhasi

“भगवन्, देवों के देव, यज्ञ को सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है। उसके विषय में, लौकिक और वैदिक दोनों प्रकार का, मुझे बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.237.2)

देवतानां तु पूजा या यज्ञेष्वेव समाहिता । यज्ञा वेदेष्वधीताश्च वेदा ब्राह्मणसंयुताः ॥

devatānāṃ tu pūjā yā yajñeṣveva samāhitā | yajñā vedeṣvadhītāśca vedā brāhmaṇasaṃyutāḥ

“देवताओं की पूजा यज्ञों में ही निहित है; यज्ञ वेदों में पढ़े गए हैं, और वेद ब्राह्मणों से जुड़े हैं।”

श्लोक 3 (13.237.3)

इदं तु सकलं दिव्यं दिवि वा भुवि वा प्रिये । यज्ञार्थं विद्धि तत्सृष्टं लोकानां हितकाम्यया ॥

idaṃ tu sakalaṃ divyaṃ divi vā bhuvi vā priye | yajñārthaṃ viddhi tatsṛṣṭaṃ lokānāṃ hitakāmyayā

“हे प्रिये, जान लो कि स्वर्ग में या पृथ्वी पर जो कुछ भी यह दिव्य है, वह सब लोकों के हित की कामना से यज्ञ के लिए ही रचा गया है।”

श्लोक 4 (13.237.4)

एवं विज्ञाय तत्कर्ता सदारः सततं द्विजः । प्रेत्यभावे लभेल्लोकान्ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥

evaṃ vijñāya tatkartā sadāraḥ satataṃ dvijaḥ | pretyabhāve labhellokānbrahmakarmasamādhinā

“यह जानकर यज्ञ करनेवाला द्विज, पत्नी सहित और सदा, ब्रह्मकर्म (वैदिक कर्म) में एकाग्रता के कारण मरने के बाद लोकों को प्राप्त करता है।”

श्लोक 5 (13.237.5)

ब्राह्मणेष्वेव तद्ब्रह्म नित्यं देवि समाहितम् । तस्माद्विप्रैर्यथाशास्त्रं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

brāhmaṇeṣveva tadbrahma nityaṃ devi samāhitam | tasmādviprairyathāśāstraṃ vidhidṛṣṭena karmaṇā

“वह वेद-ज्ञान सदा ब्राह्मणों में ही स्थित रहता है, हे देवि। इसलिए ब्राह्मण शास्त्र के अनुसार, विधि में बताए गए कर्म से,”

श्लोक 6 (13.237.6)

यज्ञकर्म कृतं सर्वं देवता अभितर्पयेत् । ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव यज्ञार्थं प्रायशः स्मृताः ॥

yajñakarma kṛtaṃ sarvaṃ devatā abhitarpayet | brāhmaṇāḥ kṣatriyāścaiva yajñārthaṃ prāyaśaḥ smṛtāḥ

“जो भी यज्ञकर्म किया जाता है, वह सब देवताओं को पूर्ण रूप से तृप्त करता है। ब्राह्मण और क्षत्रिय प्रायः यज्ञ के अधिकारी माने गए हैं।”

श्लोक 7 (13.237.7)

अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्वेदेषु परिकल्पितैः । सुशुद्धैर्यजमानैश्च ऋत्विग्भिश्च यथाविधिः । शुद्धैर्द्रव्योपकरणैर्यष्टव्यमिति निश्चयः ॥

agniṣṭomādibhiryajñairvedeṣu parikalpitaiḥ | suśuddhairyajamānaiśca ṛtvigbhiśca yathāvidhiḥ | śuddhairdravyopakaraṇairyaṣṭavyamiti niścayaḥ

“वेदों में बताए गए अग्निष्टोम आदि यज्ञों से, अत्यन्त शुद्ध यजमानों और ऋत्विजों के साथ विधिपूर्वक, तथा शुद्ध सामग्री और उपकरणों से यज्ञ करना चाहिए; यही निश्चय है।”

