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अनुशासन पर्व · अध्याय 242

देहत्याग के चार मार्ग और मृतकों के संस्कार

उमा पूछती हैं कि मृत्यु के समय को प्राप्त मनुष्य किस प्रकार देह छोड़ें कि परलोक में उनका कल्याण हो। महेश्वर स्वाभाविक मृत्यु और स्वयं की चेष्टा से होने वाली मृत्यु का भेद बताते हैं और वृद्ध अथवा रोगी के लिए चार विहित मार्ग कहते हैं: उत्तर की ओर महाप्रस्थान, आमरण उपवास, अग्नि-प्रवेश और पवित्र जल में प्रवेश, प्रत्येक के विधान सहित। वे कहते हैं कि युद्ध में मरने वाला योद्धा, स्वामी के लिए प्राण देने वाला सेवक, तथा गौओं, ब्राह्मणों या असहायों के लिए प्राण देने वाला पुण्य लोकों को पाता है, जबकि काम, क्रोध या भय से आत्महत्या करने वाला अनन्त नरक में जाता है। अन्त में वे स्वाभाविक मृत्यु के बाद शरीर के संस्कार बताते हैं।

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उमोवाच

श्लोक 1 (13.242.1)

भगवन्मानुषाः केचित्कालधर्ममुपस्थिताः । प्राणमोक्षं कथं कृत्वा परत्र हितमाप्नुयुः ॥

bhagavanmānuṣāḥ kecitkāladharmamupasthitāḥ | prāṇamokṣaṃ kathaṃ kṛtvā paratra hitamāpnuyuḥ

हे भगवन्, कुछ मनुष्य मृत्यु के समय को प्राप्त हो गए हैं। वे प्राण का त्याग किस प्रकार करें कि परलोक में उनका कल्याण हो?

महेश्वर उवाच

श्लोक 2 (13.242.2)

हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता । द्विविधं मरणं लोके स्वभावाद्यत्नतस्तथा ॥

hanta te kathayiṣyāmi śṛṇu devi samāhitā | dvividhaṃ maraṇaṃ loke svabhāvādyatnatastathā

अच्छा, मैं तुम्हें बताता हूँ; हे देवी, एकाग्र मन से सुनो। लोक में मृत्यु दो प्रकार की है: एक स्वभाव से होने वाली और दूसरी प्रयत्न से होने वाली।

श्लोक 3 (13.242.3)

तयोः स्वभावं नापायं यत्नतः करणोद्भवम् । एतयोरुभयोर्देवि विधानं शृणु शोभने ॥

tayoḥ svabhāvaṃ nāpāyaṃ yatnataḥ karaṇodbhavam | etayorubhayordevi vidhānaṃ śṛṇu śobhane

इन दोनों में स्वाभाविक मृत्यु बिना किसी उपाय के आप ही आती है; दूसरी प्रयत्न से, किसी कारण को लेकर उत्पन्न होती है। हे शोभने, इन दोनों का विधान सुनो।

श्लोक 4 (13.242.4)

कल्याकल्यशरीरस्य यत्नजं द्विविधं स्मृतम् । यत्नजं नाम मरणमात्मत्यागो मुमूर्षया ॥

kalyākalyaśarīrasya yatnajaṃ dvividhaṃ smṛtam | yatnajaṃ nāma maraṇamātmatyāgo mumūrṣayā

प्रयत्न से होने वाली मृत्यु शरीर के स्वस्थ या अस्वस्थ होने के भेद से दो प्रकार की मानी गई है। प्रयत्नजन्य मरण का अर्थ है मरने की इच्छा से स्वयं को त्याग देना।

श्लोक 5 (13.242.5)

तत्राकल्यशरीरस्य जरा व्याधिश्च कारणम् । महाप्रस्थानगमनं तथा प्रायोपवेशनम् । जलावगाहनं चैव अग्निचित्यां प्रवेशनम् ॥

tatrākalyaśarīrasya jarā vyādhiśca kāraṇam | mahāprasthānagamanaṃ tathā prāyopaveśanam | jalāvagāhanaṃ caiva agnicityāṃ praveśanam

इनमें जिसका शरीर अस्वस्थ है, उसके लिए कारण वृद्धावस्था और रोग हैं। उसके मार्ग हैं: महाप्रस्थान के लिए प्रस्थान, आमरण उपवास, जल में प्रवेश और अग्नि की चिता में प्रवेश।

