अनुशासन पर्व · अध्याय 243
मोक्ष परम धर्म और साधक का आचार
संसार में प्रशंसित धर्म के अनेक मार्गों से भ्रमित उमा महेश्वर से संशय मिटाने वाला ज्ञान पूछती हैं। महेश्वर कहते हैं कि प्रत्येक धर्म फल देता है, किन्तु संसार-चक्र से मोक्ष ही परम लक्ष्य है, जो आत्मज्ञान से मिलता है। वे बताते हैं कि ऋणमुक्त ब्राह्मण या क्षत्रिय घर छोड़कर वन जाता है, गुरु बनाता है और साङ्ख्य या योग सीखता है, और साधक के नियम कहते हैं: अल्प संग्रह, गुरु की सेवा, एक बार भोजन, भिक्षा, शुचिता, दया तथा द्वेष, अहंकार, शोक और भय से मुक्ति, जो निर्वाण की ओर ले जाते हैं।
उमोवाच
श्लोक 1 (13.243.1)
देवदेव नमस्तेऽस्तु कालसूदन शङ्कर । लोकेषु विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादान्मया श्रुताः ॥
devadeva namaste'stu kālasūdana śaṅkara | lokeṣu vividhā dharmāstvatprasādānmayā śrutāḥ
हे देवों के देव, काल का नाश करने वाले शंकर, आपको नमस्कार है! आपकी कृपा से मैंने लोकों में प्रचलित अनेक प्रकार के धर्म सुने हैं।
श्लोक 2 (13.243.2)
विशिष्टं सर्वधर्मेभ्यः शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् । श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वमत्र मुह्यति मे मनः ॥
viśiṣṭaṃ sarvadharmebhyaḥ śāśvataṃ dhruvamavyayam | śrotumicchāmyahaṃ sarvamatra muhyati me manaḥ
जो सब धर्मों में श्रेष्ठ, शाश्वत, अटल और अविनाशी है, उसके विषय में मैं सब कुछ सुनना चाहती हूँ; इस विषय में मेरा मन भ्रमित हो रहा है।
श्लोक 3 (13.243.3)
केचिन्मोक्षं प्रशंसन्ति केचिद्यज्ञफलं द्विजाः । वानप्रस्थं पुनः केचिद्गार्हस्थ्यं केचिदाश्रमम् ॥
kecinmokṣaṃ praśaṃsanti kecidyajñaphalaṃ dvijāḥ | vānaprasthaṃ punaḥ kecidgārhasthyaṃ kecidāśramam
कुछ द्विज मोक्ष की प्रशंसा करते हैं, कुछ यज्ञ के फल की; कुछ वानप्रस्थ की, और कुछ गृहस्थाश्रम की;
श्लोक 4 (13.243.4)
राजधर्माश्रयं केचित्केचित्स्वाध्यायमेव च । ब्रह्मचर्याश्रमं केचित्केचिद्वाक्संयमाश्रयम् ॥
rājadharmāśrayaṃ kecitkecitsvādhyāyameva ca | brahmacaryāśramaṃ kecitkecidvāksaṃyamāśrayam
कुछ राजधर्म का आश्रय लेते हैं, कुछ केवल वेदाध्ययन का; कुछ ब्रह्मचर्याश्रम का, और कुछ वाणी के संयम का।
श्लोक 5 (13.243.5)
मातरं पितरं केचित्सेवमाना दिवं गताः । अहिंसया परः स्वर्गे सत्येन च महीयते ॥
mātaraṃ pitaraṃ kecitsevamānā divaṃ gatāḥ | ahiṃsayā paraḥ svarge satyena ca mahīyate
कुछ लोग माता और पिता की सेवा करके स्वर्ग को गए हैं। जो अहिंसा में श्रेष्ठ है और सत्य से युक्त है, वह स्वर्ग में सम्मानित होता है।
श्लोक 6 (13.243.6)
आहवेऽभिमुखाः केचिन्निहतास्त्रिदिवं गताः । केचिदुञ्छवृत्ते सिद्धाः स्वर्गमार्गं समाश्रिताः ॥
