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अनुशासन पर्व · अध्याय 238

श्राद्ध-विधि और पितृगण

उमा महेश्वर से पूछती हैं कि पितृमेध कैसे किया जाए, और वे उसके स्थान, मास और तिथियाँ, निमन्त्रित करने और त्यागने योग्य ब्राह्मण, पवित्र और वर्जित वस्तुएँ, विभिन्न भोजनों से मिलने वाली तृप्ति की अवधि, तथा तीन पिण्डों के दान का क्रम बताते हैं। फिर उमा पूछती हैं कि दक्षिण दिशा में रहने वाले पितर पृथ्वी पर दिए गए अन्न से कैसे पुष्ट होते हैं, और महेश्वर देवताओं और पितरों के हव्य और कव्य कर्मों तथा मनुष्य के उन्हें करने की आवश्यकता का स्पष्टीकरण करते हैं।

अध्याय 237अध्याय-सूचीअध्याय 239

उमोवाच

श्लोक 1 (13.238.1)

पितृमेधः कथं देव तन्मे शंसितुमर्हसि । सर्वेषां पितरः पूज्याः सर्वसम्पत्प्रदायिनः ॥

pitṛmedhaḥ kathaṃ deva tanme śaṃsitumarhasi | sarveṣāṃ pitaraḥ pūjyāḥ sarvasampatpradāyinaḥ

हे देव, पितृमेध कैसे किया जाता है? कृपा करके मुझे बताइए। पितर सभी के पूज्य हैं और सब प्रकार की सम्पत्ति देने वाले हैं।

महेश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.238.2)

पितृमेधं प्रवक्ष्यामि यथावत्तन्मना शृणु । देशकालौ विधानं च तत्क्रियायाः शुभाशुभम् ॥

pitṛmedhaṃ pravakṣyāmi yathāvattanmanā śṛṇu | deśakālau vidhānaṃ ca tatkriyāyāḥ śubhāśubham

मैं पितृमेध को यथावत् बताऊँगा, ध्यान लगाकर सुनो: उसका स्थान और समय, उसकी विधि, तथा उस कर्म में क्या शुभ है और क्या अशुभ।

श्लोक 3 (13.238.3)

लोकेषु पितरः पूज्या देवतानां च देवताः । शुचयो निर्मलाः पुण्या दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥

lokeṣu pitaraḥ pūjyā devatānāṃ ca devatāḥ | śucayo nirmalāḥ puṇyā dakṣiṇāṃ diśamāśritāḥ

लोकों में पितर पूजनीय हैं, वे देवताओं के भी देवता हैं। वे शुद्ध, निर्मल और पुण्यमय हैं तथा दक्षिण दिशा में निवास करते हैं।

श्लोक 4 (13.238.4)

यथा वृष्टिं प्रतीक्षन्ते भूमिष्ठाः सर्वजन्तवः । पितरश्च तथा लोके पितृमेधं शुभेक्षणे ॥

yathā vṛṣṭiṃ pratīkṣante bhūmiṣṭhāḥ sarvajantavaḥ | pitaraśca tathā loke pitṛmedhaṃ śubhekṣaṇe

हे सुन्दर नेत्रों वाली, जैसे पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणी वर्षा की प्रतीक्षा करते हैं, वैसे ही लोक में पितर पितृमेध की प्रतीक्षा करते हैं।

श्लोक 5 (13.238.5)

तस्य देशाः कुरुक्षेत्रं गया गङ्गा सरस्वती । प्रभासं पुष्करं चेति तेषु दत्तं महाफलम् ॥

tasya deśāḥ kurukṣetraṃ gayā gaṅgā sarasvatī | prabhāsaṃ puṣkaraṃ ceti teṣu dattaṃ mahāphalam

उसके स्थान कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, सरस्वती, प्रभास और पुष्कर हैं; इन स्थानों में किया गया दान महान् फल देता है।

श्लोक 6 (13.238.6)