श्लोक 6 (13.242.6)

एवं चतुर्विधः प्रोक्त आत्मत्यागो मुमूर्षताम् । एतेषां क्रमयोगेन विधानं शृणु शोभने ॥

evaṃ caturvidhaḥ prokta ātmatyāgo mumūrṣatām | eteṣāṃ kramayogena vidhānaṃ śṛṇu śobhane

इस प्रकार मरने की इच्छा रखने वालों का आत्मत्याग चार प्रकार का कहा गया है। हे शोभने, इनका विधान क्रम से सुनो।

श्लोक 7 (13.242.7)

स्वधर्मयुक्तं गार्हस्थ्यं चिरमूढ्वा विधानतः । तत्रानृण्यं च सम्प्राप्य वृद्धो वा व्याधितोऽपि वा ॥

svadharmayuktaṃ gārhasthyaṃ ciramūḍhvā vidhānataḥ | tatrānṛṇyaṃ ca samprāpya vṛddho vā vyādhito'pi vā

जो विधिपूर्वक अपने धर्म से युक्त गृहस्थ-जीवन को दीर्घकाल तक जीकर वहाँ ऋण से मुक्त हो चुका हो, चाहे वह वृद्ध हो या रोगी,

श्लोक 8 (13.242.8)

दर्शयित्वा स्वदौर्बल्यं सर्वानेवानुमान्य च । सर्वं विहाय बन्धूंश्च कर्मणां भरणं तथा ॥

darśayitvā svadaurbalyaṃ sarvānevānumānya ca | sarvaṃ vihāya bandhūṃśca karmaṇāṃ bharaṇaṃ tathā

अपनी दुर्बलता दिखाकर, सबसे अनुमति लेकर, सब कुछ छोड़कर, बन्धुओं को और अपने कार्यों के भरण-पोषण को भी त्यागकर,

श्लोक 9 (13.242.9)

दानानि विधिवत्कृत्वा धर्मकार्यार्थमात्मनः । अनुज्ञाप्य जनं सर्वं वाचा मधुरया ब्रुवन् ॥

dānāni vidhivatkṛtvā dharmakāryārthamātmanaḥ | anujñāpya janaṃ sarvaṃ vācā madhurayā bruvan

अपने धर्मकार्य के लिए विधिपूर्वक दान करके और मधुर वाणी में बोलते हुए सब लोगों से अनुमति लेकर,

श्लोक 10 (13.242.10)

अहतं वस्त्रमाच्छाद्य बद्ध्वा तत्कुशरज्जुना । उपस्पृश्य प्रतिज्ञाय व्यवसायपुरसरम् ॥

ahataṃ vastramācchādya baddhvā tatkuśarajjunā | upaspṛśya pratijñāya vyavasāyapurasaram

न पहना हुआ नया वस्त्र ओढ़कर और उसे कुश की रस्सी से बाँधकर, आचमन करके और संकल्प लेकर, दृढ़ निश्चय को आगे रखते हुए,

श्लोक 11 (13.242.11)

परित्यज्य ततो ग्राम्यं धर्मं कुर्याद्यथेप्सितम् । महाप्रस्थानमिच्छेच्चेत्प्रतिष्ठेतोत्तरां दिशम् ॥

parityajya tato grāmyaṃ dharmaṃ kuryādyathepsitam | mahāprasthānamiccheccetpratiṣṭhetottarāṃ diśam

तब ग्राम्य जीवन के धर्म को त्यागकर वह जैसा चाहे वैसा आचरण करे। यदि वह महाप्रस्थान की इच्छा करे तो उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करे,

श्लोक 12 (13.242.12)

भूत्वा तावन्निराहारो यावत्प्राणविमोक्षणम् । चेष्टाहानौ शयित्वाऽपि तन्मनाः प्राणमुत्सृजेत् । एवं पुण्यकृतां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥

bhūtvā tāvannirāhāro yāvatprāṇavimokṣaṇam | ceṣṭāhānau śayitvā'pi tanmanāḥ prāṇamutsṛjet | evaṃ puṇyakṛtāṃ lokānamalānpratipadyate

जब तक प्राण न छूट जाएँ तब तक निराहार रहकर, और चेष्टा के बन्द हो जाने पर लेटकर भी, उसी में मन लगाए हुए प्राण त्याग दे। इस प्रकार वह पुण्यात्माओं के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (13.242.13)