श्लोक 8 (13.237.8)

तथा कृतेषु यज्ञेषु देवानां तोषणं भवेत् । तुष्टेषु सर्वदेवेषु यज्वा यज्ञफलं लभेत् ॥

tathā kṛteṣu yajñeṣu devānāṃ toṣaṇaṃ bhavet | tuṣṭeṣu sarvadeveṣu yajvā yajñaphalaṃ labhet

“इस प्रकार यज्ञ किए जाने पर देवता प्रसन्न होते हैं, और सब देवताओं के प्रसन्न होने पर यजमान को यज्ञ का फल मिलता है।”

श्लोक 9 (13.237.9)

देवाः सन्तोषिता यज्ञैर्लोकान्संवर्धयन्त्युत । उभयोर्लोकयोर्भूतिर्देवि यज्ञे प्रदृश्यते ॥

devāḥ santoṣitā yajñairlokānsaṃvardhayantyuta | ubhayorlokayorbhūtirdevi yajñe pradṛśyate

“यज्ञों से सन्तुष्ट होकर देवता लोकों का पोषण करते हैं। हे देवि, दोनों लोकों की समृद्धि यज्ञ से ही दिखाई देती है।”

श्लोक 10 (13.237.10)

तस्माद्यज्वा दिवं गत्वा अमरैः सह मोदते । नास्ति यज्ञसमं दानं नास्ति यज्ञसमो निधिः ॥

tasmādyajvā divaṃ gatvā amaraiḥ saha modate | nāsti yajñasamaṃ dānaṃ nāsti yajñasamo nidhiḥ

“इसलिए यज्ञ करनेवाला स्वर्ग जाकर देवताओं के साथ आनन्द करता है। यज्ञ के बराबर कोई दान नहीं है और यज्ञ के बराबर कोई निधि नहीं है।”

श्लोक 11 (13.237.11)

सर्वधर्मसमुद्देशो देवि यज्ञे समाहितः । एषा यज्ञकृता पूजा लौकिकीमपरां शृणु ॥

sarvadharmasamuddeśo devi yajñe samāhitaḥ | eṣā yajñakṛtā pūjā laukikīmaparāṃ śṛṇu

“हे देवि, समस्त धर्म का सार यज्ञ में समाया है। यह यज्ञ द्वारा की जानेवाली पूजा है; अब दूसरी, लौकिक पूजा के विषय में सुनो।”

श्लोक 12 (13.237.12)

देवसत्कारमुद्दिश्य क्रियते लौकिकोत्सवः ॥

devasatkāramuddiśya kriyate laukikotsavaḥ

“देवताओं के सत्कार के उद्देश्य से लौकिक उत्सव किया जाता है।”

श्लोक 13 (13.237.13)

देवगोष्ठेऽधिसंस्कृत्य चोत्सवं यः करोति वै । यागान्देवोपहारांश्च शुचिर्भूत्वा यथाविधि । देवान्सन्तोषयित्वा स देवि धर्ममवाप्नुयात् ॥

devagoṣṭhe'dhisaṃskṛtya cotsavaṃ yaḥ karoti vai | yāgāndevopahārāṃśca śucirbhūtvā yathāvidhi | devānsantoṣayitvā sa devi dharmamavāpnuyāt

“जो देव-सभा-स्थान को सजाकर-सँवारकर वहाँ उत्सव करता है, और पवित्र होकर विधिपूर्वक यज्ञ तथा देवताओं को उपहार अर्पित करता है, वह देवताओं को प्रसन्न करके, हे देवि, धर्म प्राप्त करता है।”

श्लोक 14 (13.237.14)