āhave'bhimukhāḥ kecinnihatāstridivaṃ gatāḥ | keciduñchavṛtte siddhāḥ svargamārgaṃ samāśritāḥ
कुछ युद्ध में शत्रु के सम्मुख डटे रहकर मारे जाने पर स्वर्ग को गए हैं; कुछ उञ्छवृत्ति से सिद्ध होकर स्वर्ग के मार्ग पर आरूढ़ हुए हैं।
श्लोक 7 (13.243.7)
आर्जवेनापरे युक्ता महतां पूजने रताः । ऋजवो नाकपृष्ठे तु शुद्धात्मानः प्रतिष्ठिताः ॥
ārjavenāpare yuktā mahatāṃ pūjane ratāḥ | ṛjavo nākapṛṣṭhe tu śuddhātmānaḥ pratiṣṭhitāḥ
दूसरे लोग सरलता से युक्त और महापुरुषों के पूजन में लगे रहकर, सरल और शुद्ध अन्तःकरण वाले होकर स्वर्ग के शिखर पर प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 8 (13.243.8)
एवं बहुविधैर्लोके धर्मद्वारैः सुसंवृतैः । ममापि मतिराविद्धा मेघलेखेव वायुना ॥
evaṃ bahuvidhairloke dharmadvāraiḥ susaṃvṛtaiḥ | mamāpi matirāviddhā meghalekheva vāyunā
इस प्रकार संसार में धर्म के अनेक द्वार हैं, जो भली-भाँति ढके हुए हैं; मेरा मन भी हवा से उड़ती मेघ-रेखा के समान डगमगा रहा है।
श्लोक 9 (13.243.9)
एतस्मिन्संशयस्थाने संशयच्छेदकारि यत् । वचनं ब्रूहि देवेश निश्चयज्ञानसंज्ञितम् ॥
etasminsaṃśayasthāne saṃśayacchedakāri yat | vacanaṃ brūhi deveśa niścayajñānasaṃjñitam
हे देवेश, संशय के इस स्थान पर ऐसा वचन कहिए जो संशय को काट दे, जिसे निश्चयात्मक ज्ञान कहा जाता है।
नारद उवाच
श्लोक 10 (13.243.10)
एवं पृष्टः स्वया देव्या महादेवः पिनाकधृक् । प्रोवाच मधुरं वाक्यं सूक्ष्ममध्यात्मसंश्रितम् ॥
evaṃ pṛṣṭaḥ svayā devyā mahādevaḥ pinākadhṛk | provāca madhuraṃ vākyaṃ sūkṣmamadhyātmasaṃśritam
अपनी देवी के इस प्रकार पूछने पर पिनाकधारी महादेव ने मधुर, सूक्ष्म और अध्यात्म से युक्त वचन कहा।
महेश्वर उवाच
श्लोक 11 (13.243.11)
न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामाऽसि निश्चयम् । एतदेव विशिष्टं ते यत्त्वं पृच्छसि मां प्रिये ॥
nyāyatastvaṃ mahābhāge śrotukāmā'si niścayam | etadeva viśiṣṭaṃ te yattvaṃ pṛcchasi māṃ priye
हे महाभागे, तुम उचित ही निश्चित तत्त्व को सुनना चाहती हो। हे प्रिये, तुम जो मुझसे यह पूछ रही हो, यही तुम्हारी विशेषता है।
श्लोक 12 (13.243.12)
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्गलोकफलाश्रितः । बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफलाः क्रियाः ॥
sarvatra vihito dharmaḥ svargalokaphalāśritaḥ | bahudvārasya dharmasya nehāsti viphalāḥ kriyāḥ
सर्वत्र धर्म स्वर्गलोक रूपी फल पर आश्रित बताया गया है। अनेक द्वारों वाले धर्म में यहाँ कोई कर्म निष्फल नहीं है।
श्लोक 13 (13.243.13)
