अनुशासन पर्व · अध्याय 239
दान का प्रमाण और धर्म के भेद
उमा धर्म के फलों का प्रमाण पूछती हैं, और महेश्वर बताते हैं कि अपने सार-धन का दान सर्वोत्तम है, चाहे वह निर्धन का एक प्रस्थ हो या धनी के करोड़। वे दान के पाँच प्रकार के फल (अनन्त, महान्, सम, हीन, पातक), छह गुणों वाले उत्तम दान और सज्जनों द्वारा किए जाने वाले लोकहित के कार्य गिनाते हैं। धर्म के कितने भेद हैं, यह पूछे जाने पर वे श्रुति, स्मृति, देश, कुल, जाति, गण और आपत् के धर्म बताते हैं और कहते हैं कि फल तभी मिलता है जब कारण ठीक से पूरा हो।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.239.1)
एवं कृतस्य धर्मस्य श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो । प्रमाणं फलमानानां तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
evaṃ kṛtasya dharmasya śrotumicchāmyahaṃ prabho | pramāṇaṃ phalamānānāṃ tanme śaṃsitumarhasi
हे प्रभो, इस प्रकार किए गए धर्म के फलों का प्रमाण मैं सुनना चाहती हूँ। कृपा करके मुझे वह बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 2 (13.239.2)
प्रमाणकल्पनां देवि दानस्य शृणु भामिनि ॥
pramāṇakalpanāṃ devi dānasya śṛṇu bhāmini
हे भामिनि, दान के प्रमाण का निर्णय सुनो।
श्लोक 3 (13.239.3)
यत्सारस्तु नरो लोके तद्दानं चोत्तमं स्मृतम् । सर्वदानविधिं प्राहुस्तदेव भुवि शोभने ॥
yatsārastu naro loke taddānaṃ cottamaṃ smṛtam | sarvadānavidhiṃ prāhustadeva bhuvi śobhane
लोक में मनुष्य का जो सार (मुख्य धन) हो, उसका दान सर्वोत्तम कहा गया है; हे शोभने, यही पृथ्वी पर सब दानों की विधि कहते हैं।
श्लोक 4 (13.239.4)
प्रस्थं सारं दरिद्रस्य शतं कोटिधनस्य च । प्रस्थसारस्तु तत्प्रस्थं ददन्महदवाप्नुयात् ॥
prasthaṃ sāraṃ daridrasya śataṃ koṭidhanasya ca | prasthasārastu tatprasthaṃ dadanmahadavāpnuyāt
निर्धन का सार एक प्रस्थ है और करोड़ों के धनी का सौ; जिसका सार प्रस्थ है, वह वह प्रस्थ देकर महान् फल पाता है।
श्लोक 5 (13.239.5)
कोटिसारस्तु तां कोटिं ददन्महदवाप्नुयात् । उभयं तन्महत्तच्च फलेनैव समं स्मृतम् ॥
koṭisārastu tāṃ koṭiṃ dadanmahadavāpnuyāt | ubhayaṃ tanmahattacca phalenaiva samaṃ smṛtam
जिसका सार करोड़ है, वह उस करोड़ को देकर महान् फल पाता है। वे दोनों महान् हैं और फल में समान माने गए हैं।
श्लोक 6 (13.239.6)
धर्मार्थकामभोगेषु शक्त्यभावस्तु मध्यमम् । स्वद्रव्यादतिहीनं तु तद्दानमधमं स्मृतम् ॥
dharmārthakāmabhogeṣu śaktyabhāvastu madhyamam | svadravyādatihīnaṃ tu taddānamadhamaṃ smṛtam
जहाँ धर्म, अर्थ, काम और भोग की आवश्यकताओं के कारण सामर्थ्य की कमी हो, वहाँ दान मध्यम माना गया है; और जो अपने धन से बहुत कम हो, वह दान अधम माना गया है।