प्रायोपवेशनं चेच्छेत्तेनैव विधिना नरः । देशे पुण्यतमे श्रेष्ठे निराहारस्तु संविशेत् ॥

prāyopaveśanaṃ cecchettenaiva vidhinā naraḥ | deśe puṇyatame śreṣṭhe nirāhārastu saṃviśet

यदि मनुष्य आमरण उपवास करना चाहे तो उसी विधि से करे: अत्यन्त पवित्र और श्रेष्ठ स्थान में निराहार होकर बैठ या लेट जाए।

श्लोक 14 (13.242.14)

अप्राणं तु शुचिर्भूत्वा कुर्वन्दानं स्वशक्तितः । पुण्यं परित्यजेत्प्राणानेष धर्मः सनातनः । एवं कलेवरं त्यक्त्वा स्वर्गलोके महीयते ॥

aprāṇaṃ tu śucirbhūtvā kurvandānaṃ svaśaktitaḥ | puṇyaṃ parityajetprāṇāneṣa dharmaḥ sanātanaḥ | evaṃ kalevaraṃ tyaktvā svargaloke mahīyate

पवित्र होकर, अपनी शक्ति के अनुसार दान करते हुए, प्राणरहित होने तक पुण्यभाव से प्राण त्याग दे; यही सनातन धर्म है। इस प्रकार शरीर छोड़कर वह स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 15 (13.242.15)

अग्निप्रवेशनं चेच्छेत्तेनैव विधिना शुभे । कृत्वा काष्ठमयं चित्यं पुण्यक्षेत्रे नदीषु वा ॥

agnipraveśanaṃ cecchettenaiva vidhinā śubhe | kṛtvā kāṣṭhamayaṃ cityaṃ puṇyakṣetre nadīṣu vā

हे शुभे, यदि वह अग्नि में प्रवेश करना चाहे तो उसी विधि से करे: किसी पुण्यक्षेत्र में अथवा नदियों के तट पर काठ की चिता बनाकर,

श्लोक 16 (13.242.16)

दैवतेभ्यो नमस्कृत्वा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । भूत्वा शुचिर्व्यवसितः प्रविशेदग्निसंस्तरम् । सोपि लोकान्यथान्यायं प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥

daivatebhyo namaskṛtvā kṛtvā cāpi pradakṣiṇam | bhūtvā śucirvyavasitaḥ praviśedagnisaṃstaram | sopi lokānyathānyāyaṃ prāpnuyātpuṇyakarmaṇām

देवताओं को नमस्कार करके और अग्नि की प्रदक्षिणा करके, शुद्ध और दृढ़ निश्चय वाला होकर वह अग्निशय्या में प्रवेश करे। वह भी यथोचित रूप से पुण्यकर्म करने वालों के लोकों को प्राप्त करता है।

श्लोक 17 (13.242.17)

जलावगाहनं चेच्छेत्तेनैव विधिना शुभे । ख्याते पुण्यतमे तीर्थे निमज्जेत्सुकृतं स्मरन् ॥

jalāvagāhanaṃ cecchettenaiva vidhinā śubhe | khyāte puṇyatame tīrthe nimajjetsukṛtaṃ smaran

हे शुभे, यदि वह जल में प्रवेश करना चाहे तो उसी विधि से करे: किसी प्रसिद्ध परम पवित्र तीर्थ में अपने पुण्यकर्मों का स्मरण करते हुए डुबकी लगाए।

श्लोक 18 (13.242.18)

सोपि पुण्यतमाँल्लोकान्निःसङ्गात्प्रतिपद्यते । ततः कल्यशरीरस्य संत्यागं शृणु तत्वतः ॥

sopi puṇyatamām̐llokānniḥsaṅgātpratipadyate | tataḥ kalyaśarīrasya saṃtyāgaṃ śṛṇu tatvataḥ

वह भी आसक्ति से रहित होकर परम पवित्र लोकों को पहुँचता है। अब स्वस्थ शरीर वाले के देहत्याग के विषय में यथार्थ रूप से सुनो।

श्लोक 19 (13.242.19)