यस्मिन्यस्मिंश्च विषये योयो याति विनिश्चयम् । तं तमेवाभिजानाति नान्यं धर्मं शुचिस्मिते ॥
yasminyasmiṃśca viṣaye yoyo yāti viniścayam | taṃ tamevābhijānāti nānyaṃ dharmaṃ śucismite
हे शुचिस्मिते, जिस-जिस विषय में जो-जो मनुष्य निश्चय पर पहुँच जाता है, वह उसी को जानता है, किसी अन्य धर्म को नहीं।
श्लोक 14 (13.243.14)
शृणु देवि समासेन मोक्षद्वारमनुत्तमम् । एतद्धि सर्वधर्माणां विशिष्टं शुभमव्ययम् ॥
śṛṇu devi samāsena mokṣadvāramanuttamam | etaddhi sarvadharmāṇāṃ viśiṣṭaṃ śubhamavyayam
हे देवी, संक्षेप में मोक्ष के सर्वोत्तम द्वार को सुनो। यह सब धर्मों में श्रेष्ठ, शुभ और अविनाशी है।
श्लोक 15 (13.243.15)
नास्ति मोक्षात्परं देवि मोक्ष एव परा गतिः । सुखमात्यन्तिकं श्रेष्ठमनिवृत्तं च तद्विदुः ॥
nāsti mokṣātparaṃ devi mokṣa eva parā gatiḥ | sukhamātyantikaṃ śreṣṭhamanivṛttaṃ ca tadviduḥ
हे देवी, मोक्ष से बढ़कर कुछ नहीं है; मोक्ष ही परम गति है। उसे अन्तिम सुख, श्रेष्ठ और कभी समाप्त न होने वाला जानते हैं।
श्लोक 16 (13.243.16)
नात्र देवि जरा मृत्युः शोको वा दुःखमेव वा । अनुत्तममचिन्त्यं च तद्देवि परमं सुखम् ॥
nātra devi jarā mṛtyuḥ śoko vā duḥkhameva vā | anuttamamacintyaṃ ca taddevi paramaṃ sukham
हे देवी, वहाँ न बुढ़ापा है, न मृत्यु, न शोक और न दुःख। हे देवी, वही अनुपम, अचिन्त्य परम सुख है।
श्लोक 17 (13.243.17)
ज्ञानानामुत्तमं ज्ञानं मोक्षज्ञानं विदुर्बुधाः । ऋषिभिर्देवसङ्घैश्च प्रोच्यते परमं पदम् ॥
jñānānāmuttamaṃ jñānaṃ mokṣajñānaṃ vidurbudhāḥ | ṛṣibhirdevasaṅghaiśca procyate paramaṃ padam
ज्ञानों में विद्वान् मोक्ष-ज्ञान को सर्वोत्तम मानते हैं। ऋषियों और देवसमूहों द्वारा उसे परम पद कहा जाता है।
श्लोक 18 (13.243.18)
नित्यमक्षरमक्षोभ्यमजेयं शाश्वतं शिवम् । विशन्ति तत्पदं प्राज्ञाः स्पृहणीयं सुरोत्तमैः ॥
nityamakṣaramakṣobhyamajeyaṃ śāśvataṃ śivam | viśanti tatpadaṃ prājñāḥ spṛhaṇīyaṃ surottamaiḥ
नित्य, अक्षर, अक्षोभ्य, अजेय, शाश्वत और शिव उस पद में ज्ञानीजन प्रवेश करते हैं, जिसकी श्रेष्ठ देवता भी इच्छा करते हैं।
श्लोक 19 (13.243.19)
दुःखादिश्च दुरन्तश्च संसारोयं प्रकीर्तितः । शोकव्याधिजरादोषैर्मरणेन च संयुतः ॥
duḥkhādiśca durantaśca saṃsāroyaṃ prakīrtitaḥ | śokavyādhijarādoṣairmaraṇena ca saṃyutaḥ
यह संसार दुःख से आरम्भ होने वाला और बुरे अन्त वाला कहा गया है; वह शोक, रोग, जरा के दोषों और मृत्यु से युक्त है।
श्लोक 20 (13.243.20)
यथा ज्योतिर्गणा व्योम्नि विवर्तन्ते पुनःपुनः । तस्य मोक्षस्य मार्गोऽयं श्रूयतां शुभलक्षणे ॥
yathā jyotirgaṇā vyomni vivartante punaḥpunaḥ | tasya mokṣasya mārgo'yaṃ śrūyatāṃ śubhalakṣaṇe