तीर्थानि सरितः पुण्या विविक्तानि वनानि च । नदीनां पुलिनानीति देशाः श्राद्धस्य पूजिताः ॥

tīrthāni saritaḥ puṇyā viviktāni vanāni ca | nadīnāṃ pulinānīti deśāḥ śrāddhasya pūjitāḥ

तीर्थ, पुण्य नदियाँ, एकान्त वन और नदियों के तट की बालुका-भूमियाँ: ये श्राद्ध के लिए प्रशस्त स्थान माने गए हैं।

श्लोक 7 (13.238.7)

माघप्रोष्ठपदौ मासौ श्राद्धकर्मणि पूजितौ । पक्षयोः कृष्णपक्षश्च पूर्वपक्षात्प्रशस्यते ॥

māghaproṣṭhapadau māsau śrāddhakarmaṇi pūjitau | pakṣayoḥ kṛṣṇapakṣaśca pūrvapakṣātpraśasyate

श्राद्धकर्म के लिए माघ और प्रोष्ठपद (भाद्रपद) मास प्रशस्त हैं; और दोनों पक्षों में कृष्ण पक्ष शुक्ल पक्ष से अधिक श्रेष्ठ माना जाता है।

श्लोक 8 (13.238.8)

अमावास्यां त्रयोदश्यां नवम्यां प्रतिपत्सु च । तिथिष्वेतासु तुष्यन्ति दत्तेनेह पितामहाः ॥

amāvāsyāṃ trayodaśyāṃ navamyāṃ pratipatsu ca | tithiṣvetāsu tuṣyanti datteneha pitāmahāḥ

अमावस्या, त्रयोदशी, नवमी और प्रतिपदाओं की तिथियों में दिए गए दान से पितामह (पितर) यहाँ सन्तुष्ट होते हैं।

श्लोक 9 (13.238.9)

पूर्वाह्णे शुक्लपक्षे च रात्रौ जन्मदिनेषु वा । युग्मेष्वहस्सु च श्राद्धं न च कुर्वीत पण्डितः ॥

pūrvāhṇe śuklapakṣe ca rātrau janmadineṣu vā | yugmeṣvahassu ca śrāddhaṃ na ca kurvīta paṇḍitaḥ

विद्वान् पुरुष को पूर्वाह्न में, शुक्ल पक्ष में, रात्रि में, जन्मदिनों पर अथवा सम (युग्म) तिथियों वाले दिनों में श्राद्ध नहीं करना चाहिए।

श्लोक 10 (13.238.10)

एष कालो मया प्रोक्तः पितृमेधस्य पूजितः । यस्मिंश्च ब्राह्मणं पात्रं पश्येत्कालः स च स्मृतः ॥

eṣa kālo mayā proktaḥ pitṛmedhasya pūjitaḥ | yasmiṃśca brāhmaṇaṃ pātraṃ paśyetkālaḥ sa ca smṛtaḥ

यह वह समय है जो मैंने पितृमेध के लिए प्रशस्त बताया है; और जब कभी कोई सुपात्र ब्राह्मण मिल जाए, वह भी उचित काल माना गया है।

श्लोक 11 (13.238.11)

अपाङ्क्तेया द्विजा वर्ज्या ग्राह्यास्ते पङ्क्तिपावनाः । भोजयेद्यदि पापिष्ठाञ्श्राद्धेषु नरकं व्रजेत् ॥

apāṅkteyā dvijā varjyā grāhyāste paṅktipāvanāḥ | bhojayedyadi pāpiṣṭhāñśrāddheṣu narakaṃ vrajet

जो द्विज पंक्ति में बैठाने योग्य नहीं हैं उन्हें त्याग देना चाहिए, और जो पंक्ति को पावन करने वाले हैं उन्हें स्वीकार करना चाहिए। यदि कोई श्राद्धों में अत्यन्त पापी लोगों को भोजन कराए, तो वह नरक में जाता है।

श्लोक 12 (13.238.12)

वृत्तश्रुतकुलोपेतान्सकलत्रान्गुणान्वितान् । तदर्हाञ्श्रोत्रियान्विद्धि ब्राह्मणानयुजः शुभे ॥

vṛttaśrutakulopetānsakalatrānguṇānvitān | tadarhāñśrotriyānviddhi brāhmaṇānayujaḥ śubhe