श्लोक 7 (13.239.7)
शृणु दत्तस्य वै देवि पञ्चधा फलकल्पनाम् । आनन्त्यं च महच्चैव समं हीनं हि पातकम् ॥
śṛṇu dattasya vai devi pañcadhā phalakalpanām | ānantyaṃ ca mahaccaiva samaṃ hīnaṃ hi pātakam
हे देवी, दिए हुए दान के फल का पाँच प्रकार का विभाजन सुनो: अनन्त, महान्, सम, हीन और पातक।
श्लोक 8 (13.239.8)
तेषां विशेषं वक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता । दुस्त्यजस्य च वै दानं पात्र आनन्त्यमुच्यते ॥
teṣāṃ viśeṣaṃ vakṣyāmi śṛṇu devi samāhitā | dustyajasya ca vai dānaṃ pātra ānantyamucyate
मैं उनकी विशेषताएँ बताऊँगा; हे देवी, ध्यान से सुनो। जिसे त्यागना कठिन हो, उसका सुपात्र को दिया दान अनन्त कहा जाता है।
श्लोक 9 (13.239.9)
दानं षङ्गुणयुक्तं तु महदित्यभिधीयते । यथाश्रद्धं तु वै दानं यथार्हं सममुच्यते ॥
dānaṃ ṣaṅguṇayuktaṃ tu mahadityabhidhīyate | yathāśraddhaṃ tu vai dānaṃ yathārhaṃ samamucyate
छह गुणों से युक्त दान महान् कहलाता है; श्रद्धा के अनुसार और उचित रीति से दिया हुआ दान सम कहा जाता है।
श्लोक 10 (13.239.10)
गुणतस्तु तथा हीनं दानं हीनमिति स्मृतम् । दानं पातकमित्याहुः षड्गुणानां विपर्यये ॥
guṇatastu tathā hīnaṃ dānaṃ hīnamiti smṛtam | dānaṃ pātakamityāhuḥ ṣaḍguṇānāṃ viparyaye
गुणों में हीन दान उसी प्रकार हीन माना गया है; और छह गुणों के विपरीत होने पर दान को पातक कहते हैं।
श्लोक 11 (13.239.11)
देवलोके महत्कालमानन्त्यस्य फलं विदुः । महतस्तु तथा कालं स्वर्गलोके तु पूज्यते ॥
devaloke mahatkālamānantyasya phalaṃ viduḥ | mahatastu tathā kālaṃ svargaloke tu pūjyate
वे अनन्त दान का फल देवलोक में दीर्घकाल तक रहना जानते हैं; और महान् दान का भी उतना ही समय स्वर्गलोक में सम्मान पाना बताया जाता है।
श्लोक 12 (13.239.12)
समस्य तु तदा दानं मानुष्यं भोगमावहेत् । दानं निष्फलमित्याहुर्विहीनं क्रियया शुभे ॥
samasya tu tadā dānaṃ mānuṣyaṃ bhogamāvahet | dānaṃ niṣphalamityāhurvihīnaṃ kriyayā śubhe
सम दान मनुष्य-लोक के भोग देता है; और हे शुभे, विधि से रहित दान को वे निष्फल कहते हैं।
श्लोक 13 (13.239.13)
अथवा म्लेच्छदेशेषु तत्र तत्फलतां व्रजेत् । नरकं प्रेत्य तिर्यक्षु गच्छेदशुभदानतः ॥
athavā mlecchadeśeṣu tatra tatphalatāṃ vrajet | narakaṃ pretya tiryakṣu gacchedaśubhadānataḥ
अथवा वह वहीं म्लेच्छ देशों में फल देता है; और अशुभ दान से मनुष्य मरकर नरक में या पशु-योनियों में जाता है।
उमोवाच
श्लोक 14 (13.239.14)
अशुभस्यापि दानस्य शुभं स्याच्च फलं कथम् ॥
aśubhasyāpi dānasya śubhaṃ syācca phalaṃ katham
अशुभ दान का भी शुभ फल कैसे हो सकता है?