गन्धमाल्यैश्च विविधैः परमान्नेन धूपनैः । बह्वीभिः स्तुतिभिश्चैव स्तुवद्भिः प्रयतैर्नरैः ॥

gandhamālyaiśca vividhaiḥ paramānnena dhūpanaiḥ | bahvībhiḥ stutibhiścaiva stuvadbhiḥ prayatairnaraiḥ

“अनेक प्रकार के गन्ध और मालाओं से, उत्तम अन्न और धूप से, और संयमी मनुष्यों द्वारा की गई अनेक स्तुतियों से,”

श्लोक 15 (13.237.15)

नृत्तैर्वाद्यैश्च गान्धर्वैरन्यैर्दृष्टिविलोभनैः । देवसत्कारमुद्दिश्य कुर्वते ये नरा भुवि ॥

nṛttairvādyaiśca gāndharvairanyairdṛṣṭivilobhanaiḥ | devasatkāramuddiśya kurvate ye narā bhuvi

“नृत्य, वाद्य, गान और आँखों को लुभानेवाली अन्य वस्तुओं के साथ — जो मनुष्य पृथ्वी पर देवताओं के सत्कार के उद्देश्य से यह करते हैं,”

श्लोक 16 (13.237.16)

तेषां भक्तिकृतेनैव सत्कारेणैव पूजिताः । तेनैव तोषं संयान्ति देवि देवास्त्रिविष्टपे ॥

teṣāṃ bhaktikṛtenaiva satkāreṇaiva pūjitāḥ | tenaiva toṣaṃ saṃyānti devi devāstriviṣṭape

“स्वर्ग में रहनेवाले देवता उनकी भक्ति से किए गए उसी सत्कार से पूजित होकर, हे देवि, उसी से प्रसन्न होते हैं।”

श्लोक 17 (13.237.17)

मानुषैश्चोपकारैर्वा शुचिभिः सत्परायणैः । ब्रह्मचर्यपरैरेतत्कृतं धर्मफलं लभेत् ॥

mānuṣaiścopakārairvā śucibhiḥ satparāyaṇaiḥ | brahmacaryaparairetatkṛtaṃ dharmaphalaṃ labhet

“इसी प्रकार शुद्ध, सत्परायण और ब्रह्मचर्य में तत्पर मनुष्यों द्वारा मानवीय सेवाओं से जो किया जाता है, वह धर्म का फल देता है।”

श्लोक 18 (13.237.18)

केवलैः स्तुतिभिर्देवि गन्धमाल्यसमाहितैः । प्रयतैः शुद्धगात्रैस्तु शुद्धदेशे सुपूजिताः । सन्तोषं यान्ति ते देवा भक्तैः सम्पूजितास्तथा ॥

kevalaiḥ stutibhirdevi gandhamālyasamāhitaiḥ | prayataiḥ śuddhagātraistu śuddhadeśe supūjitāḥ | santoṣaṃ yānti te devā bhaktaiḥ sampūjitāstathā

“हे देवि, केवल स्तुतियों से भी, जब वे गन्ध और मालाओं के साथ हों, संयमी और शुद्ध शरीरवाले भक्तों द्वारा शुद्ध स्थान में भली-भाँति पूजे गए वे देवता इस प्रकार भक्तों से सम्मानित होकर प्रसन्न होते हैं।”

श्लोक 19 (13.237.19)

देवान्सन्तोषयित्वैव देवि धर्ममवाप्नुयात् ॥

devānsantoṣayitvaiva devi dharmamavāpnuyāt

“देवताओं को प्रसन्न करके ही, हे देवि, मनुष्य धर्म प्राप्त करता है।”

उमोवाच

श्लोक 20 (13.237.20)

त्रिविष्टपस्था वै भूमौ देवा मानुषचेष्टितम् । कथं ज्ञास्यन्ति विधिवत्तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

triviṣṭapasthā vai bhūmau devā mānuṣaceṣṭitam | kathaṃ jñāsyanti vidhivattanme śaṃsitumarhasi