हे शुभे, जान लो कि सदाचार, विद्या और कुल से युक्त, सपत्नीक और गुणवान् श्रोत्रिय ब्राह्मण ही इसके योग्य हैं; उन्हें विषम संख्या में निमन्त्रित करना चाहिए।

श्लोक 13 (13.238.13)

एतान्निमन्त्रयोद्विद्वान्पूर्वेद्युः प्रातरेव वा । तत्र श्राद्धक्रियां पश्चादारभेत यथाविधि ॥

etānnimantrayodvidvānpūrvedyuḥ prātareva vā | tatra śrāddhakriyāṃ paścādārabheta yathāvidhi

विद्वान् पुरुष इन्हें एक दिन पहले अथवा उसी दिन प्रातःकाल ही निमन्त्रित करे; और उसके बाद विधिपूर्वक श्राद्धकर्म आरम्भ करे।

श्लोक 14 (13.238.14)

त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः । त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वरा ॥

trīṇi śrāddhe pavitrāṇi dauhitraḥ kutapastilāḥ | trīṇi cātra praśaṃsanti śaucamakrodhamatvarā

श्राद्ध में तीन वस्तुएँ पवित्र करने वाली हैं: दौहित्र (पुत्री का पुत्र), कुतप और तिल। और यहाँ तीन गुणों की भी प्रशंसा की जाती है: शुद्धता, क्रोध का अभाव और जल्दबाजी का अभाव।

श्लोक 15 (13.238.15)

कुतपः खड्गपात्रं च कुशा दर्भास्तिला मधु । कालशाकं गजच्छाया पवित्रं श्राद्धकर्मसु ॥

kutapaḥ khaḍgapātraṃ ca kuśā darbhāstilā madhu | kālaśākaṃ gajacchāyā pavitraṃ śrāddhakarmasu

कुतप, गैंडे के सींग का पात्र, कुश, दर्भ, तिल, मधु, कालशाक और हाथी की छाया: ये श्राद्धकर्मों में पवित्र माने गए हैं।

श्लोक 16 (13.238.16)

तिलानवकिरेत्तत्र नानावर्णान्समन्ततः । अशुद्धं पितृयज्ञश्च तिलैः शुध्यति शोभने ॥

tilānavakirettatra nānāvarṇānsamantataḥ | aśuddhaṃ pitṛyajñaśca tilaiḥ śudhyati śobhane

वहाँ चारों ओर अनेक रंगों के तिल बिखेरे। हे शोभने, पितृयज्ञ में जो कुछ अशुद्ध हो, वह तिलों से शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 17 (13.238.17)

नीलकाषायवस्त्रं च भिन्नवर्णं नवव्रणम् । हीनाङ्गमशुचिं वाऽपि वर्जयेत्तत्र दूरतः ॥

nīlakāṣāyavastraṃ ca bhinnavarṇaṃ navavraṇam | hīnāṅgamaśuciṃ vā'pi varjayettatra dūrataḥ

नीले या गेरुए रंग के वस्त्र, चितकबरे रंग वाले, नए घाव वाले, अंगहीन अथवा अपवित्र व्यक्ति: इन सबको उस कर्म से दूर ही रखे।

श्लोक 18 (13.238.18)

कुक्कुटांश्च वराहांश्च नग्नं क्लीबं रजस्वलाम् । आयसं त्रपुसीसं च श्राद्धकर्मणि वर्जयेत् ॥

kukkuṭāṃśca varāhāṃśca nagnaṃ klībaṃ rajasvalām | āyasaṃ trapusīsaṃ ca śrāddhakarmaṇi varjayet

मुर्गे और सूअर, नग्न व्यक्ति, नपुंसक, रजस्वला स्त्री, लोहा, राँगा और सीसा: इन सबको श्राद्धकर्म में वर्जित करे।

श्लोक 19 (13.238.19)