जैसे आकाश में ज्योतियों के समूह बार-बार घूमते रहते हैं, वैसे ही यह संसार-चक्र भी। हे शुभलक्षणे, उसके मोक्ष का यह मार्ग सुनो।
श्लोक 21 (13.243.21)
ब्रह्मादिस्थावरान्तश्च संसारो यः प्रकीर्तितः । संसारे प्राणिनः सर्वे निवर्तन्ते यथा पुनः ॥
brahmādisthāvarāntaśca saṃsāro yaḥ prakīrtitaḥ | saṃsāre prāṇinaḥ sarve nivartante yathā punaḥ
जो संसार ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक बताया गया है, उस संसार में सभी प्राणी बार-बार लौटते रहते हैं।
श्लोक 22 (13.243.22)
तत्र संसारचक्रस्य मोक्षो ज्ञानेन दृश्यते । अध्यात्मतत्वविज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते ॥
tatra saṃsāracakrasya mokṣo jñānena dṛśyate | adhyātmatatvavijñānaṃ jñānamityabhidhīyate
उस संसार-चक्र से मोक्ष ज्ञान द्वारा दिखाई देता है। अध्यात्म-तत्त्व का विशेष ज्ञान ही ज्ञान कहलाता है।
श्लोक 23 (13.243.23)
ज्ञानस्य ग्रहणोपायमाचारं ज्ञानिनस्तथा । यथावत्सम्प्रवक्ष्यामि तत्त्वमेकमनाः शृणु ॥
jñānasya grahaṇopāyamācāraṃ jñāninastathā | yathāvatsampravakṣyāmi tattvamekamanāḥ śṛṇu
ज्ञान को ग्रहण करने का उपाय और ज्ञानी का आचार मैं तुम्हें यथार्थ रूप से बताऊँगा; एकाग्र मन से सुनो।
श्लोक 24 (13.243.24)
ब्राह्मणः क्षत्रियो वाऽपि भूत्वा पूर्वं गृहे स्थितः । आनृण्यं सर्वतः प्राप्य ततस्तान्संत्यजेद्गृहान् ॥
brāhmaṇaḥ kṣatriyo vā'pi bhūtvā pūrvaṃ gṛhe sthitaḥ | ānṛṇyaṃ sarvataḥ prāpya tatastānsaṃtyajedgṛhān
ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय, पहले घर में रहकर और सब ओर से ऋणमुक्त होकर, फिर उन घरों को त्याग दे।
श्लोक 25 (13.243.25)
ततः संत्यज्य गार्हस्थ्यं निश्चितो वनमाश्रयेत् ॥
tataḥ saṃtyajya gārhasthyaṃ niścito vanamāśrayet
फिर गृहस्थ-जीवन छोड़कर, दृढ़ निश्चयी होकर, वन का आश्रय ले।
श्लोक 26 (13.243.26)
वने गुरुं समाज्ञाय दीक्षितो विधिपूर्वकम् । दीक्षां प्राप्य यथान्यायं स्ववृत्तं परिपालयेत् ॥
vane guruṃ samājñāya dīkṣito vidhipūrvakam | dīkṣāṃ prāpya yathānyāyaṃ svavṛttaṃ paripālayet
वन में गुरु को पहचानकर विधिपूर्वक दीक्षित होकर, और यथाविधि दीक्षा पाकर अपने आचार का पालन करे।
श्लोक 27 (13.243.27)
गृह्णीयादप्युपाध्यायान्मोक्षज्ञानमनिन्दितः । द्विविधं च पुनर्मोक्षं साङ्ख्ययोगमिति स्मृतिः ॥
gṛhṇīyādapyupādhyāyānmokṣajñānamaninditaḥ | dvividhaṃ ca punarmokṣaṃ sāṅkhyayogamiti smṛtiḥ
निन्दा से रहित होकर वह उपाध्याय से मोक्ष का ज्ञान ग्रहण करे। मोक्ष दो प्रकार का है, जिसे स्मृति में साङ्ख्य और योग कहा गया है।
श्लोक 28 (13.243.28)