“देवता स्वर्ग में रहते हैं, और मनुष्यों का आचरण पृथ्वी पर होता है। वे उसे ठीक-ठीक कैसे जान पाएँगे? कृपया मुझे यह बताइए।”

महेश्वर उवाच

श्लोक 21 (13.237.21)

तदहं ते प्रवक्ष्यामि यथा तैर्विद्यते प्रिये । प्राणिनां तु शरीरेषु अन्तरात्मा व्यवस्थितः ॥

tadahaṃ te pravakṣyāmi yathā tairvidyate priye | prāṇināṃ tu śarīreṣu antarātmā vyavasthitaḥ

“हे प्रिये, वे इसे जिस प्रकार जानते हैं, वह मैं तुम्हें बताऊँगा। प्राणियों के शरीरों में अन्तरात्मा स्थित है।”

श्लोक 22 (13.237.22)

आत्मानं परमं देवमिति विद्धि शुभेक्षणे । आत्मा मनोव्यवस्थानात्सर्वं वेत्ति शुभाशुभम् ॥

ātmānaṃ paramaṃ devamiti viddhi śubhekṣaṇe | ātmā manovyavasthānātsarvaṃ vetti śubhāśubham

“हे शुभ नेत्रोंवाली, जान लो कि आत्मा ही परम देव है। मन में स्थित होने के कारण आत्मा शुभ और अशुभ सब कुछ जानता है।”

श्लोक 23 (13.237.23)

आत्मैव देवास्तद्विद्युरव्यग्रमनसा कृतम् । सतां मनोव्यवस्थानाच्छुभं भवति वै नृणाम् ॥

ātmaiva devāstadvidyuravyagramanasā kṛtam | satāṃ manovyavasthānācchubhaṃ bhavati vai nṛṇām

“देवता आत्मा के द्वारा ही जानते हैं कि कौन-सा कर्म शान्त मन से किया गया है। सज्जनों के मन की स्थिरता से ही मनुष्यों का कल्याण होता है।”

श्लोक 24 (13.237.24)

तस्माद्देवाभिसम्पूजा ब्राह्मणानां तथैव च । यज्ञाश्च धर्मकार्याणि गुरुपूजा च शोभने ॥

tasmāddevābhisampūjā brāhmaṇānāṃ tathaiva ca | yajñāśca dharmakāryāṇi gurupūjā ca śobhane

“इसलिए देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा, तथा यज्ञ, धर्मकार्य और गुरु की पूजा, हे शोभने,”

श्लोक 25 (13.237.25)

शुद्धगात्रैर्व्रतयुतैस्तन्मयैस्तत्परायणैः । एवं व्यवस्थितैर्नित्यं कर्तव्यमिति निश्चयः ॥

śuddhagātrairvratayutaistanmayaistatparāyaṇaiḥ | evaṃ vyavasthitairnityaṃ kartavyamiti niścayaḥ

“शुद्ध शरीर, दृढ़ व्रत, तन्मयता और तत्परता से युक्त तथा इस प्रकार स्थिर रहनेवालों को सदा करने चाहिए; यही निश्चय है।”

श्लोक 26 (13.237.26)

एवं कृत्वा शुभाकाङ्क्षी परत्रेह च मोदते । अन्यथा मन आविश्य कृतं न फलति प्रिये । ऋतेऽपि तु मनो देवि अशुभं फलति ध्रुवम् ॥

evaṃ kṛtvā śubhākāṅkṣī paratreha ca modate | anyathā mana āviśya kṛtaṃ na phalati priye | ṛte'pi tu mano devi aśubhaṃ phalati dhruvam

“इस प्रकार करके शुभ की कामना करनेवाला परलोक में भी और यहाँ भी आनन्द पाता है। हे प्रिये, मन कहीं और लगाकर किया गया कर्म फल नहीं देता; और हे देवि, कर्म के बिना भी अशुभ विचार निश्चय ही फल देता है।”

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