महेश्वर उवाच
श्लोक 15 (13.239.15)
मनसा तत्वतः शुद्धमानृशंस्यपुरःसरम् । प्रीत्या तु सर्वदानानि दत्त्वा फलमवाप्नुयात् ॥
manasā tatvataḥ śuddhamānṛśaṃsyapuraḥsaram | prītyā tu sarvadānāni dattvā phalamavāpnuyāt
जो मन से सचमुच शुद्ध होकर, दयाभाव को आगे रखकर और प्रेम से सब दान देता है, वह फल पाता है।
श्लोक 16 (13.239.16)
रहस्यं सर्वदानानामेतद्विद्धि शुभेक्षणे । अन्यानि धर्मकार्याणि शृणु सद्भिः कृतानि च ॥
rahasyaṃ sarvadānānāmetadviddhi śubhekṣaṇe | anyāni dharmakāryāṇi śṛṇu sadbhiḥ kṛtāni ca
हे सुन्दर नेत्रों वाली, इसे सब दानों का रहस्य जानो। अब सज्जनों द्वारा किए जाने वाले अन्य धर्मकार्य सुनो।
श्लोक 17 (13.239.17)
आरामदेवगोष्ठानि संक्रमाः कूप एव च । गोवाटश्च तटाकश्च सभा शाला च सर्वशः ॥
ārāmadevagoṣṭhāni saṃkramāḥ kūpa eva ca | govāṭaśca taṭākaśca sabhā śālā ca sarvaśaḥ
उद्यान, देवालय और गोष्ठ, पुल और कुएँ, गोवाट और तालाब, सभाएँ और विश्रामशालाएँ सर्वत्र,
श्लोक 18 (13.239.18)
पाषण्डावसथश्चैव पानीयं गोतृणानि च । व्याधितानां च भैषज्यमनाथानां च पोषणम् ॥
pāṣaṇḍāvasathaścaiva pānīyaṃ gotṛṇāni ca | vyādhitānāṃ ca bhaiṣajyamanāthānāṃ ca poṣaṇam
पाषण्ड (पन्थ-विशेष के साधुओं) के लिए ठहरने के स्थान, पेयजल, गायों के लिए चारा, रोगियों के लिए औषध और अनाथों का पालन-पोषण,
श्लोक 19 (13.239.19)
अनाथशवसंस्कारस्तीर्थमार्गविशोधनम् । व्यसनाभ्यवपत्तिश्च सर्वेषां च स्वशक्तितः ॥
anāthaśavasaṃskārastīrthamārgaviśodhanam | vyasanābhyavapattiśca sarveṣāṃ ca svaśaktitaḥ
अनाथ मृतकों का अन्त्य-संस्कार, तीर्थमार्गों की सफाई, और अपनी शक्ति के अनुसार सबकी विपत्ति में सहायता।
श्लोक 20 (13.239.20)
एतत्सर्वं समासेन धर्मकार्यमिति स्मृतम् । तत्कर्तव्यं मनुष्येण स्वशक्त्या श्रद्धया शुभे ॥
etatsarvaṃ samāsena dharmakāryamiti smṛtam | tatkartavyaṃ manuṣyeṇa svaśaktyā śraddhayā śubhe
यह सब संक्षेप में धर्मकार्य माना गया है; हे शुभे, मनुष्य को यह अपनी शक्ति के अनुसार और श्रद्धा से करना चाहिए।
श्लोक 21 (13.239.21)
प्रेत्यभावे लभेत्पुण्यं नास्ति तत्र विचारणा । रूपं सौभाग्यमारोग्यं बलं सौख्यं लभेन्नरः । स्वर्गो वा मानुषे वाऽपि तैस्तैराप्यायते हि सः ॥
pretyabhāve labhetpuṇyaṃ nāsti tatra vicāraṇā | rūpaṃ saubhāgyamārogyaṃ balaṃ saukhyaṃ labhennaraḥ | svargo vā mānuṣe vā'pi taistairāpyāyate hi saḥ
परलोक में उसे पुण्य मिलता है, इसमें कोई सन्देह नहीं। मनुष्य रूप, सौभाग्य, आरोग्य, बल और सुख पाता है; स्वर्ग में हो या मनुष्यों में, वह इन्हीं सबसे आनन्दित होता है।
उमोवाच
श्लोक 22 (13.239.22)
भगवन्लोकपालेश धर्मस्तु कतिभेदकः । दृश्यते परितः सद्भिस्तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