रक्षार्थं क्षत्रियः श्रेष्ठः प्रजापालनकारणात् । योधानां भर्तृपिण्डार्थं गुर्वर्थं ब्रह्मचारिणाम् ॥

rakṣārthaṃ kṣatriyaḥ śreṣṭhaḥ prajāpālanakāraṇāt | yodhānāṃ bhartṛpiṇḍārthaṃ gurvarthaṃ brahmacāriṇām

श्रेष्ठ क्षत्रिय रक्षा के लिए, प्रजा के पालन के कारण; योद्धा अपने स्वामी के अन्न के लिए; और ब्रह्मचारी अपने गुरु के लिए,

श्लोक 20 (13.242.20)

गोब्राह्मणार्थं सर्वेषां प्राणत्यागो विधीयते । स्वराज्यरक्षणार्थं वा कुजनैः पीडिताः प्रजाः ॥

gobrāhmaṇārthaṃ sarveṣāṃ prāṇatyāgo vidhīyate | svarājyarakṣaṇārthaṃ vā kujanaiḥ pīḍitāḥ prajāḥ

गौओं और ब्राह्मणों के लिए तथा सबके लिए प्राण का त्याग विहित है; अथवा अपने राज्य की रक्षा के लिए, जब दुष्ट जनों से प्रजा पीड़ित हो।

श्लोक 21 (13.242.21)

मोक्तुकामस्त्यजेत्प्राणान्युद्धमार्गे यथाविधि । सुसन्नद्धो व्यवसितः सम्प्रविश्यापराङ्मुखः । एवं राजा मृतः सद्यः स्वर्गलोके महीयते ॥

moktukāmastyajetprāṇānyuddhamārge yathāvidhi | susannaddho vyavasitaḥ sampraviśyāparāṅmukhaḥ | evaṃ rājā mṛtaḥ sadyaḥ svargaloke mahīyate

प्राण छोड़ने की इच्छा रखने वाला विधि के अनुसार युद्ध के मार्ग में प्राण त्यागे: भली-भाँति कवच आदि से सज्जित, दृढ़ निश्चयी, पीठ न दिखाते हुए शत्रु-सेना में घुसकर। इस प्रकार मरा हुआ राजा तत्काल स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 22 (13.242.22)

तादृशी सुगतिर्नास्ति क्षत्रियस्य विशेषतः । भृत्यो वा भर्तृपिण्डार्थं भर्तृकर्मण्युपस्थिते ॥

tādṛśī sugatirnāsti kṣatriyasya viśeṣataḥ | bhṛtyo vā bhartṛpiṇḍārthaṃ bhartṛkarmaṇyupasthite

क्षत्रिय के लिए तो इसके समान उत्तम गति विशेष रूप से नहीं है। अथवा सेवक, अपने स्वामी के अन्न के लिए, स्वामी का कार्य उपस्थित होने पर,

श्लोक 23 (13.242.23)

कुर्वंस्तत्र तु साहाय्यमात्मप्राणानपेक्षया । स्वाम्यर्थं संत्यजेत्प्राणान्पुण्याँल्लोकान्स गच्छति ॥

kurvaṃstatra tu sāhāyyamātmaprāṇānapekṣayā | svāmyarthaṃ saṃtyajetprāṇānpuṇyām̐llokānsa gacchati

अपने प्राणों की परवाह किए बिना वहाँ सहायता करता हुआ स्वामी के लिए प्राण त्याग दे, तो वह पुण्य लोकों में जाता है।

श्लोक 24 (13.242.24)

स्पृहणीयः सुरगणैस्तत्र नास्ति विचारणा । एवं गोब्राह्मणार्थं वा दीनार्थं वा त्यजेत्तनुम् ॥

spṛhaṇīyaḥ suragaṇaistatra nāsti vicāraṇā | evaṃ gobrāhmaṇārthaṃ vā dīnārthaṃ vā tyajettanum

वह देवगणों के लिए भी वांछनीय होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं। इसी प्रकार गौओं और ब्राह्मणों के लिए अथवा दीन-दुखियों के लिए भी कोई शरीर त्याग सकता है;

श्लोक 25 (13.242.25)

सोपि पुण्यमवाप्नोति आनृशंस्यव्यपेक्षया । इत्येते जीवितत्यागे मार्गास्ते समुदाहृताः ॥

sopi puṇyamavāpnoti ānṛśaṃsyavyapekṣayā | ityete jīvitatyāge mārgāste samudāhṛtāḥ

वह भी करुणा की भावना के कारण पुण्य पाता है। इस प्रकार प्राण-त्याग के ये मार्ग तुम्हें बताए गए।

श्लोक 26 (13.242.26)

कामक्रोधाद्भयाद्वाऽपि यदि चेत्संत्यजेत्तनुम् । सोऽनन्तं नरकं याति आत्महन्तृत्वकारणात् ॥

kāmakrodhādbhayādvā'pi yadi cetsaṃtyajettanum | so'nantaṃ narakaṃ yāti ātmahantṛtvakāraṇāt

किन्तु यदि कोई काम, क्रोध अथवा भय से शरीर त्याग दे तो आत्महत्या के कारण वह अनन्त नरक में जाता है।

श्लोक 27 (13.242.27)

स्वभावं मरणं नाम न तु चात्मेच्छया भवेत् । यथा मृतानां यत्कार्यं तन्मे शृणु यथाविधि ॥

svabhāvaṃ maraṇaṃ nāma na tu cātmecchayā bhavet | yathā mṛtānāṃ yatkāryaṃ tanme śṛṇu yathāvidhi

स्वाभाविक मृत्यु वही है जो अपनी इच्छा से न हो। अब मृतकों के लिए जो कुछ करना चाहिए, वह विधिपूर्वक मुझसे सुनो।

श्लोक 28 (13.242.28)

तत्रापि मरणं त्यागो मूढत्यागाद्विशिष्यते । भूमौ संवेशयेद्देहं नरस्य विनशिष्यतः ॥

tatrāpi maraṇaṃ tyāgo mūḍhatyāgādviśiṣyate | bhūmau saṃveśayeddehaṃ narasya vinaśiṣyataḥ

वहाँ भी मरण, अर्थात् देह का त्याग, मूढ़तावश किए गए त्याग से श्रेष्ठ है। जो मनुष्य नष्ट होने वाला हो, उसके शरीर को भूमि पर लिटाए,

श्लोक 29 (13.242.29)

निर्जीवं वृणुयात्सद्यो वाससा तु कलेवरम् । माल्यगन्धैरलङ्कृत्य सुवर्णेन च भामिनि ॥

nirjīvaṃ vṛṇuyātsadyo vāsasā tu kalevaram | mālyagandhairalaṅkṛtya suvarṇena ca bhāmini

और निर्जीव हो जाने पर तुरन्त शरीर को वस्त्र से ढक दे, तथा हे भामिनी, माला, गन्ध और सोने से उसे अलंकृत करके,

श्लोक 30 (13.242.30)

श्मशाने दक्षिणे देशे चिताग्नौ प्रदहेन्मृतम् । अथवा निक्षिपेद्भूमौ शरीरं जीववर्जितम् ॥

śmaśāne dakṣiṇe deśe citāgnau pradahenmṛtam | athavā nikṣipedbhūmau śarīraṃ jīvavarjitam

श्मशान में दक्षिण दिशा के स्थान पर चिता की अग्नि में मृतक को जला दे; अथवा प्राणरहित शरीर को भूमि में गाड़ दे।

श्लोक 31 (13.242.31)

दिवा च शुक्लपक्षश्च उत्तरायणमेव च । मुमूर्षूणां प्रशस्तानि विपरीतं तु गर्हितम् ॥

divā ca śuklapakṣaśca uttarāyaṇameva ca | mumūrṣūṇāṃ praśastāni viparītaṃ tu garhitam

दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण मरने वालों के लिए प्रशस्त हैं; इनके विपरीत समय निन्दित है।

श्लोक 32 (13.242.32)

औदकं चाष्टकाश्राद्धं बहुभिर्बहुभिः कृतम् । आप्यायनं मृतानां तत्परलोके भवेच्छुभम् । एतत्सर्वं मया प्रोक्तं मानुषाणां हितं वचः ॥

audakaṃ cāṣṭakāśrāddhaṃ bahubhirbahubhiḥ kṛtam | āpyāyanaṃ mṛtānāṃ tatparaloke bhavecchubham | etatsarvaṃ mayā proktaṃ mānuṣāṇāṃ hitaṃ vacaḥ

जलदान और अष्टका श्राद्ध, जो बहुत-से लोग बार-बार करते हैं, मृतकों को तृप्ति देते हैं और परलोक में उनके लिए शुभ फल वाले होते हैं। यह सब मैंने मनुष्यों के हित के लिए तुम्हें बता दिया।

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