मांसैः प्रीणन्ति पितरो मुद्गमाषयवैरिह । शशरौरवमांसेन षण्मासं तृप्तिरिष्यते ॥

māṃsaiḥ prīṇanti pitaro mudgamāṣayavairiha | śaśarauravamāṃsena ṣaṇmāsaṃ tṛptiriṣyate

यहाँ पितर मांस से तथा मूँग, उड़द और जौ से तृप्त होते हैं। खरगोश और रुरु मृग के मांस से छह महीने की तृप्ति कही गई है।

श्लोक 20 (13.238.20)

संवत्सरं च गव्येन हविषा पायसेन च । वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥

saṃvatsaraṃ ca gavyena haviṣā pāyasena ca | vārdhrīṇasasya māṃsena tṛptirdvādaśavārṣikī

गाय से प्राप्त हविष्य और खीर से एक वर्ष की तृप्ति होती है; वार्ध्रीणस के मांस से बारह वर्ष की तृप्ति होती है।

श्लोक 21 (13.238.21)

आनन्त्याय भवेद्दत्तं खड्गमांसं पितृक्षये । पायसं सतिलं क्षौद्रं खड्गमांसेन सम्मितम् ॥

ānantyāya bhaveddattaṃ khaḍgamāṃsaṃ pitṛkṣaye | pāyasaṃ satilaṃ kṣaudraṃ khaḍgamāṃsena sammitam

पितरों के श्राद्ध में दिया गया गैंडे का मांस अनन्त फल देने वाला होता है; तिल और मधु सहित खीर को गैंडे के मांस के समान माना गया है।

श्लोक 22 (13.238.22)

महाशकलिनो मत्स्याश्छागो वा सर्वलोहितः । कालशाकमितीत्येव तदानन्त्याय कल्पितम् ॥

mahāśakalino matsyāśchāgo vā sarvalohitaḥ | kālaśākamitītyeva tadānantyāya kalpitam

बड़े शल्कों वाली मछलियाँ, या पूरी तरह लाल बकरा, या कालशाक: इन्हें भी अनन्त तृप्ति देने वाला ठहराया गया है।

श्लोक 23 (13.238.23)

सापूपं सामिषं स्निग्धमाहारमुपकल्पयेत् । उपकल्प्य तदाहारं ब्राह्मणानर्चयेत्ततः ॥

sāpūpaṃ sāmiṣaṃ snigdhamāhāramupakalpayet | upakalpya tadāhāraṃ brāhmaṇānarcayettataḥ

वह पूए, मांस और घी से युक्त भोजन तैयार करे; और भोजन तैयार करके तब ब्राह्मणों का सत्कार करे।

श्लोक 24 (13.238.24)

श्मश्रुकर्मशिरः स्नातान्समारोप्यासनं क्रमात् । सुगन्धमाल्याभरणैः स्नग्भिरेतान्विभूषयेत् ॥

śmaśrukarmaśiraḥ snātānsamāropyāsanaṃ kramāt | sugandhamālyābharaṇaiḥ snagbhiretānvibhūṣayet

जिनकी दाढ़ी-मूँछ बनवाई जा चुकी हो और जो सिर से स्नान कर चुके हों, उन ब्राह्मणों को क्रम से आसनों पर बैठाकर सुगन्धित मालाओं, आभूषणों और पुष्प-हारों से सजाए।

श्लोक 25 (13.238.25)

अलङ्कृत्योपविष्टांस्तान्पिण्डावापं निवेदयेत् ॥

alaṅkṛtyopaviṣṭāṃstānpiṇḍāvāpaṃ nivedayet

उन्हें अलंकृत कर बैठा देने के बाद पिण्डदान की बात उन्हें निवेदन करे।

श्लोक 26 (13.238.26)

ततः प्रस्तीर्य दर्भाणां प्रस्तरं दक्षिणामुखम् । तत्समीपेऽग्निमिद्ध्वा च स्वधां च जुहुयात्ततः । समीपे त्वग्नीषोमाभ्यां पितृभ्यो जुहुयात्तदा ॥

tataḥ prastīrya darbhāṇāṃ prastaraṃ dakṣiṇāmukham | tatsamīpe'gnimiddhvā ca svadhāṃ ca juhuyāttataḥ | samīpe tvagnīṣomābhyāṃ pitṛbhyo juhuyāttadā