पञ्चविंशतिविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते । ऐश्वर्यं देवसारूप्यं योगशास्त्रस्य निर्णयः । तयोरन्यतरं ज्ञानं शृणुयाच्छिष्यतां गतः ॥
pañcaviṃśativijñānaṃ sāṅkhyamityabhidhīyate | aiśvaryaṃ devasārūpyaṃ yogaśāstrasya nirṇayaḥ | tayoranyataraṃ jñānaṃ śṛṇuyācchiṣyatāṃ gataḥ
पच्चीस तत्त्वों का विशेष ज्ञान साङ्ख्य कहलाता है; ऐश्वर्य और देवताओं का सारूप्य योगशास्त्र का निर्णय है। शिष्यभाव को प्राप्त होकर वह इन दोनों में से किसी एक का ज्ञान सुने।
श्लोक 29 (13.243.29)
नाकालो नाप्यकाषायी नाप्यसंवत्सरोषितः । नासाङ्ख्ययोगो नाश्राद्धं गुरुणा स्नेहपूर्वकम् । समः शीतोष्णहर्षादीन्विषहेत स वै मुनिः ॥
nākālo nāpyakāṣāyī nāpyasaṃvatsaroṣitaḥ | nāsāṅkhyayogo nāśrāddhaṃ guruṇā snehapūrvakam | samaḥ śītoṣṇaharṣādīnviṣaheta sa vai muniḥ
न असमय आने वाला, न काषाय वस्त्र धारण न करने वाला, न गुरु के पास एक वर्ष न रहा हुआ, न साङ्ख्य और योग से रहित, न श्रद्धाहीन: गुरु स्नेहपूर्वक यह ज्ञान देता है। वही सच्चा मुनि है जो सर्दी-गर्मी और हर्ष आदि को समभाव से सह लेता है।
श्लोक 30 (13.243.30)
अधृष्यः क्षुत्पिपासाभ्यामुचितेभ्यो निवर्तयेत् । त्यजेत्सङ्कल्पजान्ग्रन्थीन्सदा ध्यानपरो भवेत् ॥
adhṛṣyaḥ kṣutpipāsābhyāmucitebhyo nivartayet | tyajetsaṅkalpajāngranthīnsadā dhyānaparo bhavet
भूख और प्यास से अपराजेय होकर वह इन्द्रियों को उनके अभ्यस्त विषयों से हटा ले; संकल्प से उत्पन्न गाँठों को त्याग दे और सदा ध्यान में तत्पर रहे।
श्लोक 31 (13.243.31)
कुण्डिकाचमसं शिक्यं छत्रं यष्टिमुपानहौ । चेलमित्येव नैतेषु स्थापयेत्स्वाम्यमात्मनः ॥
kuṇḍikācamasaṃ śikyaṃ chatraṃ yaṣṭimupānahau | celamityeva naiteṣu sthāpayetsvāmyamātmanaḥ
कमण्डलु, चमस, सिक्का, छत्र, दण्ड, पादुकाएँ और वस्त्र, इनमें से किसी में भी वह अपने स्वामित्व की भावना न जमाए।
श्लोक 32 (13.243.32)
गुरोः पूर्वं समुत्तिष्ठेज्जघन्यं तस्य संविशेत् । नैवाविज्ञाप्य भर्तारमावश्यकमपि व्रजेत् ॥
guroḥ pūrvaṃ samuttiṣṭhejjaghanyaṃ tasya saṃviśet | naivāvijñāpya bhartāramāvaśyakamapi vrajet
वह गुरु से पहले उठे और उनके बाद सोए। अपने स्वामी को बताए बिना आवश्यक कार्य से भी कहीं न जाए।
श्लोक 33 (13.243.33)
द्विरह्नि स्नानशाटेन संध्ययोरभिषेचनम् । एककालाशनं चास्य विहितं यतिभिः पुरा ॥
dvirahni snānaśāṭena saṃdhyayorabhiṣecanam | ekakālāśanaṃ cāsya vihitaṃ yatibhiḥ purā
दिन में दो बार स्नान-वस्त्र पहनकर स्नान, दोनों संध्याओं में अभिषेक, और दिन में एक ही बार भोजन: प्राचीन काल में यतियों ने उसके लिए यही विधान किया है।
श्लोक 34 (13.243.34)