bhagavanlokapāleśa dharmastu katibhedakaḥ | dṛśyate paritaḥ sadbhistanme śaṃsitumarhasi
हे भगवन्, लोकपालों के स्वामी, धर्म के कितने भेद हैं? सज्जनों में वह चारों ओर दिखाई देता है। कृपा करके मुझे बताइए।
महेश्वर उवाच
श्लोक 23 (13.239.23)
शृणु देवि समुद्देशान्नानात्वं धर्मसङ्कटे । धर्मा बहुविधा लोके श्रुतिभेदमुखोद्भवाः ॥
śṛṇu devi samuddeśānnānātvaṃ dharmasaṅkaṭe | dharmā bahuvidhā loke śrutibhedamukhodbhavāḥ
हे देवी, धर्म की उलझन में जो अनेकता है, उसका संक्षेप में वर्णन सुनो: संसार में धर्म अनेक प्रकार के हैं, जो श्रुति के भेदों से उत्पन्न हुए हैं।
श्लोक 24 (13.239.24)
स्मृतिधर्मश्च बहुधा सद्भिराचार इष्यते ॥
smṛtidharmaśca bahudhā sadbhirācāra iṣyate
स्मृतियों का धर्म भी अनेक प्रकार का है; और सज्जनों का आचार भी धर्म माना जाता है।
श्लोक 25 (13.239.25)
देशधर्माश्च दृश्यन्ते कुलधर्मास्तथैव च । जातिधर्माश्च वै धर्मा गणधर्माश्च शोभने ॥
deśadharmāśca dṛśyante kuladharmāstathaiva ca | jātidharmāśca vai dharmā gaṇadharmāśca śobhane
हे शोभने, देशों के धर्म दिखाई देते हैं, वैसे ही कुलों के धर्म, जातियों के धर्म और गणों (समूहों) के धर्म भी।
श्लोक 26 (13.239.26)
शरीरकालवैषम्यादापद्धर्मश्च दृश्यते । एतद्धर्मस्य नानात्वं क्रियते लोकवासिभिः ॥
śarīrakālavaiṣamyādāpaddharmaśca dṛśyate | etaddharmasya nānātvaṃ kriyate lokavāsibhiḥ
शरीर और समय की विषमता के कारण आपद्धर्म भी दिखाई देता है। धर्म की यह अनेकता लोक में रहने वाले लोगों द्वारा बरती जाती है।
श्लोक 27 (13.239.27)
कारणात्तत्रतत्रैव फलं धर्मस्य चेष्यते । तत्कारणसमायोगे लभेत्कुर्वन्फलं नरः ॥
kāraṇāttatratatraiva phalaṃ dharmasya ceṣyate | tatkāraṇasamāyoge labhetkurvanphalaṃ naraḥ
धर्म का फल अपने-अपने कारण से ही होता माना गया है; उस कारण के पूर्ण होने पर कर्म करने वाला मनुष्य फल पाता है।
श्लोक 28 (13.239.28)
अन्यथा न लभेत्पुण्यमतदर्हः समाविशेत् । एवं धर्मस्य नानात्वं फलं कुर्वँल्लभेन्नरः ॥
anyathā na labhetpuṇyamatadarhaḥ samāviśet | evaṃ dharmasya nānātvaṃ phalaṃ kurvam̐llabhennaraḥ
अन्यथा वह पुण्य नहीं पाता, यदि अयोग्य व्यक्ति उसे अपनाए। इस प्रकार धर्म की अनेकता को निभाने वाला मनुष्य उसका फल पाता है।
श्लोक 29 (13.239.29)
श्रौतस्मार्तस्तु धर्माणां प्राकृतो धर्म उच्यते । इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
śrautasmārtastu dharmāṇāṃ prākṛto dharma ucyate | iti te kathitaṃ devi bhūyaḥ śrotuṃ kimicchasi
धर्मों में श्रौत, स्मार्त और प्राकृत धर्म कहे जाते हैं। हे देवी, इस प्रकार मैंने तुम्हें बताया; अब और क्या सुनना चाहती हो?