तब दक्षिणमुख होकर दर्भों का बिछौना बिछाए, उसके पास अग्नि प्रज्वलित करके स्वधा की आहुति दे। और उसी के समीप अग्नि-सोम को तथा पितरों को आहुति दे।

श्लोक 27 (13.238.27)

तथा दर्भेषु पिण्डांस्त्रीन्निर्वपेद्दक्षिणामुखः । अपसव्यमपाङ्गुष्ठं नामधेयपुरस्कृतम् ॥

tathā darbheṣu piṇḍāṃstrīnnirvapeddakṣiṇāmukhaḥ | apasavyamapāṅguṣṭhaṃ nāmadheyapuraskṛtam

तब दक्षिणमुख होकर कुशों पर तीन पिण्ड रखे; अपसव्य भाव से, अँगूठे को अलग रखकर, और नाम का उच्चारण पहले करके।

श्लोक 28 (13.238.28)

एतेन विधिना दत्तं पितॄणामक्षयं भवेत् । ततो विप्रान्यथाशक्ति पूजयेन्नियतः शुचिः । सदक्षिणं ससम्भारं यथा तुष्यन्ति ते द्विजाः ॥

etena vidhinā dattaṃ pitṝṇāmakṣayaṃ bhavet | tato viprānyathāśakti pūjayenniyataḥ śuciḥ | sadakṣiṇaṃ sasambhāraṃ yathā tuṣyanti te dvijāḥ

इस विधि से दिया हुआ दान पितरों के लिए अक्षय होता है। फिर संयमी और शुद्ध रहकर अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा और सब सामग्री सहित ब्राह्मणों का पूजन करे, जिससे वे द्विज सन्तुष्ट हों।

श्लोक 29 (13.238.29)

यत्र तत्क्रियते तत्र न जल्पन्न जपेन्मिथः । नियम्य वाच्यं देहं च श्राद्धकर्म समारभेत् ॥

yatra tatkriyate tatra na jalpanna japenmithaḥ | niyamya vācyaṃ dehaṃ ca śrāddhakarma samārabhet

जहाँ वह कर्म किया जा रहा हो, वहाँ वे आपस में न बातचीत करें और न जप करें। वाणी और देह को संयत करके श्राद्धकर्म आरम्भ करे।

श्लोक 30 (13.238.30)

ततो निर्वपने वृत्ते तान्पिण्डांस्तदनन्तरम् । ब्राह्मणोऽग्निरजो गौर्वा भक्षयेदप्सु वा क्षिपेत् ॥

tato nirvapane vṛtte tānpiṇḍāṃstadanantaram | brāhmaṇo'gnirajo gaurvā bhakṣayedapsu vā kṣipet

फिर पिण्डदान पूरा हो जाने पर उन पिण्डों को उसके बाद कोई ब्राह्मण, अग्नि, बकरा या गाय खाए, अथवा उन्हें जल में डाल दिया जाए।

श्लोक 31 (13.238.31)

पत्नीं वा मध्यमं पिण्डं पुत्रकामो हि प्राशयेत् । आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम् ॥

patnīṃ vā madhyamaṃ piṇḍaṃ putrakāmo hi prāśayet | ādhatta pitaro garbhaṃ kumāraṃ puṣkarasrajam

अथवा पुत्र की कामना करने वाला पुरुष अपनी पत्नी को बीच वाला पिण्ड खिलाए, यह कहते हुए: "हे पितरो, इसमें कमल की माला पहने हुए कुमार को गर्भ में स्थापित करो।"

श्लोक 32 (13.238.32)

तृप्तानुत्थाप्य तान्विप्रानन्नशेषं निवेदयेत् । तच्छेषं बहुभिः पश्चात्सभृत्यो भक्षयेन्नरः ॥

tṛptānutthāpya tānviprānannaśeṣaṃ nivedayet | taccheṣaṃ bahubhiḥ paścātsabhṛtyo bhakṣayennaraḥ

तृप्त ब्राह्मणों को उठाकर उनके सामने बचा हुआ अन्न निवेदित करे; उसके बाद वह मनुष्य बहुत-से लोगों और अपने सेवकों के साथ उसका शेष भाग खाए।

श्लोक 33 (13.238.33)

एष प्रोक्तः समासेन पितृयज्ञः सनातनः । पितरस्तेन तुष्यन्ति कर्ता च फलमाप्नुयात् ॥

eṣa proktaḥ samāsena pitṛyajñaḥ sanātanaḥ | pitarastena tuṣyanti kartā ca phalamāpnuyāt

यह सनातन पितृयज्ञ संक्षेप में कहा गया; इससे पितर प्रसन्न होते हैं और करने वाला इसका फल पाता है।

श्लोक 34 (13.238.34)

अहन्यहनि वा कुर्यान्मासेमासेऽथवा पुनः । संवत्सरं द्विः कुर्याच्च चतुर्वाऽपि स्वशक्तितः ॥

ahanyahani vā kuryānmāsemāse'thavā punaḥ | saṃvatsaraṃ dviḥ kuryācca caturvā'pi svaśaktitaḥ

वह इसे प्रतिदिन करे, अथवा प्रत्येक मास में; या वर्ष में दो बार अथवा चार बार, अपनी सामर्थ्य के अनुसार।

श्लोक 35 (13.238.35)

दीर्घायुश्च भवेत्स्वस्थः पितृमेधेन वा पुनः । सपुत्रो बहुभृत्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् ॥

dīrghāyuśca bhavetsvasthaḥ pitṛmedhena vā punaḥ | saputro bahubhṛtyaśca prabhūtadhanadhānyavān

पितृमेध से मनुष्य दीर्घायु और स्वस्थ होता है, पुत्रों और बहुत-से सेवकों वाला होता है, तथा प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न होता है।

श्लोक 36 (13.238.36)

श्राद्धदः स्वर्गमाप्नोति निर्मलं विविधात्मकम् । अप्सरोगणसंघुष्टं विरजस्कमनन्तरम् ॥

śrāddhadaḥ svargamāpnoti nirmalaṃ vividhātmakam | apsarogaṇasaṃghuṣṭaṃ virajaskamanantaram

श्राद्ध करने वाला निर्मल, अनेक प्रकार के, अप्सराओं के समूहों से गूँजते हुए, रजोगुण से रहित स्वर्ग को तुरन्त प्राप्त करता है।

श्लोक 37 (13.238.37)

श्राद्धानि पुष्टिकामा वै ये प्रकुर्वन्ति पण्डिताः । तेषां पुष्टिं प्रजां चैव दास्यन्ति पितरः सदा ॥

śrāddhāni puṣṭikāmā vai ye prakurvanti paṇḍitāḥ | teṣāṃ puṣṭiṃ prajāṃ caiva dāsyanti pitaraḥ sadā

जो विद्वान् पुष्टि की कामना से श्राद्ध करते हैं, उन्हें पितर सदा पुष्टि और सन्तान प्रदान करते हैं।

श्लोक 38 (13.238.38)

धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं शत्रुविनाशनम् । कुलसन्धारकं चेति श्राद्धमाहुर्मनीषिणः ॥

dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ svargyaṃ śatruvināśanam | kulasandhārakaṃ ceti śrāddhamāhurmanīṣiṇaḥ

वह धन, यश और आयु देने वाला है, स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला, शत्रुओं का नाश करने वाला और कुल को धारण करने वाला है: ऐसा मनीषी लोग श्राद्ध के विषय में कहते हैं।

उमोवाच

श्लोक 39 (13.238.39)

भगवन्देवदेवेश मृतास्ते भुवि जन्तवः । नानाजातिषु जायन्ते शीघ्रं कर्मवशात्पुनः ॥

bhagavandevadeveśa mṛtāste bhuvi jantavaḥ | nānājātiṣu jāyante śīghraṃ karmavaśātpunaḥ

हे भगवन्, देवों के देव, पृथ्वी पर मरे हुए प्राणी अपने कर्मों के वश में होकर शीघ्र ही फिर अनेक योनियों में जन्म लेते हैं।

श्लोक 40 (13.238.40)

पितरः स्वस्ति ते तत्र कथं तिष्ठन्ति देववत् । पितॄणां कतमो देशः पिण्डानश्नन्ति वै कथम् ॥

pitaraḥ svasti te tatra kathaṃ tiṣṭhanti devavat | pitṝṇāṃ katamo deśaḥ piṇḍānaśnanti vai katham

तब वहाँ पितर कुशलपूर्वक देवताओं की तरह कैसे रहते हैं? पितरों का कौन-सा लोक है, और वे पिण्डों को कैसे खाते हैं?

श्लोक 41 (13.238.41)

अन्ने दत्ते मृतानां तु कथमाप्यायनं भवेत् । एवं मया संशयितं भगवन्वक्तुमर्हसि ॥

anne datte mṛtānāṃ tu kathamāpyāyanaṃ bhavet | evaṃ mayā saṃśayitaṃ bhagavanvaktumarhasi

मृतकों के निमित्त अन्न देने पर उनका पोषण कैसे होता है? हे भगवन्, मेरी यह शंका है; आपको इसे बताना चाहिए।

नारद उवाच

श्लोक 42 (13.238.42)

एतद्विरुद्धं पृच्छन्त्यां रुद्राण्यां परिषद्भृशम् । बभूव सर्वा मुदिता श्रोतुं हि परमं हितम् ॥

etadviruddhaṃ pṛcchantyāṃ rudrāṇyāṃ pariṣadbhṛśam | babhūva sarvā muditā śrotuṃ hi paramaṃ hitam

जब रुद्राणी ने यह विरोधी-सा प्रश्न पूछा, तब सारी सभा अत्यन्त प्रसन्न हो गई, क्योंकि उसे सुनना परम हितकर था।

महेश्वर उवाच

श्लोक 43 (13.238.43)

स्थाने संशयितं देवि शृणु कल्याणि तत्वतः । गुह्यानां परमं गुह्यं हितानां परमं हितम् ॥

sthāne saṃśayitaṃ devi śṛṇu kalyāṇi tatvataḥ | guhyānāṃ paramaṃ guhyaṃ hitānāṃ paramaṃ hitam

हे देवी, तुम्हारी शंका उचित है; हे कल्याणी, तत्त्वतः सुनो। यह गुप्त बातों में परम गुप्त और हितकर बातों में परम हितकर है।

श्लोक 44 (13.238.44)

यथा देवगणा देवि तथा पितृगणाः प्रिये । दक्षिणस्यां दिशि शुभे सर्वे पितृगणाः स्थिताः ॥

yathā devagaṇā devi tathā pitṛgaṇāḥ priye | dakṣiṇasyāṃ diśi śubhe sarve pitṛgaṇāḥ sthitāḥ

हे प्रिये, जैसे देवताओं के गण हैं, वैसे ही पितरों के गण हैं। सभी पितृगण शुभ दक्षिण दिशा में स्थित हैं।

श्लोक 45 (13.238.45)

प्रेतानुद्दिश्य या पूजा क्रियते मानुषैरिह । तेन तुष्यन्ति पितरो न प्रेताः पितरः स्मृताः ॥

pretānuddiśya yā pūjā kriyate mānuṣairiha | tena tuṣyanti pitaro na pretāḥ pitaraḥ smṛtāḥ

यहाँ मनुष्य प्रेतों को उद्देश्य करके जो पूजा करते हैं, उससे पितर सन्तुष्ट होते हैं; प्रेत पितर नहीं माने गए हैं।

श्लोक 46 (13.238.46)

उत्तरस्यां यथा देवा रमन्ते यज्ञकर्मभिः । दक्षिणस्यां तथा देवि तुष्यन्ति विविधैर्मखैः ॥

uttarasyāṃ yathā devā ramante yajñakarmabhiḥ | dakṣiṇasyāṃ tathā devi tuṣyanti vividhairmakhaiḥ

जैसे उत्तर में देवता यज्ञकर्मों से आनन्दित होते हैं, वैसे ही हे देवी, दक्षिण में पितर अनेक प्रकार के यज्ञों से सन्तुष्ट होते हैं।

श्लोक 47 (13.238.47)

द्विविधं क्रियते कर्म हव्यकव्यसमाश्रितम् । तयोर्हव्यक्रिया देवान्कव्यमाप्यायते पितॄन् ॥

dvividhaṃ kriyate karma havyakavyasamāśritam | tayorhavyakriyā devānkavyamāpyāyate pitṝn

कर्म दो प्रकार का किया जाता है, हव्य और कव्य पर आश्रित। इनमें हव्य-क्रिया देवताओं को पोषण देती है और कव्य पितरों को।

श्लोक 48 (13.238.48)

प्रसव्यं मङ्गलैर्द्रव्यैर्हव्यकर्म विधीयते । अपसव्यममङ्गल्यैः कव्यं चापि विधीयते ॥

prasavyaṃ maṅgalairdravyairhavyakarma vidhīyate | apasavyamamaṅgalyaiḥ kavyaṃ cāpi vidhīyate

हव्य-कर्म प्रसव्य रीति से मंगलकारी द्रव्यों के साथ किया जाता है; और कव्य-कर्म अपसव्य रीति से अमंगल द्रव्यों के साथ किया जाता है।

श्लोक 49 (13.238.49)

सदेवासुरगन्धर्वाः पितॄनभ्यर्चयन्ति च । आप्यायन्ते च ते श्राद्धैः पुनराप्याययन्ति तान् ॥

sadevāsuragandharvāḥ pitṝnabhyarcayanti ca | āpyāyante ca te śrāddhaiḥ punarāpyāyayanti tān

देवता, असुर और गन्धर्व भी पितरों की पूजा करते हैं; और श्राद्धों से पुष्ट हुए पितर बदले में उन्हें पुष्ट करते हैं।

श्लोक 50 (13.238.50)

अनिष्टा च पितॄन्पूर्वं यः क्रियां प्रकरोति चेत् । रक्षांसि च पिशाचाश्च फलं भोक्ष्यन्ति तस्य तत् ॥

aniṣṭā ca pitṝnpūrvaṃ yaḥ kriyāṃ prakaroti cet | rakṣāṃsi ca piśācāśca phalaṃ bhokṣyanti tasya tat

यदि कोई पहले पितरों की पूजा किए बिना कर्म करता है, तो उसका फल राक्षस और पिशाच खाते हैं।

श्लोक 51 (13.238.51)

हव्यकव्यक्रियास्तस्मात्कर्तव्या भुवि मानुषैः । कर्मक्षेत्रं हि मानुष्यं तदन्यत्र न विद्यते ॥

havyakavyakriyāstasmātkartavyā bhuvi mānuṣaiḥ | karmakṣetraṃ hi mānuṣyaṃ tadanyatra na vidyate

इसलिए पृथ्वी पर मनुष्यों को हव्य और कव्य कर्म करने चाहिए; क्योंकि मनुष्य-जन्म ही कर्मक्षेत्र है, उसके अतिरिक्त कहीं और नहीं है।

श्लोक 52 (13.238.52)

कव्येन सन्ततिर्दृष्टा हव्ये भूतिः पृथग्विधाः । इति ते कथितं देवि देवगुह्यं सनातनम् ॥

kavyena santatirdṛṣṭā havye bhūtiḥ pṛthagvidhāḥ | iti te kathitaṃ devi devaguhyaṃ sanātanam

कव्य से सन्तति और हव्य से अनेक प्रकार का ऐश्वर्य प्राप्त होता देखा गया है। हे देवी, इस प्रकार मैंने तुम्हें देवताओं का यह सनातन रहस्य बता दिया।

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