भैक्षं सर्वत्र गृह्णीयाच्चिन्तयेत्सततं निशि । कारणे चापि सम्प्राप्ते न ज्ञाप्येत कदाचन ॥
bhaikṣaṃ sarvatra gṛhṇīyāccintayetsatataṃ niśi | kāraṇe cāpi samprāpte na jñāpyeta kadācana
वह सर्वत्र भिक्षा ग्रहण करे और रात्रि में निरन्तर चिन्तन करे; कोई कारण उपस्थित होने पर भी उसे कभी प्रकट न किया जाए।
श्लोक 35 (13.243.35)
ब्रह्मचर्यं वने वासः शौचमिन्द्रियसंयमः । दया च सर्वभूतेषु तस्य धर्मः सनातनः ॥
brahmacaryaṃ vane vāsaḥ śaucamindriyasaṃyamaḥ | dayā ca sarvabhūteṣu tasya dharmaḥ sanātanaḥ
ब्रह्मचर्य, वन में निवास, शुद्धि, इन्द्रियसंयम और सब प्राणियों पर दया: यही उसका सनातन धर्म है।
श्लोक 36 (13.243.36)
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । आत्मयुक्तः परां बुद्धिं लभते पापनाशिनीम् ॥
vimuktaḥ sarvapāpebhyo laghvāhāro jitendriyaḥ | ātmayuktaḥ parāṃ buddhiṃ labhate pāpanāśinīm
सब पापों से मुक्त, हल्का भोजन करने वाला, जितेन्द्रिय और आत्मा में स्थिर होकर वह पाप का नाश करने वाली परम बुद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 37 (13.243.37)
यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
yadā bhāvaṃ na kurute sarvabhūteṣu pāpakam | karmaṇā manasā vācā brahma sampadyate tadā
जब वह कर्म, मन और वाणी से किसी भी प्राणी के प्रति पापभाव नहीं रखता, तब वह ब्रह्म हो जाता है।
श्लोक 38 (13.243.38)
अनिष्ठुरोऽनहङ्कारो निर्द्वन्द्वो वीतमत्सरः । वीतशोकभयाबाधं पदं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥
aniṣṭhuro'nahaṅkāro nirdvandvo vītamatsaraḥ | vītaśokabhayābādhaṃ padaṃ prāpnotyanuttamam
कोमल, अहंकाररहित, द्वन्द्वों और ईर्ष्या से मुक्त होकर वह शोक, भय और बाधा से रहित अनुपम पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 39 (13.243.39)
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी समलोष्टाश्मकाञ्चनः । समः शत्रौ च मित्रे च निर्वाणमधिगच्छति ॥
tulyanindāstutirmaunī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ | samaḥ śatrau ca mitre ca nirvāṇamadhigacchati
निन्दा और स्तुति में समान, मौन रहने वाला, ढेले, पत्थर और सोने को एक-सा मानने वाला, तथा शत्रु और मित्र में समान, वह निर्वाण को प्राप्त होता है।
श्लोक 40 (13.243.40)
एवं युक्तसमाचारस्तत्परोऽध्यात्मचिन्तकः । ज्ञानाभ्यासेन तेनैव प्राप्नोति परमां गतिम् ॥
evaṃ yuktasamācārastatparo'dhyātmacintakaḥ | jñānābhyāsena tenaiva prāpnoti paramāṃ gatim
इस प्रकार संयत आचार वाला, उसी में तत्पर और आत्मचिन्तन करने वाला पुरुष उसी ज्ञान के अभ्यास से परम गति को प्राप्त